Hindi Story: चाहत

Hindi Story: जमीन के लालच में चाहत के पति और पिता को उस के अपनों ने ही मार डाला. गोद में रह गया बेटा उदय, पर चाहत ने हिम्मत नहीं हारी और उदय को प्रौफेसर बना दिया. फिर वह अपने मायके लौटी. आगे क्या हुआ?

खे से लौट कर प्रेम शंकर ने अपने गले से गमछा हटाया और चबूतरे पर बैठ गए. बीड़ी सुलगा कर फूंक से धुआं हवा में उछाला. माथे के पसीने की बूंदों को पोंछते हुए और थकी आवाज में पुकार लगाई, ‘‘चाहत की अम्मांअभी तक मेहमान गांव से नहीं लौटे हैं क्या?’’ सवाल पूछ कर वे बेचैनी से चारों तरफ टहलने लगे. चाहत की मां राजौरी हड़बड़ाती हुई बाहर निकल आई. चाहत भी पीछे से अपने बेटे उदय को गोद में ले कर गई. ‘‘इतनी जल्दी आप गए? कुछ हुआ है क्या? कभी सोहन के बारे में नहीं पूछतेआज?’’ राजौरी की सांसें फूलने लगीं. प्रेम शंकर उस का हाथ पकड़ कर बोले, ‘‘अरे, शांत हो जा राजौरी. मैं ने बस इतना पूछ लिया कि शाम हो गई और अभी तक नहीं लौटे.’’ राजौरी की घबराहट कुछ कम हुई, फिर अपने पति के लिए पानी लाने चली गई.

राजौरी पानी का लोटा और कटोरी में थोड़ा सा गुड़ ले कर आई और प्रेम शंकर को पकड़ाया. वे उठ कर आंगन में नली के पास जा कर कुल्ला करने लगे, फिर चबूतरे पर बैठ गए. गुड़ खा कर पानी पिया. थोड़ी तरावट महसूस हुई. आज मौसम में खुश्की थी. नीम और पकड़ी के पेड़ की पत्तियां भी हिलने से मना कर रही थीं. ‘‘चाहत की मां, हम आते हैं दालान से घूम कर,’’ प्रेम शंकर की आवाज में सुस्ती थी.
‘‘कोई बात है क्या चाहत के बापू? कुछ तो है जो हम सब से छिपा रहे हैं?’’
प्रेम शंकर ने अपनी गरदन को एक ?ाटका दिया और हौले से मुसकरा कर बोले, ‘‘कुछ नहीं है. उमस के मारे दम निकल रहा है और धान रोपनी का समय हो रहा है. बहुत काम है, इसी मारे चिंता लगी हुई है.’’
प्रेम शंकर असल बात राजौरी को बता नहीं पाए. दरअसल, जब वे रास्ते में सुरेश से मिल कर रहे थे, तो एक बात पता चली थी उन्हें. मारे घबराहट के उन को पसीना आने लगा था.

इस गांव की रीत है कि जायदाद अपने बेटे को ही देनी होती है. अगर बेटा नहीं है तो भतीजे को. बेटियों को जायदाद का एक हिस्सा भी नहीं दिया जा सकता है. प्रेम शंकर को एक ही बेटी है चाहत. वह छोटी थी तब प्रेम शंकर सोचते थे कि खेतखलिहान भतीजे को दे देंगे, पर बाद के दिनों में भाईभतीजे के रंगढंग ठीक नहीं लगने से उन का मन बदल गया था. चाहत की शादी राजौरी की बहन की ननद के बेटे रोहन से हुई थी, जिस के सिर से मांबाप का साया उठ गया था. हालांकि, गांव में अफवाह है कि चाहत और सोहन के बीच प्रेम था. बातों को दबाने के लिए उन दोनों की शादी करा दी गई. प्रेम शंकर ने सोहन और चाहत के नाम सारी जायदाद लिख दी. पूरे कुनबे में यह बात आग की तरह फैल गई. सब तिलमिलाहट से भर गए. सब के सब प्रेम शंकर और उन के परिवार से कट कर रहने लगे, पर प्रेम शंकर और उन के दामाद सोहन को गांव के लोग बहुत प्यार और इज्जत देते थे.

