Women’s Empowerment Story : अस्तित्व

Women’s Empowerment Story.

चैप्टर 1 : कांच की दीवारें

माया के लिए सुबह का मतलब सूरज की पहली किरण नहीं, बल्कि किचन में बजने वाली बरतनों की आवाज थी. 32 साल की माया, जो कभी अपने कालेज में ‘बैस्ट डिबेटर’ हुआ करती थी, अब एक आदर्श बहू, पत्नी और मां के सांचे में पूरी तरह ढल चुकी थी.

शहर के एक मिडिल क्लास परिवार में माया की शादी विवेक से हुई थी. विवेक बुरा इनसान नहीं था, लेकिन वह उन मर्दों में से था, जिन्हें लगता है कि घर के कामों में हाथ बंटाना उन की ‘मर्दानगी’ के खिलाफ है और पत्नी का सपना सिर्फ एक अच्छी ‘हौबी’ तक सीमित होना चाहिए.

‘‘माया, मेरी नीली शर्ट कहां है?’’ विवेक ने बैडरूम से आवाज लगाई. ‘‘अलमारी के दाहिने कोने में टंगी है,’’ माया ने रोटी बेलते हुए जवाब दिया. ‘‘मिल नहीं रही, तुम ही आ कर देख लो.’’

माया ने गैस धीमी की और बैडरूम की तरफ भागी. यही उस की जिंदगी का सार था, अपनी गति छोड़ कर दूसरों की सुविधा के लिए दौड़ना. शर्ट विवेक के सामने ही थी, बस उस ने उठाने की जहमत नहीं की थी.

उस दिन दोपहर में, जब घर के सब लोग काम पर और बच्चे स्कूल जा चुके थे, माया ने पुराने स्टोररूम की सफाई करने की सोची. वहां धूल भरी किताबों के बीच उसे अपनी पुरानी पेंटिंग किट और एक अधूरी डायरी मिली.

डायरी का पहला पन्ना खुला, जिस पर लिखा था, ‘मैं उड़ना चाहती हूं, उस आसमान में, जहां मेरी अपनी पहचान हो.’

माया की आंखों में आंसू आ गए. वह पहचान कहीं खो गई थी.

चैप्टर 2 : पुरानी यादें,नई कसक

उस शाम माया की सहेली अदिति का फोन आया. अदिति अब एक कामयाब आर्किटैक्ट थी.

‘‘माया, अगले महीने हमारे कालेज का रीयूनियन है. तुझे आना ही होगा,’’ अदिति ने उत्साह से कहा. माया हिचकिचाई, ‘‘अदिति, घर पर कैसे… विवेक और मम्मीजी शायद नहीं मानेंगे.’’ ‘‘कब तक दूसरों की मरजी से जिएगी माया? तू क्या थी और क्या बन गई है, कभी आईने में खुद को देखा है?’’ अदिति के इन शब्दों ने माया के दिल पर चोट लगी.

उस रात डिनर टेबल पर माया ने दबी आवाज में विवेक से कहा, ‘‘विवेक, अगले महीने कालेज का रीयूनियन प्रोग्राम है. मैं दिल्ली जाना चाहती हूं, 2 दिन के लिए.’’ पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. विवेक की मां ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, ‘‘2 दिन? घरगृहस्थी वाली औरतों को बाहर जाना शोभा नहीं देता. और बच्चों का क्या?’’ विवेक ने बिना सिर उठाए कहा, ‘‘छोड़ो न माया, क्या करोगी वहां जा कर? घर पर सब ठीक तो है.’’

माया को उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि वह इस घर का हिस्सा तो है, लेकिन उस की अपनी कोई इच्छा, कोई वजूद नहीं है. वह बस एक मशीन है, जिसे रिमोट से चलाया जाता है.

चैप्टर 3 : विद्रोह की पहली किरण

अगले कुछ दिन माया बहुत शांत रही. वह अपना काम करती, लेकिन उस की आंखों में एक नई चमक थी. एक फैसला. उस ने स्टोररूम से अपनी पेंटिंग किट निकाली और उसे साफ किया. उस ने तय किया कि वह अपनी अधूरी पेंटिंग पूरी करेगी.

एक दोपहर, जब उस की सास सो रही थी, माया ने कैनवास पर रंग बिखेरना शुरू किया. उस ने एक पिंजरे का चित्र बनाया, जिस का दरवाजा खुला था, लेकिन पंछी अभी भी अंदर बैठा था, शायद बाहर की दुनिया के डर से.

अचानक आवाज आई, ‘‘यह क्या कूड़ा फैला रखा है?’’ सासू मां दरवाजे पर खड़ी थीं, ‘‘माया, यह सब करने की उम्र है तुम्हारी? जाओ, शाम की चाय की तैयारी करो.’’ माया ने इस बार नजरें नीची नहीं कीं. उस ने शांत स्वर में कहा, ‘‘मांजी, यह कूड़ा नहीं है. यह मेरा शौक है और चाय 10 मिनट बाद बन जाएगी, तब तक मैं यह रंग सुखाना चाहती हूं.’’

सासू मां अवाक रह गईं. माया के लहजे में बदतमीजी नहीं थी, पर एक ऐसी मजबूती थी जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखी थी. उस रात माया ने डायरी में लिखा, ‘पिंजरा खुला है, बस पंखों को फड़फड़ाने की आदत डालनी है.’’

चैप्टर 4 : सपनों की उड़ान

दिल्ली जाने की तारीख नजदीक आ रही थी. घर में तनाव का माहौल साफ महसूस किया जा सकता था. विवेक ने माया से बात करना लगभग बंद कर दिया था और सासू मां हर बात पर ताना मार रही थीं. लेकिन इस बार माया के भीतर कुछ बदल गया था. उसे अब अपराधी जैसा महसूस नहीं हो रहा था.

रीयूनियन वाली सुबह, माया ने अपनी साड़ी पहनी, हलका मेकअप किया और अपना बैग उठाया. विवेक ड्राइंगरूम में बैठा अखबार पढ़ रहा था. ‘‘मैं निकल रही हूं,’’ माया ने शांति से कहा.

विवेक ने अखबार नीचे किया. उस की आंखों में गुस्सा और हैरानी थी, ‘‘तुम सच में जा रही हो? घर और बच्चों को इस हाल में छोड़ कर?’’ ‘‘बच्चे अब बड़े हो गए हैं विवेक, और मम्मी जी भी यहां हैं. मैं ने फ्रिज में 2 दिन का खाना बना कर रख दिया है. बस 2 दिन की ही तो बात है,’’ माया ने सूझ बूझ के साथ जवाब दिया.

जब माया टैक्सी में बैठी, तो उस के हाथ कांप रहे थे, लेकिन दिल में एक अजीब सी शांति थी. जैसे ही ट्रेन ने स्टेशन छोड़ा, उसे लगा कि उस के ऊपर से बरसों पुराना कोई बोझ उतर गया है. वह दिल्ली सिर्फ अपनी सहेलियों से मिलने नहीं, बल्कि अपनी खुद से ही मिलने जा रही थी.

चैप्टर 5 : दिल्ली की वह शाम

दिल्ली के एक आलीशान होटल में पुरानी सहेलियों का जमघट लगा था. कोई जज बन चुकी थी, कोई बड़ी कंपनी की मालकिन. जब माया वहां पहुंची, तो सब उसे देख कर खुशी से झूम उठीं.

बातोंबातों में अदिति ने माया की पेंटिंग वाली बात छेड़ दी, ‘‘तुम्हें पता है, माया कालेज में सब से अच्छी पेंटर थी. माया, तुम ने वह पिंजरे वाली पेंटिंग पूरी की?’’ माया ने झिझकते हुए अपने फोन में वह अधूरी पेंटिंग की फोटो दिखाई.

