Bihar : प्रशांत किशोर की जीत

Bihar. जन सुराज पार्टी के अध्यक्ष प्रशांत किशोर ने पटना के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में शानदार जीत हासिल की. उन्हें 64,151 वोट मिले थे, जबकि भाजपा के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को 44,827 और राजद की उम्मीदवार रेखा गुप्ता को 14,273 वोट मिले थे. इस तरह 19,234 वोटों के अंतर से प्रशांत किशोर जीत गए.

सीनियर पत्रकार पुष्यमित्र के मुताबिक, ‘‘महज 8-9 महीने पहले बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को 98,151 वोट मिले थे और राजद की उम्मीदवार रेखा गुप्ता को 46,308 वोट. तब जन सुराज के उम्मीदवार केसी सिंह को सिर्फ 7,690 वोट आए थे. मगर अब माहौल बदल चुका है.

पिछले चुनाव से मुकाबला करें तो भाजपा ने इस चुनाव में लगभग 54,000 वोट गंवाए और राजद ने 30,000 यानी भाजपा का नुकसान बड़ा है. बड़ी संख्या में भाजपा समर्थक जन सुराज की तरफ शिफ्ट हुए हैं. यही भाजपा के लिए खतरे की घंटी है.’’

सच तो यह है कि दिल्ली के जंतरमंतर से ले कर बांकीपुर तक जो जेनजी आंदोलन हुआ है, वह भाजपा के लिए खतरे की घंटी ही है. अब तक भाजपा का विरोध दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक किया करते थे. मगर अब उन का विरोध सवर्ण और शहरी मध्यमवर्गीय लोग कर रहे हैं, जो उन के कोर वोटर हैं.

पुष्यमित्र के मुताबिक, ‘‘अंधभक्ति से बिदकने के कई कारण गिने जा सकते हैं. सब से बड़ी बात बिहार में देखें तो सब से बड़ी वजह सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाना है, जिस से एक बड़ा वर्ग नाराज है.

‘‘पार्टी का पहला मुख्यमंत्री उन्हें ऐसा नहीं चाहिए था, जिस पर अपराध के दाग हों. जिस की बातचीत में वह दबंगई हो और जिसे राजद के दौर में उन्होंने भोगा है. उन्हें बारबार पार्टी विद डिफरैंस की घुट्टी पिलाई गई थी.

‘‘दूसरी वजह, जमीनी कार्यकर्ताओं के नाम पर डमी लोगों को आगे बढ़ाना और नीरज कुमार सिन्हा जैसे उम्मीदवार को थोपना. इसे बांकीपुर की जनता अपना अपमान सम झ रही थी.

‘‘कायस्थ भाजपा के साथ बताए जाते हैं, मगर कायस्थों में भी इस फैसले को ले कर कम गुस्सा नहीं था. नीट आंदोलन का मसला तो सब पर हावी था ही. मध्यम वर्ग को लगने लगा था कि सरकार उन के बच्चों की पढ़ाई और कैरियर को ले कर गंभीर नहीं है.

‘‘इस में आप यूजीसी के मसले को जोड़ दें, भरत तिवारी प्रकरण को जोड़ दें, नीट छात्रा की संदिग्ध हत्या के मामले को जोड़ दें, राम मंदिर चंदा चोरी को जोड़ दें. ये तमाम ऐसे मामले हैं, जिन के कारण भाजपा का कोर वोटर ठगा महसूस कर रहा है. उस के अंदर गुस्सा है.’’

जाहिर सी बात है कि इस गुस्से को इस बार प्रशांत किशोर ने बखूबी भुनाया और वे आगे भी भुनाएंगे. अगर ऐसा ही माहौल बना रहा तो जल्द ही प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज बिहार की राजनीति में खाली हो रहे जद (यू) और राजद के स्पेस को भरने में जुट जाएगी.

कांग्रेस ऐसी पार्टी है, जिस का सब से आसानी से जन सुराज से सम झौता हो सकता है. अगर प्रशांत किशोर कुछ बुनियादी वैचारिक मसले पर साथ देने को तैयार हों तो वामदल भी उन के साथ आ सकते हैं.

मगर ध्यान से देखें तो यह जीत इतनी आसान नहीं थी. जहां भाजपा और जद (यू) के सैकड़ों विधायकों के अलावा अनेक केंद्रीय मंत्री और बड़े नेता इस उपचुनाव के पीछे लगे हों, इस जीत को अप्रत्याशित तो नहीं कहा जा सकता.

बांकीपुर भाजपा का सब से सुरक्षित और पारंपरिक गढ़ के रूप में मशहूर रहा है. लेकिन जब प्रशांत किशोर ने इस क्षेत्र से परचा भरा, तो यहां की लड़ाई दिलचस्प बन गई. भाजपा ने इसे इज्जत का सवाल बना कर अपनी सारी ताकत यहां  झोंक दी. आखिर वह ऐसा करने को मजबूर थे. नीतिन नवीन और सम्राट चौधरी की इज्जत भी दांव पर थी, क्योंकि उन के कार्यकाल में एक विधानसभा सीट का उपचुनाव हो रहा था.

सवाल यह है कि पटना जिले के बांकीपुर विधान सभा उपचुनाव में प्रशांत किशोर जीत गए, तो हारा कौन? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी या नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव?

भाजपा के अहं के चलते उस ने हार का स्वाद चखा. सत्ता पक्ष को सम झना होगा कि अब भारतीय मतदाताओं में जागरूकता बढ़ी है. अब पहले की तरह परिवार तंत्र चल नहीं सकता. मतदाता नेताओं को कसौटी पर कसने लगे हैं.

