Editorial: मोदी सरकार का मैसेज – वोट का हक भी छीना जा सकता है

Editorial: बिहार में स्पैशल इंटैंसिव रिवीजन (एसआईआर) का मतलब चुनाव सूचियों से विदेशियों को निकालना नहीं है, बल्कि यह जताने के लिए है कि बिहार के या देश के दूसरे राज्यों के मतदाताओं को मालूम रहे कि वोट का हक तो मोदी सरकार का दिया हुआ है, कभी भी वापस लिया जा सकता है.

भारतीय जनता पार्टी आम जनता को यह अहसास कराना चाहती है कि वोट का हक कोई संवैधानिक नहीं है, यह राशन की तरह, मुफ्त बस सेवा की तरह, सरकारी नौकरी की तरह, शौचालय के लिए अनुदान की तरह, सरकारी स्कूल में पढ़ाई की तरह, सरकारी अस्पताल में इलाज की तरह का हक है जो 2014 के बाद दिया गया है और मोदी सरकार चुनाव आयोग के जरीए जब चाहे वापस ले सकती है.

चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अगस्त में हुई प्रैस कौंफ्रैंस में यही कई बार दोहराया और सुप्रीम कोर्ट में बारबार कहा कि कानून से यह हक मिला है और यह कानून मोदी सरकार जब चाहे जैसे चाहे बदल सकती है.

सदियों से देश का गरीब, शूद्र, अछूत, सवर्णों की औरतें उस सामाजिक कानून के कड़े पहरे में रहे जो पंडितों ने अपने लाभ के लिए बनाए और थोपे. इस से पुजारियों, सरकारी आदमियों और सेठोंको तो जम कर फायदा हुआ, पर आम आदमी हमेशा भूखानंगा रहा. बिहार में तो हाल ज्यादा ही बुरा रहा क्योंकि वहां जाति के सहारे धर्म का जहर गंगा में बुरी तरह घुला हुआ है जिस का पानी हर नदीनाले और कुएं में पहुंचा हुआ है.

वोट के हक ने इस जहरीले पानी को फिल्टर करना शुरू किया था पर बिहार सब से अलग अपवाद रहा जहां वोट का हक आम लोगों को जयप्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर के बावजूद पूरी तरह मिल नहीं पाया. इस की एक वजह शायद यह भी थी कि 1757 से 1857 तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने बड़ी गिनती में बिहार के ब्राह्मणों को सेना में भरती किया था और उन्हें अपने ही लोगों को बंदूकों से मारने की ट्रेनिंग दी थी. उस से पहले ब्राह्मण खुद हथियार न उठा कर क्षत्रियों या ऊंचे शूद्रों को इस्तेमाल किया करते थे.

अंगरेजों की फौजों से रिटायर हो कर आए लोगों ने गांवों में अंगरेजी रोबदार वाला राज बिना सरकार के थोप दिया जिसे 1950 के संविधान ने छीना था. उस के बाद जो जमीन संघर्ष चला और आज चल रहा है उस में गरीबों के पास बिहार छोड़ कर भागने के लायक कुछ उपाय नहीं बचा था.

चुनाव आयोग अब इस भगौड़ेपन को फिर से तेज करना चाह रहा है और वोट का हक आम अनपढ़ व अछूतों, शूद्रों, सवर्ण व गैर सवर्ण औरतों से छीनने में मंदिर सरकार को सौंपने का काम कर रहा है. जहां एक बार टीएन शेषन ने हरेक को, चाहे कहीं रह रहा हो, वोट का हक दिया था. ज्ञानेश कुमार इसे छीन कर अपनी ‘महान कृपा’ पर ‘प्रसाद’ की तरह बांट रहे हैं. अफसोस यह है कि सुप्रीम कोर्ट इस चोरी पर फिक्र नहीं करता दिख रहा और सिवा राहुल गांधी के कांग्रेस या इंडिया ब्लौक वाले भी इस डर को नहीं समझ रहे.

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यह ठीक है कि हमारे गांवों और कसबों में ही नहीं छोटेबड़े शहरों में किसी भी तरह की गाडि़यां चलाने के नियम कोई मानता नहीं और जो जितना गांव से नया ड्राइवर हो वह उतनी मनमानी करता है पर इस का मतलब यह नहीं है कि पुलिस चालान पर चालान करती रहे. इस समय इलैक्ट्रोनिक चालान ही देश में 34,000 करोड़ रुपए के बकाया हैं जो ज्यादातर सीसीटीवी की फुटेज से किए गए थे.

