News Story : सुपरस्टार विजय की राजनीति में सुपर एंट्री

News Story. एक तो चिलचिलाती गरमी, ऊपर से अनामिका का कई दिनों से बिना बताए गायब हो जाना, विजय को बड़ा अखर रहा था. उस के मम्मीपापा को भी नहीं पता था कि अनामिका किस कोप भवन में जा छिपी थी.

15 मई को विजय के सब्र का बांध टूट गया. उस ने अनामिका को फोन किया, पर वहां से कोई जवाब नहीं आया. उस ने अनामिका को मैसेज किया कि वह डियर पार्क जा रहा है. अगर उसे आना है, तो आ जाए.

विजय तैयार हो कर जब अपनी मोटरसाइकिल से निकल ही रहा था कि अनामिका का मैसेज आया, ‘ठीक है.’ विजय ने मैसेज चैक किया और भाव खाते हुए बिना रिप्लाई किए डियर पार्क के लिए निकल गया.

शाम के तकरीबन साढ़े 6 बजे अनामिका डियर पार्क आई. उसे दूर से देखते ही विजय ने नाराज हो कर मुंह फेर लिया. ‘‘क्या हुआ जनाब, आ तो गई तुम से मिलने,’’ अनामिका बोली. ‘‘बड़ा अहसान कर दिया. वैसे, तुम थीं कहां इतने दिनों से?’’ विजय ने सवाल दागा.

‘‘एक सीक्रेट मिशन पर,’’ अनामिका बोली और फिर हंस दी. ‘‘बताओगी भी या नहीं?’’ विजय बोला. ‘‘मैं एक्टिंग क्लास ले रही हूं,’’ अनामिका ने राज खोला. ‘एक्टिंग क्लास’ जैसी बात सुनते ही विजय का मुंह खुला का खुला रह गया. ‘‘अब यह क्या नौटंकी है… तुम और एक्टिंग क्लास… आईएएस बनने का इरादा छोड़ दिया क्या?’’ विजय ने पूछा. ‘‘क्यों… क्या मैं एक्टर नहीं बन सकती? आजकल तो नौटंकी करने वालों की ही बल्लेबल्ले है. देश की सरकार को ही देख लो. उन के नेताओं की भगवा नौटंकी जगजाहिर है. हर कोई जनता को बेवकूफ बनाने के लिए संसद हो या सरकारी समारोह, हर जगह ये लोग एक्टिंग ही कर रहे हैं,’’ अनामिका बोली.

इस तरह की और वीडियो देखने के लिए सरस सलिल का चैनल सब्सक्राइब करें

‘‘अब यह कौन सी नई खुराफात है? मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा है,’’ विजय बोला. ‘‘इस में खुराफात जैसी कौन सी बात है. नेता अभिनेता बन रहे हैं और अभिनेता नेता. दोनों हाथ में लड्डू और मुंह में मलाई. फिर क्या करना आईएएस बन कर,’’ अनामिका बोली. ‘‘फिर वही बात. कहीं कुछ नशावशा तो नहीं कर लिया है,’’ विजय अब चिढ़ रहा था. ‘‘अरे मेरे भोले विजय… क्या तुम ने थलापति विजय के बारे में नहीं सुना, जिन्होंने फिल्मों के बाद अब सियासत में इतनी शानदार एंट्री मारी है कि सीधे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बन गए हैं,’’ अनामिका बोली.

‘‘तो क्या हुआ? वहां तो बड़े से बड़े अभिनेता नेता बने हैं, फिर विजय ने क्या कारनामा कर दिया?’’ विजय ने कहा. ‘‘पर इस बंदे में दम है. फिल्मों में सुपर हिट और राजनीति में सुपर हिट. आए और सब पर छाए,’’ अनामिका ने कहा. ‘‘अच्छा, तो बताओ अपने इस सुपर हीरो के बारे में, जिस के चक्कर में तुम पर एक्टिंग का भूत चढ़ गया है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘तमिल फिल्म इंडस्ट्री के सुपरस्टार और तमिलगा वेत्री क?ागम (टीवीके) सियासी दल के प्रमुख जोसेफ सी. विजय, जिन्हें उन के चाहने वाले ‘थलापति विजय’ के नाम से जानते हैं, अब आधिकारिक तौर पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बन गए हैं. ‘‘हालांकि, सत्ता तक पहुंचने का उन का सफर किसी राजनीतिक ड्रामे से कम नहीं रहा. बहुमत जुटाने की जद्दोजेहद, सहयोगियों की तलाश और लगातार राजनीतिक बैठकों के बीच आखिरकार विजय ने रविवार, 10 मई, 2026 को ‘मदर्स डे’ पर मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली.

‘‘चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में आयोजित इस शपथ ग्रहण समारोह में विजय के साथ टीवीके के 9 विधायकों ने भी मंत्री पद की शपथ ली थी. इस समारोह में कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी मौजूद रहे थे.’’ ‘‘बधाई हो, पर थलापति विजय को तो बहुमत नहीं मिला था, फिर यह सब कैसे मुमकिन हुआ?’’ विजय ने पूछा. ‘‘दरअसल, 4 मई को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित हुए तो विजय की पार्टी टीवीके ने सभी को चौंका दिया था. इस पार्टी ने 234 सदस्यीय विधानसभा में 108 सीटें जीत कर सब से बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर राजनीतिक समीकरण बदल दिए थे.

‘‘हालांकि, यह जीत ऐतिहासिक मानी गई, लेकिन विजय की पार्टी बहुमत के आंकड़े से 10 सीट पीछे रह गई. इस के बाद विजय को सरकार बनाने के लिए चुनाव बाद गठबंधन की राह अपनानी पड़ी.’’ ‘‘फिर तो सरकार बनाने के लिए चला यह ड्रामा कई दिनों तक सस्पैंस भरा बना रहा होगा?’’ विजय ने सवाल उठाया.

‘‘सच में चुनाव नतीजे आने के बाद कई दिनों तक तमिलनाडु की राजनीति में सस्पैंस बना रहा. टीवीके ने कांग्रेस से समर्थन मांगा, जिस ने अपने 5 विधायकों का समर्थन दिया. इस के बाद सीपीआई और सीपीआई (एम) ने भी विजय का साथ दिया.

शनिवार, 9 मई, 2026 को विदुथलाई चिरुथैगल काची (वीसीके) और इंडियन यूनियन मुसलिम लीग (आईयूएमएल) के समर्थन के बाद विजय बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने में कामयाब रहे.’’ ‘‘सुना है तमिलनाडु के राज्यपाल ने भी कोई अड़ंगा लगाया था?’’ विजय ने कुरेदते हुए पूछा. ‘‘सूत्रों के मुताबिक, विजय ने शपथ लेने से पहले राज्यपाल आरवी अरलेकर से कम से कम बार मुलाकात की थी, पर जरूरी 118 विधायकों की लिस्ट पूरी न होने के चलते राज्यपाल उन्हें लौटा रहे थे. इस रवैए पर राज्यपाल की किरकिरी भी हुई. विपक्ष ने उन्हें खूब आड़े हाथ लिया. फिर आखिरकार, राज्यपाल ने सरकार बनाने की मंजूरी दे दी.

सरिता

आज ही सब्सक्राइब करें सरिता 
आपके लिए स्पेशल छूट

‘‘वैसे, राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा रही कि अगर 10 मई तक कोई सरकार नहीं बनती तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता था. ऐसे में विजय का बहुमत जुटाना समय के खिलाफ दौड़ जैसा माना गया,’’ अनामिका ने बताया. ‘‘चलो, अब विजय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बन चुके हैं. पर मु?ा जैसे आम इनसान को उन के बारे में, उन के परिवार के बारे में, उन की पढ़ाईलिखाई और फिल्मों के बारे में जानने की ज्यादा दिलचस्पी है. इस के बारे में कुछ बताओ…’’ विजय बोला, ‘‘आखिर इतना बड़ा सुपरस्टार मेरा नाम राशि का है. वह भी विजय और हम भी विजय. वह जनता का हीरो और हम आप के हीरो.’’

‘‘वैरी फनी. पर अब तुम ने पूछ ही लिया है तो बता देती हूं. विजय का जन्म 22 जून, 1974 में हुआ था. वे एक फिल्मी परिवार से आते हैं. उन के पिता एसए चंद्रशेखर तमिल फिल्मों के डायरैक्टर हैं और उन की मां शोभा चंद्रशेखर प्लेबैक सिंगर हैं. ‘‘फिल्मों की बात करें तो विजय ने 1992 में फिल्म ‘नालैया थीरपू’ से अपने एक्टिंग कैरियर की शुरुआत की. 1990 के दशक में उन्होंने रोमांटिक फिल्मों के जरीए लोकप्रियता हासिल की. ‘पूवे उनाक्कागा’, ‘लव टुडे’, ‘कधालुक्कु मरियाधै’ और ‘थुल्लाथा मनामुम थुल्लुम’ जैसी फिल्मों ने उन्हें नौजवानों के बीच बड़ी पहचान दिलाई.

‘‘इस के बाद विजय ने एक्शन फिल्मों की ओर रुख किया और ‘घिल्ली’, ‘पोक्किरी’, ‘थिरुमलाई’ जैसी फिल्मों से वे सुपरस्टार बन गए. पिछले एक दशक में ‘थुप्पक्की’, ‘कत्थी’, ‘मेर्सल’, ‘सरकार’, ‘मास्टर’, ‘लियो और ‘ग्रेटेस्ट आल टाइम’ जैसी फिल्मों ने उन्हें तमिल सिनेमा के सब से बड़े सितारों में शामिल कर दिया,’’ अनामिका बोली. ‘‘जब विजय का फिल्म कैरियर इतना शानदार चल रहा था, तो वे राजनीति में क्यों आए?’’ विजय ने पूछा.

‘‘विजय ने साल 2024 में फिल्मों से दूरी बना कर सक्त्रिय राजनीति में कदम रखा और तमिलगा वेत्री क?ागम (टीवीके) नाम की पार्टी बनाई. उन की लोकप्रियता और बड़े फैन बेस ने उन्हें सीधे राज्य की राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया. राजनीतिक माहिरों का मानना है कि विजय ने नौजवानों, मिडिल क्लास और शहरी वोटरों के बीच मजबूत पकड़ बनाई, जिस का फायदा उन्हें चुनाव में मिला,’’ अनामिका ने बताया.

‘‘पर विजय की आखिरी फिल्म ‘जना नायकन’ अब विवादों में घिर गई है. इस का क्या हश्र होगा?’’ विजय ने सवाल किया. ‘‘दरअसल, यह फिल्म जनवरी में पोंगल के मौके पर रिलीज होने वाली थी, लेकिन केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से मंजूरी नहीं मिलने के कारण रिलीज टालनी पड़ी. इस पर फिल्म के प्रोड्यूसरों ने अदालत का दरवाजा भी खटखटाया, लेकिन मामला अभी कोर्ट में पैंडिंग है. ‘‘इतना ही नहीं, अप्रैल में फिल्म औनलाइन लीक हो गई, जिस से तमिल फिल्म इंडस्ट्री में हड़कंप मच गया.

‘‘इस मामले में विजय ने आरोप लगाया था कि फिल्म की रिलीज में देरी राजनीतिक साजिश का हिस्सा है और चुनाव के दौरान उन की निजी जिंदगी से जुड़ी खबरें भी जानबू?ा कर लीक की गईं.’’