बिहार में भी परिवारतंत्र को ठेस लगी है और अनेक नेता सत्ता से बेदखल हुए हैं. ऐसे में इस फार्मूले को बहुत भरोसे का नहीं माना जा सकता. अब अंधभक्ति वाले दिन गुजरे दिनों की बात होने लगी है. ठीक है कि जनता नेतापुत्रों का सम्मान करती है, मगर वह उसे राजा या सर्वेसर्वा मानने को तैयार नहीं. वह काम भी देख रही होती है. अब मतदाताओं को उम्मीदवारों की नीयत भांपते देर नहीं लगती है, जिस से नेतापुत्रों की नियति भी बदल जाती है.

सीनियर पत्रकार अनूप नारायण सिंह कहते हैं, ‘‘जिन को लगता था कि किसी को भी मैदान में उतार देंगे तो चुनाव जीत जाएंगे, यह भ्रम टूटा है. भाई लोकतंत्र है, यह बात सम िझए. जनता किसी की नहीं है. जो आप को कुरसी पर बैठ सकता है, वह आप को कुरसी से उतार भी सकता है. शुरुआत बांकीपुर से हुई है. खत्म कहां से होगा, यह नहीं कहा जा सकता.’’

प्रशांत किशोर की यह जीत न सिर्फ भाजपा के लिए, बल्कि राजद के लिए भी खतरे की घंटी है. विपक्ष की भूमिका में अब प्रशांत किशोर तेजस्वी यादव से कहीं ज्यादा तेजतर्रार साबित होंगे. जीत का सेहरा जनता ने उन के सिर पर इसी उम्मीद के साथ रखा है. अब देखना यही है कि प्रशांत किशोर इसे कितना संभाल पाते हैं. Bihar

Bihar Politics: वोटों के लिए मंदिरमंदिर जाते प्रशांत किशोर

Bihar Politics: बिहार में अब एक नए देवता का आगमन हुआ है. नेताओं को चुनाव लड़ने की सलाह देने वाले प्रशांत किशोर ने अपनी एक अलग पार्टी बना ली है जन सुराज पार्टी और वे गांवगांव घूम रहे हैं. उन का कहना है कि वे वोट नहीं मांग रहे, बल्कि वे तो यह बता रहे हैं कि गरीबी से कैसे निकला जाए. उन का कहना है कि बिहार ने पहले 40 साल कांग्रेस को जिताया, फिर लालू प्रसाद यादव को महाराजा मान कर बैठाया और अब नीतीश कुमार अलटीपलटी मार कर बिहार पर राज कर रहे हैं पर बिहार सुधरा नहीं है.

अब वे कहते हैं कि आप बिहारी उन के कहे मुताबिक वोट देंगे तो बिहार में पढ़ाई व नौकरियां टपकना शुरू हो जाएंगी. इसी तरह के वादे पहले वे पार्टियों को बरगलाने के लिए कर चुके हैं कि उन के कहे मुताबिक चुनाव लड़ा गया तो जीत पक्की ही है.

प्रशांत किशोर ब्राह्मण हैं और वे यह नहीं कहेंगे, भूल कर भी, कि बिहार की गरीबी की वजह पोंगापंथी, पाखंडबाजों का राज रहा है जो जाति के नाम पर मंदिरों को अमीर करते रहे हैं. बिहार में अयोध्या और तिरुपति जैसे विशाल मंदिर नहीं हैं पर वहां जितना पैसा लोग पूजापाठ पर करते हैं और कहीं नहीं करते क्योंकि वहां के जमींदारों ने जम कर धर्म बेचा है.

लालू प्रसाद यादव ने निचली जातियों की बात की पर उन्हें कभी पूजापाठ के जंजाल से नहीं निकाला. वे खुद तिरुमला मंदिर में पत्नी के साथ गए थे. देवघर में बैजनाथ मंदिर में मई, 2025 को भोलेनाथ की पूजा करने पहुंचे थे. वहां उन्होंने यह भी कहा कि बाबा का आशीर्वाद पाने के बाद उन्हें जनता का आशीर्वाद चुनाव में मिलेगा. 22 मई को एकमा के बिशनपुर कला गांव में उन्होंने गोपेश्वर बाबा के मंदिर की देहरी पर सिर झुकाया और कहा कि अब बिहार की जनता जाग चुकी है.

इस से पहले सितंबर, 2024 में उन्होंने पूर्णिया में पूरणदेवी को पूजाअर्चना की और बिहार के लिए आशीर्वाद मांगा जिस का कोरा मतलब है कि वे अपनी चुनावी जीत चाहते थे.

प्रशांत किशोर हों या दूसरे नेता जब तक धर्म से चिपके रहेंगे, सत्ता में चाहे आ जाएं, बिहार का उद्धार नहीं कर सकेंगे. बिहार की कमजोरी की वजह अधपढ़ों की बढ़ती गिनती है जो सर्टिफिकेट या डिगरी तो ले लेते हैं पर हर काम पूरा करने के लिए भरोसा पूजापाठ पर करते हैं. कोई भी नेता उन्हें इस दलदल से निकालने की कोशिश तक नहीं करता. जरूरत से ज्यादा समझदार प्रशांत किशोर भी उसी गिनती में आ गए हैं.

प्रशांत किशोर नहीं अपने कामों पर भरोसा करे कांग्रेस

भाजपाई नेता और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बचपन में चाय बेची थी या नहीं, इस का कोई सुबूत किसी ने नहीं देखा. इस के बाद भी देश के सामने उन्होंने खुद को चाय बेचने वाला साबित कर दिया.

इस के उलट विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने अपने राज में देश और समाज के सुधार के लिए कई बड़े काम किए थे, पर न जाने क्यों अब वह उस का बखान जनता के सामने करने में नाकाम हो रही है.

भले ही कांग्रेस ने अभी हुए चिंतन शिविर में खुद को जनता के सामने अच्छे से रखने की बात कही है, पर सच तो यह है कि उस के सुविधाभोगी नेता कलफदार कुरतापाजामा पहन कर एयरकंडीशनर कमरों से बाहर निकलने को तैयार नहीं हैं.

देश में ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ की राजनीति भी नई नहीं है. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपनेअपने दौर में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने का काम किया था. इस के बाद भी कांग्रेस सत्ता में वापस आई. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में देश की जनता कांग्रेस को तब अहमियत देगी, जब कांग्रेस खुद को सत्ता का दावेदार साबित करने में कामयाब होगी.

पर आज की तारीख में तो ऐसा लगता है कि कांग्रेस सत्ता की रेस से दूर क्या हुई पार्टी का खुद पर से पूरी तरह से भरोसा उठ गया है. पर राजनीति में कब क्या होगा, यह बता पाना आसान नहीं है.

साल 1984 में राजीव गांधी इतिहास में सब से बड़ा बहुमत हसिल कर के देश के प्रधानमंत्री बने थे. 5 साल के बाद ही जनता ने उन पर भरोसा बरकरार नहीं रखा और वे सत्ता से बाहर हो गए थे.

साल 2004 में भाजपा की अगुआई वाली अटल सरकार को यह गुमान हो गया था कि उन के कार्यकाल में इंडिया शाइन कर रहा है, लिहाजा समय से 6 महीने पहले अटल सरकार ने लोकसभा चुनाव कराने का फैसला ले लिया था. पर चुनाव के नतीजे एक बार फिर उम्मीद के खिलाफ गए थे. अटल सरकार चुनाव हार गई. जिस कांग्रेस को खत्म मान लिया गया था, वह न केवल सत्ता में आई, बल्कि उस ने पूरे 10 साल सरकार चलाई.

साल 2014 में कांग्रेस लोकसभा चुनाव हारी. इस के बाद कई प्रदेशों में भी उसे चुनावी हार का सामना करना पड़ा. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा. इस हार के बाद एक बार फिर से कांग्रेस को खत्म माना जा रहा है. कांग्रेस के तमाम नेता पार्टी छोड़ कर दूसरे दलों में जा रहे हैं. ‘जी-23’ नाम से कांग्रेस में एक अंसतुष्ट खेमा बन गया है.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस को केवल 2 सीटें मिलीं, तो पार्टी का मनोबल टूट गया. अब उसे लगने लगा कि पार्टी का समय चला गया है. इस के बाद भी देश की जनता कांग्रेस को ही सब से प्रमुख विपक्षी दल मान रही है.

कांग्रेस को चुनावी लड़ाई में वापस लाने के लिए तरहतरह के उपाय सोचे जाने लगे हैं. इस में यह योजना भी बनी कि राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर की मदद ली जाए. कई बार ऐसी खबरें सुनाई पड़ीं कि प्रशांत किशोर जिन शर्तों के साथ कांग्रेस में आना चाहते हैं या कांग्रेस के साथ काम करना चाहते हैं, वह कांग्रेस हाईकमान को मंजूर नहीं है, इसलिए प्रशांत किशोर और कांग्रेस का गठजोड़ अधर में लटक गया.

प्रशांत किशोर नरेंद्र मोदी से ले कर ममता बनर्जी तक तमाम बड़े नेताओं के लिए काम कर चुके हैं. ऐसे में उन पर सहज भरोसा नहीं किया जा सकता. कांग्रेस के पुराने नेता मानते हैं कि देश की तरक्की में कांग्रेस द्वारा कराए गए कामों का अहम रोल रहा है. लिहाजा, कांग्रेस को प्रशांत किशोर के ऊपर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है. उसे अपने अच्छे कामों को ले कर जनता के बीच जाना चाहिए.

कांग्रेस की मजबूत बुनियाद

कांग्रेस का पूरा नाम ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ है. कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश राज में 28 दिसंबर, 1885 को हुई थी. इस के संस्थापकों में एओ ह्यूम (थियोसोफिकल सोसाइटी के प्रमुख सदस्य), दादाभाई नौरोजी और दिनशा वाचा शामिल थे.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 72 प्रतिनिधियों की उपस्थिति के साथ 28 दिसंबर, 1885 को बंबई (अब मुंबई) के गोकुल दास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में हुई थी. इस के संस्थापक महासचिव एओ ह्यूम थे, जिन्होंने कलकत्ता (अब कोलकाता) के व्योमेश चंद्र बनर्जी को अध्यक्ष नियुक्त किया था.

भारत को आजादी दिलाने वाले आंदोलन में कांग्रेस की भूमिका प्रमुख थी. इसी वजह से 1947 में आजादी के बाद कांग्रेस भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टी बन गई. आजादी से ले कर साल 2014 तक, 16 आम चुनावों में से कांग्रेस ने 6 आम चुनावों में पूरा बहुमत मिला है और 4 आम चुनावों में सत्तारूढ़ गठबंधन की अगुआई की है. इस तरह 49 सालों तक वह केंद्र सरकार का हिस्सा रही.

भारत में कांग्रेस के 7 प्रधानमंत्री रह चुके हैं. इन में 1947 से 1964 तक जवाहरलाल नेहरू, 1964 से 1966 तक लाल बहादुर शास्त्री, 1966 से 1977 और 1980 से 1984 तक  इंदिरा गांधी, 1984 से 1989 तक राजीव गांधी, 1991 से 1996 तक पीवी नरसिंह राव और 2004 से 2014 तक डाक्टर मनमोहन सिंह शामिल हैं.

साल 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस ने आजादी से अब तक का सब से खराब प्रदर्शन किया और 543 सदस्यीय लोकसभा सीटों में से केवल 44 सीटें ही जीत पाई. तब से ले कर अब तक कांग्रेस कई विवादों में घिरी हुई है. उस के भविष्य पर सवालिया निशान लग रहे हैं.

गांधी युग की शुरुआत

साल 1907 में कांग्रेस में 2 दल बन चुके थे, गरम दल और नरम दल. गरम दल का नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल, जिन्हें लालबालपाल भी कहा जाता है, कर रहे थे. वहीं नरम दल का नेतृत्व गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता और दादाभाई नौरोजी कर रहे थे. गरम दल पूरे स्वराज की मांग कर रहा था, पर नरम दल ब्रिटिश राज में स्वशासन चाहता था.

पहला विश्व युद्ध छिड़ने के बाद साल 1916 की लखनऊ बैठक में दोनों दल फिर एक हो गए थे और होम रूल आंदोलन की शुरुआत हुई थी, जिस के तहत ब्रिटिश राज में भारत के लिए अधिराजकीय पद (डोमेनियन स्टेटस) की मांग की गई थी. इस के बाद कांग्रेस एक जन आंदोलन के रूप में देश के सामने खड़ी होने लगी थी.

साल 1915 में मोहनदास करमचंद गांधी का भारत आगमन होता है. उन के आने के बाद कांग्रेस में बहुत बड़ा बदलाव आया. चंपारण और खेड़ा में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जनसमर्थन से अपनी पहली कामयाबी मिली.

साल 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद महात्मा गांधी कांग्रेस के महासचिव बने. तब कांग्रेस में राष्ट्रीय नेताओं की एक नई पीढ़ी का आगमन हुआ, जिस में सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, डाक्टर राजेंद्र प्रसाद, महादेव देसाई और सुभाष चंद्र बोस जैसे लोग शामिल थे.

महात्मा गांधी के नेतृत्व में प्रदेश कांग्रेस कमेटियों का निर्माण हुआ. कांग्रेस में सभी पदों के लिए चुनाव की शुरुआत हुई और कार्यवाहियों के लिए भारतीय भाषाओं का इस्तेमाल शुरू हुआ. कांग्रेस ने कई प्रांतों में सामाजिक समस्याओं को हटाने की कोशिश की, जिन में छुआछूत, परदा प्रथा और मद्यपान वगैरह शामिल थे.

राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने के लिए कांग्रेस को पैसों की कमी का सामना करना पड़ता था. महात्मा गांधी ने एक करोड़ रुपए से ज्यादा का पैसा जमा किया और इसे बाल गंगाधर तिलक के स्मरणार्थ ‘तिलक स्वराज कोष’ का नाम दिया. 4 आना का नाममात्र सदस्यता शुल्क भी शुरू किया गया था.

नया नहीं है कांग्रेस विरोध

राम मनोहर लोहिया लोगों को आगाह करते आ रहे थे कि देश की हालत सुधारने में कांग्रेस नाकाम रही है. कांग्रेस शासन नए समाज की रचना में सब से बड़ा रोड़ा है. उस का सत्ता में बने रहना देश के लिए हितकर नहीं है, इसलिए लोहिया ने ‘कांग्रेस हटाओ, देश बचाओ’ का नारा दिया.

साल 1967 के आम चुनाव में एक बड़ा बदलाव हुआ. देश के 9 राज्यों पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा (अब ओडिशा), मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में गैरकांग्रेसी सरकारें गठित हो गईं. इस को लोहिया की बड़ी जीत के रूप में देखा गया.

जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेंका. साल 1974 में जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया. इस आंदोलन को भारी जनसमर्थन मिला.

इस से निबटने के लिए इंदिरा गांधी ने देश में इमर्जेंसी लगा दी. विरोधी नेताओं को जेल में डाल दिया गया. इस का आम जनता में जम कर विरोध हुआ. जनता पार्टी की स्थापना हुई और साल 1977 में कांग्रेस पार्टी बुरी तरह से हारी. पुराने कांग्रेसी नेता मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी.

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स दलाली कांड को ले कर राजीव गांधी को सत्ता से हटा दिया. साल 1987 में यह बात सामने आई थी कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा हथियाने के लिए 80 लाख डौलर की दलाली चुकाई थी. उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और उस के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे. स्वीडन रेडियो ने सब से पहले 1987 में इस का खुलासा किया. इसे ही ‘बोफोर्स घोटाला’ नाम से जाना जाता है.

इस खुलासे के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाया, जिस के चलते कांग्रेस की हार हुई और विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने.

हालांकि कांग्रेस की सत्ता में फिर वापसी हुई. इस के बाद गांधी परिवार का कोई भी नेता देश का प्रधानमंत्री नहीं बन सका. एक बार पीवी नरसिंह राव और 2 बार डाक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले ही अन्ना आंदोलन के सहारे कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने का काम शुरू हुआ. भारतीय जनता पार्टी ने भी कांग्रेस मुक्त भारत का अपना अभियान शुरू किया. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सत्ता में कांग्रेस की वापसी मुश्किल हो गई. 2019 के लोकसभा चुनाव की हार के बाद अब 2024 की तैयारी चल रही है.

कांग्रेस विरोध का इतिहास नया नहीं है. पर हर बार कांगेस ने वापसी की है. कांग्रेस के इतिहास के मुकाबले राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर का राजनीतिक अनुभव और साख दोनों ही कम है. वे कई नेताओं के साथ काम कर चुके हैं. ऐसे में कांग्रेसीजन उन पर यकीन करने को तैयार नहीं हैं.

रणनीतिकार प्रशांत किशोर

जिस समय कांग्रेस अपने सब से अच्छे दौर में थी, उस समय प्रशांत किशोर  ने जन्म लिया था. वे रोहतास जिले के कोनार गांव के रहने वाले हैं. उन के पिता श्रीकांत पांडे एक डाक्टर थे, जो बक्सर में ट्रांसफर हो गए थे. वहां प्रशांत किशोर ने अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी की.

प्रशांत किशोर ने अपने कैरियर की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र संघ में काम कर के की थी. वहां वे स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे थे. इस के बाद प्रशांत किशोर ने भारतीय राजनीति में रणनीतिकार के रूप में अपनी सेवाएं देनी शुरू कीं.

उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए चुनावी रणनीतिकार के रूप में काम किया है. उन का पहला प्रमुख राजनीतिक अभियान 2011 में नरेंद्र मोदी की मदद करने का था.

2014 के आम चुनाव की तैयारी के लिए प्रशांत किशोर ने मीडिया और प्रचार कंपनी ‘सिटीजन्स फोर अकाउंटेबल गवर्नेंस’ को बनाया. प्रशांत किशोर 16 सितंबर, 2018 को जनता दल ‘यूनाइटेड’ में शामिल हो गए.

प्रशांत किशोर ने चुनावी प्रचार को ले कर जो अभियान चलाए, उन में नरेंद्र मोदी की ‘चाय पर चर्चा’, ‘3 डी रैली’, ‘रन फोर यूनिटी’, ‘मंथन’ और ‘सोशल मीडिया कार्यक्रम’ प्रमुख थे.

प्रशांत किशोर 2014 के आम चुनावों से पहले महीनों तक मोदी की टीम का सब से महत्त्वपूर्ण हिस्सा थे. 2016 में कांग्रेस द्वारा पंजाब के अमरिंदर सिंह के अभियान में मदद करने के लिए प्रशांत किशोर को पंजाब विधानसभा चुनाव 2017 के लिए नियुक्त किया गया था. लगातार 2 विधानसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस को पंजाब में चुनाव प्रचार में मदद मिली.

प्रशांत किशोर को मई, 2017 में वाईएस जगनमोहन रेड्डी के राजनीतिक सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया था. उन्होंने ‘समराला संवरवरम’, ‘अन्ना पिलुपु’ और ‘प्रजा संकल्प यात्रा’ जैसे अभियान शुरू किए, जिस से कई चुनावी अभियानों की शुरुआत हुई.

प्रशांत किशोर ने साल 2017 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए काम किया, पर कामयाबी नहीं मिली. एक दल से दूसरे दल के सफर में प्रशांत किशोर पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के साथ खड़े हुए. ममता बनर्जी की जीत का श्रेय प्रशांत किशोर को दिया गया.

इस के बाद से साल 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की भूमिका खास हो गई. पर उन के खाते में चुनावी कामयाबी और नाकामी दोनों रही हैं. ऐसे में यह सोचना कि अकेले प्रशांत किशोर के बल पर कांग्रेस खड़ी हो जाएगी, यह मुमकिन नहीं है.

कांग्रेस के फैसले

देश की माली और सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कांग्रेस की सरकारों ने कई महत्त्वपूर्ण काम किए हैं. इन में बैंक के राष्ट्रीयकरण का फैसला अहम था. साल 1969 में भारत में काम करने वाले 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया. 1980 में अन्य 6 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, जिस से राष्ट्रीयकृत बैंकों की कुल संख्या बढ़ कर 20 हो गई.

साल 1962 में चीन और साल 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्धों ने सरकारी खजाने पर बहुत ज्यादा दबाव डाला था. लगातार 2 साल तक सूखे के चलते खाद्यान्न की गंभीर कमी हो गई थी और राष्ट्रीय सुरक्षा (पीएल 480 कार्यक्रम) से भी समझौता किया गया. सार्वजनिक निवेश में कमी के कारण परिणामी तीनवर्षीय योजना अवकाश ने कुल मांग को प्रभावित किया.

1960-70 के दशक में भारत की आर्थिक वृद्धि मुश्किल से जनसंख्या वृद्धि को पीछे छोड़ पाई और औसत आय स्थिर हो गई. 1951 और 1968 के बीच वाणिज्यिक बैंकों द्वारा औद्योगिक क्षेत्र में ऋण वितरण का अंश तकरीबन दोगुना हो गया, जबकि कृषि को कुल ऋण का 2 फीसदी से भी कम प्राप्त हुआ. इस तथ्य के बावजूद कि 70 फीसदी से ज्यादा आबादी थी, उस पर निर्भर है.

बैंकों के राष्ट्रीयकरण से देश को मदद मिली. बैकों में नौकरियां मिलने लगीं, जिस से बेरोजगारी घटी और आरक्षण लागू होने के चलते कमजोर तबकों को भी सरकारी नौकरी का फायदा मिल सका.

जमींदारी उन्मूलन कानून

संविधान बनाते समय जिन अहम मुद्दों से लड़ना था, उन में भारत की सामंतीशाही व्यवस्था प्रमुख थी, जिस ने आजादी से पहले देश के सामाजिक तानेबाने को बुरी तरह चोट पहुंचाई थी. उस वक्त जमीन का मालिकाना हक कुछ ही लोगों के पास था, जबकि बाकी लोगों की जरूरतें भी पूरी नहीं हो पाती थीं. इस असमानता को खत्म करने के लिए सरकार कई भूमि सुधार कानून ले कर आई, जिस में से एक जमींदारी उन्मूलन कानून 1950 भी था.

प्रिवीपर्स कानून

भारत जब आजाद हो रहा था, तब यहां तकरीबन 570 के आसपास रियासतें थीं. इन सभी को भारत में विलय के बाद एक खास तरीके से प्रिवीपर्स की रकम इन के राजाओं के लिए तय की गई. इस का फार्मूला था, उस स्टेट से सरकार को मिलने वाले कुल राजस्व की तकरीबन साढ़े 8 फीसदी रकम उत्तराधिकारियों को दी जाए. सब से ज्यादा प्रिवीपर्स मैसूर के राजपरिवार को मिला, जो 26 लाख रुपए सालाना था. हैदराबाद के निजाम को 20 लाख रुपए मिले.

वैसे, प्रिवीपर्स की रेंज भी काफी दिलचस्प थी. काटोदिया के शासक को प्रिवीपर्स के रूप में महज 192 रुपए सालाना की रकम मिली. 555 शासकों में 398 के हिस्से 50,000 रुपए सालाना से कम की रकम आई. 1947 में भारत के खाते से 7 करोड़ रुपए प्रिसीपर्स के रूप में निकले. 1970 में यह रकम घट कर 4 करोड़ रुपए सालाना रह गई.

साल 1971 में इंदिरा ने प्रिवीपर्स रोकने का कानून बना दिया. इस कानून को लागू करने के पीछे सारे नागरिकों के लिए समान अधिकार और सरकारी धन के व्यर्थ व्यय का हवाला दिया. यह बिल 26वें संवैधानिक संशोधन के रूप में पास हो गया. इस के साथ ही राजभत्ता और राजकीय उपाधियों का भारत में हमेशा के लिए अंत हो गया.

हालांकि इस विधेयक के पास होने के बाद कई पूर्व राजवंश अदालतों की शरण में गए, लेकिन वहां उन की सारी याचिकाएं खारिज हो गईं. इसी के विरोध में कई राजाओं ने 1971 के चुनाव में खड़े होने और नई पार्टी बनाने का फैसला किया, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिल पाई. इस कानून के जरीए भारत में राजशाही का खात्मा हुआ.

रोजगार गारंटी कानून

कांग्रेस के ही कार्यकाल में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) 7 सितंबर, 2005 को लागू हुआ. इस योजना में हर वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराना सरकार का काम था. प्रतिदिन 220 रुपए की न्यूनतम मजदूरी मिलती थी. इस कानून ने गांव के लोगों की क्रयशक्ति को बढ़ाने का काम किया. इस का असर गांव वालों के रहनसहन पर देखने को मिला.

कांग्रेस के ही कार्यकाल में जमीन अधिग्रहण कानून बना, जिस के जरीए किसानों को बाजार मूल्य का 4 गुना पैसा मिलने लगा. बेटियों को अपने पिता की जायदाद में हक देने का काम भी कांग्रेस सरकार में हुआ. सूचना अधिकार कानून और शिक्षा अधिकार कानून भी कांग्रेस सरकार के समय लागू हुए.

कांग्रेस इन का प्रचार कर के लोगों को अपने कामों के बारे में बता सकती है. आज भी देश के बहुत सारे लोग कांग्रेस की नीतियों पर भरोसा करते हैं. पर कांग्रेस की दिक्कत यह है कि वह जनता तक अपनी आवाज पहुंचा नहीं पा रही है.

कांग्रेस लंबे समय तक सत्ता में रहने के चलते सुविधाभोगी हो गई थी. उस के नेता जनता से दूर हो गए हैं. अगर सत्ता वापस लानी है, तो जनता के बीच जा कर विरासत को बता कर लोगों से जुड़ना होगा. प्रशांत किशोर जैसे लोग चुनावी मैनेजमैंट तो कर सकते हैं, पर वोट दिलाने का काम नहीं कर सकते.

भाजपाई नीतीश को पटकनी देंगे पीके?

भारतीय जनता पार्टी को केंद्र में और जनता दल (यू) को बिहार में अपनी चुनावी योजनाओं से जीत दिलाने वाले प्रशांत किशोर उर्फ पीके ने अपने पुराने दोनों क्लाइंट को धूल चटाने के लिए कमर कस ली है. उन्होंने बिहार की कुल 8,800 पंचायतों में पैठ बनाने की कवायद शुरू कर दी है. पंचायतों में अपनी पैठ बना कर वे बिहार विधानसभा पर नजरें टिका चुके हैं.

20 फरवरी, 2020 से ‘बात बिहार की’ नाम से नए कार्यक्रम की शुरुआत कर चुके पीके का दावा है कि 3 लाख नौजवान इस से जुड़ चुके हैं और 20 मार्च, 2020 तक 10 लाख और नौजवानों को जोड़ना है.

गौरतलब है कि इस साल के आखिर में बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. सवाल यह भी है कि क्या पीके नीतीश कुमार जैसे सियासी धुरंधर और भाजपा जैसी नैशनल पार्टी को चुनौती देने की ताकत रखते हैं, क्योंकि मार्केटिंग और राजनीति दोनों अलगअलग चीजें हैं.

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जनता दल (यू) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर ने 18 फरवरी, 2020 को पटना में प्रैस कौंफ्रैंस कर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजग के खिलाफ हल्ला बोल दिया था. उन्होंने नीतीश कुमार को अपने पिता समान बताते हुए दावा किया कि उन दोनों का रिश्ता केवल राजनीति का नहीं रहा है. उस के तुरंत बाद उन्होंने नीतीश कुमार के साथ विचारों के मतभेद का खुलासा कर डाला.

पीके ने कहा कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव के समय से ही नीतीश कुमार और उन के बीच ‘आल इज वैल’ नहीं रहा.

नीतीश कुमार हमेशा कहते हैं कि वे गांधी, लोहिया और जेपी की विचारधारा को नहीं छोड़ सकते हैं, पर गांधी के साथसाथ गोडसे के विचारों को मानने वालों के साथ वे कैसे खड़े हैं? इसी से हमारे बीच मतभेद रहा.

पीके ने नीतीश कुमार के विकास के कामों को तथाकथित विकास करार दे डाला. भाजपा के साथ होते हुए भी आज तक बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की उन की सालों पुरानी मांग क्यों नहीं पूरी हुई?

बिहार में शिक्षा की हालत बेहद खराब है. प्रति परिवार बिजली की खपत में बिहार सब से पिछड़ा है. विकास के मामले में बिहार पिछले 15 सालों से 22वें नंबर पर क्यों है? अपनी बात कहने और मनवाने के लिए हरदम नीतीश कुमार पिछलग्गू बने रहते हैं.

पीके ने नीतीश कुमार को सियासी चुनौती दे दी है, लेकिन क्या उन में कूवत है कि वे नीतीश कुमार जैसे सियासी धुरंधर और सोशल इंजीनियरिंग के मास्टर के सामने टिक सकेंगे? पीके जहां मार्केटिंग और पब्लिसिटी के मास्टर हैं, वहीं नीतीश कुमार के पास तकरीबन 45 सालों का सियासी अनुभव है. वे विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री रहे हैं और भाजपा और राजद जैसे ताकतवर दलों को साधते रहे हैं.

साल 1974 के जेपी आंदोलन की उपज नीतीश कुमार साल 1985 में पहली बार विधायक बने थे. साल 1989 में वे पहली बार सांसद बने थे. उस के बाद साल 1991, साल 1996, साल 1998, साल 1999 और साल 2004 में वे लोकसभा चुनाव जीते थे. साल 1990 के अप्रैल से नवंबर महीने तक वे केंद्रीय कृषि मंत्री रहे.

19 मार्च, 1998 से ले कर 5 अगस्त, 1999 तक नीतीश कुमार केंद्रीय रेल मंत्री रहे. 13 अक्तूबर, 1999 से ले कर 22 नवंबर, 1999 तक वे भूतल परिवहन मंत्री रहे. 27 मई, 2000 से 20 मार्च, 2001 तक वे कृषि मंत्री रहे. 22 जुलाई, 2001 से ले कर साल 2004 तक वे रेल मंत्री रहे.

साल 2005 में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने और उन्होंने न्याय के साथ विकास का नारा दिया. तब से अब तक वे लगातार बिहार के मुख्यमंत्री की कुरसी पर काबिज हैं.

साल के आखिर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कराने के लिए नीतीश कुमार ने सियासी दांवपेंच खेलना शुरू कर दिया है. नीतीश कुमार की सब से बड़ी ताकत उन की ईमानदार छवि है और फैसला लेने के मामले में वे पक्के माने जाते हैं.

पीके पर पलटवार करते हुए जद (यू) के राष्ट्रीय संगठन के महासचिव आरसीपी सिंह ने कहा कि नीतीश कुमार को पिछलग्गू बनाने की औकात किसी के पास नहीं है. वे अपने काम के बूते देशभर में पहचान बन चुके हैं. हमें किसी ऐरेगैरे से सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है.

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जद (यू) के सीनियर नेता ललन सिंह ने पीके की तुलना टिटहरी से करते हुए कहा कि टिटहरी रात को पैर उठा कर सोती है, क्योंकि उसे लगता है कि उस ने अपने पैरों से आसमान को थाम रखा है. सुबह उठ कर वह इस बात का प्रचार भी करती है कि अगर वह पैर उठा कर नहीं सोती तो आसमान गिर पड़ता.

भाजपा नेता सुशील मोदी ने पीके पर तंज कसते हुए कहा कि इवैंट मैनेजमैंट करने वालों की कोई विचारधारा नहीं होती है. वे अपने क्लाइंट की विचारधारा और बोली को तुरंत अपना लेने में माहिर होते हैं.

पीके साल 2014 में नरेंद्र मोदी की जीत का सेहरा अपने सिर बांधने में बड़बोले बने रहे, तब भाजपा और मोदी उन्हें गोडसेवादी नहीं लगे? पिछले ढाई साल से पीके नीतीश कुमार के साथ मिल कर अपनी राजनीति चमकाने में लगे रहे और अब चुनाव आते ही नीतीश गोडसेवादी बन गए?

वहीं राजद के सीनियर नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं कि पीके के बयान से साफ हो गया है कि बिहार में विकास नहीं हुआ है. पीके ने साफ कहा है कि साल 2005 में जिस जगह पर बिहार खड़ा था, आज भी वहीं खड़ा है.

बिहार भाजपा के अध्यक्ष और सांसद संजय जायसवाल कहते हैं कि चुनावी साल में पीके जैसे कई लाउडस्पीकर बजेंगे. पैसे ले कर टेप बजाने वाले पीके वही बोलते हैं, जिस बात के लिए उन्हें भुगतान किया जा सकता है.

नीतीश कुमार के खिलाफ पीके की यह बयानबाजी उन की सियासत में ऐंट्री की कवायद है या जद (यू) से निकाले जाने की खुन्नस है, इसे पीके ने साफ नहीं किया. बिहार विधानसभा चुनाव में उन की भूमिका केवल रणनीतिकार की होगी या वे राज्य के धुरंधर नेताओं के साथ चुनावी अखाड़े में ताल ठोंक कर उतरेंगे, यह भी साफ नहीं किया.

पिछले विधानसभा चुनाव में पीके नीतीश कुमार के साथ बतौर रणनीतिकार जुड़े और बाद में सलाहकार भी बने. कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला और उस के बाद राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए गए.

महागठबंधन से नाता तोड़ लेने के बाद भाजपा के साथ जब नीतीश कुमार ने अपनी सरकार बनाई, तब भी पीके चुप क्यों रहे? जद (यू) में रहते हुए भी पश्चिम बंगाल और दिल्ली के चुनावों में किस विचारधारा के साथ रणनीतिकार बने रहे? अपने कारोबार और सियासत को साथसाथ चलाते रहे. गांधीवादी होते हुए भी भाजपा के रणनीतिकार बनना क्यों कबूल किया? इन सारे सवालों का जवाब पीके को आने वाले समय में देना होगा.

साल 1977 को बिहार के रोहतास जिले के कोनर गांव में जनमे प्रशांत किशोर उर्फ पीके के पिता श्रीकांत पांडे डाक्टर थे. पीके ने गांव में ही मिडिल क्लास तक की पढ़ाई की. 8 साल तक यूएनओ से जुड़े रहने के बाद साल 2014 के आम चुनाव में भाजपा के प्रचार मुहिम की रणनीति बना कर मशहूर हुए प्रशांत किशोर साल 2012 में गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा से जुड़े थे.

भाजपा के लिए साल 2014 के चुनाव में ‘चाय पर चर्चा’ उन का कामयाब और मशहूर कार्यक्रम साबित हुआ था. भाजपा की सोशल मीडिया मुहिम को उन्होंने ही डिजाइन किया था. उसी समय अनेक कालेजों और कंपनियों से 200 प्रोफैशनलों को चुन कर पीके ने सीएजी (सिटीजन फौर अकाउंटेबेल गवर्नैंस) नाम की कंपनी बनाई. साल 2015 में भाजपा से अलग होने के बाद उन्होंने अपनी कंपनी सीएजी का नाम बदल कर आईपीएसी यानी इंडियन पौलिटिकल ऐक्शन कमेटी कर दिया था.

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साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में पीके जद (यू) के प्रचार मुहिम से जुड़े. जद (यू) और राजद के गठबंधन को भारी जीत दिलाने के इनाम में उन्हें नीतीश कुमार ने जद (यू) का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद दे दिया. पिछले साल एनआरसी के मसले पर जद (यू) की पार्टी लाइन से अलग राय रखने के बाद नीतीश कुमार के साथ उन के मतभेद शुरू हुए थे.

साल 2016 में पीके ने पंजाब में कांग्रेस की प्रचार मुहिम संभाली और कांग्रेस को भारी जीत मिली. इस से प्रशांत किशोर का रुतबा और कद दोनों बढ़ गए. साल 2017 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जीत दिलाने की चुनौती कबूल की, लेकिन उस में बुरी तरह नाकाम रहे.

साल 2019 में उन्होंने आंध्र प्रदेश में वाइएसआर कांग्रेस की प्रचार की नैया की पतवार संभाली और उस में कामयाबी मिली. साल 2020 में दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की पार्टी ‘आप’ के प्रचार का दारोमदार लिया और केजरीवाल को दोबारा दिल्ली की सत्ता पर काबिज कराने में मददगार बने.

अब प्रशांत किशोर ने पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में द्रमुक को जिताने की कमान अपने कंधों पर ली है. लगता है कि भाजपा के लिए ‘चाय पर चर्चा’ राहुल गांधी के लिए ‘खाट पर चर्चा’ और नीतीश कुमार के लिए ‘बिहार में बहार हो नीतीशे कुमार हो’ जैसे नारे गढ़ने वाले पीके अब खुद राजनीतिक अखाड़े में कमर कस कर उतरने की तैयारी में हैं.

नीतीश का मास्टर स्ट्रोक

चुनावी साल में बिहार विधानसभा ने एनपीआर और एनआरसी के खिलाफ प्रस्ताव पास कर नीतीश कुमार ने अपने विरोधियों को एक बार फिर चारों खाने चित कर दिया है. गौरतलब है कि देश में पहली बार भाजपा के सहयोग से यह प्रस्ताव पास किया गया. नीतीश कुमार ने अपने इस मास्टर स्ट्रोक से राजद समेत तमाम विरोधी दलों की बोलती बंद कर दी है, वहीं भाजपा को उस के ही दांव से बेबस कर दिया है.

विधानसभा में नीतीश कुमार ने साफ कहा है कि बिहार में एनआरसी लागू होने का सवाल ही नहीं है. एनपीआर साल 2010 के प्रावधान पर ही लागू होगा. मुझे भी नहीं पता है कि मेरी मां का जन्म कब हुआ था.

नीतीश कुमार के इस राजनीतिक पैतरे से बौखलाए राजद नेता तेजस्वी यादव ने अपनी खुन्नस निकालते हुए कहा कि नीतीशजी कब किधर चले जाएं, पता नहीं. उन का ऐसा ही इतिहास रहा है.

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तेजस्वी यादव के इस बयान के बाद नीतीश कुमार ने उन्हें गार्जियन की तरह समझाते हुए कहा कि कुछ बातें बोलने का अधिकार केवल आप के पिता को है, आप को सोचसमझ कर बोलना चाहिए.

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