Blind Faith : बुटाटी धाम  राजस्थान, 22 करोड़ की चंदाचोरी

Blind Faith.राजस्थान के नागौर जिले में अयोध्या के राम मंदिर जैसी दान चोरी का बड़ा मामला सामने आया है. मामला नागौर के बुटाटी में बने संत चतुरदास महाराज मंदिर से जुड़ा है.

जिला कलक्टर के आदेश पर बनी जांच कमेटी को मंदिर समिति के वित्तीय कामकाज में गड़बड़ी मिली है. जांच कमेटी ने मंदिर समिति के अकाउंटस, बैंक लेनदेन, वाउचर और दूसरे डौक्यूमैंट्स की जांच के बाद रिपोर्ट कलक्टर को भेजी है.

इस रिपोर्ट में सोनाचांदी के लेखाजोखा से ले कर भोजनशाला बनाने, किराया जमाखर्च वगैरह में गबन और फंड का गैरजरूरी इस्तेमाल होना माना गया है.

मंदिर में बड़े दान करने वालों ने जो निर्माण कार्य करवाया है, उसे तक मंदिर समिति ने अपने खर्च में जोड़ दिया है. कमेटी ने तकरीबन 22 करोड़ रुपए का गबन माना है.

गौरतलब है कि राम मंदिर में गबन हो गया… खाटूश्याम के पुजारी का रईसजादा बेटा बाइक सवारों को कुचल कर चला गया… सालासर बालाजी के पुजारी ने बेटी की शादी में करोड़ों रुपए खर्च किए….. और अब बुटाटी धाम में करोड़ों का घपला हो गया… वगैरहवगैरह.  हालांकि यह तो मामूली धाम हैं, ऊंचेबड़े मंदिर धामों की बात ही निराली हैं.

नागौर के रहने वाले रामनारायण चौधरी बताते हैं, ‘‘मेरा गांव बुटाटी से तकरीबन 25 किलोमीटर की दूरी पर है. जब भी किसी को लकवा होता है तो बुटाटी धाम जाते हैं, लेकिन सच तो यह हैं कि आज तक एक भी मरीज ठीक नहीं हुआ है.

‘‘मेरी छोटी बहन हर महीने बुटाटी धाम फेरी देने जाती थी. जब उन को लकवा हुआ तो हम ही पहली बार उसे बुटाटी ले कर गए थे. 7 दिन तक वहीं रखा, ताकि 7 दिन तक 7 फेरी दे सकें. लेकिन उसे बचा नहीं सके. अगर डाक्टर की सलाह को मानते तो आज हमारी बहन जिंदा होती.’’

जब भी किसी को लकवा होता है और अस्पताल ले जाने की बात करते हैं तो 99 फीसदी लोग बुटाटी की पैरवी करते हैं. जिन के घर में कोई लकवाग्रस्त है, वह मजबूरी में बुटाटी ले कर जाता ही है, क्योंकि नहीं ले जाएं और मरीज को कुछ हो जाए तो दुनिया उसे जीने नहीं देती है कि हम नें कहा था कि बुटाटी ले जाओ, लेकिन नहीं माना इसलिए मरीज की जान चली गई.

जब लोग जबरदस्ती ऐसे धामों पर जा कर दान देते हैं तो ये गबन करने वालों की गलती नहीं हैं, बल्कि वहां जाने वालों की गलती है.

बुटाटी धाम के प्रचारप्रसार पर निवेश करने वालों ने ही अपना अर्जित लाभांश लिया है. किसी ने चंदा या दान भी दिया तो प्रचारप्रसार देख कर ही दिया था. अर्जित आय में से अपना लाभांश निकालना धंधे का नैतिक नियम होता है. किसी भी मंदिर, धाम, आश्रम आदि में आय पर पहला हक समिति, ट्रस्ट, पुजारी का ही होता है.

मैं ने अपनी आंखों के सामने एक दीवार पर तसवीर टांगने से ले कर 20 सालों में ‘अति प्राचीन हनुमान मंदिर’ बनते देखा है. इन 20 सालों तक उस नागौर जिले के फरार आरोपी की मेहनत, सब्र, समर्पण की कोई तो कीमत होगी जो रोज सरकारी दीवार पर तसवीर को साफ कर के टांगता, खाली जगह की सफाई करता, आसपास में पेड़पौधे लगाए.

