Sexual Health. आज बड़ी संख्या में युवा नशे की चपेट में आ रहे हैं। और यह लत किसी लिंग की महुताज नहीं चाहे लड़का हो या लडकी जो भी इसकी गिरफ्त में आता हैं फिर निकलना उसके लिए बहुत मुश्किल हो जाता हैं आज शराब, सिगरेट, ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन तेजी से बढ़ रहा है। गलत संगति, तनाव, सोशल मीडिया और दिखावे की संस्कृति इसके प्रमुख कारण हैं। नशा युवाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा, करियर और पारिवारिक जीवन पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है।यह वर्तमान के साथ साथ भविष्य को भी हर लेता हैं
नशा बिगाड़ता है यौन संबंध की क्रिया
शराब, तंबाकू, गांजा, अफीम और अन्य नशीले पदार्थ शरीर और मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालते हैं। नशे की आदत व्यक्ति की यौन क्षमता को भी कमजोर कर देती है। अधिक नशा करने से पुरुषों और महिलाओं दोनों में हार्मोन असंतुलित होने लगते हैं, जिससे यौन इच्छा कम हो सकती है।
होने वाली समस्याएं
पुरुषों में नशे के कारण कमजोरी, शीघ्रपतन, तनाव और स्तंभन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। वहीं महिलाओं में भी हार्मोन संबंधी गड़बड़ी, थकान और मानसिक तनाव बढ़ सकता है, जिससे वैवाहिक जीवन प्रभावित होता है।
शोध हमें बताते हैं कि लंबे समय तक नशा करने से मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है। व्यक्ति चिड़चिड़ा, तनावग्रस्त और अवसाद का शिकार हो सकता है, जिसका सीधा असर पति-पत्नी के रिश्तों पर पड़ता है।
विशेषज्ञओं के अनुसार स्वस्थ यौन जीवन के लिए संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम और नशे से दूरी बेहद जरूरी है। समय रहते नशे की लत छोड़ दी जाए तो शरीर और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार संभव है।साथ ही रिश्ते बेहतर बन सकते हैं।
यौन संबंध केवल शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक जुड़ाव का भी आधार होते हैं। नशे की आदत आपसी विश्वास, प्रेम और समझ को कमजोर कर देती है। इससे रिश्तों में दूरी, असंतोष और तनाव बढ़ने लगता है। स्वस्थ और सम्मानपूर्ण संबंधों के लिए मानसिक संतुलन, संवाद और नशामुक्त जीवन अत्यंत आवश्यक है।इस लत से बाहर निकलने के लिए मनोवैज्ञानिक से परामर्श भी ले सकते हैं। जो आपको नशे कि लत छुड़वाने में मददगार साबित होगा। Sexual Health
Sexual Health. इनसान का मन जितना दिखता है, उस से कहीं ज्यादा गहरा और राज से भरा है. हमारे भीतर एक ऐसी दुनिया बसती है, जहां हम अकेले होते हैं, अपने विचारों, इच्छाओं, डर, सपनों और कल्पनाओं के साथ.
इसी भीतरी दुनिया का एक हिस्सा है फैंटेसी यानी कल्पना. यह वह जगह है, जहां नामुमकिन भी मुमकिन लगता है, अधूरा भी पूरा हो जाता है और दबे हुए भाव भी आकार लेने लगते हैं.
जब हम फैंटेसी शब्द सुनते हैं, तो अकसर बच्चों की कहानियां याद आती हैं… परियां, जादू, सुपर हीरो, उड़ते महल और बोलते जानवर. बचपन की फैंटेसी आनंद, रोमांच और हैरानी से भरी होती है, लेकिन जैसेजैसे इनसान बड़ा होता है, उस की कल्पनाएं भी बदलने लगती हैं. अब उन में इच्छाएं होती हैं, भावनाएं होती हैं, अधूरी चाहतें होती हैं और कई बार वे बातें भी होती हैं, जिन्हें वह असली जिंदगी में जी नहीं पाता.
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इसी में एक रूप है सैक्सुअल फैंटेसी. इस शब्द को ले कर समाज में सब से ज्यादा भ्रम है. लोग इसे या तो गलत मान लेते हैं या बीमारी समझ लेते हैं या फिर अपराध से जोड़ देते हैं, जबकि सच यह है कि हर सैक्सुअल फैंटेसी गलत नहीं होती. यह इनसान के सामान्य दिमागी प्रोसैस का हिस्सा भी हो सकती है.
कल्पना की निजी दुनिया
सैक्सुअल फैंटेसी का मतलब केवल शारीरिक संबंध की कल्पना नहीं है. यह उस से कहीं बड़ी है. इस में निकटता की चाह, किसी के द्वारा चाहे जाने की इच्छा, रोमांच की तलाश, भावनात्मक जुड़ाव, शक्ति का अनुभव, समर्पण की भावना या प्यार पाने की लालसा भी शामिल हो सकती है.
कई बार इनसान अपनी अलसी जिंदगी में संयमित, जिम्मेदार और नियंत्रित रहता है. वह हर समय नियमों में बंधा रहता है. ऐसे में उस का मन एक ऐसी जगह बनाता है, जहां वह बिना किसी फैसले, आलोचना या सामाजिक दबाव के अपने भीतर की इच्छाओं को महसूस कर सके. यह फैंटेसी की दुनिया है.
यह जरूरी नहीं कि इनसान अपनी हर कल्पना को सच करना चाहता हो. कई बार कल्पना केवल कल्पना होती है… मन की एक निजी फिल्म, जिसे इनसान जीता नहीं, केवल सोचता है.
फ्रायड ने क्या कहा था
मनोविज्ञान के जनक माने जाने वाले सिगमंड फ्रायड का मानना था कि मनुष्य की अनेक इच्छाएं समाज, नैतिकता, डर और नियमों के दबाव में दब जाती हैं. वे इच्छाएं गायब नहीं होतीं, बल्कि सपनों, कल्पनाओं या बरताव के रूप में बाहर आती हैं.
आधुनिक मनोविज्ञान इस विचार को थोड़ा अलग तरीके से देखता है. आज माना जाता है कि हमारा अचेतन मन सीधे शब्दों में नहीं बोलता, बल्कि वह प्रतीकों, संकेतों और कल्पनाओं के माध्यम से अपनी बात कहता है यानी कभीकभी फैंटेसी हमारे भीतर छिपी भावनाओं का संकेत भी हो सकती है.
फैंटेसी की 3 जरूरतें
आधुनिक मनोवैज्ञानिक जस्टिन लेहमिलर की रिसर्च के मुताबिक, ज्यादातर सैक्सुअल फैंटेसी 3 तरह की मनोवैज्ञानिक जरूरतों से जुड़ी होती हैं… कनैक्शन, एक्साइटमैंट और कंट्रोल.
कनैक्शन : कोई मुझे चाहे
हर इनसान चाहता है कि कोई उसे सम?ो, चाहे, स्वीकार करे. यह जरूरत बचपन से शुरू होती है और जिंदगीभर बनी रहती है. कई लोगों की कल्पनाओं में प्यार, अपनापन, निकटता और भावनात्मक जुड़ाव खास होता है.
अगर किसी इनसान ने बचपन में स्नेह की कमी महसूस की हो या किशोरावस्था में प्यार किया हो पर कह न पाया हो, तो उस के भीतर चाहे जाने की इच्छा गहरी हो सकती है. ऐसे लोग अकसर ऐसी कल्पनाएं करते हैं, जहां कोई उन्हें बेहद प्यार करता है, समझता है या उन्हें चुनता है.
यह सामान्य है. समस्या तब शुरू होती है, जब इनसान कल्पना और असलियत का अंतर खो देता है. जब एकतरफा प्यार जुनून बन जाए. कई बार कोई इनसान किसी से प्यार करने लगता है, जबकि सामने वाला उसे पसंद नहीं करता. फिर भी वह अपने मन में एक कहानी बना लेता है कि वह भी मु?ो चाहता है, वह अभी मना कर रही है, एक दिन मान जाएगी. यहीं से फैंटेसी का अंधेरा पक्ष शुरू होता है.
जब इनसान सामने वाले के इनकार को स्वीकार नहीं कर पाता, तब जुनून जन्म लेता है. पीछा करना, धमकाना, हिंसा करना, एसिड अटैक, रेप जैसी घटनाएं कई बार इसी मानसिक गंदी सोच से जुड़ी होती हैं. कुछ लोग यह भ्रम भी पाल लेते हैं कि कोई सैलिब्रिटी उन से प्यार करता है. यह खतरनाक मानसिक हालत हो सकती है.
एक्साइटमैंट : नया, अलग और रोमांचक
इनसान का दिमाग नवीनता से जोश में आता है. कुछ नया, अनिश्चित या रोमांचक होने पर हमारे शरीर में डोपामाइन और एड्रेनालिन जैसे रसायन सक्रिय होते हैं, जो जोश और मजा देते हैं.
समस्या यह है कि रोजमर्रा की एक जैसी जिंदगी से मन जल्दी ऊब जाता है. वही समय, वही दिनचर्या, वही जिम्मेदारियां, तब मन कुछ नया चाहता है. इसी कारण बहुत से लोग अपनी कल्पनाओं में रोमांच खोजते हैं. वे कुछ ऐसा सोचते हैं, जो असली जिंदगी से अलग हो. इस में कोई बुराई नहीं, जब तक यह केवल कल्पना की सीमा में हो और किसी को नुकसान न पहुंचाए.
आज के नौजवानों में यह बेचैनी ज्यादा दिखती है. सुविधाएं बढ़ी हैं, पर संतोष घटा है, इसलिए कई लोग ड्रग्स, तेज रफ्तार, वीडियो गेम, जोखिम भरे बरताव या लगातार नए रिश्तों में थ्रिल खोजते हैं. लेकिन हर रोमांच की एक सीमा होती है. धीरेधीरे मन को उस से भी ज्यादा जोश चाहिए होता है. यहीं से कई बार इनसान गलत रास्तों की ओर मुड़ जाता है.
कंट्रोल : ताकत और समर्पण का खेल
इनसान के भीतर ताकत पाने की इच्छा भी होती है. कई लोग जिंदगी में दबे हुए रहते हैं… बचपन में डांट, बेइज्जती, बुलीइंग या कंट्रोल का अनुभव करते हैं. बड़े हो कर वे ऐसी कल्पनाएं कर सकते हैं, जहां वे ताकतवर हों, किसी पर कंट्रोल रखते हों.
दूसरी ओर कुछ लोग अपनी असली जिंदगी में इतने फैसले लेते हैं, इतने जिम्मेदार होते हैं कि वे अपनी निजी दुनिया में कंट्रोल छोड़ देना चाहते हैं. उन्हें किसी और के नेतृत्व या कंट्रोल में सुख महसूस होता है.
इन दोनों हालात में अपनेआप में कुछ गलत नहीं है, अगर सबकुछ सहमति, सम्मान और सुरक्षा के भीतर हो. समस्या तब है, जब कंट्रोल हिंसा में बदलने लग जाए.
जब किसी इनसान को दूसरे की इच्छा, दर्द या असहमति की परवाह न रहे, जब हिंसा ही जोश का स्रोत बन जाए, जब सहमति खत्म हो जाए, तब यह मानसिक विकार और सामाजिक खतरा बन जाता है.
कब सामान्य, कब असामान्य
यह सब से खास सवाल है. हर फैंटेसी रोग नहीं है. हर कल्पना अपराध नहीं है. हर निजी इच्छा शर्म की बात नहीं है. लेकिन कुछ संकेत बताते हैं कि मामला गंभीर हो सकता है. इनसान कल्पना और असलियत में फर्क न कर पाए. सामने वाले की सहमति को अहमियत न दे. हिंसा, जबरदस्ती या शोषण में आनंद महसूस करे. बिना ऐसी कल्पनाओं के सामान्य जिंदगी न जी पाए. संबंध टूटने लगें, अपराधबोध बढ़े या बरताव खतरनाक हो जाए. कानून तोड़ने की सोच पैदा हो ऐसी हालत में माहिर की मदद जरूरी है.
रिश्तों में ताजगी भी ला सकती है
एक हैल्दी और मैच्योर संबंध में कल्पनाएं कई बार संवाद का हिस्सा बन सकती हैं. वे रिश्तों में ताजगी, नयापन और खुलापन ला सकती हैं. कई जोड़े अपनी भावनाओं और इच्छाओं पर बातचीत कर के एकदूसरे को बेहतर समझते हैं.
कभी केवल प्रिय इनसान की कल्पना ही आत्मीयता बढ़ा देती है..कभी किसी खास हालात की कल्पना उत्साह जगा देती है. यह सब इनसान की स्वाभाविक मानसिक संरचना का हिस्सा है. शर्त सिर्फ एक है कि सम्मान, सहमति और संतुलन.
शर्म नहीं, समझ जरूरी है
हमारा समाज सैक्स और मानसिकता दोनों विषयों पर खुल कर बात करने से बचता है. नतीजा यह होता है कि लोग अपनी सामान्य भावनाओं को भी अपराध सम?ाने लगते हैं और कई बार गंभीर समस्याएं छिपी रह जाती हैं.
जरूरत है समझ की. अगर कोई कल्पना किसी को नुकसान नहीं पहुंचा रही, इनसान की जिंदगी को बाधित नहीं कर रही और उस की निजी मानसिक दुनिया तक सीमित है, तो उसे ले कर अपराधबोध पालना उचित नहीं.
लेकिन अगर कल्पना हिंसा, जुनून, भ्रम या जबरदस्ती में बदल रही है, तो उसे नजरअंदाज करना भी खतरनाक है. आखिर में इनसान का मन कोई अदालत नहीं, जहां हर विचार पर सजा सुनाई जाए. मन एक संसार है, जहां उजाला भी है, अंधेरा भी.
फैंटेसी उसी संसार का हिस्सा है.
वह कभी रचनात्मक होती है, कभी सांत्वना देती है, कभी रोमांच भरती है और कभी भीतर छिपे घावों का संकेत बनती है, इसलिए सैक्सुअल फैंटेसी को केवल अपराध या बीमारी कह देना अधूरा सच है. सही बात यह है कि उसे समझना चाहिए, क्योंकि जब समझ होती है, तभी सीमा भी तय होती है और सुरक्षा भी. Sexual Health
Sexual Health: तकरीबन 12 साल की उम्र से ले कर अधेड़ उम्र तक महिलाओं को माहवारी से सामना करना पड़ता है. ऐसे में देशदुनिया में महावारी बताने के कई दिलचस्प ‘कोडवर्ड’ बना दिए गए हैं.
जापान के झंडे को ‘निशोकी’ कहते हैं, जिस का मतलब है ‘सूरज का झंडा’. इसे आमतौर पर ‘हिनोमारू’ भी कहा जाता है यानी ‘सूरज का घेरा’. यह झंडा सफेद बैकग्राउंड पर एक लाल गोले (सूरज का प्रतीक) के साथ बनाया गया है.
पर जब इंगलिश में कहा जाता है कि ‘जापान इज अटैकिंग’ तो यह कोई असल में जापान द्वारा किया गया हमला नहीं है, बल्कि उन लड़कियों या औरतों का कोडवर्ड होता है, जिन्हें माहवारी आई होती है.
यहां पर भी जापान के झंडे को ही सिंबल की तरह इस्तेमाल किया जाता है, सफेद रंग पर लाल रंग का चढ़ना. मतलब अगर कोई लड़की बोल रही है कि ‘जापान इज अटैकिंग’, तो सुनने वाली समझ जाए कि उसे माहवारी आई है.
किसी लड़की को माहवारी आने का मतलब है कि वह मां बनने की काबिलीयत रखती है और अमूमन 12 साल की उम्र में हर लड़की को पहली माहवारी आ जानी चाहिए. कभीकभार यह उम्र 1-2 साल ऊपरनीचे हो सकती है.
माहवारी है क्या
माहवारी किसी महिला को कुदरत का सब से अनमोल तोहफा है. इसे ‘मासिक धर्म’ या ‘महीना आना’ भी कहते हैं. माहवारी में महिला के शरीर से गंदा खून और ऊतक बाहर निकलते हैं, जिस से महिला का शरीर गर्भधारण करने के लिए तैयार हो जाता है. ऐसा अमूमन महीने में 4-5 दिन होता है और यह चक्र 11-12 साल की उम्र से ले कर अधेड़ उम्र तक जारी रहता है.
पर भारत जैसे देश में माहवारी को हौआ बना कर रखा गया है. धर्म की जंजीरों में कुदरत की इस नायाब चीज को जकड़ कर रख दिया गया है.
एक सर्वे में सामने आया है कि आज भी 81 फीसदी लड़कियों को पता ही नहीं होता है कि उन्हें जब पहली बार माहवारी आए, तो उसे कैसे हैंडल करना है. उन की मां तक उन्हें इस की जानकारी देने में झिझकती है, क्योंकि उसे खुद अपने समय में अधकचरा ज्ञान दिया गया था. वह खुद इन दिनों में ‘अपवित्र’ हो जाती थी, तो बेटी को किस मुंह से बताए कि वह जिंदगी के ऐसे पड़ाव पर आ गई है, जहां से मां बनने का सुख भोगा जा सकता है.
पर जानकारी तो देनी ही होगी. यह लड़की को किसी सहेली से मिले या बड़ी बहन से या फिर महल्ले की किसी दीदी या फिर आंटी से, उसे अपने आंखकान खुले रखने होंगे.
सब से पहले तो लड़की को अपने शरीर में होने वाले बदलावों को समझना चाहिए. इन हालात में लड़की को अचानक शरीर में मरोड़ सी उठने लगती है. नाजुक अंगों पर बाल आने शुरू हो जाते हैं. आवाज में बदलाव महसूस होता है. चेहरे पर मुंहासे की शुरुआत होने लगती है. छाती में दर्द होता है. लंबाई बढ़ती है.
माहवारी के कोडवर्ड
अगर लड़की को माहवारी की जानकारी मिल भी जाती है, तो इन खास दिनों में उसे कुछ सावधानियां भी बरतनी चाहिए. उस में माहवारी में पैड लगाने और साथ रखने की जागरूकता होनी चाहिए, पर कभीकभार उन्हें जब इस के बारे में आपस में बात करनी होती है, तो बहुत सी लड़कियां कुछ खास शब्दों में बात करती हैं, ताकि सिर्फ उन्हें ही समझ आए, जैसे ‘जापान इज अटैकिंग’.
भारत में लड़कियां माहवारी को ‘पीरियड्स’, ‘मूड स्विंग्स’, ‘एमसी’, ‘महीना’, ‘खास दिन’ कह देती हैं. पर बहुत से देशों में माहवारी को अलगअलग कोडवर्ड में जाहिर किया जाता है, जैसे ‘नियाग्रा इज ब्लीडिंग’, ‘शार्क वीक’, ‘आंटी फ्लो’, ‘इट्स माई टाइम औफ द मंथ’, ‘इट्स माई मून टाइम’, ‘माई रैड वैडिंग’, ‘ब्लडी मैरी’, ‘कोड रैड’ वगैरह. Sexual Health
Sexual Health: मध्य प्रदेश में भोपाल के एक सरकारी कालेज से बीकौम कर रहे 20 साला रितेश को सम झ नहीं आ रहा था कि उस के प्राइवेट पार्ट में यह हो क्या रहा है. रुकरुक कर हलकी मीठीमीठी सी खुजली हो रही थी, जिसे वह पैंट के ऊपर से ही खुजा लेता था.
रितेश को लगा कि यों ही कुछ होगा, जो अपनेआप ठीक हो जाएगा, क्योंकि पहले भी 2-3 बार उस के साथ यह परेशानी पेश आ चुकी थी. पेशाब करने में थोड़ी दिक्कत आ रही थी.
लेकिन इस बार यह खुजली अपनेआप ठीक नहीं हुई तो रितेश चिंता में पड़ गया. परेशानी ऐसी जगह की थी कि अगर वह अपने यारदोस्तों से पूछता, तो वे मजाक बनाते और वैसे भी वे कोई डाक्टर तो थे नहीं, जो इस का इलाज बता देते. लिहाजा, कोई रिस्क न उठाते हुए रितेश ने डाक्टर को दिखाने का फैसला लिया. लेकिन उस से पहले अपने प्राइवेट पार्ट का मुआयना करना जरूरी समझा.
बाथरूम जा कर रितेश ने अंडरवियर उतारा तो ऊपर से तो प्राइवेट पार्ट ठीकठाक लगा, लेकिन जैसे ही उस के आगे की चमड़ी खींची, तो दर्द हुआ और मुंडी पर ढेर सा सफेद सा कुछ जमा दिखा. उस ने जिज्ञासा के चलते इसे सूंघा तो एक अजीब सी बदबू से नाक और दिमाग में सनसनाहट सी हुई.
यह देख कर तो रितेश सकते में आ गया, क्योंकि चमड़ी मुश्किल से खिंच रही थी और हलकी लाल भी पड़ गई थी, जिसे आगेपीछे करने पर दर्द भी हो रहा था.
घबराए रितेश को तुरंत कुछ नहीं सू झा सिवा इस के कि पानी से यह सफेदी हटा दी जाए, जो उस ने हटा भी दी, तो इस से थोड़ी राहत मिली, लेकिन दर्द ज्यों का त्यों बना रहा.
रितेश के मन में सरकारी अस्पताल तक पहुंचतेपहुंचते तरहतरह के खयाल आते रहे कि यह क्या है और कैसे हो गया?
तो फिर यह क्या था
2 घंटे लाइन में लगने के बाद जब नंबर आया तो रितेश झेंपता हुआ सा डाक्टर साहब के केबिन में दाखिल हो गया. झेंप इस बात की ज्यादा थी कि डाक्टर पैंट उतार कर प्राइवेट पार्ट दिखाने को कहेंगे, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. उन्होंने समस्या पूछी और 2-4 सवाल किए जिन के रितेश ने ठीकठीक जवाब दिए.
डाक्टर साहब ने परचा बनाया और कहा कि यह ट्यूब है. इसे दिन में 2 बार लगाना है, लेकिन उस से पहले प्रभावित जगह यानी चमड़ी को कुनकुने पानी से धो कर अच्छे से सुखा लेना.
यह सुन कर रितेश की जान में जान आई. कुरसी से उठने से पहले उस ने हिम्मत कर के डाक्टर से पूछ ही लिया कि यह बीमारी आखिर है क्या?
डाक्टर साहब ने रितेश को बताया कि यह कोई खास डरने की बात नहीं है, बल्कि पेनिस का फंगल इंफैक्शन है, जो किसी को भी हो सकता है. इसे कैंडिडा बैलेनाइटिस कहते हैं.
फंगल इंफैक्शन होने की वजह एक कैंडिडा कवक या फिर डर्माटोफाइट्स या फिर दूसरे सूक्ष्मजीव होते हैं जो शरीर के किसी भी हिस्से में बेलगाम हो कर बढ़ने लगते हैं.
कैंडिडा कवक या यीस्ट सब से आम फंगस है जो आमतौर पर पेनिस में इंफैक्शन की वजह बनती है.
पेनिस की चमड़ी को फोरस्किन कहते हैं, जिस के नीचे स्मेग्मा बनता है. वहां चूंकि नमी रहती है, इसलिए कैंडिडा जल्दी पनपता है.
स्मेग्मा कुदरती तौर पर बनने वाला गाढ़ा पदार्थ है, जो सफेद या पीला होता है. लेकिन यह कोई बीमारी नहीं है. फोरस्किन के नीचे मुंडी पर चूंकि नमी भी रहती है और गरमी भी, इसलिए कैंडिडा जल्द पसर और फैल जाता है. बहुत ज्यादा पसीना आने से भी इसे जमने का मौका मिल जाता है.
जब ज्यादा स्मेग्मा जमा हो जाता है तब इस से बदबू आने लगती है. अगर स्मेग्मा को साफ न किया जाए, तो यह फंगल इंफैक्शन में तबदील हो जाता है.
यही रितेश के साथ हो रहा था और यही लाखों लड़कों और मर्दों के साथ कभी भी हो सकता है, लेकिन मर्दों से ज्यादा यह औरतों में होता है, क्योंकि उन का प्राइवेट पार्ट अंदर की तरफ होता है जिस से कैंडिडा को पसरने की ज्यादा जगह मिल जाती है.
यह देख कर मर्द हो या औरत दोनों घबरा जाते हैं और डर और शर्म के मारे डाक्टर को नहीं दिखाते, जो कभीकभार बड़ा खतरा बन जाता है.
फंगल इंफैक्शन का एहसास तब होता है जब प्राइवेट पार्ट में जलन और खुजली होने लगती है और पेशाब उतरने में भी कठिनाई होने लगती है.
इन लक्षणों को दिखते ही अगर इलाज न कराया जाए, तो फोरस्किन लाल पड़ जाती है, उस पर चकत्ते या दाने भी हो जाते हैं और उस से खून भी निकलने लगता है, जिस का दर्द बहुत तेज होता है.
आमतौर पर इसी स्टेज पर लोग डाक्टर के पास भागते हैं. यह इंफैक्शन चूंकि बहुत खतरनाक नहीं होता, इसलिए इलाज से इस स्टेज पर भी ठीक हो जाता है, जिस में समय थोड़ा ज्यादा लगता है.
इस में एक दिक्कत यह भी आती है कि ज्यादा स्मेग्मा जमा हो जाने पर फोरस्किन इतनी टाइट हो जाती है कि इस के आगेपीछे होने या करने में तेज दर्द होता है.
साफसफाई है अहम
प्राइवेट पार्ट का फंगल इंफैक्शन तकलीफदेह तो होता है, लेकिन ज्यादा खतरनाक नहीं होता. इसे होने से आसानी से रोका जा सकता है :
* प्राइवेट पार्ट की रोजाना सफाई किया जाना जरूरी है खासतौर से फोरस्किन के नीचे. यहां साफसफाई के लिए माइल्ड यानी हलका साबुन भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
* फोरस्किन को गीला नहीं रखना चाहिए. उसे साफ सूती कपड़े से सुखाना चाहिए.
* टाइट अंडरवियर नहीं पहनना चाहिए. इस से प्राइवेट पार्ट के आसपास नमी बनती है.
* गीले कपड़े पहनने से बचना चाहिए.
* कुछ दवाओं के खाने से भी यह इंफैक्शन होता है, इसलिए डाक्टर से सलाहमशवरा करना चाहिए.
* डायबिटीज के मरीजों के प्राइवेट पार्ट में फंगल इंफैक्शन होने के चांस ज्यादा रहते हैं और उन्हें यह बारबार हो भी सकता है, इसलिए इस बीमारी से गुजर रहे लोगों को अपनी शुगर को कंट्रोल में रखना चाहिए.
* जब फंगल इंफैक्शन हो जाए तो हमबिस्तरी नहीं करनी चाहिए. इस से यह बीमारी पार्टनर को भी लग सकती है. लेकिन मन न माने तो कंडोम का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए.
* आजकल हर कोई सिंथैटिक कपड़े पहनता है खासतौर से अंडरवियर. इस से फंगल इंफैक्शन का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए सूती अंडरवियर पहनना चाहिए. Sexual Health
Sexual Health: अपनी बौडी को हैल्दी और फिट रखने के लिए कई लोग जिम जाते हैं, पार्क जाते हैं, ऐक्सरसाइज करते हैं, हैल्दी डाइट लेते हैं और भी कई ऐसी चीजें करते हैं जिस से कि वे लंबे समय तक फिट रह सकें, लेकिन इन सब के साथ हमें फिट रखने के लिए एक और चीज की जरूरत पड़ती है. जी हां, सैक्स हमें फिजिकली और मैंटली दोनों तरीके से फिट रखने में मदद करता है.
कुछ लोग अपने काम की वजह से या अन्य किसी वजहों से अपनी सैक्स लाइफ को बिलकुल ही इग्नोर करने लगते हैं जो गलत है. लंबे समय तक सैक्स न करने से हमारे शरीर को काफी नुकसान पहंचता है. तो चलिए आज हम आप को बताएंगे कि सैक्स न करने से या कभीकभी करने से हमारे शरीर को किस तरह से नुकसान पहुंच सकता है.
स्ट्रैस का बढ़ना
सैक्स एक ऐसा प्रोसैस है जिसे चाहे महिला हो या पुरुष दोनों ही काफी ऐंजौय करते हैं और ऐसा माना भी गया है कि सैक्स करने से हमारे माइंड का जितना भी स्ट्रैस है, रिलीज हो जाता है. इसी के चलते अगर हम लंबे समय तक सैक्स नहीं करते हैं, तो हमारे शरीर और दिमाग में इस का गहरा असर होता है और तनाव बढ़ने के चांस ज्यादा हो जाते हैं.
स्किन का डल होना
सैक्स करने से हमारा मन काफी खुश रहता है और हैल्दी सैक्स लाइफ का मतलब है आप अपने शरीर के साथ साथ मन से भी खुश रहोगे और जो इनसान मन से खुश रहता है उस की त्वचा अपनेआप ही ग्लो करने लगती है. ऐसे में लंबे समय तक सैक्स न करने से आपकी स्किन डल और बेजान दिख सकती है.
दूसरों में बढ़ सकती है दिलचस्पी
पार्टनर्स को एकदूसरे के साथ समय जरूर बिताना चाहिए, क्योंकि अगर किसी कारण से महिला और पुरुष अपने काम के चलते अपने पार्टनर को टाइम नहीं दे पा रहे हैं और दोनों पार्टनर्स के बीच एक हैल्दी सैक्स लाइफ नहीं बन पा रही है, तो ऐसे में संभव है कि उन की दिलचस्पी बाहर किसी और में पैदा होने लगे. जब इनसान को सैक्स का सुख घर में नहीं मिलता है, तो उसे मजबूरन बाहर जाना ही पड़ता है.
इसी के साथ ही सैक्स न करने से या महीने में केवल एक या 2 बार ही सैक्स करने से इस के अलावा और भी कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं जैसे कि प्राइवेट पार्ट्स में ड्राइनैस, ब्लड प्रैशर की प्रौब्लम, इम्यूनिटी का वीक होना, प्रोस्टैट कैंसर का खतरा आदि. ऐसे में जरूरी है कि आप अपने पार्टनर के साथ जितना हो सके उतना क्वालिटी टाइम बिताएं और अपनी सैक्स लाइफ को मजबूत बनाएं.
Masturbation : आज के समय में हर उम्र के लोगों के हाथ में स्मार्टफोन है. वे जब चाहें कुछ भी सर्च कर सकते हैं. आजकल इंटरनैट पर सबकुछ उपलब्ध है और ऐसे में बङों की तो छोङिए, छोटे बच्चे और टीनएजर्स (teenagers) भी वे सब देखने लग जाते हैं जो उन को नहीं देखना चाहिए.
बढ़ती उम्र के बच्चों में कई सारे हारमोनल बदलाव होते हैं। ऐसे में वे इंटरनैट पर पौर्न वीडियोज सर्च कर देखने लगते हैं. न सिर्फ पौर्न वीडियोज बल्कि पौर्न वीडियोज (Porn videos) देख कर मास्टरबेट यानि हस्तमैथुन (masturbation) भी करने लगते हैं। इस से उन का किसी और चीज में मन नहीं लगता.
आने लगते हैं गलत विचार
जिस उम्र में बच्चों को सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए उस उम्र में बच्चे खुद को अकेला पा कर पौर्न वीडियोज देखने लग जाते हैं. यों मास्टरबेट करना कोई गलत बात नहीं है बल्कि कई मामलों में इस कार्य को हैल्दी भी माना गया है पर जब कोई चीज हद से ज्यादा हो जाए तो नुकसानदायक भी साबित हो सकती है.
अधिक मास्टरबेट करने से बच्चों के मन में बहुत जल्दी गलत विचार आने लगते हैं और फिर वे लड़कियों को देख उन के साथ वही सब करने का सोचने लगते हैं जो उन्होंने पौर्न वीडियोज में देखा होता है.
बच्चों के दें सैक्स ऐजुकेशन
पेरैंट्स को इस बात की जानकारी जरूर होनी चाहिए कि उन का बच्चा अपने फोन में क्या क्या चीजें सर्च करता है या किस तरह की चीजें देखता है. भारतीय पेरैंट्स अपने बच्चों से खुल कर बात नहीं कर पाते जोकि काफी गलत है. उन्हें शुरुआत से ही बच्चों को सही और गलत के बारे में बताना चाहिए और खासतौर पर जब बच्चे अपनी टीनऐज में आ जाएं तब उन्हें सैक्स संबंधित जानकारी भी देनी चाहिए।
जानें अपने बच्चों के विचार
वैसे तो हस्तमैथुन (masturbation) की लत के बारे में हमारा दिमाग हमें खुद ही सावधान कर देता है क्योंकि अधिक हस्तमैथुन शरीर में कई सारे बदलाव लाता है. जल्दी थक जाना, सारा वक्त कमजोरी महसूस करना और किसी और चीज में ध्यान न लग पाना इस बात का संकेत देते हैं कि अधिक हस्तमैथुन नहीं करना चाहिए.
टीनऐज में पेरैंट्स को इस बात का खास खयाल रखना चाहिए कि उन के बच्चे का ध्यान पढ़ाई में लग भी पा रहा है या नहीं और पेरैंट्स को अकसर बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए जिस से कि वे जान सकें कि उन के बच्चों के मन में किस तरह के विचार आते हैं.
कुदरती प्रकिया है Masturbation
बच्चों को डराना या डांटना बिलकुल नहीं चाहिए क्योंकि यह सब चीजें इस उम्र में काफी सामान्य और कुदरती हैं. बच्चों को इन्हीं सब बातों के बारे में समझाना चाहिए कि उन के लिए इस समय क्या जरूरी है और क्या नहीं.
याद रखें, हस्तमैथुन एक सामान्य क्रिया जरूर है मगर हद से अधिक करना मानसिक बीमारियों की वजह भी बन जाता है.
अच्छा यही होगा कि teenagers को सैक्स ऐजुकेशन के बारे में बताएं ताकि उन का ध्यान सैक्स से अधिक पढ़ाई पर हो. एक उम्र के बाद ही सैक्स लाइफ जीना उचित रहता है और उस समय तो कतई नहीं जब वक्त कैरियर बनाने की हो.
Alcohlic : अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें..
सवाल –
मेरे शादी को अभी कुछ ही समय हुआ है और शादी के समय मेरे ससुराल वालों ने मुझसे और मेरे घरवालों से यह बात छिपाई थी कि मेरे होने वाले पति कोई भी नशा नहीं करते और इसी शर्त पर मैं उनके साथ शादी करने के लिए मानी थी. शादी के बाद मेरे कुछ दिन तो बिल्कुल अच्छे निकले लेकिन अब मुझे धीरे धीरे पता चला है कि मेरे पति ना सिर्फ शराब (alcohlic) पीते हैं बल्कि चरस गांजा तक पीते हैं और इसी वजह से वे अक्सर अपने दोस्तों के साथ देर रात तक बाहर रहते हैं और उनकी इन आदतों के बारे में उनके घरवालों को भी पता था. जब मैंने उनके इस बारे में बात की तो उन्होनें पहले तो मेरी बात का ठीक से जवाब नहीं दिया पर उसके बाद उन्होनें साफ कह दिया कि हां मैं यब सब चीज़ें करता हूं. ऐसे में अब हमारे रोज लड़ाई-झगड़े होते हैं और मैं इस लड़ाई-झगड़ों से परेशान आ चुकी हूं. मेरा अपने पति के साथ रहने का बिल्कुल मन नहीं करता. मुझे क्या करना चाहिए ?
जवाब –
अक्सर मां-बाप शादी के समय अपने बच्चों की खामियां उनके ससुराल वालों से छिपा जाते हैं जो कि बेहद गलत है. हमें सबसे पहले अपने बच्चों की सारी अच्छी बुरी आदतें उनके होने वाले लाइफ पार्टनर से डिस्कस करनी चाहिए क्यूंकि अक्सर घर टूटने और तलाक की वजह यही बातें होती है.
लड़के के मां-बाप को लगता है कि शादी के बाद जिम्मेदारी आने पर लड़का अपने आप सुधर जाएगा या उसकी पत्नी उसे सुधार देगी पर वह इस बात को नहीं समझते कि शादी के बाद भी अगर उनका लड़का नहीं सुधरा तो आने वाली लड़की की जिंदगी भी खराब हो सकती है.
आपके केस में आपसे आपके पति की बुरी आदतें छिपाई गई हैं जो कि बिल्कुल गलत है. आपको सबसे पहले अपने सास-ससुर के पास जाना चाहिए और उन्हें उनके बेटे की सारी आदतों के बारे में बताना चाहिए. हो सकता है कि उन्हें अपने बेटे की सारी आदतों का ना पता हो या फिर उन्हें लगता तो कि अब उनका बेटा सुधर गया है. आप अपने सास-ससुर को बताएं कि आपके समझाने के बावजूद आपके पति नशे नहीं छोड़ रहे.
अगर आपके सास-ससुर के समझाने पर आपके पति समझ जाते हैं तो अच्छी बात है लेकिन अगर आपके पति फिर भी नहीं सुधरते तो आप अपने पति को धमकी दे सकती हैं कि अगर उन्होनें नशों की बुरी आदतें नहीं छोड़ी तो आप उन्हें छोड़ कर चली जाएंगी. ऐसे में उनको डराने के लिए आप 3-4 दिन या एक हफ्ते के लिए अपने मायते रहने चले जाइए जिससे कि आपके पति को एहसास हो कि वे जो कर रहे हैं वे बिल्कुल गलत है और इससे उनका घर कभी नहीं बस सकेगा.
अगर आपके पति नशे छोड़ना चाहते हैं और वे चाह कर भी नशे (alcohlic) नहीं छोड़ पा रहे तो आप उन्हें किसी अच्छे डौक्टर के पास ले कर जाएं ताकि उन्हें नशे छोड़ने में मदद मिल सके.
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इस का कोई तय नियम नहीं है. बच्चा होने के बाद जब बीवी जिस्मानी तौर पर पूरी तरह से सेहतमंद हो जाए, तभी सेक्स करना चाहिए.
शारीरिक व मानसिक थकान
बच्चे के जन्म के बाद मानसिक व शारीरिक तौर पर एक औरत का थकना स्वाभाविक है. चूंकि प्रैग्नैंसी के 9 महीनों के दौरान उसे कई तरह के उतारचढ़ावों से गुजरना पड़ता है. बच्चे को जन्म देने के बाद भी उस के अंदर अनेक सवाल पल रहे होते हैं. कमजोरी और शिशु जन्म के साथ बढ़ती जिम्मेदारियां, रात भर जागना और दिन का शिशु के साथ उस की जरूरतें पूरी करतेकरते गुजर जाना आम बात होती है. औरत के अंदर उस समय चिड़चिड़ापन भर जाता है. नई स्थिति का सामना न कर पाने के कारण अकसर वह तनाव या डिप्रैशन का शिकार भी हो जाती है. मां बनने के बाद औरत कई कारणों की वजह से सैक्स में अरुचि दिखाती है. सब से प्रमुख कारण होता है टांकों में सूजन होना. अगर ऐसा न भी हो तो भी गर्भाशय के आसपास सूजन या दर्द कुछ समय के लिए वह महसूस करती है. थकावट का दूसरा बड़ा कारण होता है 24 घंटे शिशु की देखभाल करना, जो शारीरिक व मानसिक तौर पर थकाने वाला होता है. इसलिए जब भी वह लेटती है, उस के मन में केवल नींद पूरी करने की ही इच्छा होती है. कई औरतों की तो सैक्स की इच्छा कुछ महीनों के लिए बिलकुल ही खत्म हो जाती है.
अपने शरीर के बदले हुए आकार को ले कर भी कुछ औरतों के मन में हीनता घिर जाती है, जिस से वे यौन संबंध बनाने से कतराने लगती हैं. उन्हें लगने लगता है कि वे पहले की तरह सैक्सी नहीं रही हैं. स्टे्रच मार्क्स या बढ़ा हुआ वजन उन्हें अपने ही शरीर से प्यार करने से रोकता है. बेहतर होगा कि इस तरह की बातों को मन में लाने के बजाय जैसी हैं, उसी रूप में अपने को स्वीकारें. अगर वजन बढ़ गया है, तो ऐक्सरसाइज रूटीन अवश्य बनाएं.
दर्द होने का डर
अकसर पूछा जाता है कि अगर डिलीवरी नौर्मल हुई है, तो यौन संबंध कब से बनाने आरंभ किए जाएं? इस के लिए कोई निर्धारित नियम या अवधि नहीं है, फिर भी डिलीवरी के 11/2 महीने बाद सामान्य सैक्स लाइफ में लौटा जा सकता है. बच्चे के जन्म के बाद कई औरतें सहवास के दौरान होने वाले दर्द से घबरा कर भी इस से कतराती हैं. औरत के अंदर दोबारा यौन संबंध कायम करने की इच्छा कब जाग्रत होगी, यह इस पर भी निर्भर करता है कि उस की डिलीवरी कैसे हुई है. जिन औरतों का प्रसव फोरसेप्स की सहायता से होता है, उन्हें सैक्स के दौरान निश्चिंत रहने में अकसर लंबा समय लगता है. ऐसा ही उन औरतों के साथ होता है, जिन के योनिमार्ग में चीरा लगता है. सीजेरियन केबाद टांके भरने में समय लगता है. उस समय किसी भी तरह का दबाव दर्द का कारण बन सकता है. फोर्टिस ला फेम की गायनाकोलौजिस्ट डा. त्रिपत चौधरी कहती हैं, ‘‘प्रसव के बाद 2 से 6 हफ्तों तक सैक्स संबंध नहीं बनाने चाहिए, क्योंकि बच्चे के जन्म के बाद औरत न सिर्फ अनगिनत शारीरिक परिवर्तनों से गुजरती है, वरन मानसिक व भावनात्मक बदलाव भी उस के अंदर समयसमय पर होते रहते हैं. चाहे डिलीवरी नौर्मल हुई हो या सीजेरियन से, दोनों ही स्थितियों में कुछ महीनों तक यौन संबंध बनाने से बचना चाहिए. ‘‘डिलीवरी के बाद के जिन महीनों को पोस्टपार्टम पीरियड कहा जाता है, उस दौरान औरत के अंदर सैक्स संबंध बनाने की बात तक नहीं आती. प्रसव के बाद कुछ हफ्तों तक हर औरत को ब्लीडिंग होती है. ब्लीडिंग केवल रक्त के रूप में ही नहीं होती है, बल्कि कुछ अंश निकलने व डिस्चार्ज की तरह भी हो सकती है. वास्तव में यह पोस्टपार्टम ब्लीडिंग औरत के शरीर से प्रैग्नैंसी के दौरान बचे रह गए अतिरिक्त रक्त, म्यूकस व प्लासेंटा के टशू को बाहर निकालने का तरीका होती है. यह कुछ हफ्तों से ले कर महीनों तक हो सकती है.
‘‘डिलीवरी चाहे नौर्मल हुई हो या सीजेरियन से औरत के योनिमार्ग में सूजन आ जाती है और टांकों को भरने में समय लगता है. अगर इस दौरान यौन संबंध बनाए जाएं तो इन्फैक्शन होने की अधिक संभावना रहती है. औरत किसी भी तरह के इन्फैक्शन का शिकार न हो जाए, इस के लिए कम से कम 6 महीनों बाद यौन संबंध बनाने की सलाह दी जाती है. योनिमार्ग या पेट में सूजन, घाव, टांकों की वजह से सहवास करने से उसे दर्द भी होता है.’’
क्या करें
अगर बच्चा सीजेरियन से होता है, तो कम से कम 6 हफ्तों बाद यौन संबंध बनाने चाहिए. लेकिन उस से पहले डाक्टर से जांच करवानी जरूरी होती है कि आप के टांके ठीक से भर रहे हैं कि नहीं और आप की औपरेशन के बाद होने वाली ब्लीडिंग रुकी कि नहीं. यह ब्लीडिंग यूट्रस के अंदर से होती है, जहां पर प्लासेंटा स्थित होता है. यह ब्लीडिंग हर गर्भवती महिला को होती है, चाहे उस की डिलीवरी नौर्मल हुई हो या सीजेरियन से. अगर डाक्टर सैक्स संबंध बनाने की इजाजत दे देते हैं, तो इस बात का ध्यान अवश्य रखें कि टांके अगर पूरी तरह भरे नहीं हैं तो किस पोजीशन में संबंध बनाना सही रहेगा. पति साइड पोजीशन रखते हुए संबंध बना सकता है, जिस से औरत के पेट पर दबाव नहीं पड़ेगा. अगर उस दौरान स्त्री को दर्द महसूस हो, तो उसे ल्यूब्रिकेंट का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि कई बार थकान या अनिच्छा की वजह से योनि में तरलता नहीं आ पाती. अगर औरत को दर्द का अनुभव होता हो तो पति पोजीशन बदल कर या ओरल सैक्स का सहारा ले सकता है. साथ ही, वैजाइनल ड्राईनैस से बचने के लिए ल्यूब्रिकेंट का इस्तेमाल करना अनिवार्य होता है. चूंकि प्रैग्नैंसी के बाद वैजाइना बहुत नाजुक हो जाती है और उस में एक स्वाभाविक ड्राईनैस आ जाती है, इसलिए नौर्मल डिलीवरी के बाद भी सैक्स के दौरान औरत दर्द महसूस करती है.
पोस्टपार्टम पीरियड बहुत ही ड्राई पीरियड होता है, इसलिए बेहतर होगा कि उस के खत्म होने के बाद ही यौन संबंध बनाए जाएं. प्रसव के 1-11/2 महीने बाद यौन संबंध बनाने के बहुत फायदे भी होते हैं. सैक्स के दौरान स्रावित होने वाले हारमोंस की वजह से संकुचन होता है, जिस से यूट्रस को सामान्य अवस्था में आने में मदद मिलती है और साथी के साथ दोबारा से शारीरिक व भावनात्मक निकटता कायम करने में यौन संबंध महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. प्रसव के बाद कुछ महीनों तक पीरियड्स अनियमित रहते हैं, जिस की वजह से सुरक्षित चक्र के बारे में जान पाना असंभव हो जाता है. इस दौरान गर्भनिरोध करने के लिए कौपर टी का इस्तेमाल करना या ओरल पिल्स लेना सब से अच्छा रहता है. अगर प्रसव के बाद कई महीनों तक औरत के अंदर यौन संबंध बनाने की इच्छा जाग्रत न हो तो ऐसे में पति को बहुत धैर्य व समझदारी से उस से बरताव करना चाहिए.
पति का सहयोग
जैसे ही औरत शारीरिक व भावनात्मक रूप से सुदृढ़ हो जाती है, संबंध बनाए जा सकते हैं. इस दौरान पति के लिए इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है कि वह पत्नी पर किसी भी तरह का दबाव न डाले या जबरदस्ती सैक्स संबंध बनाने के लिए बाध्य न करे. हफ्ते में 1 बार अगर संबंध बनाए जाते हैं, तो दोनों ही इसे ऐंजौय कर पाते हैं और वह भी बिना किसी तनाव के. पति को चाहिए कि वह इस विषय में पत्नी से बात करे कि वह संबंध बनाने के लिए अभी तैयार है कि नहीं, क्योंकि प्रसव के बाद उस की कामेच्छा में भी कमी आ जाती है, जो कुछ समय बाद स्वत: सामान्य हो जाती है.
अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.
सवाल मेरी पत्नी की उम्र 30 साल है. हमारी लव मैरिज है. शादी के पहले हमने संबंध बनाए थे, जिससे उसे गर्भ ठहर गया था, तब उसने अर्बाशन करा लिया. पर उस के बाद से ही मेरी वाइफ का पीरियड्स अनियमित हो गया है और पीरियड के दौरान स्राव भी बहुत कम होता है. वह प्रैगनेंट होना चाहती है लेकिन नहीं हो पा रही. कहीं इसकी वजह पीरियड का अनियमित होना तो नहीं है?
जवाब
पीरियड्स दौरान कम रक्तस्राव होने के कई कारण हो सकते हैं. इस का पता लगाने के लिए प्रारंभिक परीक्षण के तौर पर आप के पैल्विक का अल्ट्रासाउंड करना होगा, जिस में आप के गर्भाशय की भीतरी परत की मोटाई की माप ली जाएगी. हारमोन का भी ठीक से पता लगाया जाएगा. उस के बाद अश्रमैंस सिंड्रोम पता लगाने के लिए हिस्टेरोस्कोपी जांच महत्त्वपूर्ण होगी. इस के अलावा जननांग की तपेदिक का पता लगाने के लिए बायोप्सी कर जांच के लिए भेजी जाएगी, क्योंकि पीरियड के दौरान कम रक्तस्राव होने का यह एक सामान्य कारण है. किसी अचछे चिकित्सक से मिल कर इस बारे में परामर्श लें. इस तरह की समस्याओं को अनदेखा न करें.
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सवाल –
मेरी उम्र 22 साल है. मेरा एक बौयफ्रैंड है जिस से मेरा रिलेशन 1 साल से चल रहा है. वह मुझ से बहुत प्यार करता है और मेरा अच्छे से खयाल भी रखता है. लेकिन मेरा बौयफ्रैंड जब भी मुझ से अकेले में मिलता है तो वह मेरे प्राइवेट पार्ट्स को छूने की कोशिश करता है. मैं हर बार उसे ऐसा कुछ करने से मना करती हूं लेकिन वह फिर भी नहीं मानता और कहता है कि गर्लफ्रैंड और बौयफ्रेंड में यह सब चलता है. मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या मुझे उसे यह सब करने देना चाहिए?
जवाब –
आजकल रिलेशनशिप में आना काफी सामान्य सी बात है और कई लोग रिलेशनशिप में न सिर्फ रोमांस बल्कि सैक्स भी कर लेते हैं. हर इंसान को रोमांस करना पसंद होता है. जैसाकि आप ने बताया कि आप का बौयफ्रैंड अकेले में आप के प्राइवेट पार्ट्स को छूता है तो ऐसे में आप खुद सोचिए कि क्या आप को अच्छा लगता है जब वह यह सब करता है?
अगर आप को यह सब अच्छा लगता है और आप का बौयफ्रैंड का टच करना पसंद आता है तो बेशक आप को उसशका साथ देना चाहिए और इसे एक ऐंजौय की तरह लेना चाहिए.
रिलेशनशिप में किसिंग, स्मूचिंग या फिर सैक्स संबंध बनाना आम बात है मगर यह जबरन नहीं, रजामंदी से हो तभी ठीक है.
अलबत्ता, आप दोनों पिछले 1 साल से रिलेशनशिप में हैं लेकिन आप हर बार अपने बौयफ्रैंड को रोमांस के लिए मना कर देती हैं पर वह फिर भी आप से प्यार करता है तो ऐसे में उस का प्यार आप के लिए सच्चा है और जिस्मानी नहीं है तो आप को उस के साथ रोमांस जरूर करना चाहिए और उसे भी थोड़ी लिबर्टी लेने दीजिए.
आप को एक अच्छा लड़का मिला हुआ है तो उसे थोड़ी छूट देने में कोई बुराई नहीं है. कहीं ऐसा न हो कि आप के इस स्वभाव की वजह से आप एक अच्छे लड़के से हाथ धो बैठें.
अगर आप श्योर नहीं हैं कि भविष्य में आप की उस के साथ शादी होगी या नहीं तो ऐसे में सैक्स को ले कर आप सोचसमझ कर कदम उठाएं लेकिन रोमांस का मजा आप खुल कर उठा सकती हैं.
अगर आप को कभी भी ऐसा फील हो कि आप सैक्स करने के लिए भी तैयार हैं तो यह करना भी कोई गुनाह नहीं है बल्कि रोमांस और सैक्स एक ऐसा अनुभव है जिसे हर कोई ऐंजौय करता है.
मगर ध्यान रहे, सैक्स के लिए दोनों की रजामंदी जरूरी है और चूंकि अभी आप दोनों को ही पहले कैरियर बनानी है, तो ऐहतियात जरूर बरतें और बौयफ्रैंड से कहें कि वह सैक्स के दौरान कंडोम का प्रयोग करे. इस दौरान यह चैक भी करें कि कंडोम फट तो नहीं गया. वैसे, अच्छी क्वालिटी का कंडोम जल्द फटता नहीं और सैक्स को मजेदार बनाता है.
आप एक बात का ध्यान रखना कि आप को अपने बौयफ्रेंड को उतनी ही छूट देनी है जहां तक आप का मन मानता हो या जहां तक आप कंफर्टेबल फील करें. जहां भी आप को लगे कि आप असहज फील कर रही हैं तो उसी समय अपने बौयफ्रैंड को रोक दें.
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