‘‘मतलब विजय की एक्टर से नेता बनने की कहानी भी बड़ी फिल्मी है?’’ विजय बोला. ‘‘सच मे विजय का मुख्यमंत्री बनने का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहा. चुनावी जीत, बहुमत की कमी, सहयोगियों की तलाश और आखिरकार सत्ता तक पहुंच, पूरे प्रोसैस ने तमिलनाडु की राजनीति को कई दिनों तक रोमांचक बनाए रखा.’’

‘‘विजय के परिवार के बारे में और कुछ बताओ?’’ ‘‘विजय की शादीशुदा जिंदगी की बात करें, तो उन्होंने 25 अगस्त, 1999 को संगीता सोर्नालिंगम से शादी की थी. संगीता एक ब्रिटिश तमिल परिवार से ताल्लुक रखती हैं और उन का जन्म श्रीलंका में हुआ था. दोनों की पहली मुलाकात 1997 में फिल्म ‘कालमेलम काथिरुप्पेन’ के सैट पर हुई थी, जहां संगीता एक फैन के तौर पर उन से मिलने पहुंची थीं.

‘‘हालांकि, पिछले कुछ समय से उन के रिश्ते में खटास की खबरें चर्चा में रही हैं. साल 2025 में संगीता द्वारा तलाक की अर्जी देने की रिपोर्ट्स सामने आई थीं, जिस से उन की निजी जिंदगी में बड़े बदलाव के संकेत मिले.

‘‘विजय और संगीता के 2 बच्चे हैं. बेटा जेसन संजय और बेटी दिव्या साशा. जेसन संजय ने फिल्म ‘सिग्मा’ से बतौर डायरैक्टर अपने कैरियर की शुरुआत की है और वे अपने पिता के साथ बचपन में ‘वेट्टाइकारन’ फिल्म में नजर आ चुके हैं. वहीं बेटी दिव्या ने फिल्म ‘थेरी’ में अपने पिता के साथ स्क्रीन शेयर की थी. दोनों ही बच्चे विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद अब धीरेधीरे अपने कैरियर की दिशा तय कर रहे हैं,’’ अनामिका बोली.

‘‘वैसे, यह बंदा कितना पढ़ालिखा है? सुना है यह कालेज से ड्रौप आउट है और इसे डाक्टरेट की उपाधि भी मिली है. यह क्या माजरा है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘विजय ने अपनी शुरुआती पढ़ाई चेन्नई के कोदंबक्कम में बने फातिमा स्कूल से की. इस के बाद उन्होंने विरुगंबक्कम के बाललोक स्कूल से अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी की. पढ़ाई के मामले में औसत छात्र थे, लेकिन उन का रु?ान पढ़ाई से ज्यादा एक्टिंग की तरफ था. चूंकि उन के पिता एसए चंद्रशेखर एक फिल्म डायरैक्टर थे, इसलिए सिनेमा का माहौल उन्हें बचपन से ही मिला था.

‘‘स्कूल के बाद विजय ने चेन्नई के लोयोला कालेज में ‘विजुअल कम्यूनिकेशन’ की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया. इस के बाद उन्होंने एक्टिंग में अपना कैरियर बनाने का मन बना लिया. ‘‘यही वजह थी कि थलापति विजय ने पढ़ाई के दौरान ही कई शूटिंग और बाकी चीजों में काम करना शुरू कर दिया था. इस के बाद उन्हें एक्टिंग के कई औफर मिलने लगे और पढ़ाई को आगे बढ़ाना मुश्किल हो गया. आखिरकार उन्होने ग्रेजुएशन पूरी होने से पहले ही कालेज ड्रौप कर लिया.’’

‘‘अब मैं तुम्हें एक दिलचस्प बात बताता हूं…’’ विजय ने कहा, ‘‘भले ही विजय ने अपनी कालेज की डिगरी पूरी नहीं की, लेकिन उन के काम को खूब सम्मान मिला. उन का नाम इतना मशहूर हुआ कि साल 2007 में डाक्टर. एमजीआर एजुकेशनल एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट ने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में उन के योगदान के लिए ‘मानद डाक्टरेट’ की उपाधि से सम्मानित किया.’’

‘‘वाह…’’ अनामिका बोली. ‘‘जो भी हो बंदा कमाल का है. अब यह राजनीति में आ ही गया है तो फिर यहां भी अपने अच्छे काम से सुपरस्टार बन जाए. वैसे, मैं तो यह भी चाहूंगा कि मेरी अनामिका भी एक्टिंग सीख कर बड़ी कलाकार बने,’’ विजय बोला.

‘‘हो गया, चलो अब कहीं डिनर करने चलते हैं. मुझे बड़ी तेज भूख लगी है,’’ अनामिका बोली तो विजय ने ‘हां’ में सिर हिला दिया. News Story

Politics : अंबेडकर को सिर्फ मूर्ति बनाने की साजिश

Politics. उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने डाक्टर भीमराव अंबेडकर की विरासत को सम्मानित करने और दलित मतदाताओं के बीच पैठ मजबूत करने के लिए ‘डाक्टर अंबेडकर मूर्ति विकास योजना’ बनाई है. इस योजना के तहत उत्तर प्रदेश की हर विधानसभा में अंबेडकर की प्रतिमाओं का सौंदर्यीकरण करना, मूर्तियों के ऊपर छत्र और बाउंड्री वाल बनवाना शामिल है.

सरकार ने इस के लिए 403 करोड़ रुपए का बजट पास किया है. इस से उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों के हर क्षेत्र में 10-10 स्मारकों का विकास किया जाएगा.

इस योजना में अंबेडकर के साथ ही साथ दलितों के साथ जुड़े संत रविदास, कबीर, ज्योतिबा फुले और महर्षि वाल्मीकि जैसे महापुरुषों के स्मारकों के विकास को भी शामिल किया गया है.

उत्तर प्रदेश सरकार के इस कदम को 2027 के विधानसभा चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है. पार्टी इस के जरीए दलित वोटर को जोड़ना चाह रही है. हर विधानसभा को करीबकरीब एक करोड़ रुपए इस काम के लिए मिलेंगे.

उत्तर प्रदेश की सरकार ने तय किया है कि प्रदेशभर में जहां कहीं भी  अंबेडकर की प्रतिमा होगी, वहां पर प्रतिमा के ऊपर छत्र लगाने का काम कराया जाएगा. जहां पर अंबेडकर की प्रतिमा स्थापित होगी वहां पर जो पार्क होगा. उस की बाउंड्री वाल का निर्माण और उस के सुंदरीकरण का काम भी सरकार अपने पास ले रही है.

इस तरह की और वीडियो देखने के लिए सरस सलिल का चैनल सब्सक्राइब करें

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ऐशबाग में 50 करोड़ रुपए की लागत से ‘भारत रत्न’ भीमराव अंबेडकर मैमोरियल एंड कल्चरल सैंटर का निर्माण होगा. पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 28 जून को इस की आधारशिला रखेंगे. इस में अंबेडकर की 45 फुट ऊंची प्रतिमा लगेगी और अंबेडकर की पुण्यतिथि 6 दिसंबर पर इस का उद्घाटन करवाए जाने की तैयारी है.

‘भारत रत्न’ अंबेडकर के नाम पर बनने वाले मैमोरियल सैंटर में अंबेडकर की प्रतिमा के साथ ही डिजिटल लाइब्रेरी, म्यूजियम और शानदार एडिटोरियम भी बनाया जाएगा. स्मारक में पूरे साल कल्चरल प्रोग्राम का आयोजन किया जाएगा. छात्रों के लिए सैमिनार के आयोजन किए जाएंगे. यहां छात्रों को अंबेडकर पर शोध करने के लिए जरूरी चीज मुहैया करवाएगी.

यहां बनने वाली लाइब्रेरी को काफी बड़ी होगी. उस में अंबेडकर से जुड़ी किताबों का संग्रह होगा.

मूर्तियां होंगी दलित वोट का सहारा

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की नजर से दलित वोट काफी खास माने जा रहे हैं. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में यही दलित वोट भाजपा से खिसक गया था, जिस की वजह से उत्तर प्रदेश में पार्टी को 33 सीटों का नुकसान हुआ था. ऐसे में अब भाजपा दलित वोटरों को काफी अहम मान रही है.

साल 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट पर हर पार्टी की नजर है. उत्तर प्रदेश में तकरीबन 22 फीसदी दलित वोट हैं. यहां विधानसभा की आरक्षित 86 सीट में 84 दलितों के लिए हैं.

उत्तर प्रदेश की लगभग 150 विधानसभा सीटों पर दलित वोट ही हारजीत तय करते हैं. उत्तर प्रदेश में 4 बार मुख्यमंत्री रही मायावती दलितों की सब से बड़ी नेता मानी जाती रही हैं. 1995, 1997, 2003 और 2007 वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं. साल 2007 बसपा की बहुमत से सरकार बनी थी.

इस के बाद धीरधीरे मायावती की ताकत कम होती गई. बसपा को लगातार 2012, 2017 और 2022 में हार का सामना करना पड़ा है. विधानसभा में बसपा से सिर्फ एक विधायक है. वहीं लोकसभा में एक भी सांसद बसपा का नहीं है. बसपा को अभी भी 9 फीसदी वोट मिलते हैं.

क्यों नहीं लग पाई पेरियार की मूर्ति

मायावती जब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने प्रदेश के अलगअलग हिस्सों में अंबेडकर की प्रतिमाएं लगवाई थीं. अंबेडकर की पत्नी रमा बाई के नाम पर लखनऊ में एक बड़ा स्मारक भी बनवाया गया था.

मायावती ने तब लखनऊ में अपनी मूर्तियां भी लगवाई थीं, जिस को ले कर खुद भाजपा ने ही सवाल खड़े किए थे. मायावती लखनऊ में जिन दलित महापुरुषों की मूर्तियां लगवाना चाहती थी उन में एक नाम पेरियार ईवी रामास्वामी नायकर का भी था. भाजपा को ब्राह्मण विरोधी पेरियार के नाम से नफरत थी.

भाजपा और अन्य दक्षिणपंथी संगठनों ने पेरियार की मूर्ति का कड़ा विरोध किया था. उन का मानना था कि पेरियार राम विरोधी थे, जबकि असल में वे ब्राह्मण विरोधी थे. उन के विचार हिंदू देवीदेवताओं के खिलाफ थे.

मायावती के तीसरे कार्यकाल 2002-2003 के दौरान जब मूर्ति लगाने का प्रस्ताव था. तब बसपा भाजपा के सहयोग से सरकार चला रही थी. भाजपा ने मूर्ति स्थापना का विरोध करते हुए सरकार से हटने की धमकी दी थी, जिस के कारण मायावती को यह योजना स्थगित करनी पड़ी थी.

उस समय मूर्ति न लगने का कारण यह बताया गया था कि पेरियार दक्षिण भारत के समाज सुधारक थे, इसलिए उन की मूर्ति उत्तर प्रदेश में नहीं लगनी चाहिए. मूर्ति न लगने देने का कारण पेरियार के ईश्वर विरोधी और तर्कवादी विचारों को धार्मिक भावनाओं खिलाफ माना गया था.

मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनी थीं तो उन्होंने भाजपा के दबाव को माना और पेरियार की मूर्ति लगाने की योजना को टाल दिया.

सरिता

आज ही सब्सक्राइब करें सरिता 
 आपके लिए स्पेशल छूट

पेरियार की नीतियों का मतलब था मंदिरों की दुकानदारी खत्म होना और पंडों को किए जाने वाले दान की बचत होना. दोनों बातें जनता के लिए लाभदायक हैं, पर धर्म का प्रचार इतना जबरदस्त है कि मायावती भी कुछ न कर पाईं और कांशीराम की नीतियां भी राजनीति का शिकार हो गईं.