वहां मौजूद एक महिला, जो आर्ट गैलरी चलाती थीं, पेंटिंग देख कर दंग रह गईं और बोलीं, ‘‘माया, इस पेंटिंग में जो दर्द और जो उम्मीद है, वह कमाल की है. क्या तुम इसे मेरी एग्जीबिशन के लिए पूरा कर सकती हो?’’ माया की आंखों में चमक आ गई. सालों बाद किसी ने उसे उस के काम के लिए सराहा था.

उस रात, होटल के कमरे में बैठ कर माया ने महसूस किया कि वह सिर्फ एक ‘मशीन’ नहीं है. उस के पास एक हुनर है, जिसे दुनिया देखना चाहती है.

माया ने अदिति से कहा, ‘‘मैं वापस जा कर अपनी जिंदगी को फिर से पेंट करूंगी.’’

चैप्टर 6 : वापसी और टकराव

2 दिन बाद जब माया घर लौटी, तो घर का नजारा बदला हुआ था. सिंक में जूठे बरतन पड़े थे, ड्राइंगरूम में सामान बिखरा था और विवेक चिड़चिड़ाया हुआ था. ‘‘आ गईं तुम? देख लिया अपना रीयूनियन प्रोग्राम? यहां देखो क्या हाल हो रखा है,’’ विवेक चिल्लाया.

माया ने चुपचाप अपना बैग रखा और रसोई में जाने के बजाय सोफे पर बैठ गई और बोली, ‘‘विवेक, 2 दिन में अगर घर बिखर गया, तो सोचो मैं पिछले 10 सालों से इसे कैसे संभाल रही हूं और अब से चीजें ऐसी नहीं रहेंगी.’’ ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ सासू मां कमरे से बाहर आते हुए बोलीं.

‘‘मतलब यह कि अब मैं अपनी पेंटिंग को समय दूंगी. मुझे एक गैलरी से औफर मिला है. मैं घर के काम करूंगी, लेकिन अब मैं खुद को नहीं मारूंगी.’’ विवेक हंसने लगा, ‘‘पेंटिंग? उस से घर चलेगा? यह पागलपन छोड़ो और चाय बनाओ.’’

माया उठी, लेकिन रसोई की तरफ नहीं, बल्कि अपने स्टोररूम की तरफ गई. उस ने मुड़ कर कहा, ‘‘चाय खुद बना लीजिए विवेकजी, मुझे अपना कैनवास तैयार करना है.’’

विवेक और उस की मां अवाक रह गए. यह वह माया नहीं थी, जो हर बात पर ‘जी’ कहती थी. यह वह औरत थी, जिस ने अपने अस्तित्व को पहचान लिया था.

चैप्टर 7 : खामोश जंग

अगले कुछ हफ्ते घर में एक ‘कोल्ड वार’ जैसा माहौल रहा. विवेक ने माया से दूरी बना ली थी और सासू मां हर छोटे काम के लिए उसे ताना मारती रहतीं. लेकिन माया ने एक बात गांठ बांध ली थी कि वह अब सफाई नहीं देगी, बल्कि कर के दिखाएगी.

माया सुबह जल्दी उठ कर घर का सारा काम निबटाती, बच्चों को स्कूल भेजती और फिर दोपहर के 2 घंटे अपनी पेंटिंग के लिए सुरक्षित रखती. उन 2 घंटों में वह दुनिया को भूल जाती. उस ने उस ‘खुले पिंजरे’ वाली पेंटिंग को पूरा किया और उस का नाम रखा, ‘रिहाई’.

अदिति को फोन पर पेंटिंग का पूरा हो जाने का खबर दे दी गई और इस पेंटिंग को अदिति का ठिकानों में पोस्ट के जरीए भेज दिया.

एक दिन अदिति का फोन आया, ‘‘माया, तुम्हारी पेंटिंग मैं ने गैलरी के मालिक को दिखाई थी. उन्होंने अगले हफ्ते एक आर्ट फेयर में तुम्हारी पेंटिंग के लिए जगह बुक की है. तुम्हें जरूर आना होगा.’’

माया का दिल जोर से धड़का. यह सिर्फ एक पेंटिंग नहीं थी, यह उस की 10 सालों की खामोश चीख थी. उस ने धीरे से कहा, ‘‘मैं आऊंगी अदिति, चाहे कुछ भी हो जाए.’’

चैप्टर 8 : सफलता की पहली दस्तक

आर्ट फेयर का दिन आ गया. माया ने अपनी सब से सुंदर नीली साड़ी पहनी. जब वह हाल में पहुंची, तो अपनी पेंटिंग को एक खूबसूरत फ्रेम में दीवार पर टंगा देख उस की आंखों में आंसू आ गए.

लोग वहां आ रहे थे, पेंटिंग देख रहे थे और माया के बारे में चर्चा कर रहे थे. तभी एक बुजुर्ग आदमी, जो खुद एक मशहूर पेंटर थे, माया के पास आए और कहा, ‘‘बेटी, इस पेंटिंग में जो रंगों का तालमेल है, वह तो अच्छा है ही, लेकिन जो भाव है, वह दर्द और आजादी की कशमकश, वह दिल को छू लेती है. बहुत खूब… बहुत खूब…’’

शाम होतेहोते खबर मिली कि माया की पेंटिंग एक बड़े बिजनैसमैन ने ऊंचे दाम पर खरीद ली है. उसे एक चैक मिला, जिस पर लिखी रकम विवेक की 5 साल की सैलरी के बराबर थी. माया को उस कागज के टुकड़े से ज्यादा उस सम्मान की खुशी थी, जो उसे वहां मिल रहा था.

जब माया घर लौटी, तो विवेक सोफे पर बैठा इंतजार कर रहा था, ‘‘कहां थी इतनी देर? घर की कोई फिक्र है या नहीं?’’  माया ने शांति से वह चैक विवेक के सामने टेबल पर रख दिया. ‘‘यह क्या है?’’ विवेक ने हैरानी से पूछा. ‘‘यह मेरी मेहनत की कमाई है विवेक. उसी ‘कूड़े’ से मिली है, जिसे तुम ‘पागलपन’ कह रहे थे.’’

विवेक चैक देख कर सन्न रह गया. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि माया, जो कल तक एकएक रुपए के लिए उस से पूछती थी, आज खुद कमा रही है.

चैप्टर 9 : दीवारें ढहने लगीं

चैक की रकम ने घर का माहौल बदल दिया, लेकिन माया का मकसद पैसा नहीं था. सासू मां, जो अब तक बातबात पर टोकती थीं, अचानक शांत हो गई थीं. शायद पैसे की ताकत ने उन्हें चुप करा दिया था, लेकिन माया को बुरा लग रहा था कि उस का सम्मान उस की कला से ज्यादा उस चैक से जुड़ा था.

एक रात विवेक बिस्तर पर लेटा हुआ था. उस ने अचानक कहा, ‘‘माया, मुझे माफ कर दो. मुझे लगा था कि तुम बस बोरियत मिटाने के लिए यह सब कर रही हो. मुझे नहीं पता था कि तुम इतनी काबिल हो.’’

माया ने खिड़की के बाहर चांद को देखते हुए कहा, ‘‘विवेक, मुझे तुम्हारे माफी की जरूरत नहीं है, सिर्फ साथ की जरूरत थी. काबिल मैं हमेशा से थी, बस तुम ने कभी मुझे एक इनसान की तरह देखा ही नहीं. तुम ने मुझे सिर्फ एक ‘पत्नी’ और ‘बहू’ के सांचे में देखा.’’

विवेक खामोश रहा. उस रात उसे पहली बार एहसास हुआ कि उस ने अपनी पत्नी के सपनों का गला घोंट कर अपनी सुखसुविधाओं की दीवार खड़ी की थी.

