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एक दिन: तीन नेताओं के तीन बयान

आज हम देश के तीन बड़े नेताओं के बयान का विश्लेषण ले कर आए हैं. इन्हें पढ़समझ कर आप खुद अंदाजा लगाइए कि देश किस दिशा में जा रहा है. एक समय था जब देश के बड़े नेता सोच समझ कर जनता के बीच अपनी भावना व्यक्त करते थे. कहां गया वह समय और कहां जा रहा है हमारा भारत देश. पहला बयान है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का और दूसरा है गृह मंत्री अमित शाह का और तीसरा बयान है अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहिन…

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार, 11 नवंबर, 2024 को आरोप लगाया कि कांग्रेस अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की सामूहिक ताकत को तोड़ने की कोशिश कर रही है, ताकि उन के बीच विभाजन पैदा किया जा सके और उन की आवाज कमजोर की जा सके और अंततः उन के लिए आरक्षण समाप्त किया जा सके.

नरेंद्र मोदी ने ‘नमो एप’ के माध्यम से ‘मेरा बूथ, सब से मजबूत’ कार्यक्रम के तहत झारखंड में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कार्यकर्ताओं से संवाद करते हुए कहा कि इसलिए मैं चार बार कहता रहता हूं कि एक रहेंगे, तो सेफ (सुरक्षित) रहेंगे. नरेंद्र मोदी ने झारखंड मुक्ति मोरचा (झामुमो), कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) गठबंधन के पांच साल के शासन की विफलताओं को रेखांकित किया और कहा कि राज्य को प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए ‘भ्रष्टाचार, माफिया और कुशासन’ से मुक्त कराना होगा.

नरेंद्र मोदी ने दावा किया कि झारखंड की जनता इस बार विधानसभा चुनाव में बदलाव को संकल्पित है और इस का सब से बड़ा कारण यह है कि सत्तारूढ़ गठबंधन ने राज्य की रोटी, बेटी और माटी पर वार किया है. उन्होंने कहा कि झारखंड इस बार बदलाव करने को संकल्पित हो गया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि कुछ ‘राष्ट्र विरोधी’ अपने निहित स्वार्थ के लिए समाज को बांटने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने लोगों से उन्हें हराने के लिए एकजुट होने का आह्वान किया. नरेंद्र मोदी ने गुजरात के खेड़ा जिले के चडताल में श्री स्वामीनारायण मंदिर की 200वीं वर्षगाठ पर आयोजित समारोह को डिजिटल तरीके से संबोधित किया.

पिछले पांच साल इन्होंने बड़ीबड़ी बातें कीं, लेकिन आज झारखंड के लोग देख रहे हैं कि इन के ज्यादातर वादे झूठे हैं. भाजपा झारखंड में ‘रोटी, बेटी और माटी’ के मुद्दे को जोरशोर से उठा रही है. इस के माध्यम से वह आदिवासी अस्मिता का सवाल
उठा कर बंगलादेशी घुसपैठियों द्वारा आदिवासी महिलाओं का तथाकथित उत्पीड़न, धर्मांतरण, जमीन पर कब्जा और धोखा दे कर विवाह करने तथा इस के परिणामस्वरूप आदिवासियों की संख्या में लगातार कमी आने का मुद्दा उठा रही है .राज्य में झारखंड मुक्ति मोरचा (झामुमो), कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की गठबंधन सरकार है.

नरेंद्र मोदी ने कहा कि राज्य में चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने महसूस किया कि लोगों में भ्रष्टाचार और परिवारवाद को ले कर भी भारी गुस्सा है. उन्होंने कहा कि परिवारवादी पार्टियां, भ्रष्टाचारी तो होती ही हैं. साथ ही समाज के प्रतिभाशाली नौजवानों के रास्ते में सब से बड़ी दीवार होती हैं. झामुमो के परिवारवादियों ने कांग्रेस के ‘शाही परिवार’ से ऐसी गंदी चीजें सीखी हैं, जिस में उन्हें कुरसी और खजाना… इन दो चीजों की ही चिंता रहती है. नागरिकों की उन्हें परवाह हो नहीं होती है. उन्होंने कहा कि इसलिए इस बार के विधानसभा चुनाव में झामुमो गठबंधन की सत्ता से विदाई तय है.

समीक्षा करते हुए हम कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने जो कुछ कहा है, वह दोतरफा है. यह कैसे भूल जाते हैं कि अगर आप किसी की तरफ एक उंगली उठाते हैं तो चार उंगलियां आप की तरफ भी होती हैं.

गृह मंत्री अमित शाह कहिन…

कांग्रेस को ‘डूबता जहाज’ करार देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पूर्व अध्यक्ष अमित शाह ने सोमवार, 11 नवंबर, 2024 को कहा कि वे (कांग्रेस) चुनाव में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को नहीं बचा सकती.

अमित शाह ने रांची जिले के तमार में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए आरोप लगाया कि ‘इंडिया’ गठबंधन ने झारखंड को बरबाद कर दिया. उन्होंने वादा किया कि चुनाव के बाद भाजपा यदि सत्ता में आई तो वह अगले पांच साल में इसे सब से अधिक समृद्ध राज्य बना देगी. उन्होंने आरोप लगाया कि झामुमो, कांग्रेस आदिवासियों को महज वोट बैंक समझती हैं, वे उन का सम्मान नहीं करती हैं. उन्होंने दावा किया कि घुसपैठियों के कारण आदिवासियों की संख्या लगातार घटती जा रही है और ये घुसपैठिए झामुमोनीत (सत्तारूढ़) गठबंधन के वोट बैंक हैं.

कांग्रेस पर प्रहार करते हुए अमित शाह ने कहा कि राहुल गांधी की चार पीढ़ियां भी जम्मूकश्मीर में अनुच्छेद 370 वापस नहीं ला सकती हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को कहा कि झारखंड में अगर भाजपा की सरकार बनती है, तो घुसपैठियों की पहचान करने और उन्हें राज्य से बाहर निकालने के अलावा उन के द्वारा हड़पी गई जमीन को वापस लेने के लिए एक समिति गठित की जाएगी.

गृह मंत्री के रूप में कांग्रेस पर अप्रत्यक्ष रूप से भी प्रहार किया जा सकता है, मगर जिस स्तर पर आ कर चार पीढ़ियां की बात जम्मूकश्मीर विधेयक 370 के संदर्भ में अमित शाह ने कही है, आप ही बताइए कि क्या वह शोभनीय है?

मल्लिकार्जुन खड़गे कहिन…

11 नवंबर, 2024, दिन सोमवार को अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे अपनी बात कहते हुए बड़े बेचारे से लग रहे थे मगर उन्होंने जो कहा बड़ी बेबाकी से और बड़ा सच कहा है.

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया कि भाजपा विपक्ष को दबाने एवं निर्वाचित सरकारों को गिराने में विश्वास करती है. विधायकों की बकरियों की तरह खरीदफरोख्त की जाती है. उन्होंने नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर अडाणी और अंबानी के साथ मिल कर केंद्र सरकार चलाने का भी आरोप लगाया. उन्होंने योगी आदित्यनाथ को घेरते हुए कहा कि वे मुंह में राम, बगल में छुरी में विश्वास करते हैं.

मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि मोदीजी सरकारें गिराने में विश्वास रखते हैं. वे विधायक खरीदते हैं. उन का काम विधायकों को बकरी के जैसे अपने पास रख लेना, पालना और फिर बाद में काट कर खाना है.

मल्लिकार्जुन खड़गे ने दावा किया कि मोदी और शाह ने विपक्षी नेताओं के खिलाफ ईडी, सीबीआई और अन्य केंद्रीय एजेंसियों को तैनात कर दिया है, लेकिन हम डरते नहीं हैं. हम ने आजादी के लिए लड़ाई लड़ी, अपने प्राणों की आहुति दी.

उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी, शाह, अडाणी और अंबानी देश चला रहे हैं, जबकि राहुल गांधी और मैं संविधान और लोकतंत्र को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कटाक्ष किया कि मोदी आदतन झूठे हैं, जो कभी अपने वादे पूरे नहीं करते.