समय बीतने पर तसवीर की जगह मूर्तियां लगाईं, रोज सुबहशाम धूप, अगरबत्ती करता, 2-2 घंटे तथाकथित मंत्र गुनगुनाता. आज वह कमाई कर रहा है. निवेश से अपना लाभांश ले रहा है.

धर्म का धंधा ही ऐसा है, जो तमाम जोखिमों से दूर बिना पूंजी लगाए अपनी धरती पर सदियों से धड़ल्ले से चलता आ रहा है. धर्म को धंधा बना कर चालाक लोगों द्वारा गरीबों, दलितों, पिछड़ों का शोषण करने की महज सोचीसम झी चाल है. यह एकतरफा वसूली है. आमजन के साथसाथ पूरे देश के भविष्य के लिए यह खतरनाक है.

किसी मामूली आदमी के पास 5,000 रुपए हैं, तो वह अपने बच्चों की पढ़ाईलिखाई पर खर्च करने के बजाय मंदिरमसजिद या धर्म के अड्डों को चंदा देना बेहतर सम झता है. बेचारे बच्चों का भविष्य कुरबान कर दिया जाता है.

सीकर जिले के सालासर बालाजी मंदिर का पुजारी अपनी बेटी की शादी में 11 किलो सोना दें व करोड़ों रुपए खर्च कर डाले, तो इसे क्या कहेंगे, जबकि मंदिर की देखरेख के लिए एक ट्रस्ट बना हुआ है व ट्रस्ट में शामिल पुजारियों को तनख्वाह भी दी जाती है.

30,000 महीना तनख्वाह लेने वाला पुजारी इतना पैसा व धन अपनी बेटी पर कहां से खर्च करेगा? यकीनीतौर पर चंदेचढ़ावे में हेराफेरी हुई होगी, नहीं तो इतना खर्चा इस समय 30,000 कमाने वाले के बूते में तो कतई नहीं है.

पुराने मंदिरों के पुनर्निर्माण के नाम पर आजकल हरेक गांव में इन पर करोड़ों रुपए खर्च कर के भव्य मंदिर बनाए जा रहे हैं. दिलचस्प बात तो यह है कि इन मंदिरों के निर्माण में किसानों की कड़ी मेहनत की पूंजी इस्तेमाल की जा रही है.

राजस्थान के किसानों में पनपी इस नई प्रथा में गांवों के किसान बेबस या शौकशौक में अपनी मेहनत की कमाई भव्य मंदिर निर्माण के लिए दे रहे हैं. अकसर सभी गांवों में ऐसा किया जा रहा है. चाहे किसान फटे कपड़े पहने, उस के बच्चे भूखे रहें, बच्चे पढ़ाई छोड़ दें, कर्ज के पैसे न चुकें, लेकिन मंदिर निर्माण के लिए तो कमाई दान देनी ही होगी वरना धर्म के ठेकेदार नाराज हो जाएंगे और स्वर्ग जाने का सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा.

कोई भी धार्मिक काम बिना चंदे के नहीं होता. मेहनत की कमाई चंदे के जरीए ज्यादातर धार्मिक आयोजनों और अनुष्ठानों में जाती है. आम जनता चंदों से परेशान है, फिर भी धर्म के नाम पर अपनी जेब ढीली करने में कोताही नहीं बरतती, इसलिए चंदाखोरी का धंधा खूब फलफूल रहा है.

मेरे गांव कोथून से उत्तर दिशा में तालाब किनारे एक तरफ जंगल से घिरा एक धार्मिक स्थल है. यहां शिव का एक प्राचीन मंदिर है. इस के बारे में कहा जाता है कि यहां का शिवलिंग राजा भृतहरि द्वारा स्थापित हैं. बाद में भक्तों ने यहां भव्य मंदिर बनवा दिया.

बहरहाल, जो भी हो, शिव का यह मंदिर काफी पुराना था, यह सच है. लेकिन 10-15 साल से यह नए स्वरूप में खड़ा है. यहां लाल पत्थर की जगह अब भव्य मार्बल और संगमरमर के पत्थर लगे हैं. मंदिर की ऊंचाई भी आकाश को छूती नजर आती है और यह सारा कमाल हुआ है चंदा उगाही से.

ऐसा एक नहीं, कई मंदिर और हैं जो चंदे और चढ़ावे से आज विशाल रूप लिए हुए हैं. अब तो ट्रस्ट के नाम पर चंदा उगाही होती है जिस में एक नहीं, कई महंतपुजारियों का हिस्सा होता है जो बराबरबराबर बंटता है और बंटवारे में जहां तीनपांच हुआ, तो वहीं आपस में लड़ाई झगड़ा शुरू हो जाता है.

महंतपुजारी आने वाले भक्तों से रसीद काट कर चंदा वसूलते हैं और शहरगांव में घूमघूम कर धनपतियों से भी उन की धार्मिक भावनाओं का दोहन कर के चंदा वसूला जाता है.

कुलमिला कर बात यह है कि चाहे कोथून का शिव मंदिर हो या फिर देश के कोनेकोने में बने मंदिर, इन मंदिरों के नाम पर करोड़ों का चंदा वसूला जाता है. इस चंदे से मंदिरों का भव्य निर्माण तो होता ही है, साथ ही महंतोंपुजारियों की जीवनशैली भी भव्य हो जाती है. अब इन लोगों ने आमदनी के लिए दूसरे मंदिर भी बना लिए हैं. महंतपुजारी अब गाडि़यों में सफर करते हैं और लग्जरी लाइफ जीते हैं.

पिछले दिनों खाटूश्याम मंदिर के पुजारी के बेटे द्वारा नशे की हालत में गाड़ी से टक्कर मारने की घटना काफी चर्चा में रही. यह घटना अजमेरपुष्कर रोड पर हुई थी, जहां उस की तेज रफ्तार फौर्च्यूयूनर ने कई बाइक सवारों को कुचल दिया. इस हादसे में एक आदमी की मौके पर ही मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे. कार में सवार सभी लोग नशे में चूर थे और मौके पर पुलिस ने कार में शराब की दर्जनों बोतलें भी बरामद की थीं.

हमारा समाज अब काफी शिक्षित हो चूका है लेकिन अफसोस है कि सोच अभी भी अवैज्ञानिक एवं रूढि़वादी है और पैसा उगाई का काम तथाकथित बुद्धिजीवी, पढ़ेलिखे और इज्जतदार लोगों की समितियां करती हैं.

जब कोई इस तरह की लूटचोरी पर सवाल उठाते है तो नसीहत दी जाती है कि तुम लोग हिंदू विरोधी हो, कम्युनिस्ट हो, मुल्ला हो, देशद्रोही हो, तो क्या करें? एक सवाल इन का बड़ा हैरान करने वाला होता है कि लोग अपनी मरजी से देते है, तेरा मन नहीं है तो मत दे.

वैसे तो हर धंधा सम्मानजनक होता है क्योंकि कोई सामान बेचता है और खरीदार खरीदते हैं. शर्तें तय की जाती हैं और मामला साफ होता है. लेकिन यहां मंदिर, धाम, आश्रम में लूट ही लूट है. धर्म के नाम की लूट. इन लोगों की महारत इसी से समझ में आ जाती है कि शिक्षित, जागरूक लोग भी इन के बहकावे में फंसे हुए हैं.    Blind Faith

Religious Exploitation : धर्म का ठेला मेला ही मेला

Religious Exploitation. मैंने बहुत से कारोबार किए, पर कामयाब न हुआ. थकाहारा मैं एक ग्राहक के लिए एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम गोभी तोल रहा था कि एकाएक कहीं से प्रकट हुए बाबा ने मुझ से पूछा, ‘‘सब्जी के ठेले पर एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम तोल कर अपना यह लोक तो छोड़ो, परलोक तक क्यों खराब कर रहे हो कामपाल?’’ मैं ने उन के पैरों में गिर कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं कामपाल? मैं तो… प्रभु, और क्या करूं? अगर मैं एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम न तोलूं, तो शाम को कमेटी वालों को, इस इलाके के हवलदार को, इनकम टैक्स वाले अफसर को 4-4 किलो मुफ्त सब्जी कहां से दूंगा? अगर न दूंगा, तो कल यहां ठेला कौन लगाने देगा?

‘‘बाबा, अपना तो नसीब ही ऐसा है कि जब भी सिर मुंड़वाने बैठता हूं, तो साफ मौसम में भी पता नहीं कहां से ओले पड़ने लगते हैं. ‘‘जवानी में पहली दफा प्यार के चक्कर में सिर मुंड़वाने बैठा ही था कि शादी कर के वह मेरे गले पड़ गई. और फिर कमबख्त आज तक पता ही नहीं चल पाया कि प्यार किस बला का

नाम है. ‘‘अब आप ही बताइए कि ऐसे में मैं एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम न तोलूं, तो और क्या करूं?’’