क्या अंबेडकर की मूर्ति से होगा लाभ

भारतीय जनता पार्टी लगातार दलित और पिछड़ी जातियों से जुड़े महापुरुषों को अपने साथ जोड़ने की योजना पर काम कर रही है. अंबेडकर के अलावा सरदार वल्लभ भाई पटेल की सब से ऊंची मूर्ति गुजरात में लगाई. उन के जन्मदिन को ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ घोषित किया. बिहार के बड़े ओबीसी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को साल 2024 में ‘भारत रत्न’ दिया.

इस का लाभ भाजपा को साल 2025 के विधानसभा चुनाव में मिला. ?ारखंड के बिरसा मुंडा के जन्मदिवस को ‘जनजाति गौरव दिवस’ घोषित किया.

इसी तरह से संत रविदास का भी महिमामंडन किया. साल 2023 में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव को भारत का दूसरा सब से बड़ा सम्मान ‘पद्म विभूषण’ दिया. निषादराज गुहा और सुहेलदेव राजभर जैसे बड़े महापुरुषों का भी भाजपा ने महिमामंडन किया.

भाजपा दूसरे विचारों के महापुरुषों का सम्मान दे कर अपनी अलग पैठ बनाने का काम कर रही है. यह बात और है कि जमीनी लैवल पर वह जातीय भेदभाव को खत्म नहीं कर पा रही है.

दूसरी ओर नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से पता चलता है कि भाजपा शासन के दौरान दलित उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ी हैं. एनसीआरबी की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 की तुलना में 2022 में अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अपराधों में 13.1 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई.

सब से अधिक मामले भाजपा शासित उत्तर प्रदेश में 15,368, राजस्थान में 8,752, मध्य प्रदेश में 7,733 और बिहार में 6,509 दर्ज किए गए थे. देश की कुल दलित उत्पीड़न की 76 फीसदी घटनाएं 5 भाजपा शासित राज्यों में हुईं.

औरतों के साथ अन्याय भी लगातार बढ़ रहा है. पढ़ीलिखी औरतों को नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं और घरों में उन के साथ होने वाला भेदभाव एक नई शक्ल में सामने आ रहा है.

अंबेडकर के संविधान को कितना मानती है भाजपा

सब से बड़ा सवाल यह है कि भारतीय जनता पार्टी अंबेडकर की मूर्तियां तो लगवा रही है पर उन के बनाए संविधान का कितना पालन करती है? भाजपा पर चुनाव में धांधली, संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग, घरों को बुलडोजर से गिराने और फर्जी एनकांउटर के तमाम आरोप हैं. इस को ले कर कोर्ट तक ने टिप्पणियां की हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के शासन में ‘बुलडोजर न्याय’ की कोई जगह नहीं है. कोर्ट ने कहा कि ‘सरकार या प्रशासन बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी का घर नहीं तोड़ सकते हैं. केवल एफआईआर में नाम आने से कानूनी अधिकार नहीं हासिल हो जाता. सजा देने का अधिकार केवल कोर्ट को है सरकार या प्रशासन को नहीं.’

इसी मसले पर कोर्ट ने कहा कि नोटिस और सुनवाई जरूरी है. प्रभावित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का समय देना चाहिए. तुरंत बदले की कार्रवाई गलत है. अगर अवैध निर्माण के आधार पर यह हो रहा हो तो सब के साथ होना चाहिए. किसी एक का चुनाव करना कानून सम्मत नहीं है. घर तोड़ना केवल संपत्ति का नुकसान नहीं है, यह संविधान की धारा 21, जीवन और गरिमा से जुड़ा मामला होता है.

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में जावेद मोहम्मद का घर अवैध कह कर गिरा दिया गया. जावेद 2022 के सरकार विरोधी प्रदर्शन का हिस्सा थे. 2022 का ही दूसरा मामला दिल्ली का था. वह भी 2022 के प्रदर्शन के कारण किया गया था.

लोकसभा में संविधान पर चर्चा के दौरान भाजपा ने और गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि ‘अभी एक फैशन हो गया है… अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर… इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता.’ यह अमित शाह द्वारा संविधान निर्माता अंबेडकर का अपमान माना गया था. अब भाजपा उन्हीं अंबेडकर के सम्मान में उतर आई है. भाजपा सरकार के मंत्री रहे ब्राह्मण वर्ग से आने वाले पत्रकार से नेता बने अरुण शौरी ने अपनी किताब ‘वर्शिपिंग फाल्स गौड्स’ में अंबेडकर की आलोचना की थी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अंबेडकर के विचारों में काफी मतभेद रहे हैं. अब भाजपा इन को ‘जोड़ने’ करने की कोशिश कर रही है. अंबेडकर समानता यानी इक्वैलिटी पर जोर देते थे. दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समरसता की बात करता है. इन दोनो के विचारो में अंतर है.

इक्वैलिटी यानी समानता और समरसता यानी हार्मोनी के बीच जो अंतर है, वही अंतर अंबेडकर और संघ के बीच भी है. संघ वर्चस्व के उद्देश्य के लिए सद्भाव की अवधारणा का उपयोग करता है, जबकि अंबेडकर समानता की अवधारणा का उपयोग आजादी के लिए करते थे.

अंबेडकर की अवधारणा में समानता में जीवन को सम्मान के साथ समान अधिकारों की वकालत की गई है. अंबेडकर का समता का लक्ष्य और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की समरसता को एकसमान नहीं माना जा सकता है. समरसता का मतलब है एक होना और समता का मतलब है एकसमान होना है. समरसता कायम करने के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समानता पहली शर्त है.

भाजपा इस का कहीं पालन करते नहीं दिखती है. अंबेडकर का अंतिम लक्ष्य धर्मांतरण नहीं, जाति उन्मूलन था. उन्होंने 1935 में हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा की और 1956 में बौद्ध धर्म अपना लिया था.

अब भाजपा अंबेडकर की मूर्तियों पर छत्र लगा कर उन को छत्रपति बनाना चाहती है. हिंदू धर्म में छत्र का अपना महत्त्व है. इस को ब्राह्मण, राजा और शंकराचार्य ही धारण करते हैं. छत्र के सहारे बाबा साहब को धार्मिक चोले में रखने की तैयारी  की जा रही है.

दलित समाज के नौजवानों को नौकरी और कारोबार करना है, ऐेसे में केवल बड़े महापुरुषों का महिमामंडन करने से वह वोट नहीं देने वाला है. उसे समानता चाहिए जहां उस के साथ जाति का भेदभाव और उत्पीड़न न हो सके. केवल अंबेडकर की मूर्तियां लगाने से वह वोट नहीं देने जा रहा है. Politics

Politics: पंजाब एक अनाज फैक्ट्री

Politics: पंजाब जो देश की एक तरह की अनाज फैक्ट्री रहा है और आज भी उत्तर भारत के अमीर राज्यों में से एक है, एक बार फिर अलगाववादी ताकतों की वजह से सुलगने लगा है. अमृतपाल ङ्क्षसह ही वारिस पंजाब दे के समर्थक पूरे पंजाब में फैले हुए है और हजारों को बंद करने के बावजूद हर कोने में खुले आम दिख रहे हैं. हालांकि पंजाब में इंटरनैट पर पाबंदी है और हथियार ले कर घूमना मना है, ये लोग अमृतपाल ङ्क्षसह को दूसरा ङ्क्षमडरावाला मानते हुए कमजोर आम आदमी पार्टीकी सरकार का पूरा फायदा उठा रहे हैं.

पंजाब की खुशहाली पंजाबी सिखों के लिए ही जरूरी नहीं है, वह उन लाखों मजदूरों के लिए भी जरूरी है जो दूसरे राज्यों से यहां काम करने आए हैं और अपने गौयूजक राज्य की पोल खोलते हुए क्याक्या कर अपने गांवों में भेज रहे हैं. पंजाब में कोई भी गड़बड होगी तो इन लाखों बिहारी, राजस्थानी, उत्तर प्रदेश के उडिय़ां,

मध्यप्रदेश मजदूरों के लिए आफत हो जाएगी. इन सब राज्यों में तो पूजापाठ का काम ही पहला धंधा है पर पंजाब में किसानी का काम बड़ा है और इसीलिए किसान कानूनों का जबरदस्त मुकाबला पंजाबी किसानों ने किया था. अब ये ही किसान अमृतपाल ङ्क्षसह जैसे जबरन आधे अधूरे जने को नेता मान कर चल रहे है और पीलीे झंडों के नीचे इकट्ठा हो रहे हैं तो गलती कहीं केंद्र की

राजनीति की है जो ङ्क्षहदूङ्क्षहदू राग आलाप रही है और मुलसमानों को डराते हुए यह नहीं सोच पा रही थी कि यह शोर पंजाब के सोए खालिस्तानियों को भी जगा देगा. भारत दूसरे कई देशों के मुकाबले अच्छी शक्ल में है तो इसलिए कि यहां लोकतंत्र ने जड़े जमाई हुई हैं और आजादी के 75 साल में से ज्यादा ऐसी सरकारें रहीं जो धर्म से परे रहीं. भारतीय जनता पार्टी ने धाॢमक धंधों का फायदा उठा कर मंदिरों के इर्दगिर्द राजनीति तो चला ली और सत्ता पर कब्जा तो कर लिया पर भूल गर्ई कि मंदिर राजनीति दूसरे धर्मों को भी यही दोहराने के उकसाती है.

अब पंजाब के गुरूद्वारे फिर से राजनीति का गढ़ बनने लगे हैं और धीरेधीरे अमृतपाल ङ्क्षसह के पिछलग्गू गुरूद्वारों पर कब्जा करने लगे हैं या यूं कहिए कि गुरूद्वारों को चलाने वाले अमृतपाल ङ्क्षसह का खुल कर नही तो छिप कर साथ दे रहे हैं.

यह पंजाब के मजदूरों को दहशत में डालने वाली बात है क्योंकि ये मजदूर पूरी तरह ङ्क्षहदू अंधविश्वासों से भरे हैं. गरीब, अधपढ़े, अपने गांवों से, घरों से दूर रहने वाले मजदूर समझ नहीं पाते कि जिस मंदिर के पास वे अपनी मन्नते पूरी कराने जाते हैं उस के पास के गुरूद्वारों में दूसरे धर्म के लोग कुछ और कह रहे हैं. मंदिरों में होने वाली आमदनी पर सब की निगाहें रहती हैं और जब लगता है किमंदिर के सहारे पूरी सत्ता पर कब्जा किया जा सकता है तो जैसे रणजीत ङ्क्षसह के जमाने में इच्छा, गुरूद्वारों के सहारे वैसा क्यों नहीं हो सकता.

देश को आज अलगाव नहीं चाहिए आज कंधे और हाथ चाहिए जो अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान का मुकाबला कर सकें और अपना रहनसहन इन देशों की तरह का बना सकें. अगर हम अपनी ताकत धर्म के नाम खर्च करते रहेंगे तो हमारी हालत पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसी हो सकती है. हम ने बीज तो उस के बो रखे हैं पर लोकतंत्र का पेस्टीसाइड इन को फूटने नहीं दे रहा. जब भी लोकतंत्र कमजोर हुआ, क्या होगा कह नहीं सकते. यह पक्का है कि पंजाब में काम कर रहे दूसरे राज्यों के मजदूरों के लिए आफत हो सकती है.

Social Story: देशभर में बढ़ती बेरोजगारी की समस्या

Social Story: देश में नौकरियों की कितनी कमी है पर देश की सरकार को तो छोडि़ए. देश के मीडिया और देश की जनता तर्क को बढ़ती और परेशान करने वाली बेरोजगारी से कोर्ई फर्क नहीं पड़ रहा है. 2 छोटे मामलों में साफ होता है.