अगले दिन विवेक खुद बाजार से माया के लिए नए ब्रशेस और रंगों का सैट ले कर आया. उस ने उन्हें टेबल पर रखते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी अगली एग्जीबिशन में हम सब साथ चलेंगे.’’

माया की आंखों में उम्मीद की एक नई किरण थी. उस ने समझ लिया था कि बदलाव रातोंरात नहीं आता, लेकिन अगर आप खुद को न बदलें, तो दुनिया कभी नहीं बदलेगी.

चैप्टर 10 : सपनों की कार्यशाला

विवेक के बरताव में आया बदलाव माया के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था. लेकिन माया जानती थी कि यह सिर्फ शुरुआत है. उस ने तय किया कि वह अब घर के उस अंधेरे स्टोररूम में नहीं, बल्कि एक ऐसी जगह पेंटिंग करेगी जहां रोशनी और उम्मीद दोनों हों.

माया ने घर के पास ही एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया और उसे अपना ‘स्टूडियो’ बनाया. उस का नाम रखा, ‘अस्तित्व आर्ट स्टूडियो’. शुरुआत में महल्ले के लोगों ने तरहतरह की बातें कीं, ‘‘देखो, 2 बच्चों की मां अब दुकान खोल कर बैठेगी.’’ ‘‘घर के काम कौन करेगा?’’

लेकिन माया ने इन बातों पर ध्यान देना छोड़ दिया था. अब उस के बच्चे स्कूल से आ कर सीधा उस के स्टूडियो पहुंचते और अपनी मां को रंगों से खेलते देख गर्व महसूस करते.

एक दिन माया ने अपनी सासू मां को स्टूडियो आने का न्योता दिया. सासू मां हिचकिचाते हुए आईं, लेकिन जब उन्होंने वहां माया का बनाया हुआ उन का खुद का एक पोट्रेट (चित्र) देखा, तो उन की आंखें भर आईं. उस पेंटिंग में माया ने उन की ?ार्रियों को कमजोरी नहीं, बल्कि अनुभव की सुंदरता के रूप में दिखाया था.

उस दिन पहली बार सासू मां ने माया का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘बहू, मैं ने तुझे कभी समझा ही नहीं.’’

चैप्टर 11 : समाज और सवाल

जैसेजैसे माया का नाम बढ़ने लगा, चुनौतियां भी बढ़ती गईं. शहर की एक बड़ी आर्ट काउंसिल ने उसे ‘वुमन औफ द ईयर’ के पुरस्कार के लिए चुना. यह खबर अखबारों में छपी, तो विवेक के कुछ रिश्तेदारों ने नाकभौं सिकोड़ना शुरू कर दिया.

एक पारिवारिक समारोह में विवेक के चाचाजी ने तंज कसा, ‘‘विवेक, अब तो तुम्हारी पत्नी सैलिब्रिटी बन गई है. सुना है, अब वह घर पर खाना भी नहीं बनाती?’’

विवेक गुस्से से लाल हो गया, लेकिन उस से पहले ही माया ने मुसकराते हुए जवाब दिया, ‘‘चाचाजी, खाना तो मैं अभी भी बनाती हूं, बस अब उस खाने में और मेरी जिंदगी में स्वाद बढ़ गया है, क्योंकि अब मैं खुश हूं. और क्या खुशी बांटना गलत है?’’

उस दिन माया को समझ आया कि समाज को एक सफल औरत से उतनी दिक्कत नहीं होती, जितनी एक ‘आजाद’ और ‘आत्मविश्वासी’ औरत से होती है. उस ने तय किया कि वह अपनी कला के जरीए उन औरतों की आवाज बनेगी, जो अभी भी बंद दरवाजों के पीछे अपने सपनों को दम तोड़ते देख रही हैं.

चैप्टर 12 : अस्तित्व की गूंज

माया के स्टूडियो में अब सिर्फ पेंटिंग्स नहीं बनती थीं, बल्कि वहां आसपास की महिलाएं भी आने लगी थीं. कोई सिलाईकढ़ाई में माहिर थी, तो किसी को लिखने का शौक था. माया ने अपने स्टूडियो का एक हिस्सा उन महिलाओं के लिए खोल दिया.

एक दिन एक कम उम्र की लड़की, रश्मि, माया के पास आई. उस की आंखों में वही डर और बेबसी थी, जो सालों पहले माया की आंखों में हुआ करती थी. रश्मि ने कहा, ‘‘दीदी, मुझे पढ़ना है, लेकिन मेरी ससुराल वाले कहते हैं कि पढ़ाई सिर्फ लड़कियों की शादी तक के लिए होती है.’’

माया ने रश्मि का हाथ थामा और उसे अपनी वही ‘रिहाई’ वाली पेंटिंग दिखाई और कहा, ‘‘रश्मि, पिंजरा कभी बाहर से बंद नहीं होता, वह हमारे मन के अंदर बंद होता है. अगर तुम ठान लो, तो कोई तुम्हें नहीं रोक सकता.’’

माया ने रश्मि की पढ़ाई का जिम्मा उठाया और उसे अपने पास पार्टटाइम काम दिया. धीरेधीरे, माया का वह छोटा सा स्टूडियो एक आंदोलन बन गया. अब वह सिर्फ एक पेंटर नहीं थी, वह एक ‘उम्मीद’ बन चुकी थी.

विवेक अब गर्व से लोगों को बताता, ‘‘मैं माया का पति हूं,’’ उस के शब्दों में अब अधिकार नहीं, बल्कि सम्मान था.

चैप्टर 13 : क्षितिज के पार

समय का पहिया तेजी से घूम रहा था. माया की पेंटिंग्स अब सिर्फ स्थानीय गलियारों तक सीमित नहीं थीं. एक सुबह उसे एक ईमेल मिला, जिस ने उस की दुनिया बदल दी. लंदन की एक मशहूर आर्ट गैलरी ने उसे अपनी ‘इंटरनैशनल विमेन आर्टिस्ट्स’ प्रदर्शनी के लिए मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था.

यह माया के लिए एक सपना जैसा था. लेकिन इस बार वह डरी हुई नहीं थी. जब उस ने यह खबर विवेक और अपनी सासू मां को सुनाई, तो घर में उत्सव का माहौल हो गया.

‘‘तुम्हें जाना चाहिए माया, यह तुम्हारा हक है,’’ विवेक ने गर्मजोशी से कहा. ‘‘लेकिन विवेक, घर और बच्चे?’’ माया ने मुसकराते हुए पूछा, जैसे वह उस की पुरानी यादों को कुरेद रही हो.

विवेक ने माया का हाथ थामते हुए कहा, ‘‘घर हम संभाल लेंगे. तुम ने 10 साल हमें संभाला है, क्या हम 10 दिन तुम्हें अपनी उड़ान भरने के लिए नहीं दे सकते?’’

जब माया लंदन के उस विशाल हाल में खड़ी थी, जहां दुनियाभर के दिग्गज कलाकार मौजूद थे, उसे अपना वह छोटा सा किचन और वह धूल भरा स्टोररूम याद आया. उस ने महसूस किया कि ‘अस्तित्व’ की तलाश में सब से बड़ा कदम घर की दहलीज पार करना नहीं, बल्कि अपने मन के डर को पार करना था.

चैप्टर 14 : विरासत

लंदन से लौटने के बाद माया सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि एक प्रतीक बन चुकी थी. उस के स्टूडियो में अब सैकड़ों लड़कियां और महिलाएं अपनी कला और अपने सपनों के साथ आती थीं.

एक दिन माया ने देखा कि उस की 12 साल की बेटी, जो पहले सिर्फ पढ़ाई और मोबाइल में बिजी रहती थी, कोने में बैठ कर एक कैनवास पर कुछ उकेर रही थी.