आज जो बात सुरेश ने बताई, उस के लिए प्रेम शंकर कभी सोच भी नहीं सकते थे. इतनी नीचता पर कैसे उतर सकते थे मथुरा भैया और भतीजे. ‘‘प्रेम शंकर, जरा बच कर रहना अपने भाईभतीजे से. उन लोगों ने प्लानिंग की है कि सोहन को जान से मार देंगे और उदय को भी.’’इतना सुनते ही प्रेम शंकर अचानक खांसने लगे थे. उन की छाती में कुछ अटका हुआ महसूस हो रहा था. उन की बेचैनी बढ़ गई थी. आखिर वे करें तो क्या करें? क्या प्रेम शंकर को पुलिस के पास जाना चाहिए? क्या यह बात सच हो सकती है? उन्होंने तय किया कि कल सुबह वे थाने में जा कर शिकायत दर्ज करा आएंगे. अपनी खुशियों को इस तरह दूसरों की हथेलियों में बंद नहीं होने देंगे. अजीब सा खालीपन चारों तरफ पसर गया था. परिंदे भी अपने अपने घोंसलों की ओर जा रहे थे, पर प्रेम शंकर को वापस घर जाने का मन नहीं हुआ.

हलका अंधेरा गहरा आया था. प्रेम शंकर धीमे कदमों से घर की ओर कर खेत की ओर चले गए. जिंदगी किस करवट लेगी, इस सोच ने उन का मन उथलपुथल से भर दिया. एक ऐसा समय भी था, जब प्रेम शंकर सिंह और उन के परिवार की जिंदगी आराम से कट रही थी. एक तरह का आनंद था उन के घर के चारों ओर. चाहत की नौकरी शिक्षामित्र में लग गई थी और सोहन भी पास के गांव में सरकारी टीचर हो गया था. उदय के पैदा होने के बाद तो प्रेम शंकर के घर में हर दिन उत्सव जैसा माहौल रहता था. फिलहाल प्रेम शंकर टहलतेटहलते कुछ दूर आगे अपने खेत के आसपास निकल आए. अचानक उन्हें कुछ आवाज सुनाई दी. पीछे मुड़ कर देखा. उन की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. दुश्मन के रूप में उन के भाईभतीजे हाथ में गंडासा लिए खड़े थे. अभी प्रेम शंकर संभल पाते कि उन पर हमला शुरू हो गया. उन के मुंह को अपने हाथों से दबाए उन का एक भतीजा कह रहा था, ‘‘बहुत मर्दानगी छाई है . अब सब भुला जाओगे. हमारे रहते तू सोहन को मालिक बना देगा, ले अब भुगत.’’

गंडासे से प्रेम शंकर का सिर काट कर उन्हीं के सगे भाई नेजय भवानीके नारे से जीत का जश्न मनाया.
अचानक राजौरी का दिल जोर से धड़का. कुछ अपशकुन होने का सोच कर उस की आंखों में आंसू गए. दिल रहरह कर धड़क रहा था. पैर भी लड़खड़ा रहे थे. अपने अंदर कुछ रेंगता हुआ महसूस हुआ. मन बेचैन हुआ तो उदय को ले कर पड़ोस में चली गई. चाहत स्कूल की कौपियां जांचने बैठ गई. उस के चेहरे पर संतोष की चमक थी. तभी सोहन की आवाज सुनाई दी, ‘‘चाहत, एक लोटा पानी देना.’’ पानी और गुड़ लिए जब चाहत बाहर आई तो सोहन के हाथों को पकड़े हुए चाचा और भैया लोग को देखा. एक अनजाने डर से उस का मन कांप गया. उन के हाथों में कुल्हाड़ी और गंडासा था. चाहत दौड़ कर चाचा के पैरों से लिपट गई, ‘‘सोहन को कुछ मत करिए मथुरा चाचाजी.’’ ‘‘यहां से हट चाहत. आज प्रेम के खानदान को खत्म कर देंगे. बहुते गरमी चढ़ी है शरीर में.’’


‘‘चाचाजी, हम आप की गोद में खेले हैं. हमारा सुहाग मत उजाडि़ए. रजनीश भैया, धीरज भैया, छोड़ दीजिए सोहन को. हम सब जायदाद आप के नाम कर देंगे. इस गांव से हम सब बाहर चले जाएंगे. सोहन को कुछ मत करिए चाचाजी.’’ चाहत की दर्दभरी आवाज को अनदेखा कर धीरज ने कहा, ‘‘चल हट, ज्यादा अंगरेजी मत ?ाड़. आज हमारी आंखों में खून उतर आया है.’’ ‘‘अरी अम्मां, कहां गई रेजल्दी आओ अम्मां, वरना सोहन को ये लोग मार देंगे. अरे गांव के लोग, आओ बचाओ इन को. सब कहां चले गए हो? कोई तो इन कसाइयों सब को रोको,’’ चाहत की कातर आवाज चारों तरफ गूंजने लगी.
तभी कुल्हाड़ी और गंडासे से सोहन के पूरे शरीर पर वार होने लगे. चाहत की आंखों के सामने सोहन मर रहा था. उस की दर्दभरी आवाज से पूरा गांव रो रहा था, पर दुश्मन की आंखों पर जायदाद की पट्टी बंधी थी. राजौरी उदय को लिए घर की ओर रही थी कि तभी मुसहर टोले के परदेसी ने उदय को उन की गोद से ले लिया और रोते हुए बोला, ‘‘जल्दी घर जाओ मालकिन. प्रेम मालिक और सोहन बबुआ की जान…’’

