15 August Special: फौजी ढाबा

15 August Special: ढाबा चलाने के लिए करतार सिंह ने 4 लड़कों का स्टाफ भी रख छोड़ा था, जो ग्राहकों को अच्छी सर्विस देते थे. उन की मजे में जिंदगी कट रही थी.

फौज में सूबेदार करतार सिंह का बड़ा जलवा था. अपनी बहादुरी के लिए मिले बहुत सारे मैडल उस की वरदी की शान बढ़ाया करते थे. बौर्डर से जब भी वह गांव लौटता तो पूरा गांव अपने फौजी भाई से सरहद की कहानी सुनने आ जाता था.

करतार सिंह सरहद की गोलीबारी और दुश्मन फौज की फर्जी मुठभेड़ की कहानी बड़े जोश से सुनाया करता था. अपनी बहादुरी तक पहुंचतेपहुंचते कहानी में जोश कुछ ज्यादा ही हो जाता था. गांव का हर नौजवान बड़ी हसरत से सोचता कि काश, वह भी फौज में होता तो करतार सिंह की तरह वरदी पहन कर गांव आया करता.

गांव के बुजुर्ग तो करतार सिंह पर फख्र किया करते हैं कि उस ने उन के गांव का नाम देशभर में रोशन किया है.

इस बार करतार सिंह जब घर आया तो अपने पैरों के बजाय बैसाखी के सहारे आया. असली मुठभेड़ में उस की एक टांग में गोली लगी थी जिसे काटना पड़ा.

6 महीने सेना के अस्पताल में गुजारने के बाद करतार सिंह को छुट्टी दे दी गई और साथ में जबरदस्ती रिटायरमैंट के कागजात भी भारीभरकम रकम के चैक के साथ थमा कर उसे वापस घर भेज दिया गया.

फौजी की कीमत उसी वक्त तक है, जब तक कि उस के हाथपैर सहीसलामत रहते हैं. जिस तरह टांग के टूटने के बाद घोड़ा रेस में दौड़ने के लायक नहीं रह जाता तो उसे गोली मार दी जाती है, ठीक उसी तरह फौज लाचार हो जाने वाले को रिटायर कर देती है.

करतार सिंह को बड़ी रकम के साथ सरकार ने हाईवे से लगी हुई एक जमीन भी तोहफे में दी थी जिस पर आज उस ने ‘फौजी ढाबा’ खोल दिया था. 2 बेटियां और एक बीवी के अलावा कोई खास जिम्मेदारी करतार सिंह पर थी नहीं. फौज से मिली हुई रकम और ढाबे से होने वाली आमदनी ने पैसों की अच्छी आवाजाही कर रखी थी, इसलिए अब काम में सुस्ती आने लगी. नौकरों के भरोसे ढाबा चल रहा था.

करतार सिंह ज्यादातर नशे में धुत्त रहता था. वह पीता पहले भी था, लेकिन फौज में इतनी दौड़ाई रहती थी कि कभी नशा सवार नहीं हो पाता था. अब काम कुछ था नहीं, इसलिए नशा उतरने भी नहीं पाता था कि बोतल दोबारा मुंह से लग जाती.

जब मालिक नशे में रहे तो नौकरों को मनमानी करने से कौन रोक सकता है. आमदनी कम होने लगी, पैसे गायब होने लगे.

मजबूर हो कर ढाबे की कमान बीवी सरबजीत कौर ने संभाली. अब वह गल्ले पर खुद बैठती और काम नौकरों से कराती.

तीखे नाकनक्श की सरबजीत कौर के ढाबे पर बैठते ही ढाबे ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली. दाल मक्खनी और पिस्तई खीर के साथ सरबजीत कौर का तड़का भी फौजी ढाबे की पहचान बन गया.

एक बार फिर से ग्राहकों की तादाद कम होने लगी. सरबजीत कौर ने इस की वजह मालूम की तो एक नौकर ने बताया कि चंद कदम के फासले पर एक ढाबा और खुल गया है. अब ज्यादातर ट्रक वहां पर रुकते हैं.

दूसरे दिन सरबजीत कौर ने खुद जा कर देखा कि नया ढाबा, जिस का नाम ‘भाभीजी का ढाबा’ था, वहां 25-26 साल की एक खूबसूरत औरत गल्ले पर बैठी है और ग्राहकों से मुसकरामुसकरा कर डील कर रही है.

‘फौजी ढाबा’ को तोड़ने के लिए गंगा ने शुरू से ही अपनी बीवी को बिठा कर करतार सिंह के ग्राहकों पर डाका डाल दिया था.

सरबजीत कौर के पास अब इस के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं था कि वह अपने ब्लाउज के गले को बड़ा कर के गल्ले पर बैठा करे. इस तरकीब से कुछ सीनियर फौजी तो ढाबे पर आ गए, लेकिन अभी भी ‘भाभीजी का ढाबा’ नंबर वन पर चल रहा था.

‘फौजी ढाबा’ किस हाल से गुजर रहा था, इस की परवाह अब करतार सिंह को नहीं थी. उसे तो बस सुबहशाम 2 बोतल दारू और एक प्लेट चिकन टिक्का चाहिए था, जो किसी न किसी तरह सरबजीत कौर उस तक पहुंचा देती थी.

ढाबे की जिम्मेदारी अब पूरी तरह से सरबजीत कौर पर आ गई थी. बच्चियां छोटी थीं. यों भी स्कूल जाने वाली बच्चियों को ढाबे के काम में लगाना मुनासिब नहीं था.

एक बार उस ने एक बच्ची को पलंग पर बैठे एक ड्राइवर के पास सलाद देने के लिए भेजा तो यह देख कर उस का खून खौल गया कि ड्राइवर ने बच्ची के गाल को नोचा और फिर ड्राइवर का हाथ बच्ची की गरदन से नीचे आ गया.

छोटी बच्ची सलाद की प्लेट पटक कर घर के अंदर भाग गई. दुकानदारी पर कहीं असर न पड़े, इसलिए सरबजीत कौर ने बात आगे नहीं बढ़ाई.

बाप नशे में धुत्त और मां दिनरात ढाबे के गल्ले पर बैठने के लिए मजबूर, ऐसे में बच्चियों पर कौन नजर रखे. कच्ची उम्र से जवानी की दहलीज पर पैर रखने वाली गीता की नजर चरनजीत से टकरा गई. 1-2 महीने से शनिवार की शाम को एक नए ट्रक के साथ एक नौजवान आ कर सब से अलग बैठ जाता. खाना खा कर सो जाता और दूसरे दिन वह ट्रक ले कर कहीं चला जाता. स्याह कमीज, स्याह पैंट और नारंगी रंग की पगड़ी में वह बहुत खूबसूरत लगता था.

पहली बार जब गीता ने देखा तो वह उसे देखती ही रह गई. इत्तिफाक से उस की नजर भी गीता की तरफ उठ गई तो उस ने नजर हटाई नहीं. अपनी बड़ीबड़ी आंखों से वह गीता को घूरता ही रहा.

साथ में बैठे क्लीनर ने जब पुकारा, ‘‘चरनजीते, कहां खो गया,’’ तो गीता को मालूम हुआ कि उस का नाम चरनजीत है.

दूसरे शनिवार को जब वह फिर वहां आया तो गीता के दिल की धड़कन तेज हो गई. उसे ऐसा लगा कि वह सिर्फ उसी के लिए आया है. लेकिन, चरनजीत के बरताव में कोई फर्क नहीं आया. खाना खा कर वह पलंग पर सो गया.

गीता ने घर से एक तकिया मंगा कर ढाबे के एक लड़के को देते हुए कहा कि उन साहब को दे आए. पहली बार किसी ग्राहक को तकिया पेश किया गया था. तकिए के कोने में गीता का मोबाइल नंबर और नाम भी लिखा था.

किसी को खबर भी नहीं हुई और चरनजीत और गीता एकदूसरे के इश्क में डूबते चले गए. मोबाइल पर बातें होती रहतीं. किसी को मालूम ही नहीं चल पाता कि चंद कदमों के फासले पर आशिक और माशूक बैठे एकदूसरे से हालेदिल बयां कर रहे हैं. स्कूल टाइमिंग में बाहर मुलाकातें होने लगीं.

एक दिन ऐसा भी आया, जब चरनजीत ने गीता से कहा कि ऐसा कब तक चलता रहेगा. हम लोगों को शादी कर लेनी चाहिए. गीता खामोश हो गई.

‘‘क्या मैं ने कुछ गलत बात कह दी?’’

‘‘नहीं, तुम ने कुछ गलत नहीं कहा. मेरे पापा सूबेदार रहे हैं, मेरी शादी वे किसी ट्रक ड्राइवर से कभी नहीं करेंगे.’’

