देवकी के घर के आंगन और पिछवाड़े में बड़ीबड़ी घास और झाडि़यां उग आई थीं. मकान का प्लास्टर भी जगहजगह से उखड़ चुका था. देखने से लगता था जैसे कई महीनों से इस की किसी ने सुध नहीं ली है, पर आज अचानक उस के आंगन में रौनक सी लगी थी. कुछ लोग झाडि़यां साफ कर रहे थे, तो कुछ दीवारों के उखड़े प्लास्टर की मरम्मत में लगे थे. शाम तक रंगवार्निश लगा कर घर को चकाचक कर दिया गया. एक गरीब विधवा के घर की ऐसी कायापलट… आखिर ऐसा क्या हो गया था?
‘‘जरा, जल्दीजल्दी हाथ चलाओ भाई… और कितना टाइम लगाओगे स्टेज बनाने में?’’
‘‘अरे, यह शामियाना कैसे बांध रहे हो… जरा ढंग से बांधो…’’
‘‘कुरसियों का क्या हुआ? अभी तक नहीं आईं? और वह रैड कार्पेट?’’
‘‘कल सवेरे 8 बजे तक सारा काम पूरा हो जाना चाहिए, बेशक रातभर काम करना पड़े तो करो.’’
जल निगम का जूनियर इंजीनियर मजदूरों को डांटते हुए काम बता रहा था. यही मौका था उस के लिए अपनी अफसरी दिखाने का खासकर जब उस के बड़े अफसर भी साथ खड़े हों. दूसरे दिन ठीक सवेरे 8 बजे जल निगम के बड़े अफसर देवकी के घर पहुंच गए.
‘‘सर, रैड कार्पेट बिछवा दूं क्या? चीफ इंजीनियर साहब, कमिश्नर, डीएम और बाकी औफिसर्स की गाडि़यां नीचे रोड पर आ गई हैं,’’ जूनियर इंजीनियर ने धीरे से असिस्टैंट इंजीनियर से पूछा.
‘‘हां, बिछवा दो. और हां, नल की टोंटी बदली या नहीं? उस में बढि़या पीतल की टोंटी लगवा दो. ध्यान रहे
कि नल के स्टैंड पोस्ट का प्लास्टर उखड़े नहीं, अभी ताजा है.’’
‘‘पर साहब, बाकी जगह तो हम ने लोहे की टोंटी लगाई थी और स्टैंड पोस्ट भी नहीं बनाया था, बस यों ही लकड़ी का डंडा खड़ा कर के नल उस से बांध दिया था,’’ जूनियर इंजीनियर के बजाय काम पर लगे प्लंबर ने झिझकते हुए बताया.
‘‘चुप बे, तुझ से किस ने पूछा है? जितना कहा जाए, उतना कर, फालतू बोलने की जरूरत नहीं है,’’ असिस्टैंट इंजीनियर ने डांटते हुए कहा.
फिर एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने जूनियर इंजीनियर को इशारे से बुलाया और पूछा, ‘‘जेई साहब, जरा चैक तो करो, नल में पानी आ भी रहा है कि नहीं?’’
जूनियर इंजीनियर ने नल की टोंटी घुमा कर देखा तो उस की जान हलक में आ गई, हाथपैर फूल गए. डरते हुए, घबराई आवाज में वह बोला, ‘‘सर, गजब हो गया… पानी तो नहीं आ रहा अब… क्या होगा?’’
क्या कह रहे हो?… पानी नहीं आ रहा,’’ एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को एक झटका सा लगा.
‘‘जी एकदम सही सर…’’ जूनियर इंजीनियर बोला.
यह सुनते ही एग्जीक्यूटिव इंजीनियर का पारा चढ़ गया और वह गुस्से में बोला, ‘‘कल से अभी तक चैक क्यों नहीं किया? अब बता रहे हो कि पानी नहीं आ रहा है. तुम से एक काम भी ढंग से नहीं हो सकता. एक घंटे के बाद मंत्रीजी आने वाले हैं उद्घाटन के लिए. पानी नहीं आया तो क्या जवाब देंगे? खुद तो सस्पैंड होगे ही, मुझे भी करवाओगे.’’
‘‘सर, कल शाम को तो चैक कर के ही गए थे. तब तो पानी आ रहा था. पता नही रातोंरात…’’
‘‘…तो रात में क्या हो गया? धरती निगल गई या आसमान खा गया… जो भी हो मुझे आधे घंटे में पानी चाहिए,’’ एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने सख्त लहजे में आदेश दिया.
‘‘ठीक है सर, चैक करता हूं,’’ कह कर जूनियर इंजीनियर ने मोटरसाइकिल उठाई और कैजुअल लाइनमैन को पीछे बिठा कर चल दिया.
इसी बीच इलाके के सभी बड़े अफसर, जल निगम के चीफ इंजीनियर, कमिश्नर, डीएम पंडाल पर पधार चुके थे, साथ ही मंत्रीजी की पार्टी से ब्लौक प्रमुख, भूतपूर्व विधायक, जिला और मंडल स्तर के पार्टी नेता आदि भी आ चुके थे. इन के अलावा, विपक्षी पार्टी के वर्तमान विधायक और उन के चेलेचपाटे भी पंडाल में पधार चुके थे. इंतजार था तो बस मंत्रीजी का.
अव्वल तो इतने छोटे कार्यक्रम में मंत्रीजी आते नहीं, पर पिछले इलैक्शन में पानी की समस्या को ले कर सत्ता पक्ष को मुंह की खानी पड़ी थी. अब पार्टी किसी भी तरह अपने खोए वोट बैंक को वापस लाना चाहती थी, इसलिए सरकार ने इलाके की सब से बड़ी समस्या यानी पानी के लिए ‘हर घर जल, हर घर नल’ का शिगूफा छोड़ दिया था.
2-3 महीने में फिर से इलैक्शन होने वाले थे. सरकार इस से पहले, इलाके के हर गांव में पानी पहुंचाना चाहती थी. इस का जिम्मा जल मंत्री रघुवीर सिंह उर्फ ‘जग्गू भैया’ को सौंपा दिया गया था. वे खुद अपने हाथों से इस का शुभारंभ करना चाहते थे. जूनियर इंजीनियर और लाइनमैन पाइप लाइन को चैक करते हुए उस जगह पहुंचे जहां से देवकी के घर के लिए मेन लाइन से कनैक्शन दिया गया था. वहां का नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. तकरीबन 100 मीटर लंबा पाइप गायब था.
‘‘साहब, अब हम क्या करें? इतनी जल्दी 100 मीटर लंबा पाइप ला कर कैसे जोड़ेंगे?’’ लाइनमैन ने घबराई आवाज में पूछा.
‘‘तेरी नौकरी तो गई बेटा. तेरे साथ मैं भी सस्पैंड होऊंगा,’’ जूनियर इंजीनियर ने घबराहट में माथे से पसीना पोंछते हुए लाइनमैन को धमकाया.
‘‘साहब, इस में मेरा क्या कुसूर है? रात में कोई पाइप उखाड़ कर ले जाएगा, ऐसा कौन सोच सकता था?’’ लाइनमैन ने डरतेडरते सफाई दी.
थोड़ी देर के लिए लगा कि उन दोनों को जैसे सांप सूंघ गया, एकदम चुप रहे.
‘‘खैर, जो भी होगा, देखा जाएगा. एग्जीक्यूटिव इंजीनियर साहब को तो तुरंत बताना ही होगा,’’ कहते हुए जूनियर इंजीनियर ने चुप्पी तोड़ी.
दरअसल, हुआ यों कि गांव में पानी की पाइप लाइन बिछाने की टारगेट डेट कब की निकल चुकी थी, पर जल निगम की लापरवाही और टालमटोली की वजह से अब तक पाइप लाइन नहीं बिछ पाई थी.
अचानक जल विभाग के सचिव का आदेश आ गया,’’ अगले 2-3 महीने में विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित होने की उम्मीद है और फिर आचार संहिता लागू हो जाएगी. माननीय जल मंत्री चाहते हैं कि वे ‘हर घर जल, हर घर नल’ योजना का अगले हफ्ते अपने करकमलों से शुभारंभ करेंगे. इस के लिए जल्दी ही जरूरी तैयारी की जाए.’’ यह फरमान मिलते ही डिवीजन में हड़कम मच गया था. अभी तक तो गांव में मेन पाइप लाइन भी नहीं बिछी थी, फिर घरों तक पानी कैसे पहुंचाएंगे? डिवीजन के सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर ने आननफानन में मीटिंग बुलाई और तय हुआ कि गांव में ऐसा घर ढूंढ़ा जाए जो दूसरे गांव को जा रही मेन पाइप लाइन और रोड के एकदम नजदीक हो.
इस के लिए देवकी का घर सब से मुफीद था, जो कि दूसरे गांव को पानी की सप्लाई करने वाली मेन पाइप लाइन से महज 500 मीटर की दूरी पर था और रोड के नजदीक भी. तय कार्यक्रम के मुताबिक चुपके से देवकी के घर के लिए दूसरे गांव को पानी सप्लाई करने वाले मेन पाइप से टैंपरेरी कनैक्शन जोड़ दिया गया. गांव के कुछ और घरों में भी दिखावे के लिए नल लगा दिए गए बिना पानी के कनैक्शन के ताकि गांव वाले भरोसे में रहें कि जल्दी उन के घर भी पानी आ जाएगा. एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को जैसे ही पता चला कि कोई पाइप लाइन ही उखाड़े कर ले गया तो उस पर आसमान टूट पड़ा. हताशा और तनाव में वह मन ही मन भुनभुनाया, ‘‘आज तो मर गए अब कुछ नहीं हो सकता.’’ वह कुछ क्षण माथा पकड़ कर यों ही बैठा रहा, फिर जूनियर इंजीनियर पर सारी भड़ास निकाली, ‘‘इडियट… तुम्हारे बस का कुछ नहीं है. मरवा दिया सब को. अब देखते हैं कि कौन बचाता है नौकरी…’’
फिर दौड़ादौड़ा सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर के पास गया और सारी बात बताई. पहले तो सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर गुस्से में एग्जीक्यूटिव इंजीनियर पर ही चढ़ पड़ा, फिर कुछ देर चुप्पी सी छाई रही. सब सोचने में लगे रहे कि अब क्या किया जाए? मंत्रीजी उद्घाटन के लिए पहुंचने वाले ही थे. तभी असिस्टैंट इंजीनियर को एक तरकीब सूझी. इसे उस ने दूसरे अफसरों के साथ साझा किया. यह सुनते ही सब के चेहरे खिल उठे और वे इस के लिए तुरंत राजी हो गए. पंडाल में जमा भीड़ में अचानक हलचल सी मच गई. कुछ लोग रोड की तरफ भाग रहे थे, तो कुछ अपनी जगह उचक कर देख रहे थे. शांत वातावरण को चीरते हुए सायरन की आवाज अब पंडाल तक आ रही थी. शायद मंत्रीजी का काफिला रोड के बिलकुल पास पहुंच चुका था.
पंडाल में मौजूद बड़े अफसर और उन के पार्टी के पदाधिकारी और नेता मंत्रीजी की अगवानी के लिए तेजतेज कदमों से रोड की तरफ जा रहे थे.
गाडि़यों के काफिले के बीच से एक सफेद चमचमाती हुई, लाल बत्ती वाली कार प्रकट हुई. उस में से झक सफेद कुरतापाजामा और काली नेहरूकट जैकेट पहने, आंखों पर काला चश्मा और गले में पार्टी का गमछा डाले, मंत्रीजी उतरे. वे किसी फिल्मी नेता से कम नहीं लग रहे थे. आते ही अफसरों और उन के पार्टी के नेताओं ने उन्हें घेर लिया और फूलमालाओं से इस कदर लाद दिया था कि चेहरे के अलावा और कुछ नजर नहीं आ रहा था. मंत्रीजी धीरेधीरे हाथ जोड़े मंच की ओर बढ़ रहे थे. पीछेपीछे स्थानीय नेता, पार्टी कार्यकर्ता, चेले और चमचे जोरजोर से नारे लगाते चल रहे थे, ‘जग्गू भैया जिंदाबाद. विकास पार्टी जिंदाबाद. अपना नेता कैसा हो, जग्गू भैया जैसा हो…’
मंच पर मंत्रीजी के लिए खास कुरसी मंगवाई गई थी, जिसे मंच के बीचोंबीच लगवाया गया था. मंत्रीजी सब का अभिवादन कर कुरसी पर बैठ गए. उन के दाएं तरफ ब्लौक प्रमुख, भूतपूर्व विधायक और फिर जिला स्तर के नेता बैठे थे. बाएं तरफ कमिश्नर, डीएम, चीफ इंजीनियर और बाकी ऊंचे सरकारी अफसर बैठे थे.
किंतु इस विधानसभा क्षेत्र के वर्तमान विधायक के लिए कुरसी, जो कि विपक्षी पार्टी लोक शक्ति से थे, मंच के एक कोने पर लगाई थी. विधायक अपनी कुरसी मंच एक कोने में देख कर भड़क उठे. इस क्षेत्र के वर्तमान विधायक की हैसियत से उन्हें उम्मीद थी कि उन की कुरसी भी मंच के बीच में मंत्रीजी के साथ लगाई जाएगी. इस को ले कर वे अफसरों से उलझ गए, पर कोई उन की बात सुनने को राजी नहीं था.
विरोध में वे मंच से नीचे उतर कर पंडाल में अपने कार्यकर्ताओं के साथ पीछे खड़े हो गए. पार्टी कार्यकर्ता उन के समर्थन में सरकार के खिलाफ ‘हायहाय’ के नारे लगाने लगे. बड़ी मुश्किल से उन्हें चुप कराया गया.
जल निगम के चीफ इंजीनियर उठे और माइक पर जन समूह की ओर मुखातिब हो कर बोले, ‘‘भइयो और बहनो, जिस घड़ी का आप को बेसब्री इंतजार था वह आ गई है. माननीय मंत्रीजी के अथक प्रयास से आप के गांव तक पानी का नल आ गया है. मैं माननीय मंत्रीजी से अनुरोध करूंगा कि वे अपने हाथों से इस योजना का शुभारंभ करें.’’ सरकारी अफसर और पार्टी पदाधिकारी मंत्रीजी की अगवानी करते हुए उन्हें नल के पास ले गए. पूरे नल पोस्ट को फूलमालाओं से दुलहन की तरह सजाया गया था.
नल की पीतल की टोंटी सूरज की किरणों में सुनहरी रोशनी बिखेर रही थी. पास ही मेज पर करीने से मेजपोश बिछा कर उस पर एक तांबे का चमचमाता जग, गिलास और एक बड़े से टोकरे में बेसन के लड्डू रखे थे. मंत्रीजी ने नल की टोंटी घुमा कर जग में पानी भरा और लड्डू के साथ एक गिलास पानी पीने के लिए देवकी को दिया. पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. मंत्रीजी वापस मंच पर बैठ गए.
चीफ इंजीनियर ने फिर से मंत्रीजी से अनुरोध किया कि वे गांव वालों को आशीर्वाद के रूप में दो शब्द कहें. साथ ही उद्घोषणा की गई कि इस शुभारंभ की खुशी में सभी लोग लड्डू और नल का पानी ग्रहण करें. सभी लोगों को बारीबारी से एकएक लड्डू और पीने के लिए पानी दिया जाने लगा. इस बीच नल की टोंटी खुली रही. लोग पीने के साथ साथ हाथ मुंह भी धोने लगे.
मंत्रीजी उबासी लेते हुए उठे. कुरते की सिलवटें ठीक की और धीरेधीरे माइक की तरफ बढ़े. एक नजर जन समूह पर डाली, फिर हाथ जोड़ कर सब का अभिवादन किया और बोलना शुरू किया, ‘‘भाइयो और बहनो, 70 सालों में पिछली सरकारें जो नहीं कर पाईं, वह हमारी सरकार ने कर दिखाया. ऐसे दुर्गम क्षेत्र में भी हम ने घरघर नल पहुंचा दिया. ‘‘आज हमारे लिए बड़े सौभाग्य और खुशी का दिन है. ‘हर घर जल, हर घर नल’ का सपना अब पूरा हुआ. अब गांव वालों को खासकर औरतों, बच्चों और बूढ़ों को, पानी के लिए कोसों दूर नहीं जाना पड़ेगा. ‘‘भाइयो और बहनो, अगर आने वाले चुनाव में इस बार आप लोगों ने इस क्षेत्र से विकास पार्टी को भरी वोटों से जिताया, तो इसी तरह और भी बहुत सारी योजनाएं इस गांव के लिए लाऊंगा. आप का गांव प्रदेश में एक आदर्श और उत्कृष्ट गांव बन जाएगा.’’ लोगों का ध्यान भाषण स ज्यादा लड्डू पर था. लोग लड्डू पाने की उम्मीद में धक्कामुक्की करने लगे. 2-3 आदमी भीड़ को कंट्रोल करने में लगे थे. लोग आतेजाते मुंहहाथ धोते, गिलास में पानी लेते और लड्डू खाते हुए निकल जाते.
लेकिन यह क्या… अभी तकरीबन आधे लोग ही पानी के साथ लड्डू खा पाए होंगे कि अचानक नल से पानी आना बंद हो गया. मंत्रीजी ने घूर कर चीफ इंजीनियर की तरफ देखा मानो कह रहे हों, यह क्या बदतमीजी है. चीफ इंजीनियर ने इशारे से सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर को बुलाया और कान में कुछ फुसफुसाया. सुपरिटैंडिंग इंजीनियर खड़े हुए और भीड़ को संबोधित करते हुए बोले, ‘‘आप सभी सब्र से काम लें. असल में पंपहाउस में बिजली चली गई है, इसलिए कुछ देर के लिए पानी रुक गया है. बिजली आते ही पानी आना शुरू हो जाएगा.’’ उधर एग्जीक्यूटिव इंजीनियर डर और घबराहट के मारे पसीनेपसीने हुए जा रहा था. वह जल्दी से मंच से नीचे उतरा और जूनियर इंजीनियर को फोन किया, ‘‘अबे, मरवाओगे क्या… पानी क्यों बंद हो गया?’’ ‘‘सर, जहां से पानी पंप कर रहे हैं, वहां गाड़ी नहीं जा सकती. बड़ी मुश्किल से 500 लिटर का पानी का टैंक लोगों से भरवाया था. उस से ही हम पाइपलाइन में पानी पंप कर रहे थे.
लोगों ने टोंटी शायद खुली छोड़ दी होगी, इसलिए पानी अब खत्म हो गया है. अगर आप कहें फिर पानी भरवा दें. बहुत जल्दी भी करें तो करीब एक घंटा लग जाएगा.’’ ‘‘बेवकूफ… तुम्हारे बस का कुछ नहीं है. मैं असिस्टैंट इंजीनियर को भेज रहा हूं. उन का ही यह आइडिया था.’’ ‘‘आप का ही यह सुपर आइडिया था न? जाओ अब मुंह क्या ताक रहे हो… जा कर कुछ करो.’’ असिस्टैंट इंजीनियर चुपचाप उठा और चल दिया. आधा घंटा बीत गया पर पानी नहीं आया. लोगों के सब्र का बांध अब टूट चुका था. लोग हल्ला मचाने लगे. विपक्षी पार्टी के विधायक, नेता और पार्टी कार्यकर्ता ऐसे ही मौके की तलाश में थे. उन्होंने पीछे से ‘जग्गू भैया, हायहाय, विकास पार्टी मुरदाबाद’ के नारे लगाने शुरू कर दिए. विपक्षी पार्टी का विधायक जोरजोर से भाषण देने लगा, ‘‘भाइयो, मैं पहले ही कहता था न कि यह सरकार जनता के साथ धोखधड़ी कर ही है.
यह पानी का नल बस दिखावा है. देखो, आधे घंटे में ही पानी बंद हो गया न. अब ऐसी पार्टी को आने वाले चुनाव में फिर से बाहर का रास्ता दिखाना है…’’ भीड़ में सब लोग इन के स्वर में स्वर मिला कर ‘हाय… हाय…’ करने लगे. देखते ही देखते भीड़ कंट्रोल से बाहर हो गई. मंत्री, चीफ इंजीनियर, कमिश्नर, डीएम ने भीड़ को शांत कराने की कोशिश की, पर नाकाम रहे. अब भीड़ भी विपक्षी पार्टी के भड़कावे में आ कर गालीगलौज पर उतर आई. इतने में ही कुछ शरारती लोगों ने पीछे से सड़े टमाटर और आलू मंच की ओर फेंकने शुरू कर दिए. पुलिस जितना भीड़ को कंट्रोल करने की कोशिश करती, वह उतना ही भड़काऊ होती जा रही थी. टमाटर और आलू के बाद लोगों ने अब टूटे जूते और चप्पलें उछालनी शुरू कर दीं.
एक जूता मंत्रीजी के सिर पर आ कर टकराया. फिर क्या था, मंत्रीजी की पार्टी के कार्यकर्ताओं का गुस्सा भी फूट पड़ा. पक्ष और विपक्ष पार्टी के लोग एकदूसरे पर टूट पड़े. पहले लातघूंसों से गुत्थमगुत्था हुए और फिर खूब लाठियां और डंडे चले.
भीड़ भी 2 खेमों में बंट गई, पक्ष और विपक्ष. जिस के हाथ जो लग रहा था उसे ले कर एकदूसरे पर बरसाने लगते. करीब एक घंटे तक यह सब चलता रहा. आखिर में हालात को बेकाबू होता देख कर डीएम ने लाठीचार्ज का आदेश दिया. दंगाई भीड़ पुलिस को लाठी भांजते देख कर चुपचाप गायब हो गई. रह गए तो बस सीधेसादे गांव वाले, औरतें, बच्चे और बूढ़े. उन्हें पुलिस ने दौड़ादौड़ा कर खूब पीटा. मंत्रीजी को अफसर और पुलिस वाले चुपके से मंच के पीछे से दंगा होने से पहले ही खिसका कर ले गए और वे गाड़ी के काफिले के साथ राजधानी की तरफ रवाना हो चुके थे. दूसरे दिन के सभी लोकल और बड़े अखबारों की हैडलाइन थी कि ‘जल मंत्री के उद्घाटन समारोह में दंगा : 2 मारे गए ओर 10 गंभीर रूप से घायल’. सभी टीवी चैनल्स की भी ये ब्रेकिंग न्यूज थी. एंकर चिल्लाचिल्ला कर इस घटना को मिर्चमसाला लगा कर परोस रहे थे. सोशल मीडिया प्लेटफार्म भी इस घटना से भरे पड़े थे.
मंत्रीजी यह खबर देखते ही बौखला गए. तुरंत जल विभाग, बिजली विभाग और पुलिस विभाग के बड़े अफसरों को अपने औफिस में तलब किया. शाम तक सभी विभागों के अफसर मंत्री के औफिस में हाजिर हो गए थे. आधी रात तक मैराथन मीटिंग चली. पूरे समय सभी विभाग के अफसर एकदूसरे पर बस आरोप लगाते रहे, पर असली वजह का कुछ भी पता नहीं चला. अब चूंकि कुछ तो एक्शन लेना ही था यानी किसी को तो बलि का बकरा बनाना ही था. तय हुआ कि जल विभाग और बिजली विभाग के जूनियर इंजीनियर और उस इलाके के दारोगा को तुरंत सस्पैंड किया जाए. लाइनमैन और पंप आपरेटर को नौकरी से बरखास्त कर दिया जाए, क्योंकि ये दोनों कौन्ट्रैक्ट पर थे. संबंधित एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर और डीएसपी को कारण बताओ नोटिस दिया जाए. उस जिले के डीएम को आदेश दिया गया
कि घटना की निष्पक्ष जांच कर के एक महीने में रिपोर्ट दे.
विपक्षी दलों खासकर लोक शक्ति पार्टी ने इसे चुनावी मुद्दा बना कर सरकार के खिलाफ मोरचा खोल दिया. जल मंत्री पर इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने के लिए दबाव बनाने लगे. उधर सरकार और जल मंत्री ने इस घटना की पूरी जिम्मेदारी लोक शक्ति पार्टी के विधायक पर थोप दी.
सरकार का आरोप था कि लोक शक्ति पार्टी के विधायक और नेताओं ने ही लोगों को उपद्रव करने के लिए उकसाया, पर पक्के सुबूतों की कमी में अभी तक गिरफ्तारी नहीं हुई थी. वैसे भी कहीं इस का चुनाव पर उलटा असर न पड़ जाए, यह सोच कर कुछ समय के लिए टाल दिया गया. हर चुनावी सभा में इस मुद्दे पर दोनों पार्टियां ने एकदूसरे पर खूब कीचड़ उछाला. चुनाव में सब से ज्यादा सीटें विकास पार्टी को ही मिली थीं और उस ने जोड़तोड़ कर किसी तरह फिर से सरकार बना ली, पर इस घटना की वजह से उसे इस विधानसभा क्षेत्र से फिर से हार का सामना करना पड़ा.
मंत्रीजी के मीटिंग से वापस आते ही, अफसरों ने पहला काम दोनों जूनियर इंजीनियर और इलाके के दारोगा को सस्पैंड करने और लाइनमैन और पंप आपरेटर को बरखास्त करने का किया, क्योंकि यही काम सब से आसान था. जल विभाग के जूनियर इंजीनियर और दारोगा को तो इस की उम्मीद ही थी इसलिए उन्होंने चुपचाप सस्पैंशन लैटर ले लिया. पर बिजली विभाग के जूनियर इंजीनियर के लिए यह आदेश हैरान कर देने वाला था, इसलिए वह मिमियाने लगा, ‘‘सर, यह क्या… मुझे सस्पैंशन लैटर क्यों दिया जा रहा है? आखिर मेरा कुसूर क्या है?’’
‘‘जल विभाग का कहना कि जब मंत्रीजी नल का उद्घाटन कर रहे थे तो तुम ने उस इलाके की बिजली काट दी जिस से पानी का पंप चलना बंद हो गया और नल में पानी आना भी बंद हो गया,’’ सस्पैंशन लैटर देने वाले अफसर ने समझाया.
‘‘नहीं सर, यह एकदम झूठ है. आप इलाके में किसी से भी पूछ सकते हैं. उस समय कोई बिजली कटौती नहीं की गई थी,’’ जूनियर इंजीनियर ने बताया.
‘‘देखो भई, यह सच है या झूठ, यह तो इन्कवायरी के बाद ही पता चलेगा. ऊपर से आदेश है तो हमें पालन करना ही पड़ेगा. वैसे भी सस्पैंशन से कोई नौकरी थोड़े ही जा रही है… 2-3 महीने घर पर आराम करो, फिर सस्पैंशन वापस ले लेंगे, वह भी बैक डेट से और सारी सैलरी भी मिल जाएगी एरियर के साथ,’’ अफसर ने जूनियर इंजीनियर को दिलासा देते हुए कहा. बरखास्तगी का आदेश सुन कर लाइनमैन और पंप आपरेटर भी हाथ जोड़ के गिड़गिड़ाने लगे, ‘साहब, नौकरी से मत निकालिए. बड़ी मुश्किल से जुगाड़ लगा कर यह नौकरी मिली थी.’ ‘‘तुम्हारा दर्द हम समझते है भाई, पर क्या करें, मजबूर हैं. ऊपर से ऐसा ही आदेश है. अभी जाओ. तुम लोगों के बारे में भी कुछ सोचेंगे,’’ अफसर ने दोनों को समझाते हुए घर वापस भेज दिया. जब से पता चला कि डीएम को घटना की जांच के आदेश दिए गए हैं, जल, बिजली और पुलिस विभाग के बड़े अफसर डीएम के इर्दगिर्द चक्कर काटने लगे ताकि जांच की आंच उन तक न आ पाए.
