इन्फ्लुएंसर्स करते पौयजनस फूड का प्रचार लोग होते बीमार

कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब वायरल हुआ. वायरल वीडियो में दिखाया गया कि एक बच्चा जिस की उम्र लगभग 11-12 साल है, कुछ खा रहा है और खाते समय उस के मुंह से धुआं निकल रहा है. सामने ही एक स्टौल है जिस पर स्मोक्ड बिस्कुट लिखा हुआ है. बच्चा वहीं से बिस्कुट ले कर खा रहा है. असल में वह स्मोक्ड बिस्कुट खा रहा है.

दरअसल, स्मोक्ड बिस्कुट कोई अलग बिस्कुट नहीं है. नौर्मल बिस्कुट को ही लिक्विड नाइट्रोजन के साथ परोस दिया जाता है और इसे ही स्मोक्ड बिस्कुट कहा जाता है. असल में बच्चा वही स्मोक्ड बिस्कुट खा रहा है और बिस्कुट खाते ही बच्चे की तबीयत अचानक खराब हो जाती है. आननफानन बच्चे को हौस्पिटल ले जाया जाता है. जहां इलाज के बाद उसे घर भेज दिया जाता है. यह वीडियो कर्नाटक के दावणगेरे से आया है.

गुरुग्राम मामले में क्या हुआ

लेकिन यह कोई पहला केस नहीं है जहां कैमिकल का इस्तेमाल ठेलों, दुकानों, रैस्टोरैंटों में मिलने वाले फूड में किया जा रहा हो. इस से पहले भी खाने में कस्टमर को कैमिकल यूज्ड फूड दिया गया. अभी कुछ महीने पहले ही गुरुग्राम में एक केस आया था. जहां एक रैस्टोरैंट में डिनर करने गई फैमिली को माउथफ्रैशनर के नाम पर ड्राई आइस सर्व कर दी गई. ड्राई आइस खाते ही फैमिली के 5 लोग नेहा सबरवाल, मनिका गोयनका, प्रितिका रुस्तगी, दीपक अरोड़ा और हिमानी के मुंह से खून आने लगा. उन्हें उलटियां होने लगीं. वे दर्द से तड़पने लगे. जल्दबाजी में उन्हें हौस्पिटल ले जाया गया. जहां इलाज के बाद उन्हें घर भेज दिया गया.

जब डाक्टर से ड्राई आइस के बारे में बात की गई तो डाक्टर ने आशुतोष शुक्ला को बताया, ‘जब इन 5 लोगों ने ड्राई आइस के टुकड़े खाए तो ठंड के कारण उन के मुंह में अल्सर हो गया और उस से खून आना शुरू हो गया. इसी वजह से उन की हालत खराब हुई.’

इन दोनों घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि स्वाद के चक्कर में सेहत के साथ खिलवाड़ करना कितना महंगा साबित हो सकता है.

क्या है ड्राई आइस

बात करें अगर ड्राई आइस की तो ड्राई आइस जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि इसे सूखी बर्फ कहते हैं. जिस का टैंपरेचर 80 डिग्री तक होता है. यह सौलिड कार्बन डाइऔक्साइड से बना होता है. इसे आप आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं कि नौर्मल बर्फ को जब आप मुंह में रखते हैं तो वह पिघलने लगती है. जब नौर्मल बर्फ पिघलती है तो पानी में बदलने लगती है. वहीं ड्राई आइस पिघलती है तो वह सीधी कार्बन डाइऔक्साइड गैस में बदल जाती है. यह अकसर मैडिकल स्टोर, किराने के सामान को स्टोर करने के लिए किया जाता है. इस का इस्तेमाल फोटोशूट और थिएटर के दौरान भी किया जाता है.

ड्राई आइस इतनी खतरनाक है कि पेट में जाते ही वहां छेद बना देती है, जो काफी जानलेवा साबित हो सकता है. जब यह कार्बन डाइऔक्साइड गैस में बदल जाती है तो मुंह के आसपास के टिश्यूज और सेल्स को नुकसान पहुंचाती है.

लिक्विड नाइट्रोजन कितना खतरनाक

लिक्विड नाइट्रोजन कितना खतरनाक है, इस का अंदाजा इस घटना से लगाया जा सकता है.  2017 में दिल्ली में एक व्यक्ति ने गलती से ऐसी ड्रिंक पी ली थी जिस में लिक्विड नाइट्रोजन था. व्यक्ति को ड्रिंक से निकल रहे धुएं को हटाने के बाद उसे पीना था लेकिन उस ने धुएं हटने का इंतजार नहीं किया और उसे ऐसे ही पी लिया. इस के बाद उस व्यक्ति के पेट में दर्द हुआ और बाद में सर्जरी में पता चला कि उस के पेट में एक बड़ा छेद हो चुका है.