‘‘तो सुनो कामपाल, अब तुम्हारे शक्तिवर्धक कैप्सूल खाने के दिन आ गए हैं. कल से तुम्हें यह देश कामपाल के नाम से जानेगा. बाबा का हुक्म है कि कल से तुम सब्जी का पंचर टायरों वाला ठेला लगाना बंद कर के धर्म का ठेला लगाओ.’’ ‘‘धर्म ठेले पर भी बिकता है क्या बाबा? मैं ने तो आज तक धर्म के मौल ही देखे हैं. ऐसे में ठेले पर कौन मुझ से धर्म खरीदने आएगा? ऐसा न हो कि मैं दो वक्त की रोटी से भी जाता रहूं.’’

बाबा मेरी अक्ल पर गुस्सा होते हुए बोले, ‘‘मूर्ख, लगता है कि बीवी ने तुम्हारे दिमाग को चाटचाट कर साफ कर दिया है. इस देश में जितना धर्म बिकता है, उतना और कोई माल नहीं बिकता. धर्म के खरीदार यहां हर तबके के लोग हैं. जिन लोगों के पास आटादाल खरीदने तक को पैसे नहीं हैं, वे भी आटेदाल की परवाह किए बिना धर्म जरूर खरीदते हैं. ‘‘रही बात ठेले पर धर्म बेचने की, तो आज धर्म के जितने भी मौल सजे देख रहे हो न, सब ने ठेले से ही धर्म बेचना शुरू किया था. यह धंधा वह धंधा है, जो दिन दूनी रात सौ गुनी तरक्की करता है. जिस ने भी यह धंधा किया है, वह गंगू तेली से राजा भोज हो गया है.

‘‘मेरा तुझे आदेश है कि जनता में धर्म की स्थापना के लिए तू भी धर्म का ठेला लगा और ठेले से मौल तक पहुंच कर करोड़पति हो जा.’’ ‘‘पर बाबा, मेरे पास तो सब्जी बेचने की ही पुश्तैनी कला है. ऐसे में मैं धर्म को कैसे बेच पाऊंगा? सड़ी सब्जी की गंध मेरी नसनस में बस चुकी है,’’ मैं ने अपने भीतर का दर्द कहा.

बाबा मेरी पीठ थपथपाते हुए बोले, ‘‘धर्म बेचना सब्जी बेचने से कहीं ज्यादा आसान है. न तराजू, न बट्टे. न लंगोट, न कच्छे. न तेल लगा कर चमकाई गई सड़ी शिमला मिर्च, न ग्रीस मले मुरझाए भुट्टे. कोशिश कर के तो देख. इस धंधे में न गला फाड़ने की जरूरत, न सड़ी बंदगोभी को ताजा बनाए रखने के लिए उस के सड़े पत्ते उखाड़ने की.’’ बाबा की बातों से हैरानपरेशान हो कर मैं गश खा कर गिरतेगिरते बचा. मैं ने टूटी तराजू और सील निकाले बट्टों को परे फेंकते हुए पूछा, ‘‘पर बाबा…’’

‘‘जानता हूं. तुम बरवाला वाले का केस देख कर डर रहे हो. पर बेटा, चांदनी चौक की एक दुकान बंद होने का मतलब पूरे चांदनी चौक का बाजार बंद होना तो नहीं? गरीबी की सौ बरस की जिंदगी से अच्छे हैं मौल के 2-4 दिन. घोर कलियुग है, घोर कलियुग. अब धर्म का झंडा उठाने वालों के साथ यहां ऐसा ही होगा, पर तुम डरना मत.’’ ‘‘पर बाबा…’’

‘‘पर क्या… सब्जी का ठेला छोड़ कर कल से धर्म का ठेला लगा और चंद दिनों में ही इसरो से भी कम

लागत में चांद पर पहुंच जा,’’ इतना कह कर बाबा अंतर्ध्यान हो गए.

मुझे बाबा की बात जंच गई. लिहाजा, शाम को ठेले की बची सब्जी के भरभर झोले कमेटी वालों को, इलाके के हवलदार को, इनकम टैक्स वाले अफसर को दे कर घर पर ही धर्म का ठेला लगाने की बात पत्नी से की, तो 10-20 दिन न नहाने वाली बीवी खोली में ही स्विमिंग पूल में तैरने के सपने लेने लगी. खुले में शौच जाने वाली मेरी आंखों के सामने एयरकंडीशंड वाशरूम सज उठा. इधरउधर से गत्ते की पेटियां चुन कर लाने वाली मेरी बीवी की आंखों के आगे मौड्यूलर किचन नाचने लगा. देखते ही देखते मैं ने देखा कि जैसे मैं नामीगिरामी बाबा हो गया हूं.

कुछ भी बकने के लिए मेरे भक्तों ने मेरे लिए सोने का सिंहासन बनवा दिया है. भक्त मेरी बकवास सुनने को बेचैन हैं.

मेरे पास स्वर्ग तक जाने के लिए लिफ्ट मौजूद है. भीतर ही भीतर आई फील दैट स्वर्ग के देवता तक मुझ से चिढ़ने लगे हैं. हजारों की तादाद में मेरे दिमाग और बिना दिमाग वाले भक्त हैं. घर के खाली दालचावल के डब्बों में सोने के गहने, हीरेजवाहिरात भरे पड़े हैं. कल तक जिन्हें मैं हफ्ता दिया करता था, वे सब मेरे पैरों में ‘डेली’ चढ़ाने आ रहे हैं. Religious Exploitation

Social Satire : सर चीयर्स डौंट फीयर्स

Social Satire. धरती पर धर्म की जडे़ं मजबूती से जमाने का ठेका लिए, मौडर्न संस्कृति की हिफाजत के लिए पैदा हुए तन, मन और अंधभक्तों के धन के बलबूते अनगिनत शोषणों में लीन एक आत्मा कोर्ट से बाइज्जत बरी होने के बाद ब्रह्मलोक में जाने के बजाय यमराज के दरबार में पहुंची तो यमराज उसे देख कर डर गए.

सदियों से किस्मकिस्म की आत्माओं का सामना करते रहने वाले यमराज उस वक्त उस आत्मा का सामना नहीं कर पा रहे थे. उन्हें लग रहा था जैसे वे भीतर ही भीतर डर रहे हैं, कमजोर पड़ रहे हैं. कभी वे उस आत्मा को देख कर घबरा रहे थे तो कभी उस के साथ सच्चा सौदा करने से कतरा रहे थे. पहली बार उन्होंने महसूस किया कि वे कमजोर पड़ते जा रहे हैं.

तब पहली बार बड़ी देर बाद यमराज का कोर्ट चालू हुआ. अनगिनत शोषणों में शामिल वह आत्मा जब सिर गर्व से ऊंचा किए यमदूतों के साथ यमराज के कोर्ट में पेश हुई तो यमराज ने उस के स्वागत में अपना सिर नीचा कर लिया.

यमराज ने पंचकुला में हुए हादसे से सीख लेते हुए वैसे तो यमलोक में फैसला सुनाने से पहले ही सिक्योरिटी के पुख्ता इंतजाम कर रखे थे, पर फिर भी पता नहीं अब की बार उन्हें अपनी व्यवस्था पर यकीन क्यों नही रहा था?

इस से पहले कि आत्मा के कल्याण की कानूनी प्रकिया शुरू होती, डरेडरे से यमराज चित्रगुप्त के कान में फुसफुसाए, ‘‘चित्रगुप्त, क्यों न इस धर्मपरायण आत्मा के केस की सुनवाई की अगली तारीख तय कर दी जाए? पता नहीं क्यों आज मेरे सिर में दर्द हो रहा है.

‘‘मुझे आज पहली बार जज की कुरसी पर बैठे हुए चक्कर से आ रहे हैं. पता नहीं मुझे आज क्यों सारा यमलोक जलने का डर सता रहा है. लग रहा है, जैसे सारा यमलोक जलने को बेचैन हो.’’

‘‘महाराज, इस आत्मा के यमलोक में हुए फैसले के बाद होने वाले दंगों की नाक में नकेल डालने के पुख्ता इंतजाम हो चुके हैं. दूसरे, यहां तो वे मरे हुए लोग हैं जो नीचे मरमर कर जीने के बाद ही पहुंचे हैं. जीतेजी जो अपने लिए नहीं लड़ सके, वे अब यहां आ कर क्या हुड़दंग मचाएंगे सर? आप कोई टैंशन न लें प्लीज.

‘‘आप बेखौफ हो कर अपना फैसला दे कर धर्मराज होने का एक बार फिर सुबूत दीजिए. हम ने कौन सा चुनाव में इस आत्मा केसमर्थकों के वोट लेने हैं या लिए हैं जो इसे सजा देने से हमें डरना है. हमें कौन से तांत्रिक हो कर लोकतांत्रिक चुनाव लड़ने हैं.’’

‘‘नहीं यार, नीचे जो हुआ उसे देख कर मेरे तो जज की कुरसी पर बैठने से पहले ही हाथपैर फूले जा रहे हैं. भूल गए अपने धर्म क्षेत्र में धर्म के रौकस्टार को जब बलात्कार से जुड़ा होने की सजा सुनाई गई थी तो उस के भक्तों ने कानून को धता बताते हुए क्याक्या किया था?’’

‘‘महाराज, वे उन के भक्त नहीं बल्कि समर्थक थे. समर्थक और भक्त में फर्क होता है. समर्थक राजनीति में होते हैं और भक्त भक्ति की फील्ड में. पर अब वहां उलटा हो चला है. सब गड़बड़ वहीं से हो रही है.

‘‘आज राजनीति में समर्थकों की जगह भक्तों ने ले ली है और भक्ति में भक्तों की जगह समर्थकों ने. हाड़मांस का नर जब अपने को नारायण के रूप में पेश करता है तो ऐसा ही होता है प्रभु,’’ चित्रगुप्त यमराज को फैसला देने के लिए उन्हें हिम्मत दिलाते हुए उन के कान में फुसफुसाए तो यमराज ने दोबारा कहा, ‘‘पर ऐसा क्यों हो रहा है चित्रगुप्त?’’

‘‘प्रभु, वहां नैतिकता पर अनैतिकता हावी है. जिस ने अपनी अनैतिकता को छिपाने के लिए चमत्कारी चोला पहना है वही आज समाज में असरदार है.

‘‘नैतिकता का चोला पहन कर माया से दूर रहने वाले सैकड़ों हाथों से माया जोड़ नहीं बल्कि बटोर रहे हैं.

‘‘सरकारें पिछले हादसों से सबक लेने के बजाय एकदूसरे को सबक सिखाने में जुटी हैं. औरतों की हिफाजत के दावे करने वाले यौन शोषण के केसों में चुप्पी साध रहे हैं और समर्थक अपने नकली भगवान को रो रहे हैं.

‘‘नीचे की सरकारें अपना काम करें या न, पर आप अपना काम कीजिए बस. कम से कम हमारी साख तो बची रहे. डरने की कोई बात नहीं है प्रभु. एक इश्तिहार भी कहता है कि डर के आगे जीत है.’’

‘‘एक बार डीजीपी से फिर पूछ लो कि सिक्योरिटी के इंतजाम सच में पूरी तरह चाकचौबंद हैं या…? वाईआरसीएफ के बल तैनात कर दिए गए हैं न?’’ यमराज ने अपनी बात रखी.

‘‘हांहां प्रभु, सब किया जा चुका है. आप बस…’’

‘‘हमारे पुलिस वाले उन के पुलिस वालों की तरह पीछे तो नहीं हटेंगे?’’

‘‘वे आप का नमक खाते हैं सर. नमकहरामी नहीं करेंगे. कीप इट अप.’’

‘‘तो उन के पुलिस वाले क्या खाते हैं?’’ यमराज ने पूछा.

‘‘अब मेरा और दिमाग न खाओ सर. यहां सब ठीक है प्रभु. मुझ पर भरोसा करो. आप डर क्यों रहे हो? इंसाफ कीजिए.

‘‘इस आत्मा के समर्थकों के हुड़दंग पर काबू पाने के लिए आठ लोकों से सशस्त्र बल बुला लिए गए हैं,’’ चित्रगुप्त झल्लाए.

‘‘कोर्ट… शु… कोरट शु … को…’’ इतना कहते हुए यमराज का गला अचानक फिचफिच करने लगा तो चित्रगुप्त ने जेब में हाथ डालने के बाद कुछ गोलियां सी निकाल कर उन के हाथ पर रखते कहा, ‘‘प्रभु, मिक्स की गोली लो, फिचफिच दूर करो.’’

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