किसान आंदोलन जातीयता का शिकार

पिछले 2 लोकसभा चुनावों में किसानों में ऊंची जातियों के बड़े वर्ग ने जाति और धर्म के असर में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को सब से ज्यादा समर्थन दिया, जिस के बाद केंद्र की मोदी सरकार को यह लगा कि कृषि कानूनों के जरीए खेती के निजीकरण का यही सब से सही समय है. जाति और धर्म में फंसा किसान कृषि कानूनों के गूढ़ रहस्यों को समझ नहीं पाएगा. कुछ किसान अगर विरोध पर उतरे भी तो उन की आवाज को दबाना मुश्किल नहीं होगा.

अंगरेजों की फूट डालो और राज करो की नीति का पालन करते हुए केंद्र सरकार खेती में निजीकरण की आड़ में ईस्ट इंडिया वाले कंपनी राज की वापसी के लिए कदम बढ़ा चुकी है.

केंद्र सरकार के 3 कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन जातीय राजनीति का शिकार हो गया. कृषि कानून पूरे देश में लागू होंगे. इस का असर पूरे देश के किसानों पर पड़ेगा, पर किसान आंदोलन में हिस्सा लेने वाले किसानों को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कृषि कानूनों का असर केवल पंजाब व हरियाणा के किसानों पर पड़ेगा.

समझने वाली बात यह है कि हरियाणा और पंजाब के किसानों ने ही इस आंदोलन में पूरी मजबूती से हिस्सा क्यों लिया? बाकी देश के किसानों की हाजिरी केवल दिखावा मात्र रही.

8 दिसंबर, 2020 को किसान आंदोलन के पक्ष में भारत बंद उन राज्यों में कामयाब रहा, जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं थी. जिन राज्यों में भाजपा की सरकार रही, वहां यह आंदोलन ज्यादा कामयाब नहीं रहा.

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कृषि कानूनों में जो सब से बड़ा डर छिपा है, वह एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य का है. निजी मंडियों के आने से सरकारी मंडियों के बंद हो जाने का खतरा किसानों को दिख रहा है, जिस से यह लग रहा है कि सरकार एमएसपी को धीरेधीरे बंद करने की योजना में है.

नीति आयोग ने साल 2016 में  11 राज्यों में किसानों के बीच एमएसपी को ले कर एक सर्वे किया था, जिस में यह पता चला कि एमएसपी की जानकारी भले ही 81 फीसदी किसानों को हो,  पर इस का फायदा देशभर के केवल 6 फीसदी किसानों को ही मिलता है.

उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में 100 फीसदी किसानों को एमएसपी का पता था. एमएसपी का सब से ज्यादा फायदा पंजाब और हरियाणा के किसानों को ही मिलता रहा है.

1965-66 में जब एमएसपी योजना शुरू  हुई थी, तब यह केवल धान और गेहूं की फसल पर मिलती थी. धीरेधीरे अब 23 फसलों की खरीद पर एमएसपी मिलने लगी है. इन फसलों में ज्वार, कपास, बाजरा, मक्का, मूंग, मूंगफली, सोयाबीन और तिल जैसी फसलें शामिल हैं.

एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य का मतलब यह होता है कि अगर फसलों की कीमत बाजार के हिसाब से गिर भी जाए, तब भी सरकार तय एमएसपी पर ही किसानों से फसल खरीदेगी, जिस से किसान को नुकसान न हो.

सरकार के कानून इसलिए फेल नहीं होते कि वे गलत तरह से बने होते हैं, बल्कि वे इसलिए फेल होते हैं, क्योंकि उन का क्रियान्वयन गलत तरह से किया जाता है. एमएसपी और मंडियों के साथ भी यही हो रहा है. सरकार को इस में सुधार करना चाहिए था, न कि इस को बंद करने की दिशा में काम करना चाहिए था.

जातपांत है हावी

राजनीतिक विश्लेषक और जन आंदोलन चलाने वाले प्रताप चंद्रा कहते हैं, ‘‘लोकसभा के 2 चुनावों साल 2014 और 2019 में किसानों ने बड़ी तादाद में भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मतदान किया था. अगर जातीय आधार पर देखें, तो इन में ऊंची जातियों के किसानों का वोट फीसदी सब से अलग था.

‘‘भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने जब यह सम?ा लिया कि बहुसंख्यक किसान उस के पक्ष में हैं, तो उस ने खेती को प्रभावित करने वाले

3 कानून लागू करने का फैसला कर लिया. उसे यह पता था कि केवल हरियाणा और पंजाब के किसान आंदोलन को लंबे समय तक नहीं चला पाएंगे. इस वजह से यह समय कृषि कानूनों को लागू करने के लिए सब से मुफीद लगा.’’

