Social Story: सोनपुर मेला-दिन पशुओं का रात लड़कियों की

Social Story: रात के तकरीबन 10 बज चुके हैं. गंगा और गंडक के संगम पर बहती हवा में ठंडक है, पर इस ठंडक के भीतर एक अजीब सी बेचैनी तैर रही है. चांद आसमान में अपने पूरे शबाब के साथ मौजूद है, लेकिन लगता है कि उसे भी अंदाजा है कि उस के नीचे एक ऐसी दुनिया बसती है, जिसे उजाला भी छूने से डरता है.

सोनपुर मेले का मैदान दूरदूर तक फैला हुआ है. दिन में जहां यही जगह पशुओं की आवाजों से भरी रहती है, वहीं रात का रंग कुछ और ही होता है. आवाजें बदल जाती हैं, ताल बदल जाती है और लोगों की भीड़ किसी और ही चाह में इकट्ठा होने लगती है. ऐसा लगता है जैसे 2 मेलों की 2 दुनिया एक ही धरती पर उगती हैं… एक दिन में और दूसरी रात में. दिन का मेला पशुओं का है, रात का मेला लड़कियों का और इन दोनों दुनिया के बीच कहीं, एक रोशनी से भरा थिएटर खड़ा है, जिस के भीतर कलाकार हैं और बाहर दर्शक. पर जिस दुनिया में वे रहते हैं, वहां कलाकार होना ‘सुख’ नहीं, बल्कि ‘जद्दोजेहद’ का दूसरा नाम है.
सोनपुर, जहां दिन में व्यापार होता है, बूढ़े हाथी बिकते हैं, किसान अपनी जरूरतें खरीदते हैं, व्यापारी अपनी दुकानें सजाते हैं, वहीं रात होते ही एक दूसरी दुनिया उभर आती है. भीड़ के बीच से छनती तेज रोशनियां, लाउडस्पीकरों पर बजते मिक्स गीत, और हर मंच की ओर बढ़ती हजारों आंखें पर इन में से किसी को भी अंदाजा नहीं है कि इस चकाचौंध के पीछे क्या कीमत चुकानी पड़ती है.

आंखों में बसती थकान, मेकअप छिपा नहीं सकता स्टेज पर खड़ी हर लड़की के चेहरे पर मेकअप की कई परतें होती हैं, पर जिंदगी की दरारें इन परतों से नहीं छिपतीं. एक लड़की ने बात ही बात में कहा, ‘‘कपड़ा जितना छोटा, उतना नोट ज्यादा. पूरा शरीर तोड़ डालते हैं पर कहते हैं कि ‘आखिरी तक मुसकराना’. हम भी मुसकराते हैं, क्योंकि रोना किसी को पसंद नहीं आता. ‘‘कपड़े जितने छोटे होते हैं, लोग उतना पैसा लुटाते हैं. हमारी आंखों का रंग भी असली नहीं रहता. स्टेज पर जाने से पहले नीला लैंस लगाती हूं. पीरियड में भी नाचना पड़ता है. लोग कहते हैं कि हम नाचते हैं, क्योंकि हमें यही आता है पर किसी ने यह नहीं पूछा कि हम ने क्या खो कर यह सीखा?’’ मेकअप कर रही 17 साल की एक लड़की बोली, ‘‘हम तो गांव के मेले में नाचते थे. यहां आ गए तो पता चला कि यहां नाच नहीं, तन दिखाना ज्यादा जरूरी है. पहली बार बहुत रोई थी पर घर में खाने को कुछ नहीं था.’’

उस लड़की की आवाज में कोई ड्रामा नहीं, कोई शिकायत नहीं. बस, एक लंबा जमा हुआ सच है. ऐसा सच, जिसे मेले की भीड़ देखने नहीं आती, पर उस की बदौलत ताली जरूर बजाती है. जहां जानवरों का मेला लगता है, वहां लड़कियों का नाच भी दिखाया जाता है. सोनपुर मेला दुनिया का सब से बड़ा पशु मेला है. यह बात हर गाइड, हर पंपलैट, हर इतिहासकार लिखता है और यह सच भी है. दिन में तंबुओं में बंधे हाथी, रस्सी से बंधे घोड़े, चमकदार काठी वाले ऊंट और अनगिनत पालतू जानवरों को देखने हजारों लोग आते हैं. किसान उन का दांत देखते हैं, चाल देखते हैं, वजन देखते हैं, बरताव देखते हैं, लेकिन जैसे ही शाम ढलती है, वही मैदान, वही तंबू किसी और रंग में रंग जाते हैं.

