Hindi Love Crime Story : फांस

Hindi Love Crime Story. ‘‘अरे, मुझे  दुकान जाने में देर हो रही है. खाना तैयार हुआ कि नहीं?’’ रमेश की बात का कोई जवाब उन की पत्नी लीला दे पातीं, इस से पहले ही फोन जोर से घनघनाया. फोन पर बात करती लीला को बीच में टोकने के लिए जैसे ही रमेश उन के पास पहुंचे, तो उन के चेहरे पर आनेजाने वाले भावों को देख कर चुप हो गए. लीला के चेहरे पर घबराहट साफ दिख रही थी.

फोन रख माथे पर आई पसीने की बूंदों को अपने पल्लू से पोंछते हुए लीला बोलीं, ‘‘सुनते हो, गजब हो गया. बड़ी भाभी का फोन था. वे कह रही थीं कि हमारी बेटी किसी यादव के लड़के के साथ घूम रही है. वह जो गांव के बाहर पुराना शिव मंदिर है न, उस के पंडित ने उन्हें कई बार साथ देखा है.’’

‘‘यह तुम क्या कह रही हो लीला? ऐसा कैसे हो सकता है? हमारी बेटी ऐसा कैसे कर सकती है?’’ रमेश को अभी भी यकीन नहीं हो रहा था.

‘‘भला, बड़ी भाभी झठ क्यों बोलेंगी? उन की हम से कोई दुश्मनी थोड़े ही है,’’ लीला का सब्र जवाब दे रहा था.

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‘‘तुम्हारी लाड़ली है कहां… बुलाओ उसे. अभी सब साफ हो जाएगा. हमारे संस्कारों की इस तरह कैसे वह धज्जियां उड़ा सकती है,’’ रमेश किसी चोट खाए सांप की तरह फुफकार रहे थे.

‘‘वह क्या घर में है, जो उसे बुलाऊं. कब की कालेज जा चुकी है. कह रही थी कि आजकल किसी समारोह की तैयारी चल रही है, इसलिए रोज सुबह जल्दी जा रही है और रात को भी देर से आती है.’’

लीला की यह बात सुन कर रमेश और भड़क उठे, ‘‘यानी कालेज जाने के नाम पर गुलछर्रे उड़ा रही है. बात और फैले, उस से पहले ही उस का घर से निकलना बंद कर दो. मैं जल्दी ही कोई अपनी बिरादरी का लड़का देख कर उस की शादी तय कर देता हूं.’’

अपने कागज संभालते हुए रमेश बिना खाना लिए ही दुकान के लिए निकल गए. बेटा अभी तैयार हो रहा था. रोज की तरह उस के लिए भी नहीं ठहरे.

लीला काफी देर तक अपना सिर पकड़े यों ही बैठी रहीं.

‘‘क्या बात है अम्मां, ऐसे क्यों बैठी हो?’’ महेश ने पूछा. उस के पीछे बहू भी खाने का डब्बा थामे खड़ी थी.

‘‘अम्मां, बाऊजी आज इन के लिए ठहरे नहीं? क्या कहीं और जाना था उन्हें?’’ बहू ने पूछा, तो लीला की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली.

‘‘अब क्या बताऊं तुम दोनों को. आभा ने हमारे मुंह पर कालिख पोत दी है. वह किसी जोगिंदर नाम के यादव के लड़के से मिलतीजुलती है. तुम्हारी ताई का फोन आया था. वे बता रही थीं कि पुराने शिव मंदिर का पंडित यह बात सब से कहता फिर रहा है और उस ने तो पंचायत बुलाने की भी धमकी दी है?’’

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यह सुनते ही महेश एकदम भड़क उठा, ‘‘काट दूंगा उस यादव के बच्चे को. मेरी बहिन की ओर आंख उठा कर देखने की उस की हिम्मत भी कैसे हुई. लगता है, वह अपनी औकात भूल गया है. तुम तो बस आभा को समझाओ. वह अभी नादान है, जरूर यादव के लड़के ने उसे बरगलाया होगा.’’

महेश तो बौखलाता हुआ दुकान के लिए निकल गया, पर घर में तो जैसे मातम छा गया था. इस बीच बड़ी भाभी का फोन फिर आया था. वे बता रही थीं कि उन के पड़ोस में रहने वाली श्यामा काकी को पंडित मिला था और कह रहा था कि आभा और जोगिंदर तो घर से भाग कर शादी करने का प्रोग्राम बना रहे हैं.

यह सुन कर लीला और परेशान हो गई थीं.

शाम को जब आभा घर लौटी, तो घर के माहौल में हुए बदलाव को उस ने साफ महसूस किया.

‘‘आ गई गुलछर्रे उड़ा कर. अपने मांबाप की इज्जत दांव पर लगाते तुझे  शर्म नहीं आई. क्या इसी दिन के लिए तुझे  पालपोस कर बड़ा किया था,’’ लीला आभा के सामने तन कर खड़ी हो गई थीं.

‘‘अब आप को पता लग ही गया है, तो अच्छा ही है. वैसे भी कुछ दिनों बाद मैं आप को बताने वाली थी. जोगिंदर अच्छा लड़का है, पढ़ालिखा है, अच्छा कमाता है. हमारी बिरादरी वालों की तरह आप को दहेज भी नहीं जुटाना पड़ेगा. उसे कुछ नहीं चाहिए.

‘‘वैसे भी शहर में उस की नौकरी लग गई है, हम शादी कर के वहीं चले जाएंगे. इस में आप की नाक कैसे कट गई?’’ आभा का बेबाक जवाब सुन कर सासबहू के सीने पर सांप लोटने लगे.

‘‘और अम्मां, साफ सुन लो, हम कोई गुलछर्रे उड़ाने कहीं नहीं जाते हैं. किस ने कह दिया तुम्हें कि हम गांव के बाहर कहीं जाते हैं. हम दोनों एकदूसरे को चाहते हैं, यह सच है,्र पर अभी मेरा सारा ध्यान पढ़ाई पर है.’’

‘‘बस बहुत हो गई तेरी पढ़ाई. आज से तेरा घर से निकलना बंद. तेरे बाऊजी का हुक्म है यह. और सुन ले, जल्दी ही अपनी बिरादरी के लड़के से हम तेरी शादी कर देंगे. उस जोगिंदर की बात भी मन से निकाल दे. तुम दोनों की शादी नहीं हो सकती,’’ लीला की आवाज में इस बार थोड़ी नरमी थी. वे चाहती थीं कि बात बिना बिगड़े सुलझ जाए. आभा ने खुद को कमरे में बंद कर लिया.

आभा का घर से निकलना बंद हो गया था. रमेश और महेश लगातार जोगिंदर को धमका रहे थे कि वह गांव छोड़ कर चला जाए.

बड़ी भाभी जब लीला से मिलने आईं, तो उन्होंने कहा कि पंडित ने उन्हें आभा के लिए अपनी बिरादरी का एक लड़का सुझाया है. ज्यादा पढ़ालिखा तो नहीं है, लेकिन बात फैले, उस से पहले उसी से आभा को बांध देना ठीक रहेगा.

अपनी बेटी को यों ही किसी के साथ ब्याह देने की बात हालांकि लीला को पसंद नहीं आई, पर जेठानी के सामने वे चुप ही रहीं.

आभा ने जिद पकड़ ली थी कि वह अगर शादी करेगी तो सिर्फ जोगिंदर से, वरना अपनी जान दे देगी.

जोगिंदर पर भी लगातार दबाव बढ़ रहा था और उस के परिवार वाले भी उसे समझा रहे थे कि वह यह बेवकूफी न करे, पर दोनों मानने को तैयार नहीं थे.

समाज की खोखली परंपराओं और धर्म के नाम पर फैलाए जाने वाले जातिवाद के दोनों ही पक्ष में नहीं थे.

2 दिन बाद एक खेत में दोनों की लाशें मिलीं. सब कह रहे थे कि उन्होंने आत्महत्या कर ली, पर आसपास कहीं सुसाइड नोट नहीं मिला था.

आभा के सिर पर गोली लगी थी और जोगिंदर की कनपटी पर. खबर सुनते ही बड़ी भाभी दौड़ी चली आईं.

‘‘लीला, वह पंडित कह रहा था कि जोगिंदर ने पहले आभा को गोली मारी और फिर अपनी जान ले ली. वे दोनों शायद भागने की तैयारी कर रहे थे, पर किसी ने उन्हें देख लिया था.’’

