Hindi Story: सही फैसला

मिन्नी कम उम्र की एक शहीद की विधवा थी और बच्ची की मां भी. इधर मेहुल भी पत्नी की मौत के बाद अपने बच्चों को अकेले पाल रहा था. फिर होली आई और गलती से मेहुल ने मिन्नी को रंग लगा दिया. आगे क्या हुआ? मिन्नी का पूरा नाम मीनाक्षी था. मेहुल जबजब दिव्या के घर जाता था, मिन्नी दिखाई पड़ जाती थी. उस को शुरूशुरू में मिन्नी को ले कर उत्सुकता थी, लेकिन दिव्या भाभी से मिन्नी की दुखी जिंदगी के बारे में जो कहानी सुनी थी, उस से उस को सारी बातें पता चली थीं. मिन्नी दिव्या के बड़े ताऊ की एकलौती बेटी थी. मांबाप बहुत पहले ही मर गए थे, लिहाजा उस का लालनपालन दिव्या के घर में ही हुआ था. उस के पिता 2 भाई थे. बहुत सारी जमीन थी. घर में मनों अनाज होता था. रुपएपैसे की कोई कमी नहीं थी.
मांबाप के मरने के बाद मिन्नी की पढ़ाईलिखाई उस के चाचाजी ने एक पिता की तरह से ही की थी. उन्होंने मिन्नी को कभी किसी बात की कमी महसूस नहीं होने दी थी.

मिन्नी पढ़नेलिखने में भी होशियार थी. हमेशा अपनी क्लास में फर्स्ट आती थी. बचपन बीतने के बाद और पढ़ाईलिखाई करने के बाद चाचाजी ने उस की शादी कर दी. शादी के तुरंत बाद ही मिन्नी के पति की मौत हो गई थी. सीमा पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए सचिन शहीद हो गया था. पति की मौत के बाद मिन्नी गांव के स्कूल में पढ़ाने लगी थी. वह अपने पैरों पर खड़ी औरत थी. आज के समय की औरत. चुनौतियों से लोहा लेने वाली. पढ़ीलिखी स्वाभिमानी औरत. जबजब मेहुल की नजर मिन्नी पर पड़ती तो वह बस देखता ही रह जाता. मेहुल पास में ही रहता था और दिव्या के घर में उस का आनाजाना था. मिन्नी का गोरा चेहरा, पतली लंबी नाक, भरा हुआ बदन. कोई चाहता भी तो मिन्नी को देख कर नजरअंदाज नहीं कर सकता था, फिर तो मेहुल आदमी था. वह 77 साल का था. उस की पत्नी हेमा जिस की उम्र जब महज 25 साल थी. दूसरे बच्चे को जन्म देते समय चल बसी थी. इस का दुख मेहुल को हमेशा दिल में सालता रहता था.

लेकिन? इधर मिन्नी के में जैसी आवाज ही नहीं थी. सचिन की मौत से उस को सदमा सा लगा था. वह हंसना जैसे भूल गई थी. गोद में एक बच्ची थी. उस का दुख और उस के भविष्य के बारे में सोचती तो दिल में जैसे नश्तर से चुभते थे. मिन्नी की शादी भी 24 साल की उम्र में हो गई थी. शादी के महज सालभर बाद ही सचिन की मौत हो गई थी. मिन्नी की कहानी वह दिव्या भाभी के मुंह से सुन चुका था. बेचारी मिन्नी ने इतनी कम उम्र में विधवा होने का दर्द ?ोला था. एक कली जो ठीक से फूल भी नहीं बन सकी थी, मुर?ाई हुई सी रहने लगी थी. ऐसा जबतब बतियाते हुए दिव्या भाभी की रुलाई फूट पड़ती थी. इस बार दिव्या के पति संतोष उसे लिवाने नहीं आए थे. दुकान के काम से सूरत चले गए थे. होली सिर पर थी. मेहुल का अब इस दुनिया में 2 बच्चों के सिवा कोई नहीं था. घर पर दोनों भाभियों और मां के भरोसे उस ने बच्चों को छोड़ रखा था और दिव्या भाभी को लिवाने बनारस चला आया था.

दिव्या भाभी बतातीं कि दुनिया में कोई किसी का नहीं होता है. जब मिन्नी के पति की मौत हो गई तो ससुराल वालों ने मिन्नी को बहुत बुराभला कहा. यहां तक कि मनहूस तक कह दिया. उस को घर से निकाल दिया. दिव्या भाभी के मांबाप  और भाई सब लोग समझते रहे. इस में मिन्नी की क्या गलती है भला. लेकिन वे मिन्नी को घर से निकाल कर ही माने. मायके में चाचा चाची और भाई तो हालांकि कुछ कहते, लेकिन भाभियों को वह फूटी आंख नहीं सुहाती थी. यही वजह थी कि मिन्नी घर में सब से किनारे के कमरे में रहती थी. वह मुफ्त में खाना नहीं खाती थी, बदले में घर बरतन कर देती थी, कपड़े धो देती थी, ताकि उस को कोई मुफ्तखोर कहे. लेकिन इतना करने के बाद भी कोई किसी का मुंह थोड़े ही पकड़ सकता है. जिस के जो मन में आता, वही कह देता. मेहुल यह सब सुन कर दुखी हो जाता था. अगले दिन होली थी. मेहुल मन बना कर आया था कि वह इस बार दिव्या के साथ जम कर होली खेलेगा. बैठक में पकवान बन रहे थे. मेहुल बाहर गया तो चौपाल पर महफिल सजी थी. मेहुल भी बैठ गया. खूब भांग पी.

दोपहर हो गई. मेहुल को भूख लग गई थी. वह वापस घर गया तो देखा कि दिव्या अपनी भाभियों के साथ होली खेल रही थीइसी बीच मेहुल ने दिव्या से कहा, ‘‘भाभी कुछ नमकीन ले कर आओ.’’ दिव्या ने नहीं सुना, लेकिन मिन्नी बाहर ही बैठी थी. वह प्लेट में नमकीन लाने चली गई. इधर मेहुल कमरे में जा कर हथेली पर रंग मलने लगा. सामने ही रंगों से भरा हुआ ड्रम रखा था, जिस में घोला हुआ रंग पड़ा था.
इसी बीच मिन्नी कमरे में नमकीन देने मेहुल के पास चली गई. मेहुल को लगा शायद भाभी नमकीन ले कर आई है. मेहुल ने हथेली पर मला हुआ रंग मिन्नी के गालों पर मल दिया. धोखा दिव्या और मिन्नी के कपड़ों से हुआ था. दोनों ने एक ही रंग के कपड़े पहन रखे थे. तब तक दिव्या भी कमरे में गई थी. वह हंसते हुए बोली, ‘‘क्यों देवरजी, खा गए धोखा.’’ मेहुल बोला, ‘‘भाभी, आप दोनों ने एकजैसे कपड़े पहन रखे थे, इसलिए धोखा हो गया.’’