माया चुपचाप उस के पीछे जा कर खड़ी हो गई. बेटी ने एक मजबूत पेड़ बनाया था, जिस की जड़ें जमीन में गहरी थीं, लेकिन उस की टहनियां आसमान को छू रही थीं.

‘‘यह क्या है बेटा?’’ माया ने पूछा. ‘‘मम्मी, यह आप हो. आप घर को भी संभालती हो और आसमान को भी छूती हो. मैं भी बड़ी हो कर आप के जैसा बनना चाहती हूं,’’ बेटी ने गर्व से कहा.

माया की आंखों में खुशी के आंसू आ गए. उसे सम?ा आया कि उस की सफलता सिर्फ पुरस्कारों और पैसों में नहीं थी, बल्कि उस आत्मविश्वास में थी जो उस ने अपनी अगली पीढ़ी को विरासत में दिया था. उस ने एक ऐसी राह बना दी थी, जिस पर उस की बेटी को कभी अपनी पहचान के लिए समझोता नहीं करना पड़ेगा.

चैप्टर 15 : नया सवेरा

कहानी वहीं पहुंच गई थी जहां से शुरू हुई थी. एक सुबह की पहली किरण. लेकिन आज किचन में बरतनों की आवाज के साथसाथ एक मधुर संगीत भी बज रहा था. विवेक आज खुद चाय बना रहा था और बच्चे अपना नाश्ता खुद तैयार कर रहे थे.

माया बालकनी में खड़ी उगते हुए सूरज को देख रही थी. उस के हाथ में वही पुरानी डायरी थी. उस ने डायरी का वह आखिरी पन्ना खोला, जो खाली था और उस पर लिखा, ‘अस्तित्व किसी और की दी हुई पहचान नहीं है, यह वह आग है जो हमारे भीतर जलती है. हम औरतें त्याग की मूरत नहीं, बल्कि असीम संभावनाओं का सागर हैं. पिंजरा अब नहीं है, क्योंकि मैं ने उड़ना सीख लिया है.’

आज माया के चेहरे पर वह उदासी नहीं थी, जो कांच की दीवारों के पीछे कैद औरतों के चेहरे पर होती है. आज उस के पास उस की अपनी दुनिया थी, अपना नाम था और अपना सम्मान था. वह अब सिर्फ ‘विवेक की पत्नी’ या ‘बच्चों की मां’ नहीं थी, वह ‘माया’ थी, एक पूर्ण, सशक्त और स्वतंत्र स्त्री.

सूरज की रोशनी माया के चेहरे पर पड़ रही थी और वह मुसकरा रही थी. एक नए सफर की शुरुआत के लिए.  Women’s Empowerment Story

लेखक : अशोक नंदन

Hindi Story: ममता की छांव

Hindi Story: मां  को गांव जाने वाली बस में बैठा तो दिया था, पर विजय का दिल जोरजोर से धड़क रहा था. मां जब बस से उतर कर गांव में अपने घर जाएंगीओहउस ने गलत किया है मां के साथ. उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था. उस के माथे पर पसीने की बूंदें छलक गईं. 2 महीने पहले विजय मां को गांव से ले कर आया था अपने साथ. मां तो तब भी नहीं आना चाहती थीं, ‘‘अरे, नहीं बेटामेरा तो यह छोटा सा घर ही अच्छा है. यहां तेरे बचपन की यादें हैं. वह देख चबूतरा, तू इस पर बैठ कर कर पढ़ता था.

‘‘और वह साइकिल अब टूट गई रखरखाव में. तू तो इसे छोड़ता तक नहीं था. साइकिल पर बैठ कर ही खाना खाता और कई बार इस की सीट से सिर टिका कर सो भी जाता था.’’ मां पूरे जोश से घर में रखी
1-1 चीज दिखाती जा रही थीं. विजय का मन बिलकुल नहीं था इस सब कबाड़े को देखने का, पर मां का जोश तो देखते ही बनता था.

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‘‘मां, आप मेरे साथ चलो शहर,’’ विजय ने कहा.
‘‘नहीं, मैं तो यहीं अच्छी हूं,’’ मां ने साफ मना कर दिया था.
पर विजय तो कर मां को लेने आया था. उसे तो उन्हें ले कर जाना ही था. तरुणा ने साफसाफ बोला था, ‘‘किसी भी हालत में मां को गांव से ले कर आना है. खाली हाथ नहीं आना.’’
विजय बड़ी कशमकश में था. उसे पुराने दिन याद गए. जब वह शहर में पढ़ने के लिए गया था. पर उस के शहर पढ़ने जाने के ठीक 10 दिन बाद ही पिताजी गुजर गए थे. जब उस ने यह सुना तो धक रह गया कि अब उस की पढ़ाई का क्या होगा? पिताजी ही तो एकलौते कमाने वाले थे.
पिताजी की तेरहवीं के बाद जब सारे मेहमान चले गए तब विजय ने मां से पूछा था, ‘‘मां, मैं क्या करूं? शहर जाऊं या पढ़ाई छोड़ दूं?’’
मां ने भरी नजरों से विजय की ओर देखा, ‘‘तू शहर जा और पढ़ाई कर. अपने पिताजी के सपनों को पूरा कर बेटा.’’

‘‘पर मां, बहुत खर्चा होता है. आप कैसे…’’ विजय बोला था. ‘‘मैं कर लूंगी. कुछ कुछ तो कर ही लूंगी. खर्चा भेजती रहूंगी. तू पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर,’’ मां ने पूरी दबंगता के साथ कहा था. विजय के चेहरे पर आत्मविश्वास लौट आया था. विजय शहर गया और अपनी पढ़ाई करने लगा. मां से वह जितने पैसे मांगता, वे उतने पैसे उसे भिजवा देतीं. विजय ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर मां के पास पैसे कहां से रहे हैं, जो उसे वे भेज देती हैं. एक बार विजय ने पूछा भी, पर मां ने कहा, ‘‘तू तो पढ़ाई करपैसा कहां से रहा है, इस की चिंता छोड़ दे.’’
‘‘जी मां, मेरी जब नौकरी लग जाएगी तो 1-1 पैसा वापस कर दूंगा मां,’’ कहते हुए विजय की आवाज भर्रा गई. उस के सामने अपनी मां की तसवीर उभर आई.

ऐसा नहीं था कि मां बूढ़ी थीं, पर उन के संघर्षों ने उन्हें बूढ़ा बना दिया था और सारा संघर्ष विजय के लिए ही तो था. 5 एकड़ की खेती की जमीन और एक मकान इतनी ही पुश्तैनी जायदाद थी. मां खेतों में काम करती थीं और सब्जी वगैरह पैदा करती थीं, पर जब विजय की पैसों की मांग बढ़ी तो मां ने जमीन को ठेके पर दे दिया और एकमुश्त रकम उसे भेज दी. इस से मां के सामने खुद के लिए दो वक्त की रोटी का सवाल खड़ा हो गया, तो उन्होंने बाहर मजदूरी शुरू कर दी. दूसरों के खेतों में जातीं और दिनभर काम करतीं, जो पैसा मिलता उस में से कुछ अपने लिए बचा कर बाकी विजय को भेज देतीं. ‘‘मां, मैं जानता हूं. आप बहुत कष्ट ?ोल रही हैं. मेरी नौकरी लगने दो, फिर आप को महारानी बना कर रखूंगाकुछ दिनों की बात और है,’’ विजय ऐसा सच में ही बोलता था.