अपनी बेटी की मौत की खबर से दुखी लीला को समझ  नहीं आ रहा था कि वे अपने दुख में रोएं या घर की इज्जत बच जाने पर राहत की सांस लें. क्या हो जाता, अगर जोगिंदर से आभा की शादी की सब मंजूरी दे देते. वे जोरजोर से रोने लगीं.

लीला इस बात को कैसे किसी को बतातीं कि जिसे लोग आत्महत्या समझ रहे हैं, वह हकीकत में हत्या है. समाज में अपनी इज्जत बचाने और यह साबित करने के लिए हत्या की गई कि धर्म के साथ खिलवाड़ कभी नहीं हो सकता.

तभी बगल वाली रमा चाची उन के कंधे थपथपाते हुए बोलीं, ‘‘दुख न कर लीला, कल ही मैं ने एक चैनल पर सुना था कि बाबा अमृतानंदजी प्रवचन देते हुए कह रहे थे कि मृत्यु का क्या शोक मनाना. जो आया है, वह जाएगा भी.’’

लीला को लगा कि उन के भीतर की फांस की चुभन बढ़ती ही जा रही है.  Hindi Love Crime Story

जब एक पति ने अपनी पत्नी की जिंदगी की वैल्यू रखी पौने 6 करोड़

Love Crime ‘‘मम्मी, मैं जानता हूं कि आप को मेरी एक बात बुरी लग सकती है. वो यह कि सुमन आंटी जो आप की सहेली  हैं, उन का यहां आना मुझे अच्छा नहीं लगता और तो और मेरे दोस्त तक कहते हैं कि वह पूरी तरह से गुंडी लगती हैं.’’ बेटे यशराज की यह बात सुन कर मां दीपा उसे देखती ही रह गई.

दीपा बेटे को समझाते हुए बोली, ‘‘बेटा, सुमन आंटी अपने गांव की प्रधान है. वह ठेकेदारी भी करती है. वह आदमियों की तरह कपड़े पहनती है, उन की तरह से काम करती है इसलिए वह ऐसी दिखती है. वैसे एक बात बताऊं कि वह स्वभाव से अच्छी है.’’

मां और बेटे के बीच जब यह बहस हो रही थी तो वहीं कमरे में दीपा का पति बबलू भी बैठा था. उस से जब चुप नहीं रहा गया तो वह बीच में बोल उठा,‘‘दीपा, यश को जो लगा, उस ने कह दिया. उस की बात अपनी जगह सही है. मैं भी तुम्हें यही समझाने की कोशिश करता रहता हूं लेकिन तुम मेरी बात मानने को ही तैयार नहीं होती हो.’’

‘‘यश बच्चा है. उसे हमारे कामधंधे आदि की समझ नहीं है. पर आप समझदार हैं. आप को यह तो पता ही है कि सुमन ने हमारे एनजीओ में कितनी मदद की है.’’ दीपा ने पति को समझाने की कोशिश करते हुए कहा.

‘‘मदद की है तो क्या हुआ? क्या वह अपना हिस्सा नहीं लेती है और 8 महीने पहले उस ने हम से जो साढ़े 3 लाख रुपए लिए थे. अभी तक नहीं लौटाए.’’ पति बोला.

मां और बेटे के बीच छिड़ी बहस में अब पति पूरी तरह शामिल हो गया था.

‘‘बच्चों के सामने ऐसी बातें करना जरूरी है क्या?’’ दीपा गुस्से में बोली.

‘‘यह बात तुम क्यों नहीं समझती. मैं कब से तुम्हें समझाता आ रहा हूं कि सुमन से दूरी बना लो.’’ बबलू सिंह ने कहा तो दीपा गुस्से में मुंह बना कर दूसरे कमरे में चली गई. बबलू ने भी दीपा को उस समय मनाने की कोशिश नहीं की. क्योंकि वह जानता था कि 2-4 घंटे में वह नार्मल हो जाएगी.

बबलू सिंह उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर के इस्माइलगंज में रहता था. कुछ समय पहले तक इस्माइलगंज एक गांव का हिस्सा होता था. लेकिन शहर का विकास होने के बाद अब वह भी शहर का हिस्सा हो गया है. बबलू सिंह ठेकेदारी का काम करता था. इस से उसे अच्छी आमदनी हो जाती थी इसलिए वह आर्थिकरूप से मजबूत था.

उस की शादी निर्मला नामक एक महिला से हो चुकी थी. शादी के 15 साल बाद भी निर्मला मां नहीं बन सकी थी. इस वजह से वह अकसर तनाव में रहती थी. बबलू सिंह को बैडमिंटन खेलने का शौक था. उसी दौरान उस की मुलाकात लखनऊ के ही खजुहा रकाबगंज मोहल्ले में रहने वाली दीपा से हुई थी. वह भी बैडमिंटन खेलती थी. दीपा बहुत सुंदर थी. जब वह बनठन कर निकलती थी तो किसी हीरोइन से कम नहीं लगती थी.

बैडमिंटन खेलतेखेलते दोनों अच्छे दोस्त बन गए. 40 साल का बबलू उस के आकर्षण में ऐसा बंधा कि शादीशुदा होने के बावजूद खुद को संभाल न सका. दीपा उस समय 20 साल की थी. बबलू की बातों और हावभाव से वह भी प्रभावित हो गई. लिहाजा दोनों के बीच प्रेमसंबंध हो गए. उन के बीच प्यार इतना बढ़ गया कि उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया.

दीपा के घर वालों ने उसे बबलू से विवाह करने की इजाजत नहीं दी. इस की एक वजह यह थी कि एक तो बबलू दूसरी बिरादरी का था और दूसरे बबलू पहले से शादीशुदा था. लेकिन दीपा उस की दूसरी पत्नी बनने को तैयार थी. पति द्वारा दूसरी शादी करने की बात सुन कर निर्मला नाराज हुई लेकिन बबलू ने उसे यह कह कर राजी कर लिया कि तुम्हारे मां न बनने की वजह से दूसरी शादी करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. पति की दलीलों के आगे निर्मला को चुप होना पड़ा क्योंकि शादी के 15 साल बाद भी उस की कोख नहीं भरी थी. लिहाजा न चाहते हुए भी उस ने पति को सौतन लाने की सहमति दे दी.

घरवालों के विरोध को नजरअंदाज करते हुए दीपा ने अपनी उम्र से दोगुने बबलू से शादी कर ली और वह उस की पहली पत्नी निर्मला के साथ ही रहने लगी. करीब एक साल बाद दीपा ने एक बेटे को जन्म दिया जिस का नाम यशराज रखा गया. बेटा पैदा होने के बाद घर के सभी लोग बहुत खुश हुए. अगले साल दीपा एक और बेटे की मां बनी. उस का नाम युवराज रखा. इस के बाद तो बबलू दीपा का खास ध्यान रखने लगा. बहरहाल दीपा बबलू के साथ बहुत खुश थी.

दोनों बच्चे बड़े हुए तो स्कूल में उन का दाखिला करा दिया. अब यशराज जार्ज इंटर कालेज में कक्षा 9 में पढ़ रहा था और युवराज सेंट्रल एकेडमी में कक्षा 7 में. दीपा भी 35 साल की हो चुकी थी और बबलू 55 का. उम्र बढ़ने की वजह से वह दीपा का उतना ध्यान नहीं रख पाता था. ऊपर से वह शराब भी पीने लगा. इन्हीं सब बातों को देखने के बाद दीपा को महसूस होने लगा था कि बबलू से शादी कर के उस ने बड़ी गलती की थी. लेकिन अब पछताने से क्या फायदा. जो होना था हो चुका.

बबलू का 2 मंजिला मकान था. पहली मंजिल पर बबलू की पहली पत्नी निर्मला अपने देवरदेवरानी और ससुर के साथ रहती थी. नीचे के कमरों में दीपा अपने बच्चों के साथ रहती थी. उन के घर से बाहर निकलने के भी 2 रास्ते थे. दीपा का बबलू के परिवार के बाकी लोगों से कम ही मिलना जुलना होता था. वह उन से बातचीत भी कम करती थी.

बबलू को शराब की लत हो जाने की वजह से उस की ठेकेदारी का काम भी लगभग बंद सा हो गया था. तब उस ने कुछ टैंपो खरीद कर किराए पर चलवाने शुरू कर दिए थे. उन से होने वाली कमाई से घर का खर्च चल रहा था.

शुरू से ही ऊंचे खयालों और सपनों में जीने वाली दीपा को अब अपनी जिंदगी बोरियत भरी लगने लगी थी. खुद को व्यस्त रखने के लिए दीपा ने सन 2006 में ओम जागृति सेवा संस्थान के नाम से एक एनजीओ बना लिया. उधर बबलू का जुड़ाव भी समाजवादी पार्टी से हो गया. अपने संपर्कों की बदौलत उस ने एनजीओ को कई प्रोजेक्ट दिलवाए.

इसी बीच सन 2008 में दीपा की मुलाकात सुमन सिंह नामक महिला से हुई. सुमन सिंह गोंडा करनैलगंज के कटरा शाहबाजपुर गांव की रहने वाली थी. वह थी तो महिला लेकिन उस की सारी हरकतें पुरुषों वाली थीं. पैंटशर्ट पहनती और बायकट बाल रखती थी. सुमन निर्माणकार्य की ठेकेदारी का काम करती थी. उस ने दीपा के एनजीओ में काम करने की इच्छा जताई. दीपा को इस पर कोई एतराज न था. लिहाजा वह एनजीओ में काम करने लगी.

सुमन एक तेजतर्रार महिला थी. अपने संबंधों से उस ने एनजीओ को कई प्रोजेक्ट भी दिलवाए. तब दीपा ने उसे अपनी संस्था का सदस्य बना दिया. इतना ही नहीं वह संस्था की ओर से सुमन को उस के कार्य की एवज में पैसे भी देने लगी. कुछ ही दिनों में सुमन के दीपा से पारिवारिक संबंध बन गए.

दीपा को ज्यादा से ज्यादा बनठन कर रहने और सजनेसंवरने का शौक था. वह हमेशा बनठन कर और ज्वैलरी पहने रहती थी. 2 बच्चों की मां बनने के बाद भी उस में गजब का आकर्षण था. उसे देख कर कोई भी उस की ओर आकर्षित हो सकता था. एनजीओ में काम करने की वजह से सुमन दीपा को अकसर अपने साथ ही रखती थी. दीपा इसे सुमन की दोस्ती समझ रही थी पर सुमन पुरुष की तरह ही दीपा को प्यार करने लगी थी.

एक बार जब सुमन दीपा को प्यार भरी नजरों से देख रही थी तो दीपा ने पूछा, ‘‘ऐसे क्या देख रही हो? मैं भी तुम्हारी तरह एक महिला हूं. तुम मुझे इस तरह निहार रही हो जैसे कोई प्रेमी प्रेमिका को देख रहा हो.’’

‘‘दीपा, तुम मुझे अपना प्रेमी ही समझो. मैं सच में तुम्हें बहुत प्यार करने लगी हूं.’’ सुमन ने मन में दबी बातें उस के सामने रख दीं.

सुमन की बातें सुनते ही वह चौंकते हुए बोली, ‘‘यह तुम कैसी बातें कर रही हो? कहीं 2 लड़कियां आपस में प्रेमीप्रेमिका हो सकती हैं?’’

‘‘दीपा, मैं लड़की जरूर हूं पर मेरे अंदर कभीकभी लड़के सा बदलाव महसूस होता है. मैं सबकुछ लड़कों की तरह करना चाहती हूं. प्यार और दोस्ती सबकुछ. इसीलिए तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मैं तुम से शादी भी करना चाहती हूं.’’

‘‘मैं पहले से शादीशुदा हूं. मेरे पति और बच्चे हैं.’’ दीपा ने उसे समझाने की कोशिश की.

‘‘मैं तुम्हें पति और बच्चों से अलग थोड़े न कर रही हूं. हम दोस्त और पतिपत्नी दोनों की तरह रह सकते हैं. सब से अच्छी बात तो यह है कि हमारे ऊपर कोई शक भी नहीं करेगा. दीपा, मैं सच कह रही हूं कि मुझे तुम्हारे करीब रहना अच्छा लगता है.’’

‘‘ठीक है बाबा, पर कभी यह बातें किसी और से मत कहना.’’ दीपा ने सुमन से अपना पीछा छुड़ाने के अंदाज में कहा.

‘‘दीपा, मेरी इच्छा है कि तुम मुझे सुमन नहीं छोटू के नाम से पुकारा करो.’’

‘‘समझ गई, आज से तुम मेरे लिए सुमन नहीं छोटू हो.’’ इतना कह कर सुमन और दीपा करीब आ गए. दोनों के बीच आत्मीय संबंध बन गए थे. सुमन ने रिश्ते को मजबूत करने के लिए एक दिन दीपा के साथ मंदिर जा कर शादी भी कर ली. सुमन के करीब आने से दीपा के जीवन को भी नई उमंग महसूस होने लगी थी कि कोई तो है जो उसे इतना प्यार कर रही है.

इस के बाद सुमन एक प्रेमी की तरह उस का खयाल रखने लगी थी. समय गुजरने लगा. दीपा के पति और परिवार को इस बात की कोई भनक नहीं थी. वह सुमन को उस की सहेली ही समझ रहे थे. एनजीओ के काम के कारण सुमन अकसर ही दीपा के साथ उस के घर पर ही रुक जाती थी.

सुमन को भी शराब पीने का शौक था. बबलू भी शराब पीता था. कभीकभी सुमन बबलू के साथ ही पीने बैठ जाती थी. जिस से सुमन और बबलू की दोस्ती हो गई. सुमन के लिए उस के यहां रुकना और ज्यादा आसान हो गया था. उस के रुकने पर बबलू भी कोई एतराज नहीं करता था. वह भी उसे छोटू कहने लगा.

साल 2010 में उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव हुए तो सुमन ने अपने गांव कटरा शाहबाजपुर से ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ा. सुमन सिंह का भाई विनय सिंह करनैलगंज थाने का हिस्ट्रीशीटर बदमाश था. उस के पिता अवधराज सिंह के खिलाफ भी कई आपराधिक मुकदमे करनैलगंज थाने में दर्ज थे. दोनों बापबेटों की दबंगई का गांव में खासा प्रभाव था. जिस के चलते सुमन ग्रामप्रधान का चुनाव जीत गई. उस ने गोंडा के पूर्व विधायक अजय प्रताप सिंह उर्फ लल्ला भैया की बहन सरोज सिंह को भारी मतों से हराया.

ग्राम प्रधान बनने के बाद सुमन सिंह सीतापुर रोड पर बनी हिमगिरी में फ्लैट ले कर रहने लगी. सन 2010 में प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद उस ने अपने संबंधों की बदौलत फिर से ठेकेदारी शुरू कर दी. अपनी सुरक्षा के लिए वह 32 एमएम की लाइसैंसी रिवाल्वर भी साथ रखने लगी. उस की और दीपा की दोस्ती अब और गहरी होने लगी थी. सुमन किसी न किसी बहाने से दीपा के पास ही रुक जाती थी.

ऐसे में दीपा और सुमन एक साथ ही रात गुजारती थीं. यह सब बातें धीरेधीरे बबलू और उस के बच्चों को भी पता चलने लगी थीं. तभी तो उन्हें सुमन का उन के यहां आना अच्छा नहीं लगता था.

सुमन महीने में 20-25 दिन दीपा के घर पर रुकती थी. शनिवार और रविवार को वह दीपा को अपने साथ हिमगिरी कालोनी ले जाती थी. दीपा को सुमन के साथ रहना कुछ दिनों तक तो अच्छा लगा, लेकिन अब वह सुमन से उकता गई थी.

एक बार सुमन ने दीपा से किसी काम के लिए साढ़े 3 लाख रुपए उधार लिए थे. तयशुदा वक्त गुजर जाने के बाद भी सुमन ने पैसे नहीं लौटाए तो दीपा ने उस से तकादा करना शुरू कर दिया. तकादा करना सुमन को अच्छा नहीं लगता था. इसलिए दीपा जब कभी उस से पैसे मांगती तो सुमन उस से लड़ाईझगड़ा कर बैठी थी.

27 जनवरी, 2014 की देर रात करीब 9 बजे सुमन दीपा के घर अंगुली में अपना रिवाल्वर घुमाते हुए पहुंची. दीपा और बबलू में सुमन को ले कर सुबह ही बातचीत हो चुकी थी. अचानक उस के आ धमकने से वे लोग पशोपेश में पड़ गए.

‘‘क्या बात है छोटू आज तो बिलकुल माफिया अंदाज में दिख रहे हो.’’ दीपा बोली.

इस के पहले कि सुमन कुछ कहती. बबलू ने पूछ लिया, ‘‘छोटू अकेले ही आए हो क्या?’’

‘‘नहीं, भतीजा विपिन और उस का दोस्त शिवम मुझे छोड़ कर गए हैं. कई दिनों से दीपा के हाथ का बना खाना नहीं खाया था. उस की याद आई तो चली आई.’’

सुमन और बबलू बातें करने लगे तो दीपा किचन में चली गई. सुमन ने भी फटाफट बबलू से बातें खत्म कीं और दीपा के पीछे किचन में पहुंच कर उसे पीछे से अपनी बांहों में भर लिया. पति और बच्चोें की बातें सुन कर दीपा का मूड सुबह से ही खराब था. वह सुमन को झिड़कते हुए बोली, ‘‘छोटू ऐसे मत किया करो. अब बच्चे बड़े हो गए हैं. यह सब उन को बुरा लगता है.’’

उस समय सुमन नशे में थी. उसे दीपा की बात समझ नहीं आई. उसे लगा कि दीपा उस से बेरुखी दिखा रही है. वह बोली, ‘‘दीपा, तुम अपने पति और बच्चों के बहाने मुझ से दूर जाना चाहती हो. मैं तुम्हारी बातें सब समझती हूं.’’

दीपा और सुमन के बीच बहस बढ़ चुकी थी दोनों की आवाज सुन कर बबलू भी किचन में पहुंच गया. लड़ाई आगे न बढ़े इस के लिए बबलू सिंह ने सुमन को रोका और उसे ले कर ऊपर के कमरे में चला गया. वहां दोनों ने शराब पीनी शुरू कर दी. शराब के नशे में खाने के समय सुमन ने दीपा को फिर से बुरा भला कहा.

दीपा को भी लगा कि शराब के नशे में सुमन घर पर रुक कर हंगामा करेगी. उस की तेज आवाज पड़ोसी भी सुनेंगे जिस से घर की बेइज्जती होगी इसलिए उस ने उसे अपने यहां रुकने के लिए मना लिया. बबलू सिंह ऊपर के कमरे में सोने चला गया. दीपा के कहने के बाद भी सुमन उस रात वहां से नहीं गई बल्कि वहीं दूसरे कमरे में जा कर सो गई.

28 जनवरी, 2014 की सुबह दीपा के बच्चे स्कूल जाने की तैयारी कर रहे थे. वह उन के लिए नाश्ता तैयार कर रही थी. तभी किचन में सुमन पहुंच गई. वह उस समय भी नशे की अवस्था में ही थी. उस ने दीपा से कहा, ‘‘मुझ से बेरुखी की वजह बताओ इस के बाद ही परांठे बनाने दूंगी.’’

‘‘सुमन, अभी बच्चों को स्कूल जाना है नाश्ता बनाने दो. बाद में बात करेंगे.’’ पहली बार दीपा ने छोटू के बजाय सुमन कहा था.

‘‘तुम ऐसे नहीं मानोगी.’’ कह कर सुमन ने हाथ में लिया रिवाल्वर ऊपर किया और किचन की छत पर गोली चला दी.

गोली चलते ही दीपा डर गई. वह बोली, ‘‘सुमन होश में आओ.’’ इस के बाद वह उसे रोकने के लिए उस की ओर बढ़ी. सुमन उस समय गुस्से में उबल रही थी. उस ने उसी समय दीपा के सीने पर गोली चला दी. गोली चलते ही दीपा वहीं गिर पड़ी. गोली की आवाज सुन कर बच्चे किचन की तरफ आए. उन्होंने मां को फर्श पर गिरा देखा तो वे रोने लगे. बबलू उस समय ऊपर के कमरे में था. बच्चों की आवाज सुन कर वो और उस की पहली पत्नी निर्मला भी नीचे आ गए. निर्मला सुमन से बोली, ‘‘क्या किया तुम ने?’’

‘‘कुछ नहीं यह गिर पड़ी है. इसे कुछ चोट लग गई है.’’ सुमन ने जवाब दिया.

निर्मला ने दीपा की तरफ देखा तो उस के पेट से खून बहता देख वह सुमन पर चिल्ला कर बोली, ‘‘छोटू तुम ने इसे मार दिया.’’

दीपा की हालत देख कर बबलू के आंसू निकल पड़े. उस ने पत्नी को हिलाडुला कर देखा. लेकिन उन की सांसें तो बंद हो चुकी थीं. वह रोते हुए बोला, ‘‘छोटू, यह तुम ने क्या कर दिया.’’ वह दीपा को कार से तुरंत राममनोहर लोहिया अस्पताल ले गया जहां डाक्टरों ने दीपा को मृत घोषित कर दिया.

चूंकि घर वालों के बीच सुमन घिर चुकी थी. इसलिए उस ने फोन कर के अपने भतीजे विपिन सिंह और उस के साथी शिवम मिश्रा को वहीं बुला लिया. तभी सुमन ने अपना रिवाल्वर विपिन सिंह को दे दिया. विपिन ने रिवाल्वर से बबलू के घरवालों को धमकाने की कोशिश की लेकिन जब घरवाले उलटे उन पर हावी होने लगे वे दोनों वहां से भाग गए.

तब अपनी सुरक्षा के लिए सुमन ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया. बबलू के भाई बलू सिंह ने गाजीपुर थाने फोन कर के दीपा की हत्या की खबर दे दी. घटना की जानकारी पाते ही थानाप्रभारी नोवेंद्र सिंह सिरोही, एसएसआई रामराज कुशवाहा, सीटीडी प्रभारी सबइंसपेक्टर अशोक कुमार सिंह, रूपा यादव, ब्रजमोहन सिंह के साथ मौके पर पहुंच गए.

हत्या की सूचना पाते ही एसएसपी लखनऊ प्रवीण कुमार, एसपी (ट्रांसगोमती) हबीबुल हसन और सीओ गाजीपुर विशाल पांडेय भी घटनास्थल पर पहुंच गए. बबलू के घर पहुंच कर पुलिस ने दरवाजा खुलवा कर सब से पहले सुमन को हिरासत में लिया. उस के बाद राममनोहर लोहिया अस्पताल पहुंच कर दीपा की लाश कब्जे में ले कर उसे पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया.

पुलिस ने थाने ला कर सुमन से पूछताछ की तो उस ने सच्चाई उगल दी. इस के बाद कांस्टेबल अरुण कुमार सिंह, शमशाद, भूपेंद्र वर्मा, राजेश यादव, ऊषा वर्मा और अनीता सिंह की टीम ने विपिन को भी गिरफ्तार कर लिया. उन से हत्या में प्रयोग की गई रिवाल्वर और सुमन की अल्टो कार नंबर यूपी32 बीएल6080 बरामद कर ली. जिस से ये दोनों फरार हुए थे.

देवरिया जिले के भटनी कस्बे का रहने वाला शिवम गणतंत्र दिवस की परेड देखने लखनऊ आया था. वह एक होनहार युवक था. लखनऊ घूमने के लिए विपिन ने उसे 1-2 दिन और रुकने के लिए कहा. उसे क्या पता था कि यहां रुकने पर उसे जेल जाना पड़ जाएगा. दोनों अभियुक्तों के खिलाफ पुलिस ने भादंवि की धारा 302, 506 के तहत मामला दर्ज कर के उन्हें 29 जनवरी, 2014 को मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर जेल भेज दिया.

जेल जाने से पहले सुमन अपने किए पर पछता रही थी. उस ने पुलिस से कहा कि वह दीपा से बहुत प्यार करती थी. गुस्से में उस का कत्ल हो गया. सुमन के साथ जेल गए शिवम को लखनऊ में रुकने का पछतावा हो रहा था.

अपराध किसी तूफान की तरह होता है. वह अपने साथ उन लोगों को भी तबाह कर देता है जो उस से जुड़े नहीं होते हैं. दीपा और सुमन के गुस्से के तूफान में शिवम के साथ विपिन और दीपा का परिवार खास कर उस के 2 छोटेछोटे बच्चे प्रभावित हुए हैं. सुमन का भतीजा विपिन भागने में सफल रहा. कथा लिखे जाने तक उस की तलाश जारी थी.

— कथा पुलिस सूत्रों और मोहल्ले वालों से की गई बातचीत के आधार पर

फोटो डेमों के तौर पर यूज की गई है असल फोटो का प्रयोग नहीं किया गया है

एक नाबालिग लड़की के प्यार में किसने घोला तीखा जहर

रोमिला अपनी बेटी सलोनी के साथ लखनऊ के इंदिरा नगर मोहल्ले में रहती थी. उस का 3 मंजिल का मकान था. पहली दोनों मंजिलों पर रहने के लिए कमरे थे और तीसरी मंजिल पर गोदाम बना था, जहां कबाड़ और पुरानी चीजें रखी रहती थीं.

ईसाई समुदाय की रोमिला मूलत: सुल्तानपुर जिले की रहने वाली थी. उस ने जौन स्विंग से प्रेम विवाह किया था. सलोनी के जन्म के बाद रोमिला और जौन स्विंग के संबंध खराब हो गए. रोमिला ने घुटघुट कर जीने के बजाय अपने पति जौन स्विंग से तलाक ले लिया. इसी बीच रोमिला को लखनऊ के सरकारी अस्पताल में टैक्नीशियन की नौकरी मिल गई. वेतन ठीकठाक था. इसलिए वह अपनी आगे की जिंदगी अपने खुद के बूते पर गुजारना चाहती थी.

स्विंग से प्यार, शादी और फिर तलाक ने रोमिला की जिंदगी को बहुत बोझिल बना दिया था. कम उम्र की तलाकशुदा महिला का समाज में अकेले रहना सरल नहीं होता, इस बात को ध्यान में रखते हुए रोमिला ने अपने को धर्मकर्म की बंदिशों में उलझा लिया.

समय गुजर रहा था, बेटी बड़ी हो रही थी. रोमिला अपनी बेटी को पढ़ालिखा कर बड़ा बनाना चाहती थी. क्योंकि अब उस का भविष्य वही थी. सलोनी कावेंट स्कूल में पढ़ती थी, पढ़ने में होशियार. रोमिला ने लाड़प्यार से उस की परवरिश लड़कों की तरह की थी.

सलोनी भी खुद को लड़कों की तरह समझने लगी थी. वह जिद्दी स्वभाव की तो थी ही गुस्सा भी खूब करती थी. जन्म के समय ही कुछ परेशानियों के कारण सलोनी के शरीर के दाएं हिस्से में पैरालिसिस का अटैक पड़ा था, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उस का असर करीब करीब खत्म हो गया था.

सलोनी बौबकट बाल रखती थी. उस की उम्र हालांकि 15 साल थी पर वह अपनी उम्र से बड़ी दिखाई देती थी. वह लड़कों की तरह टीशर्ट पैंट पहनती थी. सलोनी के साथ पढ़ने वाले लड़के लड़कियां स्मार्टफोन इस्तेमाल करते थे. सलोनी ने भी मां से जिद कर के स्मार्टफोन खरीदवा लिया.

रोमिला जानती थी कि आजकल के बच्चे मोबाइल पर इंटरनेट लगा कर फेसबुक और वाट्सएप जैसी साइटों का इस्तेमाल करते हैं जो सलोनी जैसी कम उम्र लड़की के लिए ठीक नहीं है. लेकिन एकलौती बेटी की जिद के सामने उसे झुकना पड़ा.

रोमिला सुबह 8 बजे अस्पताल जाती थी और शाम को 4 बजे लौटती थी. सलोनी भी सुबह 8 बजे स्कूल चली जाती थी और 2 बजे वापस आती थी. कठिन जीवन जीने के लिए रोमिला ने बेड की जगह घर में सीमेंट के चबूतरे बनवा रखे थे. मांबेटी बिस्तर डाल कर इन्हीं चबूतरों पर सोती थीं.

रोमिला को अस्पताल से 45 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन मिलता था. इस के बावजूद मांबेटी का खर्च बहुत कम था. रोमिला जो खाना बनाती थी वह कई दिन तक चलता था.

मोबाइल फोन लेने के बाद सलोनी ने इंटरनेट के जरीए अपना फेसबुक पेज बना लिया था. वह अकसर अपने दोस्तों से चैटिंग करती रहती थी. इसी के चलते उस के कई नए दोस्त बन गए थे. उस के इन्हीं दोस्तों में से एक था पश्चिम बंगाल के मालदा का रहने वाला सुदीप दास. 19 साल का सुदीप एक प्राइवेट फैक्ट्री में काम करता था.

उस के घर की हालत ठीक नहीं थी. उस का पिता सुधीरदास मालदा में मिठाई की एक दुकान पर काम करता था. जबकि मां कावेरी घरेलू महिला थी. उस का छोटा भाई राजदीप कोई काम नहीं करता था. सुदीप और उस के पिता की कमाई से ही घर का खर्च चलता था.

सुदीप और सलोनी के बीच चैटिंग के माध्यम से जो दोस्ती हुई धीरेधीरे प्यार तक जा पहुंची. नासमझी भरी कम उम्र का तकाजा था. चैटिंग करतेकरते सुदीप और सलोनी एकदूसरे के प्यार में पागल से हो गए. स्थिति यह आ गई कि सुदीप सलोनी से मिलने के लिए बेचैन रहने लगा.

दोनों के पास एकदूसरे के मोबाइल नंबर थे. सो दोनों खूब बातें करते थे. मोबाइल पर ही दोनों की मिलने की बात तय हुई. सितंबर 2013 में सुदीप सलोनी से मिलने लखनऊ आ गया. सलोनी ने सुदीप को अपनी मां से मिलवाया. रोमिला बेटी को इतना प्यार करती थी कि उस की हर बात मानने को तैयार रहती थी. 2 दिन लखनऊ में रोमिला के घर पर रह कर सुदीप वापस चला गया.

अक्तूबर में सलोनी का बर्थडे था. उस के बर्थडे पर सुदीप फिर लखनऊ आया. अब तक सलोनी ने सुदीप से अपने प्यार की बात मां से छिपा कर रखी थी. लेकिन इस बार उस ने अपने और सुदीप के प्यार की बात रोमिला को बता दी.

सलोनी और सुदीप दोनों की ही उम्र ऐसी नहीं थी कि शादी जैसे फैसले कर सकें. इसलिए रोमिला ने दोनों को समझाने की कोशिश की. ऊंचनीच दुनियादारी के बारे में बताया. लेकिन सुदीप और सलोनी पर तो प्यार का भूत चढ़ा था.

रोमिला को इनकार करते देख सुदीप बड़े आत्मविश्वास से बोला, ‘‘आंटी, आप चिंता न करें. मैं सलोनी का खयाल रख सकता हूं. मैं खुद भी नौकरी करता हूं और मेरे पिताजी भी. हमारे घर में भी कोई कुछ नहीं कहेगा.’’

बातचीत के दौरान रोमिला सुदीप के बारे में सब कुछ जान गई थी. इसलिए सोचविचार कर बोली, ‘‘देखो बेटा, तुम्हारी सारी बातें अपनी जगह सही हैं. मुझे इस रिश्ते से भी कोई ऐतराज नहीं है. पर मैं यह रिश्ता तभी स्वीकार करूंगी जब तुम कोई अच्छी नौकरी करने लगोगे. आजकल 10-5 हजार की नौकरी में घरपरिवार नहीं चलते. अभी तुम दोनों में बचपना है.’’

‘‘ठीक है आंटी, मैं आप की बात मान लेता हूं. लेकिन आप वादा करिए कि आप उसे मुझ से दूर नहीं करेंगी. जब मैं कुछ बन जाऊंगा तो सलोनी को अपनी बनाने आऊंगा.’’ सुदीप ने फिल्मी हीरो वाले अंदाज में रोमिला से अपनी बात कही.

इस बार सुदीप सलोनी के घर पर एक सप्ताह तक रहा. इसी बीच रोमिला ने सुदीप से स्टांप पेपर पर लिखवा लिया कि वह किसी लायक बन जाने के बाद ही सलोनी से शादी करेगा. इस के बाद सुदीप अपने घर मालदा चला गया. लेकिन लखनऊ से लौटने के बाद उस का मन नहीं लग रहा था.

जवानी में, खास कर चढ़ती उम्र में महबूबा से बड़ा दूसरा कोई दिखाई नहीं देता. कामधाम, भूखप्यास, घरपरिवार सब बेकार लगने लगते हैं. सुदीप का भी कुछ ऐसा ही हाल था. उस की आंखों के सामने सलोनी का गोलगोल सुंदर चेहरा और बोलती हुई आंखें घूमती रहती थीं. वह किसी भी सूरत में उसे खोने के लिए तैयार नहीं था.

जब नहीं रहा गया तो 10 दिसंबर, 2013 को सुदीप वापस लखनऊ आया और रोमिला को बहका फुसला कर सलोनी को मालदा घुमाने के लिए साथ ले गया. हालांकि सलोनी की मां रोमिला इस के लिए कतई तैयार नहीं थी. लेकिन सलोनी ने उसे मजबूर कर दिया.

दरअसल मां के प्यार ने उसे इतना जिद्दी बना दिया था कि वह कोई बात सुनने को तैयार नहीं होती थी. रोमिला के लिए बेटी ही जीने का सहारा थी. वह उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी. इस लिए वह सलोनी की जिद के आगे झुक गई. करीब ढाई माह तक सलोनी सुदीप के साथ मालदा में रही.

मार्च, 2014 में सलोनी वापस आ गई. सुदीप भी उस के साथ आया था. बेटी का बदला हुआ स्वभाव देख कर रोमिला को झटका लगा. सलोनी उस की कोई बात सुनने को तैयार नहीं थी. पति से अलग होने के बाद रोमिला ने सोचा था कि वह बेटी के सहारे अपना पूरा जीवन काट लेगी. अब वह बेटी के दूर जाने की कल्पना मात्र से बुरी तरह घबरा गई थी.

लेकिन हकीकत वह नहीं थी जो रोमिला देख या समझ रही थी. सच यह था कि सलोनी का मन सुदीप से उचट गया था. उस का झुकाव यश नाम के एक अन्य लड़के की ओर होने लगा था. जबकि सुदीप हर हाल में सलोनी को पाना चाहता था. वह कई बार उस के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर चुका था. यह बात मांबेटी दोनों को नागवार गुजरने लगी थी.

रोमिला ने अस्पताल से 1 मार्च, 2014 से 31 मार्च तक की छुट्टी ले रखी थी. उस ने अस्पताल में छुट्टी लेने की वजह बेटी की परीक्षाएं बताई थीं.

7 अप्रैल, 2014 की सुबह रोमिला के मकान के पड़ोस में रहने वाले रणजीत सिंह ने थाना गाजीपुर आ कर सूचना दी कि बगल के मकान में बहुत तेज बदबू आ रही है. उन्होंने यह भी बताया कि मकान मालकिन रोमिला काफी दिनों से घर पर नहीं है. सूचना पा कर एसओ गाजीपुर नोवेंद्र सिंह सिरोही, सीनियर इंसपेक्टर रामराज कुशवाहा और सिपाही अरूण कुमार सिंह रोमिला के मकान पर पहुंच गए.

देखने पर पता चला कि मकान के ऊपर के हिस्से में बदबू आ रही थी. पुलिस ने फोन कर के मकान मालकिन रोमिला को बुला लिया. वहां उस के सामने ही मकान खोल कर देखा गया तो पूरा मकान गंदा और रहस्यमय सा नजर आया. सिपाही अरूण कुमार और एसएसआई रामराज कुशवाहा तलाशी लेने ऊपर वाले कमरे में पहुंचे तो कबाड़ रखने वाले कमरे में एक युवक की सड़ीगली लाश मिली.

पुलिस ने रोमिला से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह लाश मालदा, पश्चिम बंगाल के रहने वाले सुदीप दास की है. वह उस की बेटी सलोनी का प्रेमी था और उस से शादी करना चाहता था. जब सलोनी ने इनकार कर दिया तो सुदीप ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. रोमिला ने आगे बताया कि इस घटना से वह बुरी तरह डर गई थी. उसे लग रहा था कि हत्या के इल्जाम में फंस जाएगी. इसलिए वह घर को बंद कर के फरार हो गई थी.

पुलिस ने रोमिला से नंबर ले कर फोन से सुदीप के घर संपर्क किया और इस मामले की पूरी जानकारी उस के पिता को दे दी. लेकिन उस के घर वाले लखनऊ आ कर मुकदमा कराने को तैयार नहीं थे. कारण यह कि वे लोग इतने गरीब थे कि उन के पास लखनऊ आने के लिए पैसा नहीं था. इस पर एसओ गाजीपुर ने अपनी ओर से मुकदमा दर्ज कर के इस मामले की जांच शुरू कर दी. प्राथमिक काररवाई के बाद सुदीप की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

8 अप्रैल 2014 को सुदीप की लाश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद जो सच सामने आया, वह चौंका देने वाला था. इस बीच सलोनी भी आ गई थी. रोमिला और उस की बेटी सलोनी ने अपने बयानों में कई बातें छिपाने की कोशिश की थी. लेकिन उन के अलगअलग बयानों ने उन की पोल खोल दी. एसपी ट्रांस गोमती हबीबुल हसन और सीओ गाजीपुर विशाल पांडेय पुलिस विवेचना पर नजर रख रहे थे जिस से इस पूरे मामले का बहुत जल्दी पर्दाफाश हो गया.

मांबेटी से पूछताछ के बाद जो कहानी सामने आई वह कुछ इस तरह थी.

13 मार्च, 2014 की रात को सलोनी अपने कमरे में किसी से फोन पर बात कर रही थी. इसी बीच सुदीप उस से झगड़ने लगा. वह गुस्से में बोला, ‘‘मैं ने मांबेटी दोनों को कितनी बार समझाया है कि मुझे खीर में इलायची डाल कर खाना पसंद नहीं है. लेकिन तुम लोगों पर मेरी बात का कोई असर नहीं होता.’’

उस की इस बात पर सलोनी को गुस्सा आ गया. उस ने सुदीप को लताड़ा, ‘‘तुम मां से झगड़ने के बहाने तलाश करते रहते हो. बेहतर होगा, तुम यहां से चले जाओ. मैं तुम से किसी तरह की दोस्ती नहीं रखना चाहती.’’

‘‘ऐसे कैसे चला जाऊं? मैं ने स्टांपपेपर पर लिख कर दिया है, तुम्हें मेरे साथ ही शादी करनी होगी. बस तुम 18 साल की हो जाओ. तब तक मैं कोई अच्छी नौकरी कर लूंगा और फिर तुम से शादी कर के तुम्हें साथ ले जाऊंगा. अब तुम्हारी मां चाहे भी तो तुम्हारी शादी किसी और से नहीं करा सकती.’’ सुदीप ने भी गुस्से में जवाब दिया.

‘‘मेरी ही मति मारी गई थी जो तुम्हें इतना मुंह लगा लिया.’’ कह कर सलोनी ऊपर चली गई. वहां उस की मां पहले से दोनों का लड़ाईझगड़ा देख रही थी.

‘‘सुदीप, तुम मेरे घर से चले जाओ.’’ रोमिला ने बेटी का पक्ष लेते हुए चेतावनी भरे शब्दों में कहा तो सुदीप उस से भी लड़नेझगड़ने लगा. यह देख मांबेटी को गुस्सा आ गया. सुदीप भी गुस्से में था. उस ने मांबेटी के साथ मारपीट शुरू कर दी. जल्दी ही वह दोनों पर भरी पड़ने लगा. तभी रोमिला की निगाह वहां रखी हौकी स्टिक पर पड़ी.

रोमिला ने हौकी उठा कर पूरी ताकत से सुदीप के सिर पर वार किया. एक दो नहीं कई वार. एक साथ कई वार होने से सुदीप की वहीं गिर कर मौत हो गई. सुदीप की मृत्यु के बाद मांबेटी दोनों ने मिल कर उस की लाश को बोरे में भर कर कबाड़ वाले कमरे में बंद कर दिया. इस के बाद अगली सुबह दोनों घर पर ताला लगा कर गायब हो गईं.

पुलिस को उलझाने के लिए रोमिला ने बताया कि वह यह सोच कर डर गई थी कि सुदीप का भूत उसे परेशान कर सकता है. इसलिए, वे दोनों हवन कराने के लिए हरिद्वार चली गई थीं.

सलोनी ने भी 14 मार्च को अपनी डायरी में लिखा था, ‘आत्माओं ने सुदीप को मार डाला. हम फेसबुक पर एकदूसरे से मिले थे. आत्माओं के पास लेजर जैसी किरणें हैं. वह हमें नष्ट कर देंगी. आत्माएं हमें फंसा देंगी.’ सलोनी ने इस तरह की और भी तमाम अनापशनाप बातें डायरी में लिखी थीं. रोमिला भी इसी तरह की बातें कर रही थी.

पुलिस ने अपनी जांच में पाया कि मांबेटी हरिद्वार वगैरह कहीं नहीं गई थी बल्कि दोनों लखनऊ में इधरउधर भटक कर अपना समय गुजारती रही थीं. वे समझ नहीं पा रही थीं कि इस मामले को कैसे सुलझाएं, क्योंकि सुदीप की लाश घर में पड़ी थी.

बहरहाल, उस की लाश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद इस बात का खुलासा हो गया था कि मामला आत्महत्या का नहीं बल्कि हत्या का था. गाजीपुर पुलिस ने महिला दारोगा नीतू सिंह, सिपाही मंजू द्विवेदी और उषा वर्मा को इन मांबेटी से राज कबूलवाने पर लगाया.

जब उन्हें बताया गया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सुदीप की मौत का का कारण सिर पर लगी चोट को बताया गया है, तो वे टूट गईं. दोनों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. रोमिला की निशानदेही पर हौकी स्टिक भी बरामद हो गई.

8 अप्रैल, 2014 को पुलिस ने मां रोमिला को जेल और उस की नाबालिग बेटी सलोनी को बालसुधार गृह भेज दिया. जो भी जैसे भी हुआ हो, लेकिन सच यह है कि फेसबुक की दोस्ती की वजह से सुदीप का परिवार बेसहारा हो गया है.

पुलिस उस के परिवार को बारबार फोन कर के लखनऊ आ कर बेटे का दाह संस्कार कराने के लिए कह रही थी. लेकिन वे लोग आने को तैयार नहीं थे. सुदीप की लाश लखनऊ मेडिकल कालेज के शवगृह में रखी थी. एसओ गाजीपुर नोवेंद्र सिंह सिरोही ने सुदीप के पिता सुधीर दास को समझाया और भरोसा दिलाया कि वह लखनऊ आएं, वे उन की पूरी मदद करेंगे. पुलिस का भरोसा पा कर सुदीप का पिता सुधीर दास लखनऊ आया. बेटे की असमय मौत ने उस का कलेजा चीर दिया था.

सुधीर दास पूरे परिवार के साथ लखनऊ आना चाहता था लेकिन उस के पास पैसा नहीं था. इसलिए परिवार का कोई सदस्य उस के साथ नहीं आ सका. वह खुद भी पैसा उधार ले कर आया था. सुधीर दास की हालत यह थी कि बेटे के दाह संस्कार के लिए भी उस के पास पैसा नहीं था. जवान बेटे की मौत से टूट चुका सुधीर दास पूरी तरह से बेबस और लाचार नजर आ रहा था.

उन की हालत देख कर गाजीपुर पुलिस ने अपने स्तर पर पैसों का इंतजाम किया और सुदीप का क्रियाकर्म भैंसाकुंड के इलेक्ट्रिक शवदाह गृह पर किया. सुदीप की अभागी मां कावेरी और भाई राजदीप तो उसे अंतिम बार देख भी नहीं सके.

क्रियाकर्म के बाद पुलिस ने ही सुधीर के वापस मालदा जाने का इंतजाम कराया. गरीबी से लाचार यह पिता बेटे की हत्या करने वाली मांबेटी को सजा दिलाने के लिए मुकदमा भी नहीं लड़ना चाहता. अनजान से मोहब्बत और उस से शादी की जिद ने सुदीप की जान ले ली. सुदीप अपने परिवार का एकलौता कमाऊ बेटा था. उस के जाने से पूरा परिवार पूरी तरह से टूट गया है. सलोनी और सुदीप की एक गलती ने 2 परिवारों को तबाह कर दिया है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है. कथा में आरोपी सलोनी का नाम परिवर्तित है.

12 दिसंबर, 2013 की सुबह के 4 बजे का समय था. लखनऊ की सब से पौश कालोनी आशियाना स्थित थाना आशियाना में सन्नाटा पसरा हुआ था. थाने में पहरे पर तैनात सिपाही और अंदर बैठे दीवान के अलावा कोई नजर नहीं आ रहा था. तभी साधारण सी एक जैकेट पहने 25 साल का एक युवक थाने में आया.

पहरे पर तैनात सिपाही से इजाजत ले कर वह ड्यूटी पर तैनात दीवान के सामने जा खड़ा हुआ. पूछने पर उस ने बताया, ‘‘दीवान साहब, मैं यहां से 2 किलोमीटर दूर किला चौराहे के पास आशियाना कालोनी में किराए के मकान में रहता हूं. मेरी बीवी मर गई है, थानेदार साहब से मिलने आया हूं.’’

सुबहसुबह ऐसी खबरें किसी भी पुलिस वाले को अच्छी नहीं लगतीं. दीवान को भी अच्छा नहीं लगा. वह उस युवक से ज्यादा पूछताछ करने के बजाए उसे बैठा कर यह बात थानाप्रभारी सुधीर कुमार सिंह को बताने चला गया. सुधीर कुमार सिंह को कच्ची नींद में ही उठ कर आना पड़ा. उन्होंने थाने में आते ही युवक से पूछा, ‘‘हां भाई, बता क्या बात है?’’

बुरी तरह घबराए युवक ने कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम सचिन है और मैं रुचिखंड के मकान नंबर ईडब्ल्यूएस 2/341 में किराए के कमरे में रहता हूं. यह मकान पीडब्ल्यूडी कर्मचारी गुलाबचंद सिंह का है. उन का बेटा अजय मेरा दोस्त है. जिस कमरे में मैं रहता हूं, वह मकान के ऊपर बना हुआ है. मेरी पत्नी ने मुझे दवा लेने के लिए भेजा था, जब मैं दवा ले कर वापस आया तो देखा, मेरी पत्नी छत के कुंडे से लटकी हुई थी. मैं ने घबरा कर उसे हाथ लगाया तो वह नीचे गिर गई. वह मर चुकी है.’’

‘‘घटना कब घटी?’’ सुधीर कुमार सिंह ने पूछा तो सचिन ने बताया, ‘‘रात 10 बजे.’’

‘‘तब से अब तक क्या कर रहे थे?’’ यह पूछने पर सचिन बोला, ‘‘रात भर उस की लाश के पास बैठा रोता रहा. सुबह हुई तो आप के पास चला आया.’’

सचिन ने आगे बताया कि वह यासीनगंज के मोअज्जमनगर का रहने वाला है और एक निजी कंपनी में नौकरी करता है. उस के पिता का नाम रमेश कुमार है. सचिन की बातों में एसओ सुधीर कुमार सिंह को सच्चाई नजर आ रही थी.

मामला चूंकि संदिग्ध लग रहा था, इसलिए उन्होंने इस मामले की सूचना क्षेत्राधिकारी कैंट बबीता सिंह को दी और सचिन को ले कर पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने जब उस के कमरे का दरवाजा खोला तो फर्श पर एक कमउम्र लड़की की लाश पड़ी थी. उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह शादीशुदा रही होगी.

इसी बीच सीओ कैंट बबीता सिंह भी वहां पहुंच गई थीं. सचिन की पूरी बात सुनने के बाद उन्होंने लड़की की लाश को गौर से देखा. उन्हें यह आत्महत्या का मामला नहीं लगा. बहरहाल, घटनास्थल की प्राथमिक काररवाई निपटा कर पुलिस ने मृतका की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी और सचिन को थाने ले आई. कुछ पुलिस वालों का कहना था कि सचिन की बात सच है. लेकिन बबीता सिंह यह मानने को तैयार नहीं थीं. उन्होंने मृतका के गले पर निशान देखे थे और उन का कहना था कि संभवत: उस का गला घोंटा गया है.

कुछ पुलिस वालों का कहना था कि अगर सचिन ने ऐसा किया होता तो वह खुद थाने क्यों आता? अगर उस ने हत्या की होती तो वह भाग जाता. इस तर्क का सीओ बबीता सिंह के पास कोई जवाब नहीं था. बहरहाल, हकीकत पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही पता चल सकती थी.

सावधानी के तौर पर पुलिस ने सचिन को थाने में ही बिठाए रखा. इस बीच सचिन पुलिस को बारबार अलगअलग कहानी सुनाता रहा. देर शाम जब पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो इस मामले से परदा उठा. पता चला, मृतका की मौत दम घुटने से हुई थी और उसे गला घोंट कर मारा गया था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट देखने के बाद पुलिस ने सचिन से थोड़ी सख्ती से पूछताछ की तो उस ने मुंह खोल दिया. सचिन ने जो कुछ बताया, वह एक किशोरी द्वारा अविवेक में उठाए कदम और वासना के रंग में रंगे एक युवक की ऐसी कहानी थी, जो प्यार के नाम पर दुखद परिणति तक पहुंच गई थी. मृतका सोफिया थी.

मिसकाल से शुरू हुई सचिन और सोफिया की प्रेमकहानी काफी आगे बढ़ चुकी थी. फोन पर होने वाली बातचीत के बाद दोनों के मन में एकदूसरे से मिलने की इच्छा बलवती होने लगी थी. तभी एक दिन सचिन ने कहा, ‘‘सोफिया, हमें आपस में बात करते 2 महीने बीत चुके हैं. अब तुम से मिलने का मन हो रहा है.’’

‘‘सचिन, चाहती तो मैं भी यही हूं. लेकिन कैसे मिलूं, समझ में नहीं आता. मैं अभी तक कभी अजगैन से बाहर नहीं गई हूं. ऐसे में लखनऊ कैसे आ पाऊंगी?’’ सोफिया ने कहा तो सचिन सोफिया की नादानी और भावुकता का लाभ उठाते हुए बोला, ‘‘इस का मतलब तुम मुझ से प्यार नहीं करतीं. अगर प्यार करतीं तो ऐसा नहीं कहतीं. प्यार इंसान को कहीं से कहीं ले जाता है.’’

‘‘ऐसा मत सोचो सचिन. तुम कहो तो मैं अपना सब कुछ छोड़ कर तुम्हारे पास चली आऊं?’’ सोफिया ने भावुकता में कहा.

‘‘ठीक है, तुम 1-2 दिन इंतजार करो, तब तक मैं कुछ करता हूं.’’  कह कर सचिन ने बात खत्म कर दी.

दरअसल वह किसी भी कीमत पर सोफिया को हासिल करना चाहता था. इस के लिए वह मन ही मन आगे की योजना बनाने लगा. सचिन का एक दोस्त था सुवेश. सचिन ने उस से कोई कमरा किराए पर दिलाने को कहा.

सुवेश को कोई शक न हो, इसलिए सचिन ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘दरअसल मैं एक लड़की से प्यार करता हूं और मैं ने उस से शादी करने का फैसला कर लिया है. चूंकि मेरे घर वाले अभी उसे घर में नहीं रखेंगे, इसलिए तुम किसी का मकान किराए पर दिला दो तो बड़ी मेहरबानी होगी. बाद में जब घर के लोग राजी हो जाएंगे तो मैं उसे ले कर अपने घर चला जाऊंगा.’’

सुवेश सचिन का अच्छा दोस्त था. उस की परेशानी समझ कर उस ने कहा, ‘‘मेरा एक दोस्त है अजय. उस का घर रुचिखंड में है. उस के मकान का ऊपर वाला हिस्सा खाली है. मैं उस से बात करता हूं. अगर अजय तैयार हो गया तो तुम्हें कमरा मिल जाएगा. वह 2 हजार रुपए कमरे का किराया लेगा. साथ ही एक महीने का एडवांस देना होगा.’’

सचिन इस के लिए तैयार हो गया. सुवेश ने अजय से बात की और अजय ने अपने पिता से. अजय का कोई दोस्त अपनी पत्नी के साथ रहेगा यह जान कर अजय के पिता गुलाबचंद राजी हो गए. सचिन ने कमरा देख कर एडवांस किराया दे दिया. इस के बाद उस ने 8 दिसंबर को सोफिया को फोन कर के कहा, ‘‘सोफिया, मैं तुम्हें लखनऊ बुलाना चाहता हूं. मैं 10 तारीख को तुम्हें अजगैन में मिलूंगा. हम 1-2 महीने अकेले रहेंगे. इस बीच मैं अपने घर वालों को राजी कर लूंगा और फिर तुम्हें अपने घर ले जाऊंगा.’’

सोफिया यही चाहती थी. वह पहले से ही सचिन के साथ जिंदगी जीने के सपने देख रही थी. योजनानुसार सोफिया 10 दिसंबर की सुबह अपने घर से निकली तो उस की मां ने पूछा, ‘‘आज स्कूल नहीं जाएगी क्या?’’

‘‘नहीं मां, आज दादी की दवा लेनी है, वही लेने जा रही हूं. थोड़ी देर में लौट आऊंगी.’’ कह कर सोफिया घर से निकल गई. उस ने घर से 10 हजार रुपए और चांदी की एक जोड़ी पायल भी साथ ले ली थी. अपने गांव से वह सीधी अजगैन पहुंची. सचिन उसे तयशुदा जगह पर मिल गया. उस से मिलने की खुशी में 17 साल की सोफिया अपने मांबाप की इज्जतआबरू, मानसम्मान, प्यार और विश्वास सब भूल गई. वहां से दोनों लखनऊ आ गए. सचिन सोफिया को अपने कमरे पर ले गया. खाना वगैरह दोनों ने बाहर ही खा लिया था.

कमरे पर पहुंचते ही सोफिया सचिन से शादी की बात करने लगी. सचिन ने उसे प्यार से समझाया, ‘‘मुझ पर भरोसा रखो. हम जल्द ही शादी भी कर लेंगे. मैं तुम्हें सारी बातें पहले ही बता चुका हूं.’’

दरअसल सचिन किसी भी तरह जल्द से जल्द सोफिया को हासिल कर लेना चाहता था. गहराती रात के साथ सचिन की जवानी हिलोरें मारने लगी तो वह सोफिया के न चाहते हुए भी अकेलेपन का लाभ उठा कर उसे हासिल करने की कोशिश करने लगा. सोफिया ने काफी हद तक खुद को बचाने की कोशिश की. लेकिन धीरेधीरे उस का विरोध कम हो गया और सचिन मनमानी करने में सफल रहा. सोफिया खुद को यह दिलासा दे रही थी कि आज न सही कल शादी तो होनी ही है. जो शादी के बाद होना था वह पहले ही सही.

अगले दिन सोफिया सचिन से शादी करने की जिद करने लगी. जबकि सचिन चाहता था कि वह किसी तरह अपने घर वापस चली जाए. उस ने बहानेबाजी कर के उसे लौट जाने को कहा तो सोफिया बोली, ‘‘घर से भाग कर आने वाली लड़की के लिए घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं. मैं अब वापस नहीं लौट सकती.’’

सचिन और सोफिया का वह पूरा दिन प्यार और मनुहार के बीच गुजरा. रात गहरा गई तो सोफिया खाना खा कर सो गई. जबकि सचिन जाग रहा था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि सोफिया से कैसे पीछा छुड़ाए.

उस के मन में खयाल आया कि क्यों न वह गला दबा कर सोफिया को मार डाले. लेकिन उसे लगा कि इस से उस की अंगुलियों के निशान सोफिया के गले पर आ जाएंगे और वह पकड़ा जाएगा. आखिरकार काफी सोचविचार कर उस ने अपने हाथों पर पौलीथिन लपेट ली और सोती हुई सोफिया का गला दबाने लगा.

इस से सोफिया जाग गई और अपना बचाव करने का प्रयास करने लगी. सचिन जवान था और सोफिया से ताकतवर भी. वैसे भी वह योजना बना कर उस की हत्या कर रहा था. सोफिया एक तो शरीर से कमजोर थी, दूसरे उसे सचिन से ऐसी उम्मीद नहीं थी. इस के बावजूद वह पूरा जोर लगा कर बचने की कोशिश करने लगी. इस पर सचिन ने उस के सिर पर जोरो से वार किया. इस से वह बेहोश हो गई. सचिन को मौका मिला तो उस ने सोफिया का गला दबा कर उसे मार डाला.

सोफिया के मरने के बाद सचिन के हाथपांव फूल गए. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे. रात भर वह सोफिया की लाश के पास बैठा रोता रहा. काफी सोचने के बाद जब उसे लगा कि अब वह बच नहीं पाएगा तो वह सुबह 4 बजे आशियाना थाने जा पहुंचा. उस ने अपने बचाव के लिए झूठी कहानी भी गढ़ी, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट और सीओ बबीता सिंह के सामने उस का झूठ टिक नहीं सका.

पुलिस ने मामले की जानकारी सोफिया के घर वालों को दी तो वे लखनऊ आ गए. उन लोगों ने बताया कि सोफिया किसी लड़के के साथ भाग आई थी. उन्हें सोफिया का शव सौंप दिया गया. लंबी पूछताछ के बाद सचिन के बयान की पुष्टि के लिए पुलिस ने मकान मालिक गुलाबचंद और उन के बेटे अजय व उस के दोस्त सुवेश से भी पूछताछ की.

आशियाना पुलिस ने सचिन के खिलाफ भादंवि की धारा 363, 376, 302 और पोक्सो एक्ट (प्रोटेक्शन औफ चिल्ड्रन फ्राम सैक्सुअल आफेंसेज एक्ट) की धारा 3/4 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. पूछताछ के बाद उसे जेल भेज दिया गया.

इस में कोई दो राय नहीं कि सचिन के पास बचने के तमाम रास्ते थे. वह सोफिया को कहीं बाजार में अकेला छोड़ कर भाग सकता था. उसे उस के घर पहुंचा सकता था. सोफिया नादान और नासमझ थी. वह 2 माह पुरानी मोबाइल की दोस्ती पर इतना भरोसा कर बैठी कि परिवार छोड़ कर लखनऊ आ गई. उस ने जिस पर भरोसा किया, वही उस का कातिल बन गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में सोफिया नाम परिवर्तित है.

अगले अंक में पढ़िए कैसे पहुंचाया सचिन ने सोफ़िया को मौत की कगार पर?

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