‘‘फिर तो हम लोगों को अलग हो जाना चाहिए,’’ कहते हुए चरनजीत ने गीता का हाथ छोड़ दिया.

‘‘अब मैं तुम्हारे बगैर नहीं रह सकती…’’ थोड़ी देर की खामोशी के बाद गीता ने कहा, ‘‘मुझे यहां से ले कर कहीं दूर चले जाओ. वहीं शादी कर लेंगे.’’

‘‘तुम्हारा मतलब है कि मैं तुम्हें भगा कर ले जाऊं. कितनी घटिया बात कही है तुम ने…’’ चरनजीत ने कहा, ‘‘मेरे मांबाप इस बात को पसंद नहीं करेंगे. तुम्हारे घर वाले भी यही सोचेंगे कि ट्रक ड्राइवरों का किरदार ऐसा ही होता है.

‘‘गीता, मैं पढ़ालिखा हूं. मास्टरी की है मैं ने. नौकरी नहीं मिली तो ड्राइवर बन गया.

‘‘यह मेरा अपना ट्रक है. शादी करूंगा तो इज्जत से करूंगा, वरना हम दोनों के रास्ते अलग हो जाएंगे. कल तुम्हारे मम्मीपापा से तुम्हारा हाथ मांगने आऊंगा. तैयार रहना.’’

करतार सिंह ने कभी सोचा भी नहीं था कि बेटियों की शादी भी की जाती है. उसे तो इस बात की फिक्र रहती थी कि कहीं रात में उस की बोतल खाली न रह जाए.

चरनजीत ने जब उस से उस की बेटी का हाथ मांगा तो सरबजीत कौर के साथ करतार सिंह के चेहरे का रंग भी बिगड़ गया. उसे ऐसा लगा, जैसे बोतल में किसी ने सिर्फ पानी मिला दिया था. पलभर में सारा नशा काफूर हो गया.

‘‘तुम ने गीता को मांगने से पहले यह नहीं सोचा कि तुम एक ट्रक ड्राइवर हो.’’

‘‘मैं ने यह तो नहीं सोचा, लेकिन यह जरूर सोचा कि आप की बेटी अगर मेरे साथ भाग जाएगी तो आप की कितनी बदनामी होगी. ट्रक ड्राइवरों पर से हमेशा के लिए आप का भरोसा उठ जाएगा.’’

ऐसा सुन कर फौजी करतार सिंह का सिर पहली बार किसी के सामने झुका था तो वह चरनजीत था.

‘‘अपने घर वालों से कहो शादी की तैयारी करें, गीता अब तुम्हारी हुई,’’ यह कह कर करतार सिंह ने शराब की बोतल को चरनजीत के सामने ही मुंह से लगा लिया. 15 August Special

Independence Day Special: गरम स्पर्श- तबादले पर क्या था मनीष का हाल

Independence Day Special. कैप्टन मनीष को असम से नागालैंड में तबादले का और्डर मिला तो उन का दिल कुछ उदास होने लगा. पर और भी बहुत सारे साथियों के तबादले के और्डर आए थे, यह जान कर कुछ ढाढ़स बंधा. सोचा, कुछ तो दोस्त साथ होंगे, वक्त अच्छा बीतेगा.

नागा विद्रोहियों की सरगर्मियां काफी बढ़ी हुई थीं. यही देखते हुए पहाड़ी फौज की 4 बटालियनों को कोहिमा भेजना जरूरी समझा गया. कैप्टन मनीष कोहिमा रैजिमैंट हैडक्वार्टर पर हाजिर हुए तो उन की कंपनी को कोहिमा से 60 किलोमीटर की दूरी पर खूबसूरत पहाड़ियों के दामन में स्थित फौजी कैंप में पहुंचने का आदेश मिला. जैसे ही वे सब कैंप पहुंचे तो चारों ओर नजर फिराते हुए बहुत प्रसन्न हुए.

चारों तरफ ऊंचे पहाड़, उन पर साल और देवदार के पेड़. नीचे मैदानों में चारों ओर मीलों तक फैली हरियाली और सब्ज मखमली घास. तरहतरह के कुसुमित पुष्पों ने उन का मन मोह लिया. दूसरे दिन शाम को जीप में कैंप से 2 मील की दूरी पर निरीक्षण चौकी का मुआयना कर के लौटे तो रास्ते में एक छोटे रैस्टोरेंट के सामने कौफी पीने के लिए जीप रोक दी.

भीतर कोने में पड़ी टेबल पर कौफी का और्डर दे कर बैठे ही थे कि उन की नजर कुछ दूर बैठे एक जोड़े पर गई. दोनों ने मुसकराते, गरदन हिला कर कैप्टन का अभिवादन किया. कैप्टन ने देखा कि दोनों स्थानीय थे और चेहरेमोहरे से नागालैंड के ही लग रहे थे. लड़की स्कर्ट व ब्लाउज पहने हुए थी. उस का जिस्म खूबसूरत व सुडौल था, नाकनक्श तीखे थे. दोनों ने आपस में कुछ खुसुरफुसुर की और उठ कर कैप्टन के पास आए.

‘‘हैलो सर, मे वी गिव यू कंपनी?’’

‘‘ओह, श्योर,’’ कैप्टन ने चारों तरफ पड़ी कुरसियों की ओर इशारा करते हुए कहा. पहाड़ी वेशभूषा में बैरा कौफी ले कर आया तो कैप्टन ने उसे 2 कप और लाने के लिए कहा. बैरा कौफी रख कर चला गया. आंखों में हलकी मुसकराहट, पर बिना कुछ कहे नागा नौजवान ने कौफी का कप कैप्टन की ओर बढ़ाया.

‘‘थैंक यू,’’ कैप्टन ने कप ले कर उन्हें भी कौफी पीने के लिए इशारा किया.

‘‘डौली वांगजू,’’ नौजवान नागा ने पास बैठी लड़की के कंधे पर हाथ रखते हुए उस का नाम बताया, ‘‘मी फिलिप,’’ फिर अपना नाम दोहराया.

कैप्टन ने मुसकराते हुए अपनी पहचान दी, ‘‘माई सैल्फ मनीष.’’ कुछ देर तक बातचीत होती रही फिर कैप्टन मनीष वहां से चल दिए.

कैंप में लौट कर कैप्टन मनीष हाथमुंह धो कर रात को मेस (भोजन कक्ष) में डिनर करने गए. वहां बातोंबातों में उन्होंने मेजर खन्ना को नागा जोड़े के साथ हुई मुलाकात के बारे में बताया, ‘‘जोड़ी तो बहुत खूबसूरत थी, पर पता नहीं चला कि उन का आपसी रिश्ता क्या है?’’

‘‘पर आप को चिंता क्यों है कि वे आपस में क्या लगते हैं?’’

‘‘नहींनहीं, मुझे इस बात से क्या,’’ कैप्टन ने तत्पर जवाब दे कर बात को टाल दिया.

दूसरे दिन पूर्व निर्धारित प्रोग्राम के अनुसार बागियों के खिलाफ अभियान हेतु 3 दिन के लिए जाने का और्डर मिला. कैंप से गाडि़यों का काफिला उत्तरपूर्व की तरफ रवाना हुआ तो नौजवानों में उत्साह था. उन के चमकते चेहरों से यों जान पड़ रहा था कि वे मैदान मार कर ही लौटेंगे.

कैंप से रवाना होने पर मैदानी इलाके से गुजरता गाडि़यों का काफिला थोड़ी देर के लिए मिट्टी के गुबार में गुम हो गया. सिर्फ गाडि़यों के इंजन की गड़गड़ाहट और जूजू की आवाज सुनाई दे रही थी. कुछ देर के बाद मैदानी इलाका पार कर के काफिला जैसे ही बोम ला पहाड़ी के कच्चे रास्ते से ऊंचाई चढ़ने लगा वैसे ही धूल का गुबार पीछे रह गया.

दूर से टेढ़ीमेढ़ी पहाड़ी पगडंडियों पर गुजरता गाडि़यों का काफिला इतना छोटा सा लग रहा था मानो बच्चों ने अपने लारीनुमा खिलौनों में चाबी भर कर एकदूसरे के पीछे छोड़ दी हो.

कैंप में पीछे रह गए जवान हाथ हिला कर काफिले को देर तक विदा करते रहे. कुछ ही पल में काफिला आंखों से ओझल हो गया. 3 दिन के बाद काफिला लौटा. मुखबिर की सूचनानुसार फौजियों ने बोम ला पहाडि़यों के पीछे बागियों के अड्डों को चारों तरफ से घेर लिया पर घेराव के पहले ही बागी फरार हो गए थे. फौजियों ने सारा इलाका छान मारा फिर भी कोई सुराग न मिला.

कैप्टन मनीष दोस्तों के साथ मैस में गपशप करने के बावजूद बोरियत महसूस करने लगे थे. एक दिन फिर जीप में बैठ कर कैंप से बाहर जा कर उसी रैस्टोरेंट में कौफी पीने के लिए पहुंचे. भीतर पहुंचे तो उन की नजर डौली वांगजू पर पड़ी जो कोने में पड़ी टेबल पर अखबार पढ़ रही थी. इस बार वह अकेली थी. कैप्टन मनीष अभी दूसरे कोने में पड़ी कुरसी पर बैठ ही रहे थे कि डौली वहां से उठ कर उन के पास आई.

‘‘हैलो कैप्टन,’’ डौली ने मुसकराते हुए उन का अभिवादन किया.

‘‘हैलो मैडम, हाउ डू यू डू?’’ मनीष उस का नाम भूल गए थे.

डौली ने उन्हें याद दिलाते हुए कहा, ‘‘डौली, सर.’’

‘‘ओह डौली, प्लीज,’’ कैप्टन ने अपनी गलती स्वीकारते हुए कहा.

डौली फौरन दूसरी कुरसी पर बैठी और उन से 3-4 दिन नजर न आने का कारण पूछा. पर मनीष ने कैंप से आने का मौका न मिलने की वजह बता कर बात वहीं खत्म कर दी. दोनों ने मिल कर कौफी पी. मनीष ने डौली से उस के मांबाप के बारे में जानना चाहा. डौली ने उन्हें बताया कि वह मिशनरी स्कूल से 2 साल पहले मैट्रिक पास कर चुकी है. उस के मातापिता दोनों मिशनरी स्कूल में टीचर थे. स्कूल के बाद दोनों प्रचार का काम करते थे.

मनीष रहरह कर डौली की आंखों में निहारते रहे, उन में बेहिसाब कशिश थी. बौबकट बालों की सुनहरी लटें कभीकभी हवा के झोंके से उस के सुर्ख गालों को चूमने की कोशिश कर रही थीं, जिन्हें डौली बाएं हाथ की कनिष्ठिका के लंबे नाखून से निहायत खूबसूरत अंदाज में हटाती रही.

मनीष उस के चेहरे को बारबार गौर से देख रहे थे. सोच रहे थे कि डौली के नाकनक्श न बर्मी थे, न ही चीनी वंश के. पहाडि़यों की तरह उस की नाक चपटी और समतल भी नहीं थी. बल्कि उत्तरी भारत के मैदानी इलाके के आर्य वंश का सा रूपसौष्ठव था. बेपनाह हुस्न का ऐसा बुत देश के दूरदराज घनी पहाडि़यों व वादियों में भी मिल सकता है, सोच कर वे हैरान थे.

मनीष का जी उठने को नहीं हो रहा था. पर कैंप में वक्त पर पहुंचना था, इसलिए डौली की ओर मुसकरा कर उठने लगे. डौली ने एक अजीब मुसकराहट के साथ कंधे को एक मामूली झटका दे कर इजाजत देनी चाही, तो कैप्टन मनीष से रहा नहीं गया. वे डौली का हाथ थाम कर उस की आंखों में झांकते रहे, जैसे उस के बेपनाह हुस्न को नजरों से एक ही घूंट में पीना चाहते हों.

डौली की मस्तीभरी निगाहों में मनीष पलभर के लिए अपनी सुधबुध भुला बैठे. अचानक हाथ की उंगलियों पर डौली के सुर्ख लबों का स्पर्श महसूस करते हुए होश में आए. उन का चेहरा सुर्ख हो गया. खुद को संभालते हुए अगले दिन मिलने का वादा करते हुए वे मुसकरा कर जीप में सवार हो कर चले गए. पर रास्ते भर एक अनोखा एहसास उन के साथ रहा. एक अजीब मादकता उन पर हावी रही.

कैंप में लौट कर थोड़ी देर के लिए वे अपने तंबू में जा कर लेट गए. काफी देर तक किसी खूबसूरत खयाल ने उन का पीछा नहीं छोड़ा. काश, डौली के साथ ब्याह रचा कर उसे राजस्थान में अपने घर ले कर जा सकते. आकाश की इस अप्सरा को अपनी बांहों में भर कर प्यार करते, या कभी सामने बिठा कर सजदा करते. डौली को हासिल कर के, काश स्वप्निल आनंद का अनुभव कर पाते. पलभर की मुलाकात में मनीष को डौली की शांत नीली आंखों की गहराई में एक अजीब कशिश के साथसाथ नजदीकी और अपनापन भी नजर आया था.

दूसरे दिन फिर बागियों के खिलाफ अभियान का दूसरा चरण उत्तरपश्चिम की तरफ जोला पहाडि़यों की घाटियों में तय हुआ. शाम के वक्त अंधेरा होने के बाद मुखबिरों की गुप्त सूचना के अनुसार फौजी दल जोला पहाडि़यों की तरफ रवाना हुआ. जोला की बड़ी पहाड़ी के पीछे बागियों के दल के छिपे रहने की जानकारी थी. फौजी जवानों ने जोला दर्रे से काफी पहले गाडि़यों को रोका और हथियारों के साथ वे पैदल चल पड़े. चांदनी रात थी. दुश्मन की नजर न पड़े, इसलिए छोटीछोटी टोलियों में जोला दर्रे के नजदीकी द्वार पर पहुंचे और फौरन

2-2 सैनिकों के ग्रुप में तितरबितर हो कर पहाडि़यों के घने झुंड की ओट में छिप कर मोरचा संभाले बैठे रहे. कैप्टन मनीष ने अपने साथ तेजकरन को रख लिया. अमावस के बाद चौथे दिन वाला चांद बहुत देर न रुक सका. अंधेरा जैसेजैसे बढ़ने लगा वैसेवैसे सिपाहियों की बेसब्री बढ़ने लगी.

पता नहीं, शायद सारी रात यों ही टोह में बैठे गुजर जाए. यों ही इंतजार करते रात का अंतिम पहर आ गया. अचानक जोला दर्रे के छोर पर ऐसा लगा जैसे कुछ धुंधली परछाइयां बिना आवाज के आगे बढ़ रही हैं. टोह में बैठे फौजी दल के सिपाही हरकत में आ गए. सभी के हाथ राइफलों और मशीनगनों के ट्रिगरों पर पहुंच गए और कैप्टन मनीष के और्डर का इंतजार करने लगे.

धुंधली परछाइयां काले लिबास में धीरेधीरे उन झाडि़यों के घने झुरमुट की तरफ बढ़ रही थीं, जिन की ओट में कैप्टन मनीष और सूबेदार तेजकरन टोह में बैठे थे. दूसरे दल से एक फौजी की राइफल से अचानक गोली चल जाने से 2 साए एक तरफ दौड़े और 2 कैप्टन के दल की तरफ. कैप्टन की पिस्तौल की गोली से एक गिर पड़ा.

फौजी दस्ते के लिए कैप्टन का यह इशारा जैसे और्डर था. चारों तरफ से मशीनगनों से गोलियों की बौछार शुरू हो गई. जवाब में बागियों ने गोलियां चलाईं. पर कुछ देर के बाद जवाबी गोलियों की आवाज शांत हो गई. फौजी दल की गोलीबारी जारी रही. काफी देर तक जवाबी गोलियों के न आने से फौजी दल ने भी गोलीबारी बंद कर दी.

पौ फटते ही रोशनी का प्रभामंडल बढ़ने लगा. फौजी पहाडि़यों से निकल कर अपने शिकार को कब्जे में करने के लिए उतावले हो रहे थे. पर कैप्टन ने उन्हें रोका, कि कहीं दुश्मन ताक लगाए बैठा हो और अचानक हमला कर दे. इसलिए सिर्फ 2 फौजी जा कर लाशों का निरीक्षण करें. 2 नौजवानों ने आगे बढ़ कर झाडि़यों से लाशें ढूंढ़ निकालीं. कुल 2 लाशें मिलीं.