राजौरी वहीं से चिल्लाते हुए घर की तरफ भागी आई, ‘‘चाहत के बाबू, जल्दी आओहमारा घर उजड़ गया है…’’ घर के पास कर राजौरी की आंखें फटी की फटी रह गईं. सोहन का शरीर कई टुकड़ों में इधरउधर फैला हुआ था. पास ही चाहत बेहोश पड़ी हुई थी. दुश्मन वहां से खूनी खेल खेल कर चले गए थे.
राजौरी प्रेम शंकर की खोज में खेत की तरफ गई. देखा गांव के लोग प्रेम शंकर की लाश लिए चले रहे
थे. इस सदमे से राजौरी का वहीं दम निकल गया. चाहत को गांव की औरतें पानी का छींटा दे कर होश में लाने की कोशिश कर रही थीं. होश आते ही वहसोहनसोहनचिल्लाने लगती थी और फिर बेहोश हो जाती थी. रात को पुलिस की गाडि़यां आईं. गांव के लोगों आंखों देखा सब बयान कर दिए. चाहत का भी बयान लिया गया. 3 लाशों का एकसाथ दाह संस्कार किया गया. श्मशान घाट पर धूंधूं कर चिताएं जल रही थीं. तेज हवा से लपटें कांप उठती थीं. पूरे गांव में मातमी सन्नाटा पसरा हुआ था. सब एकदूसरे से आंखें चुरा रहे थे. पुलिस मथुरा और उस के बेटों को खोजने में लगी हुई थी.

उस रात खौफ से पूरा गांव थर्रा गया था. चाहत को जब होश आया तब उदय का खयाल आया. मुसहर टोले के विशंभर ने बताया कि परदेसी बाबा उस को गांव से बाहर ले गए हैं. सुनने में आया है कि उदय बाबू को भी मारने की प्लानिंग है. ‘‘मु? ले चलो उदय के पास. पता नहीं वह कैसे रात में रहा होगा. एक दिन भी वह मेरे बगैर नहीं रहा है,’’ रोते हुए चाहत ने कहा. ‘‘उदय बाबू ठीक हैं बहन. परदेसी बाबा से बात हुई है. कल सुबह हम उदय को ले कर आएंगे.’चाहत के पास अब उदय बचा था. हिम्मत से काम लेना होगा उसे. उस ने सोचा कि गांव में रह कर इंसाफ की गुहार नहीं लगा सकती है और उदय को भी खतरे में नहीं डाल सकती है. रात के 10 बजे जब गांव के सारे लोग सो रहे थे, तब चाहत विशंभर के साथ अपनी मौसी के गांव चली आई. सुबह विशंभर उदय को परदेसी से ले कर चाहत के पास आया. आंसुओं पर बंधा हुआ बांध अचानक से टूट गया. उदय को गोद में ले कर चाहत फूटफूट कर रोने लगी.

उस का मन किया कि उदय को अपने सीने में छिपा ले. जिसे कोई देख पाए, जिसे कोई छू पाए.
मथुरा और उस के बेटे को पुलिस खोज नहीं पा रही थी. तब कोर्ट के आदेश पर उस के घर का कुर्की जब्ती का वारंट आया. एक दिन के बाद मथुरा और उस के बेटों ने पुलिस के हवाले कर दिया. ताउम्र कैद की सजा हुई. चाहत गांव लौट कर नहीं आई. उस ने अपना घर परदेसी बाबा के नाम कर दिया. खेतखलिहान उन लोगों को बेच दिया, जिन्होंने पुलिस के सामने मथुरा और उस के बेटों के खिलाफ गवाही
दी थी. दिन गुजरने लगे, महीने बीतने लगे. दुखों का मौसम बहुत लंबा होता है. इन बीते सालों में चाहत ज्यादातर चुप ही रहती थी. आंखें सूनी रहती थीं. वह कहीं भी आनाजाना छोड़ चुकी थी. उस का सपना बेटे को ऊंचाई पर देखना था. उदय 7 साल का हो गया था. उस पर वक्त के पहले ही गंभीरता गई थी. उस का सारा समय मां के साथ और पढ़ाई में गुजरता था.


