⚲

Hindi Story : अब और नहीं

Hindi Story. फातिमा खुश थी. वह मां जो बनने वाली थी. लेकिन उसे एक ही परेशानी थी कि ससुराल में शौहर असगर केअलावा कोई और न था.

फातिमा को असगर से कभी कोई शिकायत नहीं हुई. वह सिलाई का अच्छा कारीगर था और उस काम से उस के घर की गाड़ी बड़े आराम से चल रही थी.

असगर का एक भाई मजहर था. जब तक मजहर शहर में रहा, तब तक लोग उस के नाम से कांपते रहे. जब फातिमा के अब्बा ने उस का निकाह असगर से करने की अम्मी से बात चलाई थी, तो वह कांप कर रह गई थी कि उसे एक गुंडे के घर जाना होगा.

‘‘बैठेबैठे सो गई क्या?’’

फातिमा चौंक गई. उसे पता भी नहीं चला कि कब असगर उस के पास आ कर बैठ गए थे.

‘‘ओह, आप आ गए. हाथमुंह धो लीजिए, मैं खाना लाती हूं,’’ कहती हुई फातिमा कमरे से चली गई.

जब वह खाना ले कर आई, असगर भी हाथमुंह धो कर आ चुके थे.

‘‘क्या तुम खाना नहीं खाओगी?’’ असगर ने पूछा. ‘‘मैं बाद में खा लूंगी… एक बात बताऊं?’’ फातिमा बोली.

‘‘फौरन बताओ, इस में पूछने की क्या बात है,’’ असगर बोले.

‘‘पहले आप खाना खा लीजिए, फिर बताऊंगी.’’

‘‘जैसी तुम्हारी इच्छा,’’ कहते हुए असगर खाना खाने लगे.

‘‘अब बताओ,’’ खाना खाने के बाद हाथ धोते हुए असगर बोले.

‘‘अब हमारे आंगन में मुन्ना…’’

‘‘मुबारक हो,’’ कहते हुए असगर ने फातिमा को अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘अरेअरे छोड़ो, क्या करते हो, कोई देख लेगा,’’ फातिमा बोली.

‘‘डांटती क्यों हो? अब हम पापा बनने वाले हैं,’’ असगर के कहने के अंदाज पर फातिमा मुसकरा कर रह गई और अपना सिर उन के सीने पर टिका दिया.

‘‘लेकिन एक बात है… इस बच्चे के बाद हमें और बच्चे नहीं चाहिए. तुम औपरेशन करा लेना,’’ असगर बोले.

‘‘क्या…’’ ‘‘हां, हमें एक ही बच्चा चाहिए, जिस की हम ठीक से परवरिश तो कर लेंगे,’’ असगर ने कहा.

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं? आप जानते हैं कि यह कितना बड़ा गुनाह…’’

‘‘क्या गुनाह है और क्या नहीं, यह मैं ज्यादा अच्छी तरह से जानता हूं, क्योंकि यह मु झ पर बीता है,’’ असगर धीरे से बोले.

‘‘खुदा की देन को आप रोकना चाहते हैं?’’ ‘‘10 बच्चे हों और चोरलफंगे हों या रिकशा खींचते घूमें, उस से अच्छा है कि एक बच्चा हो, जिस की हम ठीक से देखभाल तो कर सकें.’’

‘‘लेकिन…’’ ‘‘तुम्हें नहीं मालूम. ज्यादा बच्चों का जहर मेरी मां ने पीया था. मेरे घर से एकसाथ 6 जनाजे निकले थे,’’ असगर बोले.

‘‘क्या?’’ फातिमा हैरानी से बोली.

‘‘हां, मेरे अब्बा का काफी बड़ा कारोबार था. वे पांचों वक्त की नमाज पढ़ते थे, रोजे वगैरह रखते थे. अचानक अब्बा का चलता हुआ कारोबार फेल हो गया. वे यह  झटका सहन नहीं कर सके और बीमार पड़ गए. उसी साल मेरी 7वीं बहिन ने जन्म लिया. अब्बू बीमार पड़े थे और आमदनी का कोई जरीया नहीं था. घर खर्च के लिए पहले जेवर बिके, फिर दूसरा सामान बिकना शुरू हुआ…’’

‘‘लेकिन इस में बच्चों का क्या कुसूर, यह तो किस्मत की बात थी,’’ फातिमा बोली.

‘‘कम बो झ हो तो हिम्मत कर के उठाया जा सकता है और कमरतोड़ बो झ किस्मत के सहारे छोड़ दिया जाता है. आमदनी बंद होने के चलते मेरी और मजहर की पढ़ाई बंद हो गई. मजहर गलत संगत में पड़ गया. मां ने घर में सिलाई शुरू की, लेकिन फिर भी भुखमरी नहीं खत्म हुई.’’

‘‘ओह…’’ फातिमा ने कहा.

‘‘मैं कैसे भूल सकता हूं, जब रोटी के एकएक टुकड़े के लिए मेरे छोटे भाईबहिन कुत्तों की तरह लड़ते थे. अब्बा एक दिन चल बसे. जीतेजी उन्होंने बेहिसाब दुख सहे थे. घर में हर समय हायतोबा मची रहती थी. अब्बा की मौत से उन का सहारा भी खत्म हो गया.’’

‘‘मजहर और आप तो तब सम झदार हो गए होंगे?’’ फातिमा बोली.

‘‘हां, कुछ दिन मजहर ने एक होटल में काम किया, जहां बातबात पर उसे बेइज्जत होना पड़ता था. उस ने नौकरी छोड़ दी और गुंडागर्दी शुरू कर दी,’’ असगर गहरी सांस छोड़ते हुए बोले.

‘‘मैं ने रिकशा चलाना शुरू किया. छोटी उम्र में बहुत मुश्किल काम था, फिर भी मैं जू झ रहा था और एक दिन बीमार हो गया.

‘‘3 दिन की भुखमरी ने सब को बेहाल कर दिया और मजबूर हो कर मैं उसी हालत में रिकशा ले कर चल दिया, लेकिन जल्दी ही पस्त हो गया.

‘‘तभी महल्ले के इमरान मियां ने खबर दी कि मेरी मां ने हमारे पांचों छोटे भाईबहिनों की गला दबा कर हत्या कर दी और खुद ने फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली. क्या बीती होगी मां पर, जब उन्होंने अपने हाथों से बच्चों का गला दबाया होगा,’’ असगर ने आगे कहा.

‘‘ओह…’’ फातिमा बोली. उस की आवाज कांप रही थी.

‘‘अगर हम 2 ही भाई होते, तो मां को खुदकुशी नहीं करनी पड़ती.

‘‘इसलिए यह सोचना हमारा काम है कि हम कितने बच्चों की परवरिश सही ढंग से कर सकते हैं,’’ असगर बोले. फातिमा चुप रही.

‘‘हम जैसे छोटे लोगों के लिए एक ही बच्चा काफी है, जिस की हम ठीक से परवरिश कर सकें. अगर रफीक मियां ने सहारा दे कर मुझे सिलाई न सिखाई होती, तो मैं भी गुंडा होता या भिखारी,’’ असगर बोले.

फातिमा की सम झ में अच्छी तरह आ चुका था कि उस के लिए एक ही औलाद ठीक है.  Hindi Story

-साबिर हुसैन

Short Story in Hindi : बिंदिया

Short Story in Hindi. ठाकुर वीर सिंह की हवेली दुलहन की तरह सजी थी. बिजली वाले रंगबिरंगे बल्ब लगा कर हवेली को जगमगा रहे थे. फूल वाले उसे फूलों से सजा रहे थे और हलवाई कई तरह के पकवान बना रहे थे, जिन की खुशबू चारों ओर फैल रही थी.

हवेली के अंदर सिर्फ एक ही नाम पुकारा जा रहा था, ‘बिंदिया… बिंदिया… बिंदिया…’

हलवाई बोल रहा था, ‘‘बिंदिया बहू, भोजन तैयार है…’’

माताजी पुकार रही थीं, ‘‘बेटी बिंदिया, भोग का समय हो रहा है.’’

तभी ऊपर से आवाज आई, ‘‘बिंदिया भाभी, दूल्हे का सूट कहां रखा है?’’

हवेली के छोटे ठाकुर शक्ति सिंह की शादी हो रही थी और बरात जाने की तैयारी चल रही थी, लेकिन बिंदिया को घड़ी भर की भी फुरसत नहीं थी. वह अपनी सूझबूझ  से सारे काम बखूबी निबटा रही थी.

इसी बीच नौकरानी ने कहा, ‘‘बीबीजी, आप को बाबूजी बुला रहे हैं.’’

बिंदिया ने रसोई में जा कर भोजन का थाल सजा कर भोग लगाया, फिर शक्ति सिंह का सूट अलमारी से निकाल कर सीधे बाबूजी के पास पहुंची और बोली, ‘‘आप ने मुझे बुलाया बाबूजी?’’

बाबूजी ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें इसलिए बुलाया था कि देखना किसी भी काम में कोई कमी न रह जाए. शादी का सारा काम तुझे ही संभालना है.’’

बिंदिया ने हंसते हुए कहा, ‘‘बाबूजी, आप परेशान न हों. मैं सब संभाल लूंगी.’’

बिंदिया के जाने के बाद बाबूजी सोच में डूब गए और उन्हें 3 साल पुरानी घटना याद आने लगी…

एक बार जब ठाकुर वीर सिंह अपनी पत्नी के साथ शहर जा रहे थे, तो रास्ते में तेज रफ्तार से आते एक ट्रक ने उन की गाड़ी को पीछे से टक्कर मार दी थी. उस हादसे में उन की पत्नी की टांग में बहुत चोट आई थी. ज्यादा खून निकलने से वे बेहोश हो गई थीं.

जैसेतैसे उन्होंने अपनी पत्नी को अस्पताल पहुंचा दिया था, पर उन्हें यह चिंता हो रही थी कि इस अनजान शहर में कौन उन की मदद करेगा. उन की पत्नी को जिस ग्रुप का खून चढ़ाया जाना था, वह अस्पताल में मौजूद नहीं था.

तब नर्स ने उन्हें खून देने वालों की लिस्ट थमाते हुए एक पते की ओर इशारा करते हुए कहा था, ‘आप इस पते पर जाइए, आप का काम हो जाएगा.’

ठाकुर वीर सिंह उसी वक्त उस पते पर जा पहुंचे. उन्होंने उस छोटे से घर का दरवाजा खटखटाया.

जल्दी ही 20-21 साला एक लड़की ने दरवाजा खोल कर पूछा, ‘कहिए, आप को किस से मिलना है?’

तब ठाकुर साहब ने सारी घटना बताई, जिसे सुनते ही लड़की ने अस्पताल जा कर अपना खून दे दिया.

खून मिल जाने से ठाकुर वीर सिंह की पत्नी की जान तो बच गई, पर कमजोरी के चलते लड़की की हालत खराब हो गई.

जब वह लड़की ठीक हो गई, तब ठाकुर साहब ने उसे बुला कर रुपए देने की कोशिश की, तो उस ने कहा, ‘बाबूजी, आप मुझे  जो रुपए दे रहे हैं, इन के सहारे मैं समाज में कितने दिन इज्जत से जी सकूंगी.

‘आप तो जानते हैं कि जब एक जवान लड़की के सिर से उस के मांबाप का साया उठ जाता है, तो समाज के भूखे भेडि़ए उसे ललचाई नजरों से देखने लगते हैं और मौका पा कर उसे नोचने लगते हैं, इसलिए आप मुझे रुपए नहीं, बल्कि कोई काम दे दीजिए.’

पहली बार ठाकुर साहब ने उस लड़की को गौर से देखा. वह उन्हें सुंदर व सुशील लगी. उन्होंने मन ही मन उसे अपने बड़े बेटे अजीत सिंह की पत्नी बनाने का फैसला किया और कहा, ‘बेटी, क्या तुम हमारे साथ गांव चलोगी? जब तक मेरी पत्नी चलफिर नहीं सकती, तुम्हें उन की सेवा करनी पड़ेगी… जब तुम कहीं और जाना चाहोगी, मैं भेज दूंगा.’

ठाकुर साहब ने अपनी पत्नी को मन की बात बताई, तो वे भी राजी हो गईं.

बिंदिया की सेवा और मालिश से ठकुराइन की टांग 2 महीने में ही पूरी तरह ठीक हो गई. फिर जल्दी ही उन्होंने उसे अपनी बहू बना लिया.

ठाकुर साहब अपने छोटे बेटे की शादी भी एक गरीब परिवार में कर रहे थे, जिसे बिंदिया ने ही पसंद किया था और कहा था, ‘बाबूजी, आप ने जैसे मुझ  गरीब को अपनी बहू बनाया, उसी तरह इस लड़की को भी अपना लीजिए.

‘गरीब पैसे का नहीं, प्यार का भूखा होता है. उसे जो प्यार करता है, उस पर वह सबकुछ न्योछावर कर देता है…’

यही सोचतेसोचते ठाकुर साहब की आंखों से आंसू निकल पड़े.

तभी बिंदिया की आवाज आई, ‘‘बाबूजी, जल्दी से खाना खा लीजिए. बरात के जाने का वक्त हो रहा है.’’

यह सुन कर उन्होंने जल्दी से अपनी आंखें पोंछीं और बिंदिया का सपना पूरा करने चल पड़े.  Short Story in Hindi

– अनिल सोनी

Revenge story in hindi : आखिरी साधन

Revenge story in hindi. उस रात का मंजर याद आते ही सईदा के तनबदन में अंगारे भर गए. उस ने चादर से अपना शरीर लपेट कर बांहों से चेहरा छिपा लिया और दहाड़ें मार कर रो पड़ी.

उस समय जब सईदा के साथ ऐसा हादसा गुजरा, वह इमारत की आखिरी मंजिल के कमरे में थी, जहां से चिल्लाने की आवाज नीचे तक नहीं पहुंच सकती थी.

इलाहाबाद के एक डिगरी कालेज में सईदा और दिलशाद छात्र थे. दोनों का मिलनाजुलना बढ़ता रहा, जिस ने एक रोज इश्क का रूप ले लिया. सईदा दिलशाद की मुहब्बत में गिरफ्तार हो चुकी थी.

एक दिन दिलशाद ने कहा, ‘‘सईदा, हम लोग बैठेबैठे बोर हो चुके हैं. चलो, बाहर घूम लें. होटल में चल कर खाना खाएंगे, फिर लौट आएंगे.’’

‘‘दिलशाद, कुछ देर में रात हो जाएगी. बेहतर होगा कि हम लोग दूसरे दिन का प्रोग्राम बना लें,’’ सईदा बोली.

‘‘इस वक्त मन हो तो चलो, फालतू बातों से कोई फायदा नहीं.’’

‘‘जिद करते हो तो चलो, लेकिन मेरा ज्यादा समय मत खराब करना.’’

दोनों चल दिए. रात का खाना होटल में खाया. ज्यादा रात होने लगी, तो दिलशाद ने कहा, ‘‘सईदा, मुझे  अपने फ्लैट में कुछ जरूरी काम याद आ गया है. चलो, पहले उसे पूरा कर लूं, फिर तुम्हें घर तक छोड़ दूंगा.’’

‘‘मैं बाहर खड़ी रहूंगी. तुम अपना काम जल्द निबटा कर आ जाना,’’ सईदा ने कहा.

‘‘बाहर खड़ी रह कर क्या करोगी? कोई चोरउचक्का आ गया, तो नाहक परेशान करेगा. मुझे ज्यादा समय नहीं लगेगा,’’ वह हंस कर बोला.

दोनों लिफ्ट से दिलशाद के फ्लैट पर चले गए.

दिलशाद ने अपनी मुहब्बत का वास्ता दे कर सईदा को इतना मजबूर कर दिया कि उसे कुछ देर तक रुकना पड़ा.

बातोंबातों में वह उसे जिस्मानी संबंध बनाने को मजबूर करने लगा. तब सईदा को शक हुआ. उस ने इनकार करते हुए कहा, ‘‘शादी से पहले यह सब ठीक नहीं.’’

दिलशाद रूठ कर बोला, ‘‘तुम्हारे दिल में मेरे लिए सच्ची मुहब्बत नहीं है, इसलिए शादी का बहाना ढूंढ़ लिया. अगर तुम्हें एतराज है, तो चलो पहले तुम्हें घर छोड़ आऊं.’’

‘‘डार्लिंग, इस तरह नाराज मत हो.’’ ‘‘मैं तुम्हें मजबूर नहीं करता. कुछ देर रुको. कौफी पी कर चलेंगे.’’

दिलशाद ने गरमागरम कौफी ला कर सईदा को दी. कौफी पीने के बाद सईदा बेसुध हो गई.

जब सईदा होश में आई, तो उस ने अपने कपड़े ढीले पाए. वह दिलशाद की बांहों में पड़ी थी.

दिलशाद उसे बेतहाशा प्यार कर रहा था. सईदा भी सब भूल कर पूरे जोश के साथ दिलशाद से लिपट गई.

दिलशाद ने सिगरेट जलाई और कमरे से बाहर चला गया. उसी समय कमरे की बिजली चली गई. घुप अंधेरा छा गया. उस का चाहने वाला वापस लौट कर अंधेरे में फिर से उस के जिस्म से लिपट गया.

बैडरूम के अंधेरे में केवल उन की सांसों की गूंज थी. अचानक सईदा को उस अंधेरे में अजीब सा एहसास हुआ. उस के हाथ दिलशाद की कलाइयों पर थे. उसे यों लगा, जैसे ये दिलशाद की कलाइयां नहीं, किसी और की हों. उस के हाथ तेजी से दिलशाद के कंधों, गरदन और चेहरे पर दौड़ गए.