दिल्ली में बरसात से पहले डेंगू फैलाने वाले मच्छरों का पता करने का ठेका दिया जाता है इस साल कम से कम 3500 डोमेस्टिक ब्रीङ्क्षडग चैकर रखे जाते हैं. बरसात आने पर उन्हें हटा दिया जाता है. अब दिल्ली में ये सब सरकारी पैसे पाने वाले युवा कर्मचारी अचानक खाली होने पर हायहाय कर रहे हैं पर कोई सुन नहीं रहा क्योंकि इन के पास अगले 6-7 महीनों के लिए कोई काम होता ही नहीं. इन्हें भी जो स्विल आती है या इन्होंने काम पर सीखी होती है, वह सिर्फ मच्छरों के बारे में होती है.

इसी तरह दिल्ली बस सेवा में कौंट्रेक्ट पर रखे गए 1600 ड्राइवरों की नौकरी खत्म कर दी गई क्योंकि कंपनी का ठेका खत्म हो गया और नए टेंडर में किसे काम मिलेगा यह पता नहीं. इन ड्राइवरों को बसें चलानी ही आती हैं और आगे टेंडर के पास होने और अगली कंपनी के जम जाने तक इन को खाली रहना पड़ेगा.

इन दोनों तरह के काम करने वालों के पास और कोई अकल भी नहीं होती, न ही यह कुछ और सीखना चाहते हैं कि आड़े वक्त काम आ जाए गांवों से सीधे अब ये लोग आमतौर खाली बैठने के आदी होते है और 10-20 दिन खाली बैठ कर गांव लौट जाएंगे. वहां जो भी काम होगा करेंगे और जो थोड़ी आमदनी हो रही होगी उसी में बांटेंगे.यह समस्या देश भर में है. कहा जाता है कि देश में बेरोजगारी 8' है पर असल में ह कहीं ज्यादा है. बस इतना फर्क है कि इस देश का बेरोजगार बिना आदमनी रहने का आदी है, आधे पेट रह सकता है और सब से बड़ी बात है अपनी बुरी हालत के लिए अपने कर्मों को दोष देना जानता है.

लगातार नौकरी का इंतजाम करना किसी समाज के लिए बहुत मुश्किल नहीं है, अगर हर जवान 8-10 तरह के काम अच्छी तरह करना जानता हो, काम में तेज हो, निकम्मा और निठल्ला न हो तो देश में काम की कमी उस तरह न हो जिस तरह दिखती है और बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा के लाखों मजदूर दूसरे शहरों में काम करने के लिए जाए. अपने गांवों में काम करने से कतराने वाले मजदूरों को लगता है कि शहरों में ङ्क्षजदगी बेहतर है, काम आसानी से मिलेगा और सब से बड़ी बात है कि जाति और रीतिरिवाजों का बोझ नहीं होगा.

वे यह नहीं जानते कि शहरी लोगों के काम लगातार चलने वाले नहीं होते. शहरों में काम है पर उतने नहीं जितने सोचे जाते हैं. शहरों को इस तरह बसाया गया है और उन में व्यापार व उद्योग इस तरह के है कि वे इस्तेमाल करो और फेंक दो के सिद्धंात पर चलते हैं. मजदूर भी इसी गिनती में आते हैं.

डोमेस्टिक मीङ्क्षडग थ्रीङ्क्षडग चैकर या ड्राइवर कोई बड़ी कुशलता के काम नहीं और यदि इन मजदूरों के पास और हुनर होता तो 2 दिन भी खाली नहीं बैठना होता. सरकार से जुड़े काम करने में मौजमस्ती रहती है और कुछ ऊपरी आदमनी भी होती है इसलिए इन का लालच ज्यादा होता है. कम काम, पैसा ज्यादा और ऊपरी कमाई पर जब आग पूजापाठ का लपेटा लग जाए तो बेरोजगारी का खौफ तो रहेगा ही.

Sociopolitics: हकीकत-आदिवासी को गरीब रखने की चाल

Sociopolitics: 9अप्रैल, 2023 की सुबह मैं अपने एक ठेकेदार दोस्त के साथ भोपाल के अशोका गार्डन इलाके के चौराहे पर था. यह चौराहा मजदूरों के लिए मशहूर है. सुबह 7 बजे से मजदूर यहां जमा होने लगते हैं और 8-9 बजे तक पूरे इलाके में वही नजर आते हैं. कुछ झुंड बना कर खड़े रहते हैं, तो कुछ अकेले अलगथलग, जिस से आने वालों की नजर उन पर जल्दी पड़ सके.

ठेकेदार साहब मुझे समझाते रहे कि देखो, अभी ये लोग 500 रुपए मजदूरी दिनभर की मांगेंगे, लेकिन जैसे ही 10 बज जाएंगे, इन के भाव कम होते चले जाएंगे.

ठेकेदार को अपनी साइट पर काम करने के लिए 4-5 मजदूर चाहिए थे, लेकिन उन की निगाहें लगता था कि खास किस्म के मजदूरों को ढूंढ़ रही थीं. पूछने पर उन्होंने बताया कि वे आदिवासी मजदूरों को खोज रहे हैं, क्योंकि वे बहुत मजबूत, मेहनती और ईमानदार होते हैं. शहरी मजदूरों की तरह निकम्मे और चालाक नहीं होते, जिन्हें हर 2 घंटे बाद खानेपीने के लिए एक ब्रेक चाहिए. कभी उन्हें हाजत होने लगती है, तो कभी बीड़ीसिगरेट की तलब लग आती है. लंच भी वे लोग

2 घंटे तक करते रहते हैं. कुल जमा सार यह है कि शहरी मजदूरों से काम करा पाना आसान काम नहीं, क्योंकि वे कामचोर होते हैं.

फिर आदिवासी मजदूरों की खूबियां गिनाते हुए ठेकेदार बताने लगे कि वे कामचोरी नहीं करते और 200 रुपए की दिहाड़ी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं, जबकि शहरी मजदूर 400 रुपए से कम में हाथ भी नहीं रखने देते.

आदिवासी मजदूर को शाम को घर जाने के समय चायसमोसा खिला कर एक घंटे और काम कराया जा सकता है. और तो और लंच में उन्हें अचार और कटी प्याज के साथ सूखी रोटियां दे दो, तो वे एहसान मानते हुए मुफ्त में ऐक्स्ट्रा काम भी कर देते हैं.

इन ठेकेदार साहब की बातों और चौराहे का माहौल देख साफ हो गया कि आदिवासी वाकई में सीधे होते हैं और दुनियादारी से न के बराबर वाकिफ हैं. 400 रुपए का काम वे 200 रुपए में करने को तैयार हो जाते हैं, तो यह उन की मजबूरी भी है और जरूरत भी.

किराए की झुग्गी में रह रहे ऐसे ही एक गोंड आदिवासी परिवार से बात करने पर पता चला कि वे लोग बालाघाट से भोपाल काम की तलाश में आए थे और 6 महीने से बिल्डरों के यहां मजदूरी कर रहे हैं, लेकिन नकद जमापूंजी के नाम पर कुल 800 रुपए हैं.

पूछने पर 35 साल के जनकलाल धुर्वे ने बताया, ‘‘हम पतिपत्नी और विधवा मां मजदूरी करते हैं. मुझे रोज 300 और उन दोनों को 200-200 रुपए मिलते हैं. इन पैसों से जैसेतैसे गुजर हो जाती है, लेकिन पैसे बचते नहीं हैं. मेरे 2 बच्चे भी हैं, लेकिन स्कूल नहीं जाते, क्योंकि यहां कोई दाखिला देने को तैयार नहीं है.

‘‘हर स्कूल में बर्थ सर्टिफिकेट और आधारकार्ड और पक्का पता वगैरह मांगा जाता है. आधारकार्ड तो हमारे पास है, लेकिन दूसरे जरूरी कागजात नहीं हैं, जिस के चलते सरकारी स्कूल वाले यह कहते हुए टरका देते हैं कि वहीं बालाघाट जा कर बच्चों का एडमिशन किसी सरकारी स्कूल में करा दो.’’

लेकिन जनकलाल धुर्वे गांव वापस नहीं जाना चाहता, क्योंकि वहां काम ही नहीं है. और जो है भी, वह तकरीबन बेगार वाला है. दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद मुश्किल से 100 रुपए मिलते हैं. कभीकभार सरकारी योजना के तहत मुफ्त राशन मिल जाता है, पर उस का कोई ठिकाना नहीं और उस से हफ्तेभर ही पेट भरा जा सकता है.

इसलिए गरीब हैं

आदिवासियों के पास पैसा क्यों नहीं है और वे गरीब क्यों हैं? यह सवाल सदियों से पूछा जा रहा है, जिस का जवाब जनकलाल धुर्वे जैसे आदिवासियों की कहानी में मिलता है कि ये लोग पढ़ेलिखे नहीं हैं, जागरूक नहीं हैं, जरूरत के मारे हैं. और भी कई वजहें हैं, जिन के चलते इस तबके की माली हालत आजादी के 75 साल बाद भी बद से बदतर हुई है.

भोपाल के एक आदिवासी होस्टल में रह कर बीकौम के पहले साल की पढ़ाई कर रहे बैतूल के प्रभात कुमरे की मानें, तो आदिवासी बहुल इलाकों में शोषण बहुत है, लेकिन उस से निबटना कैसे है, यह कोई नहीं बताता.

हम आदिवासियों को ले कर खूब हल्ला मचता है, करोड़ों की योजनाएं बनती हैं, सरकार उन का खूब ढिंढोरा भी पीटती है, पर हकीकत में होताजाता कुछ नहीं है. आदिवासी तबका पहले से ज्यादा गरीब होता जा रहा है, क्योंकि उस के खर्चे बढ़ते जा रहे हैं और आमदनी कम हो रही है.

प्रभात कुमरे बहुत सी बातें बताते हुए आखिर में यही कहता है कि जो आदिवासी पढ़लिख कर सरकारी नौकरियों में लग गए हैं, वे ही चैन और सुकून से रह पा रहे हैं और उन्हीं के बच्चे अच्छा पढ़लिख पा रहे हैं. ऐसे लोग भी नौकरी मिलने के बाद अपने समाज की गरीबी दूर करने की कोई कोशिश या पहल नहीं करते हैं.

प्रभात कुमरे के मजदूर पिता जैसेतैसे उसे पढ़ा पा रहे हैं, क्योंकि उन के पास 2 एकड़ जमीन भी है. प्रभात कालेज पूरा करने के बाद किसी भी सरकारी महकमे में क्लर्क बन जाना चाहता है और यह आरक्षण के चलते उसे मुमकिन लगता है. इतने गरीब हैं

जनकलाल धुर्वे और प्रभात कुमरे की बातों से एक बात यह भी साफ हो जाती है कि पैसा गांवों में भी है और शहरों में भी है, लेकिन वह कम से

कम आदिवासियों के लिए तो बिलकुल नहीं है.

आदिवासियों के पास खेतीकिसानी की जमीन न के बराबर है और जो है, कागजों में वे उस के मालिक नहीं हैं. जिन जमीनों के पट्टे सरकारों ने आदिवासियों को दिए हैं, उन का रकबा इतना नहीं है कि वे आम किसानों की तरह उस से गुजर कर सकें.

मध्य प्रदेश में सब से ज्यादा कुल आबादी के 21 फीसदी आदिवासी हैं, जो तादाद में एक करोड़, 53 लाख के आसपास हैं. इस लिहाज से राज्य का हर 5वां आदमी आदिवासी है.