जब विजय की नौकरी लगी तो उस ने सब से पहले मां को ही फोन किया था, ‘‘मां, मेरी नौकरी लग गई है.’’
यह खुशखबरी सुन कर मां को लगा था कि अब उन के बुरे दिन खत्म हो गए हैं. विजय का मन गांव जा कर मां से मिलने का था, पर वह नहीं जा पाया. इसी बीच विजय की तरुणा से मुलाकात हुई और उन दोनों ने शादी करने का फैसला लिया. तब भी वह मां का आशीर्वाद लेना चाहता था, पर उस ने केवल फोन पर
ही मां को बताया था, ‘‘मां, मैं शादी कर रहा हूं.’’ यह सुन कर मां चौंक गई थीं, ‘‘शादी…’’
‘‘हां मां, तरुणा मेरे साहब की बेटी हैबहुत अच्छी हैआप को भी पसंद आएगी…’’
‘‘पर मां के होते हुए तू कैसे अपनी ही शादी की बात करेगाअभी मैं जिंदा हूं.’’
‘‘अरे मां, अब समय बदल चुका है. अब तो ऐसे ही शादीब्याह होते हैं.’’
‘‘मां से बगैर पूछेवाह…’’
‘‘पूछ ही तो रहा हूं…’’ विजय को अपनी गलती का अहसास हुआ.
‘‘पूछ कहां रहा है, तू तो बता रहा है,’’ मां ने कहा.

विजय  कि मां को बुरा लगा है, पर लगने दो, शादी तो उसे ही करनी है और उसे ही अपनी पत्नी के साथ जिंदगीभर रहना हैमां के समय की बात और थी, अब तो सब बदल चुका है. विजय ने शादी कर ली थी. मां को नहीं बुलाया था. पर शादी के बाद वह तरुणा को ले कर गांव गया था. उस के ससुर ने ही बोला था कि घर में कुलदेवता की पूजन करना जरूरी है. विजय कार से गांव पहुंचा. मां गुस्सा तो थीं, पर उन्होने अपना गुस्सा जाहिर नहीं होने दिया. तरुणा का वैसे ही स्वागत किया, जैसे नईनवेली दुलहन का किया जाता है. कुलदेवता की पूजा कराई और गांव की औरतों को बुला कर बधाई गीत भी गाए गए. पर जब गांव वालों ने विजय को ताने मारे कि उस ने अपनी मां के बिना ही शादी कर ली, तो उसे गांव में रहना भारी हो गया. वे दोनों अगले दिन ही गांव से चले गए.

फिर विजय गांव नहीं जा पाया था. उस का ट्रांसफर अब पास के ही शहर में हो गया था. अब उसे यहां लंबे समय रहना था. तरुणा ने ही सु?ाव दिया था कि जब हम को यहां रहना ही है, तो हम अपना घर बना ही लेते हैं. पर विजय की नौकरी तो नई है, तो उस के पास इतने पेसे कहां हें कि वह मकान बना सके.
‘‘क्यों हम गांव का घर और जमीन बेच दें…’’ विजय के ही मन में खयाल आया. तरुणा कुछ नहीं बोली.
‘‘पर मां नहीं बेचने देंगीं,’’ जवाब भी विजय ने ही दिया था.
‘‘देखिए, मां की जायदाद पर तो बेटे का ही हक होता है तो आप जमीन और मकान ले लें,’’ तरुणा ने कहा.
‘‘हां, है तो सही. पर अभी मां जिंदा हैं. वे नहीं रहेंगी, तब ही मेरा हक होगा …’’
‘‘तो हम अपना हिस्सा तो ले ही सकते हो…’’
‘‘अभी मां कुछ नहीं देंगी. शादी के समय से ही वे नाराज हैं.’’
‘‘तो एक काम क्यों नहीं करते…’’ फिर उन दोनों में खुसुरफुसुर होती रही. विजय अगले ही दिन गांव की ओर निकल पड़ा.

मां ने जब विजय को देखा तो वे हैरत में पड़ गईं. मां के चेहरे पर गुस्सा अभी भी दिखाई दे रहा था, ‘‘कैसे याद गई मेरी?’’
‘‘अरे, कुछ नहीं मां. बहुत दिनों से आप से मिला नहीं था, तो सोचा मिल आऊं…’’ कहते हुए विजय ने अपनी नजरों को ?ाका लिया था. दरअसल, विजय मां को लेने आया था, पर उन्हें ले जाने के पीछे एक योजना थी, जिस के चलते वह मां से नजरें नहीं मिला पा रहा था. मां विजय को हक भरी नजरों से देख रही थीं, ‘‘घर पर सब ठीक है …’’ वे उसे घूर कर देख रही थीं.
‘‘हांसब ठीक है…’’ विजय धीरे से बोला.
‘‘बहू कैसी है?’’
‘‘एकदम बढि़या है.’’
विजय मां के हर सवाल पर परेशान हो रहा था. कुछ देर तक शांति बनी रही.
‘‘मैं आप को लेने आया हूं.’’
‘‘क्यों?’’ मां का शक गहराता जा रहा था.
‘‘ऐसे ही, आप कहती थीं कि मु? यहां अकेले नहीं रहना.’’
‘‘मैं ने कब कहा?’’

विजय कुछ देर चुप रहा. उसे मां से इतने सवालों की उम्मीद नहीं थी, इसलिए वह सकपका गया था.
‘‘आप की बहू आप को याद कर रही थी. उस ने ही बोला था कि मां को कुछ दिनों के लिए यहां ले आओ.’’
मां कुछ नहीं बोलीं, पर उन के चेहरे से लग रहा था कि वे अभी भी नहीं आना चाहती हैं. पर दूसरे दिन मां तैयार हो गई थीं चलने को, ‘‘कब निकलना है?’’
‘‘दोपहर को,’’ विजय ने कहा.
‘‘ठीक है,’’ मां बोलीं.
‘‘मां, आप जमीन के और मकान के कागजात निकाल लेना.’’
‘‘क्यों?’’ मां को थोड़ा शक हुआ.
‘‘कुछ नहींऐसे सूने घर में किसी ने चुरा लिए तो…’’ विजय कहते हुए अचकचा रहा था.
‘‘अरे, कहां सूना घरमैं पड़ोसी को बोलूंगी. वह सोएगा यहां रात को.’’
‘‘फिर भीकागजात बारबार नहीं बनते मांउन्हें संभाल कर रखना चाहिए.’’
‘‘अच्छे से ही रखे हैं. तू फिक्र कर.’’

विजय कुछ नहीं बोला. दोपहर को मां तैयार हो कर बैठ गई थीं. ‘‘ये ले जमीन और मकान के कागज चाहिए रख लेमेरे बाद तो सारा कुछ तेरा ही है.’’ विजय की आंखों में चमक गई थी. मां उसे बड़े ध्यान से देख रहीं थीं, पर थीं चुप‘‘देख बेटा, जब तक मैं जिंदा हूं, तब तक यह सारा कुछ मेरा ही है. मैं तेरे साथ कुछ ही दिनों के लिए चल रही हूं, बाकी तो अपनी बाकी जिंदगी यहीं काटनी है,’’ मां की आंखों से आंसुओं की कुछ बूंदें गिरीं. विजय चुप रहा.
इधर, तरुणा मां के आने की राह देख रही थी. उस ने मां के लिए अलग कमरा तैयार कर दिया था. और कोई समय होता तो उसे अपनी सास का आना बुरा लगता, पर इस बार तो उस ने योजना बना कर ही उन्हें बुलाया था, तो उन के लिए खास तैयारी कर रही थी. वह जानती थी कि कम से कम 2 महीने तक तो उन को यहां रखना ही है, वे रहना चाहें तो भी.