सईदा ने अंधेरे में आंखें फाड़ कर देखा, पर कुछ नजर नहीं आया, लेकिन उस के कांपते हाथ बहुतकुछ महसूस कर चुके थे. एक पल के लिए उस ने ऐसा महसूस किया, जैसे उस की धड़कन बंद हो जाएगी.

‘‘तुम कौन हो?’’ वह चीखी.

उस आदमी ने तेज सांस ली और कमरे का गेट खोल कर बाहर चला गया.

सईदा चीख कर बेहोश हो गई. होश में आने पर उस ने दिलशाद को कुरसी पर बैठे सिगरेट पीते देखा.

उस ने गुस्से में पूछा, ‘‘तुम्हारे अलावा दूसरा साया किस का था, जिस ने मुझ  पर घोर जुल्म किया?’’

दिलशाद ने कहा, ‘‘वह मेरा जिगरी दोस्त था. सईदा, जो कुछ हुआ, उसे भूल जाओ. शादी तो मैं तुम से ही करूंगा. वह मेरा दोस्त दुग्गल ईरानी शुरू से ही मेरी हर चीज में साझेदार था. वह अपनी माशूका का प्यार मुझे  दिलाता था. मैं ने अपनी माशूका का प्यार उसे दे कर सारा कर्ज चुका दिया. यकीन करो, फिर कभी तुम्हें ऐसी शिकायत का मौका नहीं दूंगा.’’

‘‘तुम्हारे कहने का मतलब मेरी समझ  में अच्छी तरह आ गया. तुम लोग किसी लड़की से मुहब्बत न कर के फरेब करते रहे हो. मुझे भी भरोसे में ले कर तुम ने मेरे साथ अच्छा नहीं किया. इतना बड़ा गुनाह किया, जिस की जितनी भी सजा दी जाए, कम होगी.’’

‘‘तुम्हारी हर सजा मंजूर होगी. बस, रूठना बंद करो और आगे अपना वही प्यार लेतीदेती रहो.’’

‘‘शर्म नहीं आती ऐसी बातें जबान से निकालते हुए. क्या अब भी उम्मीद करते हो कि तुम मुझ से कभी प्यार पा सकोगे? लानत है, तुम्हारी जिंदगी पर…’’ वह चिल्लाई.

दिलशाद ने आगे बढ़ कर सईदा को अपनी बांहों में लेना चाहा, तो वह चीख पड़ी, ‘‘खबरदार, जो तुम ने मुझे  छूने की कोशिश की. तुम औरत को नहीं जानते. जब आग और शोला बन कर किसी पर गिरती है, तो उस पर कयामत आ जाती है, जिसे आदमी बरदाश्त नहीं कर सकता.

‘‘तुम इनसान नहीं हैवान हो, जिस के सीने में दिल नहीं है. अब तो तुम प्यार के काबिल नहीं रह गए. मेरी इज्जत का खजाना तुम दोनों ने मिल कर लूट लिया,’’ फिर वह लिफ्ट से उतर कर चली गई. कुछ दिनों तक वह कालेज नहीं गई.

एक रोज वह कैंटीन में उदास बैठी चाय पी रही थी. दिलशाद उस के पास आ कर बैठ गया. उस ने काफी मिन्नत की, माफी मांगी, ‘‘जो हुआ उसे भूल जाओ.’’

‘‘दिलशाद, तुम दोनों ने मेरे साथ जो किया, शायद उसी की वजह से मेरे बूढ़े बाप पर कहर टूट पड़ा. उन का इंतकाल हो गया. थोड़ी सी जमीन जो उन के पास थी, किसी दूसरे ने उन की बीमारी की हालत में लिखवा कर घर में चोरी करा दी,’’ सईदा मायूसी से बोली.

‘‘यह सब सुन कर मुझे  सदमा पहुंचा,’’ दिलशाद ने कहा.

‘‘अब तो मेरे गांव में भी कुछ नहीं बचा, इसलिए कालेज छोड़ कर इतनी दूर चली जाऊंगी, जहां से फिर यहां लौटना मुश्किल होगा,’’ सईदा मायूसी से बोली.

‘‘मैं पैसों का इंतजाम कर दूंगा. कालेज छोड़ने की जरूरत नहीं होगी,’’ दिलशाद ने दिलासा देते हुए कहा.

‘‘मुझे अब पढ़ना ही नहीं है. पैसों की जरूरत नहीं पड़ेगी. मुझे  इतना गरीब मत समझो कि भीख मांगनी पड़े,’’ सईदा बोली.

‘‘तुम ने तय कर लिया है, तो जोर नहीं दे सकता. केवल यही फरियाद करूंगा कि एक रोज मेरे गरीबखाने पर आखिरी डिनर ले कर ही जाना,’’ वह नाटकीय अंदाज में बोला.

‘‘शायद यह तुम्हारी दूसरी चाल होगी, ताकि तुम मेरे जिस्म से खिलवाड़ कर सको,’’ सईदा ने हिकारत से कहा.

‘‘मैं कान पकड़ कर वादा करता हूं, फिर वैसा नहीं होगा,’’ दिलशाद बोला.

‘‘ठीक है, अगर तुम ने फिर से वही बेहूदा हरकत करनी चाही, तो मैं तुम्हारे फ्लैट की आखिरी मंजिल से कूद पड़ूंगी और तुम्हें हत्या के इलजाम में जेल जाना पड़ेगा,’’ सईदा ने धमकी दी.

‘‘भरोसा रखो, ऐसी नौबत नहीं आएगी. वैसे, कब जा रही हो?’’ दिलशाद ने पूछा.

‘‘2 दिन बाद,’’ सईदा ने कहा.

‘‘तो कल शाम को मेरी दावत कबूल करो,’’ दिलशाद ने गुजारिश की.

‘‘एक शर्त पर. तुम अपने दोस्त दुग्गल ईरानी को भी दावत में बुलाओगे, जिसे मैं उस के अत्याचार करते समय नहीं देख पाई थी. अंधेरे में वह भाग गया था. वह मुझ से माफी मांग लेगा, तो मुझे जातेजाते सुकून मिलेगा.

‘‘किसी तीसरे को मत बुलाना, वरना मेरी चेतावनी याद रखना,’’ सईदा ने धमकी के अंदाज में कहा.

‘‘तुम जैसा चाहती हो, वैसा ही होगा. तुम कल रात 8-9 बजे के बीच आ जाना.’’

‘‘मेरी इज्जत तो लूट ही ली गई, अब किसी का डर नहीं,’’ सईदा ने कहा.

उसी प्रोग्राम के मुताबिक टेबल के एक ओर सईदा बैठी थी और दूसरी ओर दिलशाद और दुग्गल ईरानी बैठे थे. खाना टेबल पर सजा था. दुग्गल ईरानी ने हाथ जोड़ कर माफी मांगी और तीनों खाना खाने लगे.

‘‘तुम दोनों समझते हो कि किसी औरत की इज्जत लूट लेने के बाद माफीनामे से उस की वही रौनक फिर लौट आएगी, पर ऐसा नहीं है. औरत खिलौना नहीं है कि जब चाहा खेला और फेंक दिया.

‘‘मैं भी एक इज्जतदार औरत थी, जिसे तुम लोगों ने मिनटों में धोखा दे कर तबाह कर दिया,’’ हंसते हुए सईदा खाना खाने के साथसाथ कहती जा रही थी.

‘‘तुम लोग औरत को नहीं जानते, वह बड़ी नरम, कमजोर और बुजदिल भी कही जाती है, लेकिन जब वह इंतकाम लेने पर तुल जाती है, तो उस समय उस से खतरनाक और खौफनाक कोई चीज नहीं होती.’’

सईदा ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अब तुम लोगों ने माफी मांग ही ली है, तो बात खत्म हो गई. वैसे, हम लोग इस वक्त 8वीं मंजिल पर आखिरी डिनर ले रहे हैं. तुम लोग अगर मेरे साथ कोई ज्यादती करना चाहोगे, तो मेरी चीखपुकार नीचे तक नहीं पहुंचेगी.’’

‘‘क्या तुम ऐसी उम्मीद करती हो?’’ दिलशाद नाटकीय लहजे में बोला.

‘‘किसी का क्या भरोसा? पिछली बार भी तो भरोसे पर ही यहां मुझे लाया गया था. खैर, छोड़ो उन बातों को. मैं भी तुम लोगों के लिए अपने हाथ से बनाई खीर लाई हूं. इजाजत हो तो दूं. इस में कोई नशा नहीं, जो मुझे कौफी में दिया गया था.’’

सईदा ने 2 डब्बों के ढक्कन खोले. एक डब्बे की खीर उस ने दिलशाद के चेहरे पर फेंकी और दूसरे डब्बे की खीर बिना समय गंवाए दुग्गल ईरानी के चेहरे पर फेंक कर चिल्लाई, ‘‘हैवानो, देख लो तुम लोगों द्वारा बेइज्जत की गई औरत का इंतकाम. तुम दोनों दर्द से चिल्लाते रहोगे, पर कोई यहां तक जल्दी नहीं पहुंच सकेगा.

‘‘जब तक तुम दोनों नीचे पहुंचोगे, तुम्हारी आंखें जवाब दे चुकी होंगी. मुझे  तुम लोग कभी नहीं पा सकोगे.’’

अपनी बात पूरी कर के सईदा ने बाहर निकल कर दरवाजे की सिटकिनी बंद की और चली गई. दोनों डब्बों में खीर के बजाय तेजाब था.

दिलशाद और दुग्गल ईरानी कमरे में चिल्लातेछटपटाते और तड़पते रहे. एक रोज सईदा भी उन दोनों के जोरजुल्म से खूब छटपटाई थी.

दिलशाद और दुग्गल ईरानी से बदला लेने के लिए शायद सईदा के पास केवल यही एक आखिरी साधन बचा था. Revenge story in hindi

Emotional Story in Hindi : भरोसा

शहर के उस हिस्से को नगरनिगम के नक्शे में शायद कोई नाम दिया गया था, लेकिन लोग उसे  झुग्गी बस्ती कहते थे. नामों की भी अपनी एक हैसियत होती है. कुछ नाम सुनते ही आदमी के सामने मकान, सड़क और बिजली के खंभे आ जाते हैं और कुछ नाम सुनते ही टिन, तिरपाल, कीचड़ और नालियां.

उसी बस्ती में सोनू रहता था. 11 साल का सोनू 5वीं क्लास में पढ़ता था. उस के पिता रामदीन पास की एक दुकान पर मजदूरी करते थे और मां सुशीला आसपास के घरों में बरतन मांजती थी. परिवार में सोनू के अलावा 8 साल की गुडि़या और 5 साल का मुन्ना थे.

घर इतना छोटा था कि उस में गरीबी को भी पैर सिकोड़ कर बैठना पड़ता था. बरसात में छत टपकती, गरमी में टिन तपता और सर्दी में हवा दीवारों के छेद गिनती हुई भीतर चली आती.

लेकिन सोनू के पास एक चीज थी, उस की किताब. वह किताब को ऐसे संभाल कर रखता जैसे कोई अमीर आदमी अपनी तिजोरी की चाबी रखता है.

बस्ती से कुछ दूर एक संस्था ने बच्चों के लिए मुफ्त पाठशाला खोल रखी थी. वहां न फीस थी, न यूनिफौर्म का झंझट, न जूतेमोजे का हिसाब. जिस के पास कौपी नहीं, उसे कौपी. जिस के पास पैंसिल नहीं, उसे पैंसिल.

सोनू रोज वहां जाता था. मैडम उस के अनुशासन के लिए उसे बहुत सराहती रहती थीं. वे पूछतीं, ‘‘सोनू, बताओ, बड़े हो कर क्या बनोगे?’’ ‘‘टीचर बनूंगा.’’

‘‘क्यों?’’ वे पूछतीं. ‘‘मैडम क्योंकि ऐसा बनने के लिए किसी की जातपांत नहीं पूछी जाती, उस की जेब नहीं देखी जाती.’’

50 साल की उषा मैडम टकटकी लगा कर उस बालक की ओर हैरानी से  देखती ही रह जातीं.

सोनू ने यह बात किस किताब से सीखी थी, यह उन्हें मालूम नहीं था. शायद जिंदगी सब से बड़ी किताब होती है और सब से महंगी भी.

पिछले महीने बस्ती पर बारिश ने ऐसी मार मारी थी कि गरीबों के घरों में पानी घुस आया था. जिन के घर पक्के थे, उन्होंने दरवाजे बंद कर लिए. जिन के घर प्लास्टिक और टिन के थे, वे अपने बच्चों को गोद में उठा कर पानी का रास्ता देखते रहे.

सुशीला का काम बंद हो गया था. रामदीन की दुकान भी कई दिनों तक बंद रही. घर में राशन कम था.

सोनू ने पहली बार सम झा कि भूख का भी कोई चेहरा होता है. छुटका भाई रात को पूछता, ‘‘भैया, कल हम को रोटी मिलेगी?’’

सोनू कहता, ‘‘क्यों नहीं मिलेगी… कल तो हलवा भी मिलेगा.’’

सोनू जानता था कि हलवा तो दूर, रोटी का भरोसा भी नहीं था, फिर भी छुटके के सामने उम्मीद बांधना जरूरी था.

एक दिन बहन गुडि़या ने पूछा, ‘‘भैया, तुम  झूठ बोलते हो?’’ सोनू हंसा, ‘‘नहीं.’’

‘‘फिर हलवा कहां है?’’

सोनू चुप हो गया. बाहर बारिश हो रही थी. उस ने खिड़की के नाम पर टंगे बोरे को देखा और बोला, ‘‘हलवा अभी रास्ते में है.’’

यह सुन कर गुडि़या भी खिलखिला कर हंस दी.

गरीबी में बच्चों की हंसी भी बड़ी चीज होती है. लेकिन उस महीने सोनू ने एक और चीज देखी थी. पिता जब सुबह 8 बजे दुकान पर जाते और पौने 12 बजे खाना खाने घर आते, तो घर का वातावरण बदल जाता.

दुकान का तनाव, कम मजदूरी, मालिक की डांट और जिंदगी की खी झ… सब मिल कर पिता के भीतर बारूद बन जाते.

और घर आते ही उस की चिनगारी मां पर गिरती, ‘‘पागल औरत दिनभर करती क्या हो? बच्चों के लिए कुछ बचा भी है? तुम्हारी वजह से घर की हालत ऐसी है.’’

सुशीला चुप रहती. गरीब औरतों के पास कई बार जवाब होते हैं, मगर जवाब देने की कीमत बहुत महंगी होती है.

सोनू सब देखता था. वह अपनी मां की तरफ देखता और फिर सिर  झुका लेता.

एक दिन उस ने देखा कि मां के हाथ कांप रहे थे.

‘‘मां, क्या हुआ?’’ ‘‘कुछ नहीं बेटा.’’

‘‘आप रोई थीं?’’ ‘‘नहीं…’’

‘‘आंखें लाल क्यों हैं?’’ मां ने उस के सिर पर हाथ रख दिया, ‘‘तू पढ़ाई कर.’’

सोनू सम झ गया.

मां ने फिर वही पुराना इलाज किया था. दुख को बेटे के सिर पर हाथ फेर कर छिपा देना.

अगले हफ्ते पाठशाला में हिंदी की कविता पढ़ाई जा रही थी. मैडम कविता सुना रही थीं और मतलब बता रही थीं, ‘‘बच्चो, कविता हमें बताती है कि मुश्किल समय में भी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए…’’

तभी पीछे से सीट खिसकने की आवाज आई. सोनू उठ कर धीरेधीरे मैडम के पास आया.

‘‘क्या हुआ?’’ ‘‘मैडम…’’

‘‘हां बेटा?’’ ‘‘आप मेरे साथ औफिस में चलिए.’’

‘‘क्यों?’’ ‘‘मु झे घर पर फोन करना है.’’

मैडम मुसकराईं, ‘‘आज ही तो बहुत दिन बारिश के बाद स्कूल खुले हैं. आज ही घर की याद आ गई?’’

सोनू ने सिर  झुका लिया, ‘‘जी मैडम… मु झे मां का हाल पूछना है.’’ मैडम का चेहरा बदल गया, ‘‘मां को क्या हुआ?’’

‘‘पता नहीं.’’ ‘‘तो फोन क्यों?’’

सोनू ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘क्योंकि बाबा घर आए होंगे.’’ ‘‘तो?’’

‘‘जब वे घर आते हैं न… मां पर गुस्सा करते हैं.’’ मैडम चुप हो गईं.

सोनू ने कहा, ‘‘गाली भी देते हैं… ताने भी… कभीकभी बहुत जोर से बोलते हैं.’’

‘‘तुम ने मु झे पहले क्यों नहीं बताया?’’ सोनू ने मासूमियत से कहा, ‘‘घर की बात स्कूल में थोड़े ही बताते हैं मैडम.’’

मैडम के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था.

बड़ेबड़े समाजशास्त्री घरेलू हिंसा पर किताबें लिखते हैं. सरकारें योजनाएं बनाती हैं. भाषण होते हैं. पोस्टर छपते हैं, लेकिन एक 11 साल का बच्चा 2 वाक्यों में उस पूरे समाज का सच कह गया था, ‘‘घर की बात स्कूल में थोड़े ही बताते हैं.’’

मैडम ने फोन मिलाया. घंटी गई. सोनू की उंगलियां कांप रही थीं.

फोन उठा, ‘‘हैलो?’’ ‘‘मां…’’

उधर कुछ क्षण चुप्पी रही. ‘‘हां, बेटा.’’

‘‘आप ठीक हो?’’ ‘‘हां…’’

‘‘बाबा आए थे?’’ फिर चुप्पी.

हां बेटा.’’ ‘‘कुछ कहा?’’

मां ने जवाब नहीं दिया. सोनू सम झ गया.