इन में से 85 फीसदी के आसपास खेतिहर मजदूर हैं, जो जंगलों में रह कर रोज कुआं खोद कर पानी पीने को मजबूर हैं. इन की आमदनी जान कर हैरत होती है कि इतने कम पैसों में ये गुजर कैसे कर लेते हैं.

कोई अगर यह सोचे कि भला धर्म, जाति और लिंग का आमदनी से क्या ताल्लुक, तो उसे एक रिपोर्ट पढ़ कर अपनी यह गलतफहमी दूर कर लेनी चाहिए.

दुनियाभर से भेदभाव दूर करने का बीड़ा उठाने वाली संस्था ‘औक्सफेम इंडिया’ की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सवर्णों की मासिक आमदनी एससी यानी दलित और एसटी यानी आदिवासियों से औसतन 5,000 रुपए ज्यादा है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक, शहरों में एससी और एसटी तबकों की नियमित कर्मचारियों की औसत कमाई 15,312 रुपए है, जबकि सामान्य तबके के लोगों की कमाई 20,346 रुपए है. यह फर्क तकरीबन 33 फीसदी है.

अगर दलित और आदिवासी अपना खुद का काम करते हैं, तो उन की औसत कमाई 10,533 रुपए रह जाती है, जबकि खुद का काम करने वाले सामान्य तबके के लोगों की कमाई उन से एकतिहाई ज्यादा यानी 15,878 रुपए महीना होती है.

यह रिपोर्ट उन दावों की कलई भी खोलती है, जिन के हल्ले के तहत यह माना जाता है कि आदिवासियों को तो सरकार मुफ्त के ब्याज पर खूब कर्ज देती है, जबकि रिपोर्ट खुलासा करती है कि खेतिहर मजदूर होने के बाद भी आदिवासियों को खेतीकिसानी का लोन आसानी से नहीं मिलता और जिन्हें जैसेतैसे मिल भी जाता है, तो वह सामान्य तबके के लोगों के मुकाबले एकचौथाई होता है.

ज्यादातर आदिवासियों के पास चूंकि जमीन के पक्के और पुख्ता कागज नहीं होते, इसलिए उन्हें सरकारी योजनाओं का फायदा भी नहीं मिल पाता. ‘कर्जमाफी’ या ‘किसान सम्मान निधि’ के हकदार ये लोग नहीं हो पाते.

पीढि़यों से वनोपज बीनबीन कर बेचने वाले आदिवासी अपनी मेहनत के वाजिब दाम कभी नहीं ले पाए. जो महुआ, चिरौंजी और तेंदूपत्ता ये लोग बीनते हैं, उस की बाजार में कीमत अगर एक रुपया होती है, तो इन्हें 15 पैसे ही मिलते हैं यानी दलाली सरकारी ही नहीं, बल्कि गैरसरकारी तौर पर भी इन की कंगाली की बड़ी वजह है. दूसरे, शराब की लत की भी कीमत आदिवासी चुका रहे हैं, जो इन से छूटती नहीं.

ऊपर बैठे हैं ऊंची जाति वाले

हकदार तो बहुत सी योजनाओं के लिए आदिवासी इसलिए भी नहीं हो पाते, क्योंकि नीचे से ले कर ऊपर तक इन से ताल्लुक रखते महकमों में वे ऊंची जाति वाले हिंदू विराजमान हैं, जो हमेशा से इन्हें हिकारत और नफरत से देखते आए हैं.

धर्म और समाज दोनों आदिवासियों को जानवरों से ज्यादा कुछ नहीं समझते. इन की बदहाली की वजह पिछले जन्म के कर्म माने जाते हैं, इसलिए ये ऊपर वाले और ऊपर वालों की ज्यादती के शिकार हमेशा से ही रहे हैं.

पटवारी से कलक्टर और उस से भी ऊपर के ओहदों पर सवर्ण अफसरों का दबदबा है. मिसाल मध्य प्रदेश की लें,

तो आदिवासी वित्त एवं विकास निगम में प्रबंध संचालक जैसे अहम पद पर 25 सालों से ज्यादातर सवर्ण और उन में भी ब्राह्मण अफसर काबिज हैं, जिन की दिलचस्पी आदिवासियों के न तो वित्त में है और न ही हित में है.

इन अफसरों को न तो जनकलाल धुर्वे जैसों को कम मिल रही मजदूरी से मतलब है और न ही ये प्रभात जैसे नौजवानों से कोई सरोकार रखते हैं, जिन्हें कभीकभी फीस भरने और खानेपीने तक के लाले पड़ जाते हैं.

इन अफसरों ने आदिवासियों की जिंदगी भी नजदीक से नहीं देखी होगी कि वे एकएक कागज के लिए दरदर सालोंसाल भटकते रहते हैं, लेकिन उन की कहीं भी सुनवाई नहीं होती.

रही बात आदिवासियों से ताल्लुक रखते महकमों की, तो हाल यह है कि घूसखोर मुलाजिम इन गरीबों का खून चूसने में खटमलों की तरह चूकते नहीं.

11 अप्रैल, 2023 को मध्य प्रदेश के ही रतलाम जिले के गांव भूतपाड़ा में एक पटवारी सोनिया चौहान ने रमेश नाम के एक आदिवासी को फर्जी पावती टिका दी और हैरत की बात यह कि उस के भी बतौर घूस एक लाख, 90 हजार रुपए झटक लिए.

कैसे सीधेसादे आदिवासी सरकारी सिस्टम, जिस पर सवर्णों का कब्जा है, की मार झेल रहे हैं और कैसे देशभर में सरकारी जमीनों को प्राइवेट करने का फर्जीवाड़ा फलफूल रहा है, यह इस मामले से भी उजागर होता है.

रमेश जब जमीन के खाते और खसरे की नकल लेने तहसील पहुंचा तो पता चला कि जो जमीन उस के नाम दर्ज की गई है, वह तो सरकारी निकल रही है. उस की शिकायत पर पटवारी साहिबा के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई है, जिस ने किस्तों में घूस लेने के अलावा रमेश से अपने घर मेहनतमजदूरी भी कराई थी.

प्रभात कुमरे की कही बात मानें, तो आदिवासियों के ज्यादातर काम सरकारी महकमों से ही होते हैं. लेकिन मजाल है कि ये बाबू और साहब लोग बिना रिश्वत लिए कोई काम कर दें. जाति प्रमाणपत्र बनवाने से ले कर किसी भी सरकारी योजना का फायदा बिना दक्षिणा चढ़ाए नहीं मिलता.

अशिक्षा है वजह

आदिवासी वित्त एवं विकास निगम के ही एक ऊंची जाति वाले क्लर्क की मानें, तो आदिवासी जब तक अशिक्षित रहेंगे, तब तक गरीब ही रहेंगे, क्योंकि वे अपने हक ही नहीं जानते, इसलिए कहीं भी ज्यादती का विरोध नहीं कर पाते. सरकार इन के भले की योजनाओं पर जो अरबों रुपए खर्च कर रही है, उस का

90 फीसदी तो घोटालों और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है. यहां यानी भोपाल से सरकार अगर पोल्ट्री फार्म उन्हें भेजती है, तो उन तक एक अंडा ही पहुंचता है और यह हकीकत नीचे से ऊपर तक सभी जानते हैं. मतलब, योजनाएं आदिवासियों के भले के लिए नहीं, बल्कि नेताओं, अफसरों और मुलाजिमों के कल्याण के लिए बनती हैं. अनपढ़ और अशिक्षित रहने से नुकसान क्या होते हैं, यह आदिवासियों को समझाने वाला कोई नहीं है, जिन के 99 फीसदी से भी ज्यादा नौजवान कालेज का मुंह नहीं देख पाते.

प्राइमरी स्कूलों में टीचरों का न जाना अब मीडिया के लिए भी हल्ला मचाने की बात नहीं रही, क्योंकि उन्होंने भी धर्म के शातिर ठेकेदारों की तरह मान लिया है कि आदिवासी ऐसे ही थे और ऐसे ही रहेंगे, इन के लिए आंसू बहाने से कोई फायदा नहीं.

Bihar Politics: बिहार में रिजर्व्ड सीटें

Bihar Politics: बिहार की राजनीति हमेशा से जातपांत, सामाजिक न्याय और राजनीतिक दलों की खींचतान पर टिकी रही है. चुनाव आते ही विकास के वादे किए जाते हैं, लेकिन नतीजे ज्यादातर जातीय समीकरणों और वोट बैंक पर ही तय होते हैं.

खासकर रिजर्व्ड सीटें यानी दलित और आदिवासी समाज के लिए सुरक्षित 40 विधानसभा सीटें चुनावी राजनीति का असली रणक्षेत्र होती हैं. इन्हीं सीटों पर जीतहार से तय होता है कि सत्ता की चाबी किस गठबंधन के हाथ में जाएगी.

साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों ने इस बात को साफ कर दिया था कि इन 40 सीटों की अहमियत कितनी खास है. उस चुनाव में राजग और महागठबंधन के बीच रिजर्व्ड सीटों पर बेहद करीबी मुकाबला हुआ था. यही वजह है कि साल 2025 के विधानसभा चुनावों की तैयारी में दोनों गठबंधन अपनी पूरी ताकत इन सीटों पर झांकने वाले हैं.

जातीय समीकरण की जड़ें

बिहार का राजनीतिक इतिहास सामाजिक न्याय और जातीय समीकरणों की राजनीति से गहराई से जुड़ा है. 70 के दशक के आखिर और 80 के दशक में जब कर्पूरी ठाकुर जैसे नेताओं ने पिछड़ों को रिजर्वेशन दिलाने की पहल की.

इस के बाद लालू प्रसाद यादव की अगुआई में 90 के दशक में ‘माय समीकरण’ (मुसलिमयादव) का नारा जोरदार तरीके से उभरा. इस दौरान दलित और अति पिछड़ा वर्ग भी इस राजनीति से जुड़ने लगे. दूसरी ओर, भाजपा और जद (यू) ने सवर्ण, अति पिछड़ा और दलित वोट बैंक को साधने की रणनीति अपनाई.

आज हालत यह है कि किसी भी चुनाव में यादव और मुसलिम वोटर महागठबंधन की बुनियाद बनते हैं, जबकि अति पिछड़े और सवर्ण वोट बैंक राजग के साथ रहते हैं. दलित और महादलित वोट बैंक को ले कर दोनों गठबंधनों में सब से ज्यादा खींचतान रहती है.

राजनीतिक अहमियत

बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में से 40 सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए रिजर्व्ड हैं. इन में 38 सीटें अनुसूचित जाति और 2 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व्ड हैं. इतिहास बताता है कि बिहार में सरकार बनाने की कुंजी अकसर इन सीटों से ही निकलती है.

साल 2010 का विधानसभा चुनाव : राजग ने इन सीटों पर भारी कामयाबी पाई थी.

साल 2015 का विधानसभा चुनाव : महागठबंधन (जद (यू), राजद और कांग्रेस) ने इन सीटों पर मजबूत पकड़ बनाई थी.

साल 2020 का विधानसभा चुनाव : राजग और महागठबंधन के बीच बेहद करीबी मुकाबला हुआ था.

साल 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव में इन 40 सीटों पर नतीजे चौंकाने वाले रहे. भाजपा को 11 सीटें मिलीं. जद (यू) को 7 सीटें मिलीं. राजग की सहयोगी वीआईपी पार्टी को 1 सीट. वहीं महागठबंधन में राजद को 9 सीटें. कांग्रेस को 2 सीटें. भाकपा (माले) को 10 सीटें. इस तरह राजग को कुल 19 सीटें मिलीं, जबकि महागठबंधन ने 21 सीटों पर कब्जा किया.