मां को सामने पा देख कर तरुणा उन के पैरों  गई थी. उस ने दरवाजे पर ही मां की आरती उतारी और उन का हाथ पकड़ कर उन के कमरे तक ले गई.
मां हैरान सी थींवे अपनी बहू से दूसरी बार ही मिल रही थींशादी के बाद वे कुल देवता के पूजन के लिए आए थे, तब बहू का रुख तो अकड़ भरा ही लग रहा थाइसी वजह से ही उन्होंने कभी विजय को साथ में रखने के लिए नहीं बोला थापर आज तरुणा का रुख एकदम बदला हुआ था.
विजय का काम तो एक महीने में ही पूरा हो गया था. उस ने मां को बगैर बताए गांव की अपनी जमीन का सौदा कर लिया था और मकान का भी. अच्छे मोटे दाम उसे मिल गए थे. उस ने कुछ बहाने से मां के हाथ का अंगूठा लगवा लिया था.

अब की बार मां ने कोई शक जाहिर नहीं किया था. वे बेटे और बहू की सेवा से संतुष्ट थीं. जमीन और मकान की रजिस्ट्री होते ही विजय ने मां को गांव वापस लौटने का बोल दिया था.
अब तक मां का मन यहां पूरी तरह लग चुका था, पर अचानक जब विजय ने उन्हें गांव चले जाने को कहा, तो उन्हें बुरा लगा. बहू का रुख भी बदल गया था. उन की  में कुछ नहीं आया था कि अचानक बेटे और बहू का बरताव बदल कैसे गया. अनमने मन से मां ने गांव जाने की बात मान ली थी,
‘‘
तू चल छोड़ने.’’

‘‘मैं नहीं जा पाऊंगा. यहां बहुत काम है.’’
‘‘फिर मैं अकेले कैसे जाऊंगी? मैं तो कुछ जानती ही नहीं हूं…’’ मां के चेहरे पर निराशा छा गई थी.
‘‘मैं आप को बस में बैठा दूंगा.
बस तो सीधे गांव ही जाती है. मैं कंडक्टर को भी बोल दूंगा. वह ध्यान से आप को गांव में उतार देगा,’’ कहते हुए विजय ने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया था.
मां कुछ नहीं बोलीं. आज मां को गांव जाने वाली बस में बैठा दिया गया था.
पहली बार विजय के मन में दुख जागा. गांव में मां कहां रहेंगीवह घर तो उस ने बेच दिया है
अपनी आंखों से निकले आंसुओं को विजय ने जमीन पर नहीं गिरने दिया. वह केवल बस को जाते हुए देख रहा था

कुशलेंद्र श्रीवास्तव

Hindi Story: टुकड़ा

Hindi Story:  जौडर्न एलिना की देह तो भोगता था, पर शायद उस का प्यार मर गया था. एलिना समझ नहीं पाई थी इस बदलाव को. क्या था इस का राज? रीर बदलता है, प्रेम का आकार भी. पर औरत की आत्मा को तौलना किस ने सिखाया मर्दों को?’ बिस्तर से उठते हुए उस ने अपने कपड़ों को समेटा. उस की नजर पहले बिस्तर पर गई, फिर फर्श पर बिखरे कपड़ों पर. एकएक कपड़ा वह धीरे से उठाती,  पहनती गई. जौर्डन ने अब तक उस की ओर देखा भी नहीं था. उस की पीठ उस की तरफ थी. शर्ट के बटन बंद करता हुआ वह तेज कदमों से कमरे से बाहर चला गया.

वह एक पल के लिए ठिठक गई. उस के मन में एक टीस उठी, ‘‘मर्द कपड़े उतारते समय तो साथ होते हैं, पर पहनते समय क्यों नहीं?’’ उस का मुंह उतर गया. उसे लगा जैसे उस के भीतर कोई भारी चीज भर गई हो. एलिना का चेहरा बेहद खूबसूरत था. पतली नाक, नरम होंठ, साफ आंखें. उस की हंसी मासूम और मोहक थी. लेकिन अब उस का वजन बढ़ गया था. वह अब 16 बरस की 47 किलो की लड़की नहीं थीवह अब 55 किलो की 27 साल की औरत थी. अपने पेट और जांघों पर चढ़ आई चरबी से वह अनजान नहीं थी, पर यह चरबी एक दिन शर्म में बदल जाएगी, ऐसा उस ने कभी सोचा नहीं था.

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उस ने कई बार जौर्डन की आंखों में वह पल देखा था जब उस के शरीर को तौलती हुई एक हलकी सी अरुचि चमक जाती थी. फिर भी वह उस से उत्सुकता से संबंध बनाता था. उस के उभारों, उस की स्किन को, उस के निजी अंगों को बड़ी जिज्ञासा से छूता था. लेकिन पेट और जांघों को देखते ही उस की हथेलियां रुक जातीं और वह उन हिस्सों को अनदेखा कर देता. एलिना ने कितनी ही बार चाहा कि वह अपना वजन कम कर ले, पुराने दिनों जैसा शरीर वापस पा ले, ताकि जौर्डन की आंखों में वह खुद के लिए उठती नफरत को देखे. पर लाख कोशिशों के बावजूद वजन वहीं अटका रहा. अकेलेपन और लगातार तनाव ने उसे सिगरेटों की ओर धकेल दिया. दिनभर मीठी चाय, थकान और घुटता डर उसे भीतर ही भीतर खाता गया.
जौर्डन कोई आदर्श शरीर वाला मर्द नहीं था.

उस का अपना वजन 70 किलो था और पेट उभर आया था, पर संबंध बनाते समय एलिना ने कभी उस की ओर ऐसे नहीं देखा था. उसे शर्म आती थी किसी के शरीर को इस तरह देखने में. लेकिन अब वह जौर्डन के शरीर पर गौर करने लगी थी. एक औसत कद का, थोड़ा ठिगना मर्द. उसे अपना वजन कम लगता था और वह कहता था कि वह और वजन बढ़ाना चाहता है. एलिना को उस की आंखों में उस के पेट पर जमी चरबी के लिए कोई शर्म नहीं दिखी, बल्कि वह अपने शरीर के प्रति बहुत सहज था, जैसे कोई समस्या ही हो.
एलिना सोचती, ‘मर्द ऐसे क्यों होते हैं? वे औरत को यह क्यों जता देते हैं कि वह कहां परफैक्ट नहीं है चाहे वे खुद कितने ही भद्दे क्यों हों?’’ औरतों को उन के साथ हमेशा बहुतवेल मैनर्डरहना पड़ता है, क्योंकि जरा सी ऊंचनीच पर वे उन्हें बेइज्जत महसूस करवा देते हैं.

औरतों के सब से बड़े आलोचक अकसर उन के अपने साथी मर्द होते हैं और इस रोल में वे प्रेमी नहीं, बल्कि कठोर समीक्षक बन जाते हैं. साल बीतते गए. एलिना के वजन में कोई तबदीली नहीं आई. जौर्डन का प्रेम भी वहीं अटका रहा, पर उस की चाहत शरीर के कुछ हिस्सों तक सीमित रही. एक दिन फोन पर जौर्डन ने कहा, ‘‘मैंने तुम्हारी पीठ पर कभी भी किस नहीं किया.’’ एलिना ने सोचा कि अच्छा है, कम से कम इसने यह सोचा तो सही. पर तुरंत जौर्डन की अगली बात ने जैसे सब बदल दिया, ‘‘लेकिन तुम्हारी पीठ पसंद नहीं.  बस सामने से मतलब हैतुम्हारे उभार बहुत पसंद हैं.’’ एलिना चुप रही. उस के पास शब्द ही नहीं थे कि वह इस पर क्या कहे.

उस की चुप्पी एक आंतरिक संवाद में बदल गई, ‘क्या मैं सिर्फ उभार और निजी अंग भर हूं? क्या प्रेम में शरीर काआकर्षकरहना हमेशा जरूरी है? क्या पसंद करने वाला मर्द भी अपनी पसंदीदा औरत को ऐसे टुकड़ों में बांट कर देखता है?’ उस ने तो कभी जौर्डन को ऐसे नहीं देखा था. वह तो उस के लिए अब भी वही था, जैसा कालेज के दिनों में था, खास और दिलकश. उस के जेहन में रोजमर्रा की औरतों की यादें उतर आईं. सड़कों पर चलतीं, सिर पर टोकरी उठाए फिरतीं, घर की ओट पर बैठींबेरंगी, बेढंगी साड़ी में लिपटी औरतें. उन का काला, चपटा, उभरा, भद्दा पेट. जो आकर्षक शरीर को भूल चुकी थीं या सोचती भी नहीं थीं. उन का संघर्ष रोटी कमाना, पेट पालना, बच्चे पालना था.

उन की जिंदगी में भी तो होते होंगे निजी पलक्या महसूस करती होंगी वे उन पलों में? क्या उन के साथी
मर्द उन के बेडौल शरीर को प्रेम करते होंगे? मर्द को यादों में रही औरत याद आती होगी? क्या वे याद करते होंगे कि यही औरत सुबह उन के फर्श को साफ कर रही थी? यही औरत बेतरतीब लिपटी साड़ी में बच्चों को स्कूल छोड़ आई? या बस उन्हें दिखती होगी एक बेडौल शरीर की, कमज्यादा कदकाठी वाली औरत? क्या वे करते होंगे उपयोग? क्या वे जानते होंगे कि औरतें कितनी काम की होती हैं? अचानक उसे कालोनी में बाहर दरवाजे पर बैठी औरतें याद आईं. उन की घूरती आंखें और उन की फुसफुसाहट.
ये जवान लड़कियों के पीछे क्यों पड़ी होती हैं? क्या ये नहीं करतीं अपनी जिंदगी में यह सब, जो इतनी नफरत से भरी नजर से देखती हैं एक जवान लड़की को निकलते हुए?’

इन में यह कुंठा कहां से आई होगी? क्या यह कुंठा औरतों में यहीं से आई होगी? क्या वे यह भी नहीं सकीं कि मर्दों का मात्र दैहिक सुख उन की आत्मा को शांति नहीं देता था? कहीं कुछ रह गयावे मात्र दाता तो नहीं थीं. मगर यह सब वे औरतें सोचती भी होंगी? नहींउसे नहीं लगता था. मगर वह इन मन के जालों में गई थी, जैसे कि उसने सारी कडि़यां जोड़ ली हों, मगर उसके पास मात्र एक आह के सिवा कुछ भी नहीं.
वह खुद को अपने मन के आईने में देखतीएकदम सुडौल और आकर्षक शरीर में, काली प्लेन साड़ी पहने और जौर्डन की उस पर टिक गई नजरें.

वह चुप और खोई हुई रहती. सोचती कि कैसे वह पेट और जांघों की चरबी कम करे. कैसे वह जौर्डन की आंखों को अपने लिए चमकता हुआ देखे. कैसे वह आकर्षक रूप से उस के सामने इतराती हुई खड़ी होअब उसे यह दूर की कौड़ी लगती थी. वह निजी पलों में पेट और जांघों को छिपाने लगी थी. अब वे उसे बहुत नफरत महसूस कराने लगे थे. वह चाहती थी उन के बीच संबंध घोर अंधेरे में बनें, ताकि जौर्डन की नजर उस के पेट की चरबी और जांघों पर पड़े. उस का बेडौल शरीर अब खुद उसे पसंद नहीं था. असहजता अब उस के भीतर घर कर चुकी थी.           

राजनंदिनी रावत

Hindi Story: बदलाव

सबे की उस पुरानी सड़क पररामू जनरल स्टोरसिर्फ एक दुकान का नाम नहीं था, बल्कि यह लोगों की एक आदत बन चुका था. सुबह की पहली चाय से ले कर रात के आखिरी दूध तक, हर जरूरत का एक ही ठिकाना. किराना, दूध, छोटीमोटी दवा, कौस्मैटिक्स, आलूप्याज, लहसुन से कौपी, पैंसिलपैन तक सभी कुछ यहां मिलता था. तीनों भाई, बूढ़े पिता और बीच में खड़ा रामूतेज आवाज, तेज हिसाब और उस से भी तेज दिमाग. पर उस का दिल उतना बड़ा नहीं था, जितनी उस की दुकान. वह मनमाने दाम लगाता.
खराब सामान लौटाने से साफ मना कर देता. कंपनी के मुफ्त औफर दबा जाता और जब कोई कहता, ‘‘भैया,

यह तो गलत है,’’ तो रामू ठंडी मुसकान के साथ जवाब देता, ‘‘नहीं लेना तो
मत लो.’’
लोग चुप रह जाते. मजबूरी थी. कसबे में और औप्शन था भी तो नहीं.
समय धीरेधीरे करवट ले रहा था और बदलाव की बयार गांवकसबे में भी आई. स्मार्टफोन हर हाथ में गया. अब लोग गांवकसबे में इंटरनैट इस्तेमाल करने लगे थे.
स्मार्ट फोन और हर किसी का बैंक में खाता होने से क्रडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, पेटीएम का इस्तेमाल सीख रहे थे कसबे के लोग.
इंटरनैट ने गांव और शहर के
बीच की दूरी मिटा दी. लोग अब
घर बैठे सामान मंगाने लगेएमेजौन, फ्लिपकार्ट, ब्लिंकेट, मिंत्रा, मीशो सबकुछ सस्ता, साफ दाम और खराब हो तो बिना बहस सामान की वापसी.
पहलेपहल रामू हंसा, ‘‘मोबाइल से राशन आएगा? अरे, यह भी कोई
बात हुई…’’
लेकिन यह हंसी धीरेधीरे सूख गई. दुकान की भीड़ कम होने लगी. पुराने ग्राहक दिखना बंद हो गए. रोज का हिसाब घटने लगा.
पिता की आंखों में चिंता उतर आई. एक रात उन्होंने धीमे से कहा, ‘‘बेटा, कारोबार में पैसा नहीं, भरोसा कमाया जाता है. हम ने देर कर दी शायद.’’
रामू चुप रहा. उस ने पहली बार महसूस किया कि शायद गलती उस की भी थी.
पर तब तक बहुत देर हो चुकी थीऔर फिर कसबे में एक और नाम गूंज… ‘ब्लिंकेट’… मिनटों में सब्जी, दूध, दाल, आटाघर बैठे
अब लोग घर से निकलना भी कम करने लगे. एक दिन रामू की दुकान का शटर हमेशा के लिए गिर गया.
कुछ महीनों बाद वही रामू, पीठ पर बैग लटकाए, डिलीवरी की यूनिफार्म में, दरवाजे खटखटाता दिखाई दिया, ‘‘ब्लिंकेट डिलीवरी.’’