उस ने भरे गले से कहा, ‘‘मां, मैं सीधा घर आ जाऊंगा… ठीक है न प्यारी मां…’’ इतना ही कह कर सोनू ने फोन काट दिया. उस की आंखों में समंदर था.

मैडम ने उसे वापस क्लास में बुला लिया.

मैडम जानती थी कि उस के आंसू केवल मां के लिए नहीं थे. वह उस घर के लिए थे जहां रोटी कम थी और डर ज्यादा. उस बचपन के लिए डर था जिस में खिलौनों की जगह जिम्मेदारियां थीं.

और उस समाज के लिए था जहां एक बच्चा स्कूल में कविता पढ़तेपढ़ते अचानक अपनी मां की हिफाजत के लिए फोन कर के उन की आवाज सुनना चाहे.

मैडम काफी अनुभवी थीं. उन्होंने एक संस्था के संचालकों से बात की.

सुशीला को फिर काम दिलाने की कोशिश हुई. राशन का इंतजाम हुआ. बच्चों की पढ़ाई नियमित हुई, लेकिन सब से बड़ी जरूरत थी सोनू को यह सम झाना कि वह अकेला नहीं है.

एक दिन मैडम ने उस से कहा, ‘‘बेटा, तुम्हें अपनी मां की चिंता करनी चाहिए, लेकिन तुम्हें अपने सुनहरे भविष्य की भी चिंता करनी चाहिए.’’

सोनू ने पूछा, ‘‘जी, वह कहां मिलता है मैडम?’’

मैडम चुप रह गईं. इस सवाल का जवाब किसी स्कूली किताब में नहीं था.

सोनू ने फिर पूछा, ‘‘क्या गरीब बच्चों का भविष्य भी होता है?’’

मैडम की आंखें भर आईं. उन्होंने कहा, ‘‘होना चाहिए.’’

सोनू की आंखों में सवाल उभरा, ‘‘तो फिर सुनहरा भविष्य हमें मिलता क्यों नहीं?’’

इस बार मैडम के पास कोई जवाब नहीं था.

अगले दिन हिंदी की क्लास में मैडम ने बच्चों से पूछा, ‘‘बताओ, सब से प्यारी आवाज कौन सी होती है?’’

सब ने अपनी रुचि से जवाब दिया, जैसे ‘कोयल’, ‘चिडि़या’, ‘छुट्टी की घंटी’, ‘शंख’, ‘बांसुरी’ आदिआदि.

मैडम ने सोनू की ओर देखा, ‘‘तुम बताओ?’’ सोनू चट से बोला, ‘‘मां की.’’

‘‘क्यों?’’ सोनू ने कहा, ‘‘क्योंकि जब घर में डर हो न मैडम, तब मां की आवाज सुन कर पता चलता है कि वे अभी हमारे साथ हैं.’’

कक्षा में सन्नाटा छा गया. मैडम ने उस की ओर देखा. सोनू फिर अपनी किताब में  झुक गया.

बाहर  झुग्गियों की ओर धुआं उठ रहा था. कहीं चूल्हा जल रहा था, कहीं रोटी सिंक रही थी और कहीं शायद आज भी कोई बच्चा भूख को बहला कर सो रहा था.

लेकिन उस दिन सोनू की आंखों में एक नया सपना था. वह टीचर ही बनना चाहता था, सिर्फ इसलिए नहीं कि उसे नौकरी चाहिए थी, बल्कि वह चाहता था कि उस की तरह कोई बच्चा कभी यह न पूछे, ‘‘क्या गरीब बच्चों का भी बचपन होता है?’’

सोनू चाहता था कि उस की मां जैसी औरतें डर कर चुप न रहें. वह चाहता था कि घर का मतलब केवल चारदीवारी न हो, सुरक्षा भी हो और  इसीलिए उस ने अपनी किताब खोली.

कविता की पहली लाइन पढ़ी, ‘‘चांदसितारों तक जाना है…’’

सोनू की आवाज में अब डर नहीं था. वह आवाज धीरेधीरे पूरी क्लास में फैल रही थी.

शायद कविता पहली बार किसी बच्चे की किताब से निकल कर उस की जिंदगी में उतर रही थी. और शायद यही पढ़ाईलिखाई का असली मतलब था. अभाव में भी आदमी को इतना मजबूत बना देना कि वह अपने हिस्से की रोशनी पहचान सके. Emotional Story in Hindi

–पूनम पांडे

Relationship Story in Hindi : अवंतिका

Relationship Story in Hindi. बिजनौर की अवंतिका की शादी मेरठ के पौश इलाके गंगानगर के रहने वाले रिटायर्ड जेलर दीपचंद्र सिंह चहल के बड़े बेटे राहुल से तय हुई तो वह खुशी से  झूम उठी. उस की ससुराल वालों का खूब नाम था. पैसे की कोई कमी न थी. बहुओं को सास का बड़ा डर सताता है, यहां तो सास ही नहीं थी. वे बहुत पहले इस दुनिया से कूच कर गई थीं. हां, उस का एक देवर जरूर था लेकिन उसे तो घर की बड़ी बहू बनने का मौका मिल रहा था.

जेलर दीपचंद्र का ज्यादातर समय जेल की कोठरियों को देख कर बीता था. उन की सोच अभी भी जेलर वाली ही थी. इस की  झलक उन के बड़े मकान में दिखाई पड़ती थी. उनके दुमंजिले मकान में जेल की कोठरियों की तरह कमरे ही कमरे थे. घर की मेन एंट्री पर एक बड़ा मजबूत सा लोहे का गेट लगा था. कोई अजनबी उस मकान में घुस जाए तो उसे भूलभुलैया ही सम झ बैठे. उन्होंने उस मकान में किराएदारों को भी ऐसे ही ठूंसठूंस कर रखा हुआ था जैसे जेल में कैदी. हर कमरे में किराएदार ही किराएदार.

जेलर दीपचंद्र ने वहीं बीच में एक औफिसनुमा कमरा बना रखा था जहां से वे पूरे मकान और किराएदारों पर नजर रखते थे. उसी कमरे में वे सुबह नाश्ता पानी करने के बाद बैठ जाया करते थे. किराएदारों वाला रजिस्टर चैक करते थे कि किस का किराया आया और किस का नहीं. वहीं पर वे अपने मेहमानों या दूसरे लोगों से मिला करते थे. सुबह और शाम को पूरे मकान का एक राउंड वे जरूर ही लगाया करते थे.

उन्होंने अपने दोनों बेटों राहुल और सागर को दवाओं के कारोबार में लगा रखा था. एक बड़ा मैडिकल स्टोर मेन रोड पर खुलवा रखा था. उन का बड़ा बेटा राहुल अल्ट्रामौडर्न था. दोस्तों के संग कौकटेल पार्टी, हुक्का पार्टी करना उस का शौक था. पैसे की कोई कमी थी नहीं इसलिए राहुल की मौजमस्ती में भी कोई कमी आड़े नहीं आती थी.

अवंतिका राहुल को पहली ही नजर में भा गई थी. दीपचंद्र का नाम इतना बड़ा था कि उन की शोहरत की आड़ में राहुल के सब ऐब ढक गए थे. जब किसी रिश्तेदार ने अवंतिका के पिता को इशारों ही इशारों में बताया था कि राहुल शराब पीता है तो उन्होंने तपाक से कहा, ‘‘अरे भाई, आजकल शराब कौन नहीं पीता? ये तो बड़े लोगों के शौक हुआ करते हैं.’’

लेकिन यह बात उन्होंने अवंतिका से जानबू झ कर छिपाई. उन्हें डर था कि उन की बेटी की शादी एक अमीर परिवार में हो रही है, राहुल के शराब पीने की बात पर कहीं कोई अड़चन पैदा न हो जाए.

अवंतिका और राहुल की शादी मेरठ के एक बड़े होटल में बड़ी धूमधाम के साथ हो गई. बड़ी नामीगिरामी हस्तियां इस शादी समारोह में शामिल हुईं. पुलिस महकमे के आला अफसर वरवधु को आशीर्वाद देने के लिए पधारे.

अवंतिका को तो अपनी इस शादी पर बड़ा गुमान हो रहा था कि उस का शादी समारोह कितने शानदार ढंग से हो रहा है.

लेकिन सुहागरात को ही अवंतिका के सपने तब चकनाचूर हो गए जब राहुल नशे की हालत में उस के पास पहुंचा. वह बहकीबहकी बातें कर रहा था और होशोहवास में नहीं था. वह तो उस की हालत को देख कर ही घबरा उठी. वह बैड के एक कोने में सिमट कर बैठ गई और वह नशेडि़यों की तरह हरकतें करता रहा और फिर बेसुध हो गया.

सुहागरात को ही अवंतिका के सारे अरमान ताश के पत्तों की तरह बिखर गए. हालांकि, नशा उतरते ही सुबह के समय राहुल ने उस से माफी मांग ली लेकिन अब माफी मांगने से कोई फायदा होने वाला नहीं था. एक लड़की जिस रात को अपनी जिंदगी की सब से खास रात मानती है, वह तो गुजर चुकी थी.

राहुल ने इस की भरपाई करने की बहुत कोशिश की. वह अवंतिका को एक लंबे टूर पर गोवा और अंदमान निकोबार द्वीप समूह ले कर गया. उस की हर ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश की. अवंतिका ने भी उसे दिल से माफ कर दिया और जीवन में मधुर रस घोलने की कोशिश की. कुछ खट्टेमीठे अनुभवों के साथ 2 साल गुजर गए और वह एक बेटी सान्वी की मां भी बन गई.

अवंतिका के कहने से राहुल ने शराब पीना कम तो कर दिया था, लेकिन बंद नहीं किया था. किसीकिसी दिन तो वह यारदोस्तों के संग इतनी पी लेता था कि उसे संभालना तक मुश्किल हो जाता था. तब अवंतिका को लगता था कि उस की जिंदगी नरक बन गई है.

कोई भी औरत अपने आदमी को बिस्तर पर कभी भी बेसुध देखना नहीं चाहती. उस की भी तो अपनी इच्छाएं होती हैं. एक ओर भरा बंधा यौवन और दूसरी ओर बेसुध पड़ा आदमी. दिनभर का रोमांटिक मूड पलभर में स्वाह. आखिर कौन औरत ऐसा चाहेगी?

लेकिन नशे की आदत कुत्ते की टेढ़ी दुम की तरह होती है. न दुम सीधी होती है और न ही नशा छूटता है. राहुल के साथ भी ऐसा ही था. आएदिन वह नशे की हालत में घर पहुंचता. उस का छोटा भाई सागर ही उसे उठा कर बिस्तर तक लाता. कभीकभी अवंतिका को भी नशे में चूर राहुल को उठाने में सागर की सहायता करनी पड़ती. उस समय सागर के हाथों का स्पर्श उसे अलग ही आनंद देता था.

एक दिन अवंतिका ने सागर से कहा, ‘‘देवरजी, ऐसा कब तक चलेगा? आप अपने भाई को शराब पीने से रोकते क्यों नहीं? इन्हें सम झाते क्यों नहीं?’’

‘‘भाभी, मैं तो बहुत मना करता हूं लेकिन भैया मानते ही नहीं. शाम होते ही इन पर न जाने कौन सा फुतूर सवार हो जाता है कि पिए बिना रहते ही नहीं.’’

‘‘देवरजी, ऐसे काम नहीं चलने वाला. कितनी ही रातें तुम्हारे भैया के चक्कर में मु झे जाग कर गुजारनी पड़ती हैं.’’

‘‘तो भाभी, आप जागती क्यों हो? सो जाया करो.’’

‘‘इन्हें इस हालत में छोड़ कर देवरजी, आप सम झो तो सही मु झे नींद ही कैसे आएगी?’’

धीरेधीरे इन बातों का दायरा बढ़ने लगा. अवंतिका को अपने देवर सागर से बातें करने में अजीब सा सुकून मिलता. इस सुकून का दायरा भी धीरेधीरे बढ़ कर बांहों की पनाह तक पहुंच गया. सागर का कमरा बराबर में ही था. जब राहुल बिस्तर पर नशे में चूर पड़ा होता था तब अवंतिका सागर की बांहों में असीम सुकून पा रही होती थी.

ससुर दीपचंद्र को जब इस की भनक लगी तो उन्होंने चुप रहना ही बेहतर सम झा. ये हालात देख कर उन्होंने अपने औफिस को ही अपना बैडरूम बना लिया. घर के अंदर आना कम से कम कर दिया मानो ऐसा कर के वे अवंतिका और सागर के संबंधों को अपनी मौन स्वीकृति दे रहे हों. अब वे अपना ज्यादातर समय वहीं गुजारने लगे.

राहुल को जब अवंतिका और सागर के संबंधों का पता चला तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई लेकिन वह क्या करे गलती खुद उस की थी. लेकिन कौन मर्द होगा जो अपनी पत्नी को दूसरों की बांहों में होने की बात सुन कर चुप रह जाए. वह तो अंदर ही अंदर सुलग रहा था और मौका मिलते ही भड़क उठा, ‘‘अवंतिका, ऐसा नीच काम कोई गिरी हुई औरत ही कर सकती है जो तुम कर रही हो.’’

अवंतिका भी इस लांछन को सुन कर चुप रहने वाली नहीं थी. वह भी फट पड़ी, ‘‘मु झे नीच औरत कहने में तो तुम्हें शर्म नहीं आती लेकिन ये हालात पैदा किस ने किए? रात में शराब के नशे में चूर बिस्तर पर आ कर पड़ जाते हो उस का क्या?’’

‘‘तो तुम यह सब करोगी क्या?’’

‘‘मैं ब्याहता हूं कोई संन्यासिनी नहीं. मेरे बदन को भी भूखप्यास लगती है. अगर नशे में ऐसे ही चूर रहना था तो शादी ही क्यों की?’’

ऐसा कह कर अवंतिका अपनी बिटिया सान्वी को ले कर किचन में चली गई और राहुल सिर पकड़ कर वहीं बैठ गया. इस बेवफाई से वह बुरी तरह टूट गया. अब तो वह अपना गम भुलाने के लिए कभी भी पीनी शुरू कर देता. न वह दिन देखता, न रात.

अब उस का मन किसी काम में भी नहीं लगता. सारी दुनिया उसे बेगानी सी लगती. हर समय वह अवंतिका को  झिड़कता रहता. उसे दुत्कारता रहता. न जाने क्याक्या बड़बड़ाता रहता. अवंतिका भी उस के प्रति ढीठ बन गई थी. उस ने राहुल की चिंता ही करनी छोड़ दी. वह जोकुछ भी कहता उसे वह एक कान से सुनती दूसरे से निकाल देती.

राहुल को लगता था जैसे उस के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया हो. उसे पता था कि घर में वह 24 घंटे अपनी पत्नी की निगरानी नहीं कर सकता. सागर की जगह कोई और होता तो शायद वह उसे गोली से ही उड़ा देता, लेकिन छोटे भाई पर वह गोली कैसे चलाए? उस पर गोली चलाने की बात सोच कर ही उस की रूह कांप जाती.

जिस भाई के साथ उस ने इतने साल इतने प्रेम से गुजारे, आज वह उस पर गोली चला कर उस की जान लेले… नहींनहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता. इस से बेहतर तो यही है कि वह खुद अपनी जान देदे. अब उस के जीवन में हताशा और निराशा के सिवा कुछ नहीं बचा था.

दीपचंद्र सबकुछ जान कर भी अनजान बने हुए थे. वे घर की बात को घर में ही रखना चाहते थे. वे जानते थे कि ये हालात इतने खतरनाक और काबू से बाहर हो चुके हैं कि कभी भी कुछ भी हो सकता है.

उन्हें पता था कि राहुल ने अगर शराब पीनी नहीं छोड़ी तो अवंतिका अब कभी उस की नहीं हो सकेगी. राहुल के सामने यही बड़ी समस्या थी कि वह शराब के नशे का दास बन चुका था और दासत्व की बेडि़यों में जकड़ा आदमी कभी कुछ नहीं कर सकता.

दीपचंद्र सोचते बहुत थे, लेकिन करते कुछ नहीं थे. यहां तक कि उन्होंने अवंतिका से भी इस मसले पर कभी खुल कर बात नहीं की. वे तो सागर के लिए आने वाले रिश्तों को भी इसीलिए टालते रहे कि पता नहीं आगे क्या हो.

एक दिन राहुल ने अवंतिका और सागर को एक साथ देख लिया. वह उस समय भी नशे में था लेकिन उन दोनों को साथ देख कर उस का नशा काफूर हो गया. वह अपने ऊपर से कंट्रोल खो बैठा और घर में रखी लाइसैंसी बंदूक उठा लाया.

वह अवंतिका को गोली मारना चाहता था लेकिन सागर के बीच में आ जाने से उस का निशाना चूक गया. फिर भी कुछ छर्रे अवंतिका को लग ही गए.

सागर और दीपचंद्र अवंतिका को तुरंत अस्पताल ले कर गए जहां डाक्टरों ने कड़ी मशक्कत से उस के शरीर में घुसे छर्रों को निकाला. पुलिस केस भी दर्ज हुआ, लेकिन दीपचंद्र ने अपने असर और पैसे से केस ही बदलवा दिया.

अब केस यह बना कि अवंतिका घर की सफाई करते समय बंदूक को एक जगह से उठा कर दूसरी जगह रख रही थी तभी लापरवाही से बंदूक का ट्रिगर दब गया और गोली चल गई, जिस के कारण कुछ  छर्रे अवंतिका को लगे. इस तरह से पुलिस केस रफादफा हो गया.