मिन्नी के चेहरे पर मिलेजुले भाव थे. एक तरफ खुश थी कि कई सालों के बाद किसी ने उस पर रंग डाला था और दुखी सामाजिक मर्यादा को ले कर थी कि भला समाज और लोग क्या कहेंगे. दिव्या ने छेड़ा, ‘‘अच्छा बच्चू, भाभी को छोड़ कर भाभी की बहन से होली खेली जा रही है.’’ ‘‘अभी आप की शिकायत दूर किए देता हूंरुकिए,’’ और हाथ में बचा हुआ गुलाल उस ने दिव्या के गालों पर मल दिया. मिन्नी ने भी ड्रम में पड़ा हुआ रंग मेहुल पर पिचकारी से दे मारा. इस तरह भाभी और मिन्नी के साथ वह बहुत देर तक रंग और गुलाल से होली खेलता रहा. शाम के समय लोग अबीर खेल रहे थे. बैठक में सब लोग बैठे हुए थे. मिन्नी ठंडाई ले कर आई. अचानक मेहुल के मुंह से निकला, ‘‘दिव्या भाभी, मैं एक बात कहना चाहता हूं. हेमा के मरने के बाद से मेरी जिंदगी तहसनहस हो गई है. मैं बच्चों की परवरिश ठीक से नहीं कर पा रहा हूं. घरबाहर दोनों जगह आखिर मैं कैसे संभालूंगा

जब तक मां हैं, चल रहा हैउस के बाद सोचता हूं, तो कलेजा मुंह को आने लगता है. मैं चाहता हूं कि मिन्नी से शादी कर लूं.’’ दिव्या के पिताजी को हैरानी हुई. वे बोले, ‘‘बेटा, मिन्नी हमारी बेटी है. लेकिन तुम्हें मैं अंधेरे में नहीं रखना चाहता. बेटा, मिन्नी विधवा है. उस को एक बेटी है, फिर भी तुम उस से शादी करना चाहते हो…’’ दिव्या बोली, ‘‘पिताजी, कई बार मेरे मन में भी यह खयालआया था, लेकिन देवरजी से कहते डरती थी. पता नहीं वे क्या सोचेंगे. लेकिन आज मैं ने होली खेलते हुए देख लिया कि मेहुल का मन कितना पवित्र है. ‘‘दरअसल, मैं ने और मिन्नी ने एक ही रंग के कपड़े पहन रखे थे. मेहुलजी को धोखा हो गया.  मिन्नी पर रंग डाल दिया था. तब से अपनी गलती का पछतावा करना चाह रहे हैं. ऐसा भला आदमी कहां मिलेगा. इन की भलमनसाहत है कि  मिन्नी से माफी मांगने लगे थे.
‘‘जब से यह घटना हुई है, ये आंख नहीं मिला पा रहे हैं.  खैर इन का रिश्ता बनता है, लेकिन अब ये मिन्नी से शादी करना चाहते हैं.’’

मेहुल बोला, ‘‘हां पिताजी, मिन्नी विधवा हो गई तो इस में भला उस की क्या गलती है. लोगों को उस को भला ताने देना का हक किस ने दे दिया है. यह तो गर्व की बात है कि वह एक शहीद की विधवा है, जिस ने देश के लिए अपनी जान की कुरबानी दी है, लेकिन लोग शहीद की विधवा से कैसा बरताव कर रहे हैं, देख लीजिए. ‘‘क्या किसी विधवा को समाज में जीने का हक नहीं है? क्या किसी विधवा को खुश रहने का हक नहीं है? अगर नहीं है तो मैं परवाह नहीं करता ऐसे समाज की, जिस की जड़ें खोखली हों. ‘‘इस के अलावा 3-3 बच्चों की जिम्मेदारियों के बारे में भी सोचिए. उन की परवरिश करने का भी तो सवाल है. आखिर ये बच्चे कैसे पलेंगे, इस के बारे में भी सोचिए जरा. इन तीनों बच्चों की जिंदगी में खुशियां लौट आएंगी.’’

‘‘ठीक है बेटा, जब तुम ने और दिव्या ने फैसला कर ही लिया है, तो इस से बड़ी खुशी की बात भला और क्या होगी. होली के बाद किसी दिन लगन रखवाता हूं,’’ मिन्नी के पिताजी बोले. आज मिन्नी के पैर जमीन पर नहीं पड़ते थे. वह बहुत खुश थी. आज से कोई उस को मनहूस नहीं कहेगा. उस का भी कोई चाहने वाला होगा. उस का भी अब कोई अपना घर होगा. मिन्नी की मांग भरने वाली थी. उस की वीरान जिंदगी में बहार आने वाली थी. एक शहीद पिता की बच्ची को एक नए पिता मिल गए थे. आज आसमान में इंद्रधनुष निकला था. सात रंगों का चमकीला इंद्रधनुष.                  

Hindi Story: हिसाब

Hindi Story: पिता का साया उठते ही मुन्नी का बचपना अचानक बालिग हो गया. परिवार पालने के लिए वह आर्केस्ट्रा में डांसर बनी जहां साहिल ने उस की देह भोगी. भाई भी उसे पसंद नहीं करता था. क्या मुन्नी के बलिदान का हिसाब हुआ?

मुन्नी को कभी यह एहसास ही नहीं हुआ कि वह कब बड़ी हो गई. उस के जीवन में उम्र का बढ़ना किसी उत्सव की तरह नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की तरह आया, बिना पूछे, बिना रुके. मुन्नी घर की बड़ी बेटी थी. छोटे भाई की बड़ी बहन और मां के लिए एक ऐसा सहारा जो बचपन में ही बालिग बना दिया गया. जब मुन्नी 12 साल की थी, तभी पिता का साया उठ गया. प्राइवेट नौकरी थी उन की, कोई पैंशन नहीं, कोई जमीनजायदाद नहीं.

पिता की मौत के बाद सरकार की अनुकंपा पर मां को नौकरी तो मिली, पर इतनी मामूली कि उस से घर का गुजारा ही बड़ी मुश्किल से हो पाता था. घर में शोक था, पर उस से भी बड़ा बोझ जिम्मेदारी का था. पिता के जाने के कुछ महीनों बाद ही मुन्नी की किताबें धीरेधीरे बंद होने लगीं. 8वीं जमात के बाद स्कूल जाना छूट गया. मां ने कहा नहीं था कि पढ़ाई छोड़ दो, पर हालात ने कह दिया था. किसी ने जोर नहीं डाला, किसी ने रोका भी नहीं. समाज में यह तय था कि लड़की की पढ़ाई रुके तो चलेगा, पर लड़कों की नहीं. मुन्नी ने चुपचाप यह नियम स्वीकार कर लिया.

किशोरावस्था मुन्नी के जीवन में आई ही नहीं. जब उस की सहेलियां सपने बुन रही थीं, तब वह सुबह चूल्हा जलाती, भाई को स्कूल भेजती और मां की थकी आंखों में झांक कर समझ जाती कि शिकायत का कोई मतलब नहीं. वह खुद को भूले चली गई. 18 की उम्र, वही उम्र जब लड़कियां खुद को खोजती हैं, सजती संवरती हैं और भविष्य के सपने देखती हैं, लेकिन मुन्नी के लिए यह उम्र एक डर बन कर आई. समाज की बेरहम नजरें, महल्ले की फुसफुसाहट और हर दिन बढ़ता बोझ.

एक डाक्टर के यहां सेविका की नौकरी मिली, 5,000 रुपए महीना. यह नौकरी मुन्नी के लिए सम्मान नहीं, मजबूरी थी. सुबह से शाम तक काम, फिर घर लौट कर वही जिम्मेदारियां. शरीर थक जाता, मन उस से पहले. यहीं मुन्नी की मुलाकात साहिल से हुई. साहिल सिक्योरिटी गार्ड था, स्मार्ट, आत्मविश्वासी और बातों में चालाक. उस ने मुन्नी से वैसे बात की, जैसे अब तक किसी ने नहीं की थी. दया, आदेश, बस अपनापन.
मुन्नी के जीवन में पहली बार किसी ने उस से पूछा था, ‘‘तुम थक जाती हो ?’’

यह सवाल मुन्नी को भीतर तक छू गया. धीरेधीरे वह साहिल की बातों पर भरोसा करने लगी. उस ने मुन्नी को समझाया कि उस की मेहनत की सही कीमत नहीं मिल रही. उस ने शहर की एक नामी आर्केस्ट्रा कंपनी में काम करने का सुझाव दिया, जहां एक रात में 1,000 से 1,200 रुपए मिलते थे. खाना अलग.
‘‘इस से घर की हालत सुधर जाएगी,’’ साहिल ने कहा. मुन्नी ने ज्यादा नहीं सोचा. वह सोच भी कैसे पाती? उसे बचपन से यही सिखाया गया था कि वह दूसरों के लिए जिए. मां और भाई को बताया गया कि नाइट ड्यूटी है. सच आधा था, झूठ पूरा.

आर्केस्ट्रा कंपनी में मुन्नी की शुरुआतबैक डांसरके रूप में हुई. पहले दिन मंच पर चढ़ते समय उस के पैर कांप रहे थे. तालियों की आवाज अजनबी थी, नजरें और भी ज्यादा. धीरेधीरे उसे तालियों की आदत पड़ गई. फिर कपड़े छोटे हुए, कदम तेज हुए और आत्मसम्मान कहीं पीछे छूटा चला गया. एक साल के भीतर मुन्नी फ्रंट लाइन में थी. आमदनी बढ़ी, पर कीमत भी. पैसा घर जा रहा था, भाइयों की पढ़ाई चल रही थी, इसी ने उसे चुप रखा. साहिल से नजदीकियां बढ़ीं. मुन्नी ने पहली बार भविष्य के सपने देखेशादी, सम्मान, एक सामान्य जीवन. लेकिन हर बार जब वह शादी की बात करती, साहिल टाल देता.

साहिल के लिए मुन्नी कभी सिर्फ एक लड़की नहीं थी, बल्कि वह उस के लिए सुविधा थी, सहारा थी और बिना जवाबदेही का रिश्ता. उसे मुन्नी से वह सब मिला, जिस के लिए किसी भी मर्द को समाज के सामने कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती. मुन्नी के बढ़ते पैसों से साहिल की जिंदगी आसान होती गई. कभी मोबाइल रिचार्ज, कभी कपड़े, कभी दोस्तों के साथ शराबछोटीछोटी जरूरतों के नाम पर वह उस का पैसा लेता रहा और मुन्नी देती रही, क्योंकि उसे यह सिखाया गया था कि प्रेम में हिसाब नहीं होता. जिस देह को साहिल सार्वजनिक मंच पर नाचते देखता था, उसी देह को निजी कमरों में वह बिना किसी वचन, बिना किसी भविष्य के भोगता था.

सब से बड़ा फायदा यह था कि साहिल को कुछ भी साबित नहीं करना पड़ता था. शादी का दबाव, जिम्मेदारी का बोझ, समाज का डर, क्योंकि समाज का नियम सीधा है कि अगर रिश्ता टूटेगा, तो सवाल औरत से होंगे. साहिल जानता था कि मुन्नी  के पास जाने को कोई सुरक्षित रास्ता नहीं है. उस की मजबूरी ही साहिल की ताकत थी. जब तक मुन्नी उस के लिए उपयोगी थी, भावनात्मक रूप से भी, आर्थिक रूप से भी, तब तक साहिल मुसकराता रहा. और जिस दिन मुन्नी ने सम्मान मांगा, शादी की बात की, भविष्य में बराबरी चाही, उसी दिन साहिल ने समाज का सब से पुराना हथियार उठायाचरित्र.

‘‘तुम जैसी लड़कियों से शादी नहीं की जाती,’’ यह कहते समय साहिल यह भूल गया या जानबूझ कर अनदेखा कर गया कितुम जैसी लड़कीउस ने खुद बनाई थी, अपने फायदे के लिए, अपनी सुविधा के लिए. यह एक वाक्य नहीं था. यह समाज का फैसला था, साहिल के मुंह से निकला हुआ. मुन्नी को लगा जैसे किसी ने उस के भीतर सालों से जमा आत्मसम्मान को एक झटके में कुचल दिया हो. उसे याद आया वही साहिल, जिस ने उसे इस रास्ते पर चलने की सलाह दी थी. वही साहिल, जिस ने उस की देह को चाहा, उस के पैसों से सुविधा पाई और उस के त्याग को चुपचाप इस्तेमाल किया.

आज वही साहिल उसेतुम जैसी लड़कीकह रहा था. उस पल मुन्नी को पहली बार साफ दिखा कि समाज और मर्द, दोनों की नैतिकता एकजैसी होती है. जरूरत पड़ने तक चुप्पी और जरूरत खत्म होते ही चरित्र का सवाल. आर्केस्ट्रा में नाचते समय जिन हाथों ने तालियां बजाई, उन्हीं हाथों ने अब उंगलियां उठाईं. दिन में वही लोग उसे गिरी हुई कहते थे और रात में उसी पर नोट उड़ा कर खुद को सभ्य समझते थे. मुन्नी ने महसूस किया कि उस ने कभी कोई गलत चुनाव नहीं किया, उस के सामने बस गलत औप्शन रखे गए थे. उस की सब से बड़ी गलती यह थी कि उस ने भरोसा किया और इस समाज में एक औरत का भरोसा ही उस का सब से बड़ा अपराध होता है.

उस रात मुन्नी देर तक आईने के सामने बैठी रही. उस आईने में उसे नर्तकी दिखी, प्रेमिका बस एक औरत दिखी, जिसे हर किसी ने अपनी सुविधा के हिसाब से परिभाषित किया था. मुन्नी को समझ गया कि औरत की देह जब तक जरूरत है, तब तक मौन स्वीकृति है और जैसे ही वह सम्मान मांगती है, उसे उस के अतीत से सजा दी जाती है. मुन्नी इस दुनिया से निकलना चाहती थी. लेकिन पैसों की कमी, भाई की पढ़ाई और घर का खर्च, सब ने उस के पैरों में बेडि़यां डाल रखी थीं. मुन्नी की उम्र 30 के पार पहुंची. काम मिलने लगा कम. भाई बड़ा हो गया था. उसे सबकुछ समझ आने लगा था, पर उस ने भी आंखें बंद कर लीं. सच देखना आसान नहीं होता खासकर जब सच आप के आराम की कीमत पर हो.

मां की मौत के बाद मुन्नी पूरी तरह अकेली रह गई. मुन्नी का भाई सबकुछ जानता था. वह इतना मासूम था कि सच समझ पाता, इतना नासमझ कि हालात से अनजान रहता. भीतर ही भीतर उसे बहन के काम से नफरत थी, ऐसी नफरत जो बोलती नहीं, बस जलाती रहती है. लेकिन वह चुप रहा. इसलिए नहीं कि उसे सच स्वीकार था, बल्कि इसलिए कि वही सच उन के भविष्य की सीढ़ी बन चुका था. मुन्नी की कमाई से भाई की पढ़ाई चली, किताबें आईं, कपड़े बदले, सपने बड़े हुए. वह घर में उस की ओर
देखता कम था, उस के पैसों की ओर ज्यादा. जब पड़ोस में बातें होतीं, सिर झुका लेता. विरोध नहीं, बस बचाव. क्योंकि विरोध की कीमत होती है और उस कीमत को चुकाने की हिम्मत उस में नहीं थी.

भाई ने अपना घर बसा लिया था. जिस के लिए मुन्नी ने सबकुछ दांव पर लगाया था, वही उस से दूरी बनाने लगा. अब उसे उस के पैसों की जरूरत नहीं थी और समाज में एक औरत की कीमत अकसर उस की जरूरत तक ही होती है. वह उस समय चाहता था कि बहन इस दलदल से बाहर आए, लेकिन बिना यह पूछे कि बाहर आने के बाद वह जिएगी कैसे. उस की चुप्पी में नाराजगी भी थी, अपराधबोध भी, पर उस से ज्यादा सुविधा थी. और यह सुविधा नैतिकता की सब से बड़ी कमजोरी बन गई. आज जब मुन्नी अपने घर में सम्मान से बैठी है, तब उस की चुप्पी और भी गहरी हो गई है. अब बोलने से सिर्फ एक ही सवाल उठेगा किजब तुम्हें नफरत थी, तब तुम ने आवाज क्यों नहीं उठाई?’

मुन्नी उसी एक कमरे में रह गई, खामोश, अकेली, थकी हुई. आज वह समझ रही है कि औरत का जीवन अकसर कर्तव्य औरचरित्रके बीच पिसता है. अगर वह परिवार के लिए जिए, तो त्याग की देवी. अगर अपने लिए कुछ चाहे, तो चरित्र पर सवाल. नाचने वाली औरत को हर मर्द भोगता है, चाहे वह प्रेमी के रूप में हो, भाई के रूप में या समाज के रूप में. आज मुन्नी किसी मंच पर नहीं नाचती. अब उस के जीवन में तालियां नहीं हैं, सिर्फ सन्नाटा है. वह उसी एक कमरे में रहती है, जहां दीवारों पर अब भी बीते सालों की आवाजें टकरा कर लौट आती हैं. कभी मां की थकी सांसें, कभी भाई की पढ़ाई की चिंता, कभी साहिल की मीठी और फिर कड़वी बातें.

मुन्नी अब किसी से शिकायत नहीं करती. शायद इसलिए नहीं कि दर्द कम हो गया है, बल्कि इसलिए कि वह समझ चुकी है कि इस समाज में औरत की पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं, जब तक वह मनोरंजन बने.
मुन्नी अपनेआप से पूछती है कि क्या उस का त्याग कभी किसी खाते में दर्ज हुआ? क्या उस की जवानी, उस का श्रम, उस का मौन किसी रजिस्टर में लिखा गया? या फिर औरत का बलिदान हमेशा स्वाभाविक मान कर भुला दिया जाता है? मुन्नी को याद आता है कि जब वह कमाती थी, तब सब चुप थे. जब उस ने सवाल किया, तब सब ने चरित्र देखा. समाज ने उस से कभी यह नहीं पूछा कि उस ने क्या खोया, बस यह गिना कि उस ने क्यागलतकिया.

मुन्नी को इस बात का दुख नहीं है कि उस ने सब के लिए जिया, दुख इस बात का है कि किसी ने यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि वह भी इनसान थी. आज उस का भाई अपने बच्चों को अच्छे संस्कार सिखाता हैं. उन्हें नाचती औरतें बुरी लगती हैं. मुन्नी यह सोच कर मुसकरा देती है कि शायद उस के जीवन का बलिदान अगली पीढ़ी के लिए उदाहरण बन गया, लेकिन उस के लिए कभी इंसाफ नहीं बन सका. मुन्नी अब यह नहीं पूछती, ‘‘मेरे लिए कौन जिएगा?’’ अब मुन्नी एक और सवाल पूछती है, ‘‘कब तक औरत का बलिदान बिना हिसाब के चलता रहेगा?’’ शायद अब यही  सवाल मुन्नी की नई शुरुआत बने और उसे कुछ सुकून दे.     

पाकिस्तानी हौकी खिलाडि़यों ने आस्ट्रेलिया में धोए बरतन पाकिस्तान की नैशनल हौकी टीम के कप्तान इमाद बट ने आस्ट्रेलिया से लौटने के बाद लाहौर हवाई अड्डे पर मीडिया से बात करते हुए कहा कि आस्ट्रेलिया में नैशनल टीम के खिलाडि़यों से रसोई, बरतन, कपड़े और बाथरूम साफ करवाए जाते थे. वे अपना खाना खुद पकाते थे और सड़कों पर रहते थे

बरतन धोने और सफाई करने के बाद खिलाड़ी मैच में कैसा प्रदर्शन करेंगे? कप्तान इमाद बट ने पाकिस्तान हौकी फैडरेशन के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए और कहा कि वे मौजूदा टीम मैनेजमैंट के साथ आगे नहीं बढ़ सकते. दरअसल, पिछले कुछ दिनों से आस्ट्रेलिया में खेल रही पाकिस्तानी हौकी टीम के खिलाडि़यों की तसवीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे थे, जिन में उन्हें अपना खाना पकाते और बरतन साफ करते हुए देखा जा रहा था. कई तसवीरों में वे बैग के साथ सड़क किनारे बैठे हुए भी नजर रहे थे.

मुनीष भाटिया

 

Hindi Story: बिखरी जिंदगी

Hindi Story: शादी से पहले ही सपना पेट से हो गई थी. पर उस का प्रेमी चिरंजीवी डरपोक निकला. मजबूरी में सपना ने अबौर्शन कराया. फिर उस की शादी प्रभात के साथ हुई. पर डाक्टर ने प्रभात को बता दिया कि सपना का शादी से पहले अबौर्शन हुआ था. आगे क्या हुआ?


जि का डर था वही हुआ. सपना मायके रहने गई. उस के पति ने तलाक का नोटिस भेज दिया.
मैं यानी सपना की भाभी निशा हमेशा अपने पति रंजन से कहती रही कि शादीब्याह के मामले में कुछ भी छिपाना अच्छी बात नहीं है. चाहे जैसा भी हो सपना के अतीत के बारे में बता देना उचित हेगा, उस के बाद जो होगा उन की मरजी. अगर उन्हें लगेगा कि सपना से शादी करना ठीक होगा तो करेंगे, नहीं तो कहीं और कोशिश करो.


दरअसल, नौकरी के दरमियान सपना की जानपहचान एक दक्षिण भारतीय लड़के चिरंजीवी से हुई थी. बात इतनी बढ़ी कि वह उस से पेट से हो गई. सपना ने चिरंजीवी पर शादी करने का दबाव बनाया, तो एकाएक वह नौकरी छोड़ कर अपने गांव चला गया. इस बीच सपना ने उसे कई बार फोन किया, मगर चिरंजीवी ने हर बार यही कहा कि वह शादी करने के हालात में नहीं है, लिहाजा वह बच्चा गिरा दे.
सपना एक ऐसे भंवर मे फंस गई, जहां से उसे सिवा बरबादी के कुछ नहीं दिख रहा था. उस से रोते बन रहा था, ही हंसते. कैसे अपने मांबाप को सब बताएगी? उन्हें जब पता चलेगा तब उन पर क्या बीतेगी? एक बार खुदकुशी करने का खयाल मन में आया, मगर बढ़ते कदम रुक गए. खुदकुशी करना क्या आसान होता है?


आखिरकार सपना ने फैसला लिया कि वह मम्मीपापा को बता देगी. अबौर्शन करवाना कोई गुनाह नहीं. उस का गुनाह इतना था कि उसे इस हद तक नहीं जाना चाहिए था. मांबाप अगर बेटियों पर भरोसा कर के उन्हें बाहर नौकरी करने की इजाजत देते हैं, तो उन्हें मर्यादा का खयाल रखना चाहिए. लड़कों का क्या जाएगा, वे तो कोई भी बहाना बना कर कन्नी काट लेंगे, ?ोलना तो लड़कियों को ही पड़ता है. मम्मीपापा ने सुना तो वे आगबबूला हो गए. सपना को खरीखोटी सुनाई. चिरंजीवी से बात करना चाहा, मगर उस का फोन स्विच औफ मिला. एक बार चेन्नई जाने को सोचा, फिर यह सेच कर चुप हो गए कि उस का पुश्तैनी घर एक गांव में था, जहां कुछ कहनेसुनने से कुछ नहीं होगा. वे हमारी बात सम?ाने वाले नहीं. उलटे सपना को ही कुसूरवार मान कर गांव से भगा देंगे. काफी सोचविचार कर सपना का अबौर्शन कराना उचित सम?.


अब सपना आजाद थी. पर उस का औफिस जाना छुड़वा दिया गया. रंजन के ऊपर सपना की शादी की जिम्मेदारी थी. ऐसा इसलिए, क्योंकि रंजन पूर्वांचल की एक छोटे सी तहसील भाटी में नौकरी करते थे, जो दिल्ली से काफी दूर थी. दिल्ली के आसपास सपना की शादी करना उचित नहीं लगा. भेद खुलने का डर था. लड़का रंजन के ही औफिस में काम करता था. रंजन से उस की अच्छी जानपहचान थी. भाटी में उस का खुद का मकान था, साथ में गांव में कुछ पुश्तैनी जमीन भी थी. सपना इस शादी के हक में नहीं
थी. कहां दिल्ली, कहां एक छोटा सा कसबावह उदास हो गई. मम्मी ने भरोसा दिया कि उस का तबादला लखनऊ हो जाएगा, तब वह आराम से महानगर में रह सकेगी.


पता नहीं मम्मी के भरोसे में कितनी हकीकत थी. एकबारगी मु? लगा कि मम्मीपापा किसी तरह से सपना का घर बसना देखना चाहते थे. लेकिन सपना की पसंदनापसंद का कोई सवाल नहीं था. आज के दौर में शारीरिक संबंध बनना एक सामान्य घटना है. भागदौड़ की जिंदगी में इसे कोई इतनी गंभीरता से नहीं लेता, मगर मम्मीपापा के भीतर  इतना डर था कि उन्होंने सपना को ऐसी जगह ब्याहना मुनासिब सम?, जहां सपना जैसी लड़की के लिए एक पल रहना मुमकिन नहीं था. लड़के का नाम प्रभात था. उसे एकमुश्त जमीन खरीदने के लिए रकम की जरूरत थी, जिसे रंजन ने स्वीकार कर लिया. थोड़े से लोगों की मौजूदगी में सपना की शादी कर दी गई, पर उस का भाटी में कभी मन नहीं लगा.


सपना अकसर रंजन से यही कहा करती थी कि वह किसी तरह प्रभात का तबादला लखनऊ करवा दे, ताकि वहां कोई फ्लैट ले कर रहा जाए. इस बीच सपना पेट से हुई. पहली बार जब प्रभात उसे महिला डाक्टर के पास ले गया, तो चैकअप करने के बाद उस ने प्रभात को अपने केबिन मे बुला कर पूछा कि क्या आप की पत्नी का पहले कभी अबौर्शन हुआ था? यह सुन कर प्रभात थोड़ा हैरान हो कर बोला, ‘‘नहीं, ऐसा तो नहीं है. यह हमारा पहला अनुभव है.’’ डाक्टर ने दोबारा कुछ पूछना मुनासिब नहीं सम?. कुछ दवाएं लिख दीं और बीचबीच में कर दिखाने की सलाह दी. रास्तेभर प्रभात के कानों में लगातार डाक्टर साहिबा की कही बात गूंजती रही. जैसे ही वह सपना के साथ घर के अंदर दाखिल हुआ, सब से पहले उस का यही सवाल था, ‘‘क्या तुम्हें पहले कभी अबौर्शन हुआ था?’’


यह सुन कर सपना कांप गई, फिर खुद को संभालते हुए बोली, ‘‘कैसी बचकानी बातें कर रहे हैं…’’
‘‘डाक्टर की बात ?ाठी नहीं हो सकती…’’ प्रभात बोला.
‘‘डाक्टर बीच में कहां से गई?’’
‘‘उन्होंने ही बताया कि तुम्हारा एक बार अबौर्शन हो चुका है.’’
‘‘डाक्टर कैसे पता लगा सकता है?’’
‘‘और कौन बताएगा?’’


सपना ने थोड़ा कड़ा मन करते हुए कहा, ‘‘मान लो ऐसा ही हो तो तुम कर क्या सकते हो?’’
‘‘मैं ऐसी चरित्रहीन औरत के साथ एक पल भी नहीं रहना चाहूंगा,’’ प्रभात ने दो टूक कहा.
‘‘तलाक लेना क्या आसान होगा? दूसरे, मैं डाक्टर की बात को गलत साबित करती हूं. जब ऐसा कुछ हुआ ही हो तो मैं कैसे मान लूं?’’ सपना की आवाज में आत्मविश्वास की कमी थी.
उस रोज प्रभात और सपना में काफी बहस हुई. दोनों का ?ागड़ा सुन कर प्रभात की मां गईं. पूछने पर प्रभात ने कुछ नहीं छिपाया.
‘‘मु? तो पहले से ही शक था.
तुम्हीं शादी के लिए उतावले थे.
10 लाख क्या दिया खोटा सिक्का
थमा दिया,’’ मां सपना को जलीकटी सुनाने लगीं.


उस दिन के बाद प्रभात ने सपना की  तरफ देखना भी छोड़ दिया. सपना की जिंदगी खजूर पर लटके हुए इनसान की तरह हो गई. वह दिल्ली की रही, ही भाटी की. मम्मीपापा ने जो सोच कर उस की शादी का घरौंदा बनाया था, वह रेत की तरह बिखरने वाला था. एक दिन सपना ने फोन कर के रंजन को सारी बातें बता दीं. रंजन सपना की ससुराल आया. प्रभात को रंजन से इतनी नफरत हो गई थी कि जब कभी उस का औफिस में सामना होता, तो वह दुआसलाम भी नहीं करता था. रंजन को सम? में नहीं आया कि एकाएक प्रभात इतना बदल कैसे गया. उसे लगा होगी कोई औफिस की समस्या, पर अब सारा राज खुल गया था.


प्रभात की मां ने साफसाफ कह दिया कि वह सपना को अपनी बहू बना कर नहीं रखना चाहतीं. रंजन ने लाख सम?ाया, मगर प्रभात सम?ाने के लिए तैयार था, ही उस के घर वाले.
‘‘क्या यह आप लोगों का आखिरी फैसला है?’’ रंजन हताश मन से पूछा.
‘‘हां,’’ प्रभात ने जवाब दिया.
‘‘कहीं तुम ने सपना को तलाक देने का तो फैसला नहीं ले लिया है?’’ रंजन ने शक जताया.
‘‘आप ने सही सोचा है,’’ प्रभात
की इस बात पर रंजन के माथे पर बल पड़ गए.
‘‘तलाक लेना आसान नहीं है. वह तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली है.’’
‘‘मैं उसे अपना बच्चा नहीं मानता,’’ प्रभात ने हेकड़ी दिखलाई.
‘‘तुम्हारे मानने या मानने से कुछ नहीं होगा. जैसे डाक्टर ने सपना के अबौर्शन की जानकारी दी, वैसे ही तकनीक के जरीए बताया जा सकता है कि यह तुम्हारा बच्चा ही है. तुम्हें उसे वे सारे हक देने होंगे, जो एक बच्चे के होते हैं,’’ रंजन बोला.


पर प्रभात पर रंजन की बात का बिलकुल भी असर नहीं पड़ा. उस रोज रंजन बिना कोई ठोस फैसला लिए वापस अपने घर गया. घर कर उस का मन किसी काम में नहीं लगा. उस के दिमाग में बारबार सपना ही घूमती रही. क्या सोचा था, क्या हो गया. उसे भरोसा था कि इतनी दूर, साथ में अच्छाखासा दहेज दे कर वह सपना के नाजायज प्यार पर परदा डाल देगा, मगर ऐसा हुआ नहीं. रंजन को अपने फैसले पर अफसोस होने लगा. इस सब की जानकारी जब मम्मीपापा को लगेगी, तब उन पर क्या बीतेगी, यह सोच कर उस का दिल बैठने लगा. अब अकसर अबौर्शन को ले कर सपना और प्रभात में ?ागड़ा होने लगा. प्रभात का सारा परिवार उस के साथ था, जबकि सपना अकेली. कितनी खिलाफत करती. तंग कर एक
दिन अपना जरूरी सामान बांध कर रंजन के पास रहने चली आई.


औफिस में मौका मिला तो रंजन ने प्रभात को सम?ाने की काफी कोशिश की, मगर वह तो कुछ भी सुनने के लिए तैयार था. वह बहुत गुस्से में था. जल्दी ही यह खबर औफिस में फैल  गयी कि प्रभात और रंजन की बहन सपना में अनबन हो गई है. मामला तलाक पर गया है. रंजन को काफी शर्मिंदगी महसूस होने लगी. ऊपर से तो कोई कुछ नहीं कहता था, मगर अंदर ही अंदर कानाफूसी जारी थी. रंजन ने मम्मीपापा को सारी बात बताई. वे दोनों भी बेहद परेशान हो गए. पापा रंजन से बोले कि चाहे जैसे भी हो सपना को वापस ससुराल भेजो. ‘‘किस के बल पर? क्या गारंटी है कि वहां सपना महफूज होगी? कहीं वे सब सपना को मार डालें तब?’’ ‘‘इतना ही डर था तो फिर शादी क्यों की?’’ पापा चिल्लाए.


‘‘पापा, आप 2 तरह की बातें करते हैं. एक तरफ आप छिपाना चाहते थे, तो दूसरी तरफ शादी पर सवाल खड़ा कर रहे हैं. इतना ही था तो कर लिए होते अपने तरीके से शादी,’’ इतना बोलने के अगले पल रंजन को पापा को कहे शब्दों पर अफसोस होने लगा. उसे पापा से ऐसे तल्ख लहजे में नहीं बात करनी चाहिए थी. उस ने पापा से माफी मांगी. इधर, सपना ने साफसाफ कह दिया कि वह उस गांव में रहने नहीं जाएगी. वहां उस का मन नहीं लगता. भले ही जिंदगी अकेले काटनी हो, काट लेगी मगर वापस उस जेलखाने में नहीं जाएगी. जेलखाना ही थी उस की ससुराल. सासससुर, ननदननदोई कहीं से भी वे लोग शहरी नहीं लगते थे. पता नहीं रंजन ने क्या देखा जो टूट पड़े इस रिश्ते के लिए.


आखिरकार रंजन ने सपना को वापस दिल्ली भेज दिया. दिल्ली कर फिर से वही सवाल खड़ा हुआ कि सपना के पेट में पल रहे बच्चे का क्या होगा? एक बार सोचा कि फिर से अबौर्शन करा कर पहले की तरह आजाद जिंदगी जिए. नौकरी तो मिल ही जाएगी. सपना के मम्मीपापा इस के खिलाफ थे. उन्हें भरोसा था कि देरसवेर प्रभात को सम? जाएगा और सबकुछ ठीक हो जाएगा. काफी जद्दोजेहद के बाद सपना ने मम्मीपापा की बात मान ली. उसे भी लगा यही ठीक रहेगा. इस बीच प्रभात ने तलाक का नोटिस भेज दिया. सपना कुछ पल के लिए बेचैन हुई, मगर अगले पल खुद में हिम्मत संजोई कि चाहे जो भी हो जाए, वह प्रभात को तलाक नहीं देगी.


पूरे 9 महीने बाद सपना ने अपने बच्चे को जन्म दिया. प्रभात ने काफी कोशिश की, मगर सपना टस से मस
हुई. 2 साल गुजरने के बाद भी सपना ने तलाक के लिए कोई पहल नहीं की, तब सुनने में आया कि प्रभात ने दूसरी शादी कर ली. यह तो और भी बड़ा अपराध था. सपना ने बच्चे के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने का मन बनाया. उस ने प्रभात की पुश्तैनी जायदाद पर दावा ठोंक दिया, साथ में उस की दूसरी शादी पर भी सवाल खड़े किए. तमाम कानूनी पचड़े की वजह से प्रभात काफी दबाव में गया और उस ने सपना की बात मान कर उसके मनमुताबिक हर्जाना दे कर तलाक पा लिया. सपना का बेटा 5 साल का हुआ, तो उस ने दोबारा नौकरी करने का मन बनाया. उसे नौकरी मिल भी मिल गई. ऐसे ही एक शाम सपना औफिस से घर आने के लिए मैट्रो का स्टेशन पर इंतजार कर रही थी, तभी उसे चिरंजीवी दिखा. उस ने नफरत से नजरें दूसरी तरफ मोड़ लीं. इस के बावजूद चिरंजीवी ने उसे देख लिया. वह उस के करीब आया.


‘‘सपना, मैं चिरंजीवी,’’ इतना कह कर वह मुसकराया.
सपना ने उस की बात का कोई जवाब नहीं दिया.
‘‘सपना, मु? माफ कर दो. मैं ने तुम्हें धोखा दिया.’’
‘‘अब गड़े मुरदे उखाड़ने से क्या फायदा?’’ सपना की आवाज में
तल्खी थी.
‘‘पिताजी को कोरोना हो गया था. अचानक मु? गांव जाना पड़ा.’’
‘‘चलो, मान लेते हैं. मगर क्या तुम्हारा फर्ज नहीं बनता था कि एक बार फोन कर के मेरा हाल लेते. बड़ी आसानी से कह दिया अबौर्शन करा लो. तुम्हें
मेरी हालत का अंदाजा था?’’ कहतेकहते सपना का गला रुंध गया, ‘‘तुम ने मु? कहीं का नहीं छोड़ा.’’
‘‘मु? माफ कर दो,’’ कह कर चिरंजीवी ने चुप्पी साध ली. उस के चेहरे पर बनतेबिगड़ते भावों से लगा मानो वह सपना से और भी कुछ कहना चाहता है, मगर कह नहीं पा रहा था.
फिर चिरंजीवी ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘सपना, अगर तुम्हारे पास समय हो तो क्या थोड़ी देर के लिए मेरे साथ पास के किसी रैस्टोरैंट में जा कर चाय पीना पसंद करोगी?’’
‘‘नहीं चिरंजीवी, अब हमारे रास्ते अलगअलग  हैं.’’
‘‘सिर्फ आज, उस के बाद मैं
तुम से कभी नहीं मिलूंगा,’’ चिरंजीवी दोबारा बोला.
दोनों रैस्टोरैंट में आए. चिरंजीवी
ने चाय के साथ कुछ स्नैक्स का भी और्डर दिया.


चाय की चुसकियों के बीच चिरंजीवी ने सपना के पति और बच्चे के बारे में पूछा.
यह सुन कर सपना का मन भीग गया. बड़ी मुश्किल से उस की जबान से बोल फूटे, ‘‘मेरा तलाक हो चुका है. मु? एक 5 साल का बेटा है. वही मेरे जीने का सहारा है.’’
सपना की आंखों में आंसू देख कर चिरंजीवी का दिल पसीज गया.
चाहते हुए भी सपना ने अपने अतीत के पन्ने बारीबारी से खोल कर चिरंजीवी के सामने रख दिए.
चिरंजीवी अपराधबोध से भर गया. सपना की बिखरी जिंदगी के लिए वह खुद को कुसूरवार मानने लगा. वह भरे दिल से बोला, ‘‘सपना, बीते हुए कल को वापस तो नहीं लाया जा सकता, मगर उसे नए सिरे से संवारा जरूर जा सकता है.’’


‘‘मतलब?’’ पूछते हुए सपना हैरानी से उसे देखने लगी.
‘‘क्या हम शादी कर के नई जिंदगी की शुरुआत नहीं कर सकते?’’
‘‘यह तुम क्या कह रहे होतुम्हारे बीवीबच्चे क्या सोचेंगे…’’
‘‘मैं ने आज तक शादी नहीं की.
वैसे भी मेरी उम्र इतनी भी गई नहीं है
कि मैं शादी कर सकूं. अभी तो महज 33 साल का हूं.’’
कुछ सोच कर सपना का मन उदास हो गया, ‘‘नहीं चिरंजीवी, ऐसा नहीं हो सकता. मैं एक बेटे की मां हूं. तुम शायद ही मेरे बेटे का अपना पाओ. अगर मेरा बेटा हम दोनों की शादी की वजह से अनदेखा हुआ, तो मैं खुद का कभी माफ नहीं कर पाऊंगी.’’
‘‘अकेले जिंदगी काटना क्या आसान होगा तुम्हारे लिए?’’ चिरंजीवी के इस सवाल ने सपना को ?ाक?ार कर रख दिया. बेशक आज मांबाप जिंदा हैं, पर कल का क्या ठिकाना. वे नहीं रहे तब किस के सहारे जिंदगी काटेगी. कोई तो होना चाहिए, जो उस के अकेलेपन का साथी हो.


देर हो रही थी. सपना ने चिरंजीवी का मोबाइल नंबर मांगा. घर कर वह बेहद बेचैन हो रही थी. कभी अपने भविष्य के बारे में सोचती, तो कभी बूढ़े हो रहे मांबाप के बारे में. बच्चे को ले कर भी वह परेशान थी. पता नहीं बड़ा हो कर वह चिरंजीवी को अपना पिता स्वीकार करेगा भी या नहीं? सम?ादार होने के बाद अपने असली पिता के पास जाने का जिद कर बैठे और उसे गुनाहगार मानने लगे तब? अगले दिन रविवार था. चिरंजीवी ने सपना के साथ घूमने का प्लान बनाया, जिसे सपना इनकार कर सकी. बेटे को मां के पास छोड़ कर वह यह कह कर गई कि औफिस के काम से जा रही है, जल्द जाएगी.


आज चिरंजीवी और सपना ने एकदूसरे को काफी वक्त दिया.
‘‘चिरंजीवी, क्या तुम मु? पर तरस खा कर शादी तो नहीं कर रहे हो?’’ सपना ने अचानक पूछा.
‘‘बिलकुल नहीं. मैं तुम से आज भी बेहद प्यार करता हूं.’’
‘‘मेरे बच्चे का क्या होगा? क्या तुम उसे बाप का नाम देगे?’’
‘‘सपना, मैं खुद अपने पिता का सौतेला बेटा हूं. क्या मेरे पिता ने मु? बेटे का  मान नहीं दिया. क्या मैं ने उन्हें पिता का दर्जा नहीं दिया. तुम ने खुद देखा होगा कि जब वे कोरोना से पीडि़त हुए थे, तो मैं उन की देखभाल के लिए अपने गांव भागाभागा चला गया था.’’
सपना को चिरंजीवी निश्छल और बेकुसूर लगा.
जब सपना को पूरी तसल्ली हो गई कि चिरंजीवी के बारे में जैसा सोचा था वह वैसा नहीं है, तब घर कर उस ने अपने मम्मीपापा से उस का जिक्र किया. वे तो पहले से ही चाहते थे कि सपना का घर बस जाए. ऐसे में चिरंजीवी की पहल को मना कर सके.


सादे समारोह में शादी हो गई. जब विदाई का समय आया, तब सपना के पापा ने उसे एक कमरे में बुला कर नम आंखों से कहा, ‘‘बेटी, मु? माफ करना. मैं ने तुम्हारे साथ बहुत नाइंसाफी की. तुम पर दबाव बना कर ऐसी जगह तुम्हारी शादी कर दी, जहां करने के बारे में मु? सौ बार सोचना चाहिए था.
सिर्फ शादी कर देना ही मांबाप की जिम्मेदारी नहीं होती, बल्कि शादी के लिए बेटी की रजामंदी भी लेनी चाहिए, जो मैं ने नहीं ली.’’  Hindi Story     

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