एक दिन उदय ने पूछा, ‘‘मां, मेरे पिताजी कहां हैं? सभी के पिता उन के साथ रहते हैं, मेरे पिता तो कभी मु? देखने भी नहीं आते हैं.’’ चाहत बेबसी से मुसकराई. कुरसी से उठ कर उदय को सीने से लगा कर बोली, ‘‘तुम्हारे पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं बेटा. उन की मौत हो गई है.’’ ‘‘कैसे मौत हो गई मां?’’ उदय ने हैरान हो कर पूछा. ‘‘इस बारे में मैं कभी बाद में बताऊंगी, तब जब तुम बड़े और सम?ाने लायक हो जाओगे,’’ कहते हुए चाहत ने अपनी मुट्ठियों को कस कर बांध लिया. चाहत भरसक कोशिश करती कि उदय को कोई तकलीफ हो. वह मां और पिता दोनों की भूमिका निभा रही थी. कभी भी उदय के सामने उदास नहीं रहती और कभी गुस्सा होती. एक दिन स्कूल की जल्दी छुट्टी हो गई. उदय घर आया तो मां को एक साड़ी को हाथों से सहलाते हुए देखा. उस को देख कर मां बक्से में उस साड़ी को रखने लगी.
‘‘मां, यह क्या रख रही हो? मु? दिखाओ,’’ उदय जिज्ञासा से पूछा.

‘‘कुछ नहीं रख रही. जाओ हाथमुंह धो लो. खाना साथ खाएंगे,’’ कहते हुए चाहत ने जल्दी से उस साड़ी को बक्से में रख दिया. ‘‘बताओ मां, क्या छिपा रही हो?’’ उदय ने जिद पकड़ ली. ‘‘अभी नहीं बेटा, अभी तुम सम?ाने लायक नहीं हो. बाद में इस बारे में बताऊंगी,’’ चाहत अपने सूखे होंठों पर जीभ फेर कर रसोईघर में चली गई. दिन बीतते रहे. उदय ने 10वीं के बोर्ड इम्तिहान में जिले में टौप किया था. पूरे गांव में उत्सव का माहौल था. चाहत सुबह से ही मिलनेमिलाने में बिजी थी. सभी की जबान पर एक ही बात थी कि बिना बाप का बेटा है, इस को हर क्षेत्र में कामयाबी मिले. रात के 10 बज रहे थे. उदय की नींद खुली. मां को अपने पलंग पर देख कर वह उसे खोजने लगा. स्टोररूम का दरवाजा खुला हुआ था. अंदर गया तो देखा कि मां साड़ी को गोद में ले कर बैठी हुई है. आहट सुन कर चाहत ने ?ाट से वह साड़ी बक्से में रख दी. ‘‘मां , इस साड़ी में ऐसी क्या बात हैआप जबतब इस को ले कर चूमती रहती हैं…’’


‘‘अभी नहीं बता सकती. बाद में बताऊंगी. जब मु? लगेगा कि तुम को बताना चाहिए,’’ चाहत की बातों में
इतनी मजबूती थी कि उदय कुछ नहीं पूछ सका. इस के बाद भी उदय ने कई बार अपनी मां को उस साड़ी के साथ तड़पते देखा, लेकिन फिर कुछ पूछने की हिम्मत नहीं कर सका. उदय को ऊंची तालीम हासिल करने के लिए चाहत ने उस को दिल्ली के एक होस्टल में भेज दिया. समय पंख लगा कर उड़ रहा था. उदय हरेक इम्तिहान में टौप करता गया. हर बार चाहत का सिर गर्व से ऊपर उठ जाता था. अब वह फिर से मुसकराने लगी थी. गांव के गरीब बच्चों और अनपढ़ औरतों को पढ़ाना उस का मकसद हो गया था.
आखिरकार ख्वाबों को मंजिल मिल गई. चाहत की इच्छा और उदय की मेहनत रंग लाई. उदय बनारस
हिंदू यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर बन गया. एक चमकीली उम्मीद चाहत के आंचल में समा गई. वह सुनहरे भविष्य घोंसला बनाने के लिए फिर से उम्मीदों के तिनके जुटाने लगी.

उस के पैरों में पंख लग गए. अब तक का रोका हुआ बांध ढहने लगा. चाहत उदय के कंधे पर सिर रख कर फूट पड़ी, ‘‘आज मेरा जीवन सफल हो गया उदय. तुम्हारे नानानानी और पिता जहां भी होंगे, खुशी का जश्न मना रहे होंगे.’’ रात में वह साड़ी निकाल कर चाहत उदय के पास बैठ गई, ‘‘जो जिज्ञासा तुम्हारे अंदर बचपन से है, अब उस साड़ी और तुम्हारे पिता के बारे में बताने का समय गया है उदय.’’ चाहत ने गहरी सांस ली, ‘‘तुम्हारे पिता, नाना और नानी को उन के अपनों ने ही मारा, जायदाद के लिए. आज भी मैं उस जायदाद को कोसती हूं, जिस के चलते हमारा पूरा परिवार बेमौत मारा गया.’’ बीते हुए दिनों को बताते हुए चाहत उसी दुख से गुजर रही थी, जिसे याद कर के वह सालों से रोती रही है. कहा जाता है कि दुख बांटने से दुख कम होता हैपता नहीं कितना कम हुआ. पर चाहत के चेहरे पर शांति छा गई थी.
उदय सन्नाटे में था. अचानक वह चौंक कर उठा और बोला, ‘‘मां, चलो नाना के गांव. मैं देखना चाहता हूं उस गांव को मेरे मेरे पिता की मौत हुई थी.’’


दूसरे दिन चाहत उदय को ले कर उस गांव में गई, जहां उस का सारा संसार उजड़ गया था. चाहत और उदय के साथ गाड़ी में उदय का मामा विशंभर भी बैठा था. उस की आंखें बारबार नम हो जा रही थीं.
चाहत गाड़ी से उतरी. परदेसी का बेटा उस को देखते ही खुशी से चिल्ला उठा, ‘‘हम सब की चाहत बहन गई.’’ आवाज सुन कर गांव के लोग इकट्ठा होने लगे. विशंभर के साथ उदय भी गाड़ी से उतरा.
उदय ने सब को प्रणाम किया. विशंभर ने सब को बताया कि यह चाहत का बेटा उदय है और बनारस के कालेज में पढ़ाता है. सब की जबान पर एक ही बात थी, ‘हम सब के उदय बबुआ गए हमारे गांव…’
चाहत के घाव पर जैसे कोई मरहम लग रहा था. उसी पल महसूस हुआ, जैसे हवा में एक खुशबू बिखर रही हैसोहन के देह की खुशबू. ‘‘कुरसी लाओ जरा, उदय बबुआ के बैठने के खातिर,’’ विशंभर उल्लास से बोला.


तभी परदेसी की पत्नी बनवारी हांफते हुए आई. उस के हाथों में गुड़ और पानी का लोटा देख कर चाहत को अपना वही दिन याद गया, जब सोहन को पानी देने गई थी और अपनी आंखों से दर्दनाक मौत देखी थी. धुंधली नजर से उस ने बनवारी काकी को देखा और उन के गले लग कर रोने लगी. ‘‘काकी का पैर छुओ उदय. परदेसी काका अगर नहीं होते तो आज तुम जिंदा नहीं रहते,’’ चाहत ने कहा. उदय पैर छूने के लिए ?ाका, तभी बनवारी काकी ने कांपते हाथों से उसे गले लगा लिया. ‘‘बबुआ, तेरी माई के साथ बहुत बुरा हुआ. हम ने अपनी आंखों से सब देखा, पर कुछ कर नहीं पाई. आज भी वही हालात हैं. कुछ नहीं बदला बीते सालों में. बेटियों का हिस्सा आज भी भाईभतीजा के पास जा रहा है,’’ बनवारी काकी ने कहा. उदय कुछ देर के लिए वहीं चबूतरे पर बैठ गया और हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘मु? कुरसी नहीं चाहिए और किसी तरह का स्वागतसत्कार. यह मेरे नाना का गांव है. आप सब मेरे अपने हैं.

मेरी एक छोटी सी चाहत है. आप चाहें तो इसे आशीर्वाद के रूप में मु? दे सकते हैंक्या आप लोग दीजिएगा?’’ उदय के बोलते ही पूरा गांव चिल्ला उठा, ‘मांगो बच्चा, हम सब से जो बन पड़ेगा, दे देंगे.’‘‘आज के बाद इस गांव की बेटियों को भी उन के हिस्से का हक देना होगा. जो मेरी मां के साथ हुआ, वह अब किसी बेटी के साथ हो. ‘‘आज बरसों बाद मेरी मां उसी साड़ी को पहन कर आई है, जिस साड़ी को पहने हुए अपने पति की लाश को गले लगाया था, चूमा था. देखिए, खून के छींटे अभी भी साड़ी पर लगे हुए हैं. क्या आप सब फिर ऐसी जिंदगी अपनी बेटियों के नाम लिखना चाहते हैं?’’ कहते हुए उदय की आंखों में आंसुओं का मानो समंदर उतर आया. इस माफी को किसी में ठुकराने की हिम्मत नहीं हुई. चाहत को लगा कोई अनजाना उस के पीछे खड़ा मुसकरा रहा है.                                 

कात्यायनी सिंह

  

Hindi Story: हरे राम मिश्रा राम सजीवन

Hindi Story: राम सजीवन यादव की अपने गांव में ज्यादा इज्जत नहीं थी. वह अवारागर्दी के चलते बदनाम हो रहा था, तो पढ़ाई करने बाहर चला गया. पर वहां भी वह सुधरा नहीं. कालेज में एक दिन ऐसा हुआ कि राम सजीवन की जिंदगी बदल गई. क्या हुआ था उस के साथ?

सियासी परिवार में जनमे 20 साल के नौजवान राम सजीवन यादव ने जब आजमगढ़ से इलाहबाद का रुख किया तो उस के जेहन में केवल 2 बातें थीं. पहला घर के बाहर वह मौजमस्ती करना जो यहां मुमकिन नहीं होता और दूसरा अपनी जातबिरादरी के लिए लिए काम करना. चूंकि उस के बाबा उलटफेर सिंह ने खपसी ग्राम पंचायत का मुखिया रहते सामाजिक और सियासी जमीन बना दी थी, इसलिए उस का प्लान बी यह था कि अगर इस ट्रैक पर नाकाम रहा तो भी, बाबा वाली जगह तो मिल ही जाएगी.

राम सजीवन यादव के पिता राम बक्स सिंह यादव इलाके के दूध के बड़े सप्लायर थे, इसलिए उन्हें पैसे की कमी नहीं हुई. हवेली जैसा घर, 2 बहनों के बीच एकलौता भाई और 5 बीघे की पुश्तैनी जोत का भावी मालिक बहुत ही बनठन कर रहता था और महंगी सिगरेट पीने का शौकीन था. राम सजीवन यादव को उस के बाबा गांव से इसलिए भी हटाना चाहते थे क्योंकि बगल की दलित बस्ती की 3 लड़कियों के साथ इस के गहरे रिश्ते थे. गांव में यह बात चर्चा आम हो गई थी, जिस का गांव के विरोधी लोग पंचायत चुनाव में इस्तेमाल कर सकते थे.

हालांकि, इलाके में उन के असर, उन की जातबिरादरी की दबंगई और मजबूत सामाजिक एकता के चलते गांव का कोई दलित, डोम, ब्राह्मण और राजपूत इस बाबत मुंह नहीं खोल सकता था, क्योंकि इस बिरादरी के लोग आएदिन किसी किसी निचली जाति वाले को पीटते और सताते रहते थे. खुद अपनी जवानी में उलटफेर सिंह इस के बड़े शौकीन थे. वे इसे मर्दानगी जिंदा रखने की कला से जोड़ते थे. वे कहते थे कि यह सब क्षत्रिय वंशियों के लिए आम बात है, जिस की चर्चा का कोई मतलब नहीं है. खपसी गांव में कुल 3 जातियां ही मुख्य थीं.

यादव 70 फीसदी से ज्यादा थे, फिर एससी और फिर ब्रह्माण थे. 4 घर राजपूतों के थे, लेकिन ज्यादातर की माली हैसियत गांव के एससी तबके से भी बुरी थी, इसलिए उन का कोई मतलब नहीं था. ब्राह्मण भी यादवों के यहां से मट्ठा ला कर भात खाते थे, इसलिए उन की और यादवों की कोई तुलना नहीं थी. यादवों का खेत बंटाई पर निचली जातियों के लोग जोतते थे. इस का डर भी इन समुदायों में बना रहता था. खैर, राम सजीवन यादव अपना बोरियाबिस्तर बांध कर इलाहबाद पहुंचा और कटरा महल्ले में किराए का कमरा एक हफ्ते में ही खोज कर शिफ्ट हो गया.

इस में उस के ही इलाके के एक क्रिमिनल ने मदद की थी, जिस के केंद्र में यह था कि जरूरत पड़ने पर इस कमरे को एक छिपने की जगह के तौर पर कभीकभार इस्तेमाल किया जाएगा. राम सजीवन यादव का मन कभी पढ़नेलिखने में नहीं लगा. वह यूनिवर्सिटी में जाता जरूर था, लेकिन घूमना और बकैती ही मुख्य काम था. इस तरह जल्द ही वह खलिहर मठाधीशों की मंडली का प्रिय बन गया. दिनभर राजनीति की बातें करता और शाम को बीयर का केन खाली कर के सो जाता. बाकी मन करने पर अपने गांव के कुछ हमउम्र लंपट टाइप लड़कों से फोन पर एससी तबके और ब्राह्मणों की बस्ती की कुछ लड़कियों और औरतों के नाजुक अंगों के साइज की चर्चा करता था और सिगरेट के कश लेता था.

मठाधीशों के बीच पिछले 3 महीने की जातिगत और सामाजिक सियासी चर्चा से राम सजीवन यादव इस नतीजे पर पहुंचा था कि आंदोलनवांदोलन कर के सियासत में कुछ नहीं कर सकता. नेता से पहचान और पूंजी ही टिकट की रेस में एंट्री देती है और बिना सदन में घुसे खुद का कोई विकास होगा और ही समाज का बदलाव होगा. पौलिटिक्स में प्रौफिटलौस स्टेटमैंट ही असली बात है. बाकी सब है, टाइमपास है. एक दिन यूनिवर्सिटी में लड़कों ने फीस बढ़ने के खिलाफ अचानक आंदोलन कर दिया. इस आंदोलन में राम सजीवन यादव को भी पुलिस ने इसलिए पकड़ लिया, क्योंकि वह वहां खड़े हो कर आंदोलन कर रहे लड़कों का भाषण सुन रहा था.

हालांकि, उस के लाख कहने के बावजूद पुलिस ने उन्हें नहीं छोड़ा और उन छात्रों के साथ राम सजीवन यादव का भी चालान कर जेल भेज दिया. इस तरह राम सजीवन यादव भी 7 दिन जेल में बंद रहा. इस के बाद, विपक्षी जनशक्ति पार्टी से जुड़े वकीलों ने इन सभी की जमानत कराई. जेल से लौटने के बाद उन सब को जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष की तरफ से मुलाकात के लिए बुलाया गया, जो उन की जातबिरादरी के ही थे. उन सब ने वहां पहुंचते ही अध्यक्ष के पैर छुए. चीफ ने उन सभी लड़कों के साथ राम सजीवन यादव की भी हौसला अफजाई की और माला पहनाई. विपक्ष के नेता से मिले इस सम्मान के चलते राम सजीवन को हाथोंहाथ लिया गया.

अब उस के लिए पार्टी अध्यक्ष का दरवाजा हमेशा के लिए खुल गया था और बिना रोकटोक वह उन से कभी भी मिल सकता था. राम सजीवन यादव जनशक्ति पार्टी के लिए यूनिवर्सिटी में छात्रों के बीच काम करने लगा. राम सजीवन यादव को यह सब करते हुए एक साल से ज्यादा का समय बीत गया. अब वह जनशक्ति पार्टी की छात्र विंग में पदाधिकारी हो गया था और बड़ा चंदाखोर भी. वहां चारों तरफ उस की जातबिरादरी और उस के जैसी दिलचस्पी वाले कई लोग थे. अपने पुराने मिजाज के चलते कुछ हमजाति लड़कियों का भी शिकार राम सजीवन यादव ने किया. यह राज है कि इस के पीछे उन की रजामंदी थी या फिर कोई लालच. बात आज तक खुल नहीं पाई.

खैर, अब विधानसभा के चुनाव गए थे. राम सजीवन यादव ने अपनी टीम लगा कर जनशक्ति पार्टी के लिए चुनाव प्रचार किया. पार्टी सत्ता में गई. अब राम सजीवन का कद बढ़ चुका था. ट्रांसफरपोस्टिंग के कारोबार से ले कर ठेकापट्टा दिलवाने में उस का दखल रोज बढ़ रहा था. इस तरह उस की जेब में खूब पैसा घुसने लगा. अब वह लखनऊ राजधानी में फ्लैट ले कर शिफ्ट हो गया, जो कभीकभी इलाहाबाद के खलिहर मठाधीशों की आरामगाह भी बनता था. वहां पहुंच कर राम सजीवन यादव ने अपने एक सिक्योरिटी कंपनी भी बनाई और सरकारी संस्थानों में सिक्योरिटी गार्ड का ठेका भी लेने लगा. इस तरह से उस की चौतरफा कमाई होने लगी.

पार्टी अध्यक्ष या सीधे मुख्यमंत्री का नजदीकी होने की जो हनक थी उस का एक अलग ही नशा था, जो राम सजीवन जैसे घोर जातिवादी और कम पढ़ेलिखे नौजवान के बरताव में हर समय दिखाई पड़ जाता था.
दौलत और सत्ता का नशा थामे नहीं थमता. अब राम सजीवन यादव भी मसाज के लिए बैंकाक जाता था, विदेशी शराब पीता था. इस तरह से 5 साल बीत गए. सड़क पर संघर्ष भी बीते दौर की बात हो गई थी. सब बदल चुका था. अब राम सजीवन यादव अपने गांव की औरतों के फिगर की चर्चा की जगह इस पर चर्चा करता कि कौन सा नौकरशाह किस काम से कहां जाता है और क्या करता है. कितनी पूंजी उठाता है और पार्टी को कितना देता है. इस दौरान पावर और लक्ष्मी दोनों ने उस पर खूब कृपा बरसाई. गांव में उस की जो ठसक थी, उस का बखान ही नहीं किया जा सकता.

