Political Kahani: हम रह गए जीरो पड़ोसी बन रहा हीरो

Political Kahani:: मार्च में एकदम से मौसम का मिजाज बदल गया था. अनामिका ने सोचा कि विजय से मिल लेती हूं, पर जब वह उस के घर गई, तो विजय का मूड उखड़ा हुआ था.
‘‘मुंह क्यों लटकाया हुआ है?
सब ठीक है ?’’
अनामिका ने विजयसे पूछा.
‘‘सब मस्त. देख बिन मौसम की बारिश ने ठंडक बढ़ा दी है,’’ विजय बेमन से बोला.
‘‘हम्म, पर तुम्हारे चेहरे पर बारह क्यों बजे हैं?’’ अनामिका ने कहा.
‘‘चल , रणवीर सिंह की नई फिल्म देखने चलते हैं. सिनेमाघर पर फिल्म देखे बहुत दिन हो गए हैं. कौर्नर की सीट लेंगे,’’ विजय यह कह तो रहा था, पर उस का ध्यान कहीं और ही था.
‘‘विजय, सच बताओ कि क्या बात है? तुम्हें तो अभी कोई अवार्ड भी मिला है. तुम ने उस का भी नहीं बताया. मैं ने सोशल मीडिया पर तेरा फोटो देखा था अवार्ड लेते हुए,’’ अनामिका बोली.
‘‘फिल्म देखते हुए हम समोसे खाएंगे. बारिश के मौसम में समोसे खाने का अलग ही मजा है,’’
विजय ने कहा.

‘‘पता है, रसोई गैस कितनी महंगी हो गई है. 15 रुपए का समोसा अब 20 रुपए में मिल रहा है. सिनेमाघर में तो कम से कम 50 रुपए का होगा. और तू मु? अपने अवार्ड की बात क्यों नहीं बता रहा है?’’ अनामिका ने विजय का हाथ पकड़ कर पूछा.
‘‘अरे यार, क्या बताऊंमैं तो बड़ी मुसीबत में फंस गया. चौबे चले छब्बे बनने, दुबे बन कर लौट वाली कहावत  फिट बैठती है,’’ विजय ने धीरे से कहा.
‘‘ पूरी बात बताओ,’’ अनामिका ने विजय के बालों में हाथ फेरते हुए कहा.
‘‘तुम तो जानती हो कि पड़ोस में जो जसवंत अंकल हैं, वे लोकल गुरुद्वारा के मैंबर हैं. इस बार उन्होंनेयुवा शक्ति अवार्डके लिए चुना था. मतलब उन की गुरुद्वारा कमेटी ने. पिछले
रविवार को वहां हुए एक कार्यक्रम में उन लोगों ने मेरा सम्मान किया था. मु? एक शील्ड, सर्टिफिकेट और शौल भी दिया था.’’
‘‘हां, मैं ने तुम्हारे सोशल मीडिया हैंडल पर उस कार्यक्रम से जुड़े फोटो और वीडियो देखें थे. पर यह तो खुशी की बात है. मुंह किस बात पर फूला हुआ है, यह बताओ?’’ अनामिका बोली.
‘‘इस अवार्ड के चक्कर में मैं अब घनचक्कर बन गया हूं. हुआ यों कि मंगलवार को हमारे पड़ोस में रहने वाले अग्रवाल अंकल और मिस्टर जोसेफ का जसवंत अंकल के साथ ?ागड़ा हो गया. शोर सुन कर मैं भी वहां चला गया,’’ विजय ने बताया.
‘‘फिर आगे क्या हुआ?’’ अब अनामिका थोड़ा परेशान हो गई थी.
‘‘सारा ?ागड़ा एक नाली के गंदे पानी को ले कर था. अग्रवाल अंकल और जोसेफ अंकल बोल रहे थे कि जसवंत अंकल की वजह से नाली का पानी भर कर सड़क पर गया है, पर वे बोले कि पीछे वाले करीम भाई की वजह से ऐसा है.

‘‘बस, फिर क्या था, जसवंत अंकल को अकेला देख कर वे दोनों उन से भिड़ गए और धकियाने लगे. जब मैं ने जसवंत अंकल की साइड ली, तो अग्रवाल अंकल बोले, ‘तु? तो अवार्ड दिलाया है , तू तो इस का पक्ष लेगा ही.’ ‘‘इस पर जसवंत अंकल बिफर गए. हट्टेकट्टे तो वे हैं ही, उन्होंने दोनों अंकल को अकेले ही पीट डाला. मैं ने बीचबचाव की कोशिश की, पर तब तक तो मामला बिगड़ चुका था. कुछ लोगों ने उन तीनों को छुड़ाया, पर इस सब में मैं बुरा बन गया. अग्रवाल अंकल और जोसेफ अंकल मु? से बहुत ज्यादा नाराज हैं.
‘‘जोसेफ अंकल ने तो इतना तक कह दिया, ‘जसवंत तो करीम भाई से जलता है, इसलिए उस का नाम लगा रहा है. तू ने भी गलत आदमी का साथ दिया.’
‘‘यार, अनामिका, मैं तो बेवजह फंस गया. अब तो मैं अग्रवाल अंकल और मिस्टर जोसेफ से नजरें भी नहीं मिला पा रहा. उन दोनों के घर के दरवाजे तो मेरे लिए जैसे बंद हो गए हैं,’’ विजय ने अपनी बात रखी.
‘‘ओह, तो यह मामला है. अब आया . पर तू जानता है कि किसी और के साथ भी ऐसा हुआ है…’’ अनामिका बोली.
‘‘किस के साथ?’’ विजय ने हैरानी से पूछा.
‘‘हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ. उन्हें इजराइल ने अपने देश का सर्वोच्च सम्मान दिया और उसी के बाद से इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया. इस सब से दुनियाभर में यह संदेश गया कि भारत इजराइल और अमेरिका के साथ है ओर ईरान हमारा दुश्मन देश है.

‘‘कोढ़ पर खाज तो यह रही कि हमविश्वगुरुकी तरह सुलह कराने के सपने देख रहे थे कि नरेंद्र मोदी अमेरिका और इजराइल से कह कर युद्ध रुकवा देंगे, पर उन की कहीं भी नहीं चलती दिख रही.
‘‘अब खबर आई है कि पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर ऐसा कुछ करिश्मा कर सकते हैं कि यह युद्ध रुक जाए,’’ इतना कह कर जैसे अनामिका ने विजय पर कोई बम फोड़ दिया.
‘‘मु? पूरी बात बता कि सारा माजरा क्या है?’’ विजय ने पूछा.
‘‘खबरों की मानें तो ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव से उपजी चिंताओं के बीच पाकिस्तान मीडिएटर के रोल में नजर रहा है. वह अमेरिका के संदेश ईरान तक पहुंचा रहा है और तेहरान के जवाब वाशिंगटन को देने का काम कर रहा है.

‘‘इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर से फोन पर बातचीत की. व्हाइट हाउस के मुताबिक, चर्चा का मेन मुद्दा ईरान युद्ध था. हालांकि, इस बातचीत को संवेदनशील बताते हुए बड़े अफसरों ने और ज्यादा बताने से इनकार कर दिया.
‘‘व्हाइट हाउस की प्रैस सचिव कैरोलिन लिविट ने पहले कहा था
कि यह संवेदनशील कूटनीतिक चर्चा है और अमेरिका मीडिया के जरीए कोई बातचीत नहीं करेगा.
‘‘सूत्रों के मुताबिक, आसिम मुनीर
ने डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत की और पाकिस्तान ने खुद को अमेरिकी और ईरान के बड़े अफसरों के बीच बातचीत की संभावित जगह के रूप में पेश किया.
‘‘पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से बात की. एक्स पोस्ट के जरीए उन्होंने ईद उल फितर और नवरोज की शुभकामनाएं दीं और ईरान के लोगों के साथ अपनी हमदर्दी जताई.
‘‘शहबाज शरीफ ने कहा कि दोनों पक्षों ने खाड़ी क्षेत्र के गंभीर हालात पर चर्चा की और तनाव कम करने, डायलौग और कूटनीति की जरूरत पर सहमति जताई. उन्होंने इसलामी दुनिया में एकता और क्षेत्र में शांति बहाल करने में पाकिस्तान के रोल पर भी जोर दिया.
‘‘इस बीच सोमवार, 23 मार्च को डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि तेहरान के साथ बेहतर और ठोस बातचीत के बाद उन्होंने हमले को 5 दिनों तक टालने की घोषणा की थी. हालांकि, यह साफ नहीं है कि पाकिस्तान का मीडिएटर बनने का डोनाल्ड ट्रंप के फैसले से सीधा संबंध है या नहीं.
‘‘ईरान ने सीधे अमेरिका के साथ बातचीत से इनकार किया है, लेकिन विदेश मंत्रालय ने कहा कि कुछ मित्र देशों के जरूरी संदेश मिले हैं. जानकारों के मुताबिक, यह कूटनीतिक कोशिश अभी शुरुआती चरण में है.’’

‘‘तुम्हें इस से क्या सम? आता है?’’ विजय ने पूछा.
‘‘यही कि ईरान और अमेरिका के बीच सुलह की कोशिशें तेज हो गई हैं. अमेरिकी समाचार आउटलेट एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के अफसरों की इसी कड़ी में पाकिस्तान में मुलाकात और बातचीत मुमकिन है. पाकिस्तान में अमेरिकी और ईरानी अफसरों के बीच यह बैठक हो सकती है.
‘‘इजराइल के न्यूज चैनल-12 ने इजराइली अफसर के हवाले से बताया कि पाकिस्तान में होने वाली संभावित बैठक में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख हो सकते हैं.
‘‘अमेरिका के उपराष्ट्रपति ने सोमवार, 23 मार्च को इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से भी ईरान से खुली बातचीत करने पर चर्चा की. ‘‘इस से पहले एक रिपोर्ट में यह
भी कहा गया कि तुर्की, मिस्र और पाकिस्तान के प्रतिनिधि व्हाइट हाउस के दूत स्टीव विटकौफ से मुलाकात कर चुके हैं. साथ ही, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से भी अलग से मिले.
‘‘इस से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने के संकेत दे चुके हैं. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्रुथ पर ईरान के साथ पौजिटिव बातचीत की बात कही थी. साथ ही, ईरान के पावर प्लांट्स और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाले हमलों को 5 दिन के लिए टाल दिया था.
‘‘डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि चर्चाओं का यह दौर पूरे हफ्ते जारी रहेगा. दोनों देशों के बीच गहन चर्चाओं के पौजिटिव रवैए को देखते हुए, मैं ने अमेरिकी रक्षा विभाग को निर्देश दिया है कि ईरान के पावर प्लांट्स और ऊर्जा ढांचे पर सभी सैनिक हमलों को फिलहाल 5 दिनों के लिए टाल दिया जाए.’’
‘‘तो तुम यह मानती हो कि पाकिस्तान इस युद्ध को रुकवा सकता है, जबकि नरेंद्र मोदी नहीं?’’ विजय ने सवाल किया.

‘‘बात अगर इस खबर की करें, तो क्यों नहीं. सोचो कि इस सब में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर का नाम लिया जा रहा है और अगर पाकिस्तान कामयाब रहता है, तो फिर हमारे पड़ोसी का कद बढ़ना तय है. ‘‘मेरे खयाल से असली कूटनीति यही होती है कि चुपचाप काम को करो, ढिंढ़ोरा मत पीटो. पर हमारे देश मे पिछले कुछ साल से काम कम हो रहे हैं और बातें ज्यादा बनाई जा रही हैं.
‘‘तेल और रसोई गैस की कोई कमी नहीं है, पर जनता जो भुगत रही है वह भी सब के सामने है. गैस सिलैंडर की कालाबाजारी हो रही है. जो चाय कल तक 10 रुपए की एक कप थी, वह आज 15 रुपए हो गई हैऔर भी जाने किस तरह से महंगाई ने देश को कब्जे में ले लिया है.’’
‘‘कह तो तुम सही रही हो.

जैसा हाल मेरे पड़ोसियों ने क्या है, वैसा ही हाल देश चलाने वालों का हो गया है. गलत का साथ देने से पहले कई बार सोचना चाहिए. हर पड़ोसी से बना कर रखनी चाहिए, फिर चाहे वह कोई देश हो या पासपड़ोस,’’ विजय ने कहा. ‘‘अब ज्यादा मुंह मत लटकाओ और स्माइल करो. हमें हर बात से सीख लेनी चाहिए. फिलहाल जनता अगर चुप है, तो इस का मतलब यह नहीं है कि उस में अपना गुस्सा दिखाने की ताकत नहीं है. जैसे तुम ने इस मामले से सबक सीखा है, उसी तरह देश के नेताओं खासकर सत्ता पक्ष को भी सबक सीखना चाहिए वरना 2 बिल्लियों की लड़ाई में बंदर बाजी मार जाता है.
‘‘हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालत फिलहाल तो किसी खिसियानी बिल्ली जैसी है, जो अपनी फर्जी कामयाबी का खंभा नोंच रही है,’’ अनामिका ने दो टूक कहा.         

Hindi Story: पहली मुलाकात

Hindi Story:  मैं ने उसे बचपन में देखा था. तभी से उस की तसवीर मेरे जेहन में छप गई थी. फिर लगा कि इस खूबसूरत लड़की से दोबारा मुलाकात होगी भी या नहीं. इस बीच मेरी शादी पक्की हो गई, पर मैं उसे भूल नहीं पाया था

कु मुलाकातें ऐसी होती हैं, जो जिंदगी को एक कसक दे जाती हैं. कुछ मुलाकातें जिंदगी को एक मिठास, जिंदगी को एक खूबसूरत, सुखद, सुनहरे रंग से रंग देती हैं. कुछ मुलाकातें जिंदगी के लिए एक सुखद अहसास बन कर रह जाती हैं. कुछ मुलाकातें कभी नहीं भूलने के लिए होती हैं, जैसे उस की और मेरी मुलाकात जिंदगी में एक अजीब सी हलचल, एक चमक तो लाई थी, जिसे हम चाह कर भी यादों से नहीं दूर कर सके, फिर भी किसी से कह नहीं सकते थे, ऐसे भी हालात बन कर रह गए थे. अचानक हमारी मुलाकात फिर से दोबारा होगी, यह सोचा भी नहीं था हम ने. हो सकता है, उस केमन में मिलन दोबारा हो’, ऐसा कुछ रहा हो.

चिलचिलाती, आग उगलती जेठ महीने की दोपहरी हमारे किशोरावस्था से ले कर जवानी की ओर जाते रास्ते के समय हुआ करती थी. गांव में तब बिजली नहीं हुआ करती थी. तब बूढ़े बरगद की छाया में ठंडापन रहा करता था. बड़ेबुजुर्ग कोई चौपड़, कोई ताश खेलते हुए दोपहर वहीं बिताया करते थे.
उस बूढ़े बरगद के बगल में ही हमारा आम का बगीचा था, जो अभी भी है. जेठ महीने की तपिश आग उगलती है यह तो आप सभी जानते हैं. जवानी बड़ी अलबेली होती है, आप यह भी जानते हैं, क्योंकि इस मंजर से सभी गुजरते हैं. किशोरावस्था से जवानी की ओर बढ़ते कदम कब लड़खड़ा जाएं, कोई नहीं जानता. इस उम्र में जो संभल गया, वह पूरे जीवन संभल कर सुखमय जीवन बिताता है और जो लड़खड़ा गया, गिर गया, वह फिर संभल नहीं पाता, अपनी पूरी जिंदगी नरक जैसी बना डालता है.

हमारे ऊपर उन बुजुर्गों का साया था, जिसे मातापिता, दादीदादा कहते हैं. गांव के बड़ेबुजुर्गों का उपदेश भी हम उस बूढ़े बरगद के नीचे ध्यान से सुना करते थे. हम हमेशा पिता से डर कर कभी रास्ते से भटके नहीं थे. तब साइकिल या पैदल चल कर नातेरिश्तेदारों के यहां लोग आयाजाया करते थे. आम, जो आगे पकना शुरू करते थे, वे आधे जेठ से अपने रंग बदलने शुरू कर दिया करते थे. हम अपने हमजोली के साथ सुबहशाम बगीचे में, दोपहर बुजुर्गों के संरक्षण में बूढ़े बरगद के नीचे ही रहते थे. हम एक अनुशासन में रहते थे. वैसे भी स्कूल में जेठ के महीने में एक महीने की छुट्टी रहती थी. स्कूल में मास्टर पिता से भी ज्यादा खयाल रखते थे, खासकर पढ़ने वाले बालकबालिकाओं को, जो उन को सम्मान देते थे, उन का तो वे बहुत ही ध्यान रखते थे.

एक दिन एक अधेड़ महिला, एक पुरुष के साथ आईं, साथ में उन के साथ एक किशोरी थी, जो जवानी की दहलीज पर पांव रखने ही वाली थी, ठीक हमारी ही तरह. वह हम से वही सालछह महीने छोटी रही होगी.
हमारे बगीचे में कर वे लोग सुस्ताने लगे थे. आकर्षण स्वाभाविक था, खासकर उस ओर जिस ओर एक सुंदरता का खजाना लिए, सुंदरता की मूर्ति सी, अल्हड़ रूपवती कन्या सामने हो. मैं भी कुछ कम नहीं था. गबरू जवान, किशोरावस्था से जवानी की दहलीज की ओर बस दो कदम में ही पहुंचने वाला था. शायद कनखियों से निहार रही होती वह बाला भी आकर्षित थी. मानमर्यादा में बंधी, बालिका शर्मीली लगी, जिस के ?ाले बड़े दांतों से थोड़ी सी मुसकराहट से बिजली सी कौंध जाती थी.

उस के दांत मोती की तरह सफेद ऐसे लगते थे जैसे किसी कुशल कारीगर ने उसे उस के मुंह में तराश कर फिट कर दिए हों. उस के होंठों की लालिमा पके हुए कुंदरू की तरह लाल थी. वह शर्मीले स्वभाव की लगती थी. जब वह किसी बात पर शरमाती, तो उस के लाललाल गाल इतने लाल, सुरमई हो जाते थे, जैसे रति के गालों में उस के प्रेमी पति कामदेव ने केसर मल दिया हो. उस के गालों की सुंदरता ऐसी थी, जैसे फगुआ खेलते समय लाल गुलाब उस के गालों में मल दिया गया हो. उस की उठी हुई नाक से मेरी आंखें हटने का नाम नहीं ले रही थीं. मैं भी मर्यादा में रह कर ही उसे देख कर हैरान था कि क्यों उसे देख कर मन ही नहीं भरता है. सहसा उस ने तिरछी नजरों से मु? देखा, हालांकि वह बड़ी चतुराई से सब की नजरें बचा कर मेरी ओर देख रही थी, फिर भी मेरी और उस की आंखें चार हो गई थीं.

अरे वाह, क्या गजब की आंखों में सागर सी गहराई थी. मेरे गोलखा आम की सी फांकें थीं उस की आंखें, गजब का आकर्षण. ऐसा तीर उस की कजरारी, बड़ीबड़ी आंखों से निकला, जो सीधे मेरे दिल के अंदर एक अमिट घाव करता चला गया था. उस के बालों में बंधी चोटी उस के उठे हुए कूल्हों को बारबार सहलाती सी लग रही थी. कोई साज, कोई सिंगार फिर भी गजब का आकर्षण, कुदरती खूबसूरती जो सीधे मेरे दिल में उतरती चली गई थी. उस के अभी हाल के ही उठे लगते कठोर उभार किसी को भी भटका सकते थे. मेरा मन उस से बात करने का होता था. उस के पिता मेरे पिताजी से बात कर रहे थे, पर मैं उस बातचीत को सुनने की कोशिश में नहीं था. मैं तो किसी बहाने, किसी तरह से उस से बात करने के लिए उतावला था.

तभी उस की मां ने मु? से कहा, ‘‘दादू, आम तो तुम्हारे फले हैं, पकते तो अभी नहीं होंगे.’’ मैं ने ?ाटपट कहा, ‘‘आइए, जरा देखते हैं. हमारे दारानगर में शायद पके मीठेमीठे आम मिल जाएं. कुछ कच्चे बढि़या आम लेते जाइएगा आप, अचार रखने के लिए.’’ उस की मां ने कहा, ‘‘नहीं बेटा, हम लोग रामपुर से निमंत्रण कर के आए हैं, थके हुए हैं कौन लाद कर ले जाएगा. हम वैसे भी 3 दिन से ढंग से सो तक नहीं पाए हैं.’’ मैं ने ?ाट से कहा, ‘‘मांजी, आप चलिए . आज हमारे घर में रह कर फिर कल चले जाना. अभी वैसे भी 10 किलोमीटर बाद सड़क मिलेगी आप को.’’ उस की मां ने ?ाटपट मेरे गालों पर प्यार से हाथ फेरा, जैसे मेरी अम्मां फेरा करती थीं. मु? बहुत अच्छा लगा, अपनेपन सा महसूस हुआ.

उस की मां ने बड़े प्यार से कहा, ‘‘फिर कभी आऊंगी तो जरूर चलूंगी, सालों से तुम्हारी अम्मां से नहीं मिली हूं, जब तुम छोटे से थे, तब से. बहुत दिन हुए घर से निकले हुए, इस के दादादादी परेशान होंगे.
4 दिन बाद फिर मेरे मायके में शादी है, वहां भी जाना जरूरी है. गरमी में ही शादीब्याह में घूम लेते हैं वरना सालभर घर से कहां निकलना होता है.’’ मु? आभास हो रहा था कि ये लोग मेरे अम्माबापू के करीबी हैं. मैं सोच ही रहा था कि उस के पिता ने कहा, ‘‘चली जाओ, बिटिया को भी दिखा दो. इसे तो पके आम बहुत पसंद हैं. कुछ कच्चे बढि़या आम लेते चलेंगे. देखो बेटा, अपने बाप की तरह से नहीं बांध देना, अब बो? लादने का माद्दा नहीं रहा.’’ मैं सोच रहा था शायद उस का नाम लेंगे जिस से नाम जानने का मौका मिलेगा, जो नहीं मिला था. तो क्या हुआ, मेरे मन की मुराद पूरी हो गई थी.


मैं उन को लिवा कर अपने दारानगर नाम वाले आम के पेड़ के पास गया. वहां कुछ अधपके, तोता के काटने से गिरे आम पड़े थे. उसे उस की मां ने आम उठा कर दिया था. उस ने हंसते हुए पूछा था, ‘‘मम्मी, इस आम को दारानगर क्यों कहते हैं?’’ मैं ने हंसते हुए उस को बताया था, क्योंकि उस के बोलते हुए ऐसा लग रहा था जैसे शब्दों में शहद घुला हो. कितनी मीठी, प्यारी जबान है इस की. काश, इस का साथ जीवनभर के लिए हो सकता. यह सोचते हुए मैं ने कहा, ‘‘असल में मेरे दादाजी दारानगर नाम की जगह पर गए थे, जहां से इस आम का फल ले कर आए थे. यहां लगा कर, इस का नाम याद के लिए दारानगर रख दिया था, इसलिए इस का नाम दारानगर पूरा गांव जानता है.’’ वह आम खाते समय बहुत ही अच्छी, सुंदर लग रही थी. मेरा मन करता था कि उस से दोस्ती करूं. कुछ बोलूं, बतियाऊं. मैं अपने संकोची स्वभाव, संस्कारवश कुछ भी नहीं कह पाया था.

मैं ने उन के लिए अच्छेअच्छे आम तोड़ दिए थे. दिल तो कहता था कि समय यहीं ठहर जाए, बस यों ही वह मेरे करीब रहे. समय से मैं क्या सभी हारे हैं, समय ही हमारे बचपन को छीन कर भाग लिया था, अब हम क्याक्या सोचने वाली उम्र में कर, कितनी ऊंचाई पर उड़ने की सोच रहे हैं. अगर अम्मांबापू, दादादादी, गांव के बड़ेबुजुर्ग नहीं होते, तो हम किस दिशा में होते, पता नहीं. तभी उस की अम्मां कर मेरे सिर पर हाथ रख कर बालों को सहलाने लगी थीं. मैं चुपचाप खड़ा था. कहना तो बहुत चाहता था, पर कह नहीं पा रहा था. तभी उस की अम्मां ने प्यार से कहा, ‘‘बेटा, अच्छे से पढ़ाईलिखाई करना, अब हम चलेंगे, नहीं तो घर पहुंचने में रात हो जाएगी.’’ बिना कुछ कहे किसी मशीन सा मैं उन के पीछेपीछे चल दिया था. मैं ने देखा, मेरे बापू उस के बापू के साथ घुलमिल कर बातें कर रहे थे.

उन के पास पहुंच कर उस चंचल, चंद्रमुखी ने अपने बापू से कहा था, ‘‘बापू, अम्मां कहती हैं अब चलेंदेर करेंगे तो रात हो जाएगी.’’ कितनी प्यारी, कोयल सी मीठी बातें जो मेरे दिल में सीधे उतरती चली गई थीं. मैं चुपचाप खड़ा रहा. ऐसा लगता था, काश वह कुछ देर रुक जाती. mवे लोग मेरे बापू के पैर छू कर फिर चल दिए थे. मैं ने बिना पिता की आज्ञा के उन के पैर नहीं छुए थे, जबकि मन श्रद्धा से भरा हुआ था. वे तीनों जा रहे थे. मैं एक अचल मूर्ति बन कर खड़ा उन को जाते देख रहा था. बापू थोड़ी देर में वहां से घर की ओर चले गए थे, यह कहते हुए, ‘‘कुछ देर रुक कर चले आना, रात नहीं करना.’’ मैं उन को देखते हुए वहीं खड़ा था. बहुत दूर जाने के बाद उस लड़की ने मुड़ कर देखा था. उस के चेहरे के भाव क्या थे, दूर हो जाने की वजह से सम? पाना मुश्किल था. हां, उस का मुड़ कर देखना यह तो कह ही रहा था कि उसे भी कुछकुछ हुआ था.

उन के जाने के बाद ऐसा कोई दिन, ऐसी कोई रात नहीं होती थी, जो वह याद नहीं आती थी.
3 साल में मेरी पढ़ाई पूरी हो गई थी. सरकारी नौकरी बापू ने मु? नहीं करने दी. उन का कहना था कि एक लड़का है, हम महीने में मजदूरों को बहुत मजदूरी देते हैं. कहीं नहीं जाना यहीं हमारे पास, हमारे साथ रहना है. मेरी शादी बापू ने पक्की कर दी थी. अम्मांबापू आपस में बतियाते थे. मेरी हिम्मत कहां कि पूछ सकता. हां, खुशी मु? भी थी, फिर भी एक कांटा, एक टीस दिल में चुभ रही थी कि काश, वह मेरी पत्नी होती. समय आया, शादी हुई, फेरे हुए. मैं ने उसे देखा उस ने मु? देखा. हां, कन्यादान देने वाले अंकल ऐसे लग रहे थे, जैसे इन को कहीं देखा था. सुहागरात थी, सेज सजी थी, पर अब की तरह नहीं, वही साधारण नए गद्दारजाई में. वह वहां पहले से मौजूद थी. मैं अंदर गया, कच्चे मकान में लकड़ी के दरवाजे थे, लकड़ी का हटका बंद कर दिया था मैं ने.

दिल धकधक कर रहा था. मैं ने हिम्मत जुटाई, उस के विरोध के बावजूद मैं ने घूंघट हटाया.
मैं अपने सामने उसे देखते ही बल्लियों उछलने लगा था. यह तो शायद वही थी. उस ने धीरे से मुसकरा
कर धीमी, मीठी सी आवाज में कहा, ‘‘क्या हुआ?’’ मैं जैसे सोते से जाग गया, मन की मुराद पा गया था. मैं ने कहा, ‘‘तुम…’’ उस ने कहा, ‘‘हां, मैंआप नहीं चाहते थे क्या? मेरे अम्मांबापू ने शायद आप को उसी दिन पसंद कर लिया था. उन की बात भी हो गई थी. मैं ने भी तो शादी के समय चुपके से देखा, तो…’’
‘‘तो क्या, जरा बताओमैं तो उसी दिन से सोचता था कि तुम ही मेरी पत्नी बनो,’’ मैं ने अपनी बांहों में उसे समेटते हुए कहा था. वह शरमा गई थी. उस ने एक अटल विश्वास के साथ अपनेआप को मेरे हवाले कर दिया था. हम ठीक उसी समय से दो जिस्म एक जान हो गए थे.

हमारे सम? में गया था कि अम्मांबापू जो भी करते हैं, बहुत अच्छा करते हैं. मातापिता सदा अपने बच्चों की खुशी, बच्चों की भलाई करते हैं. अपने बच्चों के लिए ही पूरी जिंदगी लगा देते हैं. वह पहली मुलाकात, जिंदगीभर का साथ बन जाएगी मु? तो उम्मीद नहीं थी. अम्मांबापू ने जो सौगात दी थी, वह शब्दों में नहीं लिखी जा सकती, शब्दों में नहीं कही जा सकती. वह पहली मुलाकात हमारे जीतेजागते, चलतेफिरते, बोलतेडांटते जैसे कोई वरदान थी.             

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