Entertainment : मेहुल कुमार की गोल्डन जुबली

Entertainment. भारतीय सिनेमा के इतिहास में 90 के दशक में डायरैक्टर और फिल्मकार मेहुल कुमार ने बड़ी ईमानदारी व निडरता के साथ अपनी फिल्मों के जरीए लोगों को संदेश दिया था कि देश को असली खतरा बाहरी दुश्मनों से बाद में है, पहले देश के भीतर बैठे उन गद्दारों, भ्रष्ट नेताओं, जमाखोरों और बिके हुए प्रशासनिक तंत्र से है जो लोकतंत्र की जड़ों को दीमक की तरह चाट रहे हैं.

मेहुल कुमार की फिल्मों को देखते समय सिंगल स्क्रीन थिएटरों में बैठा आम आदमी सिर्फ मनोरंजन नहीं कर रहा होता था, बल्कि उसे लगता था कि परदे पर चल रहा नायक उसी के हक की लड़ाई लड़ रहा है. यही वजह है कि आज 30 साल बाद भी मेहुल कुमार की सिस्टम से तीखे सवाल पूछने वाली ‘क्रांतिवीर’ और ‘तिरंगा’ जैसी फिल्में हर 15 अगस्त के मौके हर टीवी चैनल पर दिखाई जाती हैं.

गुजरात के जामनगर से ताल्लुक रखने वाले मेहुल कुमार का असली नाम मोहम्मद बलोच है. उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत पत्रकारिता और गुजराती नाटकों के लेखन से की थी. पत्रकारिता व नाटक के लेखन ने उन के अंदर समाज की नब्ज पकड़ने की गहरी सम झ पैदा की. उन्होंने 1970 के दशक में गुजराती सिनेमा में कदम रखा. 1977 में पहली गुजराती फिल्म ‘जनमजनम ना साथी’ बनाई, उस के बाद ‘मां विना सूनो संसार’ सहित 18 ब्लौकबस्टर गुजराती फिल्मों के जरीए उन्होंने साबित कर दिया कि वे दर्शकों की भावनाओं को परदे पर उतारने की कला में माहिर हैं.

गुजराती सिनेमा में तहलका मचा कर मेहुल कुमार ने हिंदी फिल्मों के निर्माण में कदम रखा. उन्होंने ‘अनोखा बंधन’, ‘मरते दम तक’ और ‘आसमान से ऊंचा’ जैसी फिल्मों के जरीए अपनी पहचान बनाई, लेकिन नब्बे के दशक में सिस्टम की चूलें हिला देने वाली ‘पौलिटिकल, एक्शन और सोशल ड्रामा’ के कौकटेल से फिल्में गढ़ कर उन्होंने खुद को अमर बना लिया.

साल 1993 में मेहुल कुमार ने  राजकुमार और नाना पाटेकर की ऐतिहासिक जुगलबंदी के साथ फिल्म ‘तिरंगा’ बनाई थी. यह फिल्म उस दौर में बनी थी जब मुंबई सांप्रदायिक दंगों और बम धमाकों की आग में  झुलस रहा था. ऐसे माहौल में देश को एकजुट करने और सिस्टम में दोबारा विश्वास जगाने के लिए मेहुल कुमार ने एक ऐसी कहानी चुनी जो आज भी देशभक्ति का कल्ट क्लासिक मानी जाती है.

फिल्म ‘तिंरगा में राजकुमार एक संवाद, ‘‘जानी… हम तुम्हें मारेंगे और जरूर मारेंगे, लेकिन वह बंदूक भी हमारी होगी, गोली भी हमारी होगी और वक्त भी हमारा होगा…’’ बहुत ज्यादा हिट हुआ था.

एक जगह नाना पाटेकर कहते हैं, ‘‘इस देश को किसी दुश्मन की जरूरत नहीं है… इस देश को खोखला करने के लिए यहां के भ्रष्ट नेता, काले धंधेबाज और तुम जैसे गद्दार ही काफी हैं. लेकिन जब तक इस वरदी में जान है, कानून का डंडा तुम जैसे कीड़ों के सिर पर पड़ता रहेगा.’’

एक साल बाद ही 1994 में मेहुल कुमार सिस्टम से तीखे सवाल करने वाली फिल्म  ‘क्रांतिवीर’ ले कर आ गए, जो सिस्टम के चेहरे पर करारा तमाचा रही. यह फिल्म आज के ‘नीट पेपर लीक’ या ‘छात्र आंदोलनों’ की भी बात करती है. इस फिल्म ने नाना पाटेकर को उन का पहला नैशनल अवार्ड दिलाया था.

फिल्म ‘क्रांतिवीर’ के क्लाइमैक्स को  भारतीय सिनेमा के इतिहास का सब से बेहतरीन और असरदार माना जाता है. प्रताप नाम का किरदार निभाने वाले नाना पाटेकर को अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है. वह फांसी के फंदे के सामने खड़ा है और उस के सामने हजारों आम नागरिकों की भीड़ मूकदर्शक बनी खड़ी है. वहां खड़े हो कर नाना पाटेकर जो मोनोलौग (भाषण) देते हैं, वह आज भी जंतरमंतर पर बैठे आंदोलनकारी छात्रों या सड़कों पर इंसाफ मांगते आम आदमी के गुस्से को बयां करता है.

प्रताप भीड़ को देख कर कहता है, ‘‘आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने… मर्द बनने का इतना ही शौक है न, तो नपुंसकों की तरह तमाशा देखना बंद करो. आज मैं मर रहा हूं, कल तुम मरोगे, परसों तुम्हारी औलादें मरेंगी… और तुम लोग क्या करोगे? मोमबत्तियां जलाओगे? तालियां बजाओगे? सरकार को कोसोगे? कानून के रखवाले बिक चुके हैं, नेता देश को बेच रहे हैं और तुम लोग भेड़ों की तरह कतार में खड़े हो कर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हो.’’

इस के 5 साल बाद साल 1999 में मेहुल कुमार ने सेना के भीतर के भ्रष्टाचार और आतंकवाद पर फिल्म ‘कोहराम’ बनाई, जिस में अमिताभ बच्चन और नाना पाटेकर पहली बार एकसाथ नजर आए. इस फिल्म में मेहुल कुमार ने दिखाया कि कैसे सेना के भीतर भी कुछ बड़े अफसर (कबीर बेदी का किरदार) चंद रुपयों और सत्ता के लिए आतंकवादियों से हाथ मिला लेते हैं. अमिताभ बच्चन का किरदार एक ऐसे आर्मी औफिसर का है जो सिस्टम से तंग आ कर खुद कानून अपने हाथ में लेता है और न्याय की नई परिभाषा गढ़ता है.

50 साल के फिल्मी कैरियर में मेहुल कुमार का सिनेमा कभी भी ‘सौफ्ट’ या ‘धीमा’ नहीं रहा. वे हमेशा स्पष्ट और मुखर सिनेमा बनाने में यकीन करते आए हैं.

अगर मेहुल कुमार की सभी फिल्मों पर गंभीरता से नजर दौड़ाई जाए तो एक बात साफतौर पर उभरती है कि उन के सिनेमा की सब से बड़ी ताकत लेखक केके सिंह द्वारा लिखे गए तीखे और कड़क संवाद. मेहुल कुमार ने अपनी फिल्मों में संवादों को केवल बातचीत का जरीया नहीं बनाया, बल्कि उन्हें एक ‘हथियार’ की तरह इस्तेमाल किया. उन के किरदारों के मुंह से निकलने वाला एकएक शब्द एक तोप के गोले की तरह रहा, जो सीधे सिस्टम की दीवारों पर जा कर लगता था.

आज जब फिल्मकार मेहुल कुमार बौलीवुड में अपने 50 साल पूरे कर रहे हैं, तो यह केवल एक इनसान की कामयाबी वर्षगांठ नहीं है, बल्कि यह हिंदी सिनेमा के उस गौरवशाली दौर का उत्सव है जब फिल्में सिर्फ पैसा कमाने की मशीन नहीं होती थीं. उन का सिनेमा एक सामाजिक जिम्मेदारी निभाता रहा है. यही असल माने में गोल्डन जुबली है. Entertainment

Film : ‘की बोर्ड’ ने म्यूजिक खराब कर दिया – अक्षय बाफिला

Film : उत्तराखंड के रहने वाले अक्षय बाफिला ने साल 2011 में अनुराग कश्यप की फिल्म ‘देव डी’ के लिए साउंड रिकौर्डिस्ट के साथसाथ अमित त्रिवेदी के एसोसिएट के रूप में भी काम किया, फिर कई म्यूजिक अलबमों व ‘चितकबरे’, ‘हम तो चले लंदन’ समेत कुछ फिल्मों को अपने संगीत से संवारा.

इन दिनों अक्षय बाफिला फिल्म ‘हनीमूनाय नम:’ को ले कर चर्चा में हैं, जिसे संगीत से संवारने के साथ ही गीत भी गाए हैं और पहली बार मेन लीड किरदार भी निभाया है.

पेश हैं, अक्षय बाफिला से हुई बातचीत के खास अंश :

आप की संगीत से जुड़ने की कोई खास वजह?

मेरे घर में संगीत का कोई माहौल ही नहीं है. हम तो पिथौरागढ़, उत्तराखंड के एक छोटे से कसबे के रहने वाले हैं.

वसंत का मौसम शुरू होने पर एक पतिपत्नी हमारे घर आ कर उत्तराखंड का एक लोक वाद्य यंत्र ‘हुडका’ बजाते हुए वसंत के गीत गाते थे. जब वे आते तो मैं उन के नजदीक बैठ कर ध्यान से सुनता था. उसी ने मेरे अंदर संगीत के प्रति ललक पैदा हुई थी.

फिर मैं ने ग्रेजुएशन भी संगीत में ही किया. मैं ने अल्मोड़ा भारतेंदु संगीत विद्यालय से संगीत में विशारद किया. बनारस घराने के पंडित सत्यनारायण मिश्राजी मेरे गुरु रहे हैं.

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उस के बाद में दिल्ली चला गया. वहां श्रीराम कला केंद्र में 2-3 साल तक संगीत की शिक्षा ग्रहण की. लेकिन पहली बार मेरे सामने सवाल आया कि अब क्या? संगीत में कोई अच्छी नौकरी मिलने की उम्मीद नहीं थी.

काफी सोचविचार करने के बाद मैं ने मुंबई की तरफ रुख किया. यहां मैं ने साउंड इंजीनियरिंग का कोर्स किया. इस के बाद मुझे संगीतकार अमित त्रिवेदी के स्टूडियो में ‘साउंड रिकौर्डिस्ट’ के रूप में नौकरी भी मिल गई और मुझे शान, सुनिधि चौहान, श्रेया घोषाल सहित कई बेहतरीन व बड़े गायकों को रिकौर्ड करने का अवसर मिला.

बतौर साउंड रिकौर्डिस्ट दूसरे गायकों के गीत रिकौर्ड करते समय आप के अंदर का गायक और संगीतकार सामने वाले गायक की गलतियों को भी पकड़ रहा होता है. उस समय आप क्या करते हैं?

मैं बिना गायक का नाम लिए आप को एक किस्सा सुनाता हूं. हर इनसान के दिमाग से यह बात निकल जानी चाहिए कि फलां सिंगर बहुत बड़े हैं, बहुत अच्छा गाते हैं, पर हम जैसा देखते या सोचते हैं, वैसा होता नहीं. मैं ने तो खुद अपने सामने अनुभव किया. एक बहुत बड़े सिंगर ने एक लाइन को एक नहीं कम से कम 50 बार रीटेक दे कर सही ढंग से गाया था. मतलब यह कि हर गाने को जिस ढंग से गाना है, वह मंजा हुआ सिंगर भी कई बार नहीं कर पाता.

क्या आप बता सकते हैं कि ‘की बोर्ड’ संस्कृति ने संगीत या गायकों को कितना फायदा या कितना नुकसान पहुंचाया है?

इन दिनों तो ‘की बोर्ड’ यानी म्यूजिक प्रोग्रामिंग से ही 90 फीसदी गाने बनते हैं. पहले हर गाने की रिकौर्डिंग के समय बहुत सारे म्यूजिशियन यानी ढोलक, सारंगी सहित हर वाद्य यंत्र बजाने वाला बैठता था, पूरा आर्कैस्ट्रा इकट्ठा होता था. एक गाने का माहौल बनता था. फिर पूरे तालमेल के साथ गाना रिकौर्ड होता था.

उस संगीत में इनसानी हाथों की छाप होती थी, पर अब तो यह हो रहा है कि ‘की बोर्ड’ पर बैठ कर मैं अकेले ही संगीत बना रहा हूं, अच्छा या खराब सारे फैसले मैं अकेले ही ले रहा हूं. मैं खुद ही गा भी रहा हूं, गायक की भी जरूरत नहीं. पर इस तरह के गाने में भाव नहीं होते हैं. ऐसे गाने जल्दी ही भुला दिए जाते हैं.

अब तो आप संगीतकार के साथसाथ एक्टर भी बन गए हैं. यह कैसे हुआ?

फिल्म ‘हनीमूनाय नम:’ को ले कर कुछ लोग सम?ाते हैं कि मैं ने आपदा में भी अवसर ढूंढ़ लिया, जबकि यह मेरा फैसला नहीं है. इस फिल्म के डायरैक्टर निशांत भारद्वाज से मेरा अच्छा परिचय रहा है. कोविड से कुछ दिन पहले उन्हें एक तमिल फिल्म के डायरैक्शन की जिम्मेदारी मिली थी, जिसे वे उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में फिल्माना चाहते थे. इस के लिए उन्होंने मु?ो भी अपने साथ चलने के लिए कहा, पर 5-6 दिन की शूटिंग के बाद कोविड की वजह से लौकडाउन लग गया और शूटिंग रुक गई. लौकडाउन में थोड़ी सी छूट मिलते ही आधे से ज्यादा यूनिट वापस लौट गई.

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अचानक एक दिन निशांत भारद्वाज ने कहा कि उन्होंने बैठेबैठे एक कौमेडी फिल्म ‘हनीमूनाय नम:’ की स्क्रिप्ट लिख डाली है और अब वे इसे उत्तराखंड में फिल्माने के बाद ही वापस जाएंगे. उसी वक्त उन्होंने मुझे मुगाने की सिचुएशन बताई.

हम ने वहां पर गाने भी कंपोज किए और बेसिक सुविधाओं के साथ गाने रिकौर्ड किए. बाकी सारा काम मुंबई आ कर किया. अब सवाल था कि फिल्म में मेन लीड कौन निभाएगा. कोविड की वजह से मुंबई से कोई भी कलाकार उत्तराखंड पहुंचने के लिए तैयार नहीं हुआ. निशांतजी ने मुझसे कहा, तो मैं ने साफसाफ मना कर दिया कि मैं तो एक्टिंग की एबीसीडी भी नहीं जानता, लेकिन कोई दूसरा औप्शन न होने की वजह से मुझे उन की जिद के आगे झुकना पड़ा.

फिल्म ‘हनीमूनाय नम’ के बारे में कुछ बताएंगे?

यह एक ऐसी फिल्म है, जो समाज में फैली राजनीतिक मौकापरस्ती और जनता की सीधीसादी सोच को कौमेडी के साथ परोसती है. यह फिल्म हमारे समाज में मौजूद पारंपरिक रीतिरिवाजों और अंधविश्वास पर चोट करती है.

Filmi Actress: सोशल मीडिया की ग्लैमरस सैंसेशन रश्मिका मंदाना

हिंदी सिनेमा हो या साउथ, हर जगह रश्मिका मंदाना अपना जलवा बिखेर रही हैं. ‘एनिमल’, ‘पुष्पा 2 द रूल’ या ‘छावा’ हो इन फिल्मों में उन के अभिनय के बजाय उन के ग्लैमरस लुक की ही चर्चा हुई है. लेकिन  हिंदी एक्सैंट को ले कर अकसर उन्हें ट्रोल किया जाता है.
रश्मिका मंदाना ऐसी अदाकारा हैं जिन के नाम का जादू सोशल मीडिया से ले कर बौक्स औफिस तक सिर चढ़ कर बोल रहा है. उन की लोकप्रियता का आलम यह है कि उन की एक मुसकान करोड़ों दिलों की धड़कनें तेज कर देती है. अकसर आलोचक कहते हैं कि उन्हें फिल्में अभिनय से ज्यादा उन के ग्लैमरस लुक व सुंदरता की वजह से मिलीं, लेकिन रश्मिका ने हर बार अपनी मेहनत और स्क्रीन प्रेजैंस से इन धारणाओं को चुनौती दी है.
5 अप्रैल, 1996 को कर्नाटक के कोडागु (कूर्ग) जिले के एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी रश्मिका मंदाना की प्रारंभिक शिक्षा कूर्ग पब्लिक स्कूल में हुई. बाद में बेंगलुरु के एम एस रमैया कालेज औफ आर्ट्स, साइंस एंड कौमर्स से सायकोलौजी, पत्रकारिता और अंगरेजी साहित्य में स्नातक की डिग्री हासिल की.
यों बनीं अदाकारा
रश्मिका ने अभिनेत्री बनने के बारे में कभी सोचा नहीं था. कालेज में पढ़ाई के दौरान अपनी सहेलियों के उकसाने पर 2014 में रश्मिका ने ‘क्लीन एंड क्लियर फै्रश फेस औफ इंडिया’ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और यह खिताब उन्हें ही मिल गया. फिर एक एड फिल्म मिली तो मजाकमजाक में वह एड भी कर लिया. इस एड को देख कर 2-3 फिल्म निर्देशकों ने रश्मिका को फिल्मों में अभिनय करने का औफर दे दिया तो रश्मिका ने ठान लिया कि अब वे सफल अभिनेत्री बन कर ही रहेंगी.
उन्होंने रिषभ शेट्टी निर्देशित कन्नड़ भाषा की फिल्म ‘किरिक पार्टी’ में रक्षित शेट्टी के अपोजिट अभिनय किया. उन की मातृभाषा कन्नड़ के बजाय ‘कोडावा’ होने के कारण शुरुआती दौर में उन्हें कन्नड़ बोलने में ड्ढकाफी कठिनाई हुई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. 2016 में फिल्म ‘किरिक पार्टी’ रिलीज हुई और बौक्स औफिस पर यह फिल्म ब्लौकबस्टर साबित हुई.
डेट, इंगेजमैंट और फिर टूट
फिल्म की शूटिंग के दौरान ही रश्मिका मंदाना ने इस फिल्म के हीरो रक्षित शेट्टी संग डेट करना भी शुरू कर दिया था. यहां तक कि 3 जुलाई, 2017 को दूसरी फिल्म के रिलीज से पहले ही रश्मिका ने रक्षित संग अपनी इंगेजमैंट की भी घोषणा कर दी थी. फिर 21 दिसंबर, 2017 को रश्मिका की कन्नड़ भाषा में ही पुनीत राजकुमार के साथ ‘अंजनी पुत्रा’ और 29 दिसंबर, 2017 को गणेश के साथ ‘चमक’ के बौक्स औफिस पर सफलता के परचम लहराते ही रश्मिका मंदाना कन्नड़ भाषी फिल्मों की स्टार अभिनेत्री बन गईं.
इस के बाद रश्मिका मंदाना को विजय देवरकोंडा संग तेलुगू भाषा की फिल्म ‘गीता गोविंदम’ मिली. 16 अगस्त, 2018 को इस फिल्म के रिलीज होते ही रश्मिका के कैरियर के साथ ही जीवन में भी तूफान आया. इस फिल्म की सफलता ने उन्हें तेलुगू की स्टार अभिनेत्री बना दिया तो 20 दिनों बाद सितंबर 2018 में रश्मिका मंदाना ने रक्षित शेट्टी के साथ अपनी सगाई यह कह कर तोड़ दी कि दोनों के बीच सामंजस्य नहीं बैठ रहा है.
‘गीता गोविंदम’ से बदला कैरियर
रश्मिका मंदाना ने विजय देवरकोंडा के साथ सफल फिल्म ‘गीता गोविंदम’ क्या की, कि वे देखते ही देखते कन्नड़, तमिल व तेलुगू फिल्मों में छा गईं. यहां तक कि 2022 में वे अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म ‘गुडबाय’ में भी नजर आईं. यह अलग बात है कि ‘गुडबाय’ उन्हें हिंदी फिल्मों में स्थापित करने में विफल रही.
हालांकि वर्ष 2021 में अल्लू अर्जुन के साथ तेलुगू फिल्म ‘पुष्पा द राइज’ में श्रीवल्ली के किरदार में उन का जादू लोगों के सिर चढ़ कर बोल चुका था और इस फिल्म के हिंदी डब वर्जन ने उन्हें हिंदीभाषी दर्शकों के दिलों तक पहुंचा दिया था. बाद में हिंदी फिल्म ‘मिशन मजनूं’ में भी वे नजर आईं लेकिन हिंदी फिल्मों में वे नाम नहीं बना पाईं.
वर्ष 2023 में रणबीर कपूर के साथ फिल्म ‘एनिमल’ उन के कैरियर के लिए टर्निंग पौइंट साबित हुई, जिस ने बौक्स औफिस पर रिकौर्डतोड़ कमाई की. ‘एनिमल’ ने सोने पे सुहागा वाला काम किया.
लेकिन वहीं, 5 दिसंबर, 2024 को जब ‘पुष्पा द राइज’ का सीक्वअल ‘पुष्पा 2 द रूल’ तेलुगू के साथ ही हिंदी में भी डब हो कर एकसाथ रिलीज हुई तो इस ने सफलता के सारे पुराने कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए. 2025 में प्रदर्शित हिंदी फिल्म ‘छावा’ में भी रश्मिका मंदाना ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई.
ग्लैमरस गुडि़या
रश्मिका मंदाना को सोशल मीडिया पर ‘ग्लैमरस गुडि़या’ ही माना जा रहा है क्योंकि ‘एनिमल’ हो या ‘ पुष्पा 2 द रूल’ या हो ‘छावा’, इन दोनों ही फिल्मों में उन के अभिनय के बजाय उन के ग्लैमरस लुक की ही चर्चा हुई. इस में कोई दोराय नहीं कि उन का स्क्रीन प्रेजैंस और सुंदरता बेजोड़ है.
रश्मिका की सब से बड़ी खूबी उन की नैचुरल ब्यूटी और संक्रामक मुसकान है. चाहे वह रेड कारपेट पर डिजाइनर गाउन हो या फिल्म ‘पुष्पा’ में एक गांव की गोरी का लुक, वे हर लिबास में सहज दिखती हैं. उन की फिटनैस और फैशन सैंस आज की युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा है. यही वजह है कि सोशल मीडिया की वे रानी बनी हुई हैं. फरवरी 2026 तक इंस्टाग्राम पर उन के 50.7 मिलियन से अधिक फौलोअर्स हैं.
लाइक्स का रिकौर्ड
हाल ही में रश्मिका की एक पोस्ट ने विराट कोहली का रिकौर्ड तोड़ते हुए भारत में सब से अधिक लाइक पाने (लगभग 25 मिलियन लाइक्स) वाली पोस्ट का खिताब हासिल किया है. वे सोशल मीडिया पर अपनी निजी जिंदगी और फिल्मों की शूटिंग के पीछे की ?ालकियां शेयर कर अपने प्रशंसकों के साथ निरंतर जुड़ी रहती हैं.
निजी जिंदगी की निजता
वे अपनी निजी जिंदगी पर सोशल मीडिया को हावी नहीं होने देतीं. उन्होंने 2020 में ही विजय देवरकोंडा संग प्रेम की रासलीला रचानी शुरू कर दी थी मगर सार्वजिनक रूप से कभी भी इस बात को जाहिर नहीं होने दिया और न ही रश्मिका व विजय सार्वजनिक जगहों पर कभी एकसाथ नजर आए. आखिरकार, इन दोनों ने
26 फरवरी, 2026 को उदयपुर के ‘आईटीसी मेमेन्टोज’ में एक भव्य समारोह में एक नहीं 2 रीतिरिवाजों के साथ शादी कर ली. उन की शादी की फोटो ने इंटरनैट पर हंगामा बरपा रखा है. द्य
मुक्ता के स्वामित्व व अन्य विवरण संबंधी जानकारी फौर्म 4, देखिए नियम 8

क्यों नहीं चल पाती समलैंगिकता से जुडी फिल्में

समलैंगिकता हमेशा से समाज में रही है, लोगों ने बस स्वीकार करने में देरी की है. सिनेमा भी उसी अनुरूप ढलता रहा. आज क्वीर फिल्में बनाई तो जा रही हैं पर दर्शकों में शर्म और झिझक के चलते ये फिल्में चल नहीं पातीं. जानिए आने वाले समय में क्या है क्वीर फिल्मों का भविष्य.पिछले कुछ सालों से क्वीर फिल्मों का निर्माण देश में बढ़ा है, क्योंकि अब कानून इस को अपराध नहीं मानता. उन्हें अपने तरीके से जीने का अधिकार देता है, लेकिन शादी करने की मान्यता नहीं देता.

ऐसे में कुछ अलग तरीके के भाव और रहनसहन को फौलो करने वाले लोगों को छिप कर रहने की अब जरूरत नहीं रही, लेकिन परिवार, समाज और धर्म के कुछ लोग आज भी इन्हें हीन दृष्टि से देखते हैं. उन्हें अपनी भावनाओं को खुल कर कहने या रखने की आजादी नहीं है.

कोर्ट के फैसले से अब उन्हें खुल कर अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का कुछ मौका अवश्य मिला है. ऐसे में अच्छी समलैंगिक फिल्में भी बनीं, मसलन ‘फायर’, ‘तमन्ना’, ‘दरमिया’, ‘माय ब्रदर निखिल’, ‘बौम्बे टाकीज’ आदि, जिन की गिनती अच्छी फिल्मों में की गई और लोगों ने इन की मेकिंग को सराहा भी.

क्वीर फिल्मों का इतिहास 

समय के साथसाथ यह मौका पूरे विश्व में ‘न्यू क्वीर सिनेमा’ के रूप मे जाना गया, जिसे पहली बार 80 और 90 के दशकों में सब के सामने लाया गया, जिस पर कई सालों तक बहस छिड़ी और प्राइड मार्च हुए ताकि उन्हें ऐसी अलग कहानी कहने का मौका दिया जाए. अंत में कई देशों ने इसे कानूनी मान्यता दी और उन्हें आजादी से जीने का अधिकार दिया.

इस के बाद निर्मातानिर्देशकों ने ऐसे अलग विषयों को ले कर कई फिल्में बनाईं, फिल्म फैस्टिवल करवाए गए. इतने सब के बावजूद इन फिल्मों को बौक्सऔफिस पर लाने से हमेशा रोका जाता रहा. पहले इन फिल्मों को नैशनल फिल्म डैवलपमैंट कौर्पोरेशन (हृस्नष्ठष्ट) हौल तक लाने में सहयोग करता था, लेकिन उस का सहयोग अब कम मिल पाता है. आज भी थिएटर हौल मिलने में मुश्किलें हैं, दर्शकों की पहुंच से आज भी ये फिल्में दूर हैं. आखिर क्वीर फिल्मों के साथ इतना भेदभाव क्यों है, क्या है इन का भविष्य?

क्या हैं क्वीर फिल्में

समलैंगिकों को आम बोलचाल की भाषा में एलजीबीटी यानी लैस्बियन, गे, बाईसैक्सुअल और ट्रांसजैंडर कहते हैं. वहीं कई और दूसरे वर्गों को जोड़ कर इसे क्विटयर  समुदाय का नाम दिया गया है. इसलिए इसे रुत्रक्चञ्जक्त भी कहा जाता है. सभी क्वीर फिल्मों में प्यार को अधिक महत्त्व दिया गया और बताया गया है कि प्यार कभी भी किसी से हो सकता है और इसे स्वीकार करना जरूरी है.

समलैंगिक सिनेमा अपना आधिकारिक लैवल दिए जाने से पहले दशकों तक अस्तित्व में था, जैसे कि फ्रांसीसी रचनाकारों जीन कोक्ट्यू, डी अन पोएटे और जीन जेनेट की फिल्में ऐसी ही कहानियों को कहती हैं.

जिम्मेदार सभी

इस बारे में फिल्म निर्माता, निर्देशक ओनीर कहते हैं, ‘‘मु?ो वह अच्छा लग रहा है कि मेरी फिल्म पाइन कोन क्वीर सैंट्रिक फिल्म होने के बावजूद ब्रिटिश फिल्म ‘इंस्टिट्यूट फ्लेर’ लंदन में दिखाई जा रही है और उसे देखने वाले भी काफी हैं. भारत में भी इन फिल्मों का निर्माण बढ़ा है, लेकिन हौल तक पहुंचने में मुश्किल है.

‘‘इस के अलावा इन फिल्मों को बढ़ावा मिलने की मुश्किल होने की वजह समाज और धर्म है, क्योंकि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक शादी को कानूनन मान्यता देने की बात आई तो यही बात सामने आई कि समाज तैयार नहीं है और मना हो गया. समाज इसे बहुत धीरेधीरे मान रहा है कि इस तरीके के व्यक्तित्व वाले लोग हमारे समाज में हैं.

‘‘मैं जब किसी आम फिल्म को देखने हौल तक जाता हूं तो मेरे दिमाग में एक लव स्टोरी देखने की बात सामने आती है, इस के आगे और कुछ भी नहीं सोचता, लेकिन ऐसी आम फिल्म बनाने वालों को बहुत मुश्किल होती है. क्वीर फिल्मों की लव स्टोरी को देखना, इतना डर, असुरक्षा की भावना उन के अंदर क्यों आती है, मुझे समझ में नहीं आता, लेकिन उन्हीं फिल्मों को औनलाइन लोग छिपछिप कर देखते हैं. आंकड़ों के अनुसार, समाज में करीब 10 प्रतिशत लोग क्वीर समुदाय के हैं, क्या उन्हें अपनी तरह से जीने का अधिकार नहीं होना चाहिए?’’

ओनीर आगे कहते हैं, ‘‘लोगों का डर मैं ने तब भी देखा था जब मेरी पहली फिल्म ‘माई ब्रदर निखिल’ रिलीज हुई थी. तब भी इंटरवल में जब कुछ दर्शकों को पता चलता है कि मुख्य भूमिका निभाने वाला समलैंगिक है तो वे उठ कर चले गए. पुरुष दर्शकों को इस की चिंता अधिक होती है कि कोई उन्हें समलैंगिक फिल्में देखते हुए देख न ले. डर तो उन्हें तब लगना चाहिए जब वे काफी पैसे खर्च कर हिंसात्मक फिल्में देखने हौल तक जाते हैं. प्यार से इतना डर क्यों? किसी की खुशी को मानने से उन्हें डर क्यों होता है? ये कमियां हमारे समाज और धर्म की हैं, जो इसे स्वीकार नहीं करतीं.