सरकार के 5 साल बीत गए. फिर से चुनाव का मौसम गया था. इस चुनाव में राम सजीवन यादव ने पार्टी के लिए चुनाव प्रचार के साथ अपनी कमाई पूंजी से भी पार्टी फंड में मदद की. उस की सोच थी कि सरकार बनने पर यह सब घाटा पूरा हो जाएगा. हालांकि, जनशक्ति पार्टी यह चुनाव बुरी तरह हार गई. यह राम सजीवन यादव के लिए ?ाटका था, क्योंकि इस ?ाटके का कोई अनुभव उसे नहीं था. अब सरकार बदल चुकी थी. नौकरशाही नए निजाम के मुताबिक ढलने लगी. इस निजाम में अब राम सजीवन यादव को अपना कारोबार सुरक्षित रखने में भी समस्याएं आने लगीं. कुछ कारोबार तो एक साल के भीतर ही बंद करने पड़े और कई ठेकों में जांच शुरू हो गई, जिसे सैटल करने में मोटी रकम खर्च हुई.

अब इन ठेकों में तगड़ा कमीशन सत्ता के लोगों को देना मजबूरी बन गया. खुद की आदतों पर भी उस का मोटा पैसा खर्च हो रहा था. खैर, इस तरह 5 सालों में राम सजीवन यादव की जमा पूंजी का आधा से ज्यादा खर्च हो गया. हालांकि, उसे इस बात का पूरा यकीन था कि अगली सरकार में यह सब खर्च निकाल लेगा. टैंशन की कोई बात नहीं है. वह 5 साल जनशक्ति पार्टी के साथ पूरी तरह लगा रहा. एक बार फिर से चुनाव गए. इस बार पार्टी अध्यक्ष ने उन सब को याद किया जिन्होंने पार्टी के सत्ता में रहते मुनाफा कमाया था, क्योंकि पार्टी की माली जड़ें बहुत सिमट गई थीं और चुनाव के लिए पैसा चाहिए था.

राम सजीवन यादव ने इस चुनाव में पार्टी के लिए 10 गाडि़यां दीं और जीजान लगा कर खुद भी काम किया. जनशक्ति पार्टी फिर चुनाव हार गई. यह राम सजीवन यादव के लिए दूसरा बड़ा टका था. केवल जमा पूंजी के सहारे अब वह कितने दिन सियासत में चल सकता था. जातबिरादरी की चेतना के आगे उसे कुछ आता भी नहीं था. अब उस की जेब का बड़ा हिस्सा खाली था. जो धंधापानी था वह भी तकरीबन सिमट गया था. साथ में चलने वाले सिक्योरिटी गार्डों को 5 महीने से तनख्वाह नहीं मिलने के चलते वह सब भाग गए थे. दिनोंदिन उस का भौकाल कमजोर हो रहा था और उसे कोई रास्ता नजर नहीं रहा था.

बहुत हताशा में, एक दिन राम सजीवन यादव अपने कुलगुरु का दर्शन करने गया. कुलगुरु ने समस्या सुनी. फिर उसे सम?ाया कि पार्टी को छोड़ कर अपना देखो नहीं तबाह हो जाओगे. उन के मुताबिक गतिशीलता समाज का नियम है. जड़ मत बनो नहीं तो सड़गल जाओगे. उन्होंने सूखे पेड़ का उदाहरण दे कर बातें सम?ाई और जल्द ही उन्हें कुछ मदद का भरोसा दिया2 महीने के अज्ञातवास के बाद, एक दिन एक अनजान फोन राम सजीवन यादव को आया. अचानक उस ने सत्ताधारी प्रजा पार्टी की सदस्यता ले ली और मुख्यमंत्री आवास के इर्दगिर्द दिखाई देने लगा. उसे लगा कि जातबिरादरी के चक्कर में अपना फालूदा बनवाने का कोई फायदा नहीं है. जिस दल में रहो वहीं अपना कद मजबूत करो.

पौलिटिक्स में जो प्रैक्टिकल होते हैं वही आगे बढ़ते हैं. दलबदल पर भ्रष्ट जनता क्या बोलेगी? उसे चमत्कार चाहिए बस. किसी भी तरह से चमकने वाला ही उस का हीरो हो सकता है. फिर, एक दिन राम सजीवन यादव ने राष्ट्रवादी यादव मंच का गठन किया और अपनी बिरादरी को राष्ट्रवाद का फायदा सम?ाने वाली प्रदेशव्यापी यात्रा शुरू की. इस के लिए उसे 40 लाख की फंडिंग समाज से हुई. इस तरह से उस ने केवल खुद को बदला, बल्कि अपने समाज के लिए भी इस सत्ता में घुसने के नए रास्ते खोले. आजकल राम सजीवन यादव राज्य सरकार में बीज विकास विभाग में आमंत्रित सदस्य है और बिरादरी को राष्ट्रवाद की ट्रेनिंग देते हुए दारू के 4 अड्डे और खनन के 3 ठेके चला कर अपना विकास कर रहा है.         

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