बिहार की राजनीति का असली संतुलन पिछड़ों और महादलितों पर टिका है. महादलित में पासवान, मुसहर, मांझ, भुइयां जैसी जातियां आती हैं. नीतीश कुमार ने महादलित को अलग पहचान दे कर योजनाओं का फायदा पहुंचाया.

अति पिछड़ा वर्ग में तकरीबन 110 जातियां इस वर्ग में आती हैं. राजग ने इन्हें संगठित करने में बड़ा रोल निभाया है.

पसमांदा मुसलिम में पिछड़े और दलित मुसलमान. राजद और कांग्रेस पर ज्यादा भरोसा करते हैं, लेकिन हाल के सालों में भाजपा ने भी इन के बीच पैठ बनाने की कोशिशें शुरू की हैं, पर इस का असर नहीं देखा जा रहा है.

दलित राजनीति की विरासत

रामविलास पासवान का नाम बिहार की दलित राजनीति में दर्ज है. लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के जरीए उन्होंने दलित वोट खासकर पासवान जाति के वोट को अपने तरफ कर लिया.

उन के न रहने के बाद चिराग पासवान ने दलित राजनीति को ‘मौडर्न’ अंदाज देने की कोशिश की है. साल 2020 में लोजपा (रामविलास) ने राजग से अलग हो कर चुनाव लड़ा था, लेकिन भाजपा से नजदीकियां बनाए रखीं. चिराग पासवान की पकड़ भी दलितों में पासवान जाति पर ही खास है. दूसरी दलित जातियां इन के साथ नहीं हैं.

राजग की रणनीति

एनडीए (भाजपा, जद (यू) और लोजपा) का टारगेट दलित और अति पिछड़ा वोट बैंक को मजबूत बनाए रखना है. भाजपा दलित समाज में ‘गांवगांव तक पहुंच’ बनाने पर काम कर रही है. जद (यू) ‘महादलित योजना’ और ‘आरक्षण के विस्तार’ के जरीए समर्थन जुटा रही है.

चिराग पासवान का युवा और आक्रामक तेवर राजग के लिए दलित नौजवानों में आकर्षण पैदा कर सकता है खासकर पासवान जाति तो पूरी मुस्तैदी से इन के साथ है.

महागठबंधन की रणनीति

महागठबंधन (राजद, कांग्रेस और वाम दल) का आधार यादव और मुसलिम वोट बैंक है. लेकिन सत्ता तक पहुंचने के लिए इन्हें दलित और अति पिछड़े वोटों की भी जरूरत है.

तेजस्वी यादव की अगुआई में राजद दलितों को ‘समान अवसर’ और ‘नौकरीरोजगार’ का वादा कर रही है.

माकपा (माले) गांवदेहात में दलितमजदूर वर्ग को संगठित कर रही है. कांग्रेस फिर से अपने परंपरागत दलित वोट बैंक को वापस लाने की कोशिश में है.

बिहार विधानसभा की 40 रिजर्व्ड सीटें केवल चुनावी गणित का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये समाजशास्त्रीय और राजनीतिक संघर्ष की धुरी हैं.

राजग और महागठबंधन दोनों को पता है कि इन सीटों पर मिली कामयाबी ही सरकार बनाने की कुंजी होगी. साल 2025 का चुनाव दलितपिछड़े समाज की आवाज से यह तय करेगा कि बिहार किस दिशा में आगे बढ़ेगा. Bihar Politics

कांग्रेस को सीख बड़े काम के हैं छोटे चुनाव

उत्तर प्रदेश की 9 विधानसभा सीटों के उपचुनाव में कांग्रेस ने किसी सीट पर चुनाव नहीं लड़ा. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन है, जिस को ‘इंडिया ब्लौक’ के नाम से जाना जाता है. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में सपाकांग्रेस गठबंधन ने 43 सीटें जीती थीं, जिन में से सपा को 37 और कांग्रेस को 6 सीटें मिली थीं.

9 विधानसभा सीटों के उपचुनाव अलीगढ़ जिले की खैर, अंबेडकरनगर की कटेहरी, मुजफ्फरनगर की मीरापुर, कानपुर नगर की सीसामऊ, प्रयागराज की फूलपुर, गाजियाबाद की गाजियाबाद, मिर्जापुर की मझवां, मुरादाबाद की कुंदरकी और मैनपुरी की करहल विधानसभा सीटें शामिल हैं.

उत्तर प्रदेश की इन 9 विधानसभा सीटों पर साल 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने सब से ज्यादा 4 सीटें जीती थीं. भाजपा ने इन में से 3 सीटें जीती थीं. राष्ट्रीय लोकदल और निषाद पार्टी के एकएक उम्मीदवार इन सीटों पर विजयी हुए थे. कानपुर नगर की सीसामऊ सीट साल 2022 में यहां से जीते समाजवादी पार्टी के इरफान सोलंकी को अयोग्य करार दिए जाने से खाली हुई थी.

समाजवादी पार्टी ने सभी 9 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं. कांग्रेस पहले इस चुनाव में 5 सीटों को अपने लिए मांग रही थी. समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के लिए महज 2 सीटें छोड़ी थीं. कांग्रेस ने मनमुताबिक सीट नहीं मिलने के चलते उपचुनाव न लड़ने का फैसला लिया. उत्तर प्रदेश के कांग्रेस प्रभारी अविनाश पांडेय ने साफ कहा कि कांग्रेस पार्टी चुनाव नहीं लड़ेगी.

अविनाश पांडेय ने कहा कि आज सब दलों को मिल कर संविधान को बचाना है. अगर भाजपा को नहीं रोका गया, तो आने वाले समय में संविधान, भाईचारा और आपसी सम?ा और भी कमजोर हो जाएगी.

हरियाणा की हार से कांग्रेस में निराशा का माहौल है. राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं. उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में कांग्रेस हार जाती, तो उन के लिए एक और मुश्किल खड़ी हो जाती.

नरेंद्र मोदी और भाजपा से लड़ने के लिए कांग्रेस अपनी जमीन छोड़ती जा रही है, जिस का असर आने वाले समय पर पड़ेगा खासकर हिंदी बोली वाले इलाकों में, जहां पर कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है, वहां कांग्रेस को कोई चुनाव छोटा सम?ा कर छोड़ना नहीं चाहिए.

केवल विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ने से ही काम नहीं चलने वाला है. कांग्रेस को अगर अपने को मजबूत करना है, तो उसे पंचायत चुनाव और शहरी निकाय चुनाव भी लड़ने पड़ेंगे, तभी उस का संगठन मजबूत होगा और बूथ लैवल तक कार्यकर्ता तैयार हो सकेंगे.

मजबूत करते हैं छोटे चुनाव पंचायत और शहरी निकाय के चुनाव हर 5 साल में पंचायती राज कानून के तहत होते हैं. इन में जातीय आरक्षण और महिला आरक्षण दोनों शामिल हैं. इन चुनाव में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण दिया गया है.

पंचायती राज कानून प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय में साल 1984 में लागू हुआ था. पंचायत और निकाय चुनाव विधानसभा और लोकसभा चुनाव की नर्सरी जैसे हैं.

राजनीति में नेताओं की पौध पहले छात्रसंघ चुनावों से तैयार होती थी. आज के नेताओं में तमाम नेता ऐसे हैं, जो छात्रसंघ चुनाव से आगे बढ़ कर नेता बने. इन में वामदल और कांग्रेस दोनों शामिल हैं. छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगने के बाद से पंचायत और निकाय चुनाव राजनीति की नर्सरी बन गए हैं.

कांग्रेस ने पिछले कुछ सालों से पंचायत और निकाय चुनाव में गंभीरता से लड़ना बंद कर दिया है, जिस के चलते उन का संगठन बूथ लैवल तक नहीं पहुंच रहा और नए नेताओं की पौध भी वहां तैयार नहीं हो पा रही है. पंचायत चुनाव और शहरी निकाय चुनाव का माहौल विधानसभा और लोकसभा चुनाव जैसा होने लगा है.

पंचायत चुनावों में राजनीतिक दल अपनी पार्टी के चिह्न पर चुनाव भले ही नहीं लड़ते हैं, लेकिन उन्हें किसी न किसी पार्टी का समर्थन होता है. शहरी निकाय चुनाव पार्टी के चिह्न पर लड़े जाते हैं.

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने पंचायत चुनाव की अहमियत को सम?ा और साल 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को जो कामयाबी मिली, उसे रोकने के लिए पूरे दमखम से पंचायत और विधानसभा चुनाव लड़ कर साल 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को रोकने में कामयाबी हासिल कर ली.

पश्चिम बंगाल की 63,229 ग्राम पंचायत सीटों में से तृणमूल कांग्रेस ने 35,359 सीटें जीती थीं. वहीं दूसरे नंबर पर रही भाजपा ने 9,545 सीटों पर जीत हासिल की थी.

ममता बनर्जी ने पंचायत चुनाव के जरीए ही 16 साल पहले राज्य में अपनी पार्टी को मजबूत किया और विधानसभा चुनाव जीते थे. वहां से ही लोकसभा चुनाव में कामयाबी हासिल कर के पश्चिम बंगाल से कांग्रेस और वामदलों को राज्य से बेदखल कर दिया.

दूसरे राज्यों को देखें, तो जिन दलों ने पंचायत और निकाय चुनाव लड़ा, वे राज्य की राजनीति में असरदार साबित हुए. उत्तर प्रदेश और बिहार में समाजवादी पार्टी और राजद दोनों ही पंचायत चुनावों में सब से प्रभावी ढंग से हिस्सा लेती है, जिस की वजह से विधानसभा और लोकसभा चुनाव में भी सब से प्रमुख दल के रूप में चुनाव मैदान में होते हैं.

उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में जिला पंचायत सदस्य की 3,050 सीटें हैं. 3,047 सीटों पर हुए चुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच था. भाजपा ने 768 और सपा ने 759 सीटें जीती थीं.

साल 2021 में उत्तर प्रदेश में हुए ग्राम पंचायत चुनाव में 58,176 ग्राम प्रधानों सहित 7 लाख, 31 हजार, 813 ग्राम पंचायत सदस्यों ने जीत हासिल की थी. वैसे तो ये चुनाव पार्टी चुनाव चिह्न पर नहीं लड़े गए थे, लेकिन ब्लौक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्षों के चुनाव में क्षेत्र विकास समिति और जिला पंचायत सदस्य के साथ ग्राम प्रधान और पंचायत सदस्य वोट देते हैं. ऐसे में हर पार्टी ज्यादा से ज्यादा अपने लोगों को यह चुनाव जितवाना चाहती है.

पंचायत चुनाव की ही तरह से शहरी निकाय चुनाव होते हैं. इन चुनावों में पार्टी अपने उम्मीदवार खड़े करती हैं. इस में पार्षद, नगरपालिका, नगर पंचायत और मेयर का चुनाव होता है.

उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में कुल 17 नगरनिगम यानी महापालिका, 199 नगरपालिका परिषद और 544 नगर पंचायत हैं. इन सभी के चुनाव स्थानीय निकाय चुनाव होते हैं. नगरनिगम सब से बड़ी स्थानीय निकाय होती है, उस के बाद नगरपालिका और फिर नगर पंचायत का नंबर आता है.

पंचायत चुनाव और निकाय चुनाव खास इसलिए भी होते हैं, क्योंकि ये कार्यकर्ताओं के चुनाव होते हैं, जो पार्टियों को लोकसभा और विधानसभा जिताने में खास रोल अदा करते हैं. यहां कार्यकर्ता और उम्मीदवार दोनों को अपने वोटरों का पता होता है.

देखा यह गया है कि पंचायत और निकाय चुनावों में जिस पार्टी का दबदबा होता है, लोकसभा या विधानसभा चुनावों में उस के अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद भी बढ़ जाती है.

बात केवल उत्तर प्रदेश की ही नहीं है, बल्कि बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली का भी यही हाल है. जिस प्रदेश में जो पार्टी पंचायत और निकाय चुनाव में मजबूत होती है, वह विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में भी अच्छा प्रदर्शन दिखाती है. उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल इस के सब से बड़े उदाहरण हैं. यहां भाजपा और तृणमूल कांग्रेस ने पंचायत चुनाव में सब से अच्छा प्रदर्शन किया था, तो विधानसभा और लोकसभा में भी उन का अच्छा प्रदर्शन रहा है.

बिहार में 8,053 ग्राम पंचायतें हैं, जबकि यहां गांवों की संख्या 45,103 हैं. मध्य प्रदेश के 52 जिलों में 55,000 से ज्यादा गांव हैं. 23,066 ग्राम पंचायतें हैं.

राजस्थान में 11,341 ग्राम पंचायतों के चुनाव है. वहां इन चुनाव की बड़ी राजनीतिक अहमियत है. विधानसभा चुनाव के बाद जनता की सब से ज्यादा दिलचस्पी इन चुनावों में होती है. राजस्थान और हरियाणा में सरपंच यानी मुखिया की बात की अहमियत उत्तर प्रदेश और बिहार से ज्यादा है. इस की सब से बड़ी वजह यह है कि राजस्थान और हरियाणा में खाप पंचायतों का असर रहा है. पंचायती राज कानून लागू होने के बाद खाप पंचायतों का असर खत्म हुआ और वहां चुने हुए मुखिया यानी सरपंच का असर होने लगा.

छोटे चुनावों का बड़ा आधार

पंचायत चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण होने के चलते अब महिलाएं यहां मुखिया बनने लगी हैं. बहुत सारे पुरुष समाज को यह मंजूर नहीं था, लेकिन मजबूरी में सहन करना पड़ता है. एक ग्राम पंचायत में 7 से 17 सदस्य होते हैं. इन को गांव का वार्ड कहा जाता है. इस के चुने हुए सदस्य को पंच कहा जाता है.

पंचायत चुनाव में जनता 4 लोगों का चुनाव करती है. इन में प्रधान या सरपंच या मुखिया के नाम से जाना जाता है. इस के बाद पंच के लिए वोट पड़ता है. तीसरा वोट क्षेत्र पंचायत समिति और चौथा जिला पंचायत सदस्य के लिए होता है.

छोटे चुनाव का बड़ा आधार होता है. इस की 2 बड़ी वजहें हैं. पहली यह कि यहां चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार और वोटर के बीच जानपहचान सी होती है. फर्जी वोट और वोट में होने वाली गड़बड़ी को पकड़ना आसान होता है. इन चुनावों में आरक्षण होने के चलते हर जाति के वोट लेने पड़ते हैं. ऐसे में सभी को बराबर का हक देना पड़ता है.

यहां पार्टी की नीतियां नहीं चलती हैं. ऐसे में जो अच्छा उम्मीदवार होता है, वह चुनाव जीत लेता है. यह उम्मीदवार अगर विधानसभा और लोकसभा चुनाव तक जाएगा, तो चुनावी राजनीति की दिशा में बदलाव होगा.

‘ड्राइंगरूम पौलिटिक्स’ से चुनाव को जीतना आसान नहीं होता है. पंचायत और निकाय चुनाव लड़ने वाले नेता को मेहनत करने की आदत होती है. वह पार्टी के लिए मेहनत करेगा. कांग्रेस के लिए जरूरी है कि वह छोटे चुनावों की बड़ी अहमियत को समझे.

ज्यादा से ज्यादा तादाद में ज्यादा से ज्यादा चुनाव लड़ना कांग्रेस की सेहत को ठीक करने का काम करेगा. इस से गांवगांव, शहरशहर बूथ लैवल पर उस के पास कार्यकर्ताओं का संगठन तैयार होगा, जो विधानसभा और लोकसभा चुनाव को जीतने लायक बुनियादी ढांचा तैयार कर सकेगा.

नौजवानों में बढ़ रहा चुनावों का आकर्षण

जिस तरह से छात्रसंघ चुनाव लड़ने के लिए कालेज में पढ़ने वाले नौजवान पहले उतावले रहते थे, अब वे पंचायत और निकाय का चुनाव लड़ने के लिए तैयार रहते हैं.

पिछले 10 सालों को देखें, तो हर राज्य में औसतन 60 फीसदी पंचायत चुनाव लड़ने वालों की उम्र 40 साल से कम रही है. इन में से कई ने अपने कैरियर को छोड़ कर चुनाव लड़ा और जीते. कांग्रेस इन नौजवानों के जरीए राजनीति में बड़ी इबारत लिख सकती है. ये नौजवान जाति और धर्म से अलग हट कर राजनीति करते हैं.

प्रयागराज के फूलपुर विकासखंड के मुस्तफाबाद गांव के रहने वाले आदित्य ने एमबीए जैसी प्रोफैशनल डिगरी लेने के बाद नौकरी नहीं की, बल्कि अपने गांव की बदहाली को ठीक करने की ठानी. अपने अंदर एक जिद पाली कि गांव में ही बेहतर करेंगे. यहां की दशा सुधार कर ही दम लेंगे.

गांव में बिजली नहीं थी, तो आदित्य ने खुद के पैसे से विद्युतीकरण करा दिया. गांव में बिजली आई, तो सभी आदित्य के मुरीद हो गए. उसे अपना मुखिया चुनने का मन बनाया. आदित्य ने चुनाव जीत कर प्रयागराज के सब से कम उम्र के ग्राम प्रधान बनने में कामयाबी हासिल की.

हरियाणा पंचायत चुनाव में 21 साल की अंजू तंवर सरपंच बनीं. अंजू खुडाना गांव की रहने वाली हैं. खुडाना गांव के सरपंच की सीट महिला के लिए आरक्षित थी. गांव की ही बेटी अंजू तंवर को चुनाव लड़ाने का फैसला किया गया.

खुडाना गांव की आबादी तकरीबन 10,000 है. तकरीबन 3,600 वोट चुनाव के दौरान डाले गए थे, जिन में से सब से ज्यादा 1,300 वोट अंजू तंवर को मिले थे. अंजू के परिवार से कोई भी राजनीति में नहीं है. वे अपने परिवार से राजनीति में आने वाली पहली सदस्य हैं.

मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में निर्मला वल्के सब से कम उम्र की सरपंच बनी हैं. स्नातक की पढ़ाई करने के दौरान उन्होंने परसवाड़ा विकासखंड की आदिवासी ग्राम पंचायत खलोंडी से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. आदिवासी समाज से एक छात्रा को पढ़ाई की उम्र में गांव की सरपंच बनना समाज व गांव की जागरूकता का ही हिस्सा कहा जा सकता है.

पूरे देश में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जहां नौजवानों ने पंचायत और निकाय चुनाव में जीत हासिल की है. ऐसे में नौजवान चेहरों को आगे लाने में कांग्रेस अहम रोल अदा कर सकती है.

कांग्रेस जाति और धर्म की राजनीति में फिट नहीं हो पाती है. पंचायत और निकाय चुनाव में जाति और धर्म का असर कम होता है. ऐसे में अगर इन चुनाव में कांग्रेस लड़े और नौजवानों को आगे बढ़ाए, तो देश की राजनीति से जाति और धर्म को खत्म करने मे मदद मिल सकेगी.

इस से कांग्रेस का अपना चुनावी ढांचा मजबूत होगा. छोटे चुनावों को कमतर आंकना ठीक नहीं होता है. जब कांग्रेस ताकतवर थी, तब वह इन चुनावों को लड़ती और जीतती थी.

पूरे देश में कांग्रेस अकेली ऐसी पार्टी है, जो भाजपा को रोक सकती है. इस के लिए उसे अपने अंदर बदलाव और आत्मविश्वास को बढ़ाना होगा. इस के लिए छोटे चुनाव बड़े काम के होते हैं.

सलमान के बाद बिहार के पप्पू यादव पर क्यों मंडराया लौरेंस बिश्नोई को खौफ

सलमान खान (Salman khan) पर लोरेंश बिश्नोई गैंग (Lawerence bishnoi gang) का खतरा मंडरा रहा था. उनको एक बार फिर से जान से मारने की धमकियां मिल रही थी. इसी बीच बिहार के बाहुबली नेता कहे जाने वाला पूर्णिया सांसद पप्पू यादव(Pappu Yadav) भी इन धमकियों का शिकार हो रहे है. पप्पू यादव को भी लोरेंस गैंग की तरफ से लिख कर धमकियां मिल रही है. जिसकी शिकायत भी पुलिस में दर्ज हुई है. हालांकि, सलमान खान से लोरेंस की धमकियां का कारण तो सभी मीडिया खबरों में वायरल है. लेकिन पप्पू यादव तक ये गैंग कैसे पहुंचा जानते है.

दरअसल, पप्पू यादव का खुद कहना है कि मुझे लोरेंस गैंग से धमकियां मिल रही हैं और मेरी हत्या हो जाती है तो इसकी जिम्मेदार सरकार होगी. पप्पू ने हर जिले में अपने लिए पुलिस एस्कोर्ट और कार्यक्रम स्थल पर सुरक्षा टाइट करवा दी है. लेकिन एक नेता होने के कारण उन्होंने लोरेंस बिश्नोई गैंग की लगातार दे रहे अंजामों पर गौर किया और इसके विरोध में उतरे. उन्होंने कहा कि मैं एक राजनीतिक व्यक्ति होने के कारण लोरेंस बिश्नोई का विरोध करता हूं. जिस कारण से लौरेंस ने मुझे भी धमकी भरे खत लिख कर मुझे जान से मारने की धमकी दी है. इतना ही नहीं ये धमकियां मोबाइल से भी दी गई है.

हालांकि, दिल्ली पुलिस में ये सब शिकायतों को दर्ज कराया गया है. शिकायत कनौट प्लेस थाने में दर्ज हुई है. एक शिकायत में यह दावा भी किया गया है कि शिकायत कराने वाले यादव के निजी सहायक (पीए) मोहम्मद सादिक आलम है जिन्होंने बताया है कि बृहस्पतिवार को उनके मोबाइल फोन पर दो संदेश आए, जिनमें भेजने वाले ने खुद को बिश्नोई गिरोह का मेंबर बताया और कहा कि वे यादव को जान से मार देंगे.

सुरक्षो हो टाइट

पप्पू यादव ने गृह मंत्रालय से ‘जेड’ श्रेणी की सुरक्षा देने की मांग की है. पप्पू का कहना था कि अभी मुझे ‘वाई’ श्रेणी की सुरक्षा दी जा रही है. लेकिन लगातार धमकियां मिलने से जान को खतरा ज्यादा है. सिक्योरिटी को ओर टाइट करना चाहिए. पप्पू ने चिट्ठी में यह भी बताया कि इससे पहले भी मुझ पर और मेरे परिवार के सदस्यों पर हमला हुआ है. पप्पू यादव के मुताबिक धमकी देने वाले ने दावा किया है कि लोरेंस बिश्नोई जेल से ही पप्पू यादव से बात करने की कोशिश कर रहा है.