‘‘समस्या हो रही है कि थिएटर में ऐसी फिल्मों को रिलीज होने के लिए जगह नहीं मिलती. पहले नैशनल फिल्म डैवलपमैंट कौर्पोरेशन (हृस्नष्ठष्ट) इन फिल्मों को रिलीज करने में सहयोग देता था. अभी तो किसी फिल्म को दिखाने के लिए थिएटर को रकम देनी पड़ती है, पहले ऐसा नहीं था. अभी छोटी फिल्मों को रिलीज करना बहुत मुश्किल हो चुका है. ओटीटी पर भी रिलीज करने के लिए भी कई समस्याएं आती हैं, मसलन हीरो कितना बड़ा है, कैसी फिल्म है आदि के बारे में उन्हें बताना पड़ता है.

‘‘क्वीर फिल्मों को इस लिहाज से अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता, उन्हें चुनने वाले ही ऐसी फिल्मों को रिलीज करने में असहज महसूस करते हैं. क्वीर फिल्मों की समस्या हर स्तर पर अलगअलग होती है. ऐसे में वही फिल्में हौल तक पहुंच पाती हैं जिन की कहानी आम दर्शकों के स्वीकार करने योग्य हों. एक अलग रंग या व्यक्तित्व को जब तक कोई मान्यता नहीं मिलेगी, इन फिल्मों को स्वीकारा नहीं जाएगा. सो, दर्शक कैसे बढ़ेंगे?

‘‘साल 2005 में मैं ने फिल्म ‘माई ब्रदर निखिल’ बनाई थी और अब ‘पाइन कोन’ ले कर आया हूं. यह फिल्म अपनी जिंदगी. प्यारमोहब्बत, लिविंग आदि के बारे में है. इसलिए यहां पर इसे कम लोग स्वीकार कर रहे हैं, जबकि विदेशों में इसे देखने वाले काफी हैं. मु?ो यह नहीं सम?ा आता है कि 100 करोड़ की घटिया फिल्मों को थिएटर हौल मिल जाते हैं, लेकिन 2 या 3 करोड़ की छोटी और क्वीर फिल्मों को क्यों नहीं? ऐसी कई बड़ी फिल्में आईं और नहीं चलीं, दर्शक नहीं मिले, क्या हौल मालिक को घाटा नहीं हुआ?’’

माध्यमों की कमी का नहीं होगा असर 

छोटी और क्वीर फिल्मों को दिखाने के माध्यम की कमी भले ही हो, लेकिन इसे बनाना बंद नहीं करना है, क्योंकि ऐसी फिल्में कई अलग माध्यमों में भी दिखाई जा सकती हैं और इन के दर्शक भी हैं.

निर्देशक ओनीर कहते है, ‘‘लोग मुझ से पूछते हैं कि मैं ने समलैंगिक फिल्में क्यों बनाईं, इस की जरूरत क्या है? मैं ने उन से कहा कि, मुझे अदृश्य रह कर जीना मंजूर नहीं और मैं ने ही समलैंगिक विषयों पर फिल्में बनाई हैं और आगे भी बनाता रहूंगा. मैं जब बड़ा हुआ, तो ऐसी फिल्में नहीं थीं, क्योंकि समाज ऐसी बातों को नजरअंदाज करता था.’’

इक्वल ह्यूमन राइट्स

वे आगे कहते हैं, ‘‘मेरी फिल्म ‘पाइन कोन’ उन लोगों के लिए है जो इक्वलिटी इन ह्यूमन राइट को समझें. इन फिल्मों के लिए विजन की जरूरत है. ऐसे में फिल्म फैस्टिवल में भी दिखाया जाना एक अच्छा कदम है. आजकल थोड़े जागरूक लोग इन फिल्मों के को देखते हैं, क्योंकि प्राइड मार्च अब छोटेछोटे शहरों में भी होता है. इस का अर्थ यह है कि लोग इसे स्वीकार कर रहे हैं और आगे आने वाली यंग जनरेशन छोटी और क्वीर फिल्में बनाना नहीं छोड़ेगी. आगे दर्शकों का प्यार उन्हें मिलेगा, फिल्में हौल तक जाएंगी.’’

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