गांवों की जिंदगी आज भी सीधी है. लोग अभी भी बैलगाड़ी के युग से उबरे नहीं हैं जिस में टक्कर लगे तो कुछ खरोंचें ही आती थीं. जब से पैट्रोलडीजल से चलने वाली गाडि़यां, ट्रक, बसें, ट्रैक्टर और भारी मशीनरी आई है, बैलगाड़ी के नियम नहीं चलते. यह समझाना गांवों के अधपढ़ों को मुश्किल है.

गांव की गली में बीच में कहीं भी बैलगाड़ी खड़ी कर दो कोई कुछ नहीं कहेगा, चलती सड़क पर जहां हर मिनट में 10-20 गाडि़यां गुजर रही हैं, किनारे खड़ी गाडि़यां भी आफत हैं. हर साल छोटी पड़ रही सड़कों पर 2-4 मिनट के लिए गाड़ी किनारे खड़ी करना ट्रैफिक जाम कर सकता है.

इसी तरह बैलगाड़ी की स्पीड बढ़ाना चलाने वाले के हाथ में नहीं, बैल के पैरों में है. लेकिन यही चलाने वाला लाइसैंस को किसी तरह हासिल कर के शहर में गाड़ी चलाने लगता है तो स्पीड का मजा आने लगता है. स्पीड अच्छी बात है क्योंकि तभी तो गाड़ी में ताकत है. पर क्या सड़क उस लायक है? जहां कोई साइकिल वाला या राहगीर बिना देखे सड़क पार करना पैदाइशी हक मानता हो वहां बैलगाड़ी से कोई नुकसान चाहे नहीं हो पर गाड़ी से वह जानलेवा हो सकता है.

34,000 करोड़ के चालान असल में गाडि़यों के लिए आफत हैं क्योंकि बहुत से मामलों में इन का भुगतान तब करना पड़ता है जब गाड़ी बेचनी हो. आज चालानों के तार जुड़े हैं और गाड़ी बेचते समय हजारों रुपए का बिल थमा दिया जाता है. गाड़ी मालिक को पता चलता है कि 10-10 साल पुराने चालान बकाया हैं जो देने पड़ेंगे. बहुत सी पुरानी गाडि़यों की कीमत से ज्यादा चालान ही होते हैं.

कमी उस सरकार में है जो न ड्राइवरों को ट्रेनिंग दे पाती है, न सड़कों को मैनेज कर सकती है. सड़कों के रखरखाव में चूक होने पर पुलिस और कौर्पोरेशनों पर भी उसी तरह चालान ठोंके जाने चाहिए जैसे ड्राइवरों और वाहनों पर थोपे जाते हैं. सड़क के किनारे दुकानों को छूट देने, सड़क में गड्ढे होने पर, सड़कों

पर सही निशान न होने के चालान पुलिस और सड़क अफसरों पर होने चाहिए.

अगर पुलिस और सड़क अफसरों के चालान भी चालानों में शामिल कर लिए जाएं तो लाखोंकरोड़ के हो जाएंगे क्योंकि देश की कोई 5 मील की सड़क ठीक नहीं है. ड्राइवर गलत हैं, माना, पर पुलिस और सड़कों के अफसर कौन से दूध के धुले हैं. Editorial

Bihar Elections: बिहार में वोट का हक छीनने की जुर्रत

Bihar Elections: चुनाव आयोग ने कहा है कि वोटर लिस्ट में कोई गैर भारतीय नहीं रहेगा. वोटर लिस्ट की जांच का जो मौडल बिहार विधानसभा में लागू किया गया है, वह दूसरे राज्यों में भी लागू होगा. जैसेजैसे वहां पर विधानसभा चुनाव होंगे, वैसेवैसे उस राज्य में वोटर लिस्ट की जांच होगी.

इस तरह से समझें तो अगला नंबर असम और पश्चिम बंगाल का है. इस के बाद उत्तर प्रदेश की भी बारी है. साल 2026 में जिन राज्यों में चुनाव होंगे, वहां यह जांच होगी, जिस में केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी भी शामिल होंगे.

दरअसल, यह एक पौराणिक साजिश है, जिस के तहत बड़ी जनसंख्या को नागरिकता ही न देने का काम किया जा रहा है. जिस हिंदू राष्ट्र की बात हो रही है, वह पौराणिक व्यवस्था को बनाए रखना चाहता है, जिस के अनुसार सिर्फ सवर्णों को ही पूजापाठ, धन, मकान, सत्ता का हक है. बाकी सब तो दस्यु या पशु हैं.

रामरावण युद्ध में दिखाया गया है कि जब युद्ध खत्म हो गया तो राम तो राजा बन गए, जबकि उन के साथ युद्ध करने वालों को वापस जंगलों और पहाड़ों पर भेज दिया गया.

बिहार में वोटर लिस्ट में सुधार के नाम पर पौराणिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए नागरिकता को वर्ण व्यवस्था से जोड़ने की साजिश की जा रही है.

देश में संविधान लागू होने से पहले किस तरह से चुनाव होते थे, किन को वोट देने का हक था, अगर इस को देखें तो साफ पता चलता है कि वोट देने का हक सब को नहीं था. साल 1857 के बाद अंगरेजों ने लोकल सैल्फ गवर्नमैंट पौलिसी कानून बनाया था, जो साल 1884 में पूरी तरह से लागू हो गया था.

साल 1909 में इलैक्शन ऐक्ट पास हुआ. उस के बाद इलैक्शन शुरू हुआ. उस समय वोटर लिस्ट में केवल
50 लोगों के नाम होते थे. ये वही लोग थे जो इलाके के मुखिया, जमींदार, बड़े साहूकार, बड़े काश्तकार यानी कि उस वक्त जो टैक्स के रूप में लगान जमा करते थे वही लोग चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने के हकदार थे. वही लोग वोटर हुआ करते थे और उन्हीं लोगों में से चुनाव लड़ने वाले होते थे. उन्हीं में से लोग चुनाव जीत कर इलाके की तरक्की का काम करते थे.

50 लोगों की वोटर लिस्ट में से केवल 4 लोगों को चुनाव लड़ाते थे. ये वे लोग होते थे जो उस समय 100 रुपए से ज्यादा का आयकर या मालगुजारी भरते थे. मुश्किल से गांव के मुताबिक 4 या 5 वोट ही होते थे. 4 उम्मीदवार होते थे और 46 वोटर और इन्हीं लोगों में से एक जीत कर लोकल बोर्ड का मुखिया बनता था. वे डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के मैंबर जो राजधानी लखनऊ में बैठा करते थे या फिर दिल्ली जाते थे.

जब देश आजाद हुआ तो यह तय किया गया कि भारत में लोकतंत्र की स्थापना के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को वोट डालने का अधिकार दिया जाएगा. इस से पहले भारत में ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों में भी अमीरों को ही वोट देने का हक था. भारत के संविधान ने यह तय किया कि जो भी बालिग लोग हैं, वे वोट देंगे. उम्र के अलावा कोई बंधन नहीं रखा गया था.

भारत में हुए पहले आम चुनाव में करीब 17 करोड़ लोगों ने हिस्सा लिया था, जिस में 85 फीसदी लोग न तो पढ़ सकते थे और न लिख सकते थे. कुलमिला कर तकरीबन 4500 सीटों के लिए चुनाव हुआ था, जिस में 499 सीटें लोकसभा की थीं.

संविधान को दरकिनार करने की साजिश

बिहार में वोटर लिस्ट के बहाने इस तरह की व्यवस्था को बनाने का काम हो रहा है जहां वोटर लिस्ट में वही लोग होंगे जो पौराणिक व्यवस्था को मानेंगे. जो इस को चुनौती देने वाले होंगे उन के वोट देने के हक को ही खत्म कर दिया जाएगा.

देश को संविधान लागू होने से पहले के कालखंड में ले जाया जा रहा है. नागरिकता को वर्ण व्यवस्था से जोड़ने की साजिश की जा रही है. यह काम केवल बिहार तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश में होगा.

बिहार विधानसभा चुनाव में वोटर लिस्ट विवाद के बाद चुनाव आयोग ने कहा कि वोटर लिस्ट में जांच का काम देश के हर राज्य में किया जाएगा. इस में घरघर जा कर मतदाताओं की पुष्टि की जाएगी. इस के जरीए चुनाव आयोग यह चाहता है कि कोई गैरभारतीय वोटर लिस्ट में न रहे. साल 2029 में लोकसभा चुनाव से पहले सभी राज्यों की वोटर लिस्ट की स्क्रीनिंग पूरी करने की योजना है.

इस को दक्षिणापंथी लोगों की उस मांग से जोड़ कर देखा जा सकता है, जो भारतीय न हो उस को वोट देने का अधिकार न हो. यही मकसद एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का भी था. जनगणना में भी केंद्र सरकार इसी तरह का कोई हेरफेर कर सकती है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव कहते हैं, ‘जातीय जनगणना के आंकड़ों और वोटर लिस्ट के मामले में भाजपा सरकार पर भरोसा नहीं किया जा सकता है.’

बिहार वोटर लिस्ट में जिस तरह से चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं, उस के पहले महाराष्ट्र के चुनाव में वोटर लिस्ट की गड़बड़ी हो चुकी है, जिस से यह साफ दिखने लगा है कि हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए कुछ भी मुमकिन है.

इस को देख कर यह कहा जा सकता है कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव में अगर भाजपा को 400 से ज्यादा सांसद मिल गए होते तो वह कानून बना कर इस तरह के काम करती, जिन्हें अब पिछले दरवाजे से लाने की कोशिश हो रही है.

क्या है वोटर लिस्ट विवाद

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट को अपडेट करने का काम शुरू किया, जिस में नए मतदाताओं के नाम जोड़े जा रहे हैं और जो वोटर नहीं हैं, उन के नाम हटाए जा रहे हैं. इस में सभी मतदाताओं को सत्यापन का एक फोर्म भरना पड़ रहा है, जिस में अपने बारे में कुछ जरूरी जानकारी देनी है.

चुनाव आयोग जो जानकारी मांग रहा है, उस में 2 प्रावधान किए गए हैं, जैसे साल 2003 या उस के बाद पैदा हुए मतदाताओं को अपना जन्म प्रमाणपत्र या मातापिता के वोटर आईडी का एपिक नंबर देना होगा, जबकि साल 2003 से पहले पैदा हुए लोगों को कोई दस्तावेज नहीं देना है.

विवाद की वजह यह है कि आयोग ने सत्यापन के दस्तावेजों में राशनकार्ड और आधारकार्ड को मान्यता नहीं दी है. विपक्ष इस बात से नाराज है. उस का कहना है कि यह गरीब मतदाताओं को मताधिकार से दूर करने की कोशिश है. यह एक तरह से नागरिकता का सत्यापन हो रहा है. नागरिकता के सत्यापन से उस को डर है कि बंगलादेशी घुसपैठियों के नाम वोटर लिस्ट से गायब हो जाएंगे.

मुसलिम मतदाता विपक्ष का सब से बड़ा हथियार है. इस के जरीए हिंदू राष्ट्र बनाने की तैयारी है. विपक्ष की सब से बड़ी चिंता यह है कि बिहार मौडल पूरे देश में ले जाया जाएगा. घुसपैठियों को भले ही देश से न निकाला जा सकता हो पर उन को वोट देने के हक से दूर रखा जा सकता है.

विपक्ष ने पूरी ताकत से इस लड़ाई को लड़ने का फैसला किया. उसे यह डर था कि महाराष्ट्र जैसी वोटर लिस्ट में गड़बड़ी का फायदा बिहार में भी भारतीय जनता पार्टी उठा सकती है, जिस के चलते पटना में कांग्रेस और दूसरे प्रमुख दलों ने रैली की. सड़क के साथसाथ विपक्ष ने कोर्ट में भी लड़ने का काम किया.

सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि चुनाव से ठीक पहले प्रदेश के 7.9 करोड़ मतदाताओं को यह कहना कि वे अपनी पात्रता को सत्यापित करें, यह एक तरह से हजारों वोटरों को मतदान से रोकने की कोशिश है. आधारकार्ड को स्वीकार न करना पूरी तरह से नागरिकता जांच की कवायद है.

आधारकार्ड 12 अंकों की एक पहचान संख्या है, जिसे भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण द्वारा जारी किया
जाता है. यह हर भारतीय की पहचान और उस के निवासस्थान का प्रमाण है. आधारकार्ड की मान्यता बैंकिंग, स्कूल एडमिशन, सरकारी योजनाओं का लाभ लेने से ले कर अस्पतालों में इलाज तक सभी जगहों पर है. वोट देने के समय भी यह पहचानपत्र के रूप में मान्य था.

सवाल उठता है कि जब आधारकार्ड पहचानपत्र के रूप में वोट डालने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, तो वोटर लिस्ट की जांच में इस को क्यों माना नहीं जा रहा है? चुनाव आयोग का कहना है कि वोटर लिस्ट अपडेशन में आधारकार्ड को प्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं है.

कोर्ट और आयोग आमनेसामने

बिहार में वोटर लिस्ट संशोधन विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कई सवाल पूछे. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि आयोग ने मतदाता सूची में संशोधन का जो समय चुना है, वह चिंताजनक है. आधारकार्ड जैसे अहम दस्तावेज को संशोधन प्रक्रिया के सत्यापन से बाहर रखना बहुत ही चिंताजनक है. अगर विशेष सूचना रिपोर्ट का उद्देश्य नागरिकता सत्यापित करना है, तो यह प्रक्रिया इतनी देर से शुरू क्यों हुई? इस को चुनाव से जोड़ कर क्यों देखा जा रहा है?

चुनाव आयोग की ओर से सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने कहा कि मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत संवैधानिक रूप से अनिवार्य है. अनुच्छेद 326 में यह कहा गया है कि केवल भारतीय नागरिकों को ही मतदाता के रूप में नामांकित किया जा सकता है. इसी वजह से मतदाता सूची को दुरुस्त करने के लिए और सभी योग्य नागरिकों को वोट का अधिकार दिलाने के लिए नागरिकता की पुष्टि हो रही है.

चुनाव आयोग ने कहा कि इस से पहले 2003 में यह प्रक्रिया की गई थी. चुनाव आयोग के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिस का मतदाताओं से सीधा संबंध है और अगर मतदाता ही नहीं होंगे, तो हमारा वजूद ही नहीं होगा.

आयोग किसी को भी मतदाता सूची से बाहर करने का न तो इरादा रखता है और न ही कर सकता है, जब तक कि आयोग को कानून के प्रावधानों द्वारा ऐसा करने के लिए बाध्य न किया जाए. हम धर्म, जाति आदि के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकते.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था गैर नागरिकों को मतदाता सूची से बाहर करना केंद्रीय गृह मंत्रालय का विशेषाधिकार है, चुनाव आयोग का नहीं. आयोग क्यों इस मसले पर ध्यान दे रहा है, जबकि यह उस का काम नहीं है.

चुनाव आयोग ने सूची के सत्यापन के लिए जो समय चुना है, वह सही नहीं है. सब से बड़ी चिंता यह है कि आधारकार्ड को सत्यापन के लिए जरूरी दस्तावेजों में शामिल न करना है.

समस्या यह है कि पहले कोर्ट ने ही आधारकार्ड को नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं माना था. जस्टिस एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2018) के केस में सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कहा था कि आधारकार्ड एक खास पहचानपत्र है, लेकिन यह भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं है.

सरकार की ओर से भी यह साफ कहा गया था कि आधारकार्ड को नागरिकता और जन्मतिथि का प्रमाणपत्र नहीं माना जा सकता है. यह सिर्फ और सिर्फ एक शख्स का पहचानपत्र है और उस के निवासस्थान की जानकारी देता है. भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण के अनुसार अगर कोई विदेशी नागरिक 182 दिन तक भारत में लगातार रहता है, तो उस का आधारकार्ड बन सकता है, लेकिन यह सिर्फ पहचानपत्र है, उस की नागरिकता का सुबूत नहीं.

यह बात अब साफ होती नजर आ रही है कि आधारकार्ड नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं माना जा सकता. इस का फायदा उठा कर हिंदू राष्ट्र बनाने वाले उन लोगों को वोट देने के हक से दूर कर रहे हैं, जो गरीब हैं, जिन की कोई सुनने वाला नहीं है. इस से केवल वही लोग वोट दे सकें जो वोटर लिस्ट में दर्ज हैं. जिन लोगों से विरोध का डर है, उन को इस बहाने वोटर लिस्ट से बाहर किया जा सकता है. Bihar Elections

Editorial: बिहार में हार का डर – वोटर लिस्ट से नाम काटने की राजनीति?

Editorial: बिहार में हार से बचने के लिए भारतीय जनता पार्टी अब खुल्लमखुल्ला चुनाव आयोग को शिखंडी बना कर नेताओं और पार्टियों को नहीं वोटरों को तीरों का निशाना बना रही है. चुनाव आयोग मतदाता सूचियों का रिवीजन कर रहा है और इस बहाने हर उस जने को वोटर लिस्ट से हटाया जा रहा है जिस के पास जन्म प्रमाणपत्र, नागरिकता प्रमाणपत्र, मातापिता दोनों के प्रमाणपत्र जैसे डौक्यूमैंट न हों.

बिहार जैसे राज्य में जहां हर साल बाढ़ में सैकड़ों गांवों में पानी भर जाता है, लोग अपनी जान बचाने के लिए भागते हैं, डौक्यूमैंट नहीं. जब गांव की फूस की झोंपडि़यों में आग लगती है तो कौन सा डौक्यूमैंट बचता है, इस की चिंता चुनाव आयोग को नहीं. बिहार से बाहर जाने वाले और फिर लौटने वाले लाखों लोग आतेजाते अपने डौक्यूमैंट खो बैठते हैं.

बिहार के सीधे, आधे पढ़े लोग भी अब तक वोट देते रहे थे क्योंकि कुछ चुनाव आयुक्तों ने पहले सही कदम उठाया था कि वे बेघरों को भी वोट डालने का मौका देंगे चाहे उन के पास डौक्यूमैंट हो या न हो. अब भारतीय जनता पार्टी के कठपुतले चुनाव आयोग को आदेश है कि बिहार में ऐसे लोगों की छंटनी कर दी जाए जिन के पास प्रमाणपत्र नहीं है.

यह काम अमेरिका में हो रहा है जहां गोरों के राजा डोनाल्ड ट्रंप हर ब्राउन, ब्लैक को वोट देने के हक से निकालने के लिए ऐसा ही काम कर रहे हैं और लाखों को जेलों में बंद कर रहे हैं. भारत में जेलों में बंद करने का काम बाद में शुरू होगा, जब चुनाव आयोग कटी हुई सूचियां जारी कर देगा. तब एक बड़े परिवार के कुछ लोग नागरिक माने जाएंगे, कुछ को घुसपैठिया करार कर दिया जाएगा. यह पक्का है कि नीतीश कुमार इस मामले में ज्यादा नहीं बोल पाएंगे क्योंकि उन्हें तो कुरसी प्यारी है और वे अपने राज के अंतिम महीनों में इस छोटी सी बात के लिए, जिस का फर्क लाखों पर पड़ेगा, भारतीय जनता पार्टी से बैर मोल नहीं ले सकते.

पप्पू यादव या कांग्रेस ज्यादा न बोले इस के लिए दोनों के खिलाफ मुकदमे किए हुए हैं, बाकी कई दल तो चुप्पे रह गए हैं. सुप्रीम कोर्ट तक मामला जातेजाते चुनाव हो चुके होंगे क्योंकि चुनाव आयोग पक्का है कि सूचियां चुनाव की तारीखों का ऐलान करने के कुछ दिन पहले ही जारी करेगा.

लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि भाजपा की जीत की गारंटी है. जिन का वोट कटेगा उन के साथीरिश्तेदार भाजपा और चुनाव आयोग के गठबंधन को समझ जाएंगे. वे जानते हैं कि वोट का हक छीनना 1975 वाली इमर्जैंसी लगाना है. जैसे उन्होंने इंदिरा गांधी के मनसूबे ढहाए थे, वह काम फिर हो तो बड़ी बात नहीं.

वोट का हक बहुत बड़ा हक है. बाकी सारे हक इसी से निकलते हैं. उसे हाथ से फिसलने देने का मतलब है पौराणिक युग की गुलामी में चले जाना जो मुगलों और अंगरेजों की गुलामी से भी ज्यादा बदतर थी. जमींदारों ने उसी गुलामी को मराठा युग में इस्तेमाल किया था. आज वही न दोहराया जाए.

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कर्ज दे कर पैसा कमाना इस देश के व्यापारियों का मेन काम रहा है. गांवगांव, कसबेकसबे में जो भी व्यापारी थोड़ा पैसा कमा रहा है वह जरूर किसी न किसी तरह सूद पर पैसे देने वाला है. इन छोटेछोटे व्यापारियों, सूदखोरों और कहीं छोटे कारखानेदारों का मुनाफा सिर्फ ब्याज से होता था, क्योंकि ये दिए गए पैसे पर 10 फीसदी नहीं, 30 से 100 फीसदी तक का ब्याज लेते थे.

इन का पहला काम होता था कि गरीबों को इस हालत में लाओ कि वे कर्ज लेने को दौड़ें. इस में पंडितों और मौलवियों का बड़ा साथ था और इसीलिए ये व्यापारी मंदिरमसजिद खूब बनवाते थे. मंदिरों में तो पूजापाठ, कीर्तन, भंडारे, तीर्थयात्रा, प्रवचन, महापंडितों के दौरे चलाए जाते ताकि गरीब बेवकूफ इस जन्म और अगले जन्म को सुधारने के चक्कर में कामधाम छोड़ कर पैसा गांव से लगा कर धर्म की दुकान पर गंवा आए.

जब जेब खाली हो जाए और बीमारी, शादी, बच्चा, काम छूटने से नुकसान होने लगे तो महाजनों के पास जाए. सदियों से यह काम बड़ी शान से चल रहा है. अब इस में सरकारों की शह पा कर और नई टैक्नोलौजी आने से यह लूट छोटे महाजनों से खिसक कर टाई वालों की कंपनियों में पहुंच गई है.

माइक्रोफाइनैंस करने वाली कंपनियों ने देशभर में 4.2 करोड़ लोगों को कर्ज दे रखा है. पिछले साल 2023-24 में 60 हजार करोड़ रुपए कर्ज में दिए गए जिन पर औसतन 25 से 30 फीसदी ब्याज वसूला गया. याद रखें कि इन के पास पैसा जमा कराओ तो ये 9-10 फीसदी भी ब्याज नहीं देते.

अगर मासिक किस्त में देर हो जाए तो ब्याज पर ब्याज और जुर्माना लगने लगता है. माइक्रोफाइनैंस कंपनियां ऐसे ही ग्राहक फंसाती हैं जो समय पर किस्त न भर पाएं. इन के गांवगांव में फैले एजेंट ‘लोन ही लोन’ के परचे बांटते रहते हैं ताकि थोड़ा कमाने वाला बचत करने की जगह कर्ज ले, तीर्थ पर जाए, घर में भोज कराए, मंदिर में बड़ा दान दे, बीमारी में लगाए, शादी में लगाए और फिर किस्त न दे पाए. 60 हजार करोड़ का एक साल

में कर्ज देने वाली कंपनियों का बाजार में इतना ही पैसा उन हाथों में फंसा हुआ है जिन्होंने 90 दिनों तक किस्त नहीं चुकाई.

माइक्रोफाइनैंस कंपनियां अब भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार से मिन्नतें कर रही हैं कि इन्होंने जिन बैंकों से कम ब्याज पर पैसा ले रखा है वह सरकार माफ कर दे. यह हो भी जाएगा क्योंकि जब अरबों का बड़े बैंकों से कर्जा लिए माइक्रोफाइनैंस कंपनी बंद हो जाएगी तो बड़े बैंक माइक्रोफाइनैंस कंपनी को दिए कर्ज को भूल जाएंगे.

इस दौरान जिस ने कर्ज लिया वह मूल से ज्यादा दे चुका होगा पर ब्याज इतना ज्यादा हो चुका होगा कि फिर भी बहुत बकाया रह जाएगा. लोन कलैक्टर गुंडे भी इन माइक्रोफाइनैंस कंपनियों ने पाल रखे हैं जो मारपीट पर उतर आते हैं. अमीर और गरीब सब इस की मार खा रहे हैं. कर्ज लो, पछताओ की बात कोई न कहता है और न कोई सुनना चाहता है. Editorial

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