Village Superstition Story : लुटेरा

Village Superstition Story. उस गांव में 40 घर थे. सभी परिवार खेती और पशुपालन करते थे. इन घरों में पढ़ाईलिखाई की बेहद कमी थी. दूरदूर तक कोई स्कूल नहीं था. यहां के सभी लोग भूतप्रेत, जिन और टोनेटोटके में पूरी तरह यकीन रखते थे.

इसी गांव का नहनू एक दिन शाम ढलने के बाद अपने खेतों से घर लौट रहा था. अंधेरा काफी बढ़ चुका था. गांव को आने वाली पगडंडी में वह सरपट चला जा रहा था. पगडंडी के खत्म होते ही चौड़ा रास्ता आ जाता था, जिस में दोनों ओर सरकंडों के झुरमुट खड़े थे.

नहनू ने अपनी जेब से बीड़ीमाचिस निकाली और सुलगाने लगा. जैसे ही उस ने तीली जलाई, सरकंडों से ‘होंहों’ की आवाज आने लगी. नहनू डर कर चुपचाप खड़ा हो गया.

थोड़ी देर बाद नहनू ने देखा कि सरकंडों के पीछे से एक काली सी परछाईं रास्ते में आ कर खड़ी है. स्याह काली दिखने वाली वह परछाईं नहनू की तरफ बढ़ने लगी.

अभी भी उस परछाईं के मुंह से ‘होंहों’ की आवाज निकल रही थी.

नहनू सहम गया. उस ने हिम्मत कर के पूछा, ‘‘कौन है वहां?’’

परछाईं ने कहा, ‘‘मुझे उजाले से सख्त नफरत है. तू ने मेरे सामने उजाला क्यों किया?’’ कहतेकहते परछाईं ने नजदीक आ कर नहनू को अपने हाथों में उठा लिया और उसे जोरजोर से जमीन पर पटकने लगी.

काफी देर तक यही सिलसिला चलता रहा. इस में नहून का एक पैर और कुछ पसलियां टूट गईं.

नहनू हाथ जोड़ कर उस से जान बख्शने की भीख मांगने लगा.

परछाईं थोड़ी दूर जा खड़ी हुई. अब भी उस के मुंह से ‘होंहों’ की आवाज निकल रही थी.

परछाईं ऊपर से नीचे तक बिलकुल नंगी थी. शरीर एकदम काला था. उस ने नहनू को चेतावनी दी, ‘‘मैं एक जिन हूं. मुझे उजाले से सख्त नफरत है. जो भी इस गांव में अपने घर में उजाला करेगा, उसे मैं मार डालूंगा.’’

इतना कह कर वह जिन सरकंडों के झुरमुट में घुस गया.

बेचारा नहनू डर से कांप रहा था. अपनी टूटी टांग को घसीटता हुआ वह गांव की ओर भाग लिया.

गांव में जिस ने भी सुना, नहनू के घर की तरफ दौड़ पड़ा.

गांव में एक 70 साला हरजी बाबा था, जो झाड़फूंक करता था. लोगों के मुताबिक, उस के सिर पर भैरों आते थे. हर दीवाली और दशहरे को उस के घर झाड़फूंक कराने वालों का तांता लग जाता था.

बाबा को नहनू के घर बुलाया गया. उस ने आते ही एक लोटे में पानी मंगवाया. अपनी उंगलियां उस ने लोटे में डालीं और कुछ बुदबुदाने लगा.

लोटे से पानी ले कर उस ने नहनू के ऊपर छिड़का, बाकी पानी को उस ने नहनू के घर के दरवाजे पर छिड़क दिया.

वहां खड़े सभी लोगों के चेहरों पर डर साफ देखा जा सकता था.

आखिरकार गांव के एक आदमी ने बाबा से पूछा, ‘‘माजरा क्या है?’’

बाबा ने घर में चारों ओर नजर दौड़ाई और कहने लगा, ‘‘नहनू, आज तू बच गया. जब तुझे जिन पटक रहा था, मुझे तो तभी पता लग गया था. उसी समय मैं ने भैरों को वहां भेज दिया था, तभी तेरी जान बची है.’’

फिर बाबा थोड़ी देर के लिए चुप हो गया.

उस आदमी ने फिर पूछा, ‘‘बाबा, आज तो यह घटना नहनू के साथ हुई है, कल किसी और के साथ भी हो सकती है. इस का कोई इलाज तो होगा?’’

‘‘उस ने नहनू से कह तो दिया कि उसे उजाले से नफरत है. इस जिन का इस योनि में अभी समय बाकी है. जब तक इस का समय पूरा नहीं हो जाता, इस को भगाने का कोई तरीका नहीं है.

‘‘अब सभी को थोड़ी सावधानी बरतनी होगी. अंधेरा होते ही कोई घर से बाहर न निकले. अपने घर में रात को दीया मत जलाओ. चूल्हे का काम दिन में ही कर लिया करो. अगर जिन से कभी तुम्हारा सामना हो जाए, तो उस से बिना बात किए दूसरी जगह चले जाओ.

‘‘जिन इनसान को तभी परेशान करता है, जब उस की बात न मानी जाए. वह अगर किसी रात तुम्हारे घर में भी घुस आए, तो उस से बात मत करना. वह जो भी खाए, खाने दो. वह जो भी करे, करने दो. फिर वह तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ेगा,’’ हरजी बाबा ने सभी को सावधान करते हुए अपनेअपने घर जाने का इशारा किया.

60-70 के दशक में गांवों में भूतप्रेत या जिन के किस्से आम थे. तरहतरह की गलतफहमियां और अंधविश्वास की जड़ें मजबूती से लोगों के दिमाग में बस गई थीं. कई लोग तो यहां तक कहते थे कि अगर किसी भूत या जिन का दिल किसी औरत पर आ जाए, तो वह आम इनसानों की तरह उस के साथ रहता है.

इस बात को और मजबूत करते हुए कई लोग कहते थे कि फलां गांव में तो एक औरत से भूत के बच्चे भी पैदा हो गए थे.

भादोें का महीना था. दिन में बारिश भी खूब हुई थी. गांव में जगहजगह पानी भर गया था. घनघोर अंधेरी रात में झुंगुरों की आवाज ने माहौल को और भी डरावना बना रखा था. काली रात ऐसी लग रही थी मानो निगल जाएगी.

ऐसे में गांव के आखिरी छोर पर राजंती अपने कच्चे घर में किवाड़ बंद कर के सोने की कोशिश कर रही थी. उस का पति धरमू आज भैंस लेने मेले में गया था. रात को वह रास्ते में अपने एक रिश्तेदार के पास ही रुक गया था.

बादलों की गड़गड़ाहट से राजंती मन ही मन घबरा रही थी. वह अभी सोई भी नहीं थी कि कहीं से ‘छपछप’ की आवाजें आने लगीं. उस ने सोचा कि कोई कुत्ता या दूसरा जानवर रास्ते में भरे पानी से हो कर जा रहा होगा.

थोड़ी ही देर बाद उस के दरवाजे पर ‘खटखट’ की आवाज आई. राजंती ने सोचा कि शायद मेले से उस का पति लौट आया है. खड़ी हो कर उस ने किवाड़ खोल दिए. देखा तो सामने लंबे कद की एक भयानक सी दिखने वाली परछाईं खड़ी थी.

राजंती को समझाते देर न लगी कि वह जिन है. वह चुपचाप सहमी सी खड़ी रही. जिन के मुंह से ‘होंहों’ की आवाज आने लगी. डर के मारे राजंती थरथर कांप रही थी.

थोड़ी देर बाद जिन बोला, ‘‘मेरे लिए दूधघी लाओ.’’

राजंती बिना देर किए दूध और घी निकाल लाई. जिन तेजी से दूधघी खाने लगा. खाने के बाद वह राजंती की तरफ बढ़ा. उस ने दोनों हाथों से राजंती को बांहों में कस कर पकड़ लिया.

राजंती डर के मारे बेहोश हो गई. काफी रात बीत जाने के बाद राजंती को होश आया. उस का शरीर दर्द से फटा जा रहा था. उस का अंगअंग दुख रहा था.

राजंती समझ गई कि जिन ने उस के साथ मुंह काला किया है. रातभर वह सहमी सी अपने घर में बैठी रही. उस की आंखों से नींद कोसों दूर थी.

सुबह होते ही राजंती हरजी बाबा के पास गई. उस के कपड़ों में कालेकाले निशान बन गए थे. बाबा के पास पहले से ही काफी भीड़ थी. राजंती ने जिन के अपने घर आने की बात बताई, लेकिन अपने साथ किए गलत काम की बात उस ने छिपा ली.

बाबा ने कहा, ‘‘तू ने बहुत अच्छा किया राजंती, जो जिन को दूधघी खिला दिया और उस का विरोध नहीं किया, नहीं तो जाने क्या अनर्थ हो जाता.’’

उसी गांव का बसंता अपने जमाने का नामी पहलवान रह चुका था. अच्छा खाना और कसरत करना शुरू से उस का शौक था. 55 साल की उम्र में भी उस का शरीर 30 साल के जवान जैसा था.

बसंता ने कभी जिन की बातों पर यकीन नहीं किया. वह लोगों से कहता था, ‘यह बस मन का वहम है. अगर सचमुच जिन है भी, तो कभी मुझे मिला तो उस से कुश्ती जरूर लड़ूंगा. मैं किसी भूतजिन से नहीं डरता.’

और वाकई वह डरता भी नहीं था. कई बार अंधेरा होने के बाद वह गांव में 2-3 चक्कर लगा कर आता था. बीचबीच में लोगों से पूछता भी जाता था, ‘किसी के घर में अगर जिन आ गया हो, तो मुझे बताओ. मैं उसी की तलाश में घूम रहा हूं.’

पिछले 2 महीनों की अंधेरी रातों में जिन गांव की 10 औरतों की इज्जत लूट चुका था. लाजवश किसी भी औरत ने इस की चर्चा एकदूसरे से नहीं की. एक खास बात यह होती कि जिस भी औरत के साथ जिन सैक्स करता, उस के कपड़ों पर अजीब से काले धब्बे बन जाते थे.

उस दिन घनघोर काली अमावस्या की रात थी. सरवण और उस की पत्नी लाली ने दिनभर खलिहान में काम किया था. दोनों थके हुए थे. सरवण को बाहर बैठक में जल्दी ही नींद आ गई. लाली अंदर सो रही थी.

अचानक सरवण की नींद खुल गई. उस ने देखा कि काला जिन उस की बैठक में से होते हुए घर में घुस रहा है.

सरवण डर के मारे कांप रहा था, मगर चुपचाप बिस्तर में ही दुबका रहा.

अंदर पहुंच कर जिन वही ‘होंहों’ की डरावनी आवाज करने लगा. उस से लाली की नींद टूट गई.

लाली हड़बड़ा कर उठी. डर से वह कांप रही थी. इस सर्द रात में भी उसे पसीना आ गया. जिन ने लाली से भी दूधघी की फरमाइश की. लाली ने तुरंत घर में रखी दूध और घी की मटकी ला कर उस के सामने रख दी और एक ओर खड़ी हो गई.

खाने के बाद जिन ने वही किया, जो उस ने बाकी औरतों के साथ किया था. फिर वह तेजतेज कदमों से घर में से निकल कर बैठक में से हो कर बाहर जा रहा था. अचानक बैठक में रखी ओखली में उस का पैर फंस गया और वह धड़ाम से नीचे गिरा.

सरवण अधखुली आंखों से यह सब देख रहा था. उसे खटका हुआ. उस के दिमाग में हलचल हुई. जिन में तो दैवीय ताकत होती है, वह एक साधारण ओखली में फंस कर कैसे गिर सकता है.

सरवण बिजली की फुरती से उठा और सिरहाने रखी लाठी को उठाया. न जाने उस में उस समय बला की फुरती कहां से आ गई थी. उस ने आव देखा न ताव, जिन की खोपड़ी पर पूरी ताकत से लाठी दे मारी.

इस हमले से जिन संभल नहीं पाया और धड़ाम से गिर कर बेहोश हो गया. लाली भी भाग कर वहां आ गई और चीखने लगी.

थोड़ी ही देर में आसपड़ोस के लोग वहां जमा हो गए. लाली अंदर से दीया जला कर ले आई. उस रोशनी में लोगों ने देखा कि जिन की खोपड़ी से खून की तेज धार निकल रही है.

लोगों ने ध्यान से देखा, तो चेहरा कुछ जानापहचाना सा लगा. उस के सारे शरीर पर कालिख पुती हुई थी. लोगों ने उस के ऊपर बालटी भर पानी डाला.

कालिख उतरने के बाद लोगों की हैरानी का ठिकाना नहीं रहा. सरवण के मुंह से निकला, ‘‘अरे, यह तो अपने ही गांव का बसंता है.’’

अब बसंता को धीरेधीरे होश आ रहा था. उस का सिर चकरा रहा था और वह दर्द के चलते कराह रहा था. लोगों ने उसे उठा कर गांव की चौपाल पर लिटा दिया. जब उसे पूरी तरह होश आ गया, तो लोगों ने उसे पीटना शुरू कर दिया. उसे पीटपीट कर अधमरा कर दिया. उस पिटाई में उस का एक हाथ और एक पैर भी टूट गया था.

बसंता लोगों से अपनी जिंदगी बख्शने की भीख मांग रहा था. बोलतेबोलते उस का गला सूखा जा रहा था. उस ने हाथ जोड़ कर पानी देने की मिन्नत की.

थोड़ी देर बाद बसंता के दोनों बेटे भी वहां आ गए. उन्होंने लोगों से कहा कि बसंता ने जो गुनाह किया है, उस की सजा के लिए इसे पुलिस के हवाले कर देना चाहिए. वहीं इसे अपने किए की सजा मिलेगी. गांव के लोग बसंता को सुबह पुलिस के हवाले करने पर राजी हो गए.

गांव के एक आदमी ने राय दी कि पहले इस से यह तो पूछो कि इस जुर्म में और कौनकौन इस के साथ शामिल हैं. सभी ने इस का समर्थन किया और बसंता से सख्ती से पूछने लगे.

बसंता कहने लगा, ‘‘मेरी पत्नी को मरे हुए 7 साल हो गए. दिमाग में गलत विचारों ने घर बना लिया था. मैं औरत के लिए तरस गया था. एक दिन मैं ने इस की चर्चा हरजी बाबा से की, तो उस ने ही मुझे यह रास्ता बताया. सारी योजना उसी की थी.

‘‘तय यह हुआ था कि डर की वजह से जब सब लोग अपने खलिहानों में नहीं जाएंगे, तो मैं अनाज की चोरी कर के उसे बेच दूंगा. उस का आधा हिस्सा हरजी लेगा.

‘‘मैं रोज तुम्हारे खलिहानों से अनाज चुरा कर बेच देता था और उस का आधा हिस्सा हरजी को पहुंचा देता था.

‘‘इसी डर की आड़ में मैं अपनी सैक्स की इच्छा पूरी कर लेता था. गांव में हरजी ने ही लोगों में डर फैलाने में अहम भूमिका निभाई थी. मैं उस के इशारों पर ही काम कर रहा था,’’ कहतेकहते बसंता फूटफूट कर रोने लगा.

दूसरे दिन गांव में पुलिस आई. उस ने बसंता के बाड़े की तलाशी ली. वहां से एक मटकी कालिख की मिली, जिसे बसंता जिन बनने से पहले अपने शरीर पर पोतता था. 5 हजार रुपए नकद और भूसे में कुछ अनाज की चुराई हुई बोरियां भी मिलीं.

पुलिस बसंता को पकड़ कर ले गई. उस पर मुकदमा चलाया गया. अपनी बदनामी के डर से गांव की किसी भी औरत ने अपने साथ हुए गलत काम की शिकायत नहीं की. इसलिए बसंता को सिर्फ चोरी के केस में 3 साल की सजा हो गई. हरजी को जुर्म में साथ देने की वजह से एक साल की सजा हुई. Village Superstition Story

Story in Hindi : कर्मफल

Story in Hindi. गांव की एक कच्ची सड़क पर धूल उड़ाती सूरज की गाड़ी ईंटभट्ठे पर पहुंची. मुनीम उसे दफ्तर में ले आया. कुछ समय तक सूरज ने फाइलें देखीं, फिर मुनीम उसे भट्ठे का मुआयना कराने लगा, ताकि वह भट्ठे के काम को समझ  सके और सभी मजदूर भी अपने छोटे ठाकुर से परिचित हो जाएं.

चलतेचलते सूरज और मुनीम एक ओर गए, जहां कई औरतें मिट्टी गूंधने में मसरूफ थीं. सूरज की नजर खूबसूरत चेहरे, गदराए जिस्म, नशीली आंखों और संतरे की फांकों जैसे होंठों वाली एक लड़की पर जा टिकी.

‘‘मुनीमजी, हम पहली बार मिट्टी में गुलाब खिला हुआ देख रहे हैं,’’ सूरज ने उस लड़की के बदन का बारीकी से मुआयना करते हुए कहा.

‘‘हुजूर, यहां हर रोज आप को ऐसे ही गुलाब खिले मिलेंगे…’’ मुनीम ने भी चुटकी ली.

‘‘मुनीमजी, उस लड़की को कितनी तनख्वाह मिलती है?’’ सूरज ने पूछा.

‘‘हुजूर, वह तनख्वाह पर नहीं, 60 रुपए की दिहाड़ी पर काम करती है,’’ मुनीम ने बताया.

‘‘बस, 60 रुपए हर रोज… आप इतनी कम दिहाड़ी दे कर उस के हुस्न की तौहीन कर रहे हैं,’’ सूरज ने शिकायती अंदाज में कहा.

‘‘सभी मजदूरों की दिहाड़ी दीवाली पर बढ़ाई जाती है. पिछली दीवाली पर उस की दिहाड़ी 50 रुपए से 60 रुपए हो गई थी. अगली दीवाली पर 70 रुपए कर देंगे,’’ मुनीम ने कहा.

‘‘वह लड़की कितने दिनों से यहां काम कर रही है?’’ सूरज ने पूछा. ‘‘हुजूर, तकरीबन 3 साल से,’’ मुनीम ने जवाब दिया.

