Crime Story : सरप्राइज गिफ्ट -अवैद्य संबंधों के शक में बीवी की हत्या

Crime Story.19 जून, 2017 की शाम मनोज बेहद खुश था. लेकिन उस के दोस्त अनुज को उस की यह बेवजह की खुशी समझ में नहीं आ रही थी. जब रहा न गया तो अनुज ने पूछ ही लिया, ‘‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना क्यों हो रहा है, कुछ बताएगा भी या यूं ही बकवास करता रहेगा.’’

‘‘बताऊंगा, पर ऐसे नहीं. पहले मिल कर थोड़ा जश्न मनाते हैं. फिर अपनी खुशी का राज जाहिर करूंगा. ये ले पैसे और औफिसर्स चौइस की बोतल, तले हुए काजू, नमकीन और सिगरेट का पैकेट ले आ. सोच ले, आज मैं तुझे अपनी आजादी की पार्टी दे रहा हूं.’’ कह कर उस ने पर्स से 2 हजार रुपए का नोट निकाल कर अनुज को दे दिया.

अनुज की समझ में तो कुछ नहीं आया, लेकिन उस ने मनोज के हाथों से 2 हजार रुपए का नोट ले कर जेब में रखा और शराब के ठेके की ओर चला गया. कुछ देर बाद वह सारा सामान ले आया तो दोनों कमरे में पीने बैठ गए. मनोज ने 2 पैग बनाए और जाम से जाम टकराने के बाद दोनों शराब पीने लगे. जब मनोज पर नशे का सुरूर चढ़ा तो उस ने कहना शुरू किया, ‘‘अनुज, जानते हो मैं आज इतना खुश क्यों हूं.’’

‘‘जब तक तू बताएगा नहीं, तब तक मैं कैसे जानूंगा कि तेरे मन में किस बात को ले कर लड्डू फूट रहे हैं.’’ नशे की झोंक में अनुज उस की ओर देख कर बोला.

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‘‘बेटे, आज मैं आजाद हो गया हूं.’’

‘‘पहेलियां न बुझा कर सीधी तरह बता, तेरी इस खुशी का राज क्या है?’’ अनुज ने चौथा पैग पीते हुए उत्सुकता से पूछा.

‘‘मैं ने तेरी भाभी को खुदागंज रवाना कर दिया है. मुझे उस से हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया है.’’

मनोज की बात सुन कर अनुज को विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जब उस ने पूरी बात बताई तो उसे लगा कि हो न हो मनोज ने कोमल की हत्या कर दी है. अनुज का सारा नशा काफूर हो गया. थोड़ी देर तक वह मनोज की बात सुनता रहा, फिर पीना छोड़ कर उठ खड़ा हुआ और घर में किसी जरूरी काम का बहाना कर के वहां से चला गया.

बाहर आ कर वह कुछ दोस्तों से मिला और मनोज की बात उन्हें बताई. सब ने उसे यही सलाह दी कि इस बात की सूचना पुलिस को दे देनी चाहिए, क्योंकि बाद में वह भी पुलिसिया लफड़े में फंस सकता है. सोचविचार कर उस ने यह सूचना कंझावला थाने की पुलिस को दे दी.

पति द्वारा किसी औरत की हत्या की सूचना मिलते ही कंझावला थाने की पुलिस हरकत में आ गई. जेजे कालोनी सवदा पहुंच कर पुलिस ने मनोज गुजराती को हिरासत में ले लिया. थाने में जब मनोज से पूछताछ शुरू हुई, तब तक उस का नशा कम हो चुका था. पहले तो उस ने एसआई निखिल को बताया कि शराब के नशे में वह यह सब अपने दोस्त पर रौब जमाने के लिए  कह रहा था. लेकिन निखिल का एक करारा थप्पड