लेकिन लोग इतने भोले नहीं थे. सच्चाई धीरेधीरे सब को पता चल रही थी. अवंतिका ने सबकुछ हिम्मत से सहन किया. वह अभी भी इस इंतजार में थी कि राहुल संभल जाए तो वह अपने देवर की शादी किसी और से करा दे, लेकिन वह इतनी होशियार भी थी कि अगर उस का पति नहीं सुधरता है तो वह देवर को अपना बना कर रखेगी और उस की शादी में अड़ंगे लगाएगी. किसी भी सूरत में वह उस की शादी नहीं होने देगी.

इस तरह से वह अपने जीवन को सुरक्षित रखेगी भले ही दुनिया कुछ भी कहे. वह सागर को अपने पति की तरह ट्रीट करने लगी थी. कोई क्या कह रहा था उस ने इस की चिंता करनी बंद कर दी थी.

राहुल ने जब से उन दोनों को साथ देखा था तब से वह और ज्यादा टूट गया था. वह खुद को संभाल नहीं पा रहा था. अब दुनिया में उस का एक ही सहारा था और वह थी शराब. अब वह हर समय नशे में डूबा रहता.

उस ने बाहर आनाजाना भी छोड़ दिया था. नशा उतरते ही उस की आंखों के सामने वही घातक दृश्य घूमने लगता जिस में उस ने अपनी पत्नी को सागर के साथ गलबहियां करते देखा था. यह उस के लिए असहनीय था. इस के बाद वह फिर से जाम पर जाम चढ़ाने लगता और अवंतिका को गंदीगंदी गालियां बकने लगता.

अवंतिका पर इन गालियों का रत्तीभर भी असर नहीं होता, बल्कि वह इन गालियों को सुन कर खुद को और मजबूत कर रही होती. उसे तो इस लाचार ओर शराबी आदमी पर तरस ही आता. उसे पता था कि वह शराब पीने और गालियां बकने के अलावा कुछ नहीं कर सकता.

दीपचंद्र ने इन हालात का आकलन कर के मन में बहुतकुछ सोच लिया था. इसी आधार पर वे न तो राहुल को कुछ सम झाते और न ही उसे डाक्टर के पास ले कर जाते. इस मामले में वे बिलकुल निष्क्रिय हो गए थे और अवंतिका के साथ मजबूती से खड़े थे. उन्हें पता था कि राहुल पूरी तरह से बरबाद हो चुका है और इस के लिए वह खुद जिम्मेदार है. उस का इस दुनिया में रहना न रहना बराबर है. इस के लिए उन्होंने अपने कलेजे पर पत्थर रख लिया था, आखिर बेटा तो वह उन्हीं का था.

ज्यादा शराब पीने के चलते आखिरकार राहुल का जिगर जवाब दे गया. अवंतिका और परिवार के दूसरे सदस्यों को इस का अंदाजा पहले से ही था. जब वे उसे अस्पताल ले कर गए तो वह मरने की हालत में पहुंच चुका था. उस का चैकअप कर डाक्टरों ने अपने हाथ खड़े कर दिए. घर पहुंचते ही वह मर गया. वह हड्डियों का ढांचा मात्र बचा था.

दिखाने के लिए सब रोए, लेकिन मन ही मन सब ने चैन की सांस ली कि एक मुसीबत टली. कुदरत ने आखिरकार अपना अनोखा फैसला कर ही दिया था. कमजोर को जाना है, मजबूत को जीवन का आनंद लेना है. प्रकृति की नजर में राहुल कमजोर साबित हुआ और अवंतिका मजबूत.

अब अवंतिका के लिए कोई रोकटोक नहीं थी. राहुल का जाना अवंतिका के लिए ही नहीं सब के लिए अंदरूनी खुशियां ले कर आया था. खराब और कमजोर किसी को बरदाश्त नहीं चाहे परिवार हो समाज हो या कुदरत. दुनिया में रहना तो काबिल बनना ही होगा. नकारा लोग खुद ब खुद हाशिए पर चले जाते हैं.

राहुल की तेरहवीं होते ही दीपचंद्र ने अवंतिका के मातापिता को बुला कर उन से बात की. अवंतिका और सागर से उन्होंने पहले ही बात कर ली थी. सब यही चाहते थे कि घर की दौलत और सम्मान के साथ घर में ही रहे.

दीपचंद्र ने सम झदारी दिखाते हुए एक सादा समारोह आयोजित कर के अवंतिका और सागर को शादी के बंधन में बांध दिया, लेकिन कोर्ट में कानूनी कार्यवाही करना वे नहीं भूले. उन की शादी का रजिस्ट्रेशन करवा कर सर्टिफिकेट हासिल किया जिस से भविष्य में कोई अड़चन न आए.

अवंतिका की जिंदगी में फिर से इतनी मुसीबतों के बाद खुशियों की बहार आ गई थी. वह जिंदगी के नए सवेरे में ताजगी और उमंग भरने के लिए सागर के साथ दिल्ली एयरपोर्ट से स्पेन के लिए उड़ चली जहां उसे अपना हनीमून मनाना था. पुरानी जिंदगी और यादों को दफन करना था और नई जिंदगी को गुलाबों की बगिया की तरह महकाना था. Relationship Story in Hindi

Inspirational Story in Hindi : हकीकत

Inspirational Story in Hindi. कमलेश चाय पीती जा रही थीं और एकटक सामने बैठी गिरिजा देवी की ओर देखती जा रही थीं. वे सोचने लगीं कि ऐसी बात उन से कैसे पूछी जाए. किसी लड़की के चरित्र की बात पूछने पर रिश्तों में कड़वाहट भी आ सकती है और रिश्ता टूट भी सकता है.

अगर वे लड़की के बारे में नहीं पूछतीं, तो जो उन्होंने सुना है, वह गलत नहीं माना जा सकता.

यह बात अगर महल्ले में फैल गई कि उन की होने वाली बहू पेट गिरा कर आई है, तो चुल्लूभर पानी में डूब मरने वाली बात होगी. कोई उन्हें बोलने तक नहीं देगा. आखिर वे क्या करें?

चाय पी कर कमलेश ने कप ट्रे में रख दिया. गिरिजा देवी ट्रे को ले कर अंदर चली गईं. वे होने वाली समधिन के लिए रसोई में नाश्ते का इंतजाम करने लगीं.

कमलेश ने यह बात अपने बेटे उमेश को भी बताई थी, पर उमेश ने कहा था, ‘मां, मैं रजनी को अच्छी तरह से जानता हूं. वह सुशील और अच्छे संस्कारों वाली लड़की है. हमारा संबंध तोड़ने के लिए आप से किसी ने चुगली की है.’

उमेश की बात सुन कर कमलेश को तब चुप रह जाना पड़ा था.

उमेश और रजनी एक ही कालेज में पढ़ते थे. दोनों पक्के दोस्त थे. दोनों बहुत अच्छी पेंटिंग बनाते थे. पेंटिंग की वजह से ही दोनों में दोस्ती हुई थी. फिर दोनों एकदूसरे के घर आनेजाने लगे थे. इस दौरान उमेश ने रजनी को अच्छी तरह जांचापरखा था. उस के चरित्र पर शक की तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी.

यही वजह थी कि रजनी से शादी करने की बात भी अपने घर वालों से खुद उमेश ने ही चलाई थी. किसी मौडर्न मातापिता की तरह उमेश के मातापिता ने भी बिना किसी विरोध के यह रिश्ता स्वीकार कर लिया था, इसीलिए मां के मुंह से यह बात सुन कर कि रजनी पेट गिरा कर आई है, उमेश को यकीन नहीं हुआ था.

गिरिजा देवी हलवा और बिसकुट ले आई थीं. वे बोलीं, ‘‘लो समधिनजी, नाश्ता करो.’’

‘‘मुझे भूख नहीं है, आप खाओ.’’ ‘‘यह तो हलका भोजन है. बिना भूख के भी चल जाएगा.’’

कमलेश खाने लगीं. गिरिजा देवी सामने रखी कुरसी पर बैठ गईं.

‘‘इस तरह मत बैठो, आप भी तो खाओ समधिनजी,’’ कमलेश ने प्यार से कहा, तो गिरिजा देवी भी खाने लगीं.

कमलेश एक स्कूल में टीचर थीं. उन के पति का देहांत हो गया था, इसलिए उमेश की शादी में पिता की भूमिका वही निभा रही थीं. रजनी के बारे में शक भरी बातें उन की एक सहेली ने बताई थीं, इसलिए सचाई जानने के लिए वे यहां चली आई थीं.

गिरिजा देवी के पति आगरा में बैंक में नौकरी करते थे, इसलिए उन का सामना सीधा समधिन से हुआ था, पर डर रही थीं कि बात कैसे शुरू करें. कहीं बात झूठी निकली तो.

फिर भी कमलेश ने हिम्मत बांध कर कह डाला, ‘‘समधिनजी, मुझे आप से कुछ बातें करनी हैं.’’

गिरिजा देवी ने हंस कर कहा, ‘‘किस बारे में?’’

कमलेश मन को मजबूत करते हुए बोलीं, ‘‘रजनी के बारे में.’’

गिरिजा देवी के चेहरे पर तुरंत हैरानी के भाव छा गए. वे बोलीं, ‘‘हां बोलो, क्या बातें करनी हैं?’’

‘‘मैं ने सुना है कि रजनी पेट गिरा कर…’’ कहतेकहते कमलेश के शब्द गले में ही अटक गए.

मगर गिरिजा देवी साफसाफ बोलीं, ‘‘समधिनजी, आप ने ठीक ही सुना है.’’

कमलेश ने समझा कि गिरिजा देवी नाराज हो गईं, इसलिए वे बोलीं, ‘‘इस में बुरा मानने वाली कोई बात नहीं है. हम ने तो किसी से यह सुना था. अब आंखों देखी मक्खी तो निगली नहीं जा सकती. इसीलिए आप के पास आई हूं कि यह तो पता चले कि इस बात में कितनी सचाई है.’’

‘‘मैं भी सच कह रही हूं समधिनजी कि यह बात पूरी तरह सच है,’’ गिरिजा देवी ने मजबूती से कहा.

यह सुन कर कमलेश के चेहरे पर कठोरता छा गई. उन्होंने नाश्ते की प्लेट एक ओर सरका दी और गुस्से में बोलीं, ‘‘तो फिर यह बात तुम ने सगाई से पहले हमें क्यों नहीं बताई? हमारे साथ इतना बड़ा धोखा क्यों किया?

‘‘आप ने कैसे सोच लिया कि रजनी हमारे घर की बहू हो जाएगी? बात कैसी भी हो, एक न एक दिन सभी को पता लग जाती है.’’

‘‘वह तो ठीक है समधिनजी. आप ने जो सुना है, वह सच है और केवल उसे सुन कर कोई भी सास किसी लड़की को अपने बेटे की बहू नहीं बना सकती, मगर आप ने अधूरा सच सुना है.’’

‘‘अब पूरा सच सुनने की मुझे जरूरत भी नहीं है. जब मैं ने यह बात सुनी थी, तो मैं ने इस पर यकीन नहीं किया था. लेकिन जब तुम ही इसे सच बता रही हो, तो यह रिश्ता तोड़ना पड़ रहा है,’’ कहते हुए कमलेश कुरसी से उठ कर खड़ी हो गईं.

गिरिजा देवी ने उन का हाथ पकड़ लिया और बोलीं, ‘‘आप यह रिश्ता तोड़ दें, मुझे कोई दुख नहीं है, पर क्या अब यह नहीं जानना चाहोगी कि रजनी मां कैसे बनी?’’

‘‘लाई होगी किसी का पाप, हमें इस से क्या?’’

‘‘उमेश को यह रिश्ता तोड़ने की ठोस वजह भी तो बतानी होगी.’’

‘‘हां, बताइए…’’ कमलेश फिर से बैठ गईं.

गिरिजा देवी ने कहना शुरू किया, ‘‘आज से 3 साल पहले रजनी 12वीं में पढ़ रही थी. वह अपने गांव जा रही थी. वह मेरे साथ थी. रात का समय था. बस अपनी पूरी रफ्तार से चल रही थी. अचानक रास्ते में बस को रुकती देख हम चौंक गए. कुछ बंदूकधारी लोग

बस में चढ़ आए थे. उन्होंने सब सवारियों को बंदूक का निशाना बना कर नीचे उतार लिया.

‘‘सभी से रुपए और गहने लूट लिए. औरतों से जबरन बलात्कार किया गया, जिस का शिकार हम दोनों को होना पड़ा. तकरीबन आधा घंटा उन्होंने यह खौफनाक खेल खेला.

‘‘रजनी तो इस हादसे से बेहोश हो चुकी थी. कई महीनों बाद रजनी ने महसूस किया कि उस के पेट में उन दरिंदों का पाप पल रहा है.

‘‘पर शर्म और झिझक की वजह से उस ने यह बात किसी को नहीं बताई. जब 4-5 महीने का पेट हो गया, तब एक दिन मुझे बताया. एक नर्सिंग होम में जा कर तब इस का पेट गिरवाया.’’

यह सुनतेसुनते कमलेश के चेहरे की कठोरता न जाने कहां गायब हो गई.

गिरिजा देवी बोलीं, ‘‘समधिनजी, आप यह रिश्ता भले ही तोड़ दें, हमें कोई एतराज नहीं है, पर यह बात किसी और को मत बताना. इस घटना की वजह से रजनी की कई सगाई टूट चुकी हैं. उमेश और रजनी की दोस्ती की बात सुन कर हमें उम्मीद बंधी थी कि अब सगाई नहीं टूटेगी.

‘‘आप समझदार हैं, टीचर हैं, अब आप ही बताइए कि इस में रजनी का क्या कुसूर है?

‘‘गहराई से सोचें कि यह हादसा आप के साथ हुआ होता, तब आप पर क्या बीतती? आप अपने दिल पर हाथ रख कर सोचें कि क्या यह रिश्ता तोड़ कर आप रजनी के साथ इंसाफ कर रही हैं? अगर आप की सोच से यह ठीक है, तो आप यह रिश्ता तोड़ सकती हैं.’’

गिरिजा देवी की बात सुन कर कमलेश हैरान रह गईं. उन्होंने गिरिजा देवी का कंधा थपथपा कर कहा, ‘‘समधिनजी, इस बात के लिए माफी चाहती हूं कि मैं ने आप का दिल दुखाया. मैं सच से वाकिफ नहीं थी, इसलिए गुस्से में न जाने क्याक्या कह गई.

‘‘अब आप कोई चिंता नहीं करें. मैं सब संभाल लूंगी. आप शादी की तैयारियां कीजिए.’’

कमलेश की बात सुन कर गिरिजा देवी का दिल एकदम हलका हो गया. उन की निगाह दीवार पर टंगी रजनी द्वारा बनाई गई उस पेंटिंग पर चली गई, जिस में ऊपर लिखा था, ‘औरत ही औरत को मुक्ति दिला सकती है.’

Emotional Story in Hindi : लड़का

Emotional Story in Hindi-

‘‘कैसा लगा लड़का तुम्हें?’’ नंदराम ने अपनी बीवी प्रभावती से पूछा.

‘‘और तो सब ठीक है, पर…’’ प्रभावती हिचक गईं.

‘‘तो अपनी संगीता ही कहां की…’’ यह कहते हुए नंदराम भी हिचके. प्रभावती कुछ सोचती हुई सी चुप ही रहीं.

नंदराम प्रभावती के साथ सुबह पैसेंजर रेलगाड़ी से ही गए थे और लड़का देख कर शाम तक वापस इसलिए आ जाना चाहते थे कि वे लड़की को घर पर अकेली नहीं छोड़ना चाहते थे.

एक बार वे दोनों गलती कर चुके थे. बात तब की है, जब उन्होंने मकान के बाहर की बैठक इंटर कालेज में नए आए अंगरेजी के टीचर कीर्ति बाबू को किराए पर दे दी थी. संगीता प्राइवेट बीए कर रही थी. अंगरेजी पूछने वह उस एमए पास टीचर कीर्ति से बैठक में जाने लगी थी.

एक दिन प्रभावती ने संगीता और उस टीचर के बीच बैठक के एकांत में कुछ ऐसावैसा देख लिया था.

नंदराम को सावधान करती हुई वे बोली थीं, ‘मास्टर कीर्ति की आदतें अच्छी नहीं हैं. लालच छोड़ो और उसे किराए की बैठक से निकाल बाहर करो.’

प्रभावती की बात को नंदराम समझ गए. लिहाजा, दूसरे दिन ही उन्होंने उस टीचर को निकाल बाहर किया.

बुरा यह हुआ कि नंदराम के पुश्तैनी दुश्मन जयकिशन बाबू, जिन का घर गली में ठीक नंदराम के घर के सामने था, ने अपना बाहर का कमरा उस टीचर को किराए पर दे दिया.

किराए पर देते हुए जयकिशन बाबू ने टीचर कीर्ति बाबू से कहा, ‘हमारा होनहार लड़का हाईस्कूल में है. कसबे के सभी लड़कों की तरह वह भी अंगरेजी में कमजोर है. उसे अपनी तरह फर्राटेदार अंगरेजी सिखा दें.’’

एक दिन प्रभावती ने पति नंदराम को बताया, ‘कीर्ति बाबू पड़ोसी के चबूतरे पर लगे हैंडपंप से जब पानी भरते हैं, तो संगीता ऊपर छत पर चढ़ कर मुंडेर से उन्हें देखने के लिए झांकती है.’

यह सुनते ही नंदराम परेशान हो गए. नातेरिश्तेदारों के यहां उस के रिश्ते के लिए दौड़ लगाने लगे. जल्दीजल्दी में जो भी लड़का जहां भी मिले, वे संगीता को ब्याह कर कसबे से बाहर कर बदनामी से बचने की कोशिश में जुट गए.

वे मन ही मन सोचा करते, ‘आदमी किसी से नहीं हारता, पर अपनी औलाद से हार जाता है.’