‘‘3 साल में हर मजदूर को तरक्की मिल जाती है, पर अब तक उस लड़की की तरक्की क्यों नहीं हुई?’’ सूरज ने नाराजगी जताई. ‘‘हुजूर, दीवाली पर उस का प्रमोशन कर देंगे,’’ मुनीम तुरंत बोला.

अगले पड़ाव पर काम में मसरूफ दूसरी लड़कियों पर नजर डालते हुए सूरज बोला, ‘‘मुनीमजी, ईंटों का यह बगीचा खूबसूरत फूलों से भरा पड़ा है.’’

‘‘हुजूर, यह बगीचा आप का ही है. मैं तो सिर्फ माली हूं. इस बगीचे का जो फूल आप के मन को भाया करे, तो गुलाम को हुक्म कर दें. उसे आप की सेवा के लिए हाजिर कर दिया जाएगा,’’ मुनीम बेहिचक बोला.

पहले तो सूरज ने तीखी नजरों से मुनीम को देखा, फिर एक आजाद कहकहा मार कर बोला, ‘‘आप का बड़ा पारखी दिमाग है. इतनी सी देर में आप हमारी इच्छाओं से वाकिफ हो गए.’’

सूरज के मुंह से अपनी तारीफ सुन कर मुनीम के चेहरे पर मुसकान उभर आई.

सूरज बोला, ‘‘मुनीमजी, हम सब से पहले उस लड़की का प्रमोशन करना चाहते हैं, जिस की मदमस्त जवानी ने हमारे अंदर हलचल सी मचा दी है.’’

अगले दिन मुनीम ने उस लड़की को सूरज की हवेली में पहुंचा दिया.

‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’ सूरज ने मुसकराते हुए पूछा. ‘‘सुमन…’’ उस लड़की ने शरमाते हुए अपना नाम बताया.

‘‘सुमन का मतलब जानती हो?’’ सूरज ने उस की तरफ बारीकी से नजर डालते हुए पूछा. ‘‘फूल…’’ सुमन बोली.

‘‘तुम भी फूल जैसी कोमल, खूबसूरत और महक वाली हो. तुम्हारे रूप के मुताबिक ही तुम्हारा काम होना चाहिए, इसीलिए तुम्हारे काम में बदलाव कर के तुम्हें तरक्की दे दी है. अब तुम भट्ठे पर काम करने के बजाय यहां का काम देखोगी,’’ सूरज ने उस को बताया.

सुमन अपने काम में मसरूफ हो गई और कुछ ही देर में सूरज के लिए कौफी बना लाई. कौफी का प्याला मेज पर रखने के लिए वह झुकी, तो उस के उभार बाहर झांकने लगे.

सुमन जैसे ही सीधी हुई, सूरज ने आ कर उसे अपनी बांहों के घेरे में ले लिया.

‘‘छोटे ठाकुर, यह क्या कर रहे हैं आप? मैं गांव की लड़की हूं और यह सब नहीं करती,’’ सुमन सूरज की पकड़ से निकलने की कोशिश करने लगी.

सूरज ने बांहों का घेरा कस लिया और बोला, ‘‘शहर में यह सब आम बात है. तुम्हारी जवानी उफनती नदी की तरह है. मैं तुम्हारी जवानी के समंदर में डूब जाना चाहता हूं.’’

अगले ही पल सूरज की उंगलियां सुमन की छाती पर रेंगने लगीं. वह सुमन को बिस्तर पर ले गया. अगले ही पल एकएक कर के सुमन की देह से सारे कपड़े अलग होते चले गए. 2 जवान देहों के टकराने से उठा तूफान तब थमा, जब दोनों जिस्म थक कर निढाल पड़ गए.

मुनीम की मदद से सूरज की इन हरकतों को बढ़ावा मिलता रहा. एक दिन मुनीम के पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक गई, जब सूरज की नजर उस की जवान बेटी पर रुकी. वह किसी काम के सिलसिले में मुनीम के पास आई थी.

‘‘मुनीमजी, इस भट्ठे पर हम पहली बार इस लड़की को देख रहे हैं. अब तक उसे कहां छिपा कर रखा था?’’ सूरज ने बेहिचक पूछा. ‘‘छोटे ठाकुर, यह मेरी बेटी पुष्पा है,’’ मुनीम के चेहरे का रंग उतर गया.

‘‘मुनीमजी, पुष्पा हो या सुमन, एक ही बात है. दोनों का मतलब एक ही होता है… फूल. और तुम यह बात अच्छी तरह जानते हो कि हम खूबसूरत फूलों के बहुत शौकीन हैं. जो फूल हमें अच्छा लगता है, उसे सूंघते जरूर हैं,’’ सूरज बोला.

मुनीम का दिल धक से रह गया, ‘‘छोटे ठाकुर, पुष्पा मेरी बेटी है.’’ ‘‘सुमन भी किसी की बेटी थी,’’ सूरज ने ताना कसा.

मुनीम को वहां से खिसकने में देर न लगी. लेकिन उस के कानों में सूरज के बोलने की आवाज आती रही, ‘‘मुनीमजी, मेरी बातों की टैंशन मत लेना. आज मुझे  शराब कुछ ज्यादा चढ़ गई है, इसलिए जबान काबू में नहीं है.’’

मुनीम तेज कदमों से अपनी बेटी के साथ दफ्तर से बाहर निकल आया.

एक दिन अनहोनी घटना घट गई. उस दिन मुनीम ईंटभट्ठे से घर लौटा, तो चौंक पड़ा. मुनीम ने सूरज को घर से बाहर निकलते देखा.

मुनीम के चेहरे पर चिंता के भाव उभर आए. उस के कदम घर में घुसने के लिए तेजी से बढ़े.

पुष्पा दीवार से टेक लगाए बैठी सुबक रही थी. यह नागवार नजारा देख कर मुनीम धड़ाम से फर्श पर गिर पड़ा. Story in Hindi

Hindi Story: बाथरूम

Hindi Story: सरपंच सोहन ठाकुर को पराई औरतों को ताड़ने की गंदी आदत थी. वे एक दलित औरत बलुई को अपनी छत से नहाते हुए देखते और उसे पाने की तरकीब लगाने लगे. क्या सोहन ठाकुर बलुई को पा सके?

सो  हन ठाकुर की उम्र 48 साल की हो गई थी, पर उन के अंदर अब भी जवानों के जैसा जोश बरकरार था. वे जम कर खाते और दंड पेलते थे. उन का अच्छाखासा शरीर था. सोहन ठाकुर को देख कर कोई यह नहीं कह सकता था कि उन का 20 साल का एक बेटा भी है. सोहन ठाकुर की एक खूबसूरत पत्नी भी थी, जिसे वे प्यार से रूपमती कहा करते थे. गांव का सरपंच होने के नाते उन की खूब इज्जत भी थी. गांव में सोहन ठाकुर का दोमंजिला मकान बना हुआ था, जिस के अंदर रूपमती के लिए एक खूबसूरत सी रसोई भी बड़े मन से बनवाई गई थी.

पंचायत में भी सोहन ठाकुर की बात को मान दिया जाता था. जब भी पंचायत लगती तो सोहन ठाकुर कोई भी फैसला देने से पहले एक अलग अंदाज में अपनी मूंछ पर ताव देते और फिर फैसला सुनाते और फैसला सुनाते समय उन के चेहरे पर गजब की चमक आती थी. 48 साल की उम्र होने के बाद और गांव में इतना रसूख होने के बाद भी सोहन ठाकुर का एक और पहलू था, जिसे सिर्फ वे ही जानते थे. वह पहलू यह था कि उन की आंखें किसी भी औरत का नंगा जिस्म देखने को हमेशा आतुर रहती थीं. गांव में खेतों के बीच काम करते समय मजदूर औरतों की छाती पर सोहन ठाकुर की नजरें बरबस ही जम जाती थीं.

सुबह के तकरीबन 10 बजे सोहन ठाकुर गांव के तालाब की तरफ टहलने चले जाते और वहां पर कोई कोई औरत कपड़े धोते दिख जाती, तो उस के खुले अंगों पर किसी गिद्ध की तरह उन की नजरें टिक जाती थीं. सोहन ठाकुर के मकान के पीछे 2-3 घर दलित जाति के लोगों के थे. इन्हीं घरों में बलुई रहती थी. बलुई की उम्र 40 साल के आसपास होगी. बलुई का शरीर लंबा और मांसल पर गठा हुआ था. सांवले रंग की बलुई ब्लाउज के नीचे कुछ नहीं पहनती थी, फिर भी उस की छाती तनी ही रहती थी.

बलुई अपनी पतली कमर पर साड़ी को काफी नीचे बांधती थी, इसलिए उस की गहरी नाभि साफ दिखाई देती थी. अकसर ही सोहन ठाकुर की नजरें बलुई के जिस्म का भरपूर मुआयना करती थीं. सोहन ठाकुर एक बार अपनी छत पर खड़े हो कर चारों तरफ देख रहे थे कि तभी उन के कानों में नल चलने और पानी गिरने की आवाज आई, तो उत्सुकतावश वे छत के कोने में गए और नीचे ?ांकने लगे. सोहन ठाकुर की आंखें खुशी और हैरत से फैल गईं. उन्होंने देखा कि नीचे बलुई अपने घर के कोने में लगे नल पर नहा रही थी. वजह, गांव के गरीब और दलित घरों में बंद बाथरूम नहीं होते, इसलिए औरतें खुले में ही नहाने को मजबूर होती हैं.

सोहन ठाकुर वैसे भी बहुत दिन से बलुई को घूरा करता थे, पर बलुई के तेज स्वभाव के चलते उन्होंने कभी बलुई को छूने की कोशिश नहीं की थी, पर वे बलुई के मांसल और गठीले शरीर के दीवाने तो थे ही, इसलिए रात में अपनी पत्नी रूपमती के साथ सैक्स करते, तब भी उन के खयालों में बलुई ही रहती थी.
बलुई आज सोहन ठाकुर के सामने बिना कपड़ों के नहा रही थी. वे ?ाट से थोड़ा सा पीछे हो गए, पर अपनी नजरें बलुई के जिस्म पर ही गड़ाए रखी थीं. बलुई अपने सांवले जिस्म को बारबार साबुन लगा कर मसल रही है, तो सोहन ठाकुर के समूचे जिस्म में हवस दौड़ गई और जब बलुई ने अपने हाथ उठा कर अपनी पीठ को रगड़ा, तब तो बलुई की जवानी खिल कर सामने ही गई.

सोहन ठाकुर जम कर बलुई के रूप के दर्शन कर रहे थे. जब बलुई नहा चुकी और कपड़े पहनने लगी, तो सोहन ठाकुर धीरे से पीछे हट गए और नीचे गए. उस दिन से रोज ही सोहन ठाकुर ने धीरेधीरे यह अंदाजा लगा लिया था कि बलुई दिन में दोपहर के तकरीबन 2 बजे नहाती है. शायद इस समय तक वह
खेतों और घर का सारा काम निबटा भी लेती होगी. अब सोहन ठाकुर बलुई को नहाते हुए घूरने का मौका तलाशते रहते कि बलुई कब नहाए और कब वे उसे घूर कर अपनी आंखों को मजा देते रहें. पर एक दिन नहाते समय अचानक बलुई की नजर ऊपर खड़े सोहन ठाकुर पर पड़ ही गई. उस दिन तो बलुई ने ?ाट से अपने हाथों से कैंची बनाई और अपने खुले सीने को ढक लिया और कमरे में भाग गई, पर संकोच के चलते कुछ कह सकी.

पर एक दिन बाद जब फिर से बलुई नहा रही थी, तो सोहन ठाकुर छिप कर उस के रूप के मजे ले रहे थे. तभी बलुई ने सोहन ठाकुर को देख लिया, पर इस बार बलुई डरी नहीं और सकुचाई भी नहीं. उस ने पहले तो कपड़ों से सीने को ढका और फिर तेज आवाज में सोहन ठाकुर से कहा, ‘‘अरे, ठाकुर साहब,
हमें छिप कर क्या देखते होअगर रस चखना है, तो कभी बाहर कर मिलो…’’ बलुई की आवाज सुन कर सोहन ठाकुर फौरन नीचे भाग गए कि कहीं ऐसा हो कि यह बात उन का बेटा और रूपमती जान जाएं. वे तुरंत अपने कमरे में जा कर लेट कर सोने का बहाना करने लगे, पर बलुई की कहीं गई बात उन के कानों में अब भी गूंज रही थी और मन ही मन में वे रोमांचित भी हो रहे थे.

बलुई जाति से दलित जरूर थी, पर अपने पति किसना के साथ अच्छी तरह से जिंदगी काट रही थी. उसे बस यह दुख था कि शादी के 10 साल बाद भी उन दोनों के कोई औलाद नहीं थी. हालांकि, अब तो उस ने औलाद के बारे में सोचना भी छोड़ दिया था और अपने काम पर ही पूरा ध्यान रखे हुए थी. किसना गांव के बाहर कसबे की ओर जाने वाली सड़क के किनारे पानपुडि़या और चिप्स, पानी की बोतल, कोल्डड्रिंक का खोखा लगाता था और आतेजाते लोग उस के कस्टमर होते थे. गुजारे लायक कमाई तो हो जाती थी, पर बलुई के अंदर आगे बढ़ने की और कुछ ज्यादा पैसे कमाने की मंशा भी थी, जिस से कि वह अपने पति के लिए सड़क के किनारे एक पक्की दुकान बनवा सके.

गांव में नई उम्र के लड़केलड़कियां मोबाइल चलाते, तो बलुई को भी शौक चढ़ता था कि वह भी मोबाइल पर अपनी वीडियो बनाए. बलुई को तो सुनने में यह भी आया था कि नाचगाने की रील बना कर पैसा भी कमाया जा सकता है. बलुई भी तो नाच सकती है और दूसरे लोगों से बेहतर नाच सकती है, पर इन सब चीजों के लिए उसे अच्छा मोबाइल चाहिए और मोबाइल लेने के लिए पैसा चाहिए, जो फिलहाल तो बलुई और उस के मरद के पास नहीं था.

उस दिन शाम ढले बलुई जब पास के बाजार से वापस रही थी, तब रास्ते में उसे सोहन ठाकुर मिल गए. वे बलुई को सामने देख कर थोड़ा डर गए, पर बलुई उन्हें देख कर मुसकरा दी, तो सोहन ठाकुर का साहस बंध गया और वे उस के तराशे बदन को ऊपर से नीचे देखने लगे. ‘‘देखने के भी पैसे लगेंगे ठाकुर साहब,’’ बलुई ने इठलाते हुए कहा तो सोहन ठाकुर को ग्रीन सिगनल मिल गया. उन्होंने ?ाट से 100 का नोट निकाल कर बलुई की तरफ बढ़ाया, तो बलुई ने लेने से मना कर दिया और बोली, ‘‘इतने में तो हमारे पैर ही देख पाओगे ठाकुर साहब…’’

सोहन ठाकुर सम? गए थे कि बलुई ज्यादा पैसे चाहती है और पैसों के बदले उस के हुस्न का मजा भी लिया जा सकता है, इसलिए उन्होंने 500 रुपए निकाले और बलुई को दे दिए, पर बलुई इतने में भी नहीं मानी, तो उन्होंने उसे 1,000 रुपए देने का वादा किया. सोहन ठाकुर की बात मान कर बलुई एक गन्ने के खेत की तरफ बढ़ गई और सोहन उस से दूरी बना कर पीछे चल दिए. गन्ने के खेत में जा कर सोहन ठाकुर ने बलुई के जिस्म से जरूरी कपड़े हटाए और उस खूबसूरत औरत के जिस्म को जम कर भोगा.

बलुई ने देखा कि सोहन ठाकुर उस के जिस्म को किसी कुत्ते की तरह चाट रहे थे. वह सोच रही थी, ‘हम को नीच जात का कह कर हमारे हाथ से पानी तक नहीं पीते हैं और इस समय अपनी जीभ भी हमारे अंदर डालने से इन्हें परहेज नहीं…’ सोहन ठाकुर और बलुई का यह सिलसिला शुरू हुआ, तो फिर आगे आने वाले दिनों में भी जारी रहा. बलुई पैसों के बदले खुद को ठाकुर को सौंप देती और ठाकुर को बलुई जैसी नमकीन औरत के जिस्म का मजा मिल जाता, पर बलुई इतनी बेवकूफ नहीं थी और है वह चरित्रहीन थी.

उस ने अपने पति से धोखा किया था, पर वह तो सोहन ठाकुर को अपना जिस्म सौंप कर कुछ पैसे इकट्ठे कर लेना चाहती थी, जिस से वह अपने नहाने के लिए एक छत वाली जगह बनवा सके, ताकि सोहन ठाकुर उसे और घूर सकें. एक दिन खेत में जब सोहन ठाकुर बलुई के जिस्म में घुसने की तैयारी कर रहे थे, तभी बलुई ने उन से एक एंड्राइड मोबाइल की मांग कर डाली. ठाकुर पहले तो हिचके, क्योंकि मोबाइल थोड़ा महंगा आता है, पर बलुई ने अपने अंगों को सिकोड़ लिया और संबंध मनाने से मना कर दिया, तो सोहन ठाकुर ने मोबाइल देने के लिए मजबूरन हां कर दी और बाद में उन को बलुई के लिए एक मोबाइल खरीदना ही पड़ा.

मोबाइल पा कर बलुई बहुत खुश हो गई थी और हाई स्कूल में पढ़ने वाली एक लड़की की मदद से उस ने फेसबुक और रील्स बनाना भी सीख लिया था. इस बीच गांव में पंचायत के चुनाव की तारीख निकट आने लगी थी और सोहन ठाकुर एक बार फिर से सरपंच बनने की जुगत में लग गए थे और घरघर जा कर हाथ जोड़ कर उन्हें ही सरपंच चुनने की विनती करने लगे थे. सरपंच के बेटे मोहित सिंह को अपने पिता के कामकाज से कोई मतलब नहीं था. वह तो अपने दोस्तों की मंडली में नशे की लत में पड़ चुका था. दोस्तों को ले कर सुबह से शाम तक इधरउधर घूमता, गांजे का दम भरता और औरतों पर बुरी निगाह रखता.
उस दिन बलुई अपने घर से निकल कर खेत में काम करने जा रही थी कि तभी मोहित सिंह ने बलुई का रास्ता रोक लिया. उस की आंखों में नशा था और चेहरे से हवस टपक रही थी.

बलुई तो मोहित सिंह से उम्र में काफी बड़ी थी, पर जब इनसान के सिर पर हवस चढ़ कर बोल रही हो, तो उसे कुछ नहीं दिखता. मोहित सिंह ने बलुई को अपनी मजबूत बांहों में जकड़ लिया और खेत में ले जा कर उस का रेप कर दिया. बलुई ने चीखना चाहा, पर मोहित सिंह ने अपना गमछा उस के मुंह में ठूंस दिया और अपनी मनमानी कर ली. बलुई को अपने साथ यह जबरन गलत काम बिलकुल नहीं भाया. वह सिसकती रही और घर कर नल के पानी से नहाने लगी.

बलुई के मन में तूफान चल रहा था कि अगर वह आज नाइंसाफी सह गई, तो आगे आने वाले समय में जाने कितनी बार ये ऊंची जाति वाले उस के साथ रेप करेंगे. हो सकता है कि कई लोग मिल कर एकसाथ उस के साथ गलत काम करें. ऐसा बलुई इसलिए भी सोच रही थी कि उस ने अपने बचपन में इस तरह के कई कांड होते हुए देखेसुने थे. अच्छा यही होगा कि वह अपने साथ हुए इस गलत काम के प्रति आवाज उठाए. लिहाजा, बलुई ने अपनी शिकायत को पंचायत में उठाने की बात सोची और अपने पति किसना से अपने साथ हुई वारदात को बताया.

किसना दुखी हुआ और गुस्से से भर गया, पर वह जानता था कि सरपंच के लड़के पर ऐसा आरोप लगाने से कोई फायदा नहीं होगा और उस ने यह बात बलुई को सम?ाई पर बदले की भावना से भरी हुई बलुई नहीं मानी और पंचायत में जा कर अपनी शिकायत दर्ज कराई. सरपंच सोहन ठाकुर अपने लड़के की यह करतूत सुन कर गुस्सा होने की बजाय मन ही मन खुश हो गए. मेरे बेटे ने भी बलुई का मजा ले लिया. वाह, हमारी पसंद तो काफी मिलतीजुलती है और इस का मतलब है कि मेरा बेटा भी जवान हो गया है,’ सोहन ठाकुर ने सोचा.

सरपंच के अलावा पंचायत के दूसरे सदस्यों ने बलुई के साथ हुए गलत काम पर अफसोस जताया और बलुई को भरोसा दिलाया कि उसे इंसाफ मिलेगा और इस के लिए इस हफ्ते की 8 तारीख को दोनों पक्षों की सुनवाई के लिए पंचायत को बुलाए जाने का तय हुआ. सोहन ठाकुर के सामने दिक्कत यह थी कि अगर वे फैसला बलुई के पक्ष में देते हैं, तो बेटे को सजा सुनानी पड़ेगी और अगर बेटे के पक्ष में फैसला सुनाते हैं, तो हो सकता है कि गांव वाले आने वाले चुनाव में उन्हें वोट दें और वे हार भी सकते हैं.

तय दिन और समय पर पंचायत लगी और पहले बलुई ने अपनी शिकायत रखी जिस में बलुई ने अपने साथ हुए रेप की बात बताई और इंसाफ मांगा. इस के बाद मोहित सिंह को बोलने का मौका दिया गया. मोहित अपने कांड से साफ मुकर गया. उलटा उस ने कहा कि बलुई उस पर ?ाठा आरोप लगा रही है. दोनों लोगों की बात पर फैसला देना था और यह फैसला सरपंच सोहन ठाकुर ने यह कह कर सुना दिया, ‘‘बलुई अपने साथ हुए रेप का कोई सुबूत नहीं ला सकी है. अगर वह अपने निजी अंगों को सब के सामने दिखा सके तभी तो हम जानेंगे कि रेप हुआ या नहीं.

‘‘लिहाजा, सुबूतों की कमी में मोहित ठाकुर को बरी किया जाता है और बलुई को सख्त हिदायत दी जाती है कि बिना सुबूत किसी शरीफ आदमी पर ऐसे आरोप लगाए.’’ बलुई का मन किया कि सोहन ठाकुर के मुंह पर जा कर थूक दे, पर उस ने अपनेआप को संभाला और बेइज्जती का घूंट पी लिया. रात में जब किसना ने उसे दिलासा देने के लिए अपने गले लगाया, तो बलुई की रुलाई फूट पड़ी थी, पर इन बहते आंसुओ में बदले लेने की भावना अब भी बलवती हो रही थी. सरपंच सोहन ठाकुर को अपने फैसले पर पछतावा तो हो रहा था, पर पुत्र मोह के चलते उन्हें ऐसा फैसला करना पड़ा, जिस ने बलुई को उन से नाराज कर दिया था.

बलुई सरपंच सोहन ठाकुर को सामने देख कर अपना रास्ता बदल लेती या तो उन्हें नफरतभरी निगाह से घूरती रहती थी. सोहन ठाकुर बस बलुई को देखते रह जाते थे. तकरीबन 2 महीने हो चले थे और सोहन ठाकुर को बलुई के जिस्म का मजा नहीं मिला था. अपने मन को शांत करने के लिए बलुई के नहाने के समय पर सोहन ठाकुर छत पर चले गए और हर बार की तरह इस बार भी बलुई को नहाते हुए देखने लगे.
बलुई तो पहले से ही सतर्क थी. आज वह अपने पेटीकोट को अपने सीने के ऊपर बांधे हुए थी. बलुई की कनखियों ने देखा कि सोहन ठाकुर छत पर गए हैं. उस ने ?ाट से अपने पैरों के पास रखे मोबाइल को उठाया और सैल्फी मोड पर किया और इस तरह से अपना वीडियो बनाने लगी, जिस से बलुई का चेहरा भी एक और पीछे से ठाकुर की ?ांकती हुई वीडियो भी जाए.

बलुई ने यह काम बहुत सफाई से किया, ताकि सोहन को शक भी हो और मोबाइल में सुबूत के तौर पर यह वीडयो भी कैद हो जाए और कुछ देर में ही बलुई ने कई छोटेछोटे वीडियो के क्लिप बना लिए थे.
बलुई के सामने मोहित सिंह और उस के दोस्त अकसर पड़ ही जाते थे. आज भी जब बलुई खेत से मजदूरी कर के रही थी तो मोहित सिंह और उस के दोस्त उसे छेड़ने लगे. ‘‘यार मोहित, जवान औरतों से ज्यादा तो बड़ी उम्र की औरतों में मजा है,’’ एक दोस्त ने फिकरा कसा, तो मोहित सिंह भी भद्दी सी हंसी हंसने लगा. बलुई को तो इसी मौके का इंतजार था,

‘‘तुम ने तो बेकार में जबरदस्ती की, मांग लेते तो भी मैं मना थोड़े ही करती, बल्कि गोश्त और दारू का इंतजाम कर के आप लोगों का मन भी बहला देती,’’ बलुई ने दांव खेला, तो मोहित सिंह उस के ?ांसे में गया और तुरंत ही उस ने जेब से 1,000 रुपए निकाले और बलुई को दिए, फिर कहा कि आज शाम को वह दारू ले आए और गोश्त पका कर रखे. वे लोग आज फिर से बलुई के हुस्न का स्वाद चखेंगे.
बलुई ने पूरा जाल बिछा दिया था. उस ने पंचायत चुनाव में सोहन ठाकुर के विरोधी नेता को अपनी सारी कहानी कह सुनाई थी और उस से मदद मांगी थी. वह नेता भी बलुई की मदद के लिए तैयार था, बस अब सुबूत जुटाने की तैयारी थी.

शाम को पुराने स्कूल के एक कमरे में बलुई ने दारू मंगवा ली और गोश्त पकाने लगी थी. मोहित सिंह और उस के 2 दोस्त भी गए और गोश्त पकने का इंतजार करने लगे थे. मोहित सिंह ने पहले से ही दारू पीनी शुरू कर दी थी. थोड़ी देर बाद जब गोश्त पक गया, तब बलुई ने प्लेट में खाना लगाया और सब लोग साथ में खाने लगे. खाना खाने के बाद मोहित सिंह की आंखों में हवस के डोरे तैर आए थे. उस ने बलुई के सीने पर हाथ रख दिया और दबाव बढ़ाने लगा. बलुई ने विरोध नहीं किया तो उस की हिम्मत बढ़ गई
और उस ने बलुई के जरूरी कपड़े ऊपर कर दिए. बलुई सम? गई कि यही सही समय है और उस ने इतने में उस ने विरोधी पार्टी के नेता को मदद के लिए फोन लगा दिया और वह फोन पर चिल्ला कर मदद मांगने लगी थी.

वह नेता तुरंत ही पुलिस ले कर गया और मौके पर ही नशे में चूर मोहित सिंह और उस के दोस्तों को गिरफ्तार कर लिया. ‘‘दारोगा साहब, सिर्फ यही कुसूरवार नहीं है, बल्कि इस का बाप भी मु? गरीब को रोज नहाते हुए देखता है,’’ बलुई ने कहा तो दारोगा के साथसाथ मोहित सिंह को भी अजीब लगा कि उस के पिता भी बलुई पर बुरी नजर रखते हैं. बलुई ने अपने मोबाइल का वीडियो पुलिस को दे दिया, जो उस ने अपने मोबाइल से शूट किया था, जिस में साफ दिख रहा था कि बलुई को सोहन ठाकुर अपनी छत से घूर रहे हैं.

सोहन ठाकुर को पुलिस ने खरीखोटी सुनाई और चेतावनी दे कर छोड़ दिया, जबकि उन के लड़के को रेप करने की कोशिश मे गिरफ्तार कर लिया गया. पंचायत चुनाव में सरपंच सोहन ठाकुर की जबरदस्त हार हुई. पूरे गांव में इन दोनों की कारिस्तानी की बात फैल गई थी और सब लोग सोहन ठाकुर और उन के लड़के मोहित सिंह के नाम पर थूथू कर रहे थे. सोहन ठाकुर की पत्नी रूपमती को जब यह बात पता चली, तो वे सीधे बलुई के घर पहुंचीं और अपने पति और बेटे की तरफ से माफी मांगी और पूरे 50,000 रुपए बलुई को दिए.

बलुई ने पैसे लेने से मना किया, तो रूपमती ने कहा, ‘‘ये पैसे मैं तुम्हें इसलिए दे रही हूं, ताकि तुम अपने नहाने की जगह एक बाथरूम बनवा सको और तुम्हें खुले आसमान के नीचे नहाना पड़े. जब तुम बाथरूम में नहाओगी, तो तुम्हें कोई भी नहीं घूर सकेगा.’’ रूपमती यह कह कर चुप हो गई थीं, जबकि बलुई सोच रही थी कि सोहन ठाकुर जैसे नीच को कितनी अच्छी पत्नी मिली है.

बलुई अब मोबाइल और भी कुशलता से चलाती है और उस ने और किसना ने खूब मेहनत कर के अब और भी पैसे भी जोड़ लिए हैं, पर अभी भी इतने पैसे नहीं इकट्ठा हो पाए हैं कि वे लोग सड़क के किनारे पक्की दुकान बनवा सकें, पर पैसे कमाने की उन की कोशिश जारी है. विरोधी पार्टी का नेता अब गांव का सरपंच है और उस ने पंचायत के 5 सदस्यों में बलुई को भी शामिल किया है. बलुई अब गांव वालों की समस्याएं सुनती है और अपना फैसला भी सुनाती है. बलुई और सरपंच की कोशिश से अब हर घर में नहाने की जगह एक बंद छत वाला बाथरूम बन गया है. गांव की कोई औरत अब खुले में नहीं नहाती है.  Hindi Story.

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