लिक्विड नाइट्रोजन और ड्राई आइस दोनों पदार्थों के नाम से ही सम?ा आता है कि लिक्विड नाइट्रोजन तरल होता है और ड्राई आइस ठोस. ड्राई आइस का तापमान -78.5 डिग्री सैल्सियस तक होता है. वहीं लिक्विड नाइट्रोजन इस से भी ज्यादा ठंडी होती है और इस का तापमान -196 डिग्री सैल्सियस तक हो सकता है. दोनों पदार्थों का इस्तेमाल खानेपीने की चीजों में स्मोक इफैक्ट देने के काम में किया जाता है.

कितने खतनाक हैं ये

2018 में अमेरिकी सरकार के फूड एंड ड्रग विभाग ने खानपान में लिक्विड नाइट्रोजन और ड्राई आइस के इस्तेमाल को ले कर एक रिपोर्ट पेश की थी. इस रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ड्राई आइस या लिक्विड नाइट्रोजन का इस्तेमाल सावधानी से न किया जाए तो अत्यधिक कम तापमान की वजह से यह घातक हो सकता है. इन्हें सीधेतौर पर खाना नहीं चाहिए. इस से स्किन और हमारे इंटरनल और्गन को नुकसान पहुंच सकता है.

लेकिन फिर भी दिनबदिन रासायनिक पदार्थों का खानपान में इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है और इन को बढ़ावा देने वाला और कोई नहीं, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों का ग्रुप है, जो खुद को फूड व्लौगर कहते हैं. ज्यादा व्यूज बटोरने के लिए ये दुकानदारों को उकसाते भी हैं कि अलग और बेढंगी चीजें बनाएं, उस के लिए ऊटपटांग फ्यूजन किए जाते हैं. दुकानदार भी ज्यादा वायरल होने के चक्कर में कुछ भी चीजें खाने में इस्तेमाल करते हैं, ताकि लोगों का ध्यान अनोखेपन पर जाए.

एक्सपैरिमैंटल फूड

सोशल मीडिया पर ये इन्फ्लुएंसर्स आएदिन ऐसे फूड स्टौल और रैस्टोरैंट को कवर करते हैं जो फ्यूजन के नाम पर कुछ भी बना रहे हैं, जैसे फेंटा मैगी, दही मैगी, चौकलेट पकोड़ा, पेस्टी मैगी, कौफी आइसक्रीम, गुलाबजामुन के पकौड़े, चुकंदर से बनी चाय, चौकलेट मोमोस, चौकलेट डोसा और न जाने क्याक्या. ये शरीर में जा कर कैसा प्रभाव छोड़ रहे हैं, इस पर कोई बात नहीं करता. इन क्या दिक्कतें हो रही हैं. इस पर कोई बात नहीं करता.

बहुत जगह दुकानदार वायरल होने के चक्कर में भरभर कर बटर, तेल, घी डाल कर दिखाता है. कोई आम इंसान जो नौर्मल या कहें घर का सिंपल खाना खाने वाला हो, इसे खा ले तो उस का सिर चकरा जाए, पैसे अलग उस के कुएं में जाएं.

मूक क्यों खाद्य विभाग

क्या फूड सेफ्टी एंड स्टेटैंडर्ड अथौरिटी औफ इंडिया (एफएसएसएआई) को इस ओर ध्यान नहीं देना चाहिए? क्यों यह विभाग इस पर चुप है? जिस तरह सोशल मीडिया पर खाने से संबंधित ऊटपटांग चीजें वायरल होती रहती हैं, घटिया चीजें परोसी जाती हैं, क्या यह फूड सिक्योरिटी औफिसर की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह ध्यान दे कि मैगी के साथ कोल्डड्रिंक का छौंका हैल्थ के लिए नुकसानदेह तो नहीं?

दरअसल, ये फूड औफिसर भी चीजों को चलता करने के मूड में रहते हैं या दुकानदारों से लेदे कर मामला रफादफा करते हैं. उन्हें नागरिकों की हैल्थ की परवा नहीं होती. सड़क के किनारे एक व्यक्ति ठेला खोल कर गरीबों को सस्ते में स्वाद वाला खाना तो दे रहा है पर साथ में बीमारियां भी दे रहा है. आम लोग कुछ कहते नहीं क्योंकि हर नुक्कड़, चौराहे पर यही कचरा परोसा जा रहा है.

फूड व्लौगर का साथ

फूड एक्सपैरिमैंट करने वाले दुकानदारों को फूड इन्फ्लुएंसर्स ने आसमान पर बैठा लिया है. जहां कहीं भी देखो, ये व्लौगर अपना कैमरा उठा कर चालू हो जाते हैं. न तो इन्होंने खाने की क्वालिटी चैक करने का कोर्स कर रखा है, न ही ये फूड की वैराइटीज के बारे में ज्यादा जानकारी रखते हैं. अब इन को क्या पता कि स्मोक्ड बिस्कुट किस एज ग्रुप के लिए है. इन्हें क्या पता कि स्मोक्ड बिस्कुट को कितनी देर बाद खाना चाहिए? इन्हें क्या पता कि इसे खाने के बाद ठंडा पानी पीना चाहिए या नहीं?

सच बात तो यह है कि इन्फ्लुएंसर को एक्सपैरिमैंटल फूड की सिर्फ वीडियो नहीं बनानी चाहिए बल्कि उस के फायदे और नुकसान भी बताने चाहिए. तभी वह एक अच्छा जानकारी देने वाला मार्गदर्शक कहलाएगा.

‘लीप ईयर में’ 29 फरवरी को महिलाओं को क्यों बच्चा पैदा करने से किया जाता है मना

अंग्रेजी कैलेंडर की गणना सूर्य वर्ष के आधार पर की जाती है. इस कैलेंडर को ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ कहा जाता है और इस का पहला महीना जनवरी होता है. इसी ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ के हिसाब से साल में 365 दिन होते हैं और हर 4 साल बाद लीप ईयर आता है, जिस में 365 की बजाय 366 दिन हो जाते हैं.

एक दिन बढ़ने की यह वजह

दरअसल, पृथ्‍वी को सूर्य का चक्‍कर लगाने में 365 दिन और करीब 6 घंटे लगते हैं और तब जा कर एक सूर्य वर्ष पूरा होता है और नया साल शुरू होता है. ये 6-6 घंटे की अवधि जुड़ते हुए 4 सालों में पूरे 24 घंटे की हो जाती है और 24 घंटे का एक पूरा दिन होता है. इस एक्‍सट्रा दिन को फरवरी में जोड़ दिया जाता है. यही वजह है कि हर चौथे साल में फरवरी 29 दिनों की होती है.

इस दिन से जुड़े मिथक और अंधविश्वास

चूंकि यह 29 तारीख 4 साल में एक बार आती है तो इसे अजूबा मान लिया जाता और फिर इस से जुड़े कई मिथक जन्म ले लेते हैं, जो धीरे धीरे अंधविश्वास में बदल जाते हैं.

29 फरवरी से जुड़ा एक मिथक यह भी है कि इस दिन जनमे बच्चे बड़े विलक्षण होते हैं. लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है. केवल 4 साल में एक बार जन्मदिन आने से किसी का विलक्षण होना अंधविश्वास से ज्यादा कुछ नहीं है.

महिलाओं को बच्चा पैदा करने की मनाही

कई देशों खासकर स्कॉटलैंड में ऐसा माना जाता है कि महिलाओं के लिए 29 फरवरी भी एक बहुत ही सफल दिन हो सकता है, क्योंकि हर 4 साल में एक बार 29 फरवरी को उन्हें किसी पुरुष को प्रपोज करने का ‘अधिकार’ होता है.

इस ‘अधिकार’ की भी गजब कहानी है. काफी साल पहले ‘लीप ईयर’ के दिन को अंग्रेजी कानून में कोई मान्यता नहीं थी (उस दिन को ‘लीप ओवर’ कर दिया गया था और नजरअंदाज कर दिया गया था, इसलिए इसे ‘लीप ईयर’ कहा गया). लिहाजा यह निर्णय लिया गया कि उस दिन की कोई कानूनी स्थिति नहीं है, जिस का अर्थ है कि इस दिन परंपरा को तोड़ना स्वीकार्य है.

किंवदंती है कि 5वीं शताब्दी में किल्डारे के सेंट ब्रिगिड ने कथित तौर पर सेंट पैट्रिक को प्रस्ताव दिया था कि महिलाओं को 4 साल में एक बार अपने डरपोक प्रेमी को प्रपोज करने का अधिकार देना चाहिए. इस की इजाजत भी दी गई थी और आज भी बहुत सी महिलाएं यह रिवाज निभाती दिख जाती हैं.

स्कॉटिश अंधविश्वास का मानना ​​है कि 29 फरवरी को किसी मां का अपने बच्चे को जन्म देना दुर्भाग्यपूर्ण है. इस दिन की तुलना 13वें शुक्रवार से की जाती है, जिसे एक अशुभ दिन के रूप में भी देखा जाता है. इस 13 तारीख को इसे अंग्रेजी में ‘फ्राइडे द थर्टिंथ’ कह कर दुर्भाग्य से जोड़ा जाता है. बहुत से लोगों का मानना है कि यह दिन और तारीख जब भी मिलते हैं तो दुर्भाग्य पैदा करते हैं. इस दिन और तारीख के संयोग को अशुभ मान कर लोग घर से बाहर निकलने तक से घबराते हैं.

‘लीप डे’ यानी 29 फरवरी पर किसी पुरुष को प्रपोज करना ठीक है, लेकिन उसी दिन के बारे में यूनानियों का मानना ​​है कि ‘लीप डे’ पर शादी करना बेहद अशुभ होता है और यदि आप लीप डे’ पर तलाक लेते हैं, तो आप को कभी भी दोबारा प्यार नहीं मिलेगा.

बीमारियों से बचाता है सैनेटरी पैड

माहवारी के दिनों में इस्तेमाल किए जाने वाले सैनेटरी पैड का इस्तेमाल दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. इस के बाद भी गांवदेहात में इस का इस्तेमाल कम ही हो रहा है जिस से वहां की लड़कियों और औरतों को सेहत से जुड़ी तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है. इस संबंध में डाक्टर सुनीता चंद्रा से बात की गई. पेश हैं, उसी बातचीत के खास अंश:

गांवदेहात में लड़कियों और औरतों में सैनेटरी पैड का कितना इस्तेमाल बढ़ा है?

पिछले कुछ साल से गांवों में सेहत के लिए काम करने वाले लोगों ने सैनेटरी पैड के इस्तेमाल को ले कर जागरूकता फैलाने का काम शुरू किया है. इस से लड़कियों और नई शादीशुदा औरतों में सैनेटरी पैड का इस्तेमाल करने की आदत बढ़ी है. इस के बावजूद वहां 70 से 85 फीसदी औरतें और लड़कियां इस का इस्तेमाल नहीं कर रही हैं.

आज भी गांवदेहात में रहने वाली ज्यादातर लड़कियां और औरतें माहवारी के दिनों में सैनेटरी पैड की जगह पुराने कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं.

वे सैनेटरी पैड की जगह पुराने कपड़े क्यों इस्तेमाल करती हैं?

पुराना कपड़ा घर में ही मिल जाता है और सस्ता पड़ता है. कई बार तो जब खून का बहाव ज्यादा होता है तो वे कपड़े के अंदर और कई कपड़े भर लेती हैं. कई बार जब नए कपड़े नहीं मिलते हैं तो वे पहले इस्तेमाल किए गए कपड़ों को धो कर दोबारा इस्तेमाल कर लेती हैं. कई बार तो वे कपड़े के अंदर चूल्हे की राख या बालू भर कर अंग पर बांध लेती हैं. इस की वजह से वे कई तरह की बीमारियों की शिकार हो जाती हैं.

माहवारी में सैनेटरी पैड का इस्तेमाल न करने से किस तरह की बीमारियां हो सकती हैं?

गंदे कपड़ों का इस्तेमाल करने से उस जगह पर खुजली होती है, दाने और लाल चकत्ते पड़ने लगते हैं. धीरेधीरे गंदगी से इंफैक्शन अंदर तक पहुंच जाता है. इस से सफेद पानी आना, ल्यूकोरिया और दूसरी तरह की तमाम बीमारियां लग सकती हैं. ये बीमारियां औरत के मां बनने की कूवत पर बुरा असर डालती हैं. कई बार तो उन को बांझपन का दंश झेलना पड़ता है. यह इंफैक्शन कैंसर की वजह भी बन जाता है.

society

माहवारी के दिनों में औरतों को सामाजिक रूप से किस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है?

माहवारी के दौरान औरतों को अछूत सा समझा जाता है. इस वजह से माहवारी के संबंध में बात करने को भी गलत माना जाता है. जब किसी औरत को माहवारी आती है तो उस के साथ भेदभाव सा होता है.

कई घरों में उस को सोने के लिए अंधेरे कमरे में बिस्तर लगा दिया जाता है. उस को किसी दूसरे घर वाले के साथ उठनेबैठने नहीं दिया जाता है. साफसफाई रखने के बजाय उसे नहाने नहीं दिया जाता है. सामान्य खाने की जगह रूखासूखा खाना दिया जाता है. रसोई में जाने से मना किया जाता है.

माहवारी में इस्तेमाल किए गए कपड़े या सैनेटरी पैड को किस तरह से नष्ट किया जाता है?

आमतौर पर इन को बाहर खुले में फेंक दिया जाता है जिस से ये गंदगी फैलाने की वजह बनते हैं. जो औरतें खुले में शौच के लिए जाती हैं वहीं फेंक देती हैं. कुछ समझदार औरतें इन को मिट्टी के बड़े बरतन में रख देती हैं. बरतन ऊपर से बंद कर दिया जाता है. हवा आनेजाने के लिए बरतन में छेद कर दिया जाता है. कुछ दिन बाद जब कपड़े सूख जाते हैं तो खेत या खुली जगह में ले जा कर जला दिया जाता है. शहरों में इन को ठीक तरह से कूड़ेदान में फेंक देना चाहते है.

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