दरवाजा खुला. सामने वही बुजुर्ग अम्मां थीं, जिन की खराब दाल उस ने कभी बदलने से मना कर दिया था.
अम्मां ने उसे पहचान लिया. एक पल को दोनों की आंखें मिलीं. रामू की आंखें ?ाक गईं.
अम्मां ने सामान लिया और धीरे से बोलीं, ‘‘बेटा, जिंदगी सिखा देती है ?’’
रामू की आवाज भर्रा गई, ‘‘हां, अम्मां, अब सम? आया है.’’
सीढि़यां उतरते हुए रामू की आंखों में नमी थी. उसे याद आया कि कैसे लोग उस से हाथ जोड़ कर कहते थे, ‘‘भैया, बदल दीजिए,’’ और वह कठोर बना रहता था.
आज वही हाथ, दरवाजे की घंटी दबाने से पहले हलका सा कांप रहे थे.
घर लौट कर रामू ने पिता के पास बैठते हुए कहा, ‘‘बाबूजी, अगर फिर कभी दुकान खोली, तो सब से पहले भरोसा बेचेंगे.’’
पिता की बूढ़ी आंखों में आंसू थे. उन्होंने सिर्फ इतना कहा, ‘‘अब तू बड़ा हो गया है बेटा.’’
कभी ग्राहक रामू के सामने खड़े होते थे, आज वह ग्राहकों के दरवाजे पर खड़ा था.
यह समय का मजाक नहीं था. यह समय का आईना था, जिस में रामू पहली बार खुद को साफ देख पा रहा था

प्रज्ञा पांडे मनु

Social Story: करें हर काम, माहवारी है आम

Social Story: कुछ साल पहले मैं अपने परिवार के साथ जयपुर गया था. वहां टूरिस्ट बस हमें एक मंदिर तक ले गई थी. मेरे साथ वहीं का एक और परिवार भी था.

उस परिवार की एक महिला सदस्य उस मंदिर के अहाते तक तो गईं, पर जहां मूर्ति थी वहां जाने से उन्होंने मना कर दिया. मुझे लगा कि वे पहले कई बार यहां आ चुकी होंगी इसलिए नहीं जा रहीं लेकिन बाद में मेरी पत्नी ने बताया कि उन के ‘खास दिन’ चल रहे हैं इसलिए वे मंदिर में नहीं जाएंगी.

आप ‘खास दिनों’ से शायद समझ गए होंगे कि उस समय वे महिला माहवारी से गुजर रही थीं जिन्हें शारीरिक या मानसिक रूप से तो मुश्किल माना जा सकता है पर अगर उन के नाम पर उन्हें दूसरे आम काम करने से रोका जाए तो यह उन के साथ नाइंसाफी ही कही जाएगी.

क्या है माहवारी

12 से 13 साल की उम्र में अमूमन हर लड़की के शरीर में कुछ ऐसे बदलाव होते हैं जब वह बच्ची से बड़ी दिखने लगती है. इन्हीं बदलावों में से एक बदलाव माहवारी आना भी है. इस में उन्हें हर महीने 4-5 दिन के लिए अंग से खून बहता है जो तकरीबन 50 साल की उम्र तक जारी रहता है.

माहवारी एक सामान्य प्रक्रिया है, पर भारतीय समाज में फैली नासमझी के चलते जब तक महिलाएं माहवारी के चक्र में रहती हैं तब तक उन्हें बहुत से कामों से दूर रखने के कुचक्रों में उलझाए रखा जाता है. कहींकहीं तो इन दिनों के बारे में किसी को बताने से भी परहेज किया जाता है जबकि दक्षिण भारत में तो जब कोई लड़की रजस्वला हासिल करती है तो उत्सव सा मनाया जाता है. रिश्तेदारों को यह खुशखबरी दी जाती है, डंके की चोट पर.

पर हर जगह ऐसा नहीं है तभी तो जब किसी बच्ची को माहवारी आना शुरू होती है तो सब से पहले मां यही कहती सुनी जा सकती है कि बेटी, तुझे इन दिनों मंदिर या रसोईघर में नहीं जाना है. अपनों से बड़ों को खाना बना कर नहीं देना है. अचार को नहीं छूना है. खेलनाकूदना नहीं है.

कुछ घरों में तो कोई सदस्य लड़की को छू नहीं सकता और न ही वह किसी सदस्य को छू सकती है. उन्हें सोने के लिए अलग जगह व अलग बिस्तर तक ऐसे दिया जाता है, जैसे वे उन 4-5 दिनों के लिए अछूत हो गई हैं. यह सब आज 21वीं सदी में भी चालू है.

यह तो माना जा सकता है कि माहवारी के चलते लड़की या औरत के बरताव में बड़ा बदलाव आ जाता है, पर यह कोई हौआ नहीं है या कोई बीमारी भी नहीं जो उन्हें दूसरों से अलग होने का फरमान सुना दिया जाता है. यह तो कुदरत की देन है.

हां, अगर किसी को माहवारी नहीं आती है तो परेशानी की बात होती है, डाक्टर के पास जाने की नौबत आ जाती है क्योंकि अगर माहवारी नहीं आएगी तो शादी के बाद बच्चा पैदा नहीं होगा.

भारत में खासकर उत्तर भारत में माहवारी से जुड़े कई ऐसे अंधविश्वास हैं जिन्हें बिना किसी ठोस वजह के सच मान लिया जाता है. जैसे इन दिनों में उन्हें ज्यादा भागदौड़ या कसरत नहीं करनी चाहिए, जबकि यह सोच गलत है, क्योंकि बेवजह के ज्यादा आराम से शरीर में खून का दौरा अच्छे से नहीं हो पाता और दर्द भी ज्यादा महसूस होता है.

डाक्टर भी मानते हैं कि अगर माहवारी के समय महिलाएं खेलतीकूदती या कसरत करती हैं तो इस से उन के शरीर में खून और औक्सिजन का दौरा अच्छे ढंग से होता है जिस से पेट में दर्द और ऐंठन जैसी समस्याएं नहीं होती हैं.

इन दिनों में घर की बड़ी औरतें हमेशा कहती हैं कि अचार को मत छूना नहीं तो वह खराब हो जाएगा जबकि ऐसा नहीं होता है.

इस की खास वजह यह है कि और दिनों के मुकाबले ज्यादा साफसफाई रखने से माहवारी के दिनों में लड़की के शरीर या हाथों में जीवाणु, विषाणु या कीटाणु नहीं होते हैं तो अचार को छूने से वह खराब कैसे हो जाएगा? और अगर ऐसा होता तो फिर उन की छुई खाने की हर चीज ही जहर हो जानी चाहिए.

पंडितों ने जानबूझ कर औरतों को नीचा दिखाने के लिए माहवारी को पाप का नाम दे दिया और पहले लोगों को लूटने के लिए मंदिर बनवा दिया, फिर औरतों को खास दिनों में आने से बंद करवा कर ढिंढोरा पिटवा दिया कि वह गंदी है.

मतलब, हद है पोंगापंथ की. जिस मंदिर की गद्दी को पाने के लिए पंडेपुजारियों में खूनखच्चर तक हो जाता है या बेजबान पशुओं की बलि दे कर खून बहाया जाता है, वह इस खून से कैसे अपवित्र हो सकता है?

अगर हम मान लें कि कहीं भगवान है और यह दुनिया उसी ने बनाई है तो फिर उस ने ही तो औरतों को माहवारी का वरदान दिया है. फिर भगवान अपनी ही दी हुई चीज से अपवित्र कैसे हो सकता है?

इन ‘खास दिनों’ में एक बात और सुनने को मिलती है कि माहवारी में रसोईघर में जाने से वह अपवित्र हो जाता है. लेकिन यहां एक बात सोचने की है कि अगर उस परिवार में एक ही औरत या लड़की है और उसे माहवारी है तो खाना कौन बनाएगा? सारे घर को बता दिया जाता है कि वह तो इस समय गंदी है.

औरतों को चाहिए कि वे इस के खिलाफ खड़ी हों. माहवारी के दिनों को खराब न समझें. जैसे रोज शौच करने जाते हैं वैसे ही माहवारी है. घर वालों से लड़ें. पंडों से लड़ें. भगवान में विश्वास न करें, पर पंडों से कहें कि वे तो मंदिर में घुसेंगी. वहां पूजा न करें क्योंकि कोई मूर्ति इस लायक नहीं है जो औरतों को नीचा दिखाए.

माहवारी जवानी की निशानी है. इसे मस्ती से जीते हुए सिर ऊंचा कर के चलें.

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