Love Story in Hindi : नाम की शादी

Love Story in Hindi. कुलदीप की लाश को फटी आंखों से ताकती तनवीर बुत बनी बैठी थी. जानपहचान वाले घर पर इकट्ठे होते जा रहे थे. अमेरिका का वह इलाका भारत के पंजाबी और सिख तबके का गढ़ था.

तनवीर की हालत देख कर औरतों के आंसू नहीं थम रहे थे. अभी 4 महीने पहले ही तो लाल जोड़े में आई तनवीर की आरती उतार कर उन्होंने प्यार से घर में स्वागत किया था.

बचपन से अनाथ कुलदीप अपने प्यार भरे स्वभाव के चलते किसी का बेटा, किसी का भाई या किसी का देवर बन चुका था. परायों के बीच उसे अपना परिवार मिल गया था.

तनवीर को सतवंत ताई ने गले से लगा कर रोंआसी आवाज में तसल्ली देनी चाही, ‘‘तू चिंता मत कर तन्नी बेटी. हम सब तेरे अपने हैं. खुद को अकेली मत समझ.’’

कुलदीप के साथी टैक्सी ड्राइवर उदास खड़े थे. उन का सब से ज्यादा जिंदादिल साथी उन्हें छोड़ कर जो चला गया था.

हाईवे पर हादसा होना कोई नई बात नहीं थी, पर कुलदीप तो बहुत होशियार ड्राइवर था. पुलिस का कहना है कि हादसा होने के समय वह मोबाइल फोन पर बातें कर रहा था.

दरअसल, सवारी से अच्छे पैसे पा कर कुलदीप की खुशी दोगुनी हो गई थी. उस ने तनवीर को फोन लगाया था. शाम को लोहड़ी में पहनने के लिए उस ने अपनी तन्नी के लिए जामुनी रंग का सलवारसूट खरीदा था, तभी जोर के एक धमाके के साथ सब खत्म हो गया.

5-7 दिन तक बारीबारी से कोई न कोई पड़ोसन तनवीर के पास रही. सतवंत ताई और मनजीत भाभी का मन अपने घर में टिकता ही नहीं था. तन्नी का दुख उन का अपना दुख बन गया था.

सब के सामने एक बड़ा सवाल यह था कि अब तन्नी का क्या होगा? किराए का घर तो छोड़ना ही होगा. सब सोच में पड़ गए कि वह कहां जाएगी?

कुलदीप और तनवीर की कहानी सब जानते थे. कुलदीप ने बताया था कि जब वह भारत में था, तब बचपन में ही उस के मातापिता हैजे के शिकार हो कर चल बसे थे.

लालची चाचाचाची पूरी जायदाद पर कब्जा करना चाहते थे. समझदार हो रहा कुलदीप उन की राह का कांटा बन रहा था.

जवान हो रहे कुलदीप को गांव वालों ने इशारोंइशारों में बताया था, ‘चाचा तुम्हारी जान का दुश्मन बन चुका है. उस के साथ रहने में खतरा है.’

पास के गांव में रहने वाला जगजीत अकसर कुलदीप से मिलता रहता था. वह अमेरिका में टैक्सी चलाता था. कुलदीप की हालत देख कर उस ने सलाह दी थी, ‘यहां रह कर चाचा की चाकरी कर के क्यों बेकार में गालियां खाता है? चल, मेरे साथ. अमेरिका में तेरी जिंदगी बन जाएगी.’

चाचा ने एक चाल चल कर पूरी जायदाद अपने नाम लिखवा ली थी. कुलदीप को अमेरिका की टिकट के पैसे दे कर चाचा ने जैसे उस पर एहसान किया था.

अमेरिका पहुंच कर कुलदीप की दुनिया ही बदल गई. जगजीत को वह अपना भाई मानता था. जगजीत की घरवाली मनजीत भाभी के साथ वह अपना सुखदुख बांटता था.

कुलदीप कहता था, ‘खून के रिश्तों से बड़ा मन का रिश्ता होता है. जगजीत से मेरे मन का रिश्ता है. उस ने मुझे नई जिंदगी दी है.’

जगजीत की बहिन की शादी में कुलदीप भी उस के साथ भारत में उस के गांव गया था. वापसी में तनवीर भी उस के साथ आई थी.

‘क्यों रे कुलदीप, यह परी कहां से उड़ा लाया? तू ने तो हमें अपनी शादी की खबर भी नहीं दी?’ अमेरिका में सतवंत ताई ने उसे मीठा उलाहना दिया था.

‘हां, कुलदीप देवरजी, अब हमें सचसच बताओ कि यह कमाल कैसे हो गया?’ कमलजीत भाभी ने सब के मन की बात कही थी.

‘एक बात जान ले कुलदीप, अगर इन्हें पूरी कहानी नहीं सुनाई, तो ये तुझे  तनवीर से मिलने नहीं देंगी,’ मनजीत भाभी ने चेतावनी दे डाली थी.

20 दिन की बच्ची को ले कर मनजीत अपनी ननद की शादी में भारत नहीं जा पाई थी. कुलदीप की प्रेम कहानी सुनने के लिए वह भी बहुत उतावली थी.

‘अरे भाभी, ऐसी कड़ी सजा मत देना. चलो, मैं सब बताता हूं,’ कुलदीप बोला था.

औरतें चौकन्नी हो कर बैठ गई थीं. सब के मन में कोई फिल्मी कहानी उभर रही थी. कुलदीप ने बताना शुरू किया था, ‘तनवीर की सौतेली मां के जुल्मों ने उस की बुरी हालत कर दी थी. सौतेली मां की 3 और बेटियां हैं, पर घर का सारा काम तनवीर पर मढ़ कर सब मौज करतीं. यह देख कर मैं ने तनवीर से शादी करने का फैसला सुना डाला.

‘अमेरिका में कमाने वाला दूल्हा मिलने की बात से सौतेली मां जल गई. शादी न होने देने के लिए उस ने बहुत अड़ंगे लगाए, पर गांव वालों और जगजीत की मदद से हमारी शादी हो गई.’

कुलदीप की तरह तनवीर भी सब की प्यारी ‘तन्नी’ बन गई.

कुलदीप की मौत के बाद अब तनवीर का क्या होगा? जानपहचान के सभी मर्द इसी सोच में पड़ गए. तनवीर तो टूरिस्ट वीजा पर आई थी. कुलदीप का मानना था कि अमेरिका में रहते हुए ही वह तनवीर का वीजा स्टेटस बदलवा लेगा.

कुलदीप खुद ग्रीन कार्ड पर था. तनवीर कानूनन 6 महीने से ज्यादा वहां नहीं रह सकती थी. भारत वापस जाने का मतलब उसे फिर उसी नरक में झोंक देना था.

बूढ़े सरदार कुलवंत सिंह ने समस्या उठाई, ‘‘अब हमें सोचना है कि तनवीर बेटी की कैसे मदद की जाए?’’

‘‘सच तो यह है ताऊजी कि इधर कुआं है, तो उधर खाई. तन्नी को भारत नहीं भेजा जा सकता. हमारा कुलदीप उसे जिस आग से बचा कर लाया था, हम तन्नी को उसी आग में जलने को नहीं भेज सकते, पर यहां रहने में भी कानूनी अड़चनें हैं,’’ जगजीत ने कुछ सोचते हुए कहा.

यह सुन कर सब सोच में पड़ गए. अचानक हरजीत ने एक चौंकाने वाला प्रस्ताव सब के सामने रख दिया, ‘‘अगर माफी मिले तो जो एक तरीका मेरे दिमाग में आ रहा है, सब को बताऊं?’’

‘‘हां… हां, बेखौफ हो कर बता बेटा. तन्नी बेटी की खुशी हमारे लिए सब से ऊपर है.’’

‘‘अरमिंदर को तो आप जानते हैं न ताऊजी?’’

‘‘अरे, उसे कौन नहीं जानता. वह तो पूरी बिरादरी को बदनाम कर रहा है,’’ यह कह कर सरदार कुलवंत सिंह का चेहरा कठोर हो गया था.

‘‘इस मुश्किल घड़ी में वही हमारी मदद कर सकता?है,’’ हरजीत ने कहा.

‘‘क्या बकवास कर रहा है तू? इसी अरमिंदर ने पहले एक 50 साल की औरत के साथ शादी कर के अमेरिका की नागरिकता ली. उसे तलाक दे कर भारत से सुरजीत को ब्याह कर ले आया. उस से भी तलाक हो गया.

‘‘अब तो उस ने यह धंधा बना लिया है. पैसे ले कर जरूरतमंद लड़कियों से शादी करता है, बाद में उन्हें तलाक दे कर खुला घूमता है. ऐसे नीच इनसान से कौन सी मदद मिलेगी?’’ सरदारजी के चेहरे पर नफरत साफ झलक रही थी.

‘‘कहने को तो वह आटोमोबाइल पार्ट्स की दुकान का मालिक है, पर असल में वह औरतों को परमानैंट वीजा दिला कर पैसे कमाता है. इस के बावजूद वह कहता?है कि वह किसी की मजबूरी का कोई फायदा नहीं उठाता, बल्कि उन की मदद करता है,’’ जगजीत ने नाराजगी से कहा.

‘‘यह सच बात है. दरअसल, अरमिंदर को न जाने क्यों औरत जात से नफरत है. उस के खिलाफ किसी लड़की ने कभी कोई शिकायत नहीं की, बल्कि वे उस की एहसानमंद हैं,’’ हरजीत ने अपनी बात रखी.

‘‘तू कहना क्या चाहता है? साफसाफ बता,’’ सरदारजी ने जानना चाहा.

‘‘तनवीर की शादी अरमिंदर से करानी होगी. उस की बीवी बन कर तनवीर को अमेरिका का परमानैंट वीजा मिल जाएगा. वीजा मिलने के बाद ही तनवीर यहां रह सकती है और काम भी कर सकेगी,’’ हरजीत ने बात साफसाफ कह दी.

‘‘तेरा मतलब है कि हम तन्नी को उस भेडि़ए के हाथ में सौंप दें?’’ जगजीत ने गुस्से से कहा.

‘‘क्या अरमिंदर पर यकीन किया जा सकता है? अगर उस ने तन्नी की मरजी के खिलाफ कोई जबरदस्ती की तो?’’ जगजीत ने सवाल किया.

‘‘अगर उस ने ऐसा करने की गलती की, तो हम सब मिल कर उसे ऐसा सबक सिखाएंगे कि उस की अक्ल ठिकाने आ जाएगी,’’ हरजीत ने मजबूती से अपनी बात कही.

हरजीत की बात में दम था, लेकिन इस का अंजाम खतरनाक भी हो सकता?था.

बहुत सोचनेसमझने के बाद सब का फैसला हरजीत के हक में था. तनवीर को इस नाम की शादी के लिए राजी करने की जिम्मेदारी औरतों को दी गई.

तनवीर को समझ  पाना इतना आसान नहीं था. भारत वापस जाने के नाम पर तनवीर कांप उठती. सौतेली मां ने जाते समय कड़ी चेतावनी दी थी, ‘अमेरिका का लड़का फांस कर हमारा बड़ा नाम किया है. खबरदार, जो पलट कर मुंह दिखाया, तो तेरी खैर नहीं.’

तनवीर को अपनी छाती से लगा कर मनजीत ने समझाया, ‘‘देख तन्नी, तू मेरी छोटी बहिन जैसी?है. तेरी भलाई के लिए ही हम ने यह फैसला लिया?है.

‘‘कुलदीप नहीं चाहता था कि तू कभी वापस भारत जाए. यहां रह कर तू एक नई जिंदगी जी सकती है, पर उस के लिए परमानैंट वीजा चाहिए.’’

सब के समझने से तनवीर का विरोध ज्यादा देर नहीं टिक सका. सब ने उस की सलामती की जिम्मेदारी ली थी.

अरमिंदर से जब बात की गई, तो उस ने सपाट लहजे में कह दिया, ‘‘जरूरतमंद लड़कियों और औरतों को परमानैंट वीजा दिलाना मेरा काम है. पैसे मिलेंगे तो तनवीर तो क्या, मैं किसी से भी शादी करने के लिए तैयार हूं.’’

‘‘पर एक बात समझ  ले अरमिंदर, हमारी तनवीर पैसे देने की हालत में नहीं है. उस की मदद कर दे बस,’’ सरदारजी ने प्यार से कहा.

‘‘तू तनवीर की मदद कर दे. हम सब मिल कर जो भी बनेगा, पैसा इकट्ठा कर के तुझे  दे देंगे,’’ जगजीत ने मिन्नत की.

‘‘वाह, मुझे क्या इतना गयागुजरा समझ  लिया? मुझे  भीख के पैसे नहीं चाहिए,’’ अरमिंदर ने कुछ नाराजगी से कहा.

‘‘माना कि यह शादी बस नाम के लिए होगी, पर पैसों की भरपाई की जगह जब तक तनवीर को परमानैंट वीजा नहीं मिल जाता, वह तेरा घर संभालेगी. तेरे लिए रोटी बनाएगी, साफसफाई करेगी. बोल, यह सौदा मंजूर है?’ सरदारजी ने पूछा.

‘‘ठीक है, परमानैंट वीजा मिलते ही मैं तनवीर को तलाक दे दूंगा. उस वक्त यह शर्त मत रखिएगा कि उसे जिंदगीभर के लिए सहारा दूं.’’

अरमिंदर की ‘हां’ से सभी के चेहरे खिल उठे.

गुरुद्वारे में दोनों की शादी के समय सारी बिरादरी जमा हुई थी. तनवीर के आंसू चुन्नी से पोंछ कर सतवंत ताई ने तसल्ली दी, ‘‘घबरा मत तन्नी, शादी तो नाम के लिए है. कुछ महीने बाद तू यहां रह सकेगी. हम सब तेरे साथ हैं बेटी.’’

‘‘मुझे तो लगता है कि अरमिंदर जैसा बुरा इनसान भी हमारी तन्नी के साथ रह कर अच्छा इनसान बन जाएगा. अगर दोनों के मन मिल गए, तब तो बल्लेबल्ले. क्यों तन्नी?’’ उस गंभीर माहौल को मनजीत ने अपने मजाक से हलका करना चाहा.

आंसू?भरी आंखों के साथ तनवीर उस बदनाम अरमिंदर के घर आ गई. घर पर एक नजर डालते हुए अमरिंदर ने तनवीर से कहा, ‘‘एक बात अच्छी तरह से समझ ले. इस घर को अपना घर समझाने की भूल कभी मत करना. यह कमरा तेरा वेटिंगरूम है. जिस दिन तेरा टिकट मिल गया, अपनी गाड़ी पकड़ कर चलती बनना.’’

‘‘जी…’’ यह सुन कर तनवीर की आंखें भर आईं.

‘‘एक बात और साफ कर दूं. यह मेरा घर है, तू यहां गृहस्थी जमाने की कोशिश मत करना. घर में कुछ बरतन जरूर पडे़ हैं, पर रोटी पकाने का कोई सामान नहीं है. अब कुछ वक्त तु?ो यहां रहना है, तो कुछ इंतजाम करना होगा. आज बाहर से खाना आ जाएगा. मुश्किल में पड़ गया मैं तो,’’ अरमिंदर का गुस्सा फूट पड़ा.

अरमिंदर के जाने के बाद एक लड़का खाने की थाली के साथ आ पहुंचा. वह बोला, ‘‘भाभी, आप के लिए खाना लाया हूं. अरमिंदर भाई ने कहा है कि आप उन का इंतजार मत करना.’’

तनवीर की रुलाई फूट पड़ी. कुलदीप उसे कितने प्यार से खाना खिलाता था, पर अब कुलदीप कहां  था? खाना छूने का भी मन नहीं किया. आंखों से नींद भाग चुकी थी. क्या से क्या हो गया था.

देर रात दरवाजा खुलने की आवाज पर तनवीर डर गई. कमरे की खिड़की से बाहर झंकने पर हाथ में बोतल के साथ डगमगाते कदमों से अरमिंदर आता दिखाई दिया.

नशे में धुत्त अरमिंदर अपने कमरे में चला गया. इस आदमी के साथ तनवीर कैसे रहेगी?

सुबह नहाधोकर तनवीर काम से फारिग हो चुकी थी और सोच रही थी, ‘पता नहीं, वह चाय पीता भी है या नहीं?’

ताई ने समझाया था, ‘समझदारी से कुछ वक्त निकालना होगा तन्नी. अपने को उस से बस दूर रखना. इस बीच उस की और उस के घर की ठीक से देखभाल कर लेना.’

तनवीर की सोच को अरमिंदर की आवाज ने तोड़ा था, ‘‘तू ने कल रात खाना नहीं खाया. थाली वैसे ही रखी हुई थी. क्यों?’’ ‘‘जी… भूख नहीं थी.’’

‘‘एक बात समझ  ले. यहां कोई मानमनौव्वल करने वाला नहीं है. सरदारजी ने कहा है कि तू सारा घर संभालेगी. भूखी रह कर काम कैसे कर पाएगी. तू चाय पीती है?’’

‘‘जी, आप चाय लेंगे?’’ तनवीर ने सहमते हुए पूछा.

‘‘मैं ने कहा न कि अपने काम से काम रख. मेरी जिंदगी में दखल मत दे. कल कुछ सामान आया था. चाय की पत्ती, चीनी वगैरह होगी. दूध फ्रिज में होगा,’’ अपनी बात कह कर अरमिंदर बाहर चला गया जा  तेजाते अरमिंदर कह गया, ‘‘किसी अनजान के लिए दरवाजा मत खोलना. अपने लिए खाना पका लेना.’’

रात की थाली में से एक रोटी गले से उतार कर तनवीर ने पानी पी लिया. इस जिंदगी की तो उसे आदत डालनी ही होगी.

तनवीर ने कमरा ठीक कर दिया. वह समझ  नहीं पा रही थी कि दिन कैसे कटेगा. कुलदीप की यादें उसे कचोट रही थीं. सूना घर उसे काटने को दौड़ रहा था.

रात में तनवीर ने दालसब्जी के साथ रोटियां बना दीं. अगर अरमिंदर आ गया, तो खाना परोस देगी.

रात को बहुत देर तक इंतजार करने के बाद उस ने 2 रोटियां खा लीं. ताई ठीक कहती हैं, ‘कुछ भी हो जाए, यह पापी पेट नहीं मानता. इसे तो भरना ही पड़ता है.’

फिर वही दरवाजा खुलने की आवाज और अरमिंदर का लड़खड़ाते कदमों से घर में आना तनवीर को डरा गया. अगर कभी अरमिंदर ने उस के साथ जबरदस्ती की, तो वह क्या करेगी? कल से अपने बंद दरवाजे के आगे मेज लगा कर सोएगी.

अरमिंदर ने तनवीर को परमानैंट वीजा दिलाने का काम शुरू कर दिया. इतने दिनों में तनवीर काफी सामान्य हो चली थी. अरमिंदर ने कभी कोई गलत हरकत नहीं की, बल्कि उस की जरूरतों के बारे में पूछ कर वह उस का मन हलका कर देता.

एक दिन अरमिंदर काम पर जाने को निकलने ही वाला था कि तनवीर एक डब्बा ले कर आ गई, ‘‘आप के लिए खाना बनाया है…’’

‘‘क्या मैं ने कहा था कि मेरे लिए खाना बना?’’ अरमिंदर ने रूखेपन से कहा.

‘‘आप रोज बाहर का खाना खाते हैं. घर में रोटी बनती है, इसलिए…’’

‘‘देख तनवीर, मैं ने पहले ही कह दिया था कि रोटी का डब्बा थमा कर मेरी घरवाली बनने की कोशिश मत कर… समझ?’’

अरमिंदर की इस सख्त बात पर आंसू भरी आंखों के साथ तनवीर अपने कमरे में चली गई. काफी देर बाद उस ने बाहर आने पर देखा, रोटी का डब्बा नहीं था.

उस शाम अरमिंदर कुछ जल्दी घर आ गया. रोटी वाला डब्बा रसोईघर में रख कर उस ने कहा, ‘‘तेरा डब्बा तो मेरे साथी खाली कर गए. कह रहे थे कि सब्जी अच्छी बनी थी.’’

अरमिंदर की इस बात से तनवीर का चेहरा खुशी से चमक उठा. उस दिन के बाद से तनवीर रोज अरमिंदर को खाने का डब्बा थमाने लगी, पर शाम का वही रूटीन चलता रहा.

सतवंत ताई और मनजीत भाभी अकसर तनवीर के पास आ जाती थीं. साफसुथरा घर देख कर मनजीत के चेहरे पर शरारत छलक आई, ‘‘वाह तन्नी, देखती हूं, तू ने अरमिंदर का घर संवार दिया है. चमक रहा है घर. एक बात बता, क्या तू ने घर के मालिक को भी संभाल लिया है?’’

‘‘चुप कर मनजीत. जो मुंह में आता है, बोल देती है. सहीगलत का तो ध्यान रखा कर. हां तन्नी बेटी, बता अरमिंदर तुझे  परेशान तो नहीं करता?’’ सतवंत ताई ने पूछा.

‘‘नहीं ताई, उन्होंने कभी परेशान नहीं किया. वे मेरी जरूरतों का खयाल रखते हैं,’’ तनवीर के चेहरे पर थोड़ी सी खुशी झलक आई.

‘‘क्या कहा तन्नी? वह तेरी हर जरूरत का खयाल रखता है?’’ मनजीत कान में फुसफुसाई.

तनवीर का चेहरा शर्म से लाल हो आया. ताई ने राहत की सांस ली, ‘‘चल, यह सुन कर तसल्ली हुई. हम सब तो डरते थे कि कहीं वह तेरे साथ कोई बदसुलूकी न करे.’’

तन्नी को आशीर्वाद दे कर वे दोनों चली गईं. रास्ते में मनजीत को चुप देख कर सतवंत ताई ने  पूछा, ‘‘क्या सोच रही है मनजीत?’’

‘‘एक बात का डर लग रहा है ताई. कहीं तन्नी उस अरमिंदर शैतान के जाल में न फंस जाए. वह तो प्यार का मतलब भी नहीं जानता. कहीं हमारी तन्नी धोखा न खा बैठे.’’

‘‘क्या पता, तन्नी के साथ रह कर अरमिंदर ही सुधर जाए.’’

अमेरिका के उस हिस्से में सिख और पंजाबी जोरशोर से बैसाखी मनाते थे. बैसाखी के 2 दिन पहले अरमिंदर ने तनवीर को एक कीमती सलवारसूट दे कर उसे हैरानी में डाल दिया.

उस ने सपाट लहजे में कहा, ‘‘परसों पास के मैदान में बैसाखी का मेला लगेगा. यह सूट पहन कर चली जाना.’’

‘‘आप नहीं चलेंगे?’’

‘‘नहीं. तेरी ताई और भाभी तुझे  ले जाएंगी. ये कुछ पैसे रख ले, जो जी चाहे खरीद लेना.’’

नोटों का एक बड़ा बंडल देख कर तन्नी डर गई, ‘‘नहीं, मुझे  पैसे नहीं चाहिए. मैं मेले में नहीं जाऊंगी.’’

‘‘देख, यह औरतों का मनपसंद मेला है. तू वहां जरूर जाएगी. मैं भाभी को बोल चुका हूं,’’ इतना कह कर अरमिंदर वहां से चला गया.

मनजीत के साथ कई औरतें आई थीं. तन्नी को नया सूट पहने देख कर मनजीत की नजर ठहर गई, ‘‘वाह तन्नी, तू ने तो बड़ा प्यारा सूट पहना है.’’

‘‘वे लाए हैं…’’ शरमाती हुई तन्नी बस इतना ही कह सकी.

‘‘ओए… होए, यह ‘वे’ कौन हैं जी?’’

सब की हंसी ने तन्नी का चेहरा लाल कर दिया. मेले में सब ने खूब मजे किए. उतनी देर के लिए तनवीर अपना दुख भुला बैठी. घर लौटने पर उम्मीद के उलट अरमिंदर घर में ही था.

‘‘कैसा था मेला?’’ अरमिंदर ने पूछा.

‘‘बहुत मजा आया. मनजीत भाभी ने जबरदस्ती चूडि़यां दिलवा दीं…’’ तनवीर ने चहकते हुए बताया.

‘‘ठीक है, बहुत रात हो गई. जा, सो जा,’’ अपने कमरे का दरवाजा बंद कर अरमिंदर ने तन्नी के जोश पर ठंडे पानी के छींटे डाल दिए.

अब तन्नी को जिंदगी मुश्किल नहीं लगती थी. उसे अरमिंदर के आने का इंतजार रहता. उस का मनपसंद खाना बना, उस की तारीफ के दो शब्द सुनने को वह उतावली रहती. समझ नहीं पाती, अरमिंदर को लोग खराब क्यों कहते हैं?

कुलदीप की यादें अब धुंधली होने लगी थीं. अपनी नई जिंदगी से तन्नी ने समझौता कर लिया था.

एक दिन अरमिंदर को शराब पीते देख कर वह बोल उठी, ‘‘आप इतनी शराब न लिया करें, नुकसान करती है.’’

‘‘मेरे फायदेनुकसान से तुझे  क्या लेनादेना है? इस बारे में तो मैं ने कभी सुरजीत का कहा भी नहीं माना,’’ तन्नी की बात बीच में ही काट कर अरमिंदर ने रूखेपन से कहा.

‘‘जी, सुरजीत कौन थीं?’’

‘‘थी नहीं, है. उस की यादें इस दिल में इतनी गहरी बैठी हैं, जिन्हें कोई नहीं मिटा सकता. मेरी सबकुछ है सुरजीत.’’

‘‘अब वे कहां हैं?’’

‘‘मु?ो छोड़ गई. मेरे ही दोस्त के साथ घर बसा लिया उस ने, पर मैं पूरी जिंदगी उस का इंतजार करूंगा. अगर मेरा प्यार सच्चा है, तो वह मेरे पास जरूर आएगी.’’

न जाने क्यों अरमिंदर की इस बात से तनवीर का दिल बैठ गया. कई कहानियां याद हो आईं. प्रेमिका या प्यारी बीवी के न रहने पर लोग देवदास बन जाते हैं, पर सच्ची जीवनसंगिनी मिल जाने पर पुराने घाव भर जाते हैं. क्या तनवीर के साथ ने अरमिंदर पर कोई असर नहीं डाला?

2 दिन बाद हाथ में लिफाफा लिए अरमिंदर ने खुशीखुशी तनवीर से कहा, ‘‘ले, तेरा परमानैंट वीजा आ गया. आज से तेरी छुट्टी. खुशी मना. जहां जी चाहे, जा सकती है.’’

‘‘कहां जाऊं मैं?’’

‘‘अरे, अब तू जो चाहे काम कर सकती है. तलाक होते ही किसी अच्छे लड़के के साथ शादी कर के घर बसा सकती है.’’

‘‘मैं यहां क्यों नहीं रह सकती?’’

‘‘क्या कह रही है? कहीं तू खुद को मेरी घरवाली तो नहीं मान बैठी? देख तन्नी, मैं ने पहले ही कह दिया था कि जिस दिन तेरा टिकट आएगा, तु?ो यहां से जाना होगा. मेरा घर तो तेरे लिए मुफ्त की सराय था. अब तेरा दानापानी यहां से उठ गया.’’

‘‘मैं इस घर के एक कोने में पड़ी रहूंगी. मु?ो यहां रहने दीजिए,’’ तन्नी की आंखों में आंसू थे.

‘‘आंसू बहाना बेकार है. मैं ने तु?ो कोईर् धोखा नहीं दिया है. पहले ही साफसाफ बता दिया था कि तेरामेरा कोई रिश्ता नहीं है. मैं प्यारव्यार में यकीन नहीं रखता… सम?ा?’’

‘‘अगर यह सच है, तो आप सुरजीत को याद क्यों करते हो?’’ अचानक तन्नी तड़प उठी.

‘‘सुरजीत का नाम मत ले. एक सच जान ले कि इस दुनिया में पैसा ही सबकुछ है. अगर उस वक्त मेरे पास इतने पैसे होते, तो सुरजीत क्यों जाती?’’ अरमिंदर की आवाज तल्ख हो आई.

‘‘मुझे पैसों का जरा भी मोह नहीं है. मैं आप का घर देखूंगी…’’

‘‘फिर वही बात. जब तू मुझे छोड़ेगी, तभी तो किसी और के साथ शादी कर पैसे कमाऊंगा. तेरी वजह से अपना धंधा चौपट नहीं कर सकता. मैं तलाक की अर्जी दे रहा हूं.’’

‘‘ठीक है, तो मुझे भी कोईर् पैसे कमाने वाला काम दिला दो. मैं चली जाऊंगी,’’ तन्नी ने आंसू पोंछ दिए.

‘‘तू किसी के साथ शादी कर के आराम की जिंदगी जी सकती है. तू कहे, तो मैं कोईर् अच्छा लड़का देखूं?’’

‘‘नहींनहीं, मुझे शादी नहीं करनी है. शादी का सुख मेरे नसीब में ही नहीं लिखा है.’’

अरमिंदर सोच में पड़ गया. कुछ देर बाद वह बोला, ‘‘तू पढ़ीलिखी तो नहीं है, अंगरेजी जाने बिना कोई ठीक काम मिल नहीं सकता. 5वीं पास औरत क्या कर सकती है?’’

‘‘मैं कोई भी काम कर सकती हूं. किसी के घर रोटी पकाने का काम तो मुझे मिल ही जाएगा न?’’ तन्नी ने कहा.

‘‘एक काम कर सकती है. बुरा न माने तो कहूं.’’ ‘‘कहिए?’’

‘‘मेरे एक चाचा का बेटा हरमिंदर अमेरिका आना चाहता है, लेकिन आजकल वीजा मिलना मुश्किल है. तू उस के साथ शादी कर के मुंहमांगे पैसे पा सकती है. देख, मैं ने मुफ्त में तेरी मदद की है, तू पैसे ले कर मेरा एहसान उतार सकती है.’’

‘‘आप यह क्या कह रहे हो? यह तो पाप है.’’

‘‘हरमिंदर के साथ भी तेरी शादी नाम के लिए होगी. तेरी मरजी के बिना वह मुझे छुएगा भी नहीं.’’

‘‘नहींनहीं, यह नहीं हो सकता…’’

‘‘सोच ले. मैं तो कहता हूं, तेरा परमानैंट वीजा तेरे लिए तुरुप का पत्ता है. मेरी तरह शादी कर के जरूरतमंदों को वीजा दिला कर खूब पैसे बना सकती है. इस बीच अगर किसी से मन मिल जाए, तो घर भी बसा सकती है.’’

‘‘नहीं, मेरे लिए तो यह सुनना भी गलत है,’’ चुन्नी से चेहरा ढक कर तन्नी अपने कमरे में चली गई.

रातभर जागी तन्नी ने सूजी आंखों के साथ सुबह अरमिंदर को फैसला सुना दिया, ‘‘अपने हरमिंदर को बता दो, मैं शादी करने को तैयार हूं.’’

‘‘वाह, यह हुई न बात. मैं अभी भारत फोन लगाता हूं. जब तक हमारा तलाक होता है, तू भारत जा कर चाचा के यहां रह कर सब देखसम?ा लेना.’’ ‘‘जी…’’

‘‘तू जल्दी से अपना सामान पैक कर ले. मैं तेरा टिकट बुक करा देता हूं,’’ कहते हुए अरमिंदर फोन पर टिकट बुक कराने लगा.

तन्नी का भारत जाने का टिकट आ गया. टिकट थामती तन्नी को लगा, जैसे उस की मौत का फरमान आ गया हो.

अरमिंदर ने एक हजार डालर देते हुए समझया, ‘‘इन्हें मुश्किल घड़ी के लिए संभाल कर रखना. चाचा के यहां तुझे एक पैसा भी खर्च नहीं करना होगा. वापसी होने पर हरमिंदर को मैं अपने साथ काम पर लगा लूंगा.’’

‘‘ठीक है, उसे भी परमानैंट वीजा मिलने पर अपनी तरह जरूरतमंदों को वीजा दिलाने के धंधे में लगा लेना,’’ तन्नी की कड़वी आवाज अनचाहे ही निकल गई.

‘‘चुप कर. इस काम से मुझे कोई खुशी नहीं मिलती. सच यही है कि सच्चा प्यार भी पैसा चाहता है.’’

‘‘अब तो तुम पैसे वाले हो, घर क्यों नहीं बसा लेते? कुछ भी कहो, तुम्हें इस काम में मजा आता है.’’

‘‘मैं क्या करता हूं, यह मेरी मरजी है. तू अपने काम से मतलब रख. अपनी जिंदगी में दखलअंदाजी करने का हक मैं ने किसी को भी नहीं दिया है.’’

जगजीत तन्नी को एयरपोर्ट तक छोड़ने के लिए अपनी टैक्सी के साथ आ चुका था.

तन्नी के हाथ से सूटकेस ले कर जगजीत ने पूछा, ‘‘अचानक भारत क्यों जा रही हो? हम तो तेरे परमानैंट वीजा मिलने पर खुशी मना रहे थे. सरदारजी तुझे  कोई काम दिलाने की सोच रहे हैं. अच्छा हुआ, तुझे  अरमिंदर से छुटकारा मिल गया.’’

‘‘हां भैया, मैं जल्दी आऊंगी.’’ ‘‘किसी से मिले बिना क्यों जा रही हो? अभी भी वक्त है, उधर होता चलूं?’’

‘‘नहीं भैया. सीधे एयरपोर्ट चलना है. मैं वापस आ कर उन्हें समझ  दूंगी.’’ ‘‘अरमिंदर कहां है? तुझे  छोड़ने नहीं आएगा?’’

‘‘मैं कौन सी उन की रिश्तेदार लगती हूं? बहुत एहसान कर दिया उन्होंने. अब और नहीं,’’ तनवीर की आवाज में कड़वाहट घुल गई.

एयरपोर्ट पर तन्नी को छोड़ कर जगजीत चला गया. सूटकेस खींचती तनवीर काउंटर की ओर जा ही रही थी कि अचानक अरमिंदर की आवाज कानों में गूंजी, ‘‘वापस चल तन्नी. तू कहीं नहीं जाएगी.’’

‘‘क्या… क्यों?’’ हैरान तन्नी और कुछ नहीं पूछ सकी.

‘‘क्योंकि मैं तेरे बिना नहीं रह सकता. सुरजीत की झूठी यादों के सहारे जीने की कोशिश में खुद को बहुत सजा दे चुका हूं. मेरे कहेसुने को माफ कर दे. चल, मेरा घर तेरा इंतजार कर रहा है.’’

यह सुन कर अरमिंदर की फैली बांहों में वह समा गई. Love Story in Hindi

Love and Sacrifice Story : हां, अनि : रोजी ने ठुकराया सुनील का प्यार

Love and Sacrifice Story : सीमा के संदर्भ में मैं ने एक कविता संग्रह ‘आओ, इस जर्जर घड़ी को बदल डालें’ शीर्षक से लिखा था, जिस की याद अब मुझे आ रही है और अनिता अक्षरश: उसे सुनाने लगी. मेरे अपने ही शब्द आज मुझे कितने भोथरे महसूस हो रहे हैं.

‘‘जितनी जल्दी हो सके…आओ इस जर्जर घड़ी को बदल डालें. वरना हरगिज माफ नहीं करेंगी हमें…आने वाली हमारी नस्लें…’’

सीमा, यानी अनिता की पुरानी सहेली, इतनी जल्दी वह घर आ धमकेगी, वह भी मेरी गैरमौजूदगी में, यह तो बिलकुल न सोचा था. कल शाम को बाजार में शौपिंग करते हुए अचानक वह मिल गई तो मैं चौंक उठा, जबकि उस के चेहरे पर ऐसा कोई भाव न उभरा था.

‘‘सुनील, यह सीमा है,’’ अनिता ने परिचय दिया, ‘‘मेरी प्रिय सखी.’’ ‘‘बड़ी खुशी हुई आप से मिल कर,’’ औपचारिकता के नाते कहना पड़ा. कड़वा सच एकदम से उगला भी तो नहीं जाता.

‘‘किसी हसीन लड़की से साली का रिश्ता जुड़ जाने पर भला कौन खुश नहीं होगा,’’ निसंकोच सीमा ने कहा और हंस पड़ी. वही 3 साल पुराना चेहरा, वही रूपरंग, कातिल अदा, मोतियों से चमकते दांत, कुदरती गुलाबी होंठ और उसी तरह गालों को चूमती 2 आवारा लटें, कुछ भी तो न बदली थी वह. हां, उस का यह नाम जरूर पहली बार सुना और अपनी बात पर स्वयं ही खिलखिला उठना कतई न सुहाया. मन में दबी नफरत की चिंगारी भड़क उठी और ‘साली का संबोधन’ अंगारे की तरह अंदर जलाता चला गया.

‘‘अच्छा, मैं चलूं, अनिता,’’ सहसा वह बोली.

मैं उस से पूछना चाहता था कि इतना कह देने भर से ही क्या तुम छूट जाओगी और मेरी यादों के कैनवास पर से तुम्हारे चरित्र के दाग मिट जाएंगे?

‘‘ऐसी भी क्या जल्दी है,’’ अनिता ने कहा, ‘‘इतने बरसों बाद तो मिली हो, घर चलो, आराम से बैठ कर बातें करेंगे.’’ ‘‘फिर कभी आऊंगी, अभी जल्दी में हूं, अपना पता दे दो.’’

अनिता ने उसे अपना विजिटिंग कार्ड थमा दिया था.

रात भर मैं यही सोचता रहा कि उस ने अनिता के सामने ऐसा क्यों जताया कि हम पहली बार मिले हैं. क्या वह मुझे उस पत्र से ब्लैकमेल करना चाहती है, जिस में प्रेम के साथसाथ मैं ने उस से विवाह करने की इच्छा भी जाहिर की थी? ऐसी लड़कियों का भरोसा ही क्या? आज सारा दिन आफिस में भी दिमाग अशांत रहा. शाम को थकाहारा घर लौटा तो अनिता ने ठंडे पानी के साथ गरमागरम खबर दी, ‘‘दोपहर में सीमा आई थी.’’

सुनते ही मैं सोफे पर से उछल पड़ा, कई सवाल दिमाग में कौंधे…क्यों वह मेरे शांत व सुखी घरेलू जीवन में तूफान लाने पर तुली है अनिता, अब तक मां नहीं बन सकी तो क्या हुआ, दोनों में अच्छा तालमेल तो है.

‘‘रहने की तलाश में है बेचारी,’’ अनिता ने बताया, ‘‘अपने पड़ोस में खाली पड़ा मकान तय करवा दिया है और कह रही थी, प्लीज जीजाजी से सिफारिश कर के कहीं काम पर रखवा देना.’’

मैं बोला, ‘‘देखूंगा.’’ ‘‘देखूंगा नहीं,’’ अनिता ने जोर दिया, ‘‘उसे सर्विस दिलानी है, वह आप की बहुत प्रशंसा कर रही थी.’’

‘‘क्या कह रही थी?’’ ‘‘ऐसा नेक पति भाग्य से मिलता है,’’ पत्नी के होंठों पर मंदमंद मुसकान देख…मेरा चोर मन बोला कि निश्चय ही यह सबकुछ जान कर…अब मजा ले रही है.

‘‘शोख और चंचल है ना, इसलिए मजाक भी कर रही थी.’’ ‘‘क्या?’’

‘‘जानेमन, शादी से पहले अगर जनाब को देख लेती तो तुम्हारी जगह आज मैं होती,’’ शुक्र है, लेकिन तभी अनिता ने यह कह कर मुझे फिर झटका दिया, ‘‘मैं देख रही हूं…कल शाम से आप कुछ अपसेट हैं?’’

‘‘नहीं, मैं ठीक हूं,’’ स्वयं को संभालते हुए मैं ने कहा, ‘‘एक बात कहूं अनि, मानोगी?’’ ‘‘कहो.’’

‘‘सीमा से अब तुम्हारा मेलजोल बढ़ाना ठीक नहीं.’’ ‘‘क्यों?’’ वह सकपका गई, ‘‘क्या दोष है उस में?’’

दोष, यह पूछो, क्या दोष नहीं है उस में? पर इतना कह न पाते हुए मैं बोला, ‘‘हमारा स्तर उस से…’’

‘‘यह तो कोई बात न हुई,’’ अनिता ने एकदम से कहा, ‘‘आखिरकार वह मेरी पुरानी दोस्त है.’’

इस विषय को बदलने के लिए मैं कपड़े बदल कर हाथ में रिमोट ले कर टीवी खोलता हूं, पर यह क्या? हर चैनल पर सीमा मौजूद है. झल्ला कर रिमोट, मेज पर रखते हुए अपनी एक पत्रिका उठा लेता हूं, उस के पन्नों पर भी वही चेहरा दिखता है तो हार कर पत्रिका मेज पर पटक देता हूं और अपने दोनों पैर मेज पर फैला कर व सिर सोफे पर टिकाते हुए पलकें मूंद लेता हूं, तो सीमा, नहींनहीं, रोजी का चेहरा सजीव होने लगता है.

मुंबई के ‘प्रिंस’ होटल की रजत जयंती का मौका था. उस रात होटल में नृत्य का एक विशेष कार्यक्रम आयोजित हुआ था. कार्यक्रम शुरू होने में अभी कुछ देर थी. मैं डिनर ले कर अपनी मेज पर अकेला ही काफी पीने लगा. सहसा 2 नारी स्वरों ने चौंका दिया. कनखियों से उधर देखा तो बस, देखता ही रह गया. वहां 2 नव- युवतियां एक मेज पर बैठी नजर आईं, उन में एक सांवली सी गदराए बदन की बिल्लौरी आंखों वाली सामान्य लड़की थी, जिस ने कत्थई रंग की मैक्सी पहन रखी थी.

दूसरी, पहली बार में ही असामान्य लगी. गुलाबी साड़ीब्लाउज में सजासंवरा उस का मदमस्त यौवन लोगों के दिलों पर कहर ढा रहा था. कुछेक क्षणों के लिए तो मेरा दिल भी थम सा गया. यों लगा मानो वह नृत्य प्रोग्राम के बजाय, किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेने आई हो.

बीयर के जाम पर नाचती हुई उस की उंगलियां देख कर किसी नाजुक टहनी पर अधखिली कलियों के मंदमंद हवा में हिलने का भ्रम हुआ. उस ‘गुलाबी सुंदरी’ को अपनी सखी के साथ इस तरह अकेले बीयर पीते देख मैं ने उसे किसी बड़े घराने की माडर्न लड़की ही समझा. वह जितनी सुंदर उतनी ही चंचल लगी. मेरा ध्यान  अब तक उधर क्यों नहीं गया? इस का अफसोस तो हुआ ही, साथ में यह ताज्जुब भी कि वे दोनों डांस में मुझे अपना पार्टनर बनाने को आतुर हैं.

प्रोग्राम शुरू होने जा रहा है, जिन के पास निजी पार्टनर नहीं हैं, वे हाल में बैठे लोगों में से  अपना मनपसंद पार्टनर ढूंढ़ने लगे. कत्थई मैक्सी वाली को एक मनचले युवक ने आमंत्रित कर लिया, ‘गुलाबी रूपसी’ को उस का आफर ठुकराते देख मुझे एक अनजानी खुशी महसूस हुई.

सहसा तभी होटल मैनेजर ने स्टेज पर ताली बजाते हुए लोगों का ध्यान खींचा और माइक में बोला, ‘लेडीज एंड जेंटल मैन, जैसा कि आप सब जानते हैं, आज हम इस पिं्रस होटल की सिल्वर जुबली मनाने जा रहे हैं. पिछले अनेक सालों से निरंतर हमें आप का जो अपार स्नेह व भरपूर सहयोग मिलता रहा है, उस के लिए यह होटल आप सब का आभारी है, और आशा नहीं, पूर्ण विश्वास है कि भविष्य में भी हमें आप सब का इसी तरह सहयोग मिलता रहेगा.

‘आज के स्पेशल डांस प्रोग्राम में सर्वप्रथम आप बाल रूम डांस का लुत्फ उठाएंगे, फिर टैब डांस का और अंत में आर्केस्ट्रा की धुन में तेजी आ जाएगी, जो हर पल बढ़ती ही रहेगी. आखिर तक इस तीव्र धुन पर नाचने वाला जोड़ा, आज के डांस प्रोग्राम का विनर प्राइज हासिल करेगा.’

हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

नृत्य आरंभ हो गया. आर्केस्ट्रा की धीमी व मीठी धुन हाल में रस घोलने लगी. चारों तरफ एक अजीब सा उन्माद छा गया. जवान क्या, बूढे़ भी एकदूसरे की कमर में बांहें डाल थिरकते हुए डांसिंग फ्लोर पर आ गए, धीमी गति के नृत्य का मधुर समां देखते ही बनता था.

रात के उस दौर में शराब और शबाब का अनूठा मेल पा कर मेरा सूफी मन भी उस में डूब जाने को मचल उठा. उस ‘गुलाबी प्रिया’ को यथावत बैठी देख मैं प्रसन्नता से झूमता चला गया.

‘आई एम सुनील कुमार,’ नाम बताते हुए उस से बोला, ‘क्या आप मेरे साथ डांस करेंगी?’

‘श्योर,’ वह मुसकरा दी, ‘मुझे रोजी कहते हैं.’ ‘वेरी गुड,’ मैं चहका, ‘आप के पेरेंट्स ने बहुत सोचसमझ कर यह नाम रखा होगा?’

‘नहीं, ऐसा नहीं है,’ रोजी पुन: मुसकराने लगी और उठ कर अपना खूबसूरत एवं नाजुक हाथ बढ़ाते हुए बोली, ‘आइए, डांस करें.’

कहीं फिर न चूक जाऊं, इसलिए प्यार से उस का हाथ पकड़ते हुए मैं ने ‘थैंक्यू’ कहा. नृत्य में वह इस कदर खुल कर पेश आई मानो हम पहले से एकदूसरे को जानते हों. खैर, उस रात विशेष डांस प्रोग्राम में रोजी के साथ मुझे ही ‘ताजमहल’ मिला, लेकिन विदा होते समय जब उसे प्राइज सौंपा तो वह उदास लगी, मानो उस की उम्मीदों पर मैं खरा नहीं उतरा.

इस के बाद रोजी कई बार क्लब, होटल, सिनेमा, समंदर के किनारे आदि जगहों पर मिली लेकिन वह हमेशा जल्दी में होती जबकि मैं निरंतर महसूस करता कि वह जानबूझ कर ऐसा करती है. उस की चेष्टा कतरा जाने में रहती है. अचानक ही सामने आ जाने से उस के चेहरे पर नागवारी के जो भाव उभरते उन्हें आसानी से मैं पढ़ लेता. उसे मानो मेरा मिलना अखरता हो.

वह मेरे होशोहवास पर इस तरह छा गई कि मैं एकांत में छटपटा उठता और तब मुझे ऐसा लगता कि उस के बगैर वजूद अधूरा है. प्राय: मैं सोचता, ज्यों ही वह मिलेगी तो फौरन उस के आगे पे्रम का इजहार कर दूंगा, लेकिन रोजी की व्यस्तता और जल्दबाजी…कुछ कहने का मौका न देती.

एक दिन सोचा कि बात ऐसे नहीं बनेगी, अत: रोजी के वास्ते मैं ने एक पत्र लिखा, जिस में प्रेम के साथसाथ उस से विवाह रचाने की इच्छा भी प्रकट की और अब वह पत्र सदा जेब में रहता, ताकि मिलते ही उसे थमा दूं.

सहसा एक दिन शाम को वह सड़क पर भीड़ में जाती दिखाई दी. मैं ने जोर से नाम ले कर उसे पुकारा. उस ने चौंक कर पीछे देखा. मैं ने झट से गाड़ी फुटपाथ के साथ ले जा कर रोक दी तो उसे नजदीक आना ही पड़ा.

‘हाय, रोजी.’ ‘हाय…’ मुसकराने के बावजूद उस के चेहरे पर बेरुखी उभर आई. सफेद पैंट और टौप पर खुली केश राशि में वह बिजलियां गिराती नजर आई.

मैं कह उठा, ‘आओ, जुहू पर टहलें.’ ‘सौरी, आज फिर बिजी हूं,’ खेद भरे स्वर में वह बोली.

‘आओ तो सही, जहां कहोगी वहां उतार दूंगा.’ दिल की बात कहने के लिए इतना सफर ही बहुत होगा.

‘बेकार आप को परेशान…’ ‘मैं फुरसत में हूं,’ उतावलेपन से मैं उस की बात बीच में काटते हुए बोला तो उस से इनकार करते न बन पड़ा.

कार का अगला गेट खोलते हुए वह चुपचाप मेरी बाजू में आ कर बैठ गई. उस के बदन का मधुर स्पर्श पाते ही बात कहां से शुरू करूं समझ में न आया और कुछेक क्षण यों ही निकल गए.

‘मुझे यहीं उतरना है,’ रोजी ने कहा. ‘ठहरो रोजी.’

जातेजाते वह पलटी. मैं ने पत्र निकाल कर उसे देते हुए भारी स्वर में कहा, ‘एकांत में इसे जरूर पढ़ लेना.’

रोजी उसे ले कर भीड़ में समा गई. मैं ने देखा, वह क्लब के सामने उतरी है.

अगली मर्तबा मिलते ही रोजी खिलखिला कर हंस पड़ी.

मैं अवाक् सा मोतियों की भांति चमकते उस के दांत देखता रह गया. हंसतेहंसते उस की आंखें नम हो गईं. थोड़ी देर बाद अपनी हंसी पर काबू पाते हुए वह बोली, ‘बस, इतनी सी बात के लिए कागज रंग डाला. कितनी बार तो मिली हूं? कभी भी कह दिया होता.’

‘तुम्हारी व्यस्तता और जल्दबाजी ने मौका ही कब दिया?’

एकाएक रोजी गंभीर हो गई. माथा सिलवटों से भर गया. मानो किसी उलझन में फंस गई हो…हां…कहेगी या ना? सोचते हुए मैं ने उसे टोका, ‘जवाब दो, रोजी.’

उस की चंचलता पुन: लौट आई और वह अपने आंसू इतनी सफाई से पी गई कि मैं देख कर दंग रह गया. ‘बेकार शादी के लफड़े में क्यों पड़े हो?’ जबरन हंसते हुए उस ने कहा, ‘मैं तो यों ही तुम्हारी बन जाने को तैयार हूं, चलो, कहां ले जाना चाहते हो मुझे?’

रोजी, अश्लीलता की सारी हदें पार कर गई थी. निर्लज्जता से भरा यह निमंत्रण पा कर मन में आया कि एक जोरदार थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दूं, लेकिन कुछ सोचते हुए दुख, आश्चर्य व क्रोध से कसमसा कर रह गया.

‘मुझे तुम से यह उम्मीद नहीं थी, रोजी.’ ‘गलती की, जो एक सेक्स वर्कर से आप कोई दूसरी उम्मीद कर बैठे.’

रोजी ने मानो पिघला हुआ शीशा कानों में उड़ेल दिया हो. सहज ही उस के शब्दों पर विश्वास न हुआ और मैं पागलों की भांति उसे देखता रह गया. यह खूबसूरत लड़की…बाजारू माल कैसे हो सकती है? नहीं…नहीं…पर जो पहले से था, उस पर यकीन करना ही पड़ा. उस के मुख से यह कड़वा सच सुन प्यार के साथसाथ अब उस के प्रति सहानुभूति भी उमड़ आई. जीवन में इस अंधेरी राह पर जाने के पीछे अवश्य कोई मजबूरी रही होगी. उसे जानने की इच्छा से ही मैं कातर स्वर में बोला, ‘इतनी सुंदर, पढ़ीलिखी और समझदार हो कर भी तुम ने यह लाइन क्यों पकड़ी, रोजी?’

‘अरे, तुम तो भावुक हो गए,’ वह उपहास उड़ाते हुए खिलखिला उठी, जबकि मैं उसे अपनी आंतरिक वेदना पर हंसी का लबादा ओढ़ते हुए साफसाफ देख रहा था.

‘मजाक नहीं रोजी, मैं अब भी तुम्हें अपना जीवनसाथी बनाना चाहता हूं,’ सचमुच भावुकता के वेग में मैं बहता ही चला गया, ‘तुम्हारे अतीत से मुझे कोई सरोकार नहीं…और न ही भविष्य में कभी कुछ पूछूंगा, मैं तो सिर्फ…तुम्हें इस अंधेरे से उजाले में ले जा कर एक नए जीवन की शुरुआत करना चाहता हूं, जहां हम दोनों और हमारी खुशियां होंगी.’

‘तुम्हारे विचार और भावनाओं की मैं कद्र करती हूं, सुनील,’ वह यथार्थ के कठोर धरातल से चिपकी रह कर ही बोली, ‘मगर अफसोस, तुम्हारा औफर ठुकराने पर मजबूर हूं, मेरे हालात ऐसे हैं कि लाख चाहने पर भी मैं उन के खिलाफ कोई फैसला नहीं ले सकती.’

‘मुझ पर भरोसा करो, रोजी,’ मैं ने तहे दिल से कहा, ‘हम हर मुश्किल आसान कर लेंगे, प्लीज, बताओ तो सही.’

‘यह नामुमकिन है, सुनील,’ कह कर उस ने एक गहरी सांस ली और फिर अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देख कर बोली, ‘अच्छा, मैं अब चलूं.’

लेकिन जातेजाते ठहर गई. उसी कातिल अदा से पलट कर देखा और हंस कर बोली, ‘यों रास्ते में अचानक ही घेर कर मेरा धंधा खराब मत किया करो. पहले दिन भी तुम्हें अपना ग्राहक समझा था मैं ने और मेरी वह रात बेकार गई. खैर, कोई बात नहीं, तुम से मुझे न जाने क्यों अजीब सा लगाव हो गया है और उसे मैं कोई नाम नहीं देना चाहती. हां, अगर तुम चाहो तो हफ्ते में एक नाइट तुम्हारे साथ मुफ्त गुजार दिया करूंगी.’

‘‘रोजी…’’ ‘‘क्या हुआ?’’ अनिता किचन से बाहर आ गई, ‘‘क्यों चिल्ला रहे हो? तबीयत ठीक तो है?’’

‘‘हां, मैं ठीक हूं,’’ कह कर माथे से पसीना पोंछते हुए बोला, ‘‘आज चाय नहीं दोगी?’’ ‘‘एक मिनट, अभी लाई,’’ और वह लौट गई.

मैं फिर रोजी के बारे में सोचने लगा.

रोजाना आफिस आतेजाते सड़कों पर या जहांजहां उस के मिलने की संभावना थी वे सारे ठिकाने देख डाले पर रोजी नहीं मिली. फिर अचानक एक दिन भीड़ में वह नजर आ गई. फौरन कार फुटपाथ के एक ओर रोक कर मैं पैदल ही उस के पीछे हो लिया.

‘रोजी…’ हांफते हुए मैं ने पुकारा. पर वह अनजान सी आगे बढ़ती रही. मुझ से रहा न गया तो दौड़ कर उसे पकड़ लिया और फुटपाथ पर खींच लिया.

‘आखिर तुम चाहते क्या हो?’ पलटते ही वह एकदम गुर्राई, ‘क्यों हाथ धो कर मेरे पीछे पड़े हो?’ ‘आई लव यू, रोजी.’

उस ने सहम कर इधरउधर देखा, फिर बोली, ‘देखो, मैं चिल्ला उठी तो यहां लोग जमा हो जाएंगे और वे सब तुम्हें इश्क का मतलब समझा देंगे, पुकारूं?’

मैं यह सोच कर सिर से पांव तक सिहर गया कि वह मेरे साथ ऐसा भी कर सकती है. उस की बांह पर कसा मेरा हाथ दूसरे ही क्षण ढीला पड़ता चला गया.

‘आइंदा यह हरकत मत करना, वरना…’ चेतावनी देते हुए उस ने हाथ छुड़ाया और भीड़ में खो गई, मैं पागलों की तरह खड़ा रह गया.

उस के बाद रोजी कभी नहीं मिली और न ही मन में कभी उस से मिलने का खयाल आया. जब कभी उसे ले कर मन घृणा से भरता तो मैं कविता के सहारे उसे हलका कर लेता.

काशीपुर में दीदी की ससुराल है. वह अकसर फोन करती रहतीं कि तेरे लिए एक लड़की देखी है, कभी आ कर हां, ना बता जा. मातापिता के बरसों पहले गुजर जाने के बाद इस जहान में वही तो हैं, उन की यह बात न रखी तो वह भी मुंह मोड़ लेंगी. सो, मैं एक माह की छुट्टियां ले कर काशीपुर आ गया.

कांता दीदी ने मेरी पसंद को ध्यान में रखा था. लड़की देखते ही रिश्ता पक्का हो गया. जीजाजी तो मानो पहले से ही पूरी तैयारियां किए बैठे थे. अनिता के साथ चट मंगनी, पट ब्याह होते ही मैं अनिता को ले कर हनीमून मनाने के लिए नैनीताल जा पहुंचा. ऊंचीऊंची पर्वत श्रेणियों से घिरा नैनीताल का सुंदर इलाका, सुंदरतम झील और हरीभरी वादियों में पता ही न चला कि छुट्टियां कब गुजर गईं. हम दोनों एक दूसरे के इतने करीब आ गए, जैसे बचपन से साथ रहे हों. नैनीताल से काशीपुर, 2 दिन दीदी के यहां रह कर हम मुंबई आ गए.

उन्हीं दिनों की बात है, जब गुप्ता इंटरप्राइजेज ने पुणे में भी अपनी शाखा खोली. चूंकि कंपनी के मालिक मेरी कार्यकुशलता व ईमानदारी से पूरी तरह संतुष्ट थे. इसलिए यहां की जिम्मेदारी भी मुझे ही सौंपी गई. यहां मुंबई के मुकाबले मुझे ज्यादा सुविधाएं मिलीं.

अनिता के साथ पिता न बन पाने के बावजूद चैन से हूं. उस की बच्चेदानी में इंफैक्शन है. डाक्टर का कहना है, शीघ्र ही उसे आपरेशन द्वारा निकाला नहीं गया तो अनिता की जान को खतरा हो सकता है.

कल शाम से सीमा ने हमारे दांपत्य जीवन में हलचल मचा दी. समझ में नहीं आ रहा कि आखिर वह चाहती क्या है? ऐसी बाजारू लड़कियों का भरोसा ही क्या? अपनी इज्जत तो नीलाम करती ही हैं, दूसरे की भी मिट्टी में मिला देती हैं. सीमा अगर अनि से कह दे कि 3 साल पहले मैं ने उसे न केवल पत्नी बनाना चाहा था, बल्कि उस के द्वारा विवाह का प्रस्ताव ठुकरा देने पर बुरी तरह अपमानित भी हुआ था, तो क्या मैं उस की निगाह में ठहर पाऊंगा? अगर सीमा ने कहीं अनिता को वह पत्र दिखा दिया तो क्या जवाब दूंगा? अगर उस ने यह भेद छिपाने की कीमत मांग ली तो कैसे अदा करूंगा? उफ.

‘‘बेशर्म, कमीनी,’’ क्रोध में मैं बड़बड़ा उठा.   ‘‘किसे विभूषित किया जा रहा है, महोदय?’’ चायनाश्ता टे्र में लाते हुए अनिता ने पूछा तो मैं हड़बड़ा गया, मानो रंगेहाथों चोर पकड़ा गया हो.

‘‘क्षमा करें, बंदी से भूल हो गई,’’ अपने खास लहजे में उस ने चोट की. ‘‘सौरी.’’

‘‘भविष्य में ध्यान रहे,’’ वह महारानियों की तरह मुसकराई.

चाय से पहले, मुंह में चिप्स डाला तो मन में यह खयाल आया कि क्यों न अनिता को अपने अतीत के बारे में बता दूं और अपराधबोध से मुक्त हो जाऊं? यह तो मुझे अच्छी तरह समझती है. मेरी कविताओं की सहृदय पाठक ही नहीं, बल्कि समालोचक भी है. हां, इसी के सहयोग व प्रेरणा से तो ‘कायर नहीं हैं हम’ और ‘आओ, इस जर्जर घड़ी को बदल डालें’ कविता संग्रहों का प्रकाशन हुआ है.

‘‘सीमा को तुम कब से जानती हो, अनि?’’ रहस्योद्घाटन से पहले टोह लेना चाहा.

‘‘बचपन से,’’ उस ने बताया, ‘‘बाजपुर में उस का परिवार हमारे पड़ोस में ही रहता था, 9वीं में वह अपने मम्मीपापा के साथ वाराणसी चली गई थी. कुछ समय तक हमारे बीच फोन पर बातचीत होती रही, फिर वे लोग, भैया की शादी में नहीं आए, तो फोन आना बंद हो गया. उस के बाद वह कल शाम ही मिली, क्यों?’’

‘‘उसे नौकरी पर लगवाने के लिए पूछ रहा हूं. उस की योग्यता क्या है?’’

‘‘अंगरेजी से बी.ए. फाइनल नहीं कर सकी थी.’’ ‘‘क्यों?’’

‘‘हीरोइन बनने की गरज से अपने प्रेमी के साथ मुंबई भाग आई थी, फिर स्टूडियो के चक्कर लगातेलगाते हताश हो कर उस ने घर लौट जाने का फैसला कर लिया था. उस का वह प्रेमी उस के गहने व रुपए ले कर चंपत हो गया और जातेजाते उसे लड़कियों से जबरन धंधा कराने वाले एक गिरोह के एजेंट को बेच गया जिस के बौस के पास कई पुरुषों के साथ बेहोशी में शूट की गई उस की ब्लू फिल्म थीं.’’

‘‘कंप्यूटर तो जानती होगी?’’ ‘‘हां, प्लीज…कोई जगह खाली हो तो उसे रख लो,’’ अनिता ने आग्रह किया.

‘‘मैं हंसा,’’ वह भी फ्री में… ‘‘उस के पास देने को है भी क्या?’’

‘‘है, जो हमारे पास नहीं है.’’ ‘‘मतलब?’’ अनिता चौंकी थी.

‘‘कोख.’’ वह भी हंसी, ‘‘तो पापा बनने को व्याकुल हो. मैं जानती हूं.’’

‘‘अनि…क्या तुम उसे स्वीकार कर सकोगी. कहीं वह मुझ पर अधिकार न जता ले?’’

‘‘‘सीमा के संदर्भ में’ आओ, इस जर्जर घड़ी को बदल डालें, संग्रह की शीर्षक कविता याद आ रही है मुझे,’’ और वह अक्षरश: उसे सुनाने लगी.

दीवार घड़ी में थरथर कांप कर, आगे बढ़ती हुई सुइयों को निहारते हुए चुपचाप मैं सुनता रहा…उस की आवाज…और अंत में बोला, ‘‘स्पष्ट करो.’’

‘‘सीमा एक सेक्स वर्कर है, यह जान कर भी आप उसे अपनाने को तैयार हो गए थे, तो…’’

मैं दंग रह गया, ‘‘यानी…’’ मुख से बमुश्किल निकला. ‘‘हां, आज दोपहर सीमा…सबकुछ बता गई.’’

अपराधबोध से मैं दब गया.

‘‘लेकिन उस ने आप को ठुकरा  दिया क्यों? कभी सोचा आप ने.’’ ‘‘हां, कई बार सोचा था,’’ पर किसी नतीजे पर न पहुंच सका.

‘‘दरअसल, वह आप से बेहद प्रभावित हुई थी,’’ अनिता बोली, ‘‘उसे एक अजीब सा लगाव हो गया था आप से, जिसे वह कोई नाम नहीं देना चाहती थी. एक और बात थी कि आप की भलाई भी उस के पांव की जंजीर बन गई.’’

अनिता ने एक नया रहस्य खोला तो मैं बोला, ‘‘उसे और स्पष्ट करो.’’

‘‘लड़कियों की नजरबंदी के लिए तैनात सुरक्षा गार्ड, अगर आप को सीमा के इर्दगिर्द ज्यादा समय तक देख लेते तो आप की जान चली जाती और इसीलिए जानबूझ कर सीमा ने आप के मन में अपने प्रति नफरत भर दी ताकि आप उस से दूर हो जाएं.’’

मैं आश्चर्य से भर कर पत्नी को देखने लगा तो वह आगे बोली.

‘‘यह तो समूचा विपक्ष एक हो जाने पर पिछले दिनों सरकार को उन दरिंदों के खिलाफ काररवाई करने के लिए पुलिस को सख्त आदेश देने पड़े. तब कहीं वह मुक्त हो पाई और घर जा सकी.

‘‘अंकल, सीमा के भाग जाने का आघात बरदाश्त न कर पाते हुए पहले ही चल बसे थे. उस पर बदनामी का दंश…बेचारी कब तक झेलती रहती? छोटे भाईबहन और बीमार मां के साथ तंग आ कर आखिर में वह वाराणसी से पूना चली आई.’’

‘‘पगली, इतना बड़ा त्याग कर डाला, सिर्फ मेरे लिए? क्या लगता हूं मैं उस का? मैं तो आज तक उस से घृणा करता रहा…उसे गलत समझता रहा… छि…छि…छि…’’

‘‘अब तो यही हो सकता है कि हम कुछ करें, सीमा जैसी लड़कियों के लिए,’’ अनिता ने मानो अंदर झांक लिया हो.

‘‘हां, अनि,’’ ये दो शब्द अनंत गहराइयों से निकले पर मुझे नहीं मालूम था कि यह फैसला सही है या गलत. अगर बच्चा हो गया तो क्या उसे अनिता स्वीकार करेगी. और क्या सीमा वास्तव में बच्चे को और मुझे छोड़ कर जाएगी. मैं ने गहरी सांस ली और सब कुछ अनिता पर छोड़ दिया. Love and Sacrifice Story

Family Story : पत्नी की पगार

Family Story. ‘‘अब आप इतना परेशान मत होइए, धीरेधीरे समय के साथसाथ सब अच्छा हो जाएगा… और जब मैं ने कह दिया कि आप के सामने कैसे भी हालात आ जाएं, मैं हमेशा हर कदम पर आप के साथ हूं, तो फिर आप क्यों इतना सोचविचार करने में उलझे हुए हैं?’’ यह कहते हुए प्रिया ने चाय का प्याला शिशिर के हाथ में थमा दिया.

प्रिया के होंठों से फूटने वाले ये शब्द थकेहारे और सच कहें तो हालात के चलते कहीं न कहीं हताशा के घेरे में आ चुके शिशिर को एक बड़ा संबल देने वाले थे.

‘‘…हां, लेकिन अगर मैं इतने पांव न पसारता, तो शायद आज इस मानसिक परेशानी का मुझे मुंह नहीं देखना पड़ता,’’ शिशिर ने धीरे से कहा.

दरअसल, शिशिर ने शहर में एक मकान लिया था. चूंकि मकान शहर की जानीमानी हाई क्लास कालोनी में था, सो उस की कीमत भी हाई क्लास ही थी.

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मकान खरीदते ही बैंक के कर्ज की एक अच्छीखासी मासिक किस्त शिशिर के पल्ले पड़ गई और यहीं से शुरू हो गया रोजाना के तनाव और मानसिक अशांति का एक सिलसिला.

शिशिर की पगार का एक बड़ा भाग लोन की किस्त खा जाती थी. बचेखुचे पैसों में तमाम दूसरे खर्चे होते थे, जो मुश्किल से ही निबट पाते थे.

शिशिर की पत्नी प्रिया एक बहुत ही समझदार औरत थी. शिशिर को परेशान देख कर वह सब्र से उसे समझाने की कोशिश करती थी, लेकिन धीरेधीरे उसे लगने लगा कि कहीं न कहीं घर के खर्चों को पूरा करने में पैसे की कमी आड़े आ रही है.

एक दिन प्रिया ने शिशिर से कहा, ‘‘सुनिए, कुछ दिन अगर हम लोग अपने खर्चों को कंट्रोल कर लें, तो समय बीतने पर सबकुछ ठीक हो जाएगा.’’

प्रिया की बात पूरी नहीं हुई थी कि शिशिर ने झुंझला कर कहा, ‘‘मैं ने आज तक कभी अपने खर्चों पर कंट्रोल नहीं किया, तो आज कैसे कर लूं… ‘‘सिर्फ और सिर्फ एक मकान की वजह से मुझे  इतनी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. तुम क्या जानो, मुझ  पर क्या गुजर रही है. जाओ और जा कर अपना काम करो.’’

आज शिशिर के ये शब्द प्रिया को कहीं न कहीं चुभ गए थे, क्योंकि हकीकत तो यह थी कि प्रिया के कहने पर ही शिशिर ने शहर में वह मकान खरीदा था.

अब प्रिया ने मन ही मन ठान लिया कि वह शिशिर की पैसे से मदद कर के रहेगी. लेकिन उस ने अपनी योजना का जिक्र किसी से नहीं किया. आसपास के कई स्कूलों में उस ने इंटरव्यू दिए और आखिरकार एक स्कूल में 15,000 रुपए की मासिक पगार पर उस ने नौकरी जौइन कर ली. जब उस ने यह सूचना शिशिर को दी, तो शिशिर के होंठों पर उम्मीद से भरी मुसकराहट छा गई.

अगले ही दिन से प्रिया काफी बिजी रहने लगी थी. सुबह 4 बजे उठना, पूरे घर का खाना बनाना, साफसफाई करना और उस के बाद स्कूल के लिए तैयार होना. दोपहर को 3 बजे तक वापस आना और फिर घर के कामकाज, रात में पढ़ाई करना और फिर 11 बजे सोना, यह उस का रोज का काम हो चला था.

शिशिर की परेशानी पर प्रिया ने अपना सुकून और आराम न्योछावर कर दिया था. उसे मशीन की तरह काम करते देख कर शिशिर कभीकभी अंदर से दुखी हो जाता और कहता, ‘‘तुम नौकरी छोड़ दो, जो होगा वह देखा जाएगा.’’

लेकिन प्रिया भी बहुत जिद्दी स्वभाव की थी. उस ने ठान लिया था कि जब तक हालात ठीक नहीं हो जाते, तब तक वह शिशिर की मदद करती रहेगी.

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और एक दिन वह आया जब प्रिया ने कड़क चाय के प्याले के साथ शिशिर को एक सफेद लिफाफा थमाया. शिशिर ने लिफाफा खोल कर देखा, तो उस में 15,000 रुपए रखे हुए थे.

यह प्रिया की पहली पगार थी. आज दोनों की खुशी का कोई ठिकाना न था. सच तो यह था कि शिशिर को अपनी पगार आने से कई गुना ज्यादा खुशी और सुकून प्रिया के दिए हुए उस सफेद लिफाफे में रखे 500 के 30 नोटों को छू कर मिला था.

शिशिर ने उन पैसों को एक अलग गुल्लक में डाल दिया और उस पर लिख दिया ‘पत्नी की पगार’.

प्रिया की पहली पगार के साथ ही मानो कुछ चमत्कार सा होने लगा. शिशिर जो अब तक परेशान रहता था, धीरेधीरे सुकून की ओर बढ़ने लगा. वक्त बीतता गया और उस के साथ ही शिशिर के सिर पर से कर्ज का बोझ  भी धीरेधीरे कम होने लगा.

तकरीबन 10 साल की उतारचढ़ाव भरी जिंदगी के बाद आखिरकार शिशिर की प्रमोशन हुई और अब उस की पगार अच्छीखासी हो गई थी. कुछ ही सालों में उस ने बैंक का सारा कर्ज चुकता कर दिया. बैंक से लोन अदायगी का सर्टिफिकेट पा कर उसे ऐसा लग रहा था मानो किसी बंधन से छुटकारा मिल गया हो.

खुशी से झुमता हुआ शिशिर घर पहुंचा. आज प्रिया भी अपने स्कूल से जल्दी आ गई थी. शिशिर कुछ सोच ही रहा था कि चाय के प्याले के साथ एक सफेद लिफाफा उस की ओर बढ़ाते हुए प्रिया ने कहा, ‘‘मैं जानती हूं कि अब आप के लिए इस छोटी सी मदद का कोई मोल नहीं है, लेकिन मैं इसे अपने पास नहीं रख सकती, क्योंकि मेरे लिए सब से खाद आप की खुशी और सुकून है,’’ यह कहते हुए प्रिया की आंखों में आंसू छलक आए.

शिशिर ने प्रिया को अपने पास बिठाया और आंसू पोछते हुए कहा, ‘‘शायद तुम नहीं जानतीं कि मेरे सब से मुश्किल दिनों में इसी सफेद लिफाफे ने मुझे  मेरा मानसिक सुकून लौटाया था. आज भी मैं अपनी पगार से कई गुना ज्यादा इज्जत इस सफेद लिफाफे को देता हूं, इसलिए मेरी तुम से विनती है कि भविष्य में कभी ऐसे शब्द मत बोलना.’’

प्रिया का सिर शिशिर के कंधे पर टिका था और दोनों मुसकराते हुए सामने देख रहे थे. सामने रखा गुल्लक मानो प्रिया के सफेद लिफाफे का बेसब्री से इंतजार कर रहा था.

इतने पुराने गुल्लक पर शिशिर के लिखे हुए शब्द आज भी उम्मीद की खुशबू बिखेरते हुए साफ चमक रहे थे और वे जादुई शब्द थे ‘पत्नी की पगार’.

लेखक :  शिशिर शुक्ला

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