साल 2014 के लोकसभा चुनावों में पंजाब के किसानों ने भाजपा की अगुआई वाले राजग को 52 फीसदी वोट दिए. ये वोट भी भाजपा की जगह उस के सहयोगी अकाली दल के चलते मिले थे.

साल 2019 के लोकसभा चुनावों में ये वोट घट कर 32 फीसदी रह गए. हरियाणा के किसानों ने राजग यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को साल 2014 में 31 फीसदी वोट दिए और साल 2019 में ये वोट बढ़ कर 59 फीसदी हो गए.

बात केवल पंजाब और हरियाणा की नहीं है, बाकी देश के प्रमुख राज्यों में भी किसानों का सब से बड़ा समर्थन राजग को ही मिला.

बिहार में साल 2014 में 37 फीसदी से बढ़ कर 50 फीसदी हो गया. इसी तरह से उत्तर प्रदेश में 42 फीसदी से  54 फीसदी, गुजरात में 55 फीसदी से  62 फीसदी, राजस्थान में 54 फीसदी से 60 फीसदी, उत्तराखंड में 60 फीसदी से 65 फीसदी, मध्य प्रदेश में 55 फीसदी से 59फीसदी, महाराष्ट्र में साल 2014 और 2019 के चुनावों में 54 फीसदी वोट मिले, छत्तीसगढ़ में साल 2014 के लोकसभा चुनावों में किसानों के राजग को 52 फीसदी वोट मिले और 2019 में वे वोट घट कर 46 फीसदी रह गए.

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई ‘किसान सम्मान निधि’ के असर से किसानों ने राजग को ज्यादा वोट दिए. इस के साथ ही भाजपा के पक्ष में ऊंची जातियों के होने से राजग को किसानों के वोट ज्यादा मिले.

भारत के ज्यादातर किसान बेहद गरीब हैं. उन के लिए सालाना 6,000 रुपए की बहुत अहमियत होती है.

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पंजाब की किसान राजनीति

भाजपा को पंजाब के किसानों ने कभी भी समर्थन नहीं दिया. राजग के सहयोगी अकाली दल को पंजाब के किसान समर्थन देते थे. भाजपा की केंद्र सरकार ने जब 3 कृषि कानून बनाए तो उस के विरोध में अकाली दल कोटे से केंद्र सरकार में मंत्री हरसिमरत कौर ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.

पंजाब में अकाली दल को केवल किसानों का समर्थन ही हासिल नहीं है, बल्कि अकाली दल प्रमुख प्रकाश सिंह बादल का परिवार खेती से ही अपना कारोबार चलाता है. किसानों को अकाली दल का समर्थन इस वजह से मिलता था कि वह किसानों की परेशानियों को हल करने की ताकत रखता था.

भाजपा अब पंजाब में अकाली दल को कमजोर करना चाहती है. ऐसे में वह अकाली दल की बातें नहीं मानना चाहती है. किसान आंदोलन के समझते से बाहर होने के बाद अकाली दल की कीमत किसानों में घट जाएगी.

भाजपा पूरे देश के किसानों को यह संदेश देने में कामयाब रही कि कृषि कानूनों का विरोध केवल पंजाब के किसान ही कर रहे हैं. ऐसे में पूरे देश के किसानों को एकजुट होने से रोक लिया गया.

ऊंची जातियों के किसानों का समर्थन भाजपा के साथ होने से यह बात सम?ाने में भाजपा को आसानी रही. जिन थोड़ेबहुत किसान संगठनों ने आंदोलन को समर्थन देने का काम किया भी, उन को कई तरीकों से दबाव में ले लिया गया.

केंद्र की मोदी सरकार ने पूरे किसानों के मुद्दे को अपने प्रचार तंत्र के बल पर केवल पंजाब व हरियाणा के किसानों तक में सीमित कर के रख दिया. इस वजह से किसान आंदोलन पूरे देश के किसानों का आंदोलन नहीं बन सका.

किसान नेता केवल अपनी जाति और बिरादरी के बीच ही अपना असर रखते हैं. उन का कोई देशव्यापी संगठन नहीं है. किसान नेता राजनीतिक दलों के पिछलग्गू बन कर ही अपनी राजनीति चमकाने का काम करते हैं. 3 कृषि कानूनों के खिलाफ भी केवल 30-40 किसान दल ही एकजुट हुए, तब आंदोलन कर पाए. ज्यादातर किसान दलों की अपनीअपनी राजनीतिक विचारधारा है. ऐसे में केंद्र की मोदी सरकार को इन के बीच तोड़फोड़ करना आसान हो जाता है.

आंदोलन से डरी सरकार

जब किसानों ने एकजुट हो कर सरकार से लड़ाई लड़ी थी, तब फैसला भी किसानों के पक्ष में आया था. तब राष्ट्रीय राजनीति में किसान और किसान नेताओं का मजबूत दखल होता था. कोई भी सरकार इन को नाराज नहीं करना चाहती थी.

चौधरी चरण सिंह ऐसे नेताओं में सब से प्रमुख थे. वे देश के प्रधानमंत्री भी बने थे. उन्होंने साल 1967 में भारतीय क्रांति दल बनाया था और साल 1974 में वे भारतीय लोकदल के नेता बने थे.

ऊंची जातियों के किसानों पर उन की मजबूत पकड़ थी. किसान राजनीति में वही किसान नेता कामयाब रहा है, जिस की पकड़ ऊंची जातियों के किसानों पर रही है.

चौधरी चरण सिंह ने ही साल 1978 में भारतीय किसान यूनियन यानी बीकेयू का गठन किया था. उन की मौत के बाद किसान राजनीति दरकिनार हो गई.

साल 1987 में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने उत्तर प्रदेश में भारतीय किसान यूनियन को फिर से संगठित किया. उन्हें पता था कि इस संगठन को राजनीति से दूर रखना है. इस वजह से भारतीय किसान यूनियन गैरराजनीतिक संगठन के तौर पर काम करती रही.

किसान यूनियन की ताकत 80 के दशक में पूरे देश ने देखी थी. देश की राजधानी को बिजली की बढ़ी दरों को वापस लेना पड़ा था. किसानों की उस समय की तमाम मांगों को मान लिया गया था.

पर किसान यूनियन की ताकत चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के साथ ही खत्म हो गई. उत्तर प्रदेश में ही भारतीय किसान यूनियन का असर नहीं रहा. किसान आंदोलन में जब तक पूरे देश के हर वर्ग के किसान शामिल नहीं होंगे, तब तक उस का कामयाब होना मुश्किल है.

भारत के 2 बड़े राज्यों बिहार और उत्तर प्रदेश के किसानों के पास सब से कम मात्रा में खेत हैं. बिहार में प्रति किसान औसत 0.4 हैक्टेयर जमीन है. उत्तर प्रदेश के किसान के पास औसत 0.7 हैक्टेयर जमीन है.

इन 2 राज्यों से लोकसभा की  120 सीटें हैं. नए कृषि कानूनों का असर सब से ज्यादा इन दोनों राज्यों के किसानों  पर पड़ने वाला है. नए कृषि कानूनों में अमीर किसान और चंद उद्योगपतियों को फायदा होगा.  किसानों को बेहद नुकसान होगा.

देश में इन की संख्या 86 फीसदी है. जातीयता की बिसात पर उत्तर प्रदेश और बिहार के किसान सरकार का विरोध करने से बच रहे हैं.

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उदासीन होता छोटा किसान

किसी भी कृषि सुधार कानून का फायदा छोटे किसानों को नहीं मिलता. ऐसे में वह सोचता है कि ऐसे कानून उस के लिए नहीं हैं और वह इस से उदासीन हो जाता है. हरित क्रांति हो या श्वेत क्रांति, दोनों का फायदा बड़े किसानों को हुआ.

इस के बाद की जनगणना साल 1971 में हुई थी, तो पता चला कि उन में भूमिहीन किसानों की तादाद बढ़ गई. कौंट्रैक्ट फार्मिंग का बुरा असर भी छोटे किसानों पर पड़ेगा. जिन लोगों के पास जमीन है, वे अपनी खेती कौंट्रैक्ट फार्मिंग करने वाले लोगों को दे देंगे तो छोटे किसान मजदूर कहां जाएंगे?

देशभर के किसान अभी भले ही कृषि कानूनों का विरोध नहीं कर पा रहे हों या उन को दिक्कतें सम?ा न आ रही हों, पर आने वाले दिनों में वे इस का विरोध जरूर करेंगे.

देश की माली हालत को मजबूत बनाने के लिए जरूरी है कि खेती की बेहतरी के साथसाथ किसानों की बेहतरी का भी ध्यान रखा जाए. पंजाब और हरियाणा के किसान महंगे मोबाइल फोन और गाडि़यों को इस वजह से अपने साथ रखते हैं, क्योंकि वे अपने खेतों से कमाई करते हैं. उत्तर प्रदेश और बिहार के किसान मजदूर इन के खेतों पर काम करते हैं.

पंजाब और हरियाणा के किसानों की तरह उत्तर प्रदेश और बिहार के किसान तब तक जागरूक नहीं होंगे, जब तक उन्हें उन का हक नहीं मिल सकेगा.

कृषि कानूनों का फायदा पूरे देश के किसानों को हो, इस बड़ी सोच के साथ ऐसे कानून बनाने होंगे. कानूनों में सुधार की बात को नाक का सवाल नहीं बनाना चाहिए, तभी देश और देश की आर्थिक व्यवस्था में सुधार हो सकेगा. किसान और खेती को अलगअलग देखने से किसी तरह के सुधार की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

किसान आंदोलन में ‘पिज्जा’ की तलाश

लेखक-रोहित और शाहनवाज

दिल्ली की बढ़ती ठंड में ईंटों की दीवारों वाले गरम कमरे में रजाई में पैर डाले आराम फरमाते हुए शहरी अमीर लोग अपने लैपटौप पर इंटरनैट के जरीए किसान आंदोलन की लेटेस्ट अपडेट जान रहे थे. यूट्यूब पर अलगअलग चैनलों की लेटेस्ट खबरें देखीं तो कुछ और ही तरह के नैरेटिव चल रहे थे.

किसान आंदोलन मजे में… आखिर पिज्जा, फुट मसाजर, गीजर, वाशिंग मशीन वाले इन किसानों को फंड कहां से आ रहा है? क्या इतनी सहूलियत वाले ये किसान गरीब हैं? आंदोलन या पिकनिक… आखिर चल क्या रहा है?

ऐसे न जाने कितनी सुर्खियां खबरिया चैनलों की हैडलाइंस बनी हुई थीं. सिर्फ न्यूज चैनलों में ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर भी इसी के संबंध में मैसेज फौरवर्ड हो रहे थे.

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एक पल के लिए सोचा कि क्या सही में किसान मजे में यह आंदोलन कर रहे हैं? क्या सच में ये किसान नहीं, बल्कि आढ़ती और बिचौलिए हैं? हमारे मन में इन सवालों के उठने के बावजूद इस के काउंटर में कुछ और सवाल भी खड़े हो रहे थे. हम ने खुद को कहीं न कहीं असमंजस में पाया, जिसे खत्म करने का एक ही रास्ता था कि एक बार फिर से सिंघु बौर्डर पर जा कर माहौल का जायजा लिया जाए और देखा जाए कि न्यूज चैनल और सरकार के मंत्री जो दावा कर रहे हैं, उस में कितना दम है.

सिंघु बौर्डर पर जाने के बाद हमने पाया कि पिछली बार पुलिस की जो बैरिकेडिंग 200 मीटर आगे हरियाणा की तरफ थी, वह अब 200 मीटर पीछे दिल्ली की तरफ बढ़ाई हुई थी. बैरिकेड लोहे वाले नहीं बल्कि रास्तों को बांटने के लिए पत्थर के बड़ेबड़े डिवाइडर लगाए गए थे, वह भी 10-12 लेयर में. उन के ऊपर लोहे की कंटीली जंजीरें बिछी हुई थीं.

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पुलिस की ठीकठाक चौकसी थी. बैरिकेड पर करने के बाद देखा कि बड़ी तादाद में लोगों का हुजूम बैरिकेड के बाद ही मौजूद था. पिछली बार तो एक ही स्टेज देखा था, जहां पर किसान नेताओं और दूसरे लोगों के भाषण चलते रहते थे, लेकिन इस बार गए तो 2 स्टेज लगाए गए थे, एक हरियाणा की तरफ मुंह कर के और एक दिल्ली की तरफ मुंह कर के.

प्रोटैस्ट की जगह पर अंदर की तरफ बढ़े तो देखा कि गरमागरम चाय के साथ लोगों का स्वागत किया जा रहा था. यह मेन स्टेज के पीछे का हिस्सा था जहां पर चाय बांटी जा रही थी. मेन स्टेज की तरफ बढ़े तो हमें स्टेज पर कुछ लोग गाने गाते हुए दिखाई दिए. कुछ देर खड़े हो कर गाना सुना और आगे बढ़ चले पिज्जा की तरफ.

अब हमें मालूम तो नहीं था कि पिज्जा कहां बांटा जा रहा है, इसीलिए हम बड़े ही गौर से हर जगह जहां पर कुछ भी बंटता देखते और आगे की ओर बढ़ते रहते. सिंघु बौर्डर पर डेढ़ किलोमीटर आगे तक बिना किसी से बात किए हम हर जगह का जायजा लेते रहे. कोई रोटीसब्जी बांटता तो कोई आलूपूरी, कोई दालचावल बांटता तो कोई चायबिसकुट. लेकिन एक चीज जो हम ने अभी तक नोटिस नहीं किया वह था पिज्जा का काउंटर. भला नोटिस भी कैसे करते, नोटिस करने के लिए काउंटर का होना भी तो जरूरी था.

अनोखा ‘क्रेजी ब्यूटी सैलून’

पिज्जा का काउंटर ढूंढ़ने का एक फायदा यह हुआ कि हम ने प्रोटैस्ट साइट को बड़े ही गौर से देखापरखा. पिज्जा का काउंटर अभी तक तो नहीं मिला था, लेकिन हमें हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले से सोनू वेरिता का ‘क्रेजी ब्यूटी सैलून’ जरूर दिख गया.

सोनू गांव पेहोवा में नाई हैं और वहीं पर ही अपना ब्यूटी सैलून चलाते हैं. सोनू ने हम से बात की और उन्होंने बताया, “हमारे गांव के लोग इस प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए यहां आए हुए हैं. जो लोग हफ्ते में 4 दिन मेरे सैलून में आया करते थे, वे लोग पिछले एक महीने से नहीं आए, इसीलिए मैं ने अपना सामान बांधा और मैं भी आ गया अपने गांव के लोगों के पास उन की सेवा करने के लिए.”

सोनू यहां पर पैसे कमाने के लिए नहीं, बल्कि इस किसान आंदोलन में अपने तरीके से हिस्सेदारी निभाने के लिए आए हैं. सोनू और उन के साथ 2 और लोग बिना पैसों के और बिना थके लगातार लोगों के बाल काट कर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं.

इस में कोई शक नहीं कि सोनू की टीम को देख कर गोदी मीडिया यह कवरेज कर सकता है कि ‘ऐयाशी की हद तो देखिए, अपने साथ नाई भी लाए हैं’, ‘बाल भी कटवा रहे हैं’ वगैरहवगैरह. लेकिन सोनू से बात कर के महसूस हुआ कि वे लोग इस आंदोलन में किसी भी तरह की हिस्सेदारी निभाना चाहते हैं. उन्हें किसी ने यह करने के लिए रिक्वैस्ट नहीं की है और न ही किसी ने उन्हें कमांड दी है. उन्होंने खुद से इस आंदोलन में अपनी जिम्मेदारी ली और वे इस जिम्मेदारी को बखूबी निभा भी रहे हैं.

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बुजुर्गों के लिए ‘फुट मसाजर’

खैर, बात पिज्जा की हो रही थी, लिहाजा ‘क्रेजी ब्यूटी सैलून’ को पीछे छोड़ हम आगे बढ़े. 200-300 मीटर ही चलें होंगे, तो देखा कि एक बड़े से तंबू के अंदर प्रदर्शन में आए लोगों के लिए ‘फुट मसाजर’ का इंतजाम किया गया था. हम ने उस तंबू की तरफ कूच किया. देखा कि उस के बाहर तकरीबन 50-60 उम्र के 20 बुजुर्गों की लाइन लगी थी, जिस के गेट पर एक वालंटियर भी खड़ा था. वालंटियर एकएक कर के लोगों को अंदर भेज रहा था. हम गए तो उन्होंने हमें रोका और पंजाबी में कहा, “वीरे, इकइक कर के सब दा नंबर आएगा.”

हम ने उन्हें बताया कि हमें मसाज नहीं करवाना है, हम मीडिया से हैं और बात करना चाहते हैं, तो उस के जवाब में भी उन्होंने हमें गेट के बाहर से ही दिखाते हुए कहा, “एक मीडिया वाले पहले से ही अंदर हैं, वे निकल जाएं तो आप का नंबर आएगा.”

उस वालंटियर की यह बात सुन कर मन में बड़ी तस्सल्ली सी हुई कि यहां किसी को भी स्पैशल ट्रीटमैंट नहीं दिया जा रहा. सब के साथ एक जैसा बरताव हो रहा है. खैर, पहले वाले मीडिया कर्मी बाहर आए और उन्होंने हमें अंदर जाने के लिए मंजूरी दे दी.

अंदर जाते ही हमारी नजर उन ‘फुट मसाजर’ मशीनों पर पड़ी जिस के लिए नैशनल मीडिया चैनल अपने ‘प्राइम टाइम शो’ पर फालतू के नैरेटिव सैट करने की कोशिश करने में लगे हैं.

अंदर हमारी बात पटियाला के शेरबाज सिंह से हुई, जो चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई कर रहे हैं और ‘खालसा एड संस्था’ से जुड़े हैं.

शेरबाज सिंह से हुई बातचीत में उन्होंने इस पूरे प्रोजैक्ट के बारे में बताया, “यहां हम ने 17-18 फुट मसाजर का इंतजाम किया है यानी एक बार में 17-18 लोगों की ऐंट्री और 10 मिनट का सैशन. यह इनीशिएटिव ‘खालसा एड एनजीओ’ का है. प्रोटैस्ट में बुजुर्गों की तादाद का ध्यान रखते हुए हम ने यहां इन का इंतजाम किया है, क्योंकि बड़े उम्र के लोग जल्दी थक जाते हैं और पैरों का आराम उन की थकान मिटाने के लिए सब से बेहतरीन उपाय है.”

शेरबाज सिंह ने आगे बताया कि यह पूरा प्रोजैक्ट तकरीबन 2 लाख रुपए के आसपास का है, जिस में मशीनों से ले कर, बिजली, कुरसियां, तंबू, तकिए वगैरह सब का खर्चा जुड़ा हुआ है. ‘खालसा एड’ एक इंटरनैशनल एनजीओ है जो मानवतावादी सिद्धांतों पर चलती है और दुनिया में कहीं भी लोगों को जरूरत हो तो वह उन की मदद के लिए हमेशा तैयार रहती है.

शेरबाज सिंह ने मीडिया में चल रही झूठी खबरों का खंडन करते हुए कहा, “हर एनजीओ के पास पैसे का एक ही सोर्स होता है और वह है लोगों का डोनेशन. डोनेशन से जो पैसा जमा होता है वह हम समाज में नेक काम के लिए खर्च करते हैं. हम ने देखा कि भारत में केंद्र सरकार ने जिन कृषि कानूनों को लागू किया है उस के खिलाफ किसान सड़कों पर आंदोलन करने पर मजबूर हुए हैं. इस आंदोलन की खास बात यह है कि जितनी तादाद यहां पर नौजवानों की संख्या हैं उतनी ही संख्या यहां पर बुजुर्गों की भी है, इसलिए इस बात पर खास हम ध्यान दे रहे हैं.”

वालंटियर की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने अपनी बात जारी रखी, “ये भाई जो गेट पर खड़े हो कर सिस्टम को मैनेज कर रहे हैं इन्हें किसी ने यह काम करने के लिए मजबूर नहीं किया है, बल्कि वे खुद ही पिछले एक हफ्ते से इस आंदोलन में अपनी जिम्मेदारी समझते हुए यहां पर काम कर रहे हैं और बुजुर्गों का खयाल रखना तो हमें हमारे परिवार में ही सिखाया जाता है.

“हम ने बचपन में अपनी किताबों में भी पढ़ा है, तो जब उन्हीं बुजुर्गों के लिए ‘खालसा एड’ इन मशीनों को ले कर उन की केयर करना चाहता है तो यह मानवतावादी काम हुआ, न कि ऐयाशी.”

शेरबाज सिंह की बात तो एकदम सही थी. सरकार और मीडिया को इस आंदोलन को बदनाम करने का जुनून इतना सिर पर चढ़ा है कि बुजुर्गों के लिए किए गए इंतजाम भी उन्हें फूटी आंख नहीं सुहा रहे हैं.

रोटी मेकर मशीन की जरूरत

अब हम थोड़ा और आगे बढ़े, तो एक लंगर वाले काउंटर पर ‘रोटी मेकर मशीन’ नजर आई. हमारे कदम वहीं रुक गए और उस तरफ आगे बढ़ कर काउंटर पर खड़े हो चले. इतने में एक आदमी जयप्रकाश, जो मशीन में बटन दबा कर कुछ सैट करने में बिजी था, हमें आता देख वह हमारी तरफ बढ़ा.

दिल्ली के रहने वाले जयप्रकाश ने हमें इस रोटी मेकर मशीन के बारे में जानकारी दी. उस ने बताया कि यह मशीन एक घंटे में तकरीबन 1,200 रोटियां सेक सकती है. यह मशीन 30 नवंबर से यहां पर लोगों की सेवा के लिए लाई गई है. हर दिन तकरीबन 12,000 से 13,000 लोगों के लिए रोटियां सेंकी जाती हैं.

उन के पास तकरीबन 4 महीने का राशन मौजूद था. एक सवाल जो हम आजकल अकसर लोगों से सुन रहे हैं, वह यह है कि किसानों के पास इतना राशन आया कहां से? यह सवाल बचकाना है, अब कोई ‘मोदी के झूट की पोटली’, ‘अंबानीअडाणी के पास बढ़ती संपति’ और ‘किसानों के पास राशन कहां से आया’, यह पूछे तो उस के मन में खोट है. वह आदमी या तो बेवकूफ है या बेवकूफ बना रहा है. जो किसान अपने उगाए अनाज से पूरे देश का पेट भर रहा है उस के पास राशन नहीं होगा तो किस के पास होगा?

हमने देखा कि तकरीबन 10 लोग बड़े से पतीले पर आटा गूंद रहे थे और 10 और लोग पहले के गुंदे आटे की छोटीछोटी लोई बनाने का काम कर रहे थे. बाकी बेलने और सेंकने का काम रोटी मेकर मशीन का था.

रोटी मेकर मशीन की कीमत का तो जयप्रकाश को भी अंदाजा नहीं था, लेकिन उन्होंने बताया कि ये 2 मशीनें दिल्ली के लोगों ने आपस में चंदा जमा कर के खरीदी है. जो लोग रोटी बनाने का काम कर रहे हैं वे सब इसी आंदोलन में आए लोग हैं, जो अपने हिसाब से अपना समय दे रहे हैं और काम कर रहे हैं.

ठंड में गीजर से राहत

रोटी मेकर मशीन देखने के बाद, हम मेन स्टेज से तकरीबन 4 किलोमीटर आगे की तरफ बढ़ चुके थे, लेकिन हमें अभी तक पिज्जा का काउंटर नहीं दिखाई दिया. हमारे मन में पिज्जा की आस अभी तक खत्म नहीं हुई थी. लेकिन कदम और आगे बढ़ते ही चले जा रहे थे.

मेन स्टेज से इतनी दूर आ जाने के बाद अब हमें एक जगह पर आंदोलन करने आए किसान नहाते हुए दिखाई दिए. हम ने हमारे पास आए व्हाट्सएप फौरवर्ड पर पानी के गीजरों के बारे में भी तो पढ़ासुना था. भला इस को देखे बगैर हम कैसे वापस जा सकते थे.

वहां देखा कि पानी के जिन गीजरों के बारे में बात हो रही थी वे तो एकदम देशी किस्म के गीजर थे. यह भी सुना था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात वाले किसी एडिशन में इस तरह के गीजर के बारे में लोगों को बता कर उन्हें आत्मनिर्भर भी बनने को कहा था.

अब ऐसे में एक बड़ा सवाल तो यह उठ खड़ा होता है कि जब देश के प्रधानमंत्री ही ऐसी चीजों का प्रचार कर रहे हों और किसान अपने प्रोटैस्ट में इन्ही चीजों का इस्तेमाल कर प्रधानमंत्री के भाषण को साकार बना रहे हों, तो यह चीज कैसे अमीरी की निशानी हो सकती है? अगर यह गुमराह करने वाली बात है तो क्या यह नहीं कहा जा सकता कि प्रधानमंत्री ही लोगों को गुमराह करने का काम कर रहे थे?

जिस तरह का गीजर हम ने देखा वह बड़ा ही साधारण और देशी किस्म का गीजर था. जलती लकड़ियां और गोबर के बने उपले डाल कर पतीले को गरम किया जा रहा था और दूसरी तरफ कुप्पी जैसे आकार वाले बरतन में ठंडा पानी डाला जा रहा था. नल के दूसरे मुहाने से गरम पानी बाहर आ रहा था. ऐसी तकरीबन 20 के आसपास देशी मशीनों का सैटअप लगाया गया था. उसी जगह पर 6 सामूहिक वाशिंग मशीन भी रखी हुई थीं, प्रदर्शनकारियों के कपड़े धोने के लिए.

किसान अपने गंदे कपड़ों को यहां ले आते हैं और यहां मौजूद वालंटियर कपड़े धो कर किसानों को वापस कर देते हैं जिन्हें 90 फीसदी मशीनों में ही सुखा लिया जाता है और बाकि किसान बाहर ले जा कर कहीं भी टांग कर सुखा देते हैं.

इस पूरे सैटअप को लगाने के पीछे की वजह बताते हुए मनवीर सिंह, जो खालसा एड के वालंटियर हैं, ने कहा, “यह गीजर लगाने के पीछे का मकसद सिर्फ इतना था कि कोविड काल में सरकार भी लगातार यह प्रचार कर रही है कि साफसुथरा रहना कितना जरूरी है. ऐसे में अगर बड़ेबुजुर्गों या किसी भी उम्र के लोग इस बढ़ती ठंड में ठंडे पानी से नहाने लगें तो उन के बीमार पड़ने के चांस ज्यादा बढ़ जाएंगे. कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन का आयोजन इसीलिए किया गया है कि अगर वे सब लोग अपनेअपने कपड़े धोने में बिजी हो गए तो आंदोलन की जगह पर कौन मौजूद रहेगा? यह एक तरह का इंतजाम है, जो इस आंदोलन की खासीयत है, इसीलिए हमारे वालंटियर ही उन किसानों के कपड़े धो दे रहे हैं.”

मनवीर सिंह की बातें सुन कर अब तो यह पक्का हो गया था कि मीडिया में जिस तरह से प्रदर्शनकारियों के लिए मौजूद सुविधाओं के संबंध में बदनामी हो रही है वह बिलकुल फुजूल और घटिया दर्जे की है. फिर हमें याद आया कि जो मीडिया इस तरह के नैरेटिव चला रहा है उन्हें तो इस प्रदर्शन में ऐंट्री तक नहीं करने दी जा रही है. मजे की बात तो यह थी कि नैशनल मीडिया चैनलों से कहीं ज्यादा इज्जत यूट्यूब पर चैनल चला रहे स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों की थी. कम से कम उन्हें आंदोलन साइट में घुसने की इजाजत तो मिल रही थी.

पिज्जा की उम्मीद अब हमारे मन में धूमिल होती जा रही थी. हम मेन स्टेज से 4-5 किलोमीटर तक आगे जो आ गए थे. लेकिन हमें पिज्जा एक भी जगह पर बंटता हुआ नजर नहीं आया. हां, 1-2 जगहों पर खीर जरूर बांटी जा रही थी, लेकिन पिज्जा तो कहीं नहीं दिखा. शाम ढल चुकी थी और ढलती शाम के साथसाथ ठंड भी बढ़ती जा रही थी.

लिहाजा, हमें हार मान कर किसी से पूछना ही पड़ा, “अंकल, यह पिज्जा कहां बंट रहा है?”

अंकल ने हमें बड़ी पैनी नजरों से देखा और अपने मुंह से मफलर हटा कर कर अपनी भारी आवाज में कहा, “पिज्जा कहां ढूंढ़ रहे हो बेटा. यहां बस एक बार ही पिज्जा बंटा था. उस के बाद तो कुछ ऐसा नहीं बंटा.”

यह सुन कर तो हमें लगा कि हम जिस उम्मीद का पीछा करते करते यहां इतनी दूर आ चुके थे, वह तो यहां मौजूद ही नहीं है. ऐसे में अपने टूटते हौसलों के साथ और ढेरों सवालों के जवाब की गठरी उठाए हम ने अपने गले में मफलर बांधा, पास में बंट रही गरम चाय का एक कप लिया, और चुसकी मारते हुए हम मेन स्टेज की तरफ से होते हुए बसस्टैंड की तरफ चल पड़े.

जवाबों की गठरी

किसान आंदोलन में आए प्रदर्शनकारियों के लिए सुविधाओं को जिस तरह से मेनस्ट्रीम मीडिया ने गलत तरीके से प्रचार करने का काम किया उस से यह समझ में आता है कि ये सभी मीडिया चैनल किसी फिक्स एजेंडा को ले कर काम कर रहे हैं. उदाहरण के लिए किसानों के नहाने के लिए गीजर का इंतजाम करना और कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन का करना करना कहीं से भी उन की ऐयाशी नहीं जाहिर करती. अब इतनी बढ़ती ठंड में कोई भी इनसान नहाने के लिए गरम पानी का ही इंतजाम करेगा न.

मीडिया चैनल वाले क्या चाहते हैं कि किसान न नहाएं? साफसुथरे किसान इन की आंखो को चुभते हैं क्या? किसानों को ले कर इन की यह सोच बस छोटी सोच को ही जाहिर करता है. ये लोग देश के किसानों को अभी भी उसी पुराने किसान की तरह समझते हैं जो फटे कपड़ों में, बदन पर चीथड़े लपेटे, अंगूठाछाप था.

वैसे तो हमें कहीं पर पिज्जा नजर नहीं आया, लेकिन वहां जा कर जब हम ने पिज्जा के बारे में पूछा तो पता चला कि जो पिज्जा बना कर लोगों के बीच बांटा जा रहा था, उस का खर्चा रोटी के खर्चे के तकरीबन बराबर ही है. जब पिज्जा की बात होती है तो शहरी लोगों को डोमिनोज या पिज्जा हट का खयालल आता है, जो एक फैंसी पिज्जा के 150 रुपए तक ले लेता है. यहां ऐसा नहीं था. 2 रोटी के बराबर की आटे की लोई, ऊपर से टमाटर की चटनी जिस के ऊपर टौपिंग के नाम पर कुछ शिमला मिर्च या मक्के के दाने और ऊपर से कोई चीज नहीं. इस के लिए मैटिरियल का इंतजाम करना किसान के लिए बड़ी बात नहीं. रोटी सादी नहीं खाई जा सकती, उस के लिए साथ में सब्जी का होना जरूरी है यानी बनाने में डबल मेहनत और खर्चा कम नहीं है. लेकिन पिज्जा में एक ही बार में बेस के ऊपर सब्जियां डाल कर सेंक दी जाती हैं यानी बनाने में एक बार की ही मेहनत और खर्चा इतना भी नहीं कि जेब ढीली हो जाए.

अब कोई अगर यह पूछ ले कि इन के पास यह सब सामान कहां से आ रहा है, तो यह लाइन फिर से कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के झूठे वादे, अंबानी अडाणी के पास बढ़ता पैसा और किसानों के पास अनाज कहां से आया, पूछना ही बेवकूफी और बेमानी है.

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