समीक्षा करें तो साफ है कि तीनों ही बयानों को पढ़ने के बाद आप देखेंगे की नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बयान अतिरेकपूर्ण हैं, वहीं मल्लिकार्जुन खड़गे का बयान आत्मरक्षात्मक है. इन तीनों ही बयानों से ऐसा लगता है कि देश एक राजनीतिक संक्रमणकाल से गुजर रहा है, जो लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता.

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की रणनीति चारों खाने चित

भा रतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की सत्ता आने के बाद जिस तरह से जम्मूकश्मीर और वहां की अवाम को दर्द ही दर्द मिला है, क्या उसे कोई भूल सकता है? यहां तक कि नागरिकों के अधिकार नहीं रहे और बंदूक के साए में अब देश की सब से बड़ी अदालत के आदेश के बाद चुनाव होने जा रहे हैं. यह एक ऐसा रास्ता है, जो लोकतांत्रिक की मृग मरीचिका का आभास देता है.

मगर सितंबर, 2024 में होने वाले विधानसभा चुनाव की जो रणनीति कांग्रेस बना रही है, उस में नरेंद्र मोदी और अमित शाह का पूरा खेल बिगड़ता दिखाई दे रहा है. भाजपा किसी भी हालत में यहां सत्ता में आती नहीं दिखाई दे रही है, जिस का आगाज लोकसभा चुनाव में भी नतीजे के रूप में हमारे सामने है.

इधर, फारूक अब्दुल्ला ने जिस तरह सामने आ कर मोरचा संभाला है और  विधानसभा चुनाव लड़ने की रणनीति बनाई है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी की रणनीति चारों खाने चित हो चुकी है.

कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी श्रीनगर पहुंचे थे. मल्लिकार्जुन खड़गे ने जम्मूकश्मीर के आगामी विधानसभा चुनाव के लिए दूसरे विपक्षी दलों के साथ गठबंधन करने की इच्छा जताई और केंद्रशासित प्रदेश के लोगों से भारतीय जनता पार्टी के वादों को ‘जुमला’ करार दिया.

मल्लिकार्जुन खड़गे ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के साथ श्रीनगर में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं से विधानसभा चुनावों की जमीनी स्तर की तैयारियों के बारे में जानकारी ली. उन्होंने कहा कि ‘इंडी’ गठबंधन ने एक तानाशाह को पूरे बहुमत के साथ (केंद्र में) सत्ता में आने से रोका है. यह गठबंधन की सब से बड़ी कामयाबी है. कांग्रेस ने राज्य का दर्जा बहाल करने की पहल की है. हम इस दिशा में काम करने का वादा करते हैं. राहुल गांधी की जम्मूकश्मीर में चुनाव से पहले गठबंधन बनाने में दिलचस्पी है. वे दूसरी पार्टियों के साथ मिल कर चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं.

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आगे कहा कि दरअसल, भाजपा लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद चिंतित है, क्योंकि वे लोग जिन विधेयकों को पास कराना चाहते थे, उन में करारी मात मिली है.

पूर्ण राज्य का दर्जा

कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के श्रीनगर दौरे से राजनीति में एक गरमाहट आ गई है. राहुल गांधी ने कहा कि जम्मूकश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करना कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन ‘इंडी’ की प्राथमिकता है. यह उन की पार्टी का लक्ष्य है कि जम्मूकश्मीर और लद्दाख के लोगों को उन के लोकतांत्रिक अधिकार वापस मिलें.

कांग्रेस और ‘इंडी’ गठबंधन की प्राथमिकता है कि जम्मूकश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा जल्द से जल्द बहाल किया जाए. हमें उम्मीद थी कि चुनाव से पहले ऐसा कर दिया जाएगा, लेकिन चुनाव घोषित हो गए हैं. हम उम्मीद कर रहे हैं कि जल्द से जल्द पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा और जम्मूकश्मीर के लोगों के अधिकार बहाल किए जाएंगे.

आजादी के बाद यह पहली बार है कि कोई राज्य केंद्रशासित प्रदेश बन गया है. यहां कोई विधानपरिषद, कोई पंचायत या नगरपालिका नहीं है. लोगों को लोकतंत्र से दूर रखा गया है.

मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 30 सितंबर तक चुनाव कराने के निर्देश के चलते ही जम्मूकश्मीर में विधानसभा चुनाव की घोषणा की गई है.

चुनाव से पहले जम्मूकश्मीर के लोगों से किया गया एक भी वादा पूरा नहीं किया गया है. कुलमिला कर कांग्रेस नेताओं ने जिस तरह जम्मूकश्मीर में मोरचाबंदी की है, उस से नरेंद्र मोदी और अमित शाह के मनसूबे ध्वस्त होंगे, ऐसा लगता है.

फारूक अब्दुल्ला और कांग्रेस

जम्मूकश्मीर में जो नए राजनीतिक समीकरण बन रहे हैं, उन से साफ दिखाई दे रहा है कि फारूक अब्दुल्ला, जो जम्मूकश्मीर के सब से बड़े नेता और चेहरे हैं, ने कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है और यह गठबंधन अगर बन जाता है, तो इस की सरकार बनने की पूरी संभावना है, क्योंकि इन के सामने सारे नेता बौने हैं. वहीं राहुल गांधी और ‘इंडी’ गठबंधन का अब समय आ गया है, यह दिखाई देता है.

यहां चुनाव 18 सितंबर, 25 सितंबर और 1 अक्तूबर को होंगे. नतीजे 4 अक्तूबर को घोषित किए जाएंगे.

फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि कांग्रेस के साथ मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (माकपा) के (एमवाई) तारिगामी भी हमारे साथ हैं. मुझे उम्मीद है कि हमें लोगों का साथ मिलेगा और हम लोगों

के जीवन को बेहतर बनाने के लिए भारी बहुमत से जीतेंगे. इस के पहले राहुल गांधी ने भरोसा दिया था कि जम्मूकश्मीर के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करना कांग्रेस और ‘इंडी’ गठबंधन की प्राथमिकता है.

फारूक अब्दुल्ला ने उम्मीद जताई कि सभी ताकतों के साथ पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा. राज्य का दर्जा हम सभी के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है. इस का हम से वादा किया गया है. इस राज्य ने बुरे दिन देखे हैं और हमें उम्मीद है कि इसे पूरी शक्तियों के साथ बहाल किया जाएगा. इस के लिए हम ‘इंडी’ गठबंधन के साथ एकजुट हैं.

महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने आया है कि चुनाव से पहले या चुनाव के बाद गठबंधन में महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली पीडीपी की मौजूदगी से भी नैशनल कौंफ्रैंस के नेता फारूक अब्दुल्ला ने इनकार नहीं किया है.

नरेंद्र मोदी ने दूसरे नेताओं के पर काटे, तानाशाही की निशानी

बात साल 1982 की है. केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी. इंदिरा गांधी ने साल 1980 का लोकसभा चुनाव जीत कर प्रधानमंत्री के तौर पर वापसी की थी. उत्तर प्रदेश कांग्रेस में उठापटक और गुटबाजी चल रही थी. इंदिरा गांधी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर ऐसे चेहरे की तलाश थी, जिस को ले कर कोई विवाद और गुटबाजी न हो. तलाशने के बाद एक नाम श्रीपति मिश्र का सामने आया. 19 जुलाई, 1982 को इंदिरा गांधी ने श्रीपति मिश्र को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया. 2 साल यानी 1984 तक वे मुख्यमंत्री रहे.

सुलतानपुर जिले के सुरापुर कसबे के रहने वाले श्रीपति मिश्र बेहद सरल, सज्जन और मृदुभाषी थे. ऐसे ही नारायण दत्त तिवारी का मामला भी था.

कुछ इसी तरह से अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने मुख्यमंत्रियों को बदलने का काम करते हैं. वे तकरीबन 13 साल तक जिस गुजरात के मुख्यमंत्री रहे, उसी गुजरात में अब मुख्यमंत्री ताश के पत्तों की तरह से फेंट कर बदल दिए जाते हैं.

साल 2001 से ले कर साल 2014 तक 13 साल अकेले नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे. इस के बाद साल 2014 से ले कर साल 2022 के 8 साल में आनंदी पटेल, विजय रूपाणी और भूपेंद्र पटेल 3 मुख्यमंत्री बदले गए. 13 साल एक मुख्यमंत्री और 8 साल में 3 मुख्यमंत्री बनाए गए.

उत्तराखंड का उदाहरण भी काफी मजेदार है. साल 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद उत्तराखंड में भाजपा ने अपने बड़े नेताओं को दरकिनार कर त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया. साल 2021 में त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटा कर तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया और साल 2022 में पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया. ऐसे नए नेताओं को मुख्यमंत्री बनाया, जिन को कोई अनुभव नहीं था.

यही बात मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद देखने को मिली, जब विधानसभा चुनाव जिताने वाले शिवराज सिंह चौहान की जगह पर मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया.

अनुभवी नेताओं को दरकिनार कर के छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय और राजस्थान में भजन लाल शर्मा को इसी तरह से मुख्यमंत्री बनाया गया. असल में अब मुख्यमंत्री बनाने में काबिलीयत नहीं देखी जाती है.

पहले कांग्रेस इसी तरह से मुख्यमंत्री बदलती थी, अब भाजपा उसी राह पर है. विधायक अब पार्टी के गुलाम बन गए हैं. उन से जिन के नाम का प्रस्ताव कराना हो, कर देते हैं.

पार्टी अध्यक्ष से ले कर जिला अध्यक्षों तक के सारे फैसले हाईकमान करता है. हर दल में आंतरिक लोकतंत्र खत्म हो गया है. संगठन में चुनाव नहीं, नियुक्तियां होने लगी हैं.

जनता के नहीं, पार्टी के प्रतिनिधि

चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाले ऐक्टिविस्ट प्रताप चंद्रा कहते हैं, ‘‘असल में जब संविधान ने चुनाव की व्यवस्था बनाई, तो लोकसभा सदस्य और विधानसभा सदस्य चुने जाने का विधान था. ये सदन में अपना नेता चुनते थे. साल 1967 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ, तो इंदिरा गांधी ने कांग्रेस (आई) बनाई, जिस का निशान हाथ का पंजा था.

‘‘इंदिरा गांधी ने चुनाव आयोग से इसी निशान को अपने लिए रिजर्व करने के लिए कहा. इस के बाद पार्टी तंत्र विकसित होने लगा.

‘‘साल 1985 में राजीव गांधी ने जब दलबदल कानून बनाया, तब से विधायक और सांसद पार्टी व्हिप के दबाव में आने लगे. साल 1989 के बाद राजनीतिक दलों का रजिस्ट्रेशन शुरू हुआ. धारा

29 ए में पार्टी रजिस्टर्ड होने लगी. 29बी चुनाव चिह्न और 29सी दलों की आय के बारे में नियम बन गया.

‘‘इस के बाद विधायक और सांसद जनता के नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि बन गए. वे जनता के हित के बजाय पार्टी के हित में काम करने लगे. पार्टी व्हिप को न मानने से सदस्यता जाने का खतरा बढ़ गया था.’’

पौराणिक कथाओं का असर

हमारे समाज की मूल भावना में काबिलीयत की जगह परिपाटी को अहमियत दी जाती है. इस के तमाम उदाहरण हैं. संयुक्त हिंदू परिवारों में यह चलन था कि घर का बड़ा बेटा ही घर चलाएगा. वह काबिल न हो तो भी घर चलाने का हक उस का होता था. छोटा भाई असहमति भी जाहिर नहीं कर सकता था. हमारे समाज में असहमति को विरोध सम?ा लिया जाता है.

‘महाभारत’ को भी देखिए. धृतराष्ट्र बड़े थे, लेकिन अंधे होने की वजह से उन को राजा नहीं बनाया गया. इस के बाद भी वे खुद को राजा मानते रहे. उन के छोटे भाई पांडु की मौत के बाद जब धृतराष्ट्र ने राजपाट संभाला, तब उन्होंने तय कर लिया कि भले ही युधिष्ठिर बड़े हों, पर राजा उन का बेटा दुर्योधन ही बनेगा.

पांडवों में भी यही भावना थी. पांचों भाइयों में युधिष्ठिर सब से बड़े थे. इस वजह से उन के ही आदेशों को माना जाता था. दुर्योधन के साथ जुआ खेलने के लिए युधिष्ठिर ही आगे आए. जब महाभारत का युद्ध हुआ तो काबिलीयत के हिसाब से सब से बड़ी जिम्मेदारी अर्जुन के कंधों पर आई, क्योंकि वे

सब से काबिल थे. उन को ही कृष्ण ने गीता सुनाई. अगर परिवार में बड़े होने के चलते युधिष्ठिर ही युद्ध का संचालन करते, तो महाभारत के युद्ध का नतीजा अलग हो जाता. काबिलीयत के मुताबिक अगर जिम्मेदारी न दी जाए, तो हार तय होती है.

इतिहास में बहुत से ऐसे उदाहरण हैं, जहां बड़े बेटे को नाकाबिल होने के बाद भी राजा बना दिया गया, पर बाद में वह राज्य बरबाद हो गया.

इस को आज के दौर में घरपरिवार के उदाहरण से समझे तो कई कारोबारी घराने, सामान्य परिवार इसी वजह से खत्म हो गए, क्योंकि उन्होंने बड़े बेटे को जिम्मेदारी सौंप दी. पुरानी लीक और रूढि़वादी सोच के चलते अगर नाकाबिल होने के बाद भी बड़े बेटे को ही हक सौंप दिए जाएंगे, तो परिवार का बरबाद होना तय है.

राजनीति से ले कर घरपरिवार तक में यही कहा जाता है कि जो बड़ा है, उसे ही असल हक है. राजनीतिक दलों में इसी बड़े को हाईकमान कहा जाता है. जब हाईकमान काबिलीयत के आधार पर फैसले नहीं करता है, तो वह पार्टी डूब जाती है. कांग्रेस इस का उदाहरण है.

एक ही रंग में रंगे

कांग्रेस की तरह से भाजपा में भी हाईकमान कल्चर बढ़ गया है. हिंदुत्व के पुट को अगर किनारे कर दिया जाए, तो इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी का काम करने का तरीका एकजैसा है. प्रधानमंत्री रहते दोनों ही पार्टी और देश दोनों चला रहे हैं.

चुनाव में टिकट बंटवारे का मसला हो या मुख्यमंत्री बदलने का मसला हो, प्रधानमंत्री का ही आदेश चलता है. दूसरे प्रधानमंत्रियों के जमाने में मंत्रिमंडल का फैसला होता था. अब मसला वित्त का हो तो फैसला प्रधानमंत्री लेते हैं, विदेश का हो, तो फैसला प्रधानमंत्री लेते हैं, रक्षा का हो तो फैसला प्रधानमंत्री लेते हैं. ऐसे में वित्त, विदेश और रक्षा मंत्री को रखा ही क्यों गया है?

देश के सारे फैसले पीएमओ लेने लगा है. ऐसे में जनता के प्रतिनिधि होने का मतलब ही क्या रह गया है? जब वित्त, विदेश और रक्षा मंत्री जैसे दूसरे विभागों के फैसले पीएमओ को ही करने हैं, तो इतने मंत्री रखने की जरूरत क्या है?

प्रदेश को चलाने के लिए मुख्यमंत्री की काबिलीयत को देखने की जरूरत नहीं है, तो मुख्यमंत्री के ताम?ाम पर पैसा खर्च करने की जरूरत क्या है? पीएमओ और अफसर प्रदेश भी चला सकते हैं. राम की खड़ाऊं रख कर राज चलाया जा सकता है, तो पीएमओ देश को क्यों नहीं चला सकता?

राजा में दिखते हैं भगवान

संविधान ने एमपी, एमएलए को जनता का प्रतिनिधि माना है. वे जनता के वोट से चुन कर जाते हैं. सदन में वे वही बात करेंगे, जो उन की पार्टी यानी मुखिया का आदेश होगा. उन की असहमति को विरोध सम?ा जाएगा. इस के चलते उन की सदस्यता जा सकती है. एमपी, एमएलए जनता के प्रतिनिधि नहीं, पार्टी के प्रतिनिधि हो गए हैं. पार्टी के मुखिया यानी हाईकमान का आदेश ही राजा का आदेश हो गया है.

जैसे घरपरिवार में पिता का राज होता है, बेटे का हक नहीं होता कि वह अपनी मरजी से शादी कर सके. बात न मानने पर पिता अपनी जायदाद से बेटे को बेदखल कर सकता है. परिवार और राजनीति दोनों ही एकदूसरे के उदाहरण दे कर अपनी बात को सही साबित करते रहते हैं.

पिता भी राजा की तरह होता है. राजा को भी पिता कहा जाता है. दोनों ही भगवान जैसे होते हैं. भगवान का आदेश कौन टाल सकता है?

मनोहर लाल कितने भी काबिल क्यों न हों, राजा के आदेश की अनदेखी नहीं कर सकते. हाईकमान के रूप में नरेंद्र मोदी को लोग भगवान का अवतार बताते हैं. चुनावी टिकट से ले कर मुख्यमंत्री बदलने तक के उन के सारे फैसले कबूल कर लिए जाते हैं.

नरेंद्र मोदी के राज में महंगी ट्रेनें और खाली बटुआ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रैपिड रेल ट्रांजिट सिस्टम के 18 मील के हिस्से का उद्घाटन करने का समय दिया गया, यह देश के लिए बड़े गौरव की बात है. 18 घंटे काम करने वाले नरेंद्र मोदी को रेलों के उद्घाटनों में बहुत मजा आता है चाहे उन की ही झंडियां दिखाई हुईं रेलें महंगी और बेमतलब होने के कारण खाली क्यों न चल रही हों. अधिकतर वंदेभारत ट्रेनें खाली चल रही हैं.

यह रैपिड रेल ट्रांजिट सिस्टम कब चालू होगा पता नहीं. उसे दिल्ली से मेरठ तक जाना है पर दिल्ली में जंगपुरा के पास बारापुला के पास तो इस के खंबे अभी तो लोहे के रावण जैसे लग रहे हैं जिन पर कागज मड़ा जाना है.

अभी जो 18 मील का सफर है उस का किराया साधारण श्रेणी का 50 रुपया है. इस रेल तक पहुंचने और फिर आखिरी स्टेशन से घर, औफिस या दुकान तक पहुंचने में जो खर्चा होगा, वह अलग. साधारण वाहन भी हो तो 18 किलोमीटर के साथ जो अलग से खर्च होगा उसे मिला कर यह रेल की झंडी बटुए को खाली करने का इशारा आया है.

हमारे देश में पिछले सालों में बहुतकुछ बन रहा है. संसद भवन बना, भारत मंडपम बना, सरदार पटेल का स्टैचू बना, बड़े लंबे हाईवे बने, विशाल एयरपोर्ट बने. पर क्या इस में वे लोग चलेंगे या वे वहां छुट्टी मनाने जाएंगे जिन्होंने इसे बनाया? नहीं, क्योंकि किसी भी जगह आम आदमी की पहुंच नहीं है. न उस के पास पैसा है, न रुतबा है, न उसे जरूरत है.

जनता का पैसा मंदिरों के रास्तों या जी-20 की आवभगत में खर्च किया जा रहा है. जनता के पैसे से बने स्टेडियमों में क्रिकेट मैच हो रहे हैं, जहां 5-6 घंटे के हजारों के टिकट लगते हैं और काम सिर्फ ‘हाहाहूहू’ करना होता है.

दुनिया में हंगर इंडैक्स में 125 देशों में से 111वीं जगह पर होने वाला देश इसे ऐयाशी का नाम न दे तो क्या करे. प्रधानमंत्री ने अपने लिए 2-2 विशाल विमान खरीदे, न जाने कितने हैलीकौप्टर इस्तेमाल होते हैं, कहीं जाएं तो लंबाचौड़ा बंदोबस्त होता है. जनता के प्रधानमंत्री के फैसले जनता से दूर रह कर किए जा रहे हैं और 100 महीनों से यही हो रहा है.

रैपिड रेल ट्रांजिट सिस्टम में जाने में मजा आ सकता है पर यह अभी उस स्टेज पर नहीं है कि राज्य या किसी शहर को कोई फायदा हो. वैसे भी जरूरत भी ऐसी बसों की जो चाहे एयरकंडीशंड न हों पर इतनी दुरुस्त हों जो बिना रास्ते में खराब हुए उतनी ही दूरी उतनी ही देर में पूरी करा दें.

जरूरत सड़कों के मैनेजमैंट की है. सड़कों की भीड़ आम लोगों का समय बरबाद न करे, यह पहला काम है. अगर रैपिड ट्रेन बनानी हैं तो वे सस्ती हों चाहे एयरकंडीशंड न हों. ऐसे प्लेटफार्म से चलें जहां पानी मुफ्त मिलता हो, 20 रुपए में पूरीआलू मिल जाए न कि ऐसे से जहां पानी की बोतल 50 रुपए की हो और कम से कम खाना 300 रुपए का हो.

जरूरत नई तकनीक पैर से चलने वाले या बैटरी रिकशों की है जिन से पुलिस वाले रिश्वत न लें और जिन पर करोड़ोंअरबों की सड़कों पर चलने से मनाही न हो.

एक प्रधानमंत्री को एयरकंडीशंड रेलों, गाडि़यों, हवाईजहाजों में नहीं, सड़कों पर चलने की आदत होनी चाहिए.

राजनीति के समर में शरद पवार की गुगली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सब से बड़े नेता शरद पवार का राजनीति के मैदान में घातप्रतिघात का दौर चल रहा है. नरेंद्र मोदी लगातार प्रयास में लगे हुए हैं कि शरद पवार को अपने पक्ष में ले कर देश की राजनीति का मानचित्र ही बदल दें. वहीं दूसरी ओर शरद पवार हैं कि लगातार लाख कोशिशों के बावजूद नरेंद्र मोदी के संजाल में फंसने के बजाय नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक बड़ी लकीर खींचते चले जा रहे हैं, ऐसे में आने वाले लोकसभा चुनाव में शरद पवार की एक बड़ी भूमिका सामने आने की संभावना दिखाई देने लगी है.

शरद पवार के गृह प्रदेश महाराष्ट्र के साथसाथ देश की सियासत में उठापटक जारी है. इसी उठापटक के बीच खबर आई है कि नैशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) प्रमुख शरद पवार को कैबिनेट मंत्री का पद औफर किया गया है. लेकिन खुद शरद पवार ने इन अटकलों पर प्रतिक्रिया दी है और जो कहा है, उस से नरेंद्र मोदी के हाथों के तोते उड़ने लगे होंगे.

शरद पवार ने कहा, “मैं नरेंद्र मोदी केबिनेट में आ रहा हूं, इस से वाकिफ नहीं हूं. सीक्रेट मीटिंग की बातें हो रही हैं, लेकिन वास्तविकता ये है कि इस बैठक में कोई राजनीतिक चर्चा नहीं हुई. केंद्र सरकार ने मुझे कैबिनेट मंत्री बनने का औफर किया है. इस तरह की बातों में कोई सचाई नहीं है.

“भारत में राजनीतिक माहौल मोदी के पक्ष में नहीं है. केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में भाजपा सत्ता में नहीं है. यहां तक कि चंद्रबाबू नायडू भी इंडिया गठबंधन से जुड़ गए हैं. महाराष्ट्र और मध्य

प्रदेश में नरेंद्र मोदी की भाजपा ने सरकारों को अस्थिर किया. दिल्ली, झारखंड, बंगाल और अन्य राज्यों में भाजपा सत्ता में नहीं है. देश के लोगों ने यह तय कर लिया है कि उन्हें क्या करना है. इसलिए अब नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि मैं वापस आऊंगा. पवार ने कहा कि भाजपा ने कई राज्यों की सरकारों को अस्थिर करने का काम किया है.”

सचाई देश को बता दी

देश के महत्वपूर्ण नेताओं में  एक शरद पवार ने बेबाक तरीके से अपनी बात रखी है. शरद पवार ऐसे नेताओं में हैं, जिन की बात देश बड़ी गंभीरता से सुनता है और जो बहुत ही सालदोरिक तथ्य के साथ अपनी बात रखते हैं. सरसावा में जो कुछ कहा है, उसे अगर हम सच मानें, तो नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री के रूप में उलटी गिनती शुरू हो गई है.

शरद पवार ने कहा, “मोदी की अगुआई में चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने का काम किया जा रहा है. मणिपुर चीन की सीमा पर है. इस वजह से यह संवेदनशील राज्य है. हमें सचेत रहने की जरूरत है. लेकिन उत्तर भारत में जो हो रहा है, वह चिंताजनक है. पुलिस बलों पर हमला किया गया. दो समुदायों के बीच जहर घोला जा रहा है. नरेंद्र मोदी मणिपुर को ले कर लोकसभा में सिर्फ तीन से चार मिनट ही बोलते हैं.”

इस तरह शरद पवार ने सबकुछ देश को बता दिया है. जो आप सोचतेसमझते हैं और इन बातों में  सचाई भी है. इस तरह उन्होंने एक अलग लाइन खींच दी है. इस सब के बाद विपक्ष के नएनए गठबंधन इंडिया में एक नई ताकत का संचार होना स्वाभाविक है और नरेंद्र मोदी के लिए चिंता का सबब.

संसद में कर्मकांड और प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी

देश के नए संसद भवन के उद्घाटन के दरमियान प्राचीन रीति-रिवाजों के नाम पर जिस तरह कर्मकांड दुनिया और हमने देखे हैं उससे यह संदेश गया है कि आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु की वैज्ञानिक सोच से इतर आज का भारत यह है जो हवन और कर्मकांड में विश्वास रखता है . क्योंकि इसके बगैर न तो देश की तरक्की हो सकती है और न ही समाज की. संभवत नरेंद्र दामोदरदास मोदी को यह विश्वास और आस्था है कि पंडित पुरोहितो के सामने समर्पण करने से देश दुनिया का सरताज बन सकता है और तथाकथित रूप से विश्व गुरु भी.

यह सब देखने के बाद कहा जा सकता है कि आज देश उस चौराहे पर खड़ा है जहां से एक बार फिर पोंगा पंथ और पुरातन पंथी विचारधारा को  सरकार और  सबसे ज्यादा प्रधानमन्त्री का प्रश्रय मिला है.

दरअसल, यह देश में  हिंदुओं की तुष्टिकरण के कारण और बहुलता के कारण यह सब किया जा रहा है. जो सीधे-सीधे संविधान और अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो जाने वाले लाखों लोगों का अवमान है. यह बताता है कि लोकतंत्र में सत्ता के लिए वोटों की राजनीति का भयावह चित्र कैसा हो सकता है. हमारे देश के संविधान में स्पष्ट रूप से अंकित है कि लोकतांत्रिक गणराज्य है. मगर आज हिंदुत्व वाली सोच कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र दामोदरदास मोदी संविधान की भावना से हटकर के वह सब कर रहे हैं जो इसके पहले 75 वर्षों में कभी भी नहीं हुआ. और मजे‌ बात की लोग कह रहे हैं कि नए भारत का आगाज हो गया है. यह हास्यास्पद है की ऐसा महसूस कराया जा रहा है मानो बीते 75 साल हमारे देश के लिए अंधकार के समान थे और नरेंद्र मोदी की सत्ता आने के बाद देश सही अर्थों में आजाद हुआ है विकास की ओर बढ़ रहा है और दुनिया का नेतृत्व करेगा. मगर यह सब बातें मीडिया का हो हल्ला है. सच्चाई यह है कि देश जिस तरह अपनी संविधान की सीमाओं से हटकर के पीछे की ओर जा रहा है उससे देश की छवि दुनियां में पूरी तरह से बदल रही है जो भविष्य के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती.

नेहरू और नरेन्द्र मोदी

तथ्य यह  है कि प्रधानमंत्री मोदी विपक्ष को सम्मान नहीं देते और उनके कार्य व्यवहार से महसूस होता है मानो विपक्ष को समाप्त कर देना चाहते हैं.  नरेंद्र मोदी बारंबार विपक्ष को नजरअंदाज कर और हंसी उड़ाते दिखाई देते हैं. अगर ऐसा नहीं है तो जब संसद के निर्माण का विचार नरेंद्र मोदी सरकार को आया तो उन्होंने विपक्ष से मिल बैठकर विचार विमर्श क्यों नहीं किया. जब उद्घाटन का समय आया तब उन्होंने विपक्ष के साथ विचार-विमर्श क्यों नहीं किया. देश सत्ता और विपक्ष के माध्यम से ही चलता है.  मगर नरेंद्र दामोदरदास मोदी की सोच  है कि विपक्ष को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाए. यही कारण है कि नई संसद के उद्घाटन के दरमियान कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों ने संसद भवन के उद्घाटन का बहिष्कार कर दिया. मगर उन्हें मनाने के लिए सकारात्मक   पहल नरेंद्र मोदी सरकार ने नहीं की. बल्कि  हुआ यह कि सरकार के चर्चित चेहरों द्वारा चाहे वह राजनाथ सिंह को या फिर स्मृति ईरानी द्वारा विपक्ष का मजाक बनाया गया और उन पर प्रश्नचिन्ह उठाए गए. इस संदर्भ में शरद पवार ने जो कहा है वह सौ फीसदी दी सच है.

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार के मुताबिक,- “नए संसद भवन के बनाने से मैं खुश नहीं हूं. मैंने सुबह कार्यक्रम देखा है, अच्छा है मैं वहां नहीं गया. नई संसद मे जो कार्यक्रम हुआ उससे हम देश को पीछे ले जा रहे हैं.”

शरद पवार देश वरिष्ठ राजनेता है अगर उन्होंने उद्घाटन समारोह पर यह टिप्पणी की है तो यह देश की दुनिया की आवाज ही कही जा सकती है. उनके मुताबिक -“उद्घाटन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  की विभिन्न रस्मों से यह प्रदर्शित हुआ  की देश को दशकों पीछे ले जाया जा रहा है , देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वैज्ञानिक सोच रखने वाले समाज की परिकल्पना की थी, लेकिन नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह में जो कुछ हुआ वह इसके ठीक उलट है.”

सचमुच यह दुखद है और जिसका टेलीकास्ट दुनियाभर में हुआ है सारी दुनिया जानती है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां सभी जाति समुदाय के लोग प्रेम और सद्भाव के साथ रहते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के एक कार्यक्रम से मानो सब कुछ मिट्टी पलीद हो गया.

संसद भवन का उद्घाटन के दौरान वहां हवन किया गया तथा लोकसभा अध्यक्ष के आसन के निकट राजदंड (सेंगोल) स्थापित किया गया. यह साला ढकोसला दुनिया ने देखा है और इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है. जिसका दूरगामी असर भारत की राजनीति पर भविष्य पर पड़ने वाला है.

दरअसल,प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा आधुनिक भारत की अवधारणा की बात करने और नई दिल्ली में नए संसद भवन में की गई विभिन्न रस्मों में बहुत बड़ा अंतर है. जो सिर्फ हिंदुत्व की स्थापना और हिंदू तुष्टीकरण के कारण किया गया है. यह पूरी तरह संविधान की भावना के विपरीत है. वस्तुत: यह लोग ऐसे हैं कि अगर आज हिंदुओं की जगह कोई दूसरा जाति समुदाय बहुसंख्यक हो जाए तो यह लोग उनके पैरों में भी लोटने लगेंगे.

नए संसद भवन के उद्घाटन के अवसर पर देश के सभी छोटे बड़े नेताओं बुद्धिजीवियों ने अपने विचार रखे हैं ,ऐसे समय में शरद पवार का बयान अत्यंत महत्वपूर्ण है नए संसद भवन के उद्घाटन के संपूर्ण कार्यक्रम पर उनका यह कहना कि विज्ञान पर समझौता नहीं किया जा सकता. नेहरू ने वैज्ञानिक सोच वाले समाज का निर्माण करने की ओर निरंतर प्रयास किया. लेकिन आज नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह में जो कुछ हुआ, वह उससे ठीक उलट है जिसकी नेहरू ने परिकल्पना की थी.

सत्यपाल मलिक का सच और सीबीआई

कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के प्रिय पात्र रहे सतपाल मलिक अपने कड़वे बोलों के कारण संभवत नरेंद्र मोदी की आंखों की किरकिरी बन गए हैं. यही कारण है कि एक बहुचर्चित न्यूज पोर्टल में साक्षात्कार के बाद केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने बतौर मेहमान उन्हें बुला भेजा है. मजे की बात यह है कि सत्यपाल मलिक ने सीबीआई इस निमंत्रण को अपने ट्विटर हैंडल पर बड़ी गर्मजोशी के साथ शेयर करते हुए फिर कुछ  कड़वा बोल दिया है जिसके कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी और भारतीय जनता पार्टी अब उनके सीधे निशाने पर है.

जैसा कि अब यह बात सभी जानते हैं की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो हो या फिर प्रवर्तन निदेशालय अर्थात ईडी के दुरपयोग के आरोप केंद्र सरकार पर कुछ ज्यादा ही लगने लगे हैं ऐसे में सत्य पाल मलिक की छवि कुछ इस तरह की है कि सीबीआई द्वारा उन्हें भ्रष्टाचार के एक मामले में बुलाने की खबर की प्रतिक्रिया नरेंद्र मोदी के लिए सकारात्मक नहीं की जा सकती. आज देश के आम आवाम के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता और नेता भी यह सोचने लगे हैं कि देश में यह कैसी उल्टी गंगा बहा रही है और नरेंद्र दामोदरदास मोदी पर उंगलियां उठने लगी है. आज हम पाठकों के लिए सत्यपाल मलिक के बरक्स कुछ ऐसी जानकारियां लेकर आए हैं जिन्हें पढ़ समझकर आप स्वयं निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि आखिर देश में क्या चल रहा है.

दरअसल, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने जम्मू- कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक को केंद्र शासित प्रदेश में हुए कथित बीमा घोटाले के सिलसिले में कुछ सवालों के जवाब मांगे हैं.सात महीने में यह दूसरी दफा है, जब सत्यपाल मलिक से सीबीआई पूछताछ करेगी. बिहार, जम्मू-कश्मीर, गोवा और मेघालय के राज्यपाल के रूप में जिम्मेदारियां समाप्त होने के बाद पिछले साल अक्तूबर में मलिक से पूछताछ की गई थी . सीबीआइ की ताजा कार्रवाई ‘द वायर’ को मलिक द्वारा दिए गए साक्षात्कार के महज एक सप्ताह बाद केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो का नोटिस मिल गया है.

दूसरी तरफ जैसा कि सत्यपाल मलिक का स्वभाव है उन्होंने  कहा है कि मैंने सच सच बोल दिया है, हो सकता है, इसलिए मुझे बुलाया गया हो. मैं तो किसान का बेटा हूं, मैं घबराऊंगा नहीं, सीबीआइ ने सरकारी कर्मचारियों के लिए  सामूहिक चिकित्सा बीमा योजना के ठेके देने और जम्मू-कश्मीर में कीरू जलविद्युत परियोजन से जुड़े 2,200 करोड़ रुपए के निर्माण कार्य भ्रष्टाचार के सत्यपाल मलिक के आरोपों के संबंध में प्राथमिकी दर्ज की थीं. इधर  सत्यपाल मलिक ने दावा किया कि उन्हें 23 अगस्त, 2018 से 30 अक्तूबर 2019 के बीच जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल ने रूप में कार्यकाल के दौरान दो फाइलों को मंजू देने के लिए 300 करोड़ रुपए की रिश्वत की पेशकश की गई थी. पाठकों को बता दें कि दूसरी प्राथमिकी की जलविद्युत परियोजना के सिविल कामकाज ठेके देने में कथित अनियमितताओं से जुड़ी है. सत्यपाल मलिक ने हाल ही में एक विवादास्पद साक्षात्कार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत केंद्र सरकार पर निशाना साधा था और विशेष रूप से जम्मू कश्मीर में शासन चलाने के तरीके को लेकर उसकी आलोचना की थी.

मलिक के कथन से  उल्टा संदेश               

सीबीआइ के पूछताछ के लिए बुलाने संबंधी घटनाक्रम पर कभी मोदी के खास खास रहे सत्यपाल मलिक ने कहा कि सीबीआइ ने ‘कुछ स्पष्टीकरण’ के लिए अपने अकबर रोड स्थित गेस्ट हाउस में उपस्थित होने को कहा है.  सत्यपाल मलिक ने कहा है कि मैं राजस्थान जा रहा हूं, इसलिए मैंने उन्हें 27 से 29 अप्रैल की तारीख दी है.’ उन्होंने ट्वीट किया कि वह सच के साथ खड़े हैं. मलिक ने ‘हैशटैग सीबीआइ के साथ ट्वीट किया, ‘मैंने सच बोलकर कुछ लोगों के पाप उजागर किए हैं. कुल मिलाकर के जहां एक तरफ दिल्ली में शासन कर रही आप पार्टी के अरविंद केजरीवाल सहित उसके कई नेताओं पर सीबीआई और ईडी की गाज को हमने देखा है दूसरी तरफ बिहार में लालू परिवार भी सीबीआई और ईडी से घिरा हुआ है. छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार के कई चेहरे इनकी जद में है. यह कहा जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से हटकर अन्य सभी पार्टियों के ऊपर एक तरह से सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय ने दबिश दे रही है. इन सबके बीच सत्यपाल मलिक एक ऐसा चेहरा है जो अपने कार्य शैली के कारण देशभर में जाने जाते हैं उन्होंने अपनी बेबाक टिप्पणियों से लोकतंत्र को सींचने का काम किया है, ऐसी शख्सियत पर सीबीआई का फंदा सुर्खियां बटोर रहा है. देखना यह होगा कि आगे चलकर सत्यपाल मलिक खामोश हो जाते हैं या फिर और भी ज्यादा बेबाकी से अपनी बात को देश के सामने रखते हैं.

नरेंद्र दामोदरदास मोदी और आवाम की खुशियां

अब जब आम चुनाव में तकरीबन एक वर्ष बचा रह गया है प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की केंद्र की सरकार की अगर हम भारत के आम लोगों की खुशियों के तारतम्य में विवेचना करें तो पाते हैं कि आम आदमी का जीवन पहले से ज्यादा दुश्वार  हो गया है. उसके चेहरे की खुशियां विलुप्त होती जा रही हैं. नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद सर्वप्रथम संसद के चौबारे पर मस्तक झुका करके देश की संसद के प्रति आस्था व्यक्त की थी इसका मतलब यह था कि देश की आवाम की खुशियों के लिए वह सतत प्रयास करेंगे और इसलिए श्रद्धानवत हैं. मगर इन 9 वर्षों में देश की आवाम और खास तौर पर आम आदमी के चेहरे की खुशियां विलुप्त होती चली गई है. आग्रह है कि आप जहां कहीं भी रहते हों, आप चौराहे पर निकलिए लोगों से मिलिए लोगों को देखिए आपको इस बात की सच्चाई की तस्दीक हो जाएगी.

अगर हम आज संयुक्त राष्ट्र वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट का अवलोकन करें तो पाते हैं कि 2023 की रिपोर्ट में भारत देश दुनिया के देशों में 125 में नंबर पर है जो यह बताता है कि देश का आम आदमी खुशियों से कितना  महरूम है. अगर देश का आम आदमी खुश नहीं है तो इसका मतलब यह है कि देश की सरकार अपने दायित्व को नहीं निभा पा रही है. अरबों खरबों  की अर्जित टेक्स और विकास की बड़ी बड़ी बातें करने के बाद अगर आम आदमी को खुशियां नहीं है तो फिर देश की केंद्र सरकार पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वाभाविक हो जाता है.

 खुशियां ढूंढता आम आदमी   

दरअसल,  संयुक्त राष्ट्र वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2023 में फिनलैंड ने लगातार छठी बार दुनिया का सबसे खुशहाल देश का दर्जा हासिल कर लिया किया है. यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र सतत विकास समाधान नेटवर्क ने  जारी की है. व‌र्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2023 में 137 देशों को आय, स्वास्थ्य और जीवन के प्रमुख निर्णय लेने की स्वतंत्रता की भावना सहित कई मानदंडों के आधार पर रैंक किया गया है. 137 देशों की लिस्ट में भारत को 125वें स्थान पर रखा गया है.

2022 में भारत की रैंक 136 लें नंबर पर थी. दूसरी तरफ भारत अभी भी अपने पड़ोसी देशों जैसे नेपाल, चीन, बांग्लादेश आदि से नीचे है दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती तकलीफों और दिक्कतों के बीच भारत की स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती देश को आजादी दिलाने वाले वीर शहीदों ने शायद यह कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि आजादी के बाद भी देश का आम आदमी एक स्वतंत्र मनुष्य के रूप में एक अच्छे जीवन से महरूम रहेगा. आम आदमी के लिए मुश्किलें बढ़ती चली जा रही हैं सत्ता में बैठे हुए लोग की सुविधाएं बढ़ती चली जा रही हैं यह जबले कहां जा रहा है छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित अखबारों में सुर्खियां है कि विधानसभा में विधेयक पारित कर के पूर्व विधायकों की पेंशन को 35000 से बढ़ाकर के 58000 रूपए  लगभग कर दिया गया है. देश की चाहे कोई भी विधायिका और संसद हो आम लोगों के खुशियों को बढ़ाने का काम नहीं बल्कि बड़े लोगों की सुविधाओं के लिए अब काम करने लगी है यही कारण है कि आम आदमी का जीवन मुश्किल तो मुश्किल चुनौतियों से घिरा हुआ है जिसका अक्स वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में भी दिखाई दे रहा है.

 हजारों करोड़ों रुपए का घोटाला

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बीके शुक्ला के मुताबिक देश में आज आम आदमी आर्थिक स्थिति दयनीय हो चली है, देश के बड़े आदमी , उद्योगपति जिस तरह सत्ता के संरक्षण में हजारों करोड़ों रुपए का घोटाला कर रहे हैं उसका भुगतान ही आम आदमी कर रहा है.

दरअसल, वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स को तैयार करने में संयुक्त राष्ट छह प्रमुख कारकों का उपयोग करता है. इसमें  स्वस्थ जीवन की अनुमानित उम्र, सामाजिक सहयोग, स्वतंत्रता, विश्वास और उदारता शामिल हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि हैप्पीनेस इंडेक्स तैयार करने में औसत जीवन मूल्यांकन के लिए की फैक्टर माना गया है. इसमें फोविड-19 के तीन वर्ष (2020-2022) का औसत भी शामिल है. इस साल रिपोर्ट तैयार करने में इस बात का खास ध्यान रखा गया है कि कोविड- 19 ने जन कल्याण को कैसे प्रभावित किया है. लोगों के बीच परोपकार बड़ा है या घटा है लोगों के बीच विश्वास, परोपकार और सामाजिक संबंधों को भी प्रमुख पैमानों के तौर पर इस्तेमाल किया गया है.

उल्लेखनीय है कि एक साल ज्यादा समय से जंग लड़ रहा यूक्रेन और गंभीर आर्थिक संकट में फंसा पाकिस्तान रिपोर्ट के मुताबिक भारत से ज्यादा खुशहाल हैं. गैलप लुंड पोल जैसे स्रोतों के आंकड़ों के आधार पर बनी रिपोर्ट में नॉर्डिक देशों को शीर्ष स्थानों में सूचीबद्ध किया गया है. रिपोर्ट में फिनलैंड को लगातार छठी बार दुनिया का सबसे खुशहाल देश माना गया है. कुल मिलाकर के देश की आवाम को और सरकारों को मिलजुल कर के सकारात्मक दिशा में काम करना चाहिए.

नरेंद्र दामोदरदास मोदी सदैव सत्ता में रहने के मुगालते में क्यों हैं

लोकतंत्र हो अथवा       राजतंत्र कभी भी कोई स्थाई नहीं रहता, मगर भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी शायद यह समझते हैं कि वह सदैव सत्ता में रहेंगे यह मुगालता दोनों के लिए है भारी पड़ेगा . भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से जद्दोजहद करने के बाद अब अपने चरमोत्कर्ष पर है. उन्होंने जो मुद्दे देश के सामने रखे थे चाहे वह राम मंदिर हो या धारा 370 का अथवा हिंदुत्व का यह सब देश ने देखा है.इसी बिनाह पर भारतीय जनता पार्टी अब यह मानने लगी है कि साम दाम दंड भेद करके वह सदैव सत्ता में रहेगी और चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े नरेंद्र मोदी अमित शाह और आने वाले भारतीय जनता पार्टी के हाथ और दिमाग यह करते रहेंगे मगर यह भ्रम से ज्यादा कुछ भी नहीं है क्योंकि सत्ता कभी किसी की मुट्ठी में कैद नहीं हो सकती. लोकतंत्र का मतलब है 5 वर्ष का चुनाव और परिणाम कभी दाएं तो कभी बांएं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने विदेश में कहा है -भाजपा को यह मानना अच्छा लगता है कि भारत में हमेशा वही सत्ता में रहेगी, लेकिन ऐसा है नहीं. ब्रिटेन यात्रा पर पहुंचे राहुल गांधी ने  चैथम हाउस थिंक टैंक में एक संवाद सत्र के दौरान दावा किया कि उनके फोन में इजराइल के साफ्टवेयर पेगासस को डाला गया  क्योंकि उन्होंने सत्तारूढ़ भाजपा पर भारत में असंतोष की आवाज दबाने की कोशिश करने का आरोप लगाया था.

राहुल गांधी ने कहा -” अगर आप आजादी से लेकर आज तक के समय को देखेंगे तो कांग्रेस अधिकतर समय सत्ता में रही.” राहुल गांधी ने कहा -” भाजपा के 10 साल तक सत्ता में रहने से पहले हम 10 साल तक सत्ता में थे. भाजपा को यह मानना अच्छा लगता है कि वह भारत में सत्ता में आई हैं और हमेशा वही सत्ता में बनी रहेगी, हालांकि ऐसा नहीं है. हम ग्रामीण क्षेत्र पर काफी ध्यान केंद्रित कर रहे थे और शुरुआत में हम शहरी क्षेत्रों को लेकर चूक गए. यह एक तथ्य है, लेकिन यह कहना वास्तव में हास्यास्पद है कि भाजपा सत्ता में है और कांग्रेस का समय खत्म हो गया है.” चैथम हाउस संवाद के दौरान गांधी ने कहा – कांग्रेस के अलावा, विदेशी मीडिया भी इस बात को उजागर कर रहा है कि भारतीय लोकतंत्र के साथ गंभीर समस्या है. उन्होंने कहा – भाजपा इस तरह जवाब देती है, उसे चर्चा में कोई दिलचस्पी नहीं है.

 

राहुल गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को एक कट्टरपंथी, फासीवादी संगठन बताया और कहा- उसने देश के संस्थानों पर कब्जा करके भारत में लोकतांत्रिक चुनाव की प्रकृति को बदल दिया है. विदेशी दर्शकों के लिए इसे स्पष्ट रूप से समझाने को मुश्किल हो जाएगी. राहुल गांधी ने कहा  आप इसे एक सीक्रेट सोसाइटी कह सकते हैं. यह मुस्लिम ब्रदरहुड की तर्ज पर बनाया गया है और इसका मकसद है कि सत्ता में आने के लिए लोकतांत्रिक चुनाव का इस्तेमाल किया जाए और फिर बाद में लोकतांत्रिक चुनाव को खत्म कर दिया जाए.  विदेश नीति पर राहुल गांधी ने रूस- यूक्रेन संघर्ष  पर 2,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर कब्जा करने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा  लेकिन हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि वह (चीन) वहां नहीं हैं. भारत-पाकिस्तान संबंध पर उन्होंने कहा – उनका मानना है कि पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध हो यह महत्त्वपूर्ण है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा- यह पाकिस्तानियों की कार्रवाई पर निर्भर कर है. उन्होंने कहा – अगर पाकिस्तान, भारत आतंकवाद को बढ़ावा देता है, तो काफी मुश्किल हो जाएगी.

दरअसल,राहुल गांधी की एक-एक बात आज पूरा भारत देश और दुनिया सुन रही है और उनकी बातें गूंज रही है. यह सबसे ज्यादा तकलीफ भारतीय जनता पार्टी को दे रही हैं. सत्ता में बैठे नेताओं को दे रही है. उन्हें चुभ रही है क्योंकि राहुल गांधी की बातों में सत्यता है. नीर क्षीर विवेक से देखा जाए तो भारतीय लोकतंत्र को क्षति इन 8 वर्षों में हुई है वह उल्लेखनीय है. आज चुनाव आयोग हो या फिर देश का उच्चतम न्यायालय, कार्यपालिका हो या फिर अन्य कोई संवैधानिक संस्था सब पर भारतीय जनता पार्टी सत्ता के माध्यम से अंकुश लगाने का काम कर रही है जो सीधे-सीधे लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत है

क्या नरेंद्र मोदी -“पानीदार नहीं रहे”

जिस रास्ते पर आज भारतीय जनता पार्टी के नेता चल रहे हैं अगर अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी यही करती तो आज देश में भारतीय जनता पार्टी तो क्या अन्य दूसरी पार्टियां के कोई नामलेवा भी नहीं होते और उनकी राजनीति के गर्भ में ही भ्रूण हत्या हो जाती.

मगर कांग्रेस के नेताओं ने चाहे पंडित जवाहरलाल नेहरु हों अथवा श्रीमती इंदिरा गांधी अथवा अन्य ने लोकतंत्र पर सदैव विश्वास आस्था रखी और विपक्ष की विचारधारा को सदैव सम्मान दिया. गोवा में जिस तरह 8 विधायकों बदल बदल हुआ है और घटनाक्रम सामने आया है उससे एक सबसे बड़ा प्रश्न आज यह उठ खड़ा हुआ है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी क्या अब पानीदार नहीं रहे हैं.

दरअसल, सत्ता और विपक्ष लोकतंत्र के दो ऐसे पहिए हैं जिनके बूते देश आगे बढ़ता है अगर सत्ताधारी यह समझ ले और ठान लें कि विपक्ष को निर्मूल करना है तो यह संभव है. मगर इससे जिस तानाशाही का जन्म होगा वह न तो देश के हित में हैं और ना ही देश के लोकतंत्र के हित में. गोवा में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के 8 विधायकों का जिस तरह इस्तीफा दिलवा भाजपा प्रवेश करवाया गया है राजनीति के इतिहास में शर्मनाक घटना के रूप में याद किया जाएगा.

सवाल है, आज देश में जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार है तो देश किस दिशा में अग्रसर होगा एक तरफ है लोकतंत्र तो दूसरी तरफ है नाजी हिटलर शाही शासन .भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है हमें गर्व करते हैं कि भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है जहां सभी संविधानिक दायित्व के तहत देश के चारों स्तंभ अपने अपने कर्तव्य निर्वहन करते हैं. मगर आज स्थिति जैसी बनाई जा रही है उसे लोकतंत्र के लिए हितकारी कभी नहीं कहा जा सकता.

दरअसल, दलबदल एक ऐसा मसला है जिस पर किसी का कोई अंकुश नहीं है गोवा के मामले में यह आज सामने है. वहां सभी विधायकों को ईश्वर के नाम पर शपथ दिलाई गई थी और सभी ने यह कसम खाई थी कि हम दल बदल नहीं करेंगे मगर बड़े ही हास्यास्पद स्थिति में जिसे देश में देखा है गोवा में विपक्ष को खत्म करने का खेल हो गया.

गोवा और भारत जोड़ो यात्रा

भारत जोड़ो यात्रा के साथ राहुल गांधी ने जिस तरह देश को संदेश दिया है उससे कांग्रेस की स्थिति मजबूत बनने लगी है माना जा रहा है, शायद इसी से घबरा करके भाजपा ने गोवा में यह खेल किया  है.

कांग्रेसी नेता पवन खेड़ा में बड़ी गहरी बात कही है – “सुनाई है भारत जोड़ो यात्रा से बौखलाई भाजपा ने गोवा में “ऑपरेशन कीचड़” आयोजित किया है. सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो… जो भारत जोड़ने के इस कठिन सफ़र में साथ नहीं दे पा रहे, वो भाजपा की धमकियों से डर कर तोड़ने वालों के पास जाएं तो यह भी समझ लें कि भारत देख रहा है.’”

सचमुच आज देश में जिस तरह की गंदली राजनीति प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी कि भारतीय जनता पार्टी उनके संरक्षण में कर रही है यह सब कभी भुलाया नहीं जा सकेगा और आने वाला समय प्रत्युत्तर तो मांगेगा ही.

ईश्वर के नाम पर शपथ लेकर के विधायकों ने संकल्प लिया था कि हम दल बदल नहीं करेंगे अब जब यह खेल हो गया है तब गोवा मे सत्तारूढ़ भाजपा के पास होंगे 40 में से 33 विधायक हो गए हैं .

मार्च2022  में सरकार बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी के साथ कांग्रेस के विधायक दल के विलय के साथ, तटीय राज्य में सत्तारूढ़ दल के पास 40 में से 33 विधायक हो गए हैं इनमें से 20 विधायक बीजेपी के टिकट पर जीते हुए हैं, 2 विधायक महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी से और तीन निर्दलीय जिन्होंने बीजेपी को समर्थन दिया. इसके पहले माइकल लोबो और कामत पर जुलाई में पहली बार जब वो दलबदल करना चाह रहे थे तब कांग्रेस पार्टी ने उनका ये प्रयास विफल कर दिया था.

अब  कांग्रेस के साथ रहने वाले तीन विधायक अल्टोन डी’कोस्टा, यूरी अलेमाओ और कार्लोस फरेरा हैं. कांग्रेस विधायकों ने फरवरी विधानसभा चुनाव से पहले एक मंदिर और एक चर्च सहित विभिन्न पूजा स्थलों पर दलबदल को लेकर शपथ ली थी. इस संबंध में उन्होंने एक शपथ पत्र पर भी हस्ताक्षर किए थे.

गोवा फॉरवर्ड पार्टी के अध्यक्ष विजय सरदेसाई ने  जो कहा है वह सारे देश की आवाज है- “कांग्रेस के जिन आठ विधायकों ने सभी राजनीतिक औचित्य, बुनियादी शालीनता और ईमानदारी के खिलाफ, धन के अपने लालच और सत्ता की भूख को आगे बढ़ाने का फैसला किया है, वे आज अपने बेशर्म स्वार्थ, लोभ और कपट का प्रदर्शन करते हुए,सर्वशक्तिमान ईश्वर की अवहेलना करते हुए बुराई के प्रतीक के रूप में खड़े हैं.”

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