यहां तक कि जल निगम के सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर ने तो बर्थडे के बहाने अपने घर पर पार्टी का इंतजाम भी तक कर डाला. इस में डीएम और बाकी बड़े अफसरों को भी बुलाया गया. सब लोग डीएम से मिन्नतें करने लगे कि वे जांच की गोलमोल रिपोर्ट बनाएं, ताकि किसी बड़े अफसर पर गाज न गिरे. भला डीएम भी नमक खा कर नमकहलाली कैसे करता. उस ने जानबूझ कर रिपोर्ट सौंपने में देरी की, ताकि तक लोग इस घटना के बारे में भूल जाएं. अब तक टीवी चैनल और सोशल मीडिया भी ठंडे पड़ चुके थे. डीएम ने पूरी घटना की जिम्मेदारी विपक्षी लोक शक्ति पार्टी के विधायक और नेताओं पर डाल दी और बाकी विभागों की भूमिका न के बराबर बताई. रिपोर्ट भी तय समय एक महीने के बजाय 3 महीने में इस टिप्पणी के साथ भेजी गई कि ‘प्राकृतिक आपदा के काम में व्यस्तता की वजह से समय नहीं मिला’. रिपोर्ट जल विभाग के सचिवालय में कई महीनों तक यों ही ठंडे बस्ते में पड़ी रही. खानापूरी हो गई थी बस, अब किसी को इस से कोई मतलब न था. इस तरह और 6 महीने कट गए.
इस बीच गांव वालों ने इस घटना पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं होने पर आवाज उठानी शुरू कर दी. विपक्षी दलों को भी सरकार को घेरने का अच्छा मुद्दा मिल गया और उन के नेताओं ने तो आग में घी काम किया. मुद्दा एक बार फिर से गरमा गया. आननफानन में सरकार को रिपोर्ट सार्वजनिक करनी पड़ी.
रिपोर्ट पढ़ कर विपक्षी दल खासकर ‘लोक शक्ति पार्टी’ के नेता और कार्यकर्ता भड़क उठे. वे उस इलाके के गांव वालों को ले कर सड़कों पर उतर आए. उन का कहना था कि रिपोर्ट झूठी है. सरकार घटना की सीबीआई से जांच करवाए. जल निगम के सभी कुसूरवार अफसरों को बरखास्त कर उन पर मुकदमा चलाया जाए और जल मंत्री तुरंत इस्तीफा दे. फिर से यह मुद्दा देशप्रदेश में सुर्खियों में छाने लगा. प्रदेश के दूसरे हिस्सों से भी लोग इस आंदोलन में जुड़ने लगे. पानी सिर के ऊपर से गुजरता देख कर, सरकार ने इस घटना की जांच के लिए हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जस्टिस की अध्यक्षता में एक हाई लैवल कमेटी बना दी, जिस को 6 महीने में अपनी रिपोर्ट देनी थी.
वैसे, विपक्षी दल सीबीआई से जांच की मांग पर अड़े हुए थे. इस घटना को बीते पूरे 2 साल हो चुके थे. कुसूरवार लोगों पर कार्रवाई तो दूर अभी तक हाई लैवल कमेटी की जांच रिपोर्ट भी सार्वजनिक नहीं हुई थी. गांव वाले जब भी जल निगम के अफसरों से पूछते है कि उन के घर पर लगे नल में पानी कब आएगा? तो उन का सपाट से जवाब होता है, ‘‘अभी जांच चल रही है. जब जांच पूरी हो जाएगी तब पानी भी आ जाएगा.’’ देवकी के आंगन में फिर से बड़ीबड़ी घास और झाडि़यां उग आई हैं. पीतल की टोंटी कोई खोल के ले गया, शायद जल निगम के मुलाजिम ही ले गए होंगे. नल का स्टैंड पोस्ट टूट चुका है. देवकी रोज सवेरे जमीन पर पड़े नल को इस उम्मीद से देखती है कि शायद कभी पानी आ जाए, फिर निराश हो कर गगरी लिए पानी की तलाश में दूर निकाल जाती है.
दिनेश चंद्र कबडाल