एक दिन संगीता को प्रभावती के सामने नंदराम ने समझाने और जिंदगी की ऊंचनीच बताने की कोशिश की, तो संगीता समझ गई कि पापा यह सब उस से क्यों कह रहे हैं.

पिता से तो उस ने कुछ नहीं कहा, पर बाद में वह मां से बोली, ‘किसी से तो करेंगे हमारी शादी. कीर्ति बाबू क्या बुरे हैं? नौकरी से लगे हैं, देखनेसुनने में भी अच्छे हैं. फर्राटेदार अंगरेजी बोलते हैं.

‘बड़े घर के लड़के हैं. पिता की खासी जमीनजायदाद है. घर पर मोटरसाइकिल है. खुद के पास मोबाइल फोन रहता है. वे होनहार हैं. जल्दी अच्छी जगह पहुंच जाएंगे.’

‘पर वे तो पहले से ही शादीशुदा हैं. सुना है, बीवी बहुत पढ़ीलिखी और किसी अच्छी नौकरी से लगी है. कीर्ति बाबू से ज्यादा कमाती है, पर कीर्ति बाबू के साथ रह कर वह अपनी नौकरी नहीं कर सकती थी और वह नौकरी छोड़ने को राजी नहीं है.

‘कीर्ति बाबू को ससुराल में घरजंवाई बन कर रहना पसंद नहीं, इसलिए नौकरी पर यहां चले आए. लाख अच्छे हों वे, पर हैं तो शादीशुदा…’ प्रभावती बोलीं.

‘क्या फर्क पड़ता है इस से?’ संगीता ने मुंहफट हो कर कहा, ‘बीवी बहुत नकचढ़ी है. अपनी नौकरी और बाप के पैसे का घमंड है उसे. सीधेसच्चे कीर्ति बाबू उस से ब्याह कर के बुरे फंस गए हैं. आजकल शहरों में ऐसे तमाम लोग हैं, जो नौकरी की जगह अलग औरत रखते हैं और शहर में दूसरी औरत…’

‘पागल हुई है क्या? दिमाग खराब है तेरा?’ मां ने फटकारा, ‘ऐसी ऊलजलूल बातें कहीं सोची जाती हैं? कल को बीवी के बच्चे होंगे, तब तू क्या करेगी? बीवी दबंग हुई, तो जूतमपैजार करेगी तुझ से. पुलिस में जा धमकेगी. इतनी बात तू नहीं समझ पा रही?’

अब जब लौट कर वे दोनों स्टेशन पर उतरे, तो नंदराम ने बीवी से फिर बात छेड़ी, ‘‘संगीता जरूर पूछेगी. क्या कहोगी?’’

‘‘कुछ भी कहें, पर संगीता इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं होगी,’’ प्रभावती बोलीं, ‘‘लड़का ज्यादा पढ़ालिखा नहीं है. शहर में बरतनों की दुकान करता है.’’

‘‘पर कमाता ठीकठाक है. संगीता को सारे सुख मिलेंगे,’’ नंदराम बोले.

प्रभावती बोलीं, ‘‘ऐसे लड़के को वह कभी भी पसंद नहीं करेगी.’’

‘‘जिस लड़के को देखा था, वह 2 भाई थे. बड़े भाई को बदमाशों ने पैसे के लालच में अपहरण कर लिया था. यह लड़का पुलिस में रिपोर्ट कर आया. बदमाशों ने पैसे की मांग रखी. पुलिस भी बदमाशों से मिली हुई थी. इस लड़के के मन में लालच आ गया. पैसा नहीं दिया. नतीजा यह हुआ कि उन्होंने बड़े भाई की हत्या कर दी. अब पूरी दुकान और मकान का खुद मालिक है.’’

‘‘जो भाई अपने सगे भाई को दगा दे सकता है, वह तुम्हारी संगीता को दगा नहीं देगा, इस बात का क्या भरोसा है?’’ प्रभावती ने शक जाहिर किया.

‘‘तो क्या हम उसे कीर्ति बाबू को सौंप दें?’’ नंदराम बुरी तरह झल्लाए, ‘‘उस की पहले से बीवी है. कल को मार कर भगा देगी वह, फिर खिलाना बेटी को अपने घर बैठा कर जिंदगीभर.’’

‘‘और भी 2-4 लड़के सुने हैं हम लोगों ने. उन्हें क्यों न देखा जाए?’’ प्रभावती ने कहा.

‘‘और तब तक अपनी संगीता के पैर डगमगा गए तो? वह कीर्ति बाबू के साथ ज्यादा उलझ गई तो? कुछ ऊंचनीच हो गई, तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे. कसबे को तो देख ही रही हो. बात फैलते देर नहीं लगेगी,’’ कुछ सोच कर वे बोले, ‘‘हम तो कहते हैं, लंगड़ा है तो क्या हुआ, बरतनों की चलती दुकान है. खासा कमा लेता है. अब सारी जायदाद का अकेला मालिक है.

‘‘शक्लोसूरत और पहननाओढ़ना क्या मतलब रखता है आजकल? संगीता को इस शादी के लिए तैयार करना ही चाहिए.’’

हालांकि वे खुद समझ रहे थे, संगीता कैसे भी राजी नहीं होगी इस संबंध के लिए. कहीं कुछ उलटासीधा कर बैठी, तो लड़की से भी हाथ धो बैठेंगे.

वही हुआ. प्रभावती ने संगीता को हंसते हुए सबकुछ सामान्य ढंग से बताया. देखे हुए लड़के की तमाम खूबियां गिनाईं, पर कमियों को भी छिपाया नहीं. आखिर रिश्ते का सवाल था. लड़की बरात आने पर बिदक गई, तो कसबे में बड़ी बदनामी होगी. 2-3 बरातें ऐसे अनमेल संबंधों के चलते लड़कियां दरवाजे से लौटा चुकी हैं. संगीता ने भी ऐसा किया, तो क्या होगा?

संगीता सहेली के घर जाने के बहाने कसबे के कालेज में चली गई और कीर्ति बाबू को जा कर सबकुछ बता दिया.

यह सुन कर कीर्ति बाबू मुसकराए और बोले, ‘‘जिंदगी में चलतेचलते तमाम सवाल हमें ऐसे ही घेर कर खड़े हो जाते हैं संगीता… और अकसर हम परेशानी में पड़ जाते हैं, हम यह तय नहीं कर पाते कि क्या करें, क्या न करें.’’

‘‘लेकिन, हमें जवाब तो तलाशने पड़ेंगे सर… आप बताइए कि हम क्या करें?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘यह तुम्हारी जिंदगी है. इस का फैसला तुम्हें करना चाहिए. जिस फैसले पर पहुंचो, उस पर तुम्हें मजबूत रहना चाहिए. तुम क्या सोच रही हो?’’ वे संगीता की आंखों में ताक रहे थे.

संगीता ने सिर झुका लिया और बोली, ‘‘मैं तो आप के अलावा किसी के बारे में कुछ नहीं सोच पा रही.’’

‘‘लेकिन मेरे बारे में तुम्हें सब पता है. तुम मुझे अच्छी लगती हो, इस में शक नहीं. लेकिन हर चीज जो हमें अच्छी लगे, जरूरी नहीं है, वह हासिल भी हो जाए. हासिल करने की हिम्मत भी मुझ में नहीं है… मेरी बीवी झगड़ालू है, यह मैं अच्छी तरह से जानता हूं. वह मेरी और तुम्हारी जिंदगी नरक बना देगी, इस का एहसास मुझे है.’’

‘‘तब? तब क्या मैं आप को पाने के सपने न देखूं?’’ संगीता ने सवाल पूछा.

कीर्ति बाबू काफी देर तक चुप रहे, फिर बोले, ‘‘मांबाप से कहो कि तुम्हारे लिए कोई और अच्छा लड़का देखें, जो तुम्हारे लायक हो… तुम उस के साथ खुश रह सको,’’ मन मार कर कीर्ति बाबू ने संगीता को सलाह दी.

‘‘गांव में आप को ले कर मेरी बदनामी शुरू हो गई है. बात कल को बढ़ जाएगी,’’ संगीता बोली, ‘‘लड़का मिलना आसान तो नहीं है. समय लग सकता है और मैं आप से मिले बिना रह नहीं सकती… ऐसे में क्या होगा?’’

‘‘पिताजी से कहो, तुम्हें पढ़ने के लिए शहर भेज दें,’’ कीर्ति बाबू बोले, ‘‘वहां मन लगा कर पढ़ो. कंप्यूटर सीखो. हुनर बढ़ाओ और जब रिश्ता ठीक सा मिल जाए, ब्याह कर लेना.

‘‘मैं भी नहीं चाहता कि यह नौकरी तुम्हारी वजह से खो बैठूं. नौकरी न रही, तो बीवी मुझ पर और दबाव डालेगी कि उस के साथ रहूं, जो मैं नहीं चाहता.’’

उम्मीद नहीं थी कि कीर्ति बाबू उसे इस तरह टरका देंगे. वह उन्हें साहसी मान रही थी. उन के साथ बिना शादी के ही रहने को तैयार हो रही थी, पर अब तो हालात ही बदल गए थे.

संगीता ने घर आ कर मां से कहा, ‘‘जहां आप लोग लड़का देख आए हैं, उसी से रिश्ता तय कर दीजिए…’’

नंदराम ने सुना, तो उन्हें अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ, पर वे बहुत खुश हो गए और शहर चले गए.  Emotional Story in Hindi

Manoranjak Kahanhi : नाता

Manoranjak Kahanhi. छमिया ने गीले कपड़े निचोड़ कर छत पर बंधे तार पर डालने के लिए नजर उठाई, तो भरेभरे बदन के सांवले श्यामू को अपनी ओर ताकते पाया.

हालांकि छमिया के देखने पर श्यामू थोड़ा असहज जरूर हुआ और उस ने अपने बालों को इस तरह झटका दिया, जैसे उस की नजर अभी छमिया पर है और वह उस से नजरें हटा भी रहा है, मगर सच बात की चुगली उस की झेंपी नजरें कर रही थीं.

छमिया की जिन झील जैसी आंखों में डूबने को मन उतावला था, उन की एक हिलोर ही श्यामू को मेमना बना गई थी. भरेपूरे बदन पर जवानी का वसंत खिलाए छमिया ने तो उस से कुछ कहा भी नहीं था, पर श्यामू चाहने पर भी उसे दोबारा देखने की हिम्मत न जुटा सका.

वह तो कहो, अकेलेपन से ऊबी छमिया ने ही बात संभाल ली और कहा, ‘‘तुम तो लड़कियों की तरह शरमाते हो. अरे, मुझे  ही देख रहे थे न? कोई बात नहीं. अब मुंह क्यों छिपाते हो?’’

गांव में इतनी खुली हंसी हंस कर ऐसी बात कहने वाली औरत के बारे में श्यामू ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. वह तो शहर से इम्तिहान दे कर आया था और गांव में बोरियत से बचने के लिए शाम को छत पर बैठ गया था. पास के मिले घर की छत पर आई छमिया पर उस की नजर पड़ गई और पहली नजर में ही उस के मन की हालत जाने क्याक्या होने लगी.

छमिया की बात ने श्यामू को कुछ भरोसा दिया. वह हकलाते हुए बोला, ‘‘म…म… मैं ने सोचा कि तुम बुरा मान गई हो.’’

‘‘यह लो, सालभर बाद तो तुम नजर आए और मैं बुरा मान कर बैठ जाऊं. फिर बुरा किस बात का? हम लोग तो देवरभाभी ठहरे, जिन में हंसीमजाक होता ही रहता है. तुम्हारा नाम जरूर श्यामू है, पर तुम में कृष्ण वाले कोई गुण नहीं हैं. हां, राधा की तरह शरमाते जरूर हो,’’ छमिया श्यामू को निगाहों में तौलते हुए मुसकरा कर बोली.

‘‘कृष्ण बनूंगा तो किसी गोपी की भी जरूरत पड़ेगी न,’’ किसी तरह हिम्मत बांध कर श्यामू कह गया.

‘‘क्या इतने बड़े इलाहाबाद में तुम्हें कोई गोपी ही नहीं मिली?’’ छमिया की आंखें मुसकरा रही थीं और देह में मस्ती दिख रही थी.

‘‘अगर मिली होती, तो तुम्हें क्यों ताकता?’’ छमिया के खुलेपन ने श्यामू को ढीठ बना दिया था.

‘‘तो कब आ रहे हो माखनदही चुराने?’’ यह कहते हुए छमिया की आंखों में न्योता था.

पासपड़ोस के लोग ज्यादा दिनों बाद गांव आते हैं, तो घरघर में उन का मेहमान जैसा स्वागत होता है. वैसे तो श्यामू भले ही न जाता, पर अब तो जाना उस के मन की मजबूरी बन गया.

‘‘दहीमाखन के बजाय चाय ही मिल जाए, तब आ जाऊं,’’ कह कर श्यामू मुसकरा उठा. उस के चेहरे पर हसरत बरस रही थी.

‘‘तो अभी आ जाओ, लेकिन दरवाजे से आना, ताकि तुम्हारी चाची कुछ और न सोचने लगें. अभी वे दरवाजे पर अन्ना दीदी को बैठा कर गई हैं. जैसे मैं अकेली रहूंगी, तो भाग जाऊंगी,’’ छमिया हंसी, तो श्यामू रीझ  कर रह गया.

छमिया का पति सुशील 7 साल से बाहर कमाई कर रहा था. यही देख कर तो छमिया की मां ने कहा था, ‘बेटी राज करेगी, लड़का बड़ा कमाऊ है.’

मां की बात तो ठीक थी. सुशील ठेके पर काम ले कर अच्छी कमाई कर के घर बनवाने के अलावा 2 एकड़ खेत भी खरीद चुका था. दरवाजे पर 2 भैंसें भी बंधी थीं. जब वह गांव आता, तो छमिया के लिए बढि़या कपड़े और छोटामोटा जेवर भी लाता. घर में खानेपीने की कमी नहीं थी. पर पेट के अलावा भी तनमन में कोई भूख जगती है. इस बात को सुशील भले न जानता हो, पर छमिया उस से अनजान नहीं है.

जाड़े की रातें, सावनभादों की झाड़ी, गरमी की लंबी दोपहरें क्या तनमन को बेचैन नहीं करती हैं? पर यह क्या छमिया के कहने की बातें हैं? अंधे के आगे रोने से क्या फायदा?

एक बार तो छमिया ने सुशील से कहा भी था, ‘अब बाहर कमाने की जरूरत नहीं है. यहां खानेखर्चने भर को खेत हैं ही. उन्हीं में पसीना बहाएंगे, तो धरती माता दुखी नहीं रहने देंगी. तुम्हारे बिना अकेला घर काट खाता है.’

‘क्यों, घर में अम्मां और दीदी नहीं रहतीं? चौपाल पर बापू तो रहते ही हैं,’ कहते हुए सुशील हंसा था.

‘तुम हंसते हो. इन सब की नजरें कोतवाल की नजरें हैं. औरत का खयाल रखने वाली नजर तो अपने आदमी की ही होती है,’ छमिया ने गंभीर हो कर कहा था. यह सुन कर सुशील ने उस के गले में अपनी बांहें डाल दी थीं.

सुशील बोला था, ‘घर बैठ कर मैं तुम्हें देखूं और तुम मुझे देखो, तो हो चुकी कमाई. जवानी में कमाया हुआ ही जिंदगीभर काम आता है.’

छमिया का मन हुआ कि कह दे अगर जवानी ही रीती बीत गई, तो कमाई में क्या आग लगाई जाएगी. मगर कह न सकी. उस के मन में आया कि कह दे कि जब और कोई देखने लगेगा, तब तुम्हारी आंखें खुलेंगी.

आज सजीली कदकाठी के श्यामू को देख कर छमिया का मन खुशी से झूमने लगा. वैसे वह बात ही क्यों करती. बातें भी तो इच्छाओं की खिड़कियां होती हैं.

10 मिनट बाद श्यामू ने दरवाजे पर बैठी अन्ना दीदी के पैर छुए और ‘चाचीचाची’ कहता हुआ सीधे आंगन में चला गया. चाची यानी छमिया की सास के बारे में उसे पता था कि वे हैं नहीं, पर बहाने के लिए ही सही, कुछ तो कहना ही था.

छमिया रसोई में पकौड़े तल रही थी. चाय तैयार हो चुकी थी.

श्यामू को अपनी ओर आता देख कर छमिया ने अपने कमरे की ओर इशारा कर दिया.

छमिया का सजाधजा कमरा उस की सुरुचि की गवाही दे रहा था. श्यामू को खुशी हुई. वह कोने में रखी कुरसी पर बैठ गया.

जब छमिया चायनाश्ता ले कर आई, तो वह बोली, ‘‘यह लो, अजनबियों की तरह किनारे बैठ गए. सीधे पलंग पर आ जाओ. यहां तो देवरभाभी ही हैं… है न? इतनी दूरी ठीक नहीं होती है. न आओ, तो मैं बांह पकड़ कर उठाऊं.’’

श्यामू को लगा, अगर उस ने देर की, तो छमिया बांह पकड़ ही लेगी. वह उठ कर पलंग पर बैठ गया.

श्यामू ने पकौड़ों की तारीफ की, तो छमिया बोली, ‘‘मुझे बनाओ मत. अच्छे होते, तो 2 पकौड़ों में ही हाथ न जोड़ जाते.’’

‘‘तुम्हें बनाने की मेरी कूवत कहां है? पर जिस ने बनाया है, फुरसत में बनाया है. फिर तुम्हारे पकौड़े क्यों न अच्छे होंगे?’’ श्यामू ने उस की आंखों में झांक कर कहा.

‘‘सच कहना. तुम्हारे भैया ने तो कभी यह नहीं कहा,’’ लाज की गुलाबी लाली छमिया के गोरे मुंह में घुल कर बिखर गई.