दिन में जहां जानवर बिकते हैं, रात में वहां लड़कियों के नाच बिकते हैं. मजबूरी और जिंदगी की कीमत सोनपुर मेले या किसी दूसरे मेले में नाचने वाली लड़कियों की माली हालत आमतौर पर बेहद कमजोर होती है. ज्यादातर लड़कियां गरीबी, अनाथालय या टूटे परिवार से आती हैं. उन के पास औप्शन बहुत सीमित होते हैं, जैसे स्कूल छोड़ना, घर चलाना या परिवार का पालनपोषण करना. यही वजह है कि वे थिएटर में काम करने को मजबूर होती हैं. हालांकि स्टेज पर उन के नाच के बदले उन्हें पैसे मिलते हैं, लेकिन वह रकम उन की मेहनत, थकान और जोखिम के मुताबिक नहीं होती.

कभीकभी उन्हें सिर्फ खानेपीने, सफर और छोटेछोटे खर्चों के लिए ही भुगतान मिलता है. उन के लिए स्टेज एक ऐसा व्यवसाय है, जो आज जीविका दे सकता है, पर अच्छा भविष्य नहीं. थिएटर मालिकों का रवैया थिएटर मालिक आमतौर पर इन लड़कियों को एक ‘प्रोडक्ट’ के रूप में देखते हैं न कि इनसान के रूप में. स्टेज पर उन की चमक, थिरकन और आकर्षण ही उन की कीमत तय करती है. कुछ मालिक कलाकारों की सिक्योरिटी, भोजन और सेहत का ध्यान रखते हैं, पर ज्यादातर केवल कमाई और दर्शकों की तादाद पर फोकस करते हैं. लड़कियों के दर्द, सेहत और मानसिक हालात को नजरअंदाज किया जाता है. अगर कोई प्रदर्शन में नाकाम होती है या कमजोर पड़ती है, तो उसे धमकाया जाता है, काम से हटा दिया जाता है या अगले शो में जगह नहीं दी जाती है.

इज्जत की हिफाजत, सब से कमजोर कड़ी थिएटर की लड़कियों के लिए सब से बड़ा खतरा उन की इज्जत का होता है. स्टेज पर उन के शरीर को नजरों के सामने लाया जाता है और कई बार दर्शक की छेड़छाड़, गालीगलौज, वीडियो बनाना या स्टेज के पीछे दबाव डालना आम बात हो जाती है. सिक्योरिटी का उपाय तकरीबन नाममात्र होता है और लड़कियां अपनी हिफाजत के लिए अकेली रहती हैं. अकसर वे अपनी इज्जत के लिए चुप रहने को मजबूर होती हैं, क्योंकि विरोध करने पर नौकरी या आमदनी छिन सकती है.
समाज में नजरअंदाज होना समाज में इन लड़कियों की हालत बहुत बुरी है. लोग उन की जद्दोजेहद और मेहनत को नहीं देखते, बस उन्हें ‘नाचने वाली’ के रूप में देखते हैं.

यह पेशा उन्हें इज्जत देने के बजाय बदनाम कर देता है. उन के पास शादी, स्थायी संबंध या सामाजिक सुरक्षा के मौके भी अकसर सीमित हो जाते हैं. समाज उन की मजबूरी को नजरअंदाज करता है और

Hindi Story: बाथरूम

Hindi Story: सरपंच सोहन ठाकुर को पराई औरतों को ताड़ने की गंदी आदत थी. वे एक दलित औरत बलुई को अपनी छत से नहाते हुए देखते और उसे पाने की तरकीब लगाने लगे. क्या सोहन ठाकुर बलुई को पा सके?

सो  हन ठाकुर की उम्र 48 साल की हो गई थी, पर उन के अंदर अब भी जवानों के जैसा जोश बरकरार था. वे जम कर खाते और दंड पेलते थे. उन का अच्छाखासा शरीर था. सोहन ठाकुर को देख कर कोई यह नहीं कह सकता था कि उन का 20 साल का एक बेटा भी है. सोहन ठाकुर की एक खूबसूरत पत्नी भी थी, जिसे वे प्यार से रूपमती कहा करते थे. गांव का सरपंच होने के नाते उन की खूब इज्जत भी थी. गांव में सोहन ठाकुर का दोमंजिला मकान बना हुआ था, जिस के अंदर रूपमती के लिए एक खूबसूरत सी रसोई भी बड़े मन से बनवाई गई थी.

पंचायत में भी सोहन ठाकुर की बात को मान दिया जाता था. जब भी पंचायत लगती तो सोहन ठाकुर कोई भी फैसला देने से पहले एक अलग अंदाज में अपनी मूंछ पर ताव देते और फिर फैसला सुनाते और फैसला सुनाते समय उन के चेहरे पर गजब की चमक आती थी. 48 साल की उम्र होने के बाद और गांव में इतना रसूख होने के बाद भी सोहन ठाकुर का एक और पहलू था, जिसे सिर्फ वे ही जानते थे. वह पहलू यह था कि उन की आंखें किसी भी औरत का नंगा जिस्म देखने को हमेशा आतुर रहती थीं. गांव में खेतों के बीच काम करते समय मजदूर औरतों की छाती पर सोहन ठाकुर की नजरें बरबस ही जम जाती थीं.

सुबह के तकरीबन 10 बजे सोहन ठाकुर गांव के तालाब की तरफ टहलने चले जाते और वहां पर कोई कोई औरत कपड़े धोते दिख जाती, तो उस के खुले अंगों पर किसी गिद्ध की तरह उन की नजरें टिक जाती थीं. सोहन ठाकुर के मकान के पीछे 2-3 घर दलित जाति के लोगों के थे. इन्हीं घरों में बलुई रहती थी. बलुई की उम्र 40 साल के आसपास होगी. बलुई का शरीर लंबा और मांसल पर गठा हुआ था. सांवले रंग की बलुई ब्लाउज के नीचे कुछ नहीं पहनती थी, फिर भी उस की छाती तनी ही रहती थी.

बलुई अपनी पतली कमर पर साड़ी को काफी नीचे बांधती थी, इसलिए उस की गहरी नाभि साफ दिखाई देती थी. अकसर ही सोहन ठाकुर की नजरें बलुई के जिस्म का भरपूर मुआयना करती थीं. सोहन ठाकुर एक बार अपनी छत पर खड़े हो कर चारों तरफ देख रहे थे कि तभी उन के कानों में नल चलने और पानी गिरने की आवाज आई, तो उत्सुकतावश वे छत के कोने में गए और नीचे ?ांकने लगे. सोहन ठाकुर की आंखें खुशी और हैरत से फैल गईं. उन्होंने देखा कि नीचे बलुई अपने घर के कोने में लगे नल पर नहा रही थी. वजह, गांव के गरीब और दलित घरों में बंद बाथरूम नहीं होते, इसलिए औरतें खुले में ही नहाने को मजबूर होती हैं.

सोहन ठाकुर वैसे भी बहुत दिन से बलुई को घूरा करता थे, पर बलुई के तेज स्वभाव के चलते उन्होंने कभी बलुई को छूने की कोशिश नहीं की थी, पर वे बलुई के मांसल और गठीले शरीर के दीवाने तो थे ही, इसलिए रात में अपनी पत्नी रूपमती के साथ सैक्स करते, तब भी उन के खयालों में बलुई ही रहती थी.
बलुई आज सोहन ठाकुर के सामने बिना कपड़ों के नहा रही थी. वे ?ाट से थोड़ा सा पीछे हो गए, पर अपनी नजरें बलुई के जिस्म पर ही गड़ाए रखी थीं. बलुई अपने सांवले जिस्म को बारबार साबुन लगा कर मसल रही है, तो सोहन ठाकुर के समूचे जिस्म में हवस दौड़ गई और जब बलुई ने अपने हाथ उठा कर अपनी पीठ को रगड़ा, तब तो बलुई की जवानी खिल कर सामने ही गई.

सोहन ठाकुर जम कर बलुई के रूप के दर्शन कर रहे थे. जब बलुई नहा चुकी और कपड़े पहनने लगी, तो सोहन ठाकुर धीरे से पीछे हट गए और नीचे गए. उस दिन से रोज ही सोहन ठाकुर ने धीरेधीरे यह अंदाजा लगा लिया था कि बलुई दिन में दोपहर के तकरीबन 2 बजे नहाती है. शायद इस समय तक वह
खेतों और घर का सारा काम निबटा भी लेती होगी. अब सोहन ठाकुर बलुई को नहाते हुए घूरने का मौका तलाशते रहते कि बलुई कब नहाए और कब वे उसे घूर कर अपनी आंखों को मजा देते रहें. पर एक दिन नहाते समय अचानक बलुई की नजर ऊपर खड़े सोहन ठाकुर पर पड़ ही गई. उस दिन तो बलुई ने ?ाट से अपने हाथों से कैंची बनाई और अपने खुले सीने को ढक लिया और कमरे में भाग गई, पर संकोच के चलते कुछ कह सकी.

पर एक दिन बाद जब फिर से बलुई नहा रही थी, तो सोहन ठाकुर छिप कर उस के रूप के मजे ले रहे थे. तभी बलुई ने सोहन ठाकुर को देख लिया, पर इस बार बलुई डरी नहीं और सकुचाई भी नहीं. उस ने पहले तो कपड़ों से सीने को ढका और फिर तेज आवाज में सोहन ठाकुर से कहा, ‘‘अरे, ठाकुर साहब,
हमें छिप कर क्या देखते होअगर रस चखना है, तो कभी बाहर कर मिलो…’’ बलुई की आवाज सुन कर सोहन ठाकुर फौरन नीचे भाग गए कि कहीं ऐसा हो कि यह बात उन का बेटा और रूपमती जान जाएं. वे तुरंत अपने कमरे में जा कर लेट कर सोने का बहाना करने लगे, पर बलुई की कहीं गई बात उन के कानों में अब भी गूंज रही थी और मन ही मन में वे रोमांचित भी हो रहे थे.

बलुई जाति से दलित जरूर थी, पर अपने पति किसना के साथ अच्छी तरह से जिंदगी काट रही थी. उसे बस यह दुख था कि शादी के 10 साल बाद भी उन दोनों के कोई औलाद नहीं थी. हालांकि, अब तो उस ने औलाद के बारे में सोचना भी छोड़ दिया था और अपने काम पर ही पूरा ध्यान रखे हुए थी. किसना गांव के बाहर कसबे की ओर जाने वाली सड़क के किनारे पानपुडि़या और चिप्स, पानी की बोतल, कोल्डड्रिंक का खोखा लगाता था और आतेजाते लोग उस के कस्टमर होते थे. गुजारे लायक कमाई तो हो जाती थी, पर बलुई के अंदर आगे बढ़ने की और कुछ ज्यादा पैसे कमाने की मंशा भी थी, जिस से कि वह अपने पति के लिए सड़क के किनारे एक पक्की दुकान बनवा सके.

गांव में नई उम्र के लड़केलड़कियां मोबाइल चलाते, तो बलुई को भी शौक चढ़ता था कि वह भी मोबाइल पर अपनी वीडियो बनाए. बलुई को तो सुनने में यह भी आया था कि नाचगाने की रील बना कर पैसा भी कमाया जा सकता है. बलुई भी तो नाच सकती है और दूसरे लोगों से बेहतर नाच सकती है, पर इन सब चीजों के लिए उसे अच्छा मोबाइल चाहिए और मोबाइल लेने के लिए पैसा चाहिए, जो फिलहाल तो बलुई और उस के मरद के पास नहीं था.

उस दिन शाम ढले बलुई जब पास के बाजार से वापस रही थी, तब रास्ते में उसे सोहन ठाकुर मिल गए. वे बलुई को सामने देख कर थोड़ा डर गए, पर बलुई उन्हें देख कर मुसकरा दी, तो सोहन ठाकुर का साहस बंध गया और वे उस के तराशे बदन को ऊपर से नीचे देखने लगे. ‘‘देखने के भी पैसे लगेंगे ठाकुर साहब,’’ बलुई ने इठलाते हुए कहा तो सोहन ठाकुर को ग्रीन सिगनल मिल गया. उन्होंने ?ाट से 100 का नोट निकाल कर बलुई की तरफ बढ़ाया, तो बलुई ने लेने से मना कर दिया और बोली, ‘‘इतने में तो हमारे पैर ही देख पाओगे ठाकुर साहब…’’

सोहन ठाकुर सम? गए थे कि बलुई ज्यादा पैसे चाहती है और पैसों के बदले उस के हुस्न का मजा भी लिया जा सकता है, इसलिए उन्होंने 500 रुपए निकाले और बलुई को दे दिए, पर बलुई इतने में भी नहीं मानी, तो उन्होंने उसे 1,000 रुपए देने का वादा किया. सोहन ठाकुर की बात मान कर बलुई एक गन्ने के खेत की तरफ बढ़ गई और सोहन उस से दूरी बना कर पीछे चल दिए. गन्ने के खेत में जा कर सोहन ठाकुर ने बलुई के जिस्म से जरूरी कपड़े हटाए और उस खूबसूरत औरत के जिस्म को जम कर भोगा.

बलुई ने देखा कि सोहन ठाकुर उस के जिस्म को किसी कुत्ते की तरह चाट रहे थे. वह सोच रही थी, ‘हम को नीच जात का कह कर हमारे हाथ से पानी तक नहीं पीते हैं और इस समय अपनी जीभ भी हमारे अंदर डालने से इन्हें परहेज नहीं…’ सोहन ठाकुर और बलुई का यह सिलसिला शुरू हुआ, तो फिर आगे आने वाले दिनों में भी जारी रहा. बलुई पैसों के बदले खुद को ठाकुर को सौंप देती और ठाकुर को बलुई जैसी नमकीन औरत के जिस्म का मजा मिल जाता, पर बलुई इतनी बेवकूफ नहीं थी और है वह चरित्रहीन थी.

उस ने अपने पति से धोखा किया था, पर वह तो सोहन ठाकुर को अपना जिस्म सौंप कर कुछ पैसे इकट्ठे कर लेना चाहती थी, जिस से वह अपने नहाने के लिए एक छत वाली जगह बनवा सके, ताकि सोहन ठाकुर उसे और घूर सकें. एक दिन खेत में जब सोहन ठाकुर बलुई के जिस्म में घुसने की तैयारी कर रहे थे, तभी बलुई ने उन से एक एंड्राइड मोबाइल की मांग कर डाली. ठाकुर पहले तो हिचके, क्योंकि मोबाइल थोड़ा महंगा आता है, पर बलुई ने अपने अंगों को सिकोड़ लिया और संबंध मनाने से मना कर दिया, तो सोहन ठाकुर ने मोबाइल देने के लिए मजबूरन हां कर दी और बाद में उन को बलुई के लिए एक मोबाइल खरीदना ही पड़ा.

मोबाइल पा कर बलुई बहुत खुश हो गई थी और हाई स्कूल में पढ़ने वाली एक लड़की की मदद से उस ने फेसबुक और रील्स बनाना भी सीख लिया था. इस बीच गांव में पंचायत के चुनाव की तारीख निकट आने लगी थी और सोहन ठाकुर एक बार फिर से सरपंच बनने की जुगत में लग गए थे और घरघर जा कर हाथ जोड़ कर उन्हें ही सरपंच चुनने की विनती करने लगे थे. सरपंच के बेटे मोहित सिंह को अपने पिता के कामकाज से कोई मतलब नहीं था. वह तो अपने दोस्तों की मंडली में नशे की लत में पड़ चुका था. दोस्तों को ले कर सुबह से शाम तक इधरउधर घूमता, गांजे का दम भरता और औरतों पर बुरी निगाह रखता.
उस दिन बलुई अपने घर से निकल कर खेत में काम करने जा रही थी कि तभी मोहित सिंह ने बलुई का रास्ता रोक लिया. उस की आंखों में नशा था और चेहरे से हवस टपक रही थी.

बलुई तो मोहित सिंह से उम्र में काफी बड़ी थी, पर जब इनसान के सिर पर हवस चढ़ कर बोल रही हो, तो उसे कुछ नहीं दिखता. मोहित सिंह ने बलुई को अपनी मजबूत बांहों में जकड़ लिया और खेत में ले जा कर उस का रेप कर दिया. बलुई ने चीखना चाहा, पर मोहित सिंह ने अपना गमछा उस के मुंह में ठूंस दिया और अपनी मनमानी कर ली. बलुई को अपने साथ यह जबरन गलत काम बिलकुल नहीं भाया. वह सिसकती रही और घर कर नल के पानी से नहाने लगी.

बलुई के मन में तूफान चल रहा था कि अगर वह आज नाइंसाफी सह गई, तो आगे आने वाले समय में जाने कितनी बार ये ऊंची जाति वाले उस के साथ रेप करेंगे. हो सकता है कि कई लोग मिल कर एकसाथ उस के साथ गलत काम करें. ऐसा बलुई इसलिए भी सोच रही थी कि उस ने अपने बचपन में इस तरह के कई कांड होते हुए देखेसुने थे. अच्छा यही होगा कि वह अपने साथ हुए इस गलत काम के प्रति आवाज उठाए. लिहाजा, बलुई ने अपनी शिकायत को पंचायत में उठाने की बात सोची और अपने पति किसना से अपने साथ हुई वारदात को बताया.

किसना दुखी हुआ और गुस्से से भर गया, पर वह जानता था कि सरपंच के लड़के पर ऐसा आरोप लगाने से कोई फायदा नहीं होगा और उस ने यह बात बलुई को सम?ाई पर बदले की भावना से भरी हुई बलुई नहीं मानी और पंचायत में जा कर अपनी शिकायत दर्ज कराई. सरपंच सोहन ठाकुर अपने लड़के की यह करतूत सुन कर गुस्सा होने की बजाय मन ही मन खुश हो गए. मेरे बेटे ने भी बलुई का मजा ले लिया. वाह, हमारी पसंद तो काफी मिलतीजुलती है और इस का मतलब है कि मेरा बेटा भी जवान हो गया है,’ सोहन ठाकुर ने सोचा.

सरपंच के अलावा पंचायत के दूसरे सदस्यों ने बलुई के साथ हुए गलत काम पर अफसोस जताया और बलुई को भरोसा दिलाया कि उसे इंसाफ मिलेगा और इस के लिए इस हफ्ते की 8 तारीख को दोनों पक्षों की सुनवाई के लिए पंचायत को बुलाए जाने का तय हुआ. सोहन ठाकुर के सामने दिक्कत यह थी कि अगर वे फैसला बलुई के पक्ष में देते हैं, तो बेटे को सजा सुनानी पड़ेगी और अगर बेटे के पक्ष में फैसला सुनाते हैं, तो हो सकता है कि गांव वाले आने वाले चुनाव में उन्हें वोट दें और वे हार भी सकते हैं.

तय दिन और समय पर पंचायत लगी और पहले बलुई ने अपनी शिकायत रखी जिस में बलुई ने अपने साथ हुए रेप की बात बताई और इंसाफ मांगा. इस के बाद मोहित सिंह को बोलने का मौका दिया गया. मोहित अपने कांड से साफ मुकर गया. उलटा उस ने कहा कि बलुई उस पर ?ाठा आरोप लगा रही है. दोनों लोगों की बात पर फैसला देना था और यह फैसला सरपंच सोहन ठाकुर ने यह कह कर सुना दिया, ‘‘बलुई अपने साथ हुए रेप का कोई सुबूत नहीं ला सकी है. अगर वह अपने निजी अंगों को सब के सामने दिखा सके तभी तो हम जानेंगे कि रेप हुआ या नहीं.

‘‘लिहाजा, सुबूतों की कमी में मोहित ठाकुर को बरी किया जाता है और बलुई को सख्त हिदायत दी जाती है कि बिना सुबूत किसी शरीफ आदमी पर ऐसे आरोप लगाए.’’ बलुई का मन किया कि सोहन ठाकुर के मुंह पर जा कर थूक दे, पर उस ने अपनेआप को संभाला और बेइज्जती का घूंट पी लिया. रात में जब किसना ने उसे दिलासा देने के लिए अपने गले लगाया, तो बलुई की रुलाई फूट पड़ी थी, पर इन बहते आंसुओ में बदले लेने की भावना अब भी बलवती हो रही थी. सरपंच सोहन ठाकुर को अपने फैसले पर पछतावा तो हो रहा था, पर पुत्र मोह के चलते उन्हें ऐसा फैसला करना पड़ा, जिस ने बलुई को उन से नाराज कर दिया था.

बलुई सरपंच सोहन ठाकुर को सामने देख कर अपना रास्ता बदल लेती या तो उन्हें नफरतभरी निगाह से घूरती रहती थी. सोहन ठाकुर बस बलुई को देखते रह जाते थे. तकरीबन 2 महीने हो चले थे और सोहन ठाकुर को बलुई के जिस्म का मजा नहीं मिला था. अपने मन को शांत करने के लिए बलुई के नहाने के समय पर सोहन ठाकुर छत पर चले गए और हर बार की तरह इस बार भी बलुई को नहाते हुए देखने लगे.
बलुई तो पहले से ही सतर्क थी. आज वह अपने पेटीकोट को अपने सीने के ऊपर बांधे हुए थी. बलुई की कनखियों ने देखा कि सोहन ठाकुर छत पर गए हैं. उस ने ?ाट से अपने पैरों के पास रखे मोबाइल को उठाया और सैल्फी मोड पर किया और इस तरह से अपना वीडियो बनाने लगी, जिस से बलुई का चेहरा भी एक और पीछे से ठाकुर की ?ांकती हुई वीडियो भी जाए.

बलुई ने यह काम बहुत सफाई से किया, ताकि सोहन को शक भी हो और मोबाइल में सुबूत के तौर पर यह वीडयो भी कैद हो जाए और कुछ देर में ही बलुई ने कई छोटेछोटे वीडियो के क्लिप बना लिए थे.
बलुई के सामने मोहित सिंह और उस के दोस्त अकसर पड़ ही जाते थे. आज भी जब बलुई खेत से मजदूरी कर के रही थी तो मोहित सिंह और उस के दोस्त उसे छेड़ने लगे. ‘‘यार मोहित, जवान औरतों से ज्यादा तो बड़ी उम्र की औरतों में मजा है,’’ एक दोस्त ने फिकरा कसा, तो मोहित सिंह भी भद्दी सी हंसी हंसने लगा. बलुई को तो इसी मौके का इंतजार था,

‘‘तुम ने तो बेकार में जबरदस्ती की, मांग लेते तो भी मैं मना थोड़े ही करती, बल्कि गोश्त और दारू का इंतजाम कर के आप लोगों का मन भी बहला देती,’’ बलुई ने दांव खेला, तो मोहित सिंह उस के ?ांसे में गया और तुरंत ही उस ने जेब से 1,000 रुपए निकाले और बलुई को दिए, फिर कहा कि आज शाम को वह दारू ले आए और गोश्त पका कर रखे. वे लोग आज फिर से बलुई के हुस्न का स्वाद चखेंगे.
बलुई ने पूरा जाल बिछा दिया था. उस ने पंचायत चुनाव में सोहन ठाकुर के विरोधी नेता को अपनी सारी कहानी कह सुनाई थी और उस से मदद मांगी थी. वह नेता भी बलुई की मदद के लिए तैयार था, बस अब सुबूत जुटाने की तैयारी थी.

शाम को पुराने स्कूल के एक कमरे में बलुई ने दारू मंगवा ली और गोश्त पकाने लगी थी. मोहित सिंह और उस के 2 दोस्त भी गए और गोश्त पकने का इंतजार करने लगे थे. मोहित सिंह ने पहले से ही दारू पीनी शुरू कर दी थी. थोड़ी देर बाद जब गोश्त पक गया, तब बलुई ने प्लेट में खाना लगाया और सब लोग साथ में खाने लगे. खाना खाने के बाद मोहित सिंह की आंखों में हवस के डोरे तैर आए थे. उस ने बलुई के सीने पर हाथ रख दिया और दबाव बढ़ाने लगा. बलुई ने विरोध नहीं किया तो उस की हिम्मत बढ़ गई
और उस ने बलुई के जरूरी कपड़े ऊपर कर दिए. बलुई सम? गई कि यही सही समय है और उस ने इतने में उस ने विरोधी पार्टी के नेता को मदद के लिए फोन लगा दिया और वह फोन पर चिल्ला कर मदद मांगने लगी थी.

वह नेता तुरंत ही पुलिस ले कर गया और मौके पर ही नशे में चूर मोहित सिंह और उस के दोस्तों को गिरफ्तार कर लिया. ‘‘दारोगा साहब, सिर्फ यही कुसूरवार नहीं है, बल्कि इस का बाप भी मु? गरीब को रोज नहाते हुए देखता है,’’ बलुई ने कहा तो दारोगा के साथसाथ मोहित सिंह को भी अजीब लगा कि उस के पिता भी बलुई पर बुरी नजर रखते हैं. बलुई ने अपने मोबाइल का वीडियो पुलिस को दे दिया, जो उस ने अपने मोबाइल से शूट किया था, जिस में साफ दिख रहा था कि बलुई को सोहन ठाकुर अपनी छत से घूर रहे हैं.

सोहन ठाकुर को पुलिस ने खरीखोटी सुनाई और चेतावनी दे कर छोड़ दिया, जबकि उन के लड़के को रेप करने की कोशिश मे गिरफ्तार कर लिया गया. पंचायत चुनाव में सरपंच सोहन ठाकुर की जबरदस्त हार हुई. पूरे गांव में इन दोनों की कारिस्तानी की बात फैल गई थी और सब लोग सोहन ठाकुर और उन के लड़के मोहित सिंह के नाम पर थूथू कर रहे थे. सोहन ठाकुर की पत्नी रूपमती को जब यह बात पता चली, तो वे सीधे बलुई के घर पहुंचीं और अपने पति और बेटे की तरफ से माफी मांगी और पूरे 50,000 रुपए बलुई को दिए.

बलुई ने पैसे लेने से मना किया, तो रूपमती ने कहा, ‘‘ये पैसे मैं तुम्हें इसलिए दे रही हूं, ताकि तुम अपने नहाने की जगह एक बाथरूम बनवा सको और तुम्हें खुले आसमान के नीचे नहाना पड़े. जब तुम बाथरूम में नहाओगी, तो तुम्हें कोई भी नहीं घूर सकेगा.’’ रूपमती यह कह कर चुप हो गई थीं, जबकि बलुई सोच रही थी कि सोहन ठाकुर जैसे नीच को कितनी अच्छी पत्नी मिली है.

बलुई अब मोबाइल और भी कुशलता से चलाती है और उस ने और किसना ने खूब मेहनत कर के अब और भी पैसे भी जोड़ लिए हैं, पर अभी भी इतने पैसे नहीं इकट्ठा हो पाए हैं कि वे लोग सड़क के किनारे पक्की दुकान बनवा सकें, पर पैसे कमाने की उन की कोशिश जारी है. विरोधी पार्टी का नेता अब गांव का सरपंच है और उस ने पंचायत के 5 सदस्यों में बलुई को भी शामिल किया है. बलुई अब गांव वालों की समस्याएं सुनती है और अपना फैसला भी सुनाती है. बलुई और सरपंच की कोशिश से अब हर घर में नहाने की जगह एक बंद छत वाला बाथरूम बन गया है. गांव की कोई औरत अब खुले में नहीं नहाती है.  Hindi Story.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें