Hindi Story: सफेद दाग

Hindi Story: शादी के 3 साल गुजर जाने के बाद भी रमतिया की गोद सूनी थी. रमरतिया का पति जागेश्वर उस से दूर भागता था, जबकि रमरतिया अपनी जोबन की आग में झुलस रही थी. पर इस सब की वजह क्या थी?

गां का हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर था, जहां सिर्फ पैसेंजर ट्रेनें ही रुकती थीं. रमरतिया अपने घर के दरवाजे पर ताला लगा कर शाम के साढ़े 6 बजे वाली पूरब दिशा की ओर जाने वाली पैसेंजर ट्रेन पकड़ने स्टेशन आई थी. वह अपने मायके जा रही थी. उस के भाई की शादी जो थी. रमरतिया के मायके से उसे लेने के लिए 2-3 बार छोटा भाई आया था, लेकिन उस के पति जागेश्वर ने उसे यह कह कर वापस भेज दिया था कि शादी का दिन नजदीक आने पर एक दिन वह खुद रमरतिया को छोड़ देगा.


पर आजकल करतेकरते शादी को जब 3 दिन रह गए, तो जागेश्वर ने कहा, ‘‘रमरतिया, मु झे तुम्हें मायके छोड़ने की फुरसत नहीं है. तू 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से अकेले ही चली जाना. हां, शाम वाली पैसेंजर से मैं भी जाऊंगा, फिर 3-4 दिन ससुराल में ऐश करूंगा,’’ यह कह कर जागेश्वर पश्चिम दिशा की ओर जाने वाली सुबह 7 बजे की पैसेंजर ट्रेन से अपनी ड्यूटी पर चला गया था. जागेश्वर गांव के उस हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर से 5 स्टेशन पश्चिम दिशा उतर कर एक गांव के स्कूल में क्लर्क की नौकरी करता था, जबकि रमरतिया का मायके गांव के हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर से 5 स्टेशन पूर्व दिशा की ओर था.


रमरतिया की शादी को 3 साल गुजर गए हैं, पर अभी तक उस की गोद सूनी थी. इस की वजह यह थी कि जागेश्वर उसे बिलकुल पसंद नहीं करता था, क्योंकि उस के शरीर पर जगहजगह सफेद दाग थे. इस वजह से वह उस के पास आने में घिन महसूस करता था. जागेश्वर घर पर केवल भोजन से मतलब रखता था, फिर बिस्तर लपेट कर बगल में दाबे हुए बाहर चला जाता था और मड़ैया में बिछी खाट पर सो जाता था या जब खलिहान में फसल होती, तब खलिहान में सोता था.


सावनभादों की रातें हों या वसंत की चांदनी रातें, रमरतिया अपने जोबन की आग पर काबू कर के किसी तरह अकेली समय काट लेती. वह सोचा करती कि औरत का जन्म पा कर जिस को खूबसूरत शरीर नहीं मिला उस की जिंदगी बेकार है और उन्हीं बेकार औरतों की श्रेणी में एक वह भी है. कभीकभी जब वह अपने पति जागेश्वर को चायपानी देते समय उंगलियों से छू देती या फिर मुसकरा देती, तब वह उसे डांटते हुए बोल उठता, ‘‘मुसे तू अपनी जवानी की प्यास बु झाना चाहती हैमैं तेरी जैसी बदसूरत औरत को भला क्यों भोगूं, मु झे तो खूबसूरत औरतें मिलती रहती हैं. तू जवानी की आग में जल मरे , मैं तब भी तु झे हाथ तक नहीं लगाने वाला.’’


यह सुन कर रमरतिया की आंखों में आंसू छलक आते. वह मन ही मन  जागेश्वर को कोसती हुई बुदबुदाती रहती, ‘‘बाजारू औरतों के चक्कर में पड़ना ठीक तो नहीं होता राजा, लेकिन मैं सम झाऊं भी तो कैसे…’’
प्लेटफार्म पर बनी सीमेंट की लंबी कुरसी पर बैठी रमरतिया अपनी प्लास्टिक की डोलची हाथ में थामे यह सब सोच ही रही थी कि पैसेंजर ट्रेन आने की सूचना हो गई. मुसाफिर अपनी जगह से उठ कर पश्चिम दिशा की ओर  झुक झुक कर रेल की पटरियों को देखने लगे. जागेश्वर के कहे मुताबिक रमरतिया तो सुबह 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन ही पकड़ने वाली थी, पर बाल संवारने, नाखून रंगने और पांव को आलता से रंग कर सजनेसंवरने में उसे देर हो गई थी.


सजसंवर कर जब रमरतिया आईने के सामने खड़ी होती, तो किसी अप्सरा से कम थोड़ी लगती, पर उस का आदमी तो उस के शरीर के सफेद दाग से बिदका हुआ रहता. सांचे में ढले उस के बदन के कसाव और उभार पर तो कभी उस की नजर ही नहीं गई. सुहागरात को ही लालटेन की रोशनी में रमरतिया के शरीर के सफेद दाग देख कर जागेश्वर ऐसा बिदका था कि फिर रात में कभी नहीं पास आया. हर समय कहता रहता, ‘‘बेकार लड़की से शादी करा दी. जब जवानी की आग में तड़पेगी तब पता चलेगा कि किसी भोलेभाले लड़के से सफेद दाग वाली बात छिपा कर शादी करने का नतीजा क्या होता है.’’


जागेश्वर शाम को स्कूल से छुट्टी होने पर सीधे स्टेशन आया और अपनी ससुराल तक के स्टेशन का टिकट ले कर शाम वाली पैसेंजर ट्रेन में सवार हो गया. उसे पूरी तरह भरोसा था कि रमरतिया सुबह 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से अपने मायके पहुंच कर घरपरिवार के माहौल में घुलमिल गई होगी. चलो, रात के 10 बजे तक तो वह भी पहुंच ही जाएगा वहां. शादीब्याह वाले घरों में वैसे भी 10-11 बजे तक चहलपहल रहती ही है. ट्रेन में बैठा हुआ जागेश्वर यह सब सोचतेसोचते कभीकभी  झपकी लेने लगता. बीच के स्टेशनों पर लोग चढ़तेउतरते रहे. उस ने खिड़की से बाहर  झांका, तो पता लगा सूरज डूब चुका था और अंधेरा हो गया था.


अरे, यह तो उस के गांव का स्टेशन तुलसीपुर है. यहां तक आतेआते ट्रेन पूरे डेढ़ घंटे लेट हो गई थी. अब पूरे 8 बज   रहे थे. उसे प्यास लगती महसूस हुई. अगले ही पल वह तुलसीपुर स्टेशन पर हैंडपंप से पानी पीने ट्रेन से नीचे उतर पड़ा, यह सोच कर कि वहां कुछ देर तक तो ट्रेन रुकती ही है. गुलमोहर के पेड़ तले वाला हैंडपंप पास ही तो था. जागेश्वर ने हैंडपंप के हत्थे पर जोर डाल कर चलाया और जल्दी से 8-10 अंजुलि पानी पी डाला. तब तक ट्रेन खुल गई, तो वह दौड़ कर एक बोगी में चढ़ गया. इस बोगी में तो घुप अंधेरा है, कोई बल्ब नहीं जल रहा, शायद इस बोगी में बिजली का कनैक्शन किसी तरह से हट गया है, इसीलिए उस में कोई मुसाफिर भी नहीं चढ़ा था. जागेश्वर अंधेरे में ही बीच की एक लंबी वाली बर्थ पर बैठ गया. ट्रेन तेज रफ्तार से भागी जा रही थी.


एकाएक जागेश्वर को लगा कि उस के सामने वाली लंबी सीट पर कोई औरत लेटी है, क्योंकि उस ने शायद करवट बदली थी, तो चूडि़यों की खनकने की आवाज आई थी. वह सोचने लगा, ‘इस अंधेरी बोगी में जहां हाथ को हाथ नहीं सू रहा और यहां औरतजरूर कोई पागल औरत होगी…’ पर जागेश्वर के मन का शैतान अगले ही पल उछलकूद करने लगा. वह सोचने लगा कि काश, यह औरत उस के मन की मुरादनहींनहींऐसी पागल औरत से जिस्मानी रिश्ता बनाना खतरे से खाली नहीं, एड्स का शिकार हो जाएगा.
मन में यह सम तो जागेश्वर को आई पर अगले ही पल हवस के भेडि़ए ने उस के मन पर कालिख पोत दी और उस की हथेलियां सीट पर कुछ टटोलने लग गईं. अगले ही पल उस औरत के पांव की पायल छू गई, साथ ही चिकनी नरम चमड़ी.


अरे, यह औरत तो कुछ भी नहीं एतराज कर रही, शायद इस का मन भी…’ जागेश्वर का हौसला बढ़ गया. उस ने दोबारा अपनी हथेलियां उस की पिंडलियों तक पहुंचा दीं. वह औरत अभी भी खामोश थी. जागेश्वर को अब पूरा यकीन हो गया कि यह औरत उसे मना नहीं करेगी. जागेश्वर का हौसला बढ़ता गया और उस की हथेलियां एकएक बित्ता ऊपर बढ़ती गईं. औरत खामोश रही. हवस का भेडि़या अगले ही पल मांसपिंड पर टूट पड़ा और स्वाद चख कर शांत हो गया. पैसेंजर ट्रेन बीच के कई स्टेशनों को पार करती जागेश्वर की ससुराल वाले रेलवे स्टेशन पर जा लगी. इस बीच में उस बोगी में अंधेरा देख कर कोई भी मुसाफिर नहीं चढ़ सका था. ट्रेन रुकते ही जागेश्वर स्टेशन पर उतर पड़ा. अभी वह नीचे उतर कर खड़ा ही हुआ था कि वह औरत भी  झटपट उतर पड़ी.


स्टेशन के उजाले में जागेश्वर ने उस औरत को देखा, तो जैसे वह उस से नजरें नहीं मिला पा रहा था. वह हकलाता हुआ बोल पड़ा, ‘‘रेरमरतियातूइस अंधेरी बोगी में…’’ ‘‘हां, मैं रमरतिया ही हूं, सुबह वाली पैसेंजर ट्रेन छूट गई थी. जल्दी में स्टेशन पर इस शाम वाली ट्रेन में चढ़ी तो अंधेरी बोगी मिल गई. ट्रेन जब खुल गई तो मैं ने देखा कि तुम स्टेशन के हैंडपंप से पानी पी कर दौड़ कर इसी बोगी में चढ़ गए थे. ‘‘मैं चुपचाप बोगी के बीच में पहुंच कर एक सीट पर लेट गई. मैं जानती थी कि तुम इसी तरह ट्रेनों में, बाजारों में, गलीकूचों में औरतों की तलाश करते रहते हो और अपनी जवानी की प्यास बु झाते फिरते हो.


‘‘यही सोच कर मैं एक लावारिस औरत की तरह पड़ी रही, ताकि आज इस ट्रेन में तुम से मेल कर के यह एहसास करा सकूं कि शरीर तो एक ही होता है, चाहे वह काला हो, गोरा हो या सफेद दाग से भरा हो.
‘‘अगर मन स्वीकार कर ले तो सारी कमियां दूर हो जाती हैं, क्योंकि हर औरतआदमी के मिलन का सुख एक सा हुआ करता है,’’ यह कह कर रमरतिया खामोश हो गई. जागेश्वर को आज रमरतिया की यह बात बहुत गहरे तक जा लगी. उस ने जो कुछ कहा, आदमी औरत के मिलन की सचाई यही तो है. इतना सुख देने वाली सेहतमंद, कसे बदन वाली पत्नी को मात्र सफेद दाग की वजह से छोड़ कर जागेश्वर इधरउधर भटकते हुए बाजारू औरतों से अपने जिस्म की प्यास बु झाता रहा.


सचमुच, जागेश्वर का मन एक औरत के प्रति क्यों इतनी गलत सोच वाला हो गया. हकीकत तो यही है कि उस की पत्नी दिलदिमाग और बरताव में किसी दूसरी औरत से कमतर तो नहीं. उसे अब बहुत पछतावा होने लगा था. शादी के कई साल बीत गए, पर वे दोनों एक घर में रह कर भी अलगअलग थे. जागेश्वर ने रमरतिया के शरीर के सफेद दाग का इलाज करवाने के लिए भी कभी नहीं सोचा. अब तो कोई भी बीमारी लाइलाज नहीं रही, देश का मैडिकल क्षेत्र बहुत विकसित हो चुका है. वह अपनी चांद सी पत्नी के सफेद दाग का इलाज जरूर कराएगा.


अगले ही पल जागेश्वर ने अंधेरे में खेत की पगडंडी पर अपनी ससुराल वाले गांव की ओर कदम बढ़ाते हुए रमरतिया को अपनी बांहों में जकड़ लिया और उस के गाल पर एक गहरा चुंबन जड़ दिया. रमरतिया मुसकरा उठी. जागेश्वर के मुंह से अनायास ही निकल पड़ा, ‘‘मैं ने बहुत बड़ी भूल की है. तुम ने मेरी आंखें खोल दी हैं रमरतिया. मैं अब तुम्हें छोड़ किसी दूसरी औरत की ओर ताकूंगा भी नहीं.’’ Hindi Story

लेखक -कमलेश पांडेय ‘पुष्प’

Hindi Story: चिंता

Hindi Story: रवि अपने कुछ दोस्तों के बहकावे में कर मौजमस्ती करने चकलाघर पहुंच गया. 1,000 रुपए में उस के लिए एक कमरा और एक लड़की तय की गई. उस के बाकी दोस्त भी अलगअलग कमरों में अपनीअपनीमस्तीतलाशने में बिजी हो गए.


कमरे में पहुंच कर रवि पलंग पर बैठ गया. दीवारें सैक्सी तसवीरों से पटी पड़ी थीं. थोड़ी ही देर में कोई 31-32 साल की नेपाली औरत उस के पास कर बैठ गई. अजीब सी हिचक के बीच रवि ने जैसे ही उस का हाथ छुआ, उस का तपता हुआ शरीर उसे चौंकाने लगा. ‘‘अरे, आप को तो तेज बुखार है,’’ रवि बरबस बोल उठा. ‘‘यह सब रोज का धंधा है साहब, आप जल्दी कीजिए. उस के बाद अगले कस्टमर के पास भी जाना है,’’ दर्द को मुसकान में बदलती हुई वह बोली. रवि गंभीर हो गया और बोला, ‘‘बीमार होने पर भी यह सब करती हो. छोड़ क्यों नहीं देती हो यह सब? आखिर क्यों कर रही हो?’’ वह औरत अपने आंसू रोक पाई और बोली, ‘‘बेटी के लिए साहब.’’


‘‘मतलब?’’ रवि ने पूछा. वह औरत कुछ पल चुप रही, फिर टूटी आवाज में बोली, ‘‘नेपाल में मैं एक इज्जतदार परिवार से हूं. मेरे पति का कारोबार था. घरकार, सबकुछ था. मेरी एक 10 साल की बेटी भी है. लेकिन साल 2015 में आए भूकंप ने सब छीन लिया. मेरे पति मलबे में दब कर मर गए. आंखें खोल कर देखा तो बचा था सिर्फ भूकंप का मलबा, भूख, बेबसी और मेरी 8 महीने की बच्ची. ‘‘फिर रोजगार के लिए मैं दरदर भटकी, पर बिना मर्द की औरत खुले खेत जैसी होती है, जिसे कोई भी जानवर बेहिचक चर जाता है. हर जगह मेरे शरीर का शोषण हुआ. फिर भारत में काम दिलाने के नाम पर एक दलाल मु झे यहां बेच गया.’’


उस औरत की कहानी सुन कर रवि का रोमरोम सिहर उठा. वह जिस्म की आग बु झाने आया था, पर सामने किसी मां की तपती मजबूरियां खड़ी थीं. ‘‘लेकिन इस हालत में भी यह सब क्यों?’’ रवि की बात पूरी होने से पहले ही वह औरत बोली, ‘‘बताया तो है कि बेटी के लिए. इसी तपते हुए जिस्म से कमाए पैसों से उस की बोर्डिंग स्कूल की फीस भरती हूं, ताकि पढ़लिख कर वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके और उसे मेरी तरह इस जिस्म के बाजार में कभी बिकना पड़े.’’ रवि के भीतर उस औरत के लिए इज्जत उमड़ आई. वह फौरन कमरे से बाहर निकला और गुस्से में चकलाघर चलाने वाली रेशमाबाई के पास पहुंचा.
‘‘शर्म आनी चाहिए तुम्हें…’’ रवि फट पड़ा, ‘‘एक औरत हो कर दूसरी औरत की मजबूरी का फायदा उठाती हो. इन्हें जिल्लत की जिंदगी में धकेलती हो.’’


रेशमाबाई ने पान की पीक को पीकदान में फेंकते हुए ठहाका लगाया, ‘‘क्या बात है लल्लालगता है पहली बार आए होयहां चमड़ी का धंधा चलता है, चोंचलेबाजी नहीं. मूड नहीं बना क्या? कुछ कड़क चाहिए तो बोलो पहली बार हो, डिस्काउंट भी दे दूंगी…’’ ‘‘कैसी घटिया औरत हो तुमकोई अपनी मरजी से यह काम करे तो बात और है, पर जबरदस्तीरवि का गुस्सा फूट पड़ा. रेशमाबाई फिर मुसकराई और बोली, ‘‘यह सब यहां चलता रहता है. ज्यादा अक्ल मत लगाओ.’’ रवि जोर से बोला, ‘‘अगर यही मजबूरी तुम्हारी बेटी पर आती तो?’’ रेशमाबाई ठहाका मारते हुए बोली, ‘‘बेटी? अरे चिकने, मैं भी तो अपनी बेटी के लिए ही कर रही हूं यह सब. मेरे बाद यही तो संभालेगी धंधा. क्यों बेटी हसीना?’’


पास  झूले पर बैठी रेशमाबाई की बेटी हसीना ने बालों में उंगली घुमाते हुए मुसकरा कर कहा, ‘‘मैं भी तो इसी इंतजार में हूं अम्मी.’’ उन मांबेटी की बातें सुन रवि हैरान रह गया. वह सम नहीं पा रहा था कि बेटी के भविष्य के लिए कौन ज्यादा चिंतित हैवह नेपाली औरत या फिर रेशमाबाई?  Hindi Story

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