बताते चले की सांसद पप्पू यादव के निवास अर्जुन भवन को उड़ाने की धमकी मिली थी. इन धमकियों के पीछे लोरेंस बिश्नोई गैंग का ही नाम सामने आया था. हालांकि, पुलिस की जांच के दौरान कुछ और ही कहानी निकली. पूर्णिया पुलिस के मुताबिक, यह लेटर फर्जी निकला. पूर्णिया के एसपी ने बताया कि पप्पू यादव को जितनी भी धमकियां मिली हैं, उन्हें पुलिस गंभीरता से ले रही है. लेकिन, सांसद के निवास को उड़ाने का मामला फर्जी पाया गया है.

हालांकि पुलिस की जांच के दौरान कुछ और ही कहानी निकली. पूर्णिया पुलिस के मुताबिक, यह लेटर फर्जी है. पूर्णिया के एसपी बताया कि पप्पू यादव को जितनी भी धमकियां मिली हैं, उन्हें पुलिस गंभीरता से ले रही है.

पप्पू यादव की पार्टी और उनकी पत्नी

राजेश रंजन जिन्हें ‘पप्पू यादव’ के नाम से जाना जाता है. एक राजनीतिज्ञ हैं. इनका जन्म 24 दिसंबर 1969 को हुआ. इन्होंने बिहार के कई निर्वाचन क्षेत्रों से निर्दलीय चुनाव जीते है. पप्पू यादव 2015 में ‘सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले’ सांसदों में से एक बने वर्तमान में जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.इन्होंने आम चुनावों में शरद यादव को हराया है. उनकी पत्नी रंजीत रंजन सुपौल से भी सांसद थीं, लेंकिन 2019 के आम चुनाव में जद(यू) से हार गईं थी. बता दें कि पप्पू यादव को राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी है.

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की रणनीति चारों खाने चित

भा रतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की सत्ता आने के बाद जिस तरह से जम्मूकश्मीर और वहां की अवाम को दर्द ही दर्द मिला है, क्या उसे कोई भूल सकता है? यहां तक कि नागरिकों के अधिकार नहीं रहे और बंदूक के साए में अब देश की सब से बड़ी अदालत के आदेश के बाद चुनाव होने जा रहे हैं. यह एक ऐसा रास्ता है, जो लोकतांत्रिक की मृग मरीचिका का आभास देता है.

मगर सितंबर, 2024 में होने वाले विधानसभा चुनाव की जो रणनीति कांग्रेस बना रही है, उस में नरेंद्र मोदी और अमित शाह का पूरा खेल बिगड़ता दिखाई दे रहा है. भाजपा किसी भी हालत में यहां सत्ता में आती नहीं दिखाई दे रही है, जिस का आगाज लोकसभा चुनाव में भी नतीजे के रूप में हमारे सामने है.

इधर, फारूक अब्दुल्ला ने जिस तरह सामने आ कर मोरचा संभाला है और  विधानसभा चुनाव लड़ने की रणनीति बनाई है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी की रणनीति चारों खाने चित हो चुकी है.

कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी श्रीनगर पहुंचे थे. मल्लिकार्जुन खड़गे ने जम्मूकश्मीर के आगामी विधानसभा चुनाव के लिए दूसरे विपक्षी दलों के साथ गठबंधन करने की इच्छा जताई और केंद्रशासित प्रदेश के लोगों से भारतीय जनता पार्टी के वादों को ‘जुमला’ करार दिया.

मल्लिकार्जुन खड़गे ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के साथ श्रीनगर में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं से विधानसभा चुनावों की जमीनी स्तर की तैयारियों के बारे में जानकारी ली. उन्होंने कहा कि ‘इंडी’ गठबंधन ने एक तानाशाह को पूरे बहुमत के साथ (केंद्र में) सत्ता में आने से रोका है. यह गठबंधन की सब से बड़ी कामयाबी है. कांग्रेस ने राज्य का दर्जा बहाल करने की पहल की है. हम इस दिशा में काम करने का वादा करते हैं. राहुल गांधी की जम्मूकश्मीर में चुनाव से पहले गठबंधन बनाने में दिलचस्पी है. वे दूसरी पार्टियों के साथ मिल कर चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं.

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आगे कहा कि दरअसल, भाजपा लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद चिंतित है, क्योंकि वे लोग जिन विधेयकों को पास कराना चाहते थे, उन में करारी मात मिली है.

पूर्ण राज्य का दर्जा

कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के श्रीनगर दौरे से राजनीति में एक गरमाहट आ गई है. राहुल गांधी ने कहा कि जम्मूकश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करना कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन ‘इंडी’ की प्राथमिकता है. यह उन की पार्टी का लक्ष्य है कि जम्मूकश्मीर और लद्दाख के लोगों को उन के लोकतांत्रिक अधिकार वापस मिलें.

कांग्रेस और ‘इंडी’ गठबंधन की प्राथमिकता है कि जम्मूकश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा जल्द से जल्द बहाल किया जाए. हमें उम्मीद थी कि चुनाव से पहले ऐसा कर दिया जाएगा, लेकिन चुनाव घोषित हो गए हैं. हम उम्मीद कर रहे हैं कि जल्द से जल्द पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा और जम्मूकश्मीर के लोगों के अधिकार बहाल किए जाएंगे.

आजादी के बाद यह पहली बार है कि कोई राज्य केंद्रशासित प्रदेश बन गया है. यहां कोई विधानपरिषद, कोई पंचायत या नगरपालिका नहीं है. लोगों को लोकतंत्र से दूर रखा गया है.

मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 30 सितंबर तक चुनाव कराने के निर्देश के चलते ही जम्मूकश्मीर में विधानसभा चुनाव की घोषणा की गई है.

चुनाव से पहले जम्मूकश्मीर के लोगों से किया गया एक भी वादा पूरा नहीं किया गया है. कुलमिला कर कांग्रेस नेताओं ने जिस तरह जम्मूकश्मीर में मोरचाबंदी की है, उस से नरेंद्र मोदी और अमित शाह के मनसूबे ध्वस्त होंगे, ऐसा लगता है.

फारूक अब्दुल्ला और कांग्रेस

जम्मूकश्मीर में जो नए राजनीतिक समीकरण बन रहे हैं, उन से साफ दिखाई दे रहा है कि फारूक अब्दुल्ला, जो जम्मूकश्मीर के सब से बड़े नेता और चेहरे हैं, ने कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है और यह गठबंधन अगर बन जाता है, तो इस की सरकार बनने की पूरी संभावना है, क्योंकि इन के सामने सारे नेता बौने हैं. वहीं राहुल गांधी और ‘इंडी’ गठबंधन का अब समय आ गया है, यह दिखाई देता है.

यहां चुनाव 18 सितंबर, 25 सितंबर और 1 अक्तूबर को होंगे. नतीजे 4 अक्तूबर को घोषित किए जाएंगे.

फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि कांग्रेस के साथ मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (माकपा) के (एमवाई) तारिगामी भी हमारे साथ हैं. मुझे उम्मीद है कि हमें लोगों का साथ मिलेगा और हम लोगों

के जीवन को बेहतर बनाने के लिए भारी बहुमत से जीतेंगे. इस के पहले राहुल गांधी ने भरोसा दिया था कि जम्मूकश्मीर के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करना कांग्रेस और ‘इंडी’ गठबंधन की प्राथमिकता है.

फारूक अब्दुल्ला ने उम्मीद जताई कि सभी ताकतों के साथ पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा. राज्य का दर्जा हम सभी के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है. इस का हम से वादा किया गया है. इस राज्य ने बुरे दिन देखे हैं और हमें उम्मीद है कि इसे पूरी शक्तियों के साथ बहाल किया जाएगा. इस के लिए हम ‘इंडी’ गठबंधन के साथ एकजुट हैं.

महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने आया है कि चुनाव से पहले या चुनाव के बाद गठबंधन में महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली पीडीपी की मौजूदगी से भी नैशनल कौंफ्रैंस के नेता फारूक अब्दुल्ला ने इनकार नहीं किया है.

देसी नेताओं का सूटबूट में लुक्स है वायरल, टशन दिखाने में नहीं है किसी से कम

भारत में एक से बढ़ कर एक नेता हैं. कई तो यंग हैं, जो आज भी बिलकुल उसी तरह के कपड़े पहनना पसंद करते हैं, जो कभी आजादी के वक्त पहने जाते थे. ज्यादातर नेताओं की पोशाक अमूमन देसी ही देखी गई है, लेकिन अब ऐसा नहीं है, क्योंकि कई नेता काफी स्टाइलिश हैं और सूटबूट पहना करते हैं.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sarassalil (@sarassalil_magazine)

रवि किशन

रवि किशन, जो गोरखपुर से भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं, का असल लुक काफी बदला है. पहले वे बिना दाढ़ीमूंछों के हंसमुख चेहरे के लिए जाने जाते थे, लेकिन अब वे घनी दाढ़ीमूंछों के साथ एक गंभीर लुक में नजर आते हैं. साथ ही, उन्हें हर तरह के स्टाइलिश लुक में भी देखा गया है. वे कभी देसी अवतार में नजर आते हैं, तो कभी सूटबूट के साथ, लेकिन ज्यादातर चुनावी दौर में उन्हें देसी लिबास में ही देखा गया है.

तेजस्वी सूर्या

तेजस्वी सूर्या, जो बैंगलुरु दक्षिण से भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं, का लुक काफी आकर्षक और युवा है. वे अकसर औफिशियल कपड़ों में नजर आते हैं, जैसे कि सूट और टाई, जो उन का पहनावा है. उन के बाल छोटे हैं  और वे अकसर बिना दाढ़ीमूंछों के साफसुथरे लुक में दिखते हैं. तेजस्वी सूर्या देसी लिबास में बेहद कम नजर आते हैं.

चंद्रशेखर आजाद

चंद्रशेखर आजाद का लिबास उन के क्रांतिकारी जीवन का प्रतीक है. वे अकसर धोतीकुरता पहनते हैं, जो उस समय के भारतीय ग्रामीण और साधारण लोगों की एक पहचान है. उन के पहनावे में सादगी और भारतीयता की झलक मिलती है. लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्हें कभी सूटबूट में नहीं देखा गया है. वे सूटबूट के भी शौकीन रहे हैं.

चिराग पासवान

चिराग पासवान भी उन नेताओं की लिस्ट में आते हैं, जो देसी लिबास कैरी करने में बिलकुल नहीं शरमाते हैं. हालफिलहाल में चिराग पासवान ने एक इवैंट में अपने देसी लुक से सब का ध्यान खींचा था. उन्होंने ब्लैक शेरवानी पहनी थी, जिस में ग्रे धागों से कढ़ाई की गई थी. इस लुक में उन्होंने हील वाले ब्लैक लेदर के शूज और गोल्डन रिंग्स पहनी थीं. उन की यह ट्रैडिशनल आउटफिट और बियर्ड लुक उन्हें काफी हैंडसम और डैशिंग दिखा रहा था. इस के अलावा कई दफा चिराग पासवान सूटबूट में भी नजर आ चुके हैं.

अखिलेश यादव

अखिलेश यादव का लुक अकसर चर्चा में रहता है खासकर जब वे पब्लिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं. वे टोपी के साथ देसी लुक में दिखाई देते हैं. उन का पहनावा आमतौर पर सफेद कुरतापाजामा और लाल टोपी का होता है, जो समाजवादी पार्टी का प्रतीक है. यह लुक उन्हें एक पहचान देता है और उन के समर्थकों के बीच काफी लोकप्रिय बनाता है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें