Feel-Good Story in Hindi : मुरलीजी की कचौड़ी

Feel-Good Story in Hindi. मुरलीजी की कचौड़ी पूरे इलाके में अपने स्वाद के लिए मशहूर थीं. पर अब उन के बेटों ने वहां रैस्टोरैंट बना दिया. मुरलीजी को लगा कि कुछ तो गलत हो रहा है और इसी चिंता में वे बीमार हो गए. क्या गलत हुआ था?

मुरलीजी की कचौड़ी की दुकान शहर की छोटी, पर बहुत ही पुरानी दुकान थी. यह दुकान जितनी जगह में छोटी थी, उतनी ही मशहूरी में बहुत बड़ी थी. दुकान पर उन के नाम का कोई बोर्ड नहीं लगा था, बस शहर के लोग उसे ‘मुरलीजी की कचौड़ी’ के नाम से जानते थे.

दुकान के बाहर खुद मुरलीजी कोयले की भट्ठी लगा कर गरम तेल की बहुत बड़ी कड़ाही में कचौडि़यां बनाते थे. वे कचौडि़यां बना कर बहुत बड़े बरतन में उन्हें डालते थे, जहां पर उन का बड़ा बेटा मोहन और नौकर पैसे ले कर कचौडि़यां पैक कर के ग्राहकों को देते थे. साथ में बहुत ही चटपटी चटनी भी देते थे. जो लोग वहीं दुकान पर खाना चाहते थे, उन्हें पुराने अखबार के कागज पर कचौड़ी के ऊपर चटनी डाल कर देते थे.

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ज्यादातर ग्राहक दुकान के बाहर खड़े हो कर कचौड़ी को बहुत चाव से स्वाद लेले कर खाते थे, क्योंकि दुकान के अंदर बैठने के लिए बहुत ही कम जगह थी. सिर्फ एक ही बैंच थी. दुकान पर हमेशा लंबी लाइन लगी रहती थी.

लाइन में खड़े लोग कचौडि़यां बनाते हुए मुरलीजी को बड़े ध्यान से देखते थे. वे गुंदे हुए मैदे के बड़े गोले को कटोरी बना कर उस में आलू का मसाला भरते थे, फिर दोबारा उस का गोला बनाते और दोनों हाथों से दबा कर तश्तरी जैसा आकार दे कर गरम तेल की कड़ाही में एकएक कर के डाल देते थे.

जब 50-50 कचौडि़यां एकसाथ कड़ाही में तलती थीं, तो वह छटा देखते ही बनती थी. कचौडि़यों की खुशबू आसपास फैलती थी और सड़क पर चलते हुए लोग उस खुशबू से खिंच कर वहां चले आते थे.

कई लोग तो कचौडि़यां पैक करा कर दूसरे शहरों में अपने सगेसंबंधियों को भेजते थे, क्योंकि वे कचौडि़यां दूसरे दिन और भी अपना स्वाद बरकरार रखती थीं और इसीलिए दिन में मुरलीजी हजारों कचौडि़यां बेचते थे. इस के चलते शाम तक उन की बड़ी मजबूत तिजोरी पैसों से भर जाती थी. पर उन्हें कभी भी पैसे का घमंड नहीं था, न ही इतनी छोटी दुकान चलाते हुए शर्म आती थी.

हालांकि, मुरलीजी के पास 2-3 बहुत बड़े बंगले थे और शहर में दूसरी जगह खरीदी गई दुकानें भाड़े पर दी हुई थीं, पर उन के दोनों बेटों को इस छोटी सी दुकान पर बैठ कर शर्म आती थी.

मुरलीजी ने अपने बेटों के लिए बहुत ही शानदार बंगला रहने को बनवाया था, पर दुकान जैसे 30 साल पहले थी, वैसे ही आज थी. उन के पास वाली बहुत बड़ी दुकान बिक रही थी और उस के ऊपर का हाल भी बिक रहा था. मुरलीजी ने अपने बेटों के कहने पर रैस्टोरैंट बनाने के लिए हाल समेत वह दुकान मुंहमांगे दामों पर खरीद ली.

बेटों ने उस रैस्टोरैंट में महंगा और शानदार फर्नीचर लगवाया और डिजाइनर टेबलकुरसियां भी रखवाईं. साथ में यूनिफौर्म वाले वेटर भी थे.

यह सारा आइडिया मुरलीजी के छोटे बेटे सोहन का था, जो दिल्ली में पढ़ कर आया था. दिल्ली में उसे अच्छी नौकरी मिली भी, पर तनख्वाह उस के पापा की दुकान की रोज की कमाई से काफी कम थी, इसीलिए उस ने 2-3 महीने नौकरी कर के छोड़ दी. इतने में तो शहर के अच्छे मकान का किराया भी मुश्किल से चुकाया जा पाता है.

मुरलीजी के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. रैस्टोरैंट पर पानी की तरह पैसा बहाया गया. एक दिन शहर के बड़ेबड़े लोगों को न्योता दे कर उस रैस्टोरैंट का उद्घाटन किया गया.

सुबह स्थानीय अखबार में पहले पन्ने पर इश्तिहार भी दिया गया. अमीर घर के लोगों के लिए यह अच्छा था, क्योंकि शहर में कोई बड़ा रैस्टोरैंट था भी नहीं. पर रैस्टोरैंट में खाने का बिल ज्यादा आता था, तो छोटेमोटे ग्राहक रोजाना वहां नहीं आ पाते थे.

अब मुरलीजी को सिर्फ कैश काउंटर पर बैठना था और साथ ही रैस्टोरैंट पर नजर रखनी थी कि सभी को सर्विस बराबर मिल रही है या न. कचौडि़यां दुकान के पुराने नौकर बना रहे थे, साथ में उस के लिए 2-3 नए कुक भी रख लिए गए. वे कई बार कचौडि़यां बना कर गरम करने के लिए उन्हें बड़े ओवन में रख देते थे. अब हर काम दुकान की तरह न हो कर कंपनी की तरह होता था.

भट्ठी अब दुकान के पिछले भाग में लगा दी गई, क्योंकि इतने बड़े रैस्टोरैंट के आगे भट्ठी अच्छी नहीं लगती है. भट्ठी आगे नहीं थी, तो कचौडि़यों की खुशबू भी सड़क पर नहीं फैलती थी. लोग अब दुकान के आगे से आतेजाते, तो महसूस करते थे कि कुछ तो कमी है.

इस तरह से शाही अंदाज में खाना हो तो बड़ा बिल भी चुकाना पड़ेगा. रैस्टोरैंट में खाने का बिल ज्यादा आता था, तो मिडिल क्लास ग्राहक वहां रोजरोज नहीं आ पाते थे. सामने एक बहुत बड़ा स्कूल था. उस में बहुत सारे बच्चे पढ़ते थे. पहले वे आधी छुट्टी होते ही काफी तादाद में कचौड़ी खाने आते थे.

उस समय पूरी सड़क ब्लौक हो जाती थी, इसीलिए मुरलीजी एक घंटा पहले ही कचौडि़यां बना कर रख देते थे और दूसरे ग्राहकों को आधी छुट्टी खत्म होने के बाद आने को कहते थे.

पहले कचौड़ी का जितना बिल होता था, उतनी तो अब रैस्टोरैंट में वेटर की टिप हो जाती थी. अब छोटेछोटे बच्चे रोज रैस्टोरैंट में बैठ कर कचौड़ी नहीं खा सकते ठें, क्योंकि इतना ज्यादा बिल देना उन के बस का नहीं था.

इस सब के बावजूद महंगा वाला रैस्टोरैंट अच्छा ही चल रहा था. हालांकि, अब वहां के खर्चे भी बहुत बढ़ गए थे, धीरेधीरे पहले जो कचौड़ी बेचने में मुनाफा रहता था, वह अब रैस्टोरैंट में नहीं रहा. मुरलीजी को पूरे दिन काउंटर पर बैठना और पैसे गिनना और शाम को हिसाब लगाना अच्छा नहीं लगता था. कह सकते हैं कि उन्हें मजा नहीं आ रहा था और न ही उन्हें ग्राहकों के चेहरे पर संतुष्टि दिख रही थी.

ऐसे ही 2-3 महीने निकल गए. एक दिन मुरलीजी बहुत ज्यादा बीमार हो गए. उन्हें जिंदगी में पहली बार हौस्पिटल में भरती कराया गया. उन के बहुत सारे टैस्ट हुए, पर डाक्टर को उन की बीमारी समझ  में नहीं आ रही थी. इस वजह से डाक्टर टैस्ट पर टैस्ट कराए जा रहे थे कि शायद कोई कहीं तकलीफ पकड़ में आए.

डाक्टर को मुरलीजी की बीमारी पकड़ में नहीं आई, पर मुरलीजी समझ  गए कि वे क्यों बीमार हो गए. उन्हें याद आया कि एक बार वे बिल बनाते समय पैसों को ले कर ग्राहक से ही उलझ  गए थे. वह बहुत पुराना ग्राहक था और सालों से दुकान आता रहा था, पर अब दूसरे शहर में नौकरी के चलते उस का कभीकभार आना होता था. वह ग्राहक जब भी घर आता, तो यहां से 100 के आसपास कचौडि़यां पैक करा कर अपने शहर ले जाता था.

वह ग्राहक इस बार मुरलीजी का यह रूप देख कर हैरानी में पड़ गया कि इस आदमी के चेहरे पर हमेशा ही मुसकराहट होती थी, पर आज झुनझुलाहट क्यों दिख रही है.

‘‘मुरलीजी, आप की तबीयत तो ठीक है न?’’ उस ग्राहक ने प्यार व अपनेपन से सिर्फ इतना ही पूछा.

मुरलीजी को हौस्पिटल के बिस्तर पर लेटेलेटे न जाने कितने ही ऐसे किस्से याद आने लगे. फिर एक दिन उन्हें हौस्पिटल से छुट्टी मिल गई.

एक दिन जब दोनों बेटे सुबह 10 बजे रैस्टोरैंट पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि उन के पापा पुरानी दुकान के आगे भट्ठी लगा कर कचौडि़यां तल रहे थे और उस की वही पुरानी खुशबू के चलते दुकान के आगे लोगों की लंबी लाइन लगी हुई थी.

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आज दुकान में वैसा ही इंतजाम था, जैसा रैस्टोरैंट खोलने से पहले था. तमाम लोग हैरानी से दुकान की ओर बढ़ने लगे और देखने लगे कि आज खुद मुरलीजी कचौडि़यां बना रहे हैं. आज मुरलीजी के चेहरे पर वही पहले वाली रौनक थी.

लोग कानाफूसी करते हुए मुरलीजी से बात करने की कोशिश कर रहे थे, पर आज वे अपने मन के अलावा किसी की नहीं सुन रहे थे. बस, किस ग्राहक को कितनी कचौडि़यां चाहिए, वही पूछ रहे थे और यह भी पूछ रहे थे कि कचौडि़यां पहले जैसी ही बनी हैं न?

दोनों बेटे अपने पापा को देख रहे थे, उन पर गुस्सा हो रहे थे, पर इतने ग्राहकों की भीड़ के सामने उन्हें कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई.

दोपहर को जब मुरलीजी थोड़े फ्री हुए तो छोटे बेटे सोहन ने कहा, ‘‘पापा, यह सब क्या है? इतना खर्च किया हम ने रैस्टोरैंट बनाने पर और आप…’’

मुरलीजी मुसकराते हुए बोले, ‘‘पंछी को पिंजरे में बंद हो कर जैसा लगता होगा, वैसा ही मुझे  लग रहा था. कह सकते हैं कि बहुत बुरा लग रहा था. शायद इसी वजह से मैं अपनी जिंदगी में पहली बार बीमार हुआ.

‘‘मैं ने 40 साल से इसी तरह काम किया है और बंगले बनवाए, बैंक बैलेंस खड़ा किया. अब इस उम्र में मैं बदल नहीं सकता और न ही अपनेआप से कोई समझोता कर सकता हूं. मैं अगर पहले जैसा नहीं बना, तो शायद जी भी नहीं पाऊंगा.’’

‘‘पर पापा, यह जो इतना बड़ा रैस्टोरैंट खोला है, इस का क्या करना?’’ बड़े बेटे मोहन को कुछ समझ  में नहीं आ रहा था.

‘‘बेटा, मैं तो इसलिए तैयार हुआ था कि तुम लोगों को एक छोटी सी दुकान में भट्ठी पर बैठने में शर्म आती है. गलती तुम्हारी नहीं है, क्योंकि तुम ने वह नहीं देखा, जो मैं ने देखा है. तुम लोग पढ़ेलिखे हो, तुम्हारी दोस्ती अच्छे पढ़ेलिखे लोगों से है. तुम लोगों ने शुरू से ही बंगलागाड़ी देखी है, शायद इसीलिए मैं ने रैस्टोरैंट खोलने के लिए तुम लोगों की बात मानी.

‘‘अब यह रैस्टोरैंट तुम लोग चलाओ. जो लोग फास्ट फूड खाना चाहते हैं, पंजाबी और विदेशी खाना खाना चाहते हैं और अच्छी कीमत देना चाहते हैं, उन्हें तुम संभालो. मैं अपनी कचौड़ी की दुकान में ही ठीक हूं.

‘‘मैं कचौडि़यां बनाऊंगा, क्योंकि इस रैस्टोरैंट के चलते मेरे बरसों पुराने कचौड़ी खाने वाले ग्राहक और स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे इस जगह से दूर हो चुके हैं, क्योंकि वे रोजरोज ज्यादा पैसे खर्च नहीं कर सकते हैं. न मेरी कचौड़ी खाने वाले खुश हैं और न ही मैं कचौड़ी बनाने वाला. पर आज हम दोनों ही खुश हैं,’’ लंबी लाइन देख कर वे खुशी से उठते हुए बोले.

इस पर सोहन ने कहा, ‘‘पापा, आप हमें माफ कर दो. हम ने आप को इस उम्र में बदलने की कोशिश की. पर जब हम इस उम्र में नहीं बदल सकते हैं, तो कैसे उम्मीद रखें कि आप को इस उम्र में बदल देंगे.’’  Feel-Good Story in Hindi

Hindi Love Story : आंसू छलक आए

Hindi Love Story. ‘‘देखो विनोद, अगर तुम कल्पना से शादी करना चाहते हो, तो पहले तुम्हें अपने पिता से रजामंदी लेनी पड़गी…’’ प्रेमशंकर ने समझाते हुए कहा, ‘‘शादी में उन की रजामंदी होना बहुत जरूरी है.’’

‘‘मगर अंकल, वे इस की इजाजत नहीं देंगे,’’ विनोद ने इनकार करते हुए कहा. ‘‘क्यों नहीं देंगे इजाजत?’’ प्रेमशंकर ने सवाल पूछा, ‘‘क्या तुम उन्हें समझाओगे नहीं?’’

‘‘मैं अपने पिता की आदतों को अच्छी तरह से जानता हूं. वे कभी नहीं समझेंगे और हमारी इस शादी के लिए इजाजत भी नहीं देंगे…’’ एक बार फिर इनकार करते हुए विनोद बोला, ‘‘आप उन्हें समझा दें, तो अच्छा रहेगा.’’

‘‘मेरे समझाने से क्या वे मान जाएंगे?’’ प्रेमशंकर ने पूछा. ‘‘हां अंकल, वे मान जाएंगे,’’ यह कह कर विनोद ने गेंद उन के पाले में फेंक दी.

विनोद प्रेमशंकर के मकान में किराएदार था. उसे अभी बैंक में लगे 2 साल हुए थे. इन 2 सालों में विनोद ने किराए के मामले में उन्हें कभी दिक्कत नहीं पहुंचाई थी. एक तरह से उन के घरेलू संबंध हो गए थे.

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विनोद के बैंक में ही कल्पना काम करती थी. उसे भी बैंक में लगे तकरीबन 2 साल हुए थे. उम्र में वे दोनों बराबर के थे. दोनों कुंआरे थे. दोनों में कब प्यार पनपा, पता ही नहीं चला.

वे एकदूसरे के कमरे में घंटों बैठे रहते थे. दोनों ही तकरीबन 2 हजार किलोमीटर दूर से इस शहर में नौकरी करने आए थे.

कभीकभी कल्पना की मां जरूर उस के पास रहने आ जाती थीं. तब कल्पना मां से कोई बहाना कर के विनोद के कमरे में आती थी. प्रेमशंकर यह सब जानते थे.

जब कल्पना घंटों विनोद के कमरे में बैठी रहती, तब प्रेमशंकर को लगा कि उन दोनों में प्यार की खिचड़ी पक रही है.

एक दिन मौका देख कर उन्होंने विनोद से खुल कर बात की. नतीजा यही निकला कि विनोद के पिता इस शादी के लिए कभी राजी नहीं होंगे, क्योंकि वह ऊंची जाति का था, जबकि कल्पना निचली जाति की थी.

प्रेमशंकर बोले, ‘‘ठीक है विनोद, अगर तुम कल्पना से शादी करना चाहते हो, तो तुम्हें अपने मातापिता को भरोसे में लेना होगा.’’

मगर विनोद इनकार करते हुए बोला, ‘‘अंकल, वे इस शादी के लिए कभी इजाजत नहीं देंगे.’’

तब प्रेमशंकर ने कहा था, ‘‘आखिर वे भी तो इनसान हैं, कोई जानवर नहीं. तुम उन्हें बुलाओ. अगर वे नहीं आएंगे, तो मैं चलूंगा तुम्हारे साथ उन को समझाने…’’

इस तरह प्रेमशंकर बिचौलिया बनने को राजी हो गए.

विनोद के बुलाने पर पिता अरुण आ गए. साथ में उन की पत्नी मनोरमा भी थीं. प्रेमशंकर ने उन्हें अपने घर में इज्जत से बिठाया.

अरुण बोले, ‘‘बताइए प्रेमशंकर साहब, हमें किसलिए बुलाया है?’’ ‘‘अरुण साहब, आप को खास वजह से ही यहां बुलाया है.’’

‘‘खास वजह… मैं समझा नहीं…’’ अरुण बोले, ‘‘जो कुछ कहना है, साफसाफ कहें.’’ ‘‘ठीक है, पर इस के लिए आप को दिल थोड़ा मजबूत करना होगा.’’

‘‘मजबूत से मतलब?’’ अरुण ने हैरान हो कर पूछा. ‘‘मतलब यह कि आप ने विनोद की शादी के बारे में क्या सोचा है?’’

‘‘उस के लिए मैं ने एक लड़की देख ली है प्रेमशंकरजी. अब विनोद की हां चाहिए और उस की हां के लिए मैं यहां आया हूं,’’ यह कह कर अरुण ने प्रेमशंकर को अजीब सी निगाह से देखा.

‘‘अगर मैं कहूं कि विनोद ने अपने लिए लड़की देख ली है, तो…’’ ‘‘क्या कहा, विनोद ने अपने लिए लड़की देख ली है?’’

‘‘जी हां अरुण साहब, अब आप का क्या विचार है?’’ ‘‘कौन है वह लड़की?’’ अरुण ने पूछा.

‘‘उस के साथ बैंक में ही काम करती है. उस का नाम कल्पना है. आप इस पर क्या कहना चाहते हैं?’’

‘‘मतलब, विनोद कल्पना से शादी करना चाहता है?’’ ‘‘हां,’’ इतना कह कर प्रेमशंकर ने अरुण के दिल में हलचल पैदा कर दी.

‘‘वह किस जाति की है? क्या समाज है उस का?’’ अरुण जरा गुस्से से बोले. ‘‘वह निचली जाति की है,’’ प्रेमशंकर ने बिना किसी लागलपेट के कहा.

‘‘क्या कहा, वह एक दलित घर से है? मैं यह शादी कभी नहीं होने दूंगा…’’ अरुण ने गुस्से में साफ मना कर दिया, फिर आगे बोले, ‘‘अरे प्रेमशंकरजी, शादीब्याह अपनी ही बिरादरी में होते हैं.’’

‘‘हांहां, होते हैं अरुणजी, मगर आप जिस जमाने की बात कर रहे हैं, वह जमाना गुजर गया. यह 21वीं सदी है.’’

‘‘हां, मैं भी जानता हूं. मुझे समझाने की कोशिश न करें.’’ ‘‘जब आप इतना जानते हैं, तब इस शादी के लिए मना क्यों कर रहे हैं?’’

‘‘मैं अपने बेटे की गैरबिरादरी में शादी करा कर बिरादरी पर दाग नहीं लगाना चाहता. मैं यह शादी हरगिज नहीं होने दूंगा.’’

प्रेमशंकर मुसकराते हुए बोले, ‘‘तो आप विनोद की शादी अपनी ही बिरादरी में करना चाहते हैं?’’

‘‘हां, क्या आप को शक है?’’ ‘‘आप विनोद से तो पूछ लीजिए.’’ ‘‘पूछना क्या है? वह मेरा बेटा है. मेरा कहना वह टाल नहीं सकता.’’

‘‘अपने बेटे पर इतना भरोसा है, तो पूछ लीजिए उस से कि वह आप की पसंद की लड़की से शादी करेगा या अपनी पसंद की लड़की से,’’ कह कर प्रेमशंकर ने भीतर की तरफ इशारा कर के कहा, ‘‘विनोद, यहां आ जाओ.’’

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भीतर बैठे विनोद और कल्पना इसी इंतजार में थे. वे दोनों बाहर आ गए. अरुण कल्पना को देखते रह गए.

प्रेमशंकर बोले, ‘‘पूछ लो अपने बेटे से… यह वह कल्पना है, जिस से यह शादी करना चाहता है.’’

‘‘क्यों विनोद, यह मैं क्या सुन रहा हूं?’’ विनोद के पापा अरुण बोले. ‘‘जो कुछ सुन रहे हैं, सच सुन रहे हैं पापा,’’ विनोद ने कहा.

‘‘तुम इस कल्पना से शादी नहीं कर सकते,’’ अरुण ने कहा. ‘‘पापा, मैं शादी करूंगा, तो इस से ही,’’ विनोद बोला.

‘‘मैं तुम्हारी शादी इस लड़की से हरगिज नहीं होने दूंगा.’’ ‘‘मैं शादी करूंगा, तो सिर्फ कल्पना से ही.’’

‘‘ऐसा क्या है, जो तुम इस की रट लगाए हुए हो?’’ ‘‘कल्पना मेरा प्यार है.’’

‘‘प्यार… 2-4 मुलाकातों को तुम प्यार समझ बैठे हो?’’ चिल्ला कर अरुण बोले, ‘‘कान खोल कर सुन लो विनोद, तुम्हारी शादी वहीं होगी, जहां हम चाहेंगे.’’

‘‘पापा सच कर रहे हैं विनोद…’’ मां मनोरमा बीच में ही बात काटते हुए बोलीं, ‘‘यह लड़की हमारी जातबिरादरी की भी नहीं है. इस से शादी कर के हम समाज में अपनी नाक नहीं कटा सकते हैं, इसलिए इस के साथ शादी करने का इरादा छोड़ दे.’’

‘‘मां, मेरे इरादों को कोई बदल नहीं सकता है. शादी करूंगा तो कल्पना से ही, किसी दूसरी लड़की से नहीं.’’

अपना फैसला सुना कर विनोद कल्पना को ले कर घर से बाहर चला गया.

पलभर के सन्नाटे के बाद प्रेमशंकर बोले, ‘‘अब क्या सोचा है अरुण साहब? अब भी आप इस शादी से इनकार करते हैं?’’

‘‘यह सब आप लोगों की रची हुई साजिश है. आप ने ही मेरे बेटे को बरगलाया है, इसलिए आप उस का ही पक्ष ले रहे हैं,’’ कह कर अरुण ने अपनी बात पूरी की.

‘‘अरुण साहब सोचो, विनोद कोई दूध पीता बच्चा नहीं है…’’ प्रेमशंकर समझाते हुए बोले, ‘‘आप उसे डराधमका कर अपने वश में कर लेंगे, यह भी मुमकिन नहीं है. वह नौकरी करता है, अपने पैरों पर खड़ा है. वह अपना भलाबुरा समझता है.

‘‘वह मेरे यहां किराएदार बन कर जरूर रह रहा है, मगर मैं उस को पूरी तरह समझ चुका हूं कि वह समझदार है. वैसे, वह आप की भावनाओं को भी समझता है. मगर वह शादी करेगा, तो कल्पना से ही. इस के पहले मैं भी यह सब बातें उसे समझा चुका हूं, इसलिए आप उसे समझदार समझें.’’

‘‘क्या खाक समझदार है भाई साहब…’’ मनोरमा झल्ला कर बोलीं, ‘‘वह उस लड़की को अपने साथ ले गया है. कहीं वह गलत कदम न उठा ले. सुनो जी, उस की शादी वहीं करो, जहां हम चाहते हैं.’’ Hindi Love Story

‘‘भाभीजी, विनोद ऐसावैसा लड़का नहीं है, जो गलत कदम उठा ले…’’ प्रेमशंकर समझाते हुए बोले, ‘‘अरुण साहब, अगर आप उस पर दबाव डाल कर शादी कर भी देंगे, तब वह बहू के साथ वैसा बरताव नहीं करेगा, जो आप चाहेंगे. दिनरात उन में कलह मचेगी और आपस में मनमुटाव होगा.

‘‘अगर आप उन की मरजी से शादी नहीं करोगे, तब वे कोर्ट में ही शादी कर सकते हैं, क्योंकि कोर्ट उन्हीं का पक्ष लेगा. इसलिए आप सोचिए मत. मेरा कहना मानिए, इन की शादी आप आगे रह कर करें और पिता की जिम्मेदारी से छुटकारा पा जाएं.’’

‘‘मगर इस शादी से समाज में हमारी कितनी किरकिरी होगी, यह आप ने सोचा है?’’ एक बार फिर अरुण अपनी बात रखते हुए बोले.

‘‘समाज तो दोनों हाथों में लड्डू रखता है. थोड़े दिनों तक समाज ताना दे कर चुप हो जाएगा. इस बात पर जितना विचार कर के गहराई में उतरेंगे, उतनी ही तकलीफ उठाएंगे.

‘‘आप अपनी हठ छोड़ दें. इस के बावजूद भी आप अपनी जिद पर अड़े हो, तो विनोद की शादी अपनी देखी लड़की से कर दो. मैं इस मामले में आप से कुछ नहीं बोलूंगा,’’ प्रेमशंकर के ये शब्द सुन कर अरुण के सारे गरम तेवर ठंडे पड़ गए.

वे थोड़ी देर बाद बोले, ‘‘ठीक है प्रेमशंकरजी, मैं अपनी हठ छोड़ता हूं. विनोद कल्पना से शादी करना चाहता है, तो इस के लिए मैं तैयार हूं.’’

‘‘ओह, शुक्रिया अरुण साहब,’’ कह कर प्रेमशंकर की आंखों में खुशी के आंसू छलछला आए. Hindi Love Story

Romantic Story : वे सूखे पत्ते

Romantic Story. आज से 15 साल पहले की बात है. मैं 11वीं जमात में पढ़ता था. वह लड़की हमारी क्लास में नईनई आई थी. उस के पैर में कुछ लचक थी. शायद कुछ चोट लगी हो, इसलिए वह थोड़ा लंगड़ा कर चल रही थी. उस ने 10वीं क्लास में पूरे उदयपुर में टौप किया था और मैं ने अपने स्कूल में.

दिखने में तो वह बला की खूबसूरत थी. मगर कहते हैं न कि चांद में भी दाग होता है, बिलकुल ऐसे ही उस के पैर की वह चोट उस चांद से हुस्न का दाग बन गई थी.

उस ने पहले दिन से ही क्लास के मनचले लड़कों को अपनी खूबसूरती का दीवाना बना दिया था. उस की सादगी की चर्चा हर जबान पर थी.

शुरुआत के चंद महीनों में ही क्लास के आधे से ज्यादा लड़के उसे प्रपोज कर चुके थे. सब को उस के हुस्न से मतलब था, उस से नहीं.

हम लड़कों की सोच गिरी हुई होती है. लड़की को इस्तेमाल करने की चीज सम?ाते हैं. इस्तेमाल किया और फेंक दिया. मगर सबकुछ जानते हुए भी उस ने कभी किसी को जवाब नहीं दिया. न ही नाराजगी से और न ही खुशी से.

और एक मैं था, जो अभी तक उस का नाम भी नहीं जानता था. सच कहूं, तो मैं ने कभी कोशिश भी नहीं की थी. नाम जान कर करना भी क्या था, जब दोनों की दुनिया और रास्ते ही अलग थे.

हर कोई उसे अलगअलग नाम से पुकारता था, इसलिए कभी सुनने में भी नहीं आया उस का असली नाम.

मैं ने उस की आंखें देखी थीं. कुछ बोलती थीं उस की आंखें, मगर क्या बोलती थीं, यह जानने के लिए कभी सोचा ही नहीं. मेरे लिए पढ़ाई ज्यादा जरूरी थी. अनाथ था न मैं. अपना सबकुछ खुद ही देखना था. अपना भविष्य खुद बनाना था.

जिस उम्र में लड़के तरहतरह के शौक पूरे करने में लगे होते हैं, उस उम्र में मैं खुद को एक सांचे में ढालने चला था. भला हो उस गैरसरकारी संस्था का, जो मुझे इस स्कूल में पढ़ा रही थी.

कुछ दिनों के बाद इम्तिहान हो गए. उस लड़की ने क्लास में फिर से टौप कर दिया. मेरी सालों से चली आ रही क्लास में पहली पोजीशन की हुकूमत को उस ने खत्म कर दिया था.

हमारे क्लास टीचर क्लास में आए और बोले, ‘‘सरोज, तुम ने 96 फीसदी नंबर ला कर क्लास में टौप किया है.’’

मुझे धक्का लगा कि मैं पीछे कैसे रह गया. मैं इतनी मेहनत से तो पढ़ा था. टीचर दोबारा बोले, ‘‘राघव, तुम्हारे  95.8 फीसदी नंबर आए हैं. तुम दूसरे नंबर पर हो.’’

इस पर मुझे राहत सी मिली कि बस थोड़ा सा फर्क है. मगर फर्क क्यों है, इस का जवाब मुझे  खुद को देना था. यह जवाब मैं कहां से लाता?

मैं पूरी क्लास में यही सोचता रहा. सब लड़के खुश थे. जो फेल थे वे भी, क्योंकि उन्हें उस का असली नाम पता लग गया था.

क्लास खत्म होने पर मैं उस से मिला और बधाई दी. वह इस की हकदार भी थी, इसलिए उस ने भी मुझे  बधाई दी.

यह हमारी पहली मुलाकात थी. इस के बाद आगे के दिनों में धीरेधीरे बातें होने लगीं, मगर जबान से नहीं, बस इशारों से. दूर से देख कर हाथ हिला देना, मगर सामने होने पर चुपचाप निकल जाना, यह हमारे लिए बहुत आम हो गया था.

फाइनल इम्तिहान आने वाले थे. हमारी बातें अब शुरू होने लगी थीं. मगर मैं ने कभी सरोज के बारे में जानने की कोशिश नहीं की, बस हालचाल पूछ लिया करता था.

फिर एक दिन वह बोली, ‘‘इम्तिहान के बाद मिलना.’’

मगर कहां मिलना, यह नहीं बताया. मैं कुछ देर सोचता ही रहा कि कहां और क्यों? क्यों का जवाब तो यह था कि हम दोस्त थे, मगर कहां का जवाब मुझे नहीं मिल रहा था. क्या मेरे घर में? मगर मैं तो अनाथ आश्रम में रहता हूं. तो क्या फिर उस के घर में? मगर उस का घर तो मुझे पता ही नहीं. तो कहां? फिर उसी ने बताया कि स्कूल के पास वाले बाग में मिलना. मेरे अंदर के सवालों का तूफान थाम दिया था उस के इस जवाब ने.

इम्तिहान खत्म हुए. हम मिले, हम फिर मिले, हम बारबार मिले. एक अजीब सी, मगर बहुत प्यारी सी धुन लग गई थी दोनों को एकदूसरे के साथ की. फिर एक दिन मैं ने उसे बताया कि मैं अनाथ हूं, तो जवाब मिला कि वह भी अनाथ है.

मेरी तो यह जान कर जैसे सांसें ही थम गई थीं कि इतनी प्यारी लड़की  के मांबाप नहीं हैं.

बला की खूबसूरत लड़की इस नोच खाने वाले समाज में अपना वजूद बनाए हुए थी. समझ आ गया था मुझे  कि उस की आंखें क्या बोलती थीं और क्यों वह इतनी नरम मिजाज थी.

मुझे  आज उन सवालों के जवाब भी मिल गए थे, जिन सवालों को मैं ने कभी सोचा भी नहीं था.

फिर कुछ देर चुप रहने के बाद मैं ने बड़ी हसरत से उस से पूछा, ‘‘क्या अब तक तुम्हारा कभी कोई दोस्त रहा है?’’

वह हथेली भर के सूखे पत्ते ले आई और बोली, ‘‘ये हैं मेरे दोस्त.’’

मुझे  कुछ समझ  नहीं आ रहा था कि सरोज क्या बोल रही है. मैं हंस भी नहीं सकता था, क्योंकि उस के चेहरे पर हंसी  नहीं दिख रही थी.

‘‘सरोज, मैं कुछ समझा नहीं?’’ मैं ने बहुत जिज्ञासा से पूछा.

जब उस की आंखें सबकुछ बोलती ही थीं, तो क्यों आज मैं उस की जबान का बोला हुआ शब्द समझ नहीं पा रहा था. वह चाह रही थी कि उस का यह दोस्त उस की आंखें पढ़ कर जान जाए कि क्यों ये सूखे पत्ते उस के दोस्त थे. मगर उस ने नहीं बताया और मैं ने भी मान लिया कि शायद दुनिया में कहीं उस का भरोसा टूटा होगा, इसलिए वह ऐसी बातें करती है.

हमारी बातों के सिलसिले अब काफी बढ़ गए थे और हम धीरेधीरे बहुत करीब आ गए थे. एक लगाव था, एक अधूरापन था, जो साथ रह कर ही पूरा होता था. मैं जानना चाहता था उस का और उस के सूखे पत्तों का रिश्ता. मैं इतना करीब तो था उस के, मगर उस के दोस्त अब भी सूखे पत्ते ही थे.

फिर एक दिन मेरे मन में यह सवाल उठा कि स्कूल से पढ़ाई खत्म होने के बाद हम कैसे मिलेंगे? मगर यह सवाल मैं उस से सुनना चाहता था और यह भी जानता था कि वह नहीं पूछेगी, क्योंकि उसे मुझ से ज्यादा उन सूखे पत्तों से जो लगाव था.

स्कूल की पढ़ाई खत्म हो गई. उस से मिले हुए काफी दिन गुजर गए. अकेलापन महसूस होने लगा था और यह अकेलापन मुझे काटने को दौड़ता था. सरोज लौट गई थी अपनी दुनिया में, अपने उन सूखे पत्तों के पास या फिर कहीं और.

फिर एक दिन मैं ने स्कूल जा कर पता किया. कितना बेवकूफ था मैं. इतना वक्त साथ रहे, मगर कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह रहती कहां थी. मैं अपने टीचर के पास गया और सरोज का पता पूछा.

टीचर बोले, ‘‘राघव, पता तो मुझे भी नहीं मालूम, मगर सरोज तुम्हारे लिए एक चिट्ठी छोड़ गई है.’’

मैं बहुत खुश हुआ, मगर न जाने क्यों मेरे हाथ कांप रहे थे उस चिट्ठी को खोलने में. जिंदगी में पहली बार किसी ने मुझ अनाथ को चिट्ठी लिखी थी.

टीचर बोले, ‘‘अरे, यह क्या? जो राघव हमेशा पढ़ने में अव्वल रहा, आज उस के हाथ इस मामूली सी चिट्ठी को लेने में कांप क्यों रहे हैं?’’

‘‘पता नहीं, सर. मगर यह मामूली नहीं है,’’ इतना कह कर मैं वहां से बहुत तेजी से भाग निकला. और क्या भागा यह मैं भी नहीं जानता. शायद मुझ में हिम्मत नहीं थी उस वक्त का सामना करने की.

मैं बहुत भागा और न जाने क्यों मेरे कदम उस बाग की ओर बढ़ते चले गए, जहां हम अकसर मिलते थे.

मेरी सांसें बहुत तेज चल रही थीं. थकने की वजह से नहीं, डर की वजह से. और डर था उसे खो देने का. डर था मुझे  कि यह चिट्ठी पढ़ते ही मैं उसे खो दूंगा. या उस का मेरे लिए पहला और आखिरी खत था. क्या करूं, कुछ समझ  ही नहीं आ रहा था. अभी पढ़ूं कि नहीं.

मन में हजारों बुरे खयाल आ रहे थे. सांसें भी थमने का नाम नहीं ले रही थीं. फिर सोचा, ‘शायद उस ने इस में अपना नया पता लिखा हो.’

बहुत हिम्मत कर के मैं ने वह खत खोल ही दिया और वह कुछ यों था:

‘प्यारे दोस्त राघव,

‘मैं जानती हूं कि यह खत पढ़ने से पहले तुम ने हजार बार सोचा होगा. तुम्हारे हाथ कांपे होंगे, धड़कनों का शोर कुछ ज्यादा हो गया होगा. मन में हजारों तरह के खयाल आ रहे होंगे और उन में सब से बड़ा सवाल यह होगा कि मेरे दोस्त सूखे पत्ते ही क्यों?

‘राघव, मैं ने तुम्हें कभी नहीं बताया, पर अब बताती हूं. मैं अपने मातापिता की एकलौती लड़की थी. जिस घर में मैं पैदा हुई, वहां लड़की का पैदा होना जुर्म माना जाता था. जब मैं 4 साल की थी, तब मेरे पिता ने मुझे छत से नीचे फेंक दिया था. मैं आंगन में रखे उन सूखे पत्तों के ढेर पर गिरी थी, जिसे कुछ देर पहले मेरी मां ने जमा किया था. तब मैं तो बच गई, मगर मेरा पैर टूट गया था.

‘पिताजी की ऐसी गिरी हुई हरकत देख कर मां ने वहीं पर रखी कुल्हाड़ी से उन की जान ले ली. उन्होंने मुझे  बहुत प्यार से गले लगाया, खूब रोईं. मैं भी रो रही थी. फिर मां ने मुझे  छोड़ा और घर बंद कर के खुद को आग लगा ली. मां भी मर गईं और मैं छोटी सी लड़की 4 साल की उम्र में ही अनाथ हो गई.

‘किसी रिश्तेदार ने मेरी जिम्मेदारी नहीं ली. जिस उम्र में औलाद को उस की मां के सहारे की सब से ज्यादा जरूरत होती है, वह सहारा मुझ  से छिन गया था. मां के आंचल में खेलने की उम्र में मुझे अनाथालय वाले ले गए.

‘वहां जब मैं गई, तो हर बार बस अपना गिरना याद आता था. उस वक्त मुझे बचाने वोल वे सूखे पत्ते ही थे, जिन से मैं ने कभी बात तक नहीं की थी. उन बेजबानों ने मुझे  एक नई जिंदगी दे दी थी. मेरा पैर हमेशा के लिए खराब हो गया था.

‘मैं आज भी हर रोज जब सड़कों पर गिरे सूखे पत्ते देखती हूं, तो मुझे वही ढेर याद आता है. मैं उन का कुछ इसी तरह एहसान मानती हूं कि जब मेरा अपना पिता मेरा अपना नहीं हो सका, तब इन गैर और बेजबान पत्तों ने मुझे सहारा दिया.

‘मुझे  जब भी इस बेहया दुनिया से डर लगता है, मैं अकसर इन्हें खत लिखती हूं. मैं इन का एक ढेर बनाती हूं, फिर एक हवा का झोका आता है और उस ढेर के सब पत्तों को मेरे चारों ओर फैला कर कहता है कि भरोसा रखना सरोज… ये सूखे पत्ते हमेशा तेरे साथ हैं… हमेशा.

‘मैं जानती हूं राघव कि तुम यह खत अभी उसी बाग में बैठ कर पढ़ रहे हो, और तुम्हारी आंखें भीग गई हैं. मुझे माफ कर देना तुम्हें चुपचाप छोड़ कर जाने के लिए. मगर महसूस कर के देखना… मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं, इन सूखे पत्तों की तरह.

‘तुम्हारी सरोज.’

मेरी आंखें सच में भर आई थीं. एक आह निकल गई थी मेरे दिल से. आज समझ आ गया था कि क्यों हैं ये सूखे पत्ते उस के दोस्त… कितना जानती थी वह मुझे .. उसे पता था कि मैं यह खत उस बाग में ही पढ़ूंगा. अब समझ आया कि क्यों मेरे पैर भागतेभागते मुझे  इस बाग में ले आए थे.

मैं सरोज के दोस्तों को ले कर बनाए हुए ढेर में सरोज की दुनिया को बड़े गौर से देख रहा था कि न जाने कहां से अचानक एक हवा का झोका आया, जिस ने उन पत्तों को मेरे चारों ओर फैला दिया और मुझे सच में एहसास होने लगा कि सरोज मेरे बहुत करीब है… बहुत ही करीब…

छुटकारा: क्या ऐसे मिलता है लड़की से छुटकारा

खुला सा आंगन. आंगन में ही है टूटाफूटा सा बड़ा दरवाजा और उस दरवाजे से लग कर 2 कमरे. कमरों से सटे हुए बरामदे में रसोई. यह है गंजोई का घर. 4 बेटियां और पत्नी है गंजोई के परिवार में.

गंजोई की पत्नी सुगना पुरानी साड़ी की फटी पट्टियों से गुंथी रहती. मैली सी चारपाई पर गंजोई पैर फैला कर लेटा रहता और सुगना अपनी बातों से उस का मन बहलाया करती.

सुगना को पति की सेवा से फुरसत मिलती, तो घर की खोजखबर लेती. गंजोई तो अजगर था. दास मलूका का शुक्रिया अदा करता और अपने दाने के इंतजार में पड़ा रहता. गंजोई की बड़ी बेटी अंजू 15 साल से कुछ ऊपर. काली, ठिगनी, सुस्त, थोड़ी मोटी और चुपचुप सी रहती थी. वह लोगों के घरों में झाड़ूबरतन किया करती और धीरेधीरे उस ने अपनी दोनों छोटी बहनों को भी जानपहचान के घरों में काम पर लगवा दिया था.

अंजू के बाद वाली संजू 13 साल की दुबलीपतली, गठी हुई, उम्र के मुताबिक सही कदकाठी. खूबसूरत तो नहीं, पर बदसूरत भी नहीं थी वह. धीमी और मीठी आवाज. जल्दीजल्दी काम निबटाती. जिन घरों में काम करती, वहीं के बच्चों से वह अपना मन बहलाती.

8 साल की रंजू बेहद दुबली. गेहुआं रंग. उलझेउलझे तेल चुपड़े बाल और मैली सी फ्रौक. उस के काम में सब से ज्यादा फुरती थी. उस का मन मचलता था अपने साथ के बच्चों के साथ खेलने और भागनेदौड़ने के लिए, इसलिए वह जल्दीजल्दी काम करने की कोशिश में कुछ न कुछ गड़बड़ करती रहती और डांट सुनती रहती, पर थी धुन की पक्की.

सब से छोटी रीना 6 साल की थी. अंजू के साथ काम पर जाती और उस की मदद करती. बरतन मांजना अभी वह सीख रही थी और झाड़ू ठीकठाक लगा लेती थी  कुलमिला कर सारी बहनें मिल कर दालरोटी का जुगाड़ कर लेती थीं.

एक चीज थी, जो चारों बहनों में एकजैसी थी. उन की खाली आंखों में जिंदगी की चमक. खूब जीना चाहती थीं. वे सब जो भी थीं, जैसे भी थीं, खूब हंसना और कुछ न कुछ गुनगुनाते रहना उन की आदत थी.

महल्ले की औरतें ज्यादातर मजदूर थीं या फिर लोगों के यहां आया, महरी का काम करती थीं. गंजोई जब घर पर नहीं होता था, तो सुगना रेशमी साड़ी पहन कर किसी पड़ोसन के यहां जा बैठती. औरतें भी बातोंबातों मे उसे छेड़तीं, ‘ये चटकमटक के दिन तेरे नहीं तेरी बेटियों के हैं. जवानी में भी उन से अपने ही घर का पानी भरवाएगी क्या?

‘लड़कियां बड़ी हो रही हैं. भेज अपने निठल्ले मरद को बाहर. घरबार देखे. रिश्ताकुनबा देखे. ऐसे घर बैठे तो कोई तुम्हारे दरवाजे चढ़ेगा नहीं.’

सुगना खिसियानी सी हंसी हंसती और बोलती, ‘‘तू ही बता सरोज, हमारे पास न जेवर है, न जमीन. जो थोड़ाबहुत मेरी सास के गांठपल्ले था, वह पहले ही अंजू के बापू ने दारू में घोल कर चढ़ा लिया. अब तो ऐसा है कि चूल्हा भी अनाज देख कर ही गरम होता है.’’ ‘‘अरे तो उसे काम पर क्यों नहीं भेजती? इतनी बड़ी अनाज की मंडी है, बड़ेबड़े आढ़ती बैठते हैं. जाए किसी के पास. कोई न कोई काम मिल ही जाएगा, बेटियों की कमाई से घर चलता है कोई,’’ सरोज की सास ने दोटूक सुनाया.

अब सुगना ने वहां से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी. ऐसा नहीं है कि सुगना और गंजोई को अपनी जवान होती बेटियों की फिक्र नहीं थी, पर वे दोनों ठहरे मिजाज के मस्तमौला. उन्हें लगता था कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा.

सुगना और गंजोई का परिवार समय की ताल में ताल मिलाता एकएक कदम उस के साथ चलता चला जा रहा था. समय भी चिकनी सड़क पर सरपट चाल चल रहा था बिना किसी रुकावट के, बिना किसी मुश्किल के. अंजू की ज्यादातर सखियों का ब्याह हो चुका था, पर उसे अपने ब्याह न होने का मलाल न था. न ही उसे जरूरत महसूस होती थी. सुगना और गंजोई को उस के ब्याह की काई आस न थी. इसलिए कोशिश करने का खयाल भी किसी के धकियाने से ही आता था और धक्का हटते ही वे फिर आराम की मुद्रा में टेक लगा लेते और फिर घर चलाने में अंजू का अहम योगदान था.

संजू भी 14 साल की उम्र में ज्यादा तीखी और मुखर हो गई थी. अब वह घर से निकलती, तो उस की उभरती देह पर चुस्त फिटिंग वाला सूट होता. अपनी मालकिनों की उतरन को सजाचमका कर जब वह अपने तन पर डालती, तो उन पुराने कपड़ों से भी ताजगी फूट पड़ती. महल्ले के जवान होते मजदूर बच्चे छिपछिप कर उसे देखते और वह उन्हें देख कर बड़ी अदा से अनदेखा कर देती, मानो सावन को पता ही न हो कि उस की बारिश में सब भीग जाता है.

अब संजू का ध्यान काम में कम लगता, सोचती और मुसकराती रहती. उस के साथ की लड़कियां उस से चिढ़तीं, ‘बड़ी फैशन वाली बन गई है. बरतन मांजने जाती है या थाली में मुंह देखने? ’ अंजू भी पीछे न रहती. वह कहती, ‘‘अरे, बरतन तो मुझे देखते ही चमक जाते हैं. तुम्हारी तरह नहीं कि शक्ल देख कर घूरा भी छींक दे.’’

गंजोई के घर से बाईं तरफ 3 मकान छोड़ कर कमलकिशोर का घर था. वह एक 17 साल का ठीकठाक सी शक्ल वाला लड़का था, जो बाजार में साइकिल की दुकान पर पंचर लगाने का काम करता था.वह जवानी के उस पायदान पर था, जहां सबकुछ खूबसूरत और आसान लगता है. खाली समय में रंगीन चश्मा लगा कर वह फिल्मी गाने गुनगुनाता.उस ने मालिक से बड़ी मिन्नत कर के दुकान से एक पुरानी साइकिल ले ली थी और साइकिल की दुकान पर मंजे हुए अपने हुनर को आजमा कर उस साइकिल को नई जिंदगी दे डाली थी.

एक दिन कमलकिशोर घर के बाहर खड़ा हो कर अपनी साइकिल को साफ कर रहा था और साथ ही कुछ गाना गुनगुना रहा था, ‘‘चोरीचोरी आ जा गोरी पीपल की छांव में, कहीं कोई…’’ तभी उस की नजर संजू पर पड़ी, ‘‘यह कौन है. बड़ी मस्त दिख रही है.’’

इतने में संजू की नजर कमलकिशोर पर पड़ी. आंखें सिकोड़, कमर पर हाथ रख संजू थोड़ा गुस्से और बड़ी अदा से गुर्रा कर बोली, ‘‘आंखें फाड़ कर क्या देख रहा है? बोलूं तेरे बापू को?’’

‘‘भड़क क्यों रही है? देख ही तो रहा हूं. तू सुगना काकी की बेटी है न? चल, नाम बता अपना?’’ कमलकिशोर ने उस की तरफ बढ़ते हुए फिल्मी अंदाज में पूछा.

संजू को हंसी आ गई, ‘‘चल जा अपना काम कर,’’ कह कर वह घर में घुस गई. कमलकिशोर का मन गुदगुदाहट से भर गया. संजू को गए बहुत वक्त बीत चुका था, पर वह वहीं खड़ा अब भी उन पलों को आगेपीछे कर के अपने सपनों में जी रहा था.

‘‘संजू, जरा चूल्हा जला दे और आटे में थोड़ा नमक डाल कर मुझे दे दे. खाने का समय हो गया है. बस, अभी सब खाना मांगने वाले हैं,’’ अंजू ने कहा. इतने में ही सुगना की आवाज आई, ‘‘ऐ अंजू, खाना कब देगी? मुझे जोरों की भूख लगी है.’’

सुगना और गंजोई आंगन में पड़ी खाट पर जमे हुए थे. गंजोई आसमान की ओर मुंह कर के लेटा था और सुगना उस के पैर दबा रही थी. रसोई में जान खपाने से ज्यादा आसान था यह काम. गंजोई के खाते ही सुगना खुद खाने बैठ जाती, फिर बाद में बच्चे आपस में मिलबैठ कर खा लेते.

‘‘हांहां, खाना बन रहा है,’’ संजू ने चिढ़ कर जवाब दिया. अंजू ने संजू की तरफ देखा, पर बोली कुछ भी नहीं. अब उसे संजू के लिए फिक्र होने लगी थी. जब तक उस का खुद का ब्याह न हो जाता, तब तक संजू का ब्याह होना मुश्किल था. अपनी आस उसे थी नहीं, पर संजू…

आज रात संजू को भी नींद नहीं आ रही थी. ‘चल, नाम बता अपना’ उस के कानों में गूंज रहा था. उसे फिर हंसी आने लगी. वह कमलकिशोर ही तो था. कितनी ही बार तो देखा है उसे, फिर आज क्या बात हो गई? संजू समझने की कोशिश कर रही थी.

आज संजू की लाली में कुछ ज्यादा ही चमक थी. शायद सुबह की धूप का असर था या फिर रात को दबे पैर उस की चारपाई में घुस आए खयालों का, पता नहीं. घर से पहला कदम ही निकला था कि नजर बाईं ओर मुड़ गई. हड़बड़ाहट में दूसरा कदम तो बाहर निकला नहीं, पहला भी अंदर चला गया.

दरवाजे की ओट ले कर संजू अपनी घबराहट पर काबू पाने की कोशिश करने लगी. अपने घर के बाहर कमलकिशोर पूरी तरह मुस्तैद खड़ा था. आखिर संजू की चारपाई से निकल कर वह खयाल उस के भी तो बिस्तर में घुसा था.

कमलकिशोर की नजर संजू पर पड़ चुकी थी. वह समझ गया था कि संजू काम पर जाने वाली है. वह पहले ही साइकिल ले कर उस के काम की दिशा की ओर चल पड़ा थाइधर संजू भी संभल चुकी थी. वह तन कर बाहर निकली, बाएं देखा, फिर दाएं देखा, फिर एक निराशा की ढीली सांस, जिस में राहत पाने की भरसक कोशिश की गई थी, छोड़ते हुए अनमनी सी काम पर चल दी.

‘‘संजू, तेरे मांबापू तेरा ब्याह मुझ से तो क्या किसी से भी नहीं होने देंगे,’’ कमलकिशोर संजू से कह रहा था. कमलकिशोर और संजू को एकदूसरे के नजदीक आने में ज्यादा समय नहीं लगा था. दोनों को एकदूसरे का साथ अच्छा लगता. अपना काम खत्म कर दोनों रोज मिलते, एकदूसरे के साथ जीने के सपने देखते. सुगना और गंजोई की बेजारी संजू की चाह को और हवा देती, पर वह अंजू के बारे में सोच कर बेचैन हो जाती. उसे कोई रास्ता नजर नहीं आता था, जो उस घर की बेटियों को ससुराल के दरवाजे तक पहुंचाता हो. मांबाप को अपनी कमाऊ बेटियों को विदा करने की कोई जल्दी न थी.

अंजू को संजू और कमलकिशोर के इश्क की खबर थी, संजू ने ही उसे बताया था एक दिन.

‘‘संजू, भाग कर जाएगी मेरे साथ?’’

‘‘चल हट. बड़ा आया भगा कर ले जाने वाला. कहां रखेगा? क्या खिलाएगा मुझे? और मेरे घर वाले? महल्ले वाले जीने नहीं देंगे. मेरी बहनों की जिंदगी खराब हो जाएगी,’’ संजू ने उसे घुड़का और आखिरी बात कहतेकहते उसे खुद की आवाज सुनाई नहीं दी, आंखें सिकुड़ गईं और चेहरे पर उदासी उभर आई.

कमलकिशोर ने हलके से झिड़क कर कहा, ‘‘तो यहां रह कर तू कौन सा उन का घर भर देगी. भाग चल. तेरे बाप का बोझ कुछ कम हो जाएगा. यहां रह कर जिंदा भूत की तरह बरतन ही तो घिसेगी. मेरे साथ चल, तेरी जिंदगी संवार दूंगा.’’

संजू ने उसे घूर कर देखा, पर बोली कुछ नहीं . गरमी की रात में सभी आंगन और बरामदे में ही सोते थे. आज संजू ने अपना बिस्तर अंजू के साथ जमीन पर ही बिछा लिया था. चारपाइयां कम थीं, सो अंजू जमीन पर ही सोती थी. रीना और रंजू भी एक चारपाई पर वहां बेसुध सो रही थीं. सुगना बरामदे में थी.

संजू और अंजू दोनों चुपचाप सी आसमान को घूर रही थीं. दोनों को नींद नहीं आ रही थी. वे चुप थीं, पर शायद उन के मन के बीच संवाद चल रहा था. संजू जरा बेचैन दिखी, तो अंजू ने अपना हाथ उस के सिर पर रखते हुए पूछा, ‘‘क्या हुआ संजू, नींद नहीं आ रही है?’’

बेहद अपनेपन में भीगे शब्दों की नमी में संजू भी नहा गई, ‘‘हां दीदी, आज तो नींद सचमुच नहीं आ रही.’’

‘‘अच्छा, यह बता कि कमलकिशोर कैसा है? क्या लाया वह आज तेरे लिए? आजकल तो तू कुछ बताती ही नहीं मुझे,’’ अंजू ने बनावटी गुस्से से मुंह फुला कर कहा.

संजू ने अंजू की तरफ देखा और खिलखिला कर हंस दी, ‘‘दीदी, तुम बड़ी चालाक हो. मेरा मुंह खुलवाने के लिए कमलकिशोर का नाम ले दिया.’’

कमलकिशोर का नाम लेते ही संजू जरा संजीदा हो गई. ठंडी सांस छोड़ते हुए उस ने कहा, ‘‘दीदी, आज वह मुझे अपने साथ भाग चलने के लिए कह रहा था.’’

‘‘तो भाग जा. किस के लिए रुकी हुई है?’’ अंजू ने सहज भाव से कहा.

और एक दिन महल्ले में आग लग गई. गंजोई पहली बार हरकत में आया, ‘‘अरी सुगना, संजू आई क्या?’’

‘‘नहीं. अंजू के बापू,’’ कहते हुए सुगना बीच आंगन में बैठ छाती पीटपीट कर रो रही थी.

दिन ढल रहा था. सुबह से निकली संजू का अब तक कुछ पता न था. गंजोई ने हर जगह खबर ले ली थी और यह बात अब पूरे महल्ले को पता थी. पता चला था कि कमलकिशोर भी सुबह से गायब था. दो और दो चार भांपने में किसी ने समय न गंवाया. गंजोई ने अपना सिर पीट लिया.

सुगना रोरो कर बच्चियों को कोस रही थी, ‘‘जाओ, तुम लोग भी भाग जाओ, कोई न कोई मिल ही जाएगा चौक पर. अरे, भागना ही था तो तू ही भाग जाती,’’ उस ने अंजू की तरफ इशारा कर के कहा, ‘‘भगोड़ों का घर नाम धरा जाएगा हमारा. अंजू के बापू कुछ करो. हाय, यह क्या कर दिया? अब तो जिंदगी पत्थर जैसी भारी हो जाएगी. लोग हमें जीने नहीं देंगे, कौन ब्याहेगा इन बेटियों को?’’

गंजोई महल्ले के बड़ेबूढ़ों के आगे रो रहा था. एक बुजुर्ग ने अपनी घरघराती आवाज में लताड़ा, ‘‘देख गंजोई, तू ने तो कभी खबर ली नहीं अपने बच्चों की, अब पछताने से क्या होगा. लड़की भाग गई और धर गई कलंक तेरी सात पुश्तों पर. अब जरा सुध ले और बाकियों को संभाल.’’

‘‘देख, अब तू हमारी बिरादरी से बाहर हो गया है. हमारे भी लड़केलड़कियां हैं. कुछ तो कायदाकानून रखना पड़ेगा,’’ एक ने कहा था.

यह सुन कर गंजोई फफक कर रो पड़ा. वह हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘देखिए, आप लोग ऐसा मत कहिए. आप ही साथ छोड़ने की बात करेंगे, तो हम किस से मदद मांगेंगे. मुश्किल में तो अपने ही काम आते हैं.’’

हुमेशा यहां के एक मंदिर के बुजुर्ग थे. वे बहुत ही कांइयां मिजाज के थे. कुछ सोच कर उन्होंने कहा, ‘‘देख गंजोई, जब हम गांव में रहते थे, वहां के नियमकानून अलग थे. या यों कह लो कि बड़ेबुजुर्गों ने बड़ी सूझबूझ के साथ परिवार पर विपत्ति का तोड़ निकाला था. जो तब भी सही थे और अब भी सही ही माने जाएंगे.

‘‘गांव में जब कोई लड़की भाग जाती थी, तो उस परिवार को जाति से बाहर कर दिया जाता था और बच्चे की एक नादानी की वजह से पूरा कुनबा बरबाद हो जाता था.

‘‘तू अपनी लड़की को न खोज, न ही उसे दोबारा घर में घुसने देना. तू उस का श्राद्ध कर दे, ऐसा करने से माना जाता है कि लड़की भागी नहीं मर गई. फिर कोई उंगली नहीं उठाता. यह हमारी जाति का एक रिवाज है, जो गांव में आज भी माना जाता है. गांव वालों को खूब खिलापिला कर खुश कर दिया जाता है. फिर सब उसे मरा मान कर भूल जाते हैं.’’

गंजोई ने संजू का श्राद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उस ने तय भोजन से 2 अतिरिक्त पकवान बनवाए. सुगना ने चाव से सब को परोसा. अंजू ने भी जलेबी खाई. हुमेशा को 2 जोड़ी कपड़े भी दिए गए. कमलकिशोर के परिवार को उस का श्राद्ध करने की जरूरत नहीं थी. वह तो लड़का था न.

Hindi Kahani: ईयरफोन

Hindi Kahani: 20 साल के मजदूर रघु पर ईयरफोन का ऐसा जुनून चढ़ा कि वह हर वक्त उन्हें कान में ठूंसे रहता. बंशी चाचा ने इस के खतरे बताए, पर वह अनजान बना रहा. एक दिन गांव जाते समय रघु हाईवे पर ईयरफोन पर गाने सुन रहा था कि तभीवे सभी बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन के काम में लगे थे. सुबहसुबह अपने गांव से निकल कर फतुहा से पटना जाने वाली ट्रेन से वे रोजाना वहां पहुंच जाते थे. जैसी कि उम्मीद थी, पूजा के पहले ही बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन का यह काम पूरा हो जाना था. ऐसे में उन्हें अपने गांवघर में छुट्टी काटने की उम्मीद थी. मगर कुछ वजह से ऐसा मुमकिन नहीं हो सका था.

रघु के बाबा कहा करते थे, ‘राजा का भी महल तय समय में पूरा नहीं होता…’ तो फिर इस बिल्डिंग का काम कैसे पूरा होता. जो भी हो, मालिक ने कह रखा था कि वह छुट्टियों में काम बंद रखेगा और उन्हें पूरे पैसे देगा. इस बात से वे सभी खुश थे. बीसेक साल के रघु को दूसरे तमाम नौजवानों के समान ही मोबाइल फोन में दिलचस्पी थी. फिर हालात कुछ ऐसे बने कि उसे पढ़ाईलिखाई छोड़ कर काम में लगना पड़ा.
पिछली बाढ़ में रघु के गांवघर की फसल मारी गई थी. ऐसे में कहीं कहीं काम तो करना ही था. सो, वह भी दिहाड़ी मजदूरी में लग गया था. वही क्यों, उस के गांव के दर्जनों लोग दिहाड़ी मजदूर के रूप में पटना में काम पर जाया करते थे. महीने में दसेक दिन भी काम मिल गया, तो महीनेभर का खर्च निकल आता था.
और यहां तो जब बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन में काम मिला, तो जैसे सब की खुशी का ठिकाना नहीं रहा था. अब आराम से महीनेभर काम मिलेगा, तो अच्छे पैसे भी बनेंगे.

और जब घर में पैसे हों, तो अगली वासंती फसल के लिए बीजखाद और पटवन का भी इंतजाम हो जाएगा. तीजत्योहार भी अच्छे से मनाया जा सकेगा. एक बात तो तय है कि आजकल सभी नौजवानों के पास अपना एंड्रौइड मोबाइल फोन है, जिस से सभी का मनोरंजन होता है. बूढ़े तो अभी भी बस कीपैड वाले पुराने फोन का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि उन्हें एंड्रौइड  मोबाइल चलाना नहीं आता. लेकिन गरीब हैं, तो क्या हुआ. दीनदुनिया की खबर तो यूट्यूब, फेसबुक, व्हाट्सऐप से ही पता चल पाती है . इस के अलावा भी इस में कितना सारा कुछ है देखनेसुनने के लिए. कितने सारे फीचर हैं इस में और यहां कोई नौजवान पीछे नहीं रहना चाहता. सभी के अपने दोस्त हैं, गर्लफ्रैंड हैं, तो उन से भी तो बात करनी है. उन पर रोबदाब कायम करना है. इस के लिए मोबाइल फोन से सही और क्या हो सकता है. लेकिन दिक्कत यह है कि हर महीने इसे चार्ज भी तो कराना पड़ता है, जिस में अच्छे पैसे लग जाते हैं, इसलिए तो कहीं कामधंधा करना जरूरी है.

कुछ दिन पहले की बात है कि बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन की साइट पर मालिक का बेटा संतोष आया था. रघु सिर पर ईंट लिए चार मंजिले पर चढ़ रहा था. संतोष मजदूरों को कभी कुछ निर्देश देता, तो अपने कान से ईयरफोन निकाल कर उन्हें कुछ कहता. फिर अपने कान में ईयरफोन तुरंत लगा लेता था. उन लोगों को भी उत्सुकता होती कि आखिर कान में लगा ईयरफोन है कैसा. संतोष रघु का ही हमउम्र होगा. उस की बात पर संतोष ने हंसते हुए बताया, ‘‘अरे, यह मोबाइल फोन के साथ जरूरी है. सारा कुछ साफसाफ सुनाई देता है.’’ ‘‘लेकिन यह तो बहुत महंगा मिलता होगा ?’’ इस बार रामू ने उत्सुकता दिखाई, तो वह बोला, ‘‘हां, यह ईयरफोन ब्रांडेड कंपनी का है, तो महंगा तो है ही. लेकिन इलैक्ट्रौनिक मार्केट में लोकल ईयरफोन सस्ते में मिल जाता है.’’

‘‘सस्ता कितने तक का होता होगा?’’ रघु ने पूछा, तो संतोष बोला, ‘‘50 रुपए में मिल जाता होगा.’’
उस दिन मौका निकाल कर रघु काम के बीच ही में इलैक्ट्रौनिक मार्केट चला गया था और वहां से ईयरफोन खरीद लाया था. अब रघु को जब भी समय मिलता, वह मोबाइल चला कर कान में ईयरफोन खोंस लेता था. दूसरे लोगों ने भी देखादेखी ईयरफोन खरीद लिए थे, मगर रघु की बात ही निराली थी. वह एक तरह से मोबाइल एडिक्टेड सा था, इसलिए उसे अकसर ही डांट खानी पड़ती थी कि ईयरफोन के चलते वह किसी की नहीं सुनता. बंशी चाचा अकसर ही रघु को डांटते, ‘‘अरे, तुम हमेशा कान में यह कनठेपी क्यों घुसाए रहता है? किसी की तुम बात तक नहीं सुनते. ऐसे तो चल चुका तुम्हारा काम. कहीं मालिक ने देख लिया, तो तुम्हें काम से निकाल बाहर करेगा.’’

रघु को भी महसूस होता था कि इस ईयरफोन के वजह से किसी को सुनना मुश्किल होता है. ‘‘जब मालिक का बेटा ही कान में ईयरफोन लगाए इधरउधर घूमता हो, तो गलत तो नहीं ही होना चाहिए,’’ रघु बंशी चाचा की बात को हंसी में उड़ा देता था, ‘‘बुढ़ा गए हैं, तो बोलेंगे ही. उन्हें क्या पता कि हम जेनजी पीढ़ी वाले लोग हैं. पैसे नहीं हैं, तो क्या हुआ, जीना छोड़ दें? थोड़ी मस्ती भी नहीं करें क्या?’’ यह जेनजी शब्द रघु की डिक्शनरी में नयानया शामिल हुआ था, जिस का मतलब यह कि हम नई पीढ़ी और सोच के लोग हैं. ऐसे में उन्हें कुछ अलग करने और सोचने का हक है.
अब इत्तिफाक की बात है कि बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन साइट पर एक कच्चा चहबच्चा था. वहीं मालिक का बेटा ईयरफोन लगाए घूम रहा था. वहां एक जगह गीली, कच्ची मिट्टी थी.
बंशी चाचा चिल्लाते रह गए, ‘‘अरे सुभाष बाबू, जरा संभल कर. वहां फिसले, तो गहरे पानी में गिरोगे.’’
मगर सुभाष सुन नहीं पाया था और वही हुआ, जो नहीं होना चाहिए था. वह फिसल कर उस गहरे गड्ढे में जा गिरा था. गनीमत थी कि वहां लोग मौजूद थे और उसे बाहर निकाल लिया गया. मगर उसे चोटखरोंच तो आई ही थी.

तभी रामू को महसूस हुआ था कि यह ईयरफोन लगाना भी खतरनाक हो सकता हैशाम में तय समय पर उन्हें छुट्टी मिली, तो सभी को चैन आया. अब पूरे एक हफ्ते की छुट्टी है. अब पूजा के बाद ही तो काम शुरू होगा. पैसे भी मिल गए थे, तो सब में एक जोश भी था. पटना से फतुहा वे ट्रेन से गए थे और हाईवे के किनारे अपने गांव जा रहे थे. जब 50 मील दूर पटना से फतुहा मुफ्त में ट्रेन से गए, तो एकाध मील के लिए आटोरिकशा क्या पकड़ना. यह तो रोजरोज की बात है.
तीजत्योहार के दिन हों, तो मन आकाश में उड़ता रहता है. तब और, जब पास में पूरे पैसे हों. आखिर वे घर से बाहर शहरों में इसी दिन के लिए तो धक्के खाते फिरते हैं और कमाई की जुगत भिड़ाते रहते हैं. रामू यही सबकुछ सोचता, मस्ती में अपने ग्रुप के साथ आगे बढ़ता जा रहा था. तभी रघु बोला, ‘‘क्या रामू भाई, जरा यह गाना यूट्यूब पर सुनिए. मजा जाएगा.’’ ‘‘अब घर जा ही रहे हैं, तो वहीं आराम से सुनेंगे. यहां इस हाईवे पर गाडि़यों की तेज रफ्तार और शोर के बीच कोई कुछ क्या सुनेगा…’’

‘‘अरे, शोर को मारिए गोली. कान में ईयरफोन लगाइए और सुनिए. इस ईयरफोन को लगा कर बाहर का कुछ सुनाई कहां देता है. आखिर इसी दिन के लिए ईयरफोन खरीदे हैं.’’ ‘‘उस दिन काम की साइट पर देखे थे कि मालिक का बेटा पानी भरे चहबच्चे में कैसे जा गिरा था,’’ रामू ने रघु को सम?ाना चाहा, ‘‘खतरा उठाने की क्या जरूरत है? आराम से घर जा कर सुनना.’’ इस पर रघु ठठा कर हंस दिया था.
‘‘जब देखो, तब कान में कनठेपी लगाए घूमता रहता है…’’ रामू के कान में बंशी चाचा के कहे शब्द गूंज रहे थे,
‘‘
देख लेना, अभी तो कुछ सुन नहीं रहा. कल को किसी भारी एक्सीडैंट के चपेट में आएगा, तो पता चलेगा.’’
‘‘इस ईयरफोन से आवाज कितनी बढि़या आती हैजैसे स्टेज के सामने खड़े हो कर सुन रहे हों. सिर्फ 50 रुपए में मिल गया. इतना सस्ता में कहां
मिलता है…’’
‘‘लेकिन इस तरह हाईवे पर ईयरफोन लगा कर चलने में कितना खतरा है…’’ रामू बोला.
‘‘अरे, हम सड़क के बीच में नहीं, सड़क किनारे चल रहे हैं…’’ रघु ने कहा.

हाईवे के दोनों तरफ भारी गाडि़यां तेजी से दौड़ रही थीं. अचानक सड़क पर होड़ लगा कर दौड़ते ट्रकों को ओवरटेक करती एक पिकअप वैन को अपनी तरफ आता देख कर रामू चिल्लाया और भागा, ‘‘बचो रघु, यह हमारी तरफ ही रही है.’’
रघु के साथ 2 साथी और थे, जिन्होंने कान में ईयरफोन लगा रखा था, इसलिए उन लोगों ने भी कुछ नहीं सुना, जबकि चाचा बंशी, चाचा सोनू और भैया भानु ने उस की आवाज सुन ली थी. वे चारों हाईवे की ढलान पर भागे. तब तक तो रघु के साथ मनोज और रंजीत उस पिकअप वैन की चपेट में ही चुके थे. पिकअप वैन पलभर को रुकी. उन तीनों को गिरते, सड़क पर छटपटाते देखा, फिर तेज रफ्तार से वहां से चली गई.
वे तीनों सड़क पर पड़े छटपटा रहे थे. सड़क का वह हिस्सा खून से लाल हो रहा था. किसी के सिर में, तो किसी के हाथपैर में चोट लगी थी.

बंशी चाचा अपने गमछे से उन के जख्मी शरीर को बांध रहे थे, ताकि बहता खून रुक जाए. रामू आतीजाती गाडि़यों को रुकने और मदद करने के लिए हाथ हिलाते हुए चिल्ला रहा था, मगर यहां किस को चिंता थी.
यहां हाईवे की भागमभाग में सब को अपनीअपनी ही पड़ी थी. आखिरकार एक आटोरिकशा दिखा, जिसे रामू ने रुकवाया. फिर तीनों घायलों को उस में टांगटूंग कर बैठाया और अस्पताल जाने का इंतजाम किया.
रास्ते में रघु कराहते हुए रामू से कह रहा था, ‘‘तुम ठीक कह रहे थे रामू.

अगर मैं ने अपने कानों में ईयरफोन नहीं लगाया होता, तो मैं बच सकता था.’’ रास्ते में ही रघु ने दम तोड़ दिया था. दूसरे 2 लोगों में से एक के हाथ, जबकि दूसरे के हाथपैर दोनों टूटे थे. अस्पताल से वापस गांव आने पर रामू बहुत उदास था. रघु के घर का हाहाकार उस के कानों में गूंज रहा था. बारबार उस की आंखों के सामने रघु का चेहरा रहा था. रामू के कानों में घायल रघु की आवाज अब भी गूंज रही थी, ‘‘अगर मैं ने अपने कानों में ईयरफोन नहीं लगाया होता, तो मैं बच सकता था.’’  

Hindi Story: लोकलाज का इलाज

Hindi Story: डाक्टर राहुल रात को थकेहारे घर लौट कर चैन की नींद सोए ही थे कि अस्पताल से फोन गया. एक बुजुर्ग की हालत बहुत गंभीर थी. डाक्टर राहुल अस्पताल पहुंचे. क्या वे उस मरीज को बचा पाए? दिनभर अस्पताल की भागदौड़ के बाद जब डाक्टर राहुल शाम को घर लौटे, तो थकान जैसे उन के पूरे शरीर में उतर आई थी. कई घंटे लगातार आपरेशन, मरीजों की भीड़ और लगातार आते फोन ने उन की रगरग को थका दिया था. घर पहुंचे तो पत्नी ने चिंता से पूछा, ‘‘इतना थक गए हो राहुलसब ठीक तो था आज अस्पताल में?’’ राहुल ने मुसकराने की कोशिश की, ‘‘आज का दिन बहुत भारी था. लगातार आते मरीज, एक से एक गंभीर केस. बस, अब थोड़ी देर चैन से बैठना चाहता हूं.’’

पत्नी ने गरमागरम खाना परोसा, दोनों ने साथ खाना खाया. हलकीफुलकी बातें हुईं, फिर डाक्टर राहुल बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद में खो गए. रात के तकरीबन साढ़े 11 बजे फोन की घनघनाहट ने घर की शांति को तोड़ दिया. पत्नी ने फोन उठाया. फोन पर अस्पताल का रेजिडैंट डाक्टर था, जिस की आवाज में घबराहट साफ झलक रही थी, ‘‘मैम, एक बहुत गंभीर मरीज आया है. 85 साल के बुजुर्ग हैं. तेज बुखार है, होश नहीं है. परिवार वाले कह रहे हैं कि डाक्टर राहुल ही उन की आखिरी उम्मीद हैं.
‘‘सरपंच रामकुमार भी उन के साथ हैं. वे कह रहे हैं कि डाक्टर साहब उनके पुराने परिचित हैं. अगर राहुल सर को एक बार बुला लें, तो शायद मरीज बच जाए.’’
पत्नी बेचैन हो गई थीं. डाक्टर राहुल अभी गहरी नींद में थे. पूरे दिन की थकान के बाद बस कुछ पल आराम के मिले थे.

पत्नी ने रेजिडैंट डाक्टर को समझाने की कोशिश की, ‘‘डाक्टर राहुल बहुत थके हुए हैं. उन की तबियत भी ठीक नहीं है. आप ही इलाज शुरू कीजिए, सुबह होते ही वे खुद देख लेंगे.’’ रेजिडैंट डाक्टर ने कहा, ‘‘मैं संभाल लेता हूं मैम. मैं सब टैस्ट और दवाएं शुरू कर देता हूं.’’ पत्नी ने राहत की सांस ली, ‘‘कम से कम आज तो राहुल को थोड़ा आराम मिल जाएगा.’’ पर मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं. 15 मिनट बाद फिर फोन बजा. इस बार आवाज में हताशा थी, ‘‘मैम, मरीज के परिवार वाले नहीं मान रहे. उन का कहना है कि सिविल अस्पताल और बाकी डाक्टरों ने जवाब दे दिया है.
‘‘सब ने कहा है कि अब सिर्फ डाक्टर राहुल ही देख सकते हैं. सरपंच रामकुमार खुद कह रहे हैं कि राहुल सर उन के दोस्त हैं, वे जरूर आएंगे.’’

पत्नी की हालत विचित्र थी. एक ओर डाक्टर राहुल की थकान और उन का सख्त निर्देश था किआज किसी भी हालत में मुझे जगाया जाए’, दूसरी ओर एक जिंदगी की आखिरी सांसें थीं. पत्नी ने इनसानियत का पक्ष चुना और धीरे से डाक्टर राहुल को जगाया और सारी बात बताई. डाक्टर राहुल बिना कोई सवाल किए तुरंत उठे, कपड़े बदले और अस्पताल पहुंच गए. वहां उन्होंने बुजुर्ग मरीज पाला राम की जांच की. उन्हें तेज बुखार था, दिमाग पर चढ़ गया था और होश खो चुका था. डाक्टर राहुल ने तुरंत इलाज शुरू किया, टैस्ट करवाए, दवाएं दीं और परिवार वालों को समझाया,

‘‘इनकी हालत नाजुक है, लेकिन मैं पूरी कोशिश करूंगा.’’
3 घंटे की मेहनत के बाद पाला राम की सांसें सामान्य हुईं, आंखें खुलीं और बुखार उतरने लगा. डाक्टर राहुल के चेहरे पर राहत झलकने लगी. परिवार के एक सदस्य ने हाथ जोड़ कर धन्यवाद दिया,
‘‘डाक्टर साहब, आप ने तो कमाल कर दिया.’’
डाक्टर राहुल मुसकराए, पर ज्यादा कुछ बोले नहीं.
अगली सुबह तकरीबन 4 बजे डाक्टर राहुल घर लौटे और थकान से चूर हो कर सो गए. सुबह अस्पताल पहुंचे तो देखा कि पाला राम की हालत और सुधर रही थी.
डाक्टर राहुल ने परिवार वालों को समझाया, ‘‘अब लगातार दवाएं देते रहिए, एक हफ्ते में हालत काफी बेहतर हो जाएगी.’’
पर बाहर वार्ड के कोने में फुसफुसाहटें शुरू हो चुकी थीं, ‘‘हम तो सोच रहे थे कि यह आज रात ही मर जाएगा, अब तो बचता दिख रहा है.’’
‘‘अब 7 दिन अस्पताल में रखेंगे, तो पैसे कहां से आएंगे?’’
‘‘इतना खर्च कौन करेगा, जब सब डाक्टरों ने पहले ही कह दिया था कि यह नहीं बचेगा?’’

धीरेधीरे उन कानाफूसियों ने एक फैसले का रूप ले लिया. अगले दिन परिवार वालों में से एक ने डाक्टर राहुल से कहा, ‘‘डाक्टर साहब, हमारी बहू सिविल अस्पताल में भरती है, उस का भी केस गंभीर है. हम 2 जगह इलाज नहीं करा सकते. कृपया छुट्टी दे दीजिए, हम मरीज को घर ले जा कर देखभाल करेंगे.’’
डाक्टर राहुल ने उन्हें बहुत समझाया, ‘‘पाला राम की हालत अभी पहले से बेहतर है, लेकिन पूरी तरह ठीक नहीं. अगर अब इलाज बीच में छोड़ा, तो हालत फिर बिगड़ जाएगी.’’
परिवार वालों ने सिर झुका दिया. सच यह था कि वे खर्च से घबराए
हुए थे. पैसे थे, इच्छा, पर गांव में यह स्वीकार करना किहम इलाज का खर्च नहीं उठा सकतेउन्हें समाज में बेइज्जती वाला काम लगता, इसलिए उन्होंने अपनीलाजको झूठ का जामा पहन लिया.
पाला राम को छुट्टी दे दी गई. राहुल ने आखिरी बार कहा, ‘‘कम से कम दवा और इंजैक्शन समय पर लगवाते रहिए, तभी उम्मीद है.’’

उन्होंने सिर हिला कर हामी भरी, पर वह सिर्फ औपचारिकता थी. 15 दिन बाद गांव का वही सरपंच रामकुमार अस्पताल आया. डाक्टर राहुल ने पूछा, ‘‘अब कैसे हैं पाला राम?’’ सरपंच रामकुमार ने गहरी सांस ली, ‘‘कल रात उन की मौत हो गई.’’ डाक्टर राहुल सन्न रह गए, ‘‘कैसे? वे तो ठीक हो रहे थे…’’ सरपंच ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘घर ले जा कर उन्होंने सारी दवाएं बंद कर दीं. गांव वालों से कहा, डाक्टर राहुल ने खुद जवाब दे दिया है, अब बस सेवा करो. शायद पैसे की भी तंगी थी, पर असली वजह थी लोकलाज. ‘‘उन्हें डर था कि गांव वाले कहेंगे कि शहर में रह कर इलाज क्यों नहीं करवाया? क्यों उस को
बचाने की कोशिश नहीं की गई? इसलिए उन्होंने झूठ बोलना ही आसान समझा.’’
डाक्टर राहुल लंबे समय तक चुप रहे. मन में तूफान था. एक ओर डाक्टर के रूप में उन का काम, जो पूरी ईमानदारी से निभाया गया था, दूसरी ओर समाज का वह सच, जहां झूठी लाज के लिए लोग जिंदगी की डोर काट देते हैं.

डाक्टर राहुल ने सोचा, ‘गरीबी तो फिर भी किसी दिन मिट सकती है, पर यह दिखावे की बीमारीयह समाज के भीतर का जहर है, जो आदमी से उस का इनसान छीन लेती है.’ उस रात डाक्टर राहुल बहुत देर तक छत की ओर टकटकी लगाए रहे. उन की आंखों में सिर्फ एक चेहरा था, पाला राम का, जो मरते समय शायद यह भी नहीं जानता था कि उसे उस के अपने ही लोग उस की झूठीइज्जतके लिए मौत की तरफ धकेल गए. डाक्टर राहुल की आंखों से एक बूंद गिरी. वह आंसू किसी मरीज के लिए नहीं था, बल्कि उस समाज के लिए था, जो आज भीलाजके नाम परजिंदगीकी कीमत चुका देता है.   

डा. सुभाष चंद्र गर्ग ‘पार्थ’

Hindi Story: काम हो गया

‘‘रे, निर्मला सुन तो सही…’’ ठेकेदार रतन सिंह जैसे ही गाड़ी बाहर खड़ी कर अपने ड्राइंगरूम में आए, तब उन के चेहरे पर अपार खुशियां छाई थीं.
निर्मला सिंह ड्राइंगरूम में कर बोली, ‘‘हां, रतनजी, क्या कहना चाहते हैं? आज आप के चेहरे पर इतनी खुशियां क्यों झलक रही हैं?’’
‘‘अरे निर्मला, मुझे 65 करोड़,
40 लाख रुपए का सरकारी ठेका मिल गया है.’’
‘‘सचमुच रतनजी, यह तो मेरे लिए भी खुशी की बात है. बहुत शुक्रिया रतनजी.’’
‘‘अरे, शुक्रिया तो उस औरत का करो निर्मलाहमारी मेहरी कमला ने उस औरत को सरकारी अफसर के यहां एक रात के लिए भेजा था. क्या नाम था उस कामीनाक्षी. उसी की वजह से मुझे यह ठेका मिला है.’’
‘‘आप की बहुत इच्छा थी यह ठेका पाने की. आप को यह ठेका मिल भी गया,’’ निर्मला सिंह ने यह बात कही और फिर वह अपने काम में लग गई. मगर उस का मन काम में कहां लगा. उस का मन तो पुरानी यादों में खो गया.

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निर्मला सिंह के पति रतन सिंह ठेकेदार थे. वे सरकारी या गैरसरकारी दोनों तरह के ठेके लेते थे, फिर चाहे मकान बनाना हो चाहे पुल बनाना हो. वे शहर के नामी ठेकेदार थे. कमला उन के यहां मेहरी का काम करती थी. 30 साल की खूबसूरत जवान औरत कमला अपना काम ईमानदारी से करती थी. उसे अभी काम पर आए 2 महीने भी नहीं हुए थे, मगर बंगले की झाड़ूबुहारी, बरतन मांजना और पोंछा लगाना वही करती थी. उस के काम से निर्मला सिंह खुश थी. उस दिन जब कमला पोंछा लगा रही थी, तब ठेकेदार रतन सिंह सोफे पर बैठे हुए थे. उन कोनमस्तेकर के अपना पेटीकोट घुटनों तक चढ़ा कर कमला फर्श पर पोंछा लगाने लगी. तब रतन सिंह कनखियों से उस की गोरी पिंडलियों को बारबार देख रहे थे. मगर कमला भी बेफ्रिक हो कर पोंछा लगा रही थी.

थोड़ी देर बाद रतन सिंह बोले, ‘‘कमला, मेरे पास आना.’’
‘‘जी साहब, आती हूं,’’ कमला पोंछा वहीं रख कर रतन सिंह के पास कर बोली, ‘‘हां साहब, कहिए.’’
‘‘मेरा एक काम करोगी, उस का अलग से पैसा दूंगा. करोगी?’’
‘‘कौन सा काम है साहब?’’
‘‘काम तो खास है, पर तुम कर सकती हो,’’ जब रतन सिंह ने यह कहा, तब कमला सोच में पड़ गई. फिर वह बोली, ‘‘ऐसा कौन सा काम है, जो मैं कर सकती हूं. पहले आप काम तो बताइए साहब?’’
‘‘बस, एक अफसर के यहां एक रात गुजारनी है. इतना सा काम है. क्या कर सकोगी? उस सरकारी अफसर ने इसलिए काम अटका भी रखा है,’’ जब रतन सिंह ने यह बात कही, तब भीतर से कमला आगबबूला हो उठी, मगर उस गुस्से को बाहर नहीं आने दिया. कमला नाराज हो कर बोली, ‘‘मैं बिकाऊं औरत नहीं हूं साहब. मैं गरीब और लाचार जरूर हूं, मगर मेरी भी इज्जत है,’’ कमला अभी यह बात कह रही थी कि तभी रतन सिंह का फोन गया. वे फोन सुनने बाहर चले गए.

इसी बीच आड़ में रह कर निर्मला रतन सिंह और कमला की सारी बातें
सुन रही थी. वह बोली, ‘‘कमला, मैं
ने साहब की और तेरी सारी बातें सुन ली हैं.’’
‘‘देखो मेमसाहब, साहब मुझ से घिनौना काम करवाना चाहते हैं. हम गरीबों की इज्जत जैसे सस्ती है. जब चाहे खरीद लेंगे, ये पैसे वाले,’’ नाराजगी से कमला ने यह बात कही.
निर्मला सिंह बोली, ‘‘गुस्सा मत कर कमला. तू मत जाना. मगर मेरी निगाह में एक औरत है. तू साहब से उसे भेजने का कहना. इतना तो कर सकती है ?’’
‘‘मगर वह औरत कौन है मेमसाहब? साहब पूछेंगे उस औरत का नामपता,’’ कमला ने पूछा.
‘‘हां, उस औरत का नाम मीनाक्षी कहना. साहब से आज ही पता और समय ले लेना, बाकी की बात मैं मीनाक्षी को सब समझा दूंगी. समझी
‘‘और सुन, साहब अभी फोन पर बात करने बाहर गए हैं. वे जैसे भीतर आएंगे, मैं आड़ में रह कर सारी बातें सुन लूंगी.’’

तभी रतन सिंह ड्राइंगरूम में आए. कमला उन्हें देख कर बोली, ‘‘साहब, आप काम हो जाएगा.’’
‘‘सच कमला, तुम ने जाने के लिए अपनेआप को तैयार कर लिया?,’’ खुश हो कर रतन सिंह बोले.
‘‘साहब, आप जैसे फोन सुनने बाहर गए, तब मेरे मन में एक बात आई. मेरी एक सहेली है मीनाक्षी, वह यह काम भी करती है. पर उस ने यह कहा…’’
‘‘क्या कहा?’’ बीच में बात काट कर रतन सिंह ने पूछा.
‘‘मैं ने उस से फोन पर बात की. वह जाने को तैयार हो गई है, पर कब और किस समय जाना है? वह खुद ही आप के बताए गए पते पर पहुंच जाएगी?’’
‘‘ठीक है, मैं सरकारी अफसर को आज का ही समय देता हूं. वैसे भी मुझे रात को गांव जाना है. वहां कारीगर और मजदूरों के बीच कोई झगड़ा हो गया है और स्कूल भवन बनाने का काम रुक गया है,’’ कह कर रतन सिंह ने सरकारी अफसर को फोन लगाया और मीनाक्षी के बारे में बताया.
इस के बाद निर्मला सिंह खुद मीनाक्षी बन कर साहब के बताए समय और जगह पर पहुंच गई. साहब
विदेशी शराब पी रहे थे. चौकीदार ने अंदर जाने दिया.

जाते ही निर्मला सिंह बोली, ‘‘मैं मीनाक्षी हूं साहब, ठेकेदार रतन सिंह ने मुझे भेजा है.’’
‘‘आओ मीनाक्षी, मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था. आओ, बैठो मेरे पास,’’ सरकारी अफसर ने नशे में झूमते हुए मीनाक्षी को खींच कर अपने पास बैठा लिया.
तब मीनाक्षी बोली, ‘‘साहब, आप ठेकेदार रतनजी को यह ठेका दे
देंगे ?’’
‘‘कागज तो तमाम उन के नाम के पड़े हैं, बस इंतजार तो था तुम्हारा ही. सारे कागज सुबह ले जाना,’’ सरकारी अफसर ने जब यह कहा, तब मीनाक्षी बोली, ‘‘नहीं साहब, कागज तो आप रतनजी साहब को ही देना. मैं क्या करूंगी?’’
‘‘ठीक है, उन्हीं को देंगे,’’ कह कर सरकारी अफसर ने एक जाम और हलक में गटक लिया.
‘‘निर्मला, निर्मला,’’ जब रतन सिंह ने कर कहा, तब वह यादों से आज में लौट आई और बोली, ‘‘हां, रतनजी, बोलिए?’’
‘‘किस सोच में डूबी हुई थी?
अरे, वह कमला आई क्या?’’ रतन सिंह ने पूछा.


‘‘अरे, अभी तो नहीं आई,’’ निर्मला सिंह ने जवाब दिया.
तभी वहां कमला गई. तब निर्मला सिंह बोली, ‘‘लो, कमला का नाम लिया और वह हाजिर हो गई. बड़ी लंबी उम्र है कमला तेरी. अभी तुझे ही याद किया था.’’
‘‘मेमसाहब, मुझे क्यों याद किया?’’ कमला ने पूछा.
‘‘अरे कमला, उस मीनाक्षी को शुक्रिया कहना. उस की वजह से
मुझे यह ठेका मिला है,’’ रतन सिंह ने जब यह कहा, तब कमला बोली, ‘‘कह दूंगी साहब.’’
‘‘अरे, उसे बुला कर लाना, मैं
देखूं तो सही कौन है मीनाक्षी?’’ रतन सिंह बोले.
‘‘साहब, उस ने आप से मिलने से मना कर दिया है. जब आप का काम हो गया, तब क्या मिलना?’’
‘‘ठीक है कमला. वह नहीं मिलना चाहती है, तब कोई बात नहीं. बस, अपना काम हो गया,’’ कह कर रतन सिंह बाथरूम में चले गए.
कमला रसोईघर में जा घुसी. इधर निर्मला मंदमंद मुसकरा रही थी

Hindi Story: शेरनी की दहाड़

सुनीता के सपनों की उड़ान उस के गांव की पगडंडियों से शुरू हो कर शहर की यूनिवर्सिटी तक जा पहुंची थी. ऊंची कदकाठी, दोहरा बदन और आंखों में आत्मविश्वास की चमक. वह सिर्फ खूबसूरत और सुशील ही नहीं, बल्कि फौलादी इरादों वाली लड़की थी. जब वह अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हो कर निकलती, तो उस की सख्त शख्सीयत और स्वाभिमान देखने लायक होता. सुनीता के मामा शहर के नामी वकील थे. वही उस के आदर्श थे. वह भी उन्हीं की तरह काला कोट पहन कर गरीबों को इंसाफ दिलाने का सपना देखती थी. कानून की पढ़ाई के साथसाथ वह यह भी जानती थी कि इंसाफ की पहली सीढ़ी बेखौफ और नाइंसाफी के खिलाफ खड़ा होना है.

लेकिन उस शहर की चमक के पीछे अपराध का अंधेरा भी था. जिस इलाके में सुनीता रहती थी, वहां राजा नाम के एक बदमाश का खौफ था. राजा और उस के साथी आएदिन राहगीरों को लूटते और लड़कियों के साथ बदतमीजी करते थे. राजा अकसर सुनीता को दूर से घूरता था, पर उस की आंखों की तेज चमक और कड़क स्वभाव को देख कर वह सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था. उसे सुनीता के कड़क स्वभाव से डर लगता था. शांति तब भंग हुई, जब सुनीता को पता चला कि पड़ोस की मासूम दिव्या ने स्कूल जाना छोड़ दिया है. कई दिनों से वह खामोश और डरी हुई थी. दिव्या को राजा ने बीच सड़क पर रोक कर उस के साथ बदतमीजी की थी.

दिव्या के मातापिता डर के मारे पुलिस के पास जाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे थे. उन का खामोश डर और दिव्या की सिसकियां सुनीता के कानों में गूंज उठीं. उसे लगा कि अगर आज वह चुप रही तो उस की पढ़ाई लिखाई, उस की हिम्मत और वकालत का उस का सपना, सब बेकार है. उस के खून में उबाल गया. अगले दिन सूरज की तपिश के बीच सुनीता ने अपनी चमचमाती बाइक सीधे उस चौराहे पर रोकी, जहां राजा अपने चमचों के साथ बैठा था. इंजन बंद हुआ, चारों तरफ सन्नाटा छा गया. सुनीता ने धीमे से हैलमैट उतारा, उस के खुले बाल हवा में लहराए और उस की तीखी नजरों ने सीधे राजा को भेदा. ‘‘भाई, जरा यहां तो आना,’’ सुनीता की आवाज गूंजी, जिस में चेतावनी और शालीनता दोनों थे.

राजा अपनी अकड़ में साथियों के साथ बाइक के पास पहुंचा. उसे लगा, शायद कोई मदद मांग रही है, पर सुनीता की आंखों में अंगारे थेसुनीता ने बिना डरे, सीधे राजा की आंखों में ?ांकते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी हरकतें हदें पार कर रही हैं राजा. अपनी ताकत निहत्थों पर आजमाना बंद करो. बेहतर होगा कि आज के बाद तुम यहां किसी लड़की की तरफ आंख उठा कर भी देखो, वरना याद रखनाकानून की पढ़ाई बाद में काम आएगी, मेरा हाथ पहले चलेगा.’’ सुनीता की आवाज में ऐसी दहाड़ और आत्मविश्वास था कि राजा के पैर कांपने लगे. उस ने हड़बड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं नेमैं ने क्या किया?’’ सुनीता ने कड़क कर जवाब दिया, ‘‘वही, जो एक बुजदिल करता है. तुम्हें शर्म नहीं आती बहनबेटियों को छेड़ते हुए? मैं ने तुम्हेंभाईकह कर पुकारा है, इस शब्द की लाज रख लो, वरना अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहना.’’

वह दबंग राजा, जिस से पूरा महल्ला थरथर कांपता था, सुनीता के सामने बौना पड़ गया. उस ने हाथ जोड़ लिए और वहां से चला गया. वह डर सिर्फ पुलिस का नहीं था, वह एक स्वाभिमानी लड़की के तेज का डर था. कुछ ही दिनों में बदलाव साफ दिखने लगा. सुनीता ने केवल उसे सुधारा, बल्कि उसे उस की रुकी हुई पढ़ाई दोबारा शुरू करने के लिए भी बढ़ावा दिया, ‘‘कुछ बन कर दिखाओ. मातापिता का मान बढ़ाओ. यह जिंदगी घरपरिवार, समाज और देश का मान बढ़ाने के लिए मिली है.’’ ‘‘सम? गया दीदी,’’ राजा ने हाथ जोड़ कर कहा. राजा के बदमाश साथी, जो कल तक लड़कियों को छेड़ते थे, भी सुनीता कोदीदीकह कर सम्मान देने लगे थे. कालोनी के लोगों ने राहत की सांस ली. वे अब सुनीता कोशेरनीकहने लगे थे. सुनीता ने साबित कर दिया कि आत्मविश्वास और हिम्मत ही एक महिला का सब से बड़ा गहना और सब से ताकतवर हथियार है.         

पप्पू यादव के दावे पर बवाल   
बिहार में पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव ने दावा किया है कि भारतीय जनता पार्टी सीमांचल और पश्चिम बंगाल के कुछ जिलों को मिला कर केंद्रशासित प्रदेश बनाने की साजिश रच रही है. इस योजना के तहत पहले पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू कराया जा सकता है. इस के बाद बिहार विधानसभा से एक प्रस्ताव पास करवाने की कोशिश की जाएगी. इस पूरे प्रोसैस के बाद सीमांचल क्षेत्र के साथ पश्चिम बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद, रायगंज और दिनाजपुर जैसे कुछ जिलों को जोड़ कर एक नया केंद्रशासित प्रदेश बनाया जा सकता है, जबकि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने साफ शब्दों में कहा कि ये दावे तथ्यों के बिलकुल उलट हैं और इन में रत्तीभर भी सच्चाई नहीं है.   

Hindi Story: गली के कुत्ते

Hindi Story: रा के तकरीबन साढ़े 10 बज रहे थे. शहर की सड़कों पर हलकीहलकी ठंड उतर आई थी. सड़क किनारे बंद होती दुकानें. झिलमिलाती स्ट्रीट लाइट्स. बीचबीच में भागते आटोरिकशा और मोटरसाइकिलें. यह वही शहर था, जो कभी पूरी तरह सोता नहीं था. बस, कुछ घंटों के लिए आंखें मूंद लेता था.
आर्या औफिस से लौटते हुए बस से उतर कर पैदल घर की ओर बढ़ रही थी. बस स्टौप से घर तक का रास्ता मुश्किल से 10 मिनट का था. पर इन 10 मिनट में वह रोज जाने कितनी दुआएं पढ़ लेती थी.
आर्या के कानों में ईयरफोन नहीं थे. मोबाइल भी हाथ में नहीं था, क्योंकि उस ने बहुत पहले सीख लिया था कि रात की सड़कें सजग रहने वालों का इम्तिहान लेती हैं.

उस गली में कदम रखते ही आर्या ने हलकी सी सीटी बजाई. सीटी की आवाज सुनते ही गली के कोने से
3-4 कुत्ते निकल आए. ये कोई नए कुत्ते नहीं थे. ये वही थे जिन्हें वह महीनों से जानती थी. औफिस से लौटते वक्त वह अकसर उन के लिए बिसकुट ले आती थी. वीकैंड पर उन्हें रोटी खिलाए बिना उस के दिन की शुरुआत नहीं होती थी. जब भी महल्ले के डौग लवर्स उन कुत्तों को टीका लगवाने का इंतजाम करते, आर्या भी बढ़चढ़ कर उन की मदद करती. कुत्तों के इलाज और देखभाल में अकसर वह सब से आगे रहती. बरसात में उन के लिए टिन की शैड बनवाने का विचार भी उसी का था. उस छोटे से इंतजाम ने सर्दी और बारिश में गली के कुत्तों को बड़ी राहत दी थी. यही वजह थी कि वे आर्या की आहट पहचानते थे. उसे अपना मानते थे.

आर्या भी जानती थी कि ये कुत्ते भरोसेमंद हैं, क्योंकि ये अपनी हद जानते हैं. हवस की आग में ये पागल हो कर इधरउधर नहीं भटकते और सब से जरूरी बात यह कि ये गली को अपना घर मानते थे. इन दिनों कुत्तों को ले कर शहर में खूब विवाद चल रहा था. अखबारों में सुर्खियां थीं. टीवी डिबेट में शोर था. कोई कहता था सड़क के कुत्ते खतरनाक हैं. कोई उन्हें हटाने की मांग कर रहा था. पर आर्या जानती थी कि असल खतरा दांतों से नहीं, नीयत से होता है. गली के एक बुजुर्ग अकसर कहते थे, ‘‘बेटा, जिस कुत्ते को रोज खाना मिलता है और इलाज होता है, वह गली का पहरेदार बन जाता है.’’ उन की यह बात आर्या के दिल में उतर गई थी.

जैसे ही वह थोड़ा आगे बढ़ी, पीछे से बाइक का इंजन दहाड़ा. 2 लड़के थे. सिर पर हैलमैट नहीं. चेहरे पर बेहूदा आत्मविश्वास. एक ने कहा, ‘‘ओए देख, नाइट शिफ्ट वाली रही है.’’ दूसरा हंसा, ‘‘चल, मजे लेते हैं.’’ आर्या का दिल जोर से धड़कने लगा. उस ने कदम तेज कर दिए. पीछे से फिर आवाज आई, ‘‘डर क्यों रही हो जानेमन, हम तो आशिक हैं तुम्हारे. इन कुत्तों से कितना दिल लगाओगी, थोड़ा हम से भी लगा लो. कसम से मजा बहुत आएगा.’’ आर्या के मन में एक वाक्य कौंध गया, ‘गली का कुत्ते गली के इन वहशी लड़कों से कहीं बेहतर होते हैं. वे कम से कम इज्जत की हद जानते हैं.’ उस ने फिर से सीटी बजाई. इस बार आवाज तेज थी. कुत्ते तुरंत उस के चारों ओर गए. एक आगे. 2 पीछे. एक बगल में. बाइक जैसे ही पास आई, कुत्तों ने एक साथ भौंकना शुरू कर दिया. तेज, आक्रामक, चेतावनी भरी लहजे में.
एक लड़का घबरा गया, ‘‘अबे चल, ये काट लेंगे.’’ दूसरा भी बोला, ‘‘छोड़ यार, आज नहीं.’’

बाइक लड़खड़ाई और वापस मुड़ गई. गालियां देते हुए वे दोनों अंधेरे में गायब हो गए. आर्या वहीं खड़ी रह गई. उस के हाथ कांप रहे थे. पर इस बार डर से ज्यादा गुस्सा था. उस ने ?ाक कर कुत्तों के सिर पर हाथ फेरा. वह पूंछ हिलाने लगे. जैसे कह रहे हों, ‘तुम निश्चिंत रहो, यह हमारी गली है और हम तुम्हारे साथ हैं.’
घर पहुंचते ही मां ने पूछा, ‘‘आज फिर देर हो गई.’’ आर्या बोली, ‘‘हां मां, कुछ छिछोरे कुत्ते पीछे लग गए थे.’’ मां ने पूछा, ‘‘सब ठीक तो है ?’’ आर्या ने कहा, ‘‘हां मां, गली के कुत्ते साथ थे.’’ मां हलकी मुस्कुराईं, ‘‘अच्छा है. आजकल इनसानों से ज्यादा वही भरोसेमंद हैं.’’ अगले दिन औफिस में आर्या ने जब यह सारी घटना सुनाई. किसी ने कहा, ‘‘समाज के लिए असली खतरा ये 2 टांगों वाले कुत्ते ही हैं, जो
दुनिया को अपनी हवस के चश्मे से देखते हैं.’’

किसी ने कहा, ‘‘नगरनिगम को इन कुत्तों पर भी नकेल कसने की योजना लानी चाहिए. सड़क पर घुमते वहशी जानवर सोसाइटी के लिए बड़ा खतरा हैं.’’ आर्या शांत स्वर में बोली, ‘‘सच में, खतरनाक वे कुत्ते नहीं हैं जिन्हें रोटी नहीं मिलती, बल्कि खतरनाक वह ठरक है जिसे संस्कार मिलता है, सही इलाज.’’
उस दिन से कुत्तों के लिए आर्या के मन में इज्जत बढ़ गई थी. गली के कुत्तों के लिए अब और लोग आगे आने लगे थे. सही देखभाल मिलने पर कुत्तों का बरताव और संतुलित हो गया. धीरेधीरे गली बदलने लगी. मनचले गायब हो गए. रातें थोड़ी सुरक्षित हो गईं. आर्या अब निडर हो कर घर लौटती है. वह जानती है. इस गली में कुत्ते सिर्फ जानवर नहीं हैं. वे पहरेदार हैं. दोस्त हैं और कई बार इनसानों से ज्यादा इनसान हैं.
इस सड़क पर आज भी 2 तरह के कुत्ते हैं. एक वे जो भूख में भौंकते हैं और दूसरे वे जो हवस में नोंचने को दौड़ते हैं. पहले वाले गली की शान हैं, दूसरे समाज का कलंक.                   

Crime Story: सीमा पार इश्क के लिए 3 करोड़ की साइबर ठग

Crime Story:  कहते हैं कि इश्क सरहदें नहीं देखता. दूरी, देश, भाषा सब पीछे छूट जाते हैं. मोबाइल की स्क्रीन पर उभरता एक नाम धीरेधीरे आदत बन जाता है. दिन की शुरुआत उसी संदेश से होती है और रात उसी आवाज के साथ खत्म. भरोसा बनता है, सपने जुड़ते हैं और भविष्य की तसवीरें भी खिंचने लगती हैं. लेकिन जब यही रिश्ता पैसे के लेनदेन से जुड़ जाए, तो कहानी केवल प्यार की नहीं रहती. वह कानून, जांच और अदालत तक पहुंच जाती है.

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के डबलीराठान गांव का हरदीप सिंह इस समय ऐसी ही एक कहानी का केंद्र है. साइबर थाना पुलिस के मुताबिक उसे एक साइबर ठगी मामले में गिरफ्तार किया गया है, जिस में तकरीबन 3 करोड़, 26 लाख रुपए डिजिटल तरीके से ट्रांसफर किए जाने की बात सामने आई है. पुलिस का कहना है कि यह राशि क्रिप्टोकरैंसी के जरीए भेजी गई. मामला फिलहाल कोर्ट में कल रहा है.
हरदीप सिंह एक साधारण किसान परिवार से जुड़ा नौजवान था. उस के पिता खेती करते थे. घर की आमदनी लिमिटेड थी. उस ने गांव के स्कूल से 10वीं तक पढ़ाई की. आगे पढ़ाई जारी नहीं रख सका. बेहतर रोजगार की तलाश में उसने कंप्यूटर का काम सीखा. इंटरनैट और सोशल मीडिया उस के लिए नई उम्मीदों की दुनिया थे.

तकरीबन 2 साल पहले सोशल मीडिया के जरीए उस का मेलजोल पाकिस्तान की एक लड़की राबिया से हुआ. शुरुआत सामान्य बातचीत से हुई. फिर नियमित चैटिंग शुरू हुई. धीरेधीरे बातचीत निजी होती गई.
पूछताछ में आरोपी ने स्वीकार किया कि वह भावनात्मक रूप से जुड़ गया था. बातचीत में भविष्य और शादी तक की चर्चा होने की बात सामने आई है. जांच अफसरों के मुताबिक कुछ समय बाद पैसे से जुड़ी मदद की मांग शुरू हुई. शुरुआत छोटी रकम से हुई. कभी जरूरत का हवाला, कभी उपहार की बात. आरोपी ने कथिततौर पर कुछ भुगतान किया. लेकिन मांगों का दायरा बढ़ता गया. भावनात्मक दबाव और पैसे के बीच वह उल?ाता गया.

पुलिस के मुताबिक इसी दौर में आरोपी ने गैरकानूनी तरीके से पैसा कमाने की दिशा में कदम बढ़ाया. पूछताछ में उस ने बताया कि उसे साइबर ठगी के जरीए कमाई का सु?ाव मिला था. इस दावे की जांच जारी है. डिजिटल चैट, काल रिकौर्ड और बैंक ट्रांजैक्शन की जांच की जा रही है. जांच में सामने आया कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सस्ते सामान बेचने के नाम पर लोगों को आकर्षित किया गया. इश्तिहार में कीमत बाजार से कम बताई जाती थी. ग्राहकों से पहले भुगतान लिया जाता था. कई मामलों में भुगतान के बाद सामान नहीं भेजा गया. बाद में पीडि़तों ने शिकायत दर्ज कराई.

धीरेधीरे यह गतिविधि संगठित रूप लेने लगी. पुलिस के मुताबिक ठगी की रकम अलगअलग खातों में जमा की जाती थी. आरोपी ने अपने गांव के कुछ लोगों को यह कह कर भरोसे में लिया कि उस का बैंक खाता अस्थायी रूप से बंद है और कुछ समय के लिए उन के खाते की जरूरत है. गांवदेहात के समाज में सामाजिक भरोसा मजबूत होता है. कुछ लोगों ने सहमति दे दी. जांच में सामने आया कि ठगी की रकम उन्हीं खातों में जमा की जाती थी. बाद में रकम निकाल कर डिजिटल वालेट में डाली जाती और फिर क्त्रिप्टोकरैंसी में बदली जाती थी.

पुलिस का दावा है कि तकरीबन 3 करोड़, 26 लाख रुपए यूएसडीटी के जरीए ट्रांसफर किए गए. यह रकम डिजिटल चैनलों से सीमा पार पहुंची होने की बात जांच में सामने आई. क्रिप्टोकरैंसी के इस्तेमाल ने मामले को और मुश्किल बना दिया. पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम में लेनदेन का रास्ता साफ रहता है. लेकिन डिजिटल टोकन के जरीए राशि कई वालेट में ट्रांसफर की जा सकती है. साइबर माहिरों के मुताबिक ऐसे मामलों में जिस के पास पैसा गया है, उस की पहचान करना चुनौती से भरा होता है. मामला तब उजागर हुआ जब हनुमानगढ़ के रहने वाले एक आदमी ने साइबर ठगी की शिकायत दर्ज कराई. उस ने सोशल मीडिया पर सामान खरीदने के लिए भुगतान किया था, लेकिन सामान नहीं मिला.

बैंक लेनदेन की जांच करते हुए पुलिस आरोपी तक पहुंची. मोबाइल फोन और सिम कार्ड की जांच में कई गलत ट्रांजैक्शन सामने आए. पुलिस के मुताबिक, आरोपी से 26 बैंक पासबुक, 8 चैकबुक, 18 एटीएम कार्ड, 8 सिम कार्ड और 3 मोबाइल फोन बरामद किए गए. पाकिस्तान से जुड़े कुछ दस्तावेज भी मिलने की बात कही गई. जांच में यह भी सामने आया कि इन खातों से जुड़े 14 राज्यों में 36 साइबर ठगी शिकायतें दर्ज हैं. संबंधित राज्यों की एजेंसियों के साथ तालमेल किया जा रहा है. जिला पुलिस सुपरिंटैंडैंट के मुताबिक पूछताछ में आरोपी ने पाकिस्तान जा कर शादी करने की इच्छा जताई थी. उस ने वीजा के लिए अर्जी भी दी थी, लेकिन रजामंदी नहीं मिली. सीमापार मेलजोल और पैसे के लेनदेन की पूरी कड़ी की जांच जारी है.

राबिया के रोल की फिलहाल जांच चल रही है. डिजिटल सुबूतों की बुनियाद पर उस के जुड़े होने की तसदीक की जा रही है. आखिरी नतीजा अदालत में पेश सबूतों पर ही साफ होगा. यह मामला केवल 3 करोड़, 26 लाख रुपए के डिजिटल ट्रांसफर का नहीं है. यह उस बदलती डिजिटल संस्कृति का उदाहरण भी है, जिस में गांव का नौजवान भी वर्ल्ड नैटवर्क से जुड़ा है. इंटरनेट ने मौके दिए हैं, लेकिन जोखिम भी बढ़ाए हैं. सोशल मीडिया पर बनी पहचान असली भी हो सकती है और फर्जी भी. साइबर माहिर बताते हैं कि मौडर्न ठगी का बड़ा हिस्सा तकनीकी हैकिंग से नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक तरीकों से होता है. पहले विश्वास जीता जाता है. इनसान को भावना के लैवल पर जोड़ा जाता है. फिर पैसे की मांग जोड़ी जाती है.

इसे सोशल इंजीनियरिंग कहा जाता है. इस सब में इनसान खुद अपने पैसे सौंप देता है, क्योंकि उसे लगता है कि वह किसी अपने की मदद कर रहा है. नैशनल लैवल पर साइबर अपराध के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है. औनलाइन शौपिंग धोखाधड़ी, इन्वैस्टमैंट ठगी और सोशल मीडिया से जुड़ी धोखाधड़ी बढ़ रही है. डिजिटल भुगतान की सुविधा जितनी आसान हुई है, अपराध का तरीका भी उतना ही तेज हुआ है. गांवदेहात के इलाकों में इंटरनैट की पहुंच बढ़ी है, लेकिन डिजिटल जागरूकता अभी भी कम है. गांव के लोगों के लिए बैंक खाता भरोसे का सिंबल है. कोई परिचित मदद मांगे तो शक कम होता है. यही भरोसा कई बार अपराध की कड़ी बन जाता है.

कानूनी नजरिए से ऐसे मामलों में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धाराएं लागू हो सकती हैं. आर्थिक अपराध केवल पैसों का नुकसान नहीं करता, बल्कि सामाजिक इज्जत और भविष्य पर भी बुरा असर डालता है. यह घटना समाज के लिए चेतावनी है. इंटरनैट पर बने रिश्तों में पैसे के लेनदेन से पहले पूरी सावधानी जरूरी है. बैंक खाता, एटीएम कार्ड, पिन या ओटीपी सा? करना गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है. साइबर ठगी में तुरंत 1930 पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए. एक साधारण गांवदेहात का नौजवान, एक औनलाइन रिश्ता और 3 करोड़, 26 लाख रुपए का डिजिटल ट्रांसफर. यह कहानी अब अदालत के फैसले का इंतजार कर रही है. आखिरी फैसला कोर्ट करेगा. लेकिन यह घटना एक बड़ा मैसेज छोड़ती है. डिजिटल जमाने में भावनाएं तेज हैं, लेकिन कानून उस से भी तेज है. सीमा पार इश्क अगर पैसे के लेनदेन से जुड़ जाए, तो उस का अंजाम केवल निजी नहीं, कानूनी भी हो सकता है. इश्क अपनी जगह है. इंटरनैट अपनी जगह. लेकिन जिम्मेदारी और कानून दोनों से ऊपर हैं.   

राकेश खुडिया

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