शिनाख्त करने की कोशिश की गई, पर बेकार. इतने में कैप्टन और साथी भी पहुंच गए. बागियों की लाशों की पहचान कर पाना मुश्किल काम था. शक्ल से एक मर्द लग रहा था तो दूसरी औरत. दोनों ने गहरे नीले रंग की शर्ट और जींस पहनी हुई थी. जैसे ही 2 जवानों ने उलटी पड़ी लाशों को सीधा कर के लिटाया तो कैप्टन अकस्मात चौंक उठे. ‘डौली और फिलिप को देख कर कैप्टन का चेहरा शांत और गंभीर हो गया. झुक कर उन्होंने डौली के सर्द चेहरे से बालों की लट अपनी गरम उंगलियों से हटा कर दूर कर दी. पर डौली का सर्द चेहरा मनीष की उंगलियों का गरम स्पर्श महसूस न कर सका. Independence Day Special

15 August Special: देशप्रेम से भर देंगी आप का दिल – देखें 15 अगस्त की टौप 6 फिल्में

15 August Special: 15 अगस्त आते ही हर भारतीय के दिल में देशभक्ति का जज्बा अपने आप उमड़ने लगता है. कोई इस दिन को आसमान में रंगबिरंगी पतंगों से सजा कर मनाता है, तो कोई छुट्टी का फायदा उठा कर घर पर परिवार के साथ वक्त बिताना पसंद करता है. अगर आप भी इस आजादी के दिन को खास बनाना चाहते हैं, तो क्यों न इसे परिवार संग कुछ बेहतरीन फिल्मों के साथ सैलिब्रेट किया जाए? यहां हम आप के लिए 6 ऐसी चुनिंदा फिल्में ले कर आए हैं, जिन्हें 15 अगस्त पर परिवार के साथ मिल कर देखना आप के लिए एक अलग ही ऐक्सपीरियंस होगा.

बौर्डर (1997)

1997 में आई फिल्म ‘बौर्डर’ एक क्लासिक फिल्म है. इस फिल्म में लोंगेवाला की लड़ाई की सच्ची घटनाओं और 1971 के भारतपाक युद्ध को एक अलग ही फील के साथ को दिखाया गया है.

लक्ष्य (2004)

‘लक्ष्य’ की कहानी एक ऐसे युवक के इर्दगिर्द घूमती है, जो शुरुआत में जीवन में किसी स्पष्ट दिशा के बिना भटक रहा होता है. कारगिल युद्ध पर बनी यह फिल्म देशसेवा का गहरा संदेश देती है.

द लेजेंड औफ भगत सिंह (2002)

अजय देवगन द्वारा निभाया गया भगत सिंह का किरदार भला कोई कैसे भूल सकता है. यह फिल्म एक ऐसे व्यक्ति की सोच और बलिदान को दर्शाती है, जिस ने अपने भारत के लिए शहादत को चुना.

एलओसी कारगिल (2003)

यह फिल्म कारगिल में लड़े भारतीय सैनिकों और उन के परिवारों द्वारा याद किए जाने की कहानी है. 1999 के कारगिल युद्ध (आपरेशन विजय) पर आधारित, यह फिल्म उन की वीरता और बलिदान को दिखाती है.

चक दे इंडिया (2007)

इस मूवी में शाहरुख खान लीड रोल में है, इस मूवी में उन्होंने भारतीय महिला हौकी टीम के कोच की भूमिका निभाई है, जो इंडियन वुमन्स टीम को जीत दिलाने के लिए जीतोड़ मेहनत करता है, यह फिल्म अंत तक आपको अपनी जगह से हिलने नहीं देगी.

शेरशाह (2021)

कारगिल युद्ध के कैप्टन विक्रम बत्रा के जीवन पर आधारित ‘शेरशाह’ एक ऐसी कहानी है, जो साहस, देशभक्ति और बलिदान की मिसाल पेश करती है. इस फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने कैप्टन विक्रम बत्रा का किरदार इतनी ईमानदारी के साथ निभाया है कि दर्शकों की आंखें नम हो जाएं. 15 August Special

15 August Special: वतनपरस्ती – क्यों समीक्षा और हफीजा की दोस्ती दुश्मनी में बदल गई?

15 August Special: ‘‘नया देश, नए लोग दिल नहीं लगता… जी करता है इंडिया लौट जाऊं,’’ समीक्षा ने रोज का राग अलापा. ‘‘यह आस्ट्रेलिया है. सब से अच्छे विकसित देशों में से एक. यहां आ कर बसने के लिए लोग जमीनआसमान एक कर देते हैं और तुम यहां से वापस जाने की बात करती हो. अब इसे मैं तुम्हारा बचपना न कहूं तो और क्या कहूं?’’

‘‘तो क्या करूं? तुम्हारे पास तो तुम्हारे काम की वजह से अपना सोशल सर्कल है, दोनों बच्चों के पास भी उन के स्कूल के फ्रैंड्स हैं. बस एक मैं ही बचती हूं जिसे दिन भर चारदीवारी में अर्थहीन वक्त गुजारना पड़ता है. अकेले रहरह कर तंग आ गई हूं मैं.’’ ‘‘हां, लंबे समय तक चुप रहने के कारण तुम्हारे मुंह से बदबू भी तो आने लगती होगी,’’ प्रतीक चुटकी लेते हुए बोला.

‘‘तुम्हें मजाक सूझ रहा है, मगर मैं वास्तव में गंभीर हूं अपनी समस्या को ले कर… मेरी हालत तो कुएं के मेढक जैसी होती जा रही है. शादी से पहले जो पढ़ाईलिखाई की थी उसे भी घरगृहस्थी में फंस कर भूल चुकी हूं अब तक.’’ ‘‘कौन कहता है कि तुम कुएं का मेढक बन कर जियो… मैं तो चाहता हूं कि तुम आसमान की ऊंचाइयां छुओ.’’

‘‘इस चारदीवारी को पार कर के घर के 3 प्राणियों के सिवा किसी चौथे की सूरत देखने तक को तो नसीब नहीं होती… आसमान की ऊंचाइयों तक क्या खाक पहुंचुंगी मैं?’’ ‘‘जिंदगी की दिशा में अमूलचूल परिवर्तन जिंदगी को देखने के नजरिए और जैसेजैसे जिंदगी मिले उस से सर्वोत्तम पल निचोड़ कर जीवन अमृत ग्रहण करने में है,’’ प्रतीक समीक्षा के हाथ से चाय का प्याला ले कर उसे अपने पास बैठाते हुए किसी फिलौसफर के से अंदाज से बोला.

‘‘मुझे तो इस जीवनअमृत के प्याले को पाने की कोई युक्ति नहीं समझ आती. तुम ही कुछ समाधान ढूंढ़ो मेरे लिए.’’ ‘‘मैं खुद भी कुछ समय से तुम्हारी परेशानी महसूस कर रहा था. जैसेजैसे बच्चे बड़े होते जाएंगे उन की दुनिया हम से अलग होती जाएगी… तब बच्चे अपनी जिंदगी में और भी व्यस्त हो जाएंगे और तुम्हारा एकाकीपन बद से बदतर होता चला जाएगा. अच्छा होगा कि तुम खुद को उस वक्त से मुकाबला करने के लिए अभी से तैयार करना शुरू कर दो और कुछ पढ़लिख लो.’’

‘‘पढ़नालिखना और इस उम्र में… चलो तुम्हारी बात मान कर मैं कोई कोर्स कर भी लूं तो उस से होगा भी क्या? 1-2 साल में कोर्स पूरा हो जाएगा और मैं जहां से चलूंगी वहीं वापस आ कर खड़ी हो जाऊंगी… इस उम्र में मुझे कोई काम तो मिलने से रहा… वह भी यहां आस्ट्रेलिया में.’’ ‘‘नौकरी मिलने का आयु से संबंध जितना इंडिया में होता है उतना यहां आस्ट्रेलिया में नहीं. यहां तो एक तरह का चलन है कि बच्चों के थोड़ा बड़ा हो जाने के बाद मांएं खुद को रिबिल्ट करती हैं और जो भी कोर्सेज तत्कालीन इंडस्ट्री की जरूरत में होते हैं उन्हें कर के फिर से वर्कफोर्स में लौट आती हैं.’’

‘‘हां, अब तुम्हारा आशय कुछकुछ समझ में आ रहा है मुझे. मैं कल दोपहर में आराम से सभी यूनिवर्सिटीज की वैबसाइट पर जा कर देखूंगी कि मेरे लिए क्या ठीक रहेगा.’’

कई दिनों तक विभिन्न शिक्षण संस्थानों की वैबसाइट्स पर घंटों व्यतीत करने के बाद आखिर समीक्षा को एक कोर्स पसंद आ गया. ‘इवेंट मैनेजमैंट’ का. 15 साल बाद फिर से पढ़ाई शुरू करने की घबराहट मिश्रित उमंग के साथ वह टेफ इंस्टिट्यूट पहुंच गई.

यहीं पर उस की मुलाकात हफीजा से हुई. उस ने भी इवेंट मैनेजमैंट कोर्स में प्रवेश लिया था और अपने अंगरेजी के अल्प ज्ञान के कारण कुछ घबराई, सकुचाई अपनेआप में सिमटी सी रहती थी. हफीजा के हालात पर समीक्षा को बड़ी सहानुभूति होती. उसे लगता कि उसे हफीजा को सीमित दायरे से निकालने में उस की थोड़ी मदद करनी चाहिए. वह बचपन से सुनती आई थी कि ज्ञान बांटने से बढ़ता है. व्यावहारिक जीवन में इस की सत्यता को परखने की दृष्टि से समीक्षा ने हफीजा की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया. अब वह जब भी मौका मिलता हफीजा को अपने साथ अंगरेजी बोलने का अभ्यास कराने लगती.

समीक्षा जैसी बुद्धिजीवी दोस्त पा कर हफीजा भी बेहद प्रफुल्लित जान पड़ती थी. कृतज्ञता से सिर से पांव तक डूबी हुई वह मौकेबेमौके समीक्षा के परिवार को अपने घर बुला कर इराकी खाने की लजीज दावतें देती. समीक्षा भी अपने भारतीय पाककौशल का प्रदर्शन करने में पीछे न रहती और इंस्टिट्यूट जाने के लिए 2 लंच पैक तैयार कर के ले जाती. एक स्वयं के लिए और दूसरा अपनी हफीजा के लिए. वे दोनों क्लासरूम में पासपास बैठतीं, साथसाथ असाइनमैंट्स करतीं. दोनों के बीच की घनिष्ठता दिनप्रतिदिन बढ़ती ही जा रही थी. पंजाबी समीक्षा का गोरा रंग, तीखे नैननक्श, इराकी हफीजा से मिलतेजुलते से होने के कारण सभी उन्हें बहनें समझते. उन के बीच का अंतराल तब दृष्टव्य होता जब कोई उन से बात करता. समीक्षा धाराप्रवाह अंगरेजी बोलती तो हफीजा टूटीफूटी और वह भी पक्के इराकी लहजे में.

‘‘तुम्हारी इंग्लिश इतनी अच्छी कैसे है?’’ अपनी टूटीफूटी इंग्लिश से मायूस हफीजा से एक दिन रहा न गया तो उस ने समीक्षा से पूछ

ही लिया. ‘‘इंग्लिश एक तरह से हमारे देश की दूसरी भाषा है. हमारे यहां अच्छे से अच्छे इंग्लिश माध्यम के स्कूल हैं. उच्च शिक्षा का माध्यम ज्यादातर इंग्लिश ही है. इंग्लिश में अनगिनत पत्रपत्रिकाओं का भी प्रकाशन होता है,’’ समीक्षा ने गर्व के साथ कुछ इस अंदाज में ‘इंडिया का हाल ए अंगरेजी’ बयां किया जैसेकि द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ने वाला कोई सैनिक किसी को अपने जीते हुए पदकों की गिनती करा रहा हो.

थोड़ी देर हफीजा किंकर्तव्यविमूढ सी समीक्षा की बात सुनती रही, फिर बोली, ‘‘जिंदगी आसान रहती है तुम जैसों के लिए तो इंग्लिश भाषी देशों में आ कर. हमारे जैसों को यहां आ कर सब से पहले तो यहां की जबान सीखने की जंग लड़नी पड़ती है… बाकी चीजें तो बाद की हैं.’’ ‘‘हां हफीजा वह तो ठीक है, लेकिन मैं कई बार सोचती हूं कि ऐसे हालात में तुम यहां आ कैसे गईं, क्योंकि लोकल भाषा का ज्ञान वीजा मिलने की एक जरूरी शर्त है.’’

‘‘मैं… मैं वह क्या है मैं दूसरे तरीके से यहां आई थी,’’ हफीजा उस वक्त तो होशियारी के साथ बात टालने में कामयाब हो गई.

बहरहाल वक्त के साथ धीरेधीरे समीक्षा को पता चल गया कि हफीजा एक विधवा है. उस के पति की मृत्यु उस के बेटे के जन्म के 3-4 महीने पहले ही हो गई थी. अपने कुछ रिश्तेदारों की मदद से वह आस्ट्रेलिया चली आई थी एक रिफ्यूजी बन कर. वे सब रिश्तेदार भी कई साल पहले इसी तरीके से यहां आ कर अब तक आस्ट्रेलियन नागरिक बन चुके थे. पढ़ाई के साथसाथ वह एक रेस्तरां में कुछ घंटे वेटर का काम किया करती थी.

हफीजा का लाइफस्टाइल देख कर समीक्षा हैरान रहती थी. हफीजा का पहनावा किसी रईस से कम नहीं था. वह अच्छे इलाके में अच्छा घर किराए पर ले कर रहती थी और उस का बेटा भी उस क्षेत्र के सब से अच्छे स्कूल में पढ़ता था. ‘‘मुश्किल होती होगी तुम्हें अकेले संभालने में… कैसे संभव हो पाता है ये सब? कुछ घंटे वेटर का काम कर के तो किसी का भी गुजारा नहीं हो सकता यहां?’’ एक दिन घुमावदार तरीके से समीक्षा ने हफीजा के लाइफस्टाइल का राज जानने की उत्सुकता में पूछा. ‘‘मैं एक सिंगल मौम हूं, इसलिए मुझे ‘सोशल सिक्युरिटी अलाउंस’ मिलता है

सरकार से.’’ हफीजा के सत्य वचन समीक्षा को और भी जिज्ञासु बना गए. सो उस ने तहकीकात जारी रखी, ‘‘और तुम ने बताया था कि तुम जब आस्ट्रेलिया आई थी तो तुम्हें इंग्लिश का एक शब्द भी नहीं आता था, पर अब टूटीफूटी ही सही, मगर तुम्हें कामचलाऊ इंग्लिश आती ही है. कैसे सीखा ये सब तुम ने अपने दम पर?’’

‘‘मुझे यहां आ कर ‘एडल्ट माइग्रेंट इंग्लिश प्रोग्राम’ के तहत सरकार की तरफ से 510 घंटे की मुफ्त ट्यूशन मिली थी… अंगरेजी सीखने के लिए.’’

‘‘अच्छा तभी मैं सोचूं कि तुम्हारे इतने ठाट कैसे हैं… अब पता चला कि तुम्हारे देश से इतने सारे लोग रोजरोज बोट में बैठबैठ कर यहां क्यों चले आते हैं… क्यों कुछ खास देशों से आने वाले शरणार्थियों को ले कर नैशनल न्यूज में इतना होहल्ला होता है,’’ जल्दबाजी में समीक्षा के मुंह से सच्चे, मगर कड़वे शब्द बाहर फिसल गए. ‘‘हम से ज्यादा तो इंडियंस यहां आते हैं,’’ हफीजा ने अपना बचाव करते हुए कहा.

‘‘हां आते तो हैं पर आने का तरीका तुम लोगों वाला नहीं है. हमारे जैसे उच्चशिक्षित लोग स्किल माइग्रेशन वीजा पर आते हैं या फिर स्टूडैंट वीजा पर. दोनों ही स्थितियों में हम इन देशों की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में अपना योगदान देते हैं…’’ हफीजा ने तत्काल समीक्षा की बात बीच में काटी, ‘‘और हां वह क्या फरमाया तुम ने कि नैशनल न्यूज में हम जैसों को ले कर होहल्ला होता रहता है… क्या तुम ने कभी ‘एसबीएस’ टीवी देखा है… कैसीकैसी डौक्यूमैंटरीज आती हैं उस पर तुम्हारे इंडिया के बारे में… उफ वह खुले हुए बदबूदार गटर, गंदी झुग्गीझोंपडि़यां,’’ हफीजा ने नाक सिकोड़ कर हिकारत से कहा, ‘‘कुछ साल पहले एक औस्कर अवार्ड विनर मूवी भी तो बनी थी तुम्हारे देश के बारे में. उस में भी तो ये सब गंद ही दिखाया गया था… क्या नाम था उस का… हां याद आ गया ‘स्लमडौग मिलियनेयर…’ ओएओए हाल तेरे देश का बदहाल है, फिर भी तेरा दिमाग आसमां पर है,’’ हफीजा समीक्षा की बेइज्जती करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी. ‘‘हम स्वाभिमानी लोग हैं… कम से कम तुम्हारी तरह मुफ्त की चीजों के लिए इधरउधर नहीं भागते फिरते. हमारा इंडिया, इंडिया है और तुम्हारा इराक, इराक… है कोई मुकाबला क्या… न ही हो सकता. इन विकसित देशों को हमारे जैसे प्रतिभासंपन्न लोगों की बहुत जरूरत होती है, इसलिए बड़ी कंपनियां हमारे वीजा स्पौंसर कर के हमें यहां बुलाती हैं. दुनिया भर की इनफौरमेशन टैक्नोलौजी हम इंडियंस के बलबूते पर ही चल

रही है. हम, हम हैं… हम बिना जरूरत के शरणार्थी बन कर विकसित देशों का आर्थिक विदोहन करने के लिए नहीं आते,’’ अब तक समीक्षा भी इंडोनेशिया में असमय फटने वाले ज्वालामुखी में तबदील हो चुकी थी. ‘‘बड़े ही फेंकू होते हो तुम लोग… ऐसे ही विद्वान हो तो अपने ही देश में सदियों तक गुलाम क्यों बने रहे… क्यों लुटतेपिटते रहे अपनी ही जमीं पर विदेशियों के हाथों?’’

‘‘लुटेरे तो वहीं आते हैं न जहां धनदौलत के अंबार लगे होते हैं. इतिहास गवाह है कि हमारा इंडिया प्राचीनकाल से ही अकूत संपदा और ज्ञान का केंद्र रहा है. जिसे देखो वही दुनिया भर से हमारा धन और ज्ञान लूटने चला आता था. जब ब्रिटिश लोग आए थे तो हमारी जीडीपी पूरे विश्व की 25% थी… यह हाल तो हमारे देश का तब था जबकि ब्रिटिश लोगों के आने के पहले भी अनगिनत आक्रमणकारी टनों संपदा लूट कर ले जा चुके थे. जगत गुरु है हमारा इंडिया समझीं तुम…?’’ समीक्षा के दिलदिमाग एक हो कर उसे आपे से बाहर कर चुके थे. ‘‘ऐसी ही चाहत है दुनिया को तुम लोगों की तो मेलबौर्न में इंडियन स्टूडैंट्स को ले कर इतने फसाने क्यों हुए थे?’’ जाने कहांकहां से हफीजा भी इंडियंस के बारे में खोदखोद कर नएपुराने तथ्य निकाल रही थी.

‘‘कुछ एक पागल लोग तो सब जगह होते हैं… थोड़ीबहुत ऊंचनीच तो सब जग हो जाती है… मगर तुम लोग, तुम तो जहां रहते हो वहीं दंगा करते हो. पूरी दुनिया सच जान चुकी है तुम्हारा… शांति से रहना तो तुम लोगों ने सीखा ही नहीं है. सुविधाओं का फायदा उठाने पहुंच जाते हो अच्छे देशों में, मगर सगे किसी के नहीं होते तुम लोग.’’

जवाब में हफीजा ने समीक्षा को खा जाने वाली निगाहों से घूरा. समीक्षा ने बदले में एक विदूप मुसकराहट उस की ओर फेंकी और अपनी किताबें समेटने लगी. हफीजा कुरसी को लात मारते हुए क्लासरूम से बाहर निकल गई. शुक्र है यह नजारा देखने के लिए उस वक्त वहां कोई नहीं था. वे दोनों फुरसत के क्षणों में एक खाली क्लासरूम में अंगरेजी का अभ्यास करने के लिए आई थीं. मगर यह हसीन गुफ्तगू अचानक बेहद संगीन मोड़ ले गई. उस दिन के बाद दोनों पक्की सहेलियां क्लासरूम के ओरछोर पर बैठने लगीं. एकदूसरे को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए. फिर कभी उन्होंने आपस में आंखें नहीं मिलाईं. यह आपसी दुश्मनी थी या फिर अपनीअपनी वतनपरस्ती, कहना मुश्किल है. 15 August Special

15 August Special: आजादी – झंडा फहराना कैसे बन गया गले की फांस

15 August Special: शंकर बाबू आटोरिकशा से उतर कर कारखाने की ओर जा ही रहे थे कि 2 सिपाहियों ने उन्हें घेर लिया.

एक बोला, ‘‘थाने चलो, थानेदार ने बुलाया है.’’

दूसरा बोला, ‘‘अब तक कहां थे? 3 दिनों से हम तुम्हें ढूंढ़ रहे हैं.’’

हैरानपरेशान शंकर बाबू आसपास देखने लगे. तब तक कारखाने के कुछ मुलाजिम पास आ गए और वे उन्हें ऐसे देखने लगे, मानो वे शातिर अपराधी हों.

शंकर बाबू उस कारखाने के माने हुए मजदूर नेता थे. इस लिहाज से उन्होंने सिपाहियों पर रोब जमाना चाहा, ‘‘आखिर मेरा कुसूर क्या है?’’

‘‘थाने पहुंच कर जान लेना.’’

‘‘नहीं, बिना कुसूर जाने मैं तुम लोगों के साथ नहीं चल सकता.’’

इस पर एक सिपाही ने खास पुलिसिया अंदाज में कहा, ‘‘चलते हो या लगाऊं एक…’’

यह सुनते ही शंकर बाबू का दिमाग चकरा गया. वे तुरंत सिपाहियों के साथ चलने को तैयार हो गए.

थानेदार के आगे शंकर बाबू को पेश करते हुए एक सिपाही ने कहा, ‘‘‘साहब, यही हैं शंकर बाबू. बड़ी मुश्किल से पकड़ कर लाए हैं. ये आ ही नहीं रहे थे, संभालिए जनाब.’’

इतना कह कर सिपाही ने शंकर बाबू को बेजबान जानवर की तरह थानेदार की ओर धकेल दिया.

शंकर बाबू को बहुत गुस्सा आया, मगर वे गुस्से को दबाते हुए थोड़ी तीखी आवाज में थानेदार से बोले, ‘‘मुझे क्यों पकड़ा गया है? मेरा कुसूर क्या है? मैं शहर का एक इज्जतदार आदमी आदमी हूं. मैं…’’

‘‘अरे छोड़ो इज्जतदार और बेइज्जतदार की बातें. यह बताओ कि 15 अगस्त को झंडा फहरा कर तुम कहां गुम हो गए थे? जानते हो कि कितना बड़ा राष्ट्रीय अपराध किया है तुम ने?’’

शंकर बाबू का सिर चकराने लगा, ‘‘राष्ट्रीय अपराध? क्या झंडा फहराना राष्ट्रीय अपराध है? नहींनहीं, यह तो मेरा मौलिक अधिकार है. जरूर कहीं कुछ गलतफहमी हुई है…’’ शंकर बाबू ने तनिक गुस्से में कहा, ‘‘मैं कहीं भी किसी वजह से जाऊं, क्या मुझे आप को बता कर जाना पड़ेगा? पहले साफसाफ मेरा अपराध बताइए.’’

शंकर बाबू का गुस्सा खुद पर ही भारी पड़ रहा था. थानेदार ने आंखें तरेरते हुए कहा, ‘‘अपनी आवाज नीची कर, वरना… एक तो अपराध करता है ऊपर से गरजता भी है. यानी चोरी और सीनाजोरी, वह भी मुझ से… थानेदार जालिम सिंह से? जिस से बड़ेबड़े गुंडेबदमाश थरथर कांपते हैं.’’

शायद जिंदगी में आज पहली बार शंकर बाबू का पुलिस के साथ सामना हुआ था. वे इस पुलिसिया अंदाज से सकपका गए थे. उन्होंने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘माफ कीजिए, आप को कोई गलतफहमी हुई है. मैं तो एक पढ़ालिखा इनसान हूं, मजदूरों की अगुआई करता हूं. हो सकता है कि आप को किसी और शख्स की तलाश हो.’’

थानेदार थोड़ी नीची आवाज में बोला, ‘‘अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे. मिस्टर शंकर, आप मजदूर नेता हैं न? आप ने 15 अगस्त को अपने यूनियन के दफ्तर में एक छोटा सा जलसा किया, झंडा फहराया और चल दिए. उस दिन से आप आज नजर आए हैं. इस समय… शाम के 7 बजे हैं, जबकि झंडा परसों से लगातार लहरा रहा है और आप कह रहे हैं कि अपराध नहीं किया?’’

इतना कह कर थानेदार ने सिपाहियों की ओर मुखातिब हो कर कहा, ‘‘डाल दो इस को लौकअप में.’’

तब तक शंकर बाबू की बीवी इलाके के नेताजी को ले कर थाने पहुंच गई थी. शंकर बाबू को काटो तो खून नहीं. सिपाही मुस्तैद हो गए थे. नेताजी को समय की नजाकत समझते देर नहीं लगी. उन्होंने हलकी मुसकान फैलाते हुए थानेदार से पूछा, ‘‘आखिर माजरा क्या है थानेदार साहब?’’

थानेदार भावुक होता हुआ बोला, ‘‘अरे साहब, इस ने राष्ट्रीय झंडे का अपमान किया है. यानी देश का, राष्ट्र का अपमान किया है. इसे इतनी भी जानकारी नहीं कि राष्ट्रीय झंडा यदि सुबह फहराया जाता है, तो शाम तक उसे नीचे उतार लिया जाता है.

‘‘इस ने अपने यूनियन के दफ्तर के सामने 15 अगस्त को झंडा फहराया था, जो अभी तक लहरा रहा है. यह भारतीय संविधान के तहत जुर्म है. कानूनी अपराध है.’’

शंकर बाबू को यह जानकारी नहीं थी. उन्होंने विनती भरी आवाज में थानेदार और नेताजी से निवेदन किया, ‘‘साहब, मैं बहुत शर्मिंदा हूं. मुझ से बहुत बड़ी भूल हुई है. आइंदा कभी ऐसा नहीं होगा. मुझे बचा लीजिए.’’

थानेदार ने कड़क आवाज में कहा, ‘‘हूं, रस्सी भी जल गई और ऐंठन भी चली गई.’’

नेताजी ने हालात को संभालते हुए कहा, ‘‘कानून तो अंधा होता है, मगर शंकर बाबू एक निहायत ही शरीफ आदमी हैं.’’

फिर नेताजी ने संकेत से शंकर बाबू को एक ओर ले जा कर धीरे से कहा, ‘‘भाई, यह तो राष्ट्र के अपमान का मामला है. बहुत बुरा हुआ, तुम अगर राष्ट्र धर्म निभा नहीं सकते थे, तो झंडा फहराया ही क्यों? यह तो जुर्म नहीं, घोर जुर्म है, इसलिए शेर को शेर की मांद में ही सुलट लो. चांदी के जूते से थानेदार का मुंह सिल दो.’’

शंकर बाबू को लगा कि वे आसमान से गिरे, खजूर में अटके. संभलते हुए उन्होंने लाचारी में हामी भर दी. नेताजी ने इशारे से थानेदार को अपने पास बुला लिया.

थानेदार ने नेताजी का सुझाव मान लिया और शंकर बाबू को यूनियन के दफ्तर जा कर झंडा उतारने का आदेश देते हुए कहा, ‘‘ठीक है, आप के यूनियन के दफ्तर के सामने फहराया गया झंडा 15 अगस्त की शाम को ही उतार लिया गया था. जैसा नेताजी कहेंगे, वैसा ही होगा. ये हमारे नेता हैं. हम वही करते हैं, जो ये कहते हैं.’’

शंकर बाबू को लगा कि थानेदार की कुरसी के पीछे लगी महात्मा गांधी की तसवीर कांप रही है. शर्मिंदा हो रही है कि यह सब क्या है? कानून के रक्षक और राष्ट्र के खेवनहार दोनों ही मिलजुल कर आज झंडा उतारने की फीस वसूल कर के यह कैसा राष्ट्र प्रेम बांट रहे हैं? कैसी है इन की देशभक्ति? 15 August Special

15 August Special: और झंडा फहरा दिया

15 August Special: आमंत्रण कार्ड पर छपे ‘समरसता भोज’ के आयोजन की खबर पढ़ कर ठाकुर रसराज सिंह का माथा ठनक गया. आखिर वे उस गांव के मुखिया थे और उन की तूती आज भी बोलती थी. गांव की नई सरपंच ने उन से सलाह लिए बिना यह क्या अनर्थ कर दिया.

गुस्से से लाल हुए जा रहे ठाकुर रसराज सिंह ने अपने सचिव गेंदालाल को बुला कर डांटते हुए कहा, ‘‘क्यों रे गेंदा, पंचायत की सरपंच पगला गई है क्या. हम ठाकुरों और ब्राह्मणों को निचली जाति के लोगों के साथ बिठा कर भोज कराना चाहती है. हमारा धर्म भ्रष्ट करना चाहती है.’’

‘‘ठाकुर साहब, इस में हम कुछ नहीं कर सकते. नई सरपंचन सरकारी फरमान की आड़ ले कर हमें नीचा दिखाना चाह रही है. सरकार छुआछूत मिटाने के लिए गांवगांव ऐसे प्रोग्राम करा रही है और सरकारी अफसर उस का साथ दे रहे हैं,’’ सचिव गेंदालाल ने सफाई देते हुए कहा.

‘‘तो सुन ले गेंदा ध्यान से, हम ऐसे प्रोग्राम में हरगिज नहीं जाएंगे. इन की यह हिम्मत कि हमारी बराबरी में बैठ कर ये निचली जाति के टटपुंजिए लोग भोजन करेंगे. कोई पूछे तो कह देना कि जरूरी काम के सिलसिले में शहर गए हुए हैं,’’ ठाकुर रसराज सिंह बोले.

ये वही ठाकुर साहब हैं, जो दिन के उजाले में इन दलितों के साथ छुआछूत का बरताव करते हैं और रात के अंधेरे में इन्हीं दलितों की बहनबेटियों को अपने बिस्तर पर सुलाते हैं. पंचायत में सरपंच कोई रहा हो, मरजी इन जैसे दबंगों की ही चलती है.

यही वजह थी कि सरकारी योजनाओं का फायदा इन दबंगों ने जरूरतमंद लोगों को न दिला कर अपने परिवार के लोगों को दिला दिया था. गरीब मजदूर के पास रहने को घर नहीं था, पर प्रधानमंत्री आवास इन दबंगों ने अपने बेटाबहू को अलग परिवार दिखा कर हड़प लिए थे.

श्रद्धा गांव की सरपंच तो बन गई थी, मगर उस के पास हक कुछ नहीं थे. वह सरपंच होने के नाते कुछ करने की सोचती, मगर गांव के मुखियाजी और उन की जीहुजूरी करने वाले लोग श्रद्धा को नीचा दिखाने की कोई कसर नहीं छोड़ते थे.

उस दिन को श्रद्धा आज तक नहीं भूली है, जिस दिन पंचायत की ग्राम सभा की बैठक थी. पंचायत का सचिव गेंदालाल ठाकुर, उपसरपंच मुन्ना महाराज और कुछ पंच वहां पहले से मौजूद थे. गांव की महिला सरपंच श्रद्धा जैसे ही पंचायत भवन में पहुंची, तो उस ने पाया कि उस के बैठने के लिए कुरसी तक नहीं रखी गई थी.

इधरउधर नजर दौड़ाने के बाद श्रद्धा ने सचिव की ओर देखते हुए कहा, ‘‘सचिव महोदय, सरपंच के बैठने के लिए कुरसी का इंतजाम नहीं है क्या?’’

इस बात पर ग्राम पंचायत का दबंग सचिव गेंदालाल तुनकते हुए बोला, ‘‘तुम्हें बैठाने के लिए कुरसी नहीं है. बैठना है तो घर से कुरसी ले आओ, नहीं तो कायदे से जमीन पर ही बैठो.’’

तभी उपसरपंच मुन्ना महाराज भी गेंदालाल के साथ सुर मिलाते हुए बोला, ‘‘सरपंचन बाई, यह मत भूलो कि तुम किस जाति की हो, आखिर गांव की मानमर्यादा का ध्यान तो तुम्हें रखना होगा. गांव में आज तक कोई भी निचली जाति का पंडितों और ठाकुरों के सामने बराबरी से नहीं बैठता.’’

‘‘मगर पंडितजी, जनता ने हमें सरपंच बनाया है और संविधान ने हमें यह हक दिया है कि हम सरपंच की कुरसी पर बैठें,’’ श्रद्धा ने अपनी बात रखते हुए कहा.

‘‘जनता ने तुम्हें मजबूरी में सरपंच बनाया है. चुनाव में गांव की सरपंच की कुरसी आरक्षण में तुम्हारी जाति में चली गई,’’ उपसरपंच मुन्ना महाराज बोला.

‘‘तुम अभी नईनई सरपंच बनी हो, इसलिए तुम्हें पता नहीं है. पहले भी सरपंच कोई रहा हो, पंचायत में फैसला तो पंडितों और ठाकुरों का ही चलता रहा है,’’ सचिव गेंदालाल तंबाकू मलते हुए बोला.

आखिर उस दिन सचिव और उपसरपंच की बात सुन कर महिला सरपंच अपमान का घूंट पी कर तो रह गई, मगर पढ़ीलिखी श्रद्धा को यह बात घर कर गई.

श्रद्धा यह सोच कर हैरान थी कि आजादी के इतने साल बाद भी गांव में छुआछूत इस कदर हावी है कि गांव के दबंग दलित सरपंच से जातिगत भेदभाव रखते हैं. ऊंची जाति के ये लोग नहीं चाहते कि जनता द्वारा चुनी गई सरपंच उन की बराबरी में बैठे.

इस मामले को बीते 2 महीने हो गए थे और जब 15 अगस्त को श्रद्धा तिरंगा झंडा फहराने पहुंची, तो उपसरपंच मुन्ना महाराज ने उसे झंडा फहराने से मना कर दिया.

मुन्ना महाराज ने साफ कर दिया कि कई सालों से पंचायत भवन में गांव के मुखिया ठाकुर रसराज सिंह ही झंडा फहराते आए हैं.

रसूख वाले लोगों ने एक सुर में यह फैसला ले लिया और श्रद्धा को बिना झंडा फहराए ही घर वापस आना पड़ा.

श्रद्धा गांव की लड़की जरूर थी, मगर उस ने राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र सब्जैक्ट ले कर अपनी ग्रेजुएशन पूरी की थी और उस की शादी इसी गांव के एक सरकारी टीचर परमलाल से हुई थी.

गांव में जब चुनाव का समय आया, तो निचली जाति के लोगों ने पढ़ीलिखी श्रद्धा को सरपंच पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया. ऊंची जाति के लोगों से पूछताछ किए बिना सरपंच की दावेदारी की बात जब गांव के दबंगों को पता चली, तो उन्होंने उन के घर में काम करने वाली नौकरानी का परचा दाखिल करवा दिया. जब सरपंच के लिए चुनाव हुए, तो श्रद्धा को खूब वोट मिले और वह सरपंच बन गई.

पढ़ीलिखी श्रद्धा अपने पति के साथ खुश थी. इस बार गांव में जब सरपंच के चुनाव हुए, तो कुछ लोगों ने परमलाल को ही यह सलाह दी कि वह सरपंच पद के लिए श्रद्धा का परचा दाखिल करा दे.

दरअसल, इस बार पंचायत में सरपंच पद अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित था और गांव में जो दूसरे घरों की औरतें थीं, वे उतनी पढ़ीलिखी नहीं थीं. ज्यादातर औरतें घूंघट में रहती थीं. गांव में दलित जाति के मर्दों की भी यही सोच थी कि पंचायत का कामकाज देखना दूसरी किसी औरत के बस की बात नहीं है.

परमलाल ने गांव के कुछ अमीर लोगों से भी इस बारे में मशवरा किया, तो उन्होंने यह सोच कर हां कह दी कि सरपंच कोई बने, मरजी चलेगी तो गांव के मुखिया की ही.

परमलाल को गांव के लोग मास्साब कहते थे. उस दिन मास्साब जब अपने स्कूल का झंडा फहराने के बाद घर आए, तो श्रद्धा उतनी खुश नहीं थी. उस के चेहरे पर मायूसी देख कर मास्साब ने अंदाजा लगाया कि शायद सासबहू के बीच कोई कहासुनी हुई होगी.

भोजन करने के बाद रात में बिस्तर पर मनुहार के साथ परमलाल ने पूछा, ‘‘आज तुम्हारा फूल सा चेहरा मुर झाया सा लग रहा है. क्या अम्मां ने कुछ भलाबुरा कह दिया?’’

‘‘जब से गांव की सरपंच बनी हूं, तब से अम्मां ने तो कुछ नहीं कहा, मगर आज पंचायत में मु झे झंडा फहराने का हक भी नहीं मिला. सचिव और उपसरपंच ने मेरी जानबू झ कर बेइज्जती की है,’’ श्रद्धा पूरी कहानी बताते हुए बोली.

‘‘अच्छा तो यह बात है. आखिर गांव के इन ऊंची जाति वालों से देखा नहीं जा रहा है कि एक दलित जाति की औरत सरपंच बनी बैठी है,’’ परमलाल उसे दिलासा देते हुए बोला.

‘‘इन्हें सबक कैसे सिखाएं और संविधान ने हमें जो हक दिया है, वह हमें कैसे मिलेगा?’’ श्रद्धा ने चिंता जताते हुए कहा.

‘‘देखो श्रद्धा, गांव के ये दबंग कानून से नहीं मानते. इन की पहुंच मंत्री तक है, कुछ करेंगे तो पुलिस इन का ही साथ देती है. तुम्हें याद नहीं कि छोटे भाई की शादी में घोड़े पर बैठ कर गांव में फेरी लगाने पर इन्होंने बापू के साथ कितना झगड़ा किया था.’’

‘‘हां, यह बात तो है, पर इन सब को सबक तो सिखाना होगा, तभी हम दलितों का हमारा असली हक मिलेगा,’’ श्रद्धा ने पक्का इरादा करते हुए कहा.

महात्मा गांधी की तमाम कोशिशों के बावजूद गांव में अभी भी छुआछूत है. गांव में ऊंची जाति के लोगों के महल्ले में लगे हैंडपंप का पानी भी दलित जाति के लोगों को पीने की आजादी नहीं है.

गांव के स्कूल में बनने वाले मिड डे मील में केवल दलित जाति के बच्चे ही खाना खाते हैं. घर वालों ने बच्चों को पट्टी पढ़ा दी थी कि निचली जाति के लोगों के साथ बैठ कर भोजन नहीं करना है.

गांव के इन दबंगों को सबक सिखाने के लिए परमलाल ने श्रद्धा से कहा, ‘‘क्यों न हम गांव में 26 जनवरी पर ‘समरसता भोज’ का आयोजन करें, जिस में स्कूल के बच्चे और गांव के सभी लोगों को आमंत्रित करें. तुम जनपद और जिले के अफसरों से मिल कर पंचायत के इस कार्यक्रम की जानकारी दे दो.

‘‘वैसे भी सरकार छुआछूत मिटाने पर जोर दे रही है. ऐसे आयोजन से पंचायत की वाहवाही होगी और हमें पता है कि गांव के दबंग भोज में शामिल होंगे नहीं और तुम्हें झंडा फहराने का मौका मिल जाएगा.’’

श्रद्धा को पति की यह सलाह अच्छी लगी. उस ने जिला और जनपद के अफसरों को इस प्रोग्राम की जानकारी दे कर उन्हें गांव आने का न्योता दिया.

अफसरों की सलाह से 26 जनवरी पर सामूहिक रूप से गांव की साफसफाई के साथ तिरंगा झंडा फहराना और समरसता भोज का आयोजन किया जाना पक्का हुआ था.

आयोजन के आमंत्रण कार्ड छपवा कर गांव के मुखिया और दूसरे लोगों को भी आमंत्रित किया गया.

श्रद्धा ने मुखियाजी के पास जा कर कहा था, ‘‘ठाकुर साहब, आप को ही इस प्रोग्राम में तिरंगा झंडा फहराना है.’’

मुखियाजी ने हामी भर दी, लेकिन सरपंच के जाने के बाद जब आमंत्रण पत्र को ठीक से पढ़ा तो समरसता भोज का प्रोग्राम देख कर उन की भौंहें तन गईं. प्रोग्राम में बड़े अफसर आ रहे थे. लिहाजा, उन्होंने इस का विरोध तो नहीं किया, पर गांव के ऊंची जाति के लोगों को इस प्रोग्राम में जाने से रोक दिया.

तय समय पर जब 26 जनवरी का प्रोग्राम पंचायत में शुरू हुआ, तो सरपंच और गांव के दूसरे लोगों के साथ सड़कों पर सफाई की गई. बड़े अफसर केवल हाथ में झाड़ू ले कर फोटो खिंचवाते नजर आ रहे थे.

प्रोग्राम में गांव के मुखिया ठाकुर साहब और उन के साथी मौजूद नहीं थे. सचिव गेंदालाल सरकारी मुलाजिम होने के चलते वहां पर मौजूद था, मगर उस के चेहरे के हावभाव से साफ जाहिर था कि उसे यह सब अच्छा नहीं लग रहा था.

झंडा फहराने से पहले सरपंच श्रद्धा ने सचिव गेंदालाल से पूछा, ‘‘हमारे मुखियाजी दिखाई नहीं दे रहे, फिर झंडा कौन फहराएगा?’’

‘‘मुखियाजी किसी जरूरी काम से बाहर गए हैं,’’ सचिव गेंदालाल बोला.

‘‘तो फिर देर किस बात की सरपंच महोदया, पंचायत की मुखिया आप हो. झंडा फहराने की जिम्मेदारी भी आप की है,’’ जनपद की एक महिला अफसर ने कहा.

श्रद्धा की खुशी का ठिकाना न रहा. उस ने जोश के साथ तिरंगे झंडे के स्तंभ और गांधीजी की फोटो पर तिलक लगाया और जैसे ही सभी सावधान की मुद्रा में खड़े हुए, तो श्रद्धा ने डोरी खींच कर तिरंगा झंडा फहरा दिया. तिरंगा फहराने से गिरे फूल जमीन पर बिखर गए. भारत माता की जयघोष के साथ राष्ट्रगान का गायन हुआ.

समरसता भोज में सभी लोगों ने एकसाथ कतार में बैठ कर भोजन किया. समरसता भोज में गांव के ऊंची जाति के दबंग शामिल नहीं थे, मगर उन्हें छोड़ कर गांव के सभी लोगों ने भरपेट भोजन किया.

आसमान में लहराते तिरंगे झंडे के साथ श्रद्धा का मन भी आज पूरी तरह उमंग से लहरा रहा था. 15 August Special

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