‘‘भैया यही जानते तो बाहर क्यों पड़े होते? हीरे की कदर तो जौहरी ही जानता है,’’ श्यामू ने हंस कर कहा.

बात छमिया के मन में उतर गई. श्यामू इतना प्यारा उसे पहले कभी नहीं लगा था. उस का मन तन को भी पिघला रहा था. पर छमिया बहू थी, जिस पर अपनी नहीं, समाज की बेडि़यां हैं. दरवाजे पर बैठी 40 साल की विधवा ननद की नजरें, सास की नजरें, ससुर की मर्यादा उस के मन की लहरों पर भारी पड़ रही थीं. वह पकौड़े खाना भूल गई थी.

श्यामू ने कहा, ‘‘मेरी बात बुरी लगी हो, तो माफ करना. तुम तो पकौड़े खाना तक भूल गई हो. अब मैं भी नहीं खाऊंगा.’’

श्यामू उठने को हुआ, तो अनजाने ही छमिया ने हाथ पकड़ कर उसे बैठा लिया. अब श्यामू से न रहा गया. उस ने छमिया के मुंह में पकौड़ा ठूंसते हुए कहा, ‘‘तुम न खाओगी, तो मैं भी नहीं बैठूंगा.’’

छमिया को मुंह खोलना पड़ा. एक पल में बेतकल्लुफी बढ़ गई और वह श्यामू की ओर ऐसे अपनेपन से देखने लगी, जिस का अनुभव श्यामू ने सारी जिंदगी नहीं किया था. उसे लगा कि ऊपर से सुखी छमिया भाभी के मन में जाने कितनी सावनभादों की घटाएं हैं, जो बरसने को बेचैन हैं.

श्यामू को जाना अच्छा नहीं लग रहा था, पर छमिया की मर्यादा की खातिर उठने लगा, तो कमरे के दरवाजे तक आई छमिया ने कहा, ‘‘रात 11 बजे आना. मेरे कमरे की कुंडी खुली रहेगी. और हां, छत पर पैर न रखना. मुंडेरमुंडेर ही आना, नहीं तो दारोगा साहब यानी तुम्हारी दीदी कुत्ते की नींद सोती हैं, तूफान मचा देंगी,’’ उस ने श्यामू का हाथ पकड़ लिया.

श्यामू ने अपनी बांहें उस के गले में डाल कर आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘और अगर दीदी अपने बाहरी कमरे का दरवाजा खोल कर आंगन में इधरउधर झांकीं तो?’’

‘‘इतना डरते हो? आंगन की तरफ से कुंडी बंद कर लूंगी. वे बाहर भले ही चली जाएं, अंदर आने का रास्ता ही न रहेगा,’’ छमिया ने श्यामू का शक दूर करते हुए उसे विदा किया.

कई दिन बीत जाने पर अन्ना दीदी को लगा कि छमिया आजकल बहुत खिली सी रहती है. खानेपीने की चीजें अच्छी बनती हैं. उन की कुटिल बुद्धि ने सोचा कि हो न हो, दाल में कुछ काला है. उन्हें लगा कि श्यामू के आने के बाद से ही यह बदलाव हुआ है. वह पता लगाएंगी. यों भी उन्हें नींद कम ही आती थी, पर उस रात तो वे सोई नहीं.

रात के 11 बजे अन्ना दीदी को लगा जैसे कोई छत से नीचे उतरा है. वे बोलीं, ‘‘बहू, यह आवाज किस की थी?’’

‘‘बिल्ली कूदी है. दूधमट्ठा खा कर इस पर जवानी चढ़ी है न. दिनभर काम में मरोखपो, बाद में ये नींद में खलल करें,’’ छमिया ने जवाब दिया.

अन्ना दीदी ने चुप रहना ही ठीक समझा. वे ननद हैं, पर मायके पर बहू जैसा उन का हक कैसे होगा. यह बेटे की बहू है, तभी झल्लाती है. होगी बिल्ली, उन्हें क्या? वे तो चोरचकार के मारे बोली थीं.

वे अनमनी हो कर लेट गईं. तब तक उन के कानों में श्यामू की हंसी गूंजी.

वह धीरे से बोला, ‘‘उलटा चोर कोतवाल को डांटे.’’

‘‘कोतवाली सहतेसहते प्राण घुट गए हैं,’’ छमिया की आंखों में आंसू थे.

अब अन्ना दीदी से रहा न गया. उन्होंने कुछ सुना, कुछ न सुना. पर उन के मन का शक बढ़ गया. मरदानी हंसी के होने का शक बढ़ गया. अजीब बात है, दरवाजा उन के कमरे से ही है. कोई है, तो आया कहां से? पूछने पर बहू गुर्राती है.

वे दरवाजा खोल कर खुद नजर डाल लेंगी, इसी सोच से आंगन की ओर का दरवाजा खोला, पर वह खुल न सका. खुलता भी कैसे? छमिया ने उस में कुंडी जो लगा दी थी.

दीदी के दरवाजा भड़भड़ाने पर छमिया बोली, ‘‘दिनभर हाड़ जला कर काम करो, रात में बारबार दरवाजा मुझ से न खोला जाएगा.’’

‘‘तुम ने दरवाजा बंद ही क्यों किया?’’ दीदी ने अपना सब से बड़ा दांव चल दिया.

‘‘अब मैं अपने घर में दरवाजा भी बंद नहीं कर सकती. तुम्हारे कमरे में आ कर आवारा कुत्ते बंद रह जाते हैं. सवेरे उन की गंदगी क्या मेरा बाप साफ करेगा?’’ बात इतने ताव में कही गई थी कि अन्ना दीदी सन्न रह गई थीं.

अब उन के पास यही चारा था कि भाई से कह कर जी हलका करें, ताकि उन पर समय रहते चेताने का दोष न लगे. घर में एक मोबाइल फोन है, वह इन्हीं रानी के पास रहता है. पड़ोस के मोबाइल वालों के मोबाइल पर हर बात कही नहीं जा सकती है.

फिर भी उन्होंने भाई को फोन किया और वह आया भी. दीदी ने उस से अपने कमरे में ही कहासुना भी.

जब त्योरी चढ़ाए सुशील कमरे में घुसा, तो छमिया टपटप आंसू बहा रही थी. वह बोला, ‘‘रोओ नहीं, साफसाफ बताओ?’’

‘‘मेरी मानोगे? मैं तो यहां पराई हाड़ हूं. और तो सब तुम्हारे अपने ही हैं. उन की सुनो. मुझे  मेरे मायके छोड़ दो या जहर की गोलियां ला दो. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी,’’ छमिया ने सुशील के गले में बांहें डाल कर कहा. उस की हिचकियां बंध गई थीं.

सुशील सोच में पड़ गया. हो सकता है, दीदी को धोखा हुआ हो, पर इसे दरवाजा तो अंदर से बंद न रखना चाहिए था. वह बोला, ‘‘अच्छा, तुम ने आंगन का दरवाजा अंदर से बंद क्यों किया था?’’

‘‘अब मेरा मुंह मत खुलवाओ,’’ छमिया आंसू पोंछते हुए बोली.

‘‘क्यों, क्या बात है?’’ यह कहते हुए सुशील सकते में आ गया.

‘‘यह जांघ खोलो तो अपनी लाज जाती है, वह खोलो तो…’’ आगे की बात उस ने अधूरी सी छोड़ दी.

‘‘साफसाफ कहो, पहेली न बुझाओ,’’ सुशील सुनने को बेचैन था.

‘‘इन के कमरे में जाने कौनकौन आता है और क्याक्या होता है. यह देखने से अच्छा है, मैं इधर का दरवाजा ही बंद कर लेती हूं. सुनोगे, तो हैरान रह जाओगे. इन का क्या बिगड़ेगा? तुम जेल में होगे या फिर मैं इन्हीं की तरह विधवा हो जाऊंगी. ये तो यही चाहती हैं.

‘‘अब या तो मुझे मायके छोड़ दो या अपने साथ लिए चलो. जिस इज्जत के लिए तुम रातदिन एक किए हो, उस का उछलना मैं न देख सकूंगी,’’ सुशील के गले में बांहें डाल कर सिसकसिसक कर छमिया ने कहा.

सुशील ने अपने हाथों से उस के आंसू पोंछ कर कहा, ‘‘मायके जाने का नाम न लो. यहां तुम्हारे जिम्मे घर की मर्यादा है. मैं खुद अब यहीं रहूंगा, कमाई बहुत हो गई. हराम का खाखा कर झूठमूठ का लांछन लगाने वालों की असलियत मैं भी देखूंगा.’’

दरवाजे की ओट से सबकुछ सुनती अन्ना दीदी के तो होश उड़ गए. वे सोच नहीं पा रही थीं, किस जगह जमीन फटे और वे समा जाएं.

इस ठगिनी के इस ढंग से समझने के बाद क्या सुशील उन की बात सुनेगा या मानेगा? वे खुद अपनी ससुराल के झोपड़े में रहेंगी, लेकिन यह लांछन न सहेंगी. औरत के सामने बकरा बने आदमी से बहस करना बेकार है.

और छमिया सोच रही थी, ‘पहले ही यह अक्ल आ जाती, तो यह नौबत ही क्यों आती. खैर, मैं आगे से श्यामू को मना कर दूंगी. श्यामू कोई मेरा मर्द तो है नहीं, जिस से कोई नाता हो.’ Manoranjak Kahanhi

–मदनमोहन पांडेय

Love Story in Hindi : नाम की शादी

Love Story in Hindi. कुलदीप की लाश को फटी आंखों से ताकती तनवीर बुत बनी बैठी थी. जानपहचान वाले घर पर इकट्ठे होते जा रहे थे. अमेरिका का वह इलाका भारत के पंजाबी और सिख तबके का गढ़ था.

तनवीर की हालत देख कर औरतों के आंसू नहीं थम रहे थे. अभी 4 महीने पहले ही तो लाल जोड़े में आई तनवीर की आरती उतार कर उन्होंने प्यार से घर में स्वागत किया था.

बचपन से अनाथ कुलदीप अपने प्यार भरे स्वभाव के चलते किसी का बेटा, किसी का भाई या किसी का देवर बन चुका था. परायों के बीच उसे अपना परिवार मिल गया था.

तनवीर को सतवंत ताई ने गले से लगा कर रोंआसी आवाज में तसल्ली देनी चाही, ‘‘तू चिंता मत कर तन्नी बेटी. हम सब तेरे अपने हैं. खुद को अकेली मत समझ.’’

कुलदीप के साथी टैक्सी ड्राइवर उदास खड़े थे. उन का सब से ज्यादा जिंदादिल साथी उन्हें छोड़ कर जो चला गया था.

हाईवे पर हादसा होना कोई नई बात नहीं थी, पर कुलदीप तो बहुत होशियार ड्राइवर था. पुलिस का कहना है कि हादसा होने के समय वह मोबाइल फोन पर बातें कर रहा था.

दरअसल, सवारी से अच्छे पैसे पा कर कुलदीप की खुशी दोगुनी हो गई थी. उस ने तनवीर को फोन लगाया था. शाम को लोहड़ी में पहनने के लिए उस ने अपनी तन्नी के लिए जामुनी रंग का सलवारसूट खरीदा था, तभी जोर के एक धमाके के साथ सब खत्म हो गया.

5-7 दिन तक बारीबारी से कोई न कोई पड़ोसन तनवीर के पास रही. सतवंत ताई और मनजीत भाभी का मन अपने घर में टिकता ही नहीं था. तन्नी का दुख उन का अपना दुख बन गया था.

सब के सामने एक बड़ा सवाल यह था कि अब तन्नी का क्या होगा? किराए का घर तो छोड़ना ही होगा. सब सोच में पड़ गए कि वह कहां जाएगी?

कुलदीप और तनवीर की कहानी सब जानते थे. कुलदीप ने बताया था कि जब वह भारत में था, तब बचपन में ही उस के मातापिता हैजे के शिकार हो कर चल बसे थे.

लालची चाचाचाची पूरी जायदाद पर कब्जा करना चाहते थे. समझदार हो रहा कुलदीप उन की राह का कांटा बन रहा था.

जवान हो रहे कुलदीप को गांव वालों ने इशारोंइशारों में बताया था, ‘चाचा तुम्हारी जान का दुश्मन बन चुका है. उस के साथ रहने में खतरा है.’

पास के गांव में रहने वाला जगजीत अकसर कुलदीप से मिलता रहता था. वह अमेरिका में टैक्सी चलाता था. कुलदीप की हालत देख कर उस ने सलाह दी थी, ‘यहां रह कर चाचा की चाकरी कर के क्यों बेकार में गालियां खाता है? चल, मेरे साथ. अमेरिका में तेरी जिंदगी बन जाएगी.’

चाचा ने एक चाल चल कर पूरी जायदाद अपने नाम लिखवा ली थी. कुलदीप को अमेरिका की टिकट के पैसे दे कर चाचा ने जैसे उस पर एहसान किया था.

अमेरिका पहुंच कर कुलदीप की दुनिया ही बदल गई. जगजीत को वह अपना भाई मानता था. जगजीत की घरवाली मनजीत भाभी के साथ वह अपना सुखदुख बांटता था.

कुलदीप कहता था, ‘खून के रिश्तों से बड़ा मन का रिश्ता होता है. जगजीत से मेरे मन का रिश्ता है. उस ने मुझे नई जिंदगी दी है.’

जगजीत की बहिन की शादी में कुलदीप भी उस के साथ भारत में उस के गांव गया था. वापसी में तनवीर भी उस के साथ आई थी.

‘क्यों रे कुलदीप, यह परी कहां से उड़ा लाया? तू ने तो हमें अपनी शादी की खबर भी नहीं दी?’ अमेरिका में सतवंत ताई ने उसे मीठा उलाहना दिया था.

‘हां, कुलदीप देवरजी, अब हमें सचसच बताओ कि यह कमाल कैसे हो गया?’ कमलजीत भाभी ने सब के मन की बात कही थी.

‘एक बात जान ले कुलदीप, अगर इन्हें पूरी कहानी नहीं सुनाई, तो ये तुझे  तनवीर से मिलने नहीं देंगी,’ मनजीत भाभी ने चेतावनी दे डाली थी.

20 दिन की बच्ची को ले कर मनजीत अपनी ननद की शादी में भारत नहीं जा पाई थी. कुलदीप की प्रेम कहानी सुनने के लिए वह भी बहुत उतावली थी.

‘अरे भाभी, ऐसी कड़ी सजा मत देना. चलो, मैं सब बताता हूं,’ कुलदीप बोला था.

औरतें चौकन्नी हो कर बैठ गई थीं. सब के मन में कोई फिल्मी कहानी उभर रही थी. कुलदीप ने बताना शुरू किया था, ‘तनवीर की सौतेली मां के जुल्मों ने उस की बुरी हालत कर दी थी. सौतेली मां की 3 और बेटियां हैं, पर घर का सारा काम तनवीर पर मढ़ कर सब मौज करतीं. यह देख कर मैं ने तनवीर से शादी करने का फैसला सुना डाला.

‘अमेरिका में कमाने वाला दूल्हा मिलने की बात से सौतेली मां जल गई. शादी न होने देने के लिए उस ने बहुत अड़ंगे लगाए, पर गांव वालों और जगजीत की मदद से हमारी शादी हो गई.’

कुलदीप की तरह तनवीर भी सब की प्यारी ‘तन्नी’ बन गई.

कुलदीप की मौत के बाद अब तनवीर का क्या होगा? जानपहचान के सभी मर्द इसी सोच में पड़ गए. तनवीर तो टूरिस्ट वीजा पर आई थी. कुलदीप का मानना था कि अमेरिका में रहते हुए ही वह तनवीर का वीजा स्टेटस बदलवा लेगा.

कुलदीप खुद ग्रीन कार्ड पर था. तनवीर कानूनन 6 महीने से ज्यादा वहां नहीं रह सकती थी. भारत वापस जाने का मतलब उसे फिर उसी नरक में झोंक देना था.

बूढ़े सरदार कुलवंत सिंह ने समस्या उठाई, ‘‘अब हमें सोचना है कि तनवीर बेटी की कैसे मदद की जाए?’’

‘‘सच तो यह है ताऊजी कि इधर कुआं है, तो उधर खाई. तन्नी को भारत नहीं भेजा जा सकता. हमारा कुलदीप उसे जिस आग से बचा कर लाया था, हम तन्नी को उसी आग में जलने को नहीं भेज सकते, पर यहां रहने में भी कानूनी अड़चनें हैं,’’ जगजीत ने कुछ सोचते हुए कहा.

यह सुन कर सब सोच में पड़ गए. अचानक हरजीत ने एक चौंकाने वाला प्रस्ताव सब के सामने रख दिया, ‘‘अगर माफी मिले तो जो एक तरीका मेरे दिमाग में आ रहा है, सब को बताऊं?’’

‘‘हां… हां, बेखौफ हो कर बता बेटा. तन्नी बेटी की खुशी हमारे लिए सब से ऊपर है.’’

‘‘अरमिंदर को तो आप जानते हैं न ताऊजी?’’

‘‘अरे, उसे कौन नहीं जानता. वह तो पूरी बिरादरी को बदनाम कर रहा है,’’ यह कह कर सरदार कुलवंत सिंह का चेहरा कठोर हो गया था.

‘‘इस मुश्किल घड़ी में वही हमारी मदद कर सकता?है,’’ हरजीत ने कहा.

‘‘क्या बकवास कर रहा है तू? इसी अरमिंदर ने पहले एक 50 साल की औरत के साथ शादी कर के अमेरिका की नागरिकता ली. उसे तलाक दे कर भारत से सुरजीत को ब्याह कर ले आया. उस से भी तलाक हो गया.

‘‘अब तो उस ने यह धंधा बना लिया है. पैसे ले कर जरूरतमंद लड़कियों से शादी करता है, बाद में उन्हें तलाक दे कर खुला घूमता है. ऐसे नीच इनसान से कौन सी मदद मिलेगी?’’ सरदारजी के चेहरे पर नफरत साफ झलक रही थी.

‘‘कहने को तो वह आटोमोबाइल पार्ट्स की दुकान का मालिक है, पर असल में वह औरतों को परमानैंट वीजा दिला कर पैसे कमाता है. इस के बावजूद वह कहता?है कि वह किसी की मजबूरी का कोई फायदा नहीं उठाता, बल्कि उन की मदद करता है,’’ जगजीत ने नाराजगी से कहा.

‘‘यह सच बात है. दरअसल, अरमिंदर को न जाने क्यों औरत जात से नफरत है. उस के खिलाफ किसी लड़की ने कभी कोई शिकायत नहीं की, बल्कि वे उस की एहसानमंद हैं,’’ हरजीत ने अपनी बात रखी.

‘‘तू कहना क्या चाहता है? साफसाफ बता,’’ सरदारजी ने जानना चाहा.

‘‘तनवीर की शादी अरमिंदर से करानी होगी. उस की बीवी बन कर तनवीर को अमेरिका का परमानैंट वीजा मिल जाएगा. वीजा मिलने के बाद ही तनवीर यहां रह सकती है और काम भी कर सकेगी,’’ हरजीत ने बात साफसाफ कह दी.

‘‘तेरा मतलब है कि हम तन्नी को उस भेडि़ए के हाथ में सौंप दें?’’ जगजीत ने गुस्से से कहा.

‘‘क्या अरमिंदर पर यकीन किया जा सकता है? अगर उस ने तन्नी की मरजी के खिलाफ कोई जबरदस्ती की तो?’’ जगजीत ने सवाल किया.

‘‘अगर उस ने ऐसा करने की गलती की, तो हम सब मिल कर उसे ऐसा सबक सिखाएंगे कि उस की अक्ल ठिकाने आ जाएगी,’’ हरजीत ने मजबूती से अपनी बात कही.

हरजीत की बात में दम था, लेकिन इस का अंजाम खतरनाक भी हो सकता?था.

बहुत सोचनेसमझने के बाद सब का फैसला हरजीत के हक में था. तनवीर को इस नाम की शादी के लिए राजी करने की जिम्मेदारी औरतों को दी गई.

तनवीर को समझ  पाना इतना आसान नहीं था. भारत वापस जाने के नाम पर तनवीर कांप उठती. सौतेली मां ने जाते समय कड़ी चेतावनी दी थी, ‘अमेरिका का लड़का फांस कर हमारा बड़ा नाम किया है. खबरदार, जो पलट कर मुंह दिखाया, तो तेरी खैर नहीं.’

तनवीर को अपनी छाती से लगा कर मनजीत ने समझाया, ‘‘देख तन्नी, तू मेरी छोटी बहिन जैसी?है. तेरी भलाई के लिए ही हम ने यह फैसला लिया?है.

‘‘कुलदीप नहीं चाहता था कि तू कभी वापस भारत जाए. यहां रह कर तू एक नई जिंदगी जी सकती है, पर उस के लिए परमानैंट वीजा चाहिए.’’

सब के समझने से तनवीर का विरोध ज्यादा देर नहीं टिक सका. सब ने उस की सलामती की जिम्मेदारी ली थी.

अरमिंदर से जब बात की गई, तो उस ने सपाट लहजे में कह दिया, ‘‘जरूरतमंद लड़कियों और औरतों को परमानैंट वीजा दिलाना मेरा काम है. पैसे मिलेंगे तो तनवीर तो क्या, मैं किसी से भी शादी करने के लिए तैयार हूं.’’

‘‘पर एक बात समझ  ले अरमिंदर, हमारी तनवीर पैसे देने की हालत में नहीं है. उस की मदद कर दे बस,’’ सरदारजी ने प्यार से कहा.

‘‘तू तनवीर की मदद कर दे. हम सब मिल कर जो भी बनेगा, पैसा इकट्ठा कर के तुझे  दे देंगे,’’ जगजीत ने मिन्नत की.

‘‘वाह, मुझे क्या इतना गयागुजरा समझ  लिया? मुझे  भीख के पैसे नहीं चाहिए,’’ अरमिंदर ने कुछ नाराजगी से कहा.

‘‘माना कि यह शादी बस नाम के लिए होगी, पर पैसों की भरपाई की जगह जब तक तनवीर को परमानैंट वीजा नहीं मिल जाता, वह तेरा घर संभालेगी. तेरे लिए रोटी बनाएगी, साफसफाई करेगी. बोल, यह सौदा मंजूर है?’ सरदारजी ने पूछा.

‘‘ठीक है, परमानैंट वीजा मिलते ही मैं तनवीर को तलाक दे दूंगा. उस वक्त यह शर्त मत रखिएगा कि उसे जिंदगीभर के लिए सहारा दूं.’’

अरमिंदर की ‘हां’ से सभी के चेहरे खिल उठे.

गुरुद्वारे में दोनों की शादी के समय सारी बिरादरी जमा हुई थी. तनवीर के आंसू चुन्नी से पोंछ कर सतवंत ताई ने तसल्ली दी, ‘‘घबरा मत तन्नी, शादी तो नाम के लिए है. कुछ महीने बाद तू यहां रह सकेगी. हम सब तेरे साथ हैं बेटी.’’

‘‘मुझे तो लगता है कि अरमिंदर जैसा बुरा इनसान भी हमारी तन्नी के साथ रह कर अच्छा इनसान बन जाएगा. अगर दोनों के मन मिल गए, तब तो बल्लेबल्ले. क्यों तन्नी?’’ उस गंभीर माहौल को मनजीत ने अपने मजाक से हलका करना चाहा.

आंसू?भरी आंखों के साथ तनवीर उस बदनाम अरमिंदर के घर आ गई. घर पर एक नजर डालते हुए अमरिंदर ने तनवीर से कहा, ‘‘एक बात अच्छी तरह से समझ ले. इस घर को अपना घर समझाने की भूल कभी मत करना. यह कमरा तेरा वेटिंगरूम है. जिस दिन तेरा टिकट मिल गया, अपनी गाड़ी पकड़ कर चलती बनना.’’

‘‘जी…’’ यह सुन कर तनवीर की आंखें भर आईं.

‘‘एक बात और साफ कर दूं. यह मेरा घर है, तू यहां गृहस्थी जमाने की कोशिश मत करना. घर में कुछ बरतन जरूर पडे़ हैं, पर रोटी पकाने का कोई सामान नहीं है. अब कुछ वक्त तु?ो यहां रहना है, तो कुछ इंतजाम करना होगा. आज बाहर से खाना आ जाएगा. मुश्किल में पड़ गया मैं तो,’’ अरमिंदर का गुस्सा फूट पड़ा.

अरमिंदर के जाने के बाद एक लड़का खाने की थाली के साथ आ पहुंचा. वह बोला, ‘‘भाभी, आप के लिए खाना लाया हूं. अरमिंदर भाई ने कहा है कि आप उन का इंतजार मत करना.’’

तनवीर की रुलाई फूट पड़ी. कुलदीप उसे कितने प्यार से खाना खिलाता था, पर अब कुलदीप कहां  था? खाना छूने का भी मन नहीं किया. आंखों से नींद भाग चुकी थी. क्या से क्या हो गया था.

देर रात दरवाजा खुलने की आवाज पर तनवीर डर गई. कमरे की खिड़की से बाहर झंकने पर हाथ में बोतल के साथ डगमगाते कदमों से अरमिंदर आता दिखाई दिया.

नशे में धुत्त अरमिंदर अपने कमरे में चला गया. इस आदमी के साथ तनवीर कैसे रहेगी?

सुबह नहाधोकर तनवीर काम से फारिग हो चुकी थी और सोच रही थी, ‘पता नहीं, वह चाय पीता भी है या नहीं?’

ताई ने समझाया था, ‘समझदारी से कुछ वक्त निकालना होगा तन्नी. अपने को उस से बस दूर रखना. इस बीच उस की और उस के घर की ठीक से देखभाल कर लेना.’

तनवीर की सोच को अरमिंदर की आवाज ने तोड़ा था, ‘‘तू ने कल रात खाना नहीं खाया. थाली वैसे ही रखी हुई थी. क्यों?’’ ‘‘जी… भूख नहीं थी.’’

‘‘एक बात समझ  ले. यहां कोई मानमनौव्वल करने वाला नहीं है. सरदारजी ने कहा है कि तू सारा घर संभालेगी. भूखी रह कर काम कैसे कर पाएगी. तू चाय पीती है?’’

‘‘जी, आप चाय लेंगे?’’ तनवीर ने सहमते हुए पूछा.

‘‘मैं ने कहा न कि अपने काम से काम रख. मेरी जिंदगी में दखल मत दे. कल कुछ सामान आया था. चाय की पत्ती, चीनी वगैरह होगी. दूध फ्रिज में होगा,’’ अपनी बात कह कर अरमिंदर बाहर चला गया जा  तेजाते अरमिंदर कह गया, ‘‘किसी अनजान के लिए दरवाजा मत खोलना. अपने लिए खाना पका लेना.’’

रात की थाली में से एक रोटी गले से उतार कर तनवीर ने पानी पी लिया. इस जिंदगी की तो उसे आदत डालनी ही होगी.

तनवीर ने कमरा ठीक कर दिया. वह समझ  नहीं पा रही थी कि दिन कैसे कटेगा. कुलदीप की यादें उसे कचोट रही थीं. सूना घर उसे काटने को दौड़ रहा था.

रात में तनवीर ने दालसब्जी के साथ रोटियां बना दीं. अगर अरमिंदर आ गया, तो खाना परोस देगी.

रात को बहुत देर तक इंतजार करने के बाद उस ने 2 रोटियां खा लीं. ताई ठीक कहती हैं, ‘कुछ भी हो जाए, यह पापी पेट नहीं मानता. इसे तो भरना ही पड़ता है.’

फिर वही दरवाजा खुलने की आवाज और अरमिंदर का लड़खड़ाते कदमों से घर में आना तनवीर को डरा गया. अगर कभी अरमिंदर ने उस के साथ जबरदस्ती की, तो वह क्या करेगी? कल से अपने बंद दरवाजे के आगे मेज लगा कर सोएगी.

अरमिंदर ने तनवीर को परमानैंट वीजा दिलाने का काम शुरू कर दिया. इतने दिनों में तनवीर काफी सामान्य हो चली थी. अरमिंदर ने कभी कोई गलत हरकत नहीं की, बल्कि उस की जरूरतों के बारे में पूछ कर वह उस का मन हलका कर देता.

एक दिन अरमिंदर काम पर जाने को निकलने ही वाला था कि तनवीर एक डब्बा ले कर आ गई, ‘‘आप के लिए खाना बनाया है…’’

‘‘क्या मैं ने कहा था कि मेरे लिए खाना बना?’’ अरमिंदर ने रूखेपन से कहा.

‘‘आप रोज बाहर का खाना खाते हैं. घर में रोटी बनती है, इसलिए…’’

‘‘देख तनवीर, मैं ने पहले ही कह दिया था कि रोटी का डब्बा थमा कर मेरी घरवाली बनने की कोशिश मत कर… समझ?’’

अरमिंदर की इस सख्त बात पर आंसू भरी आंखों के साथ तनवीर अपने कमरे में चली गई. काफी देर बाद उस ने बाहर आने पर देखा, रोटी का डब्बा नहीं था.

उस शाम अरमिंदर कुछ जल्दी घर आ गया. रोटी वाला डब्बा रसोईघर में रख कर उस ने कहा, ‘‘तेरा डब्बा तो मेरे साथी खाली कर गए. कह रहे थे कि सब्जी अच्छी बनी थी.’’

अरमिंदर की इस बात से तनवीर का चेहरा खुशी से चमक उठा. उस दिन के बाद से तनवीर रोज अरमिंदर को खाने का डब्बा थमाने लगी, पर शाम का वही रूटीन चलता रहा.

सतवंत ताई और मनजीत भाभी अकसर तनवीर के पास आ जाती थीं. साफसुथरा घर देख कर मनजीत के चेहरे पर शरारत छलक आई, ‘‘वाह तन्नी, देखती हूं, तू ने अरमिंदर का घर संवार दिया है. चमक रहा है घर. एक बात बता, क्या तू ने घर के मालिक को भी संभाल लिया है?’’

‘‘चुप कर मनजीत. जो मुंह में आता है, बोल देती है. सहीगलत का तो ध्यान रखा कर. हां तन्नी बेटी, बता अरमिंदर तुझे  परेशान तो नहीं करता?’’ सतवंत ताई ने पूछा.

‘‘नहीं ताई, उन्होंने कभी परेशान नहीं किया. वे मेरी जरूरतों का खयाल रखते हैं,’’ तनवीर के चेहरे पर थोड़ी सी खुशी झलक आई.

‘‘क्या कहा तन्नी? वह तेरी हर जरूरत का खयाल रखता है?’’ मनजीत कान में फुसफुसाई.

तनवीर का चेहरा शर्म से लाल हो आया. ताई ने राहत की सांस ली, ‘‘चल, यह सुन कर तसल्ली हुई. हम सब तो डरते थे कि कहीं वह तेरे साथ कोई बदसुलूकी न करे.’’

तन्नी को आशीर्वाद दे कर वे दोनों चली गईं. रास्ते में मनजीत को चुप देख कर सतवंत ताई ने  पूछा, ‘‘क्या सोच रही है मनजीत?’’

‘‘एक बात का डर लग रहा है ताई. कहीं तन्नी उस अरमिंदर शैतान के जाल में न फंस जाए. वह तो प्यार का मतलब भी नहीं जानता. कहीं हमारी तन्नी धोखा न खा बैठे.’’

‘‘क्या पता, तन्नी के साथ रह कर अरमिंदर ही सुधर जाए.’’

अमेरिका के उस हिस्से में सिख और पंजाबी जोरशोर से बैसाखी मनाते थे. बैसाखी के 2 दिन पहले अरमिंदर ने तनवीर को एक कीमती सलवारसूट दे कर उसे हैरानी में डाल दिया.

उस ने सपाट लहजे में कहा, ‘‘परसों पास के मैदान में बैसाखी का मेला लगेगा. यह सूट पहन कर चली जाना.’’

‘‘आप नहीं चलेंगे?’’

‘‘नहीं. तेरी ताई और भाभी तुझे  ले जाएंगी. ये कुछ पैसे रख ले, जो जी चाहे खरीद लेना.’’

नोटों का एक बड़ा बंडल देख कर तन्नी डर गई, ‘‘नहीं, मुझे  पैसे नहीं चाहिए. मैं मेले में नहीं जाऊंगी.’’

‘‘देख, यह औरतों का मनपसंद मेला है. तू वहां जरूर जाएगी. मैं भाभी को बोल चुका हूं,’’ इतना कह कर अरमिंदर वहां से चला गया.

मनजीत के साथ कई औरतें आई थीं. तन्नी को नया सूट पहने देख कर मनजीत की नजर ठहर गई, ‘‘वाह तन्नी, तू ने तो बड़ा प्यारा सूट पहना है.’’

‘‘वे लाए हैं…’’ शरमाती हुई तन्नी बस इतना ही कह सकी.

‘‘ओए… होए, यह ‘वे’ कौन हैं जी?’’

सब की हंसी ने तन्नी का चेहरा लाल कर दिया. मेले में सब ने खूब मजे किए. उतनी देर के लिए तनवीर अपना दुख भुला बैठी. घर लौटने पर उम्मीद के उलट अरमिंदर घर में ही था.

‘‘कैसा था मेला?’’ अरमिंदर ने पूछा.

‘‘बहुत मजा आया. मनजीत भाभी ने जबरदस्ती चूडि़यां दिलवा दीं…’’ तनवीर ने चहकते हुए बताया.

‘‘ठीक है, बहुत रात हो गई. जा, सो जा,’’ अपने कमरे का दरवाजा बंद कर अरमिंदर ने तन्नी के जोश पर ठंडे पानी के छींटे डाल दिए.

अब तन्नी को जिंदगी मुश्किल नहीं लगती थी. उसे अरमिंदर के आने का इंतजार रहता. उस का मनपसंद खाना बना, उस की तारीफ के दो शब्द सुनने को वह उतावली रहती. समझ नहीं पाती, अरमिंदर को लोग खराब क्यों कहते हैं?

कुलदीप की यादें अब धुंधली होने लगी थीं. अपनी नई जिंदगी से तन्नी ने समझौता कर लिया था.

एक दिन अरमिंदर को शराब पीते देख कर वह बोल उठी, ‘‘आप इतनी शराब न लिया करें, नुकसान करती है.’’

‘‘मेरे फायदेनुकसान से तुझे  क्या लेनादेना है? इस बारे में तो मैं ने कभी सुरजीत का कहा भी नहीं माना,’’ तन्नी की बात बीच में ही काट कर अरमिंदर ने रूखेपन से कहा.

‘‘जी, सुरजीत कौन थीं?’’

‘‘थी नहीं, है. उस की यादें इस दिल में इतनी गहरी बैठी हैं, जिन्हें कोई नहीं मिटा सकता. मेरी सबकुछ है सुरजीत.’’

‘‘अब वे कहां हैं?’’

‘‘मु?ो छोड़ गई. मेरे ही दोस्त के साथ घर बसा लिया उस ने, पर मैं पूरी जिंदगी उस का इंतजार करूंगा. अगर मेरा प्यार सच्चा है, तो वह मेरे पास जरूर आएगी.’’

न जाने क्यों अरमिंदर की इस बात से तनवीर का दिल बैठ गया. कई कहानियां याद हो आईं. प्रेमिका या प्यारी बीवी के न रहने पर लोग देवदास बन जाते हैं, पर सच्ची जीवनसंगिनी मिल जाने पर पुराने घाव भर जाते हैं. क्या तनवीर के साथ ने अरमिंदर पर कोई असर नहीं डाला?

2 दिन बाद हाथ में लिफाफा लिए अरमिंदर ने खुशीखुशी तनवीर से कहा, ‘‘ले, तेरा परमानैंट वीजा आ गया. आज से तेरी छुट्टी. खुशी मना. जहां जी चाहे, जा सकती है.’’

‘‘कहां जाऊं मैं?’’

‘‘अरे, अब तू जो चाहे काम कर सकती है. तलाक होते ही किसी अच्छे लड़के के साथ शादी कर के घर बसा सकती है.’’

‘‘मैं यहां क्यों नहीं रह सकती?’’

‘‘क्या कह रही है? कहीं तू खुद को मेरी घरवाली तो नहीं मान बैठी? देख तन्नी, मैं ने पहले ही कह दिया था कि जिस दिन तेरा टिकट आएगा, तु?ो यहां से जाना होगा. मेरा घर तो तेरे लिए मुफ्त की सराय था. अब तेरा दानापानी यहां से उठ गया.’’

‘‘मैं इस घर के एक कोने में पड़ी रहूंगी. मु?ो यहां रहने दीजिए,’’ तन्नी की आंखों में आंसू थे.

‘‘आंसू बहाना बेकार है. मैं ने तु?ो कोईर् धोखा नहीं दिया है. पहले ही साफसाफ बता दिया था कि तेरामेरा कोई रिश्ता नहीं है. मैं प्यारव्यार में यकीन नहीं रखता… सम?ा?’’

‘‘अगर यह सच है, तो आप सुरजीत को याद क्यों करते हो?’’ अचानक तन्नी तड़प उठी.

‘‘सुरजीत का नाम मत ले. एक सच जान ले कि इस दुनिया में पैसा ही सबकुछ है. अगर उस वक्त मेरे पास इतने पैसे होते, तो सुरजीत क्यों जाती?’’ अरमिंदर की आवाज तल्ख हो आई.

‘‘मुझे पैसों का जरा भी मोह नहीं है. मैं आप का घर देखूंगी…’’

‘‘फिर वही बात. जब तू मुझे छोड़ेगी, तभी तो किसी और के साथ शादी कर पैसे कमाऊंगा. तेरी वजह से अपना धंधा चौपट नहीं कर सकता. मैं तलाक की अर्जी दे रहा हूं.’’

‘‘ठीक है, तो मुझे भी कोईर् पैसे कमाने वाला काम दिला दो. मैं चली जाऊंगी,’’ तन्नी ने आंसू पोंछ दिए.

‘‘तू किसी के साथ शादी कर के आराम की जिंदगी जी सकती है. तू कहे, तो मैं कोईर् अच्छा लड़का देखूं?’’

‘‘नहींनहीं, मुझे शादी नहीं करनी है. शादी का सुख मेरे नसीब में ही नहीं लिखा है.’’

अरमिंदर सोच में पड़ गया. कुछ देर बाद वह बोला, ‘‘तू पढ़ीलिखी तो नहीं है, अंगरेजी जाने बिना कोई ठीक काम मिल नहीं सकता. 5वीं पास औरत क्या कर सकती है?’’

‘‘मैं कोई भी काम कर सकती हूं. किसी के घर रोटी पकाने का काम तो मुझे मिल ही जाएगा न?’’ तन्नी ने कहा.

‘‘एक काम कर सकती है. बुरा न माने तो कहूं.’’ ‘‘कहिए?’’

‘‘मेरे एक चाचा का बेटा हरमिंदर अमेरिका आना चाहता है, लेकिन आजकल वीजा मिलना मुश्किल है. तू उस के साथ शादी कर के मुंहमांगे पैसे पा सकती है. देख, मैं ने मुफ्त में तेरी मदद की है, तू पैसे ले कर मेरा एहसान उतार सकती है.’’

‘‘आप यह क्या कह रहे हो? यह तो पाप है.’’

‘‘हरमिंदर के साथ भी तेरी शादी नाम के लिए होगी. तेरी मरजी के बिना वह मुझे छुएगा भी नहीं.’’

‘‘नहींनहीं, यह नहीं हो सकता…’’

‘‘सोच ले. मैं तो कहता हूं, तेरा परमानैंट वीजा तेरे लिए तुरुप का पत्ता है. मेरी तरह शादी कर के जरूरतमंदों को वीजा दिला कर खूब पैसे बना सकती है. इस बीच अगर किसी से मन मिल जाए, तो घर भी बसा सकती है.’’

‘‘नहीं, मेरे लिए तो यह सुनना भी गलत है,’’ चुन्नी से चेहरा ढक कर तन्नी अपने कमरे में चली गई.

रातभर जागी तन्नी ने सूजी आंखों के साथ सुबह अरमिंदर को फैसला सुना दिया, ‘‘अपने हरमिंदर को बता दो, मैं शादी करने को तैयार हूं.’’

‘‘वाह, यह हुई न बात. मैं अभी भारत फोन लगाता हूं. जब तक हमारा तलाक होता है, तू भारत जा कर चाचा के यहां रह कर सब देखसम?ा लेना.’’ ‘‘जी…’’

‘‘तू जल्दी से अपना सामान पैक कर ले. मैं तेरा टिकट बुक करा देता हूं,’’ कहते हुए अरमिंदर फोन पर टिकट बुक कराने लगा.

तन्नी का भारत जाने का टिकट आ गया. टिकट थामती तन्नी को लगा, जैसे उस की मौत का फरमान आ गया हो.

अरमिंदर ने एक हजार डालर देते हुए समझया, ‘‘इन्हें मुश्किल घड़ी के लिए संभाल कर रखना. चाचा के यहां तुझे एक पैसा भी खर्च नहीं करना होगा. वापसी होने पर हरमिंदर को मैं अपने साथ काम पर लगा लूंगा.’’

‘‘ठीक है, उसे भी परमानैंट वीजा मिलने पर अपनी तरह जरूरतमंदों को वीजा दिलाने के धंधे में लगा लेना,’’ तन्नी की कड़वी आवाज अनचाहे ही निकल गई.

‘‘चुप कर. इस काम से मुझे कोई खुशी नहीं मिलती. सच यही है कि सच्चा प्यार भी पैसा चाहता है.’’

‘‘अब तो तुम पैसे वाले हो, घर क्यों नहीं बसा लेते? कुछ भी कहो, तुम्हें इस काम में मजा आता है.’’

‘‘मैं क्या करता हूं, यह मेरी मरजी है. तू अपने काम से मतलब रख. अपनी जिंदगी में दखलअंदाजी करने का हक मैं ने किसी को भी नहीं दिया है.’’

जगजीत तन्नी को एयरपोर्ट तक छोड़ने के लिए अपनी टैक्सी के साथ आ चुका था.

तन्नी के हाथ से सूटकेस ले कर जगजीत ने पूछा, ‘‘अचानक भारत क्यों जा रही हो? हम तो तेरे परमानैंट वीजा मिलने पर खुशी मना रहे थे. सरदारजी तुझे  कोई काम दिलाने की सोच रहे हैं. अच्छा हुआ, तुझे  अरमिंदर से छुटकारा मिल गया.’’

‘‘हां भैया, मैं जल्दी आऊंगी.’’ ‘‘किसी से मिले बिना क्यों जा रही हो? अभी भी वक्त है, उधर होता चलूं?’’

‘‘नहीं भैया. सीधे एयरपोर्ट चलना है. मैं वापस आ कर उन्हें समझ  दूंगी.’’ ‘‘अरमिंदर कहां है? तुझे  छोड़ने नहीं आएगा?’’

‘‘मैं कौन सी उन की रिश्तेदार लगती हूं? बहुत एहसान कर दिया उन्होंने. अब और नहीं,’’ तनवीर की आवाज में कड़वाहट घुल गई.

एयरपोर्ट पर तन्नी को छोड़ कर जगजीत चला गया. सूटकेस खींचती तनवीर काउंटर की ओर जा ही रही थी कि अचानक अरमिंदर की आवाज कानों में गूंजी, ‘‘वापस चल तन्नी. तू कहीं नहीं जाएगी.’’

‘‘क्या… क्यों?’’ हैरान तन्नी और कुछ नहीं पूछ सकी.

‘‘क्योंकि मैं तेरे बिना नहीं रह सकता. सुरजीत की झूठी यादों के सहारे जीने की कोशिश में खुद को बहुत सजा दे चुका हूं. मेरे कहेसुने को माफ कर दे. चल, मेरा घर तेरा इंतजार कर रहा है.’’

यह सुन कर अरमिंदर की फैली बांहों में वह समा गई. Love Story in Hindi

Hindi Superstition Story : अशुभ

Hindi Superstition Story. मेरी नानी कहती हैं कि अगर सुबह दूध गिर जाए, तो बहुत अशुभ होता है. अम्मां खड़ीखड़ी पैर से ले कर सिर तक थरथर कांप रही थीं. मैं ने देखा कि उन के हाथ से सुबहसुबह आधा लिटर दूध गिर कर बहने लगा था.

दरअसल, अम्मां लो ब्लडप्रैशर की मरीज थीं. उन्हें चक्कर आना, दिल घबराना, पूरा जिस्म हिलना जैसी तमाम शिकायतें थीं. वे इतनी पतलीदुबली थीं कि  झटका खाते ही गिर जाएं.

महीनेभर से अम्मां की तबीयत ज्यादा खराब थी. कमजोरी के चलते उन के हाथ से दूध का डब्बा गिर गया था.

अम्मां को अपनी जानकारी के मुताबिक मैं ने लंबाचौड़ा फलसफा सुनाया कि दूध गिरना बुरा नहीं है, बुरे तो इनसान के खयालात होते हैं.

अम्मां थोड़ी शांत हुईं, लेकिन तभी पीछे से नानी ने 5 नंबर चप्पल से मेरी पीठ पर निशाना लगाया.

मैं ने पीछे पलट कर देखा. नानी खतरनाक शिकारी बिल्ली की तरह कड़े तेवर लिए मु झे घूर रही थीं.

‘‘नानी…’’ मैं कुछ कहने ही जा रहा था कि उन्होंने एक जोरदार तमाचा मेरे गाल पर रसीद कर दिया.

‘‘बेहया, तु झे पता नहीं है कि दूध गिरना कितना अशुभ होता है. हाय…हाय, अब क्या होगा? कलमुंही, तु झे कितना सम झाया करूं,’’ नानी ने अम्मां को घूरते हुए कहा.

मेरे पिता बड़ेबड़े शहरों में बने मकानों की पुताई करते थे. वे साल में 1-2 बार आ कर हमारे ऊपर प्यार की बरसात कर देते थे. फिर मु झे और अम्मां को अपनी चहेती दकियानूसी सास के पास छोड़ कर चले जाते थे.

मैं जहर का घूंट पी कर रह गया. नानी कह रही थीं, ‘‘ऐसे ही मियांजी की पोती के हाथ से दूध गिर गया था और मियांजी का एकलौता बेटा मर गया था.’’

मियांजी के परिवार के साथ हुआ वह हादसा मैं भी कहां भूला था. बेचारी बीना को कितनी कठोर सजा भुगतनी पड़ी थी. उस हादसे को गुजरे 4 महीने बीत चुके थे, मगर लगता था कि कल की ही बात हो.

मेरी नानी के इस पक्के घर के अलावा इस गांव में सिर्फ 12-13 पक्के घर और थे. 50-60 घर कच्ची मिट्टी के बने हुए थे, जिन में से एक घर मियांजी का भी था. वे अपने छोटे से परिवार के साथ हंसीखुशी से रहते थे. उन के परिवार में उन की बीवी, एक बेटा, बहू और पोती बीना थी.

मियांजी बुजुर्ग थे. उन की सू झबू झ के पूरे गांव में चर्चे होते थे. मैं भी उन की सम झदारी का कायल था.

एक दिन मैं किसी काम से मियांजी के घर गया था. मियांजी ने बड़ी इज्जत से मु झे आंगन में बैठाया और अपनी जवान पोती से कहा, ‘‘बीना, जल्दी से बाबू के लिए दूध ले कर आओ. यह हमारे यहां कभीकभार ही आता है.’’

मियांजी ने मेरा नाम बेहद अपनेपन से ले कर कहा, तो मैं बहुत खुश हो गया था.

फिर 2-3 मिनट बाद अंदर से कुछ गिरने की आवाज आई, तभी बीना की मां और दादी लपक कर अंदर गईं. थोड़ी देर बाद भीतर से रोने की आवाज भी आने लगी. मैं घबरा गया और तुरंत मियांजी के साथ अंदर गया.

‘‘बीना, यह तू ने क्या किया?’’ बीना की मां बेदर्दी से उसे पीट रही थीं. दादी उसे कोस रही थीं.

‘‘यह आप क्या कर रही हैं?’’ मैं ने बीना की मां से कहा. दर्द से बेहाल बेचारी बीना बुरी तरह रो रही थी.

मियांजी ने जल्दी से दूध लाने को क्या कहा कि बीना हड़बड़ा गई. इसी जल्दबाजी में बीना का पैर ऊंचीनीची जगह पर आ गया और दूध के साथ नीचे आ गिरी. उस के दाएं पैर में मोच आ गई थी.

मियांजी बिना कुछ कहे कमरे से निकल कर चले गए. उन्होंने अपनी बीवी को सम झाने की जरा भी कोशिश नहीं की. मु झे लगा कि इन औरतों से ज्यादा तो मियांजी अंधविश्वासी हैं.

मैं अपना सा मुंह ले कर घर लौट आया.

शाम को मैं ने अम्मां से कहा, ‘‘अम्मां, चाय के साथ पकौड़े भी बना दो. मु झे भूख लग रही है.’’

‘‘अम्मां… भूख,’’ मैं ने दोबारा लाड़ से अम्मां का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की.

‘‘चुप रहो. 3 दिन तक रसोई में न कड़ाही चढ़ेगी, न सब्जी में किसी तरह का तड़का लगेगा,’’ अम्मां के बजाय नानी ने आ कर मु झे 8-10 साल के बच्चे की तरह लताड़ दिया.

‘‘क्यों नानी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘किस दुनिया में रहता है. कुछ खबर है. मियांजी का एकलौता बेटा बस हादसे में मर गया.

‘‘अरे, बस हादसे का नाम है. उसे तो दूध गिरने के अशुभ ने खा लिया. बेचारे मियांजी कितने गरीब हैं. 2 हजार रुपए मौलवी को दे दिए थे इस अशुभ को उतरवाने के वास्ते, लेकिन दूध का घोर अशुभ उतरा ही नहीं,’’ नानी पिघला हुआ लोहा मेरे कानों में उड़ेल कर अम्मां को साथ लिए मियांजी के घर चली गईं.

अब मु झे बीना की चिंता होने लगी. ये बेदर्द समाज बीना को कहां छोड़ने वाला था. मैं ने बीना को बचाने की खातिर एक फैसला ले लिया.

मैं ने उस बस हादसे की पूरी छानबीन कर डाली और मियांजी को सम झाने की हर मुमकिन कोशिश की कि नशे में धुत्त ड्राइवर तेज बस चला रहा था. मगर मेरे लाख सम झाने पर भी किसी ने मेरी बात नहीं मानी.

दूध गिरना अशुभ नहीं था, लेकिन बीना को 2 दिन तक खाना नहीं दिया गया, वह यकीनन अशुभ था.

अब मैं ने तय कर लिया था, यह घटना मैं दोबारा नहीं होने दूंगा. बीना 2 दिन तक भूख  झेल गई, मगर मेरी अम्मां इतनी बीमार थीं कि शाम तक ही मर जातीं और मेरे लिए यह सब से बड़ा अशुभ दिन होता.

तब मैं ने कड़े तेवर अपनाते हुए नानी से कहा, ‘‘खबरदार, जो मेरे बाप की मेहनत की कमाई किसी  झोलाछाप, पाखंडी मौलवी के आगे डाली. अगर आप ने मेरी बात नहीं मानी और मेरी अम्मां के साथ जुर्म किया या उन्हें किसी तरह परेशान किया, तो हम आप को इस उम्र में छोड़ कर चले जाएंगे. फिर शायद आप की जिंदगी का यह सब से बड़ा अशुभ दिन होगा.’’

मैं अम्मां को अपने साथ लिए कमरे में आ गया. उन्हें खाट पर लिटा कर चादर ओढ़ाई. जैसे ही मैं पलटा, हैरानी के कई  झटके खातेखाते बचा.

तावीज के बजाय नानी कसबे के अस्पताल की लेडी डाक्टर के साथ खड़ी थीं. कब्रिस्तान में धकेल देने वाली नानी अब सुखशांति के बौर्डर पर खड़ी लग रही थीं. मु झे लगा कि मौके पर दी गई धमकी अब निशाने पर जा लगी थी.

डाक्टर ने चैकअप कर के दवा लिखी और परची नानी के हाथ में थमा कर चली गईं.

मैं ने खुश हो कर नानी से कहा, ‘‘अच्छा हुआ, आप सुधर गईं, वरना…’’ इस से आगे मैं कुछ और कहता कि नानी ने फिर जोरदार थप्पड़ से मेरा गाल लाल कर दिया.

‘‘मु झे छोड़ कर मत जाना. मैं किसी को नहीं भड़काऊंगी,’’ इतना कह कर नानी रोने लगीं.

आग या पानी, मैं नानी को सम झ नहीं पाया. पहले गुस्सा, फिर रोना. खैर, मैं ने नानी को कंधे से थाम लिया, क्योंकि वे सुधर जो गई थीं.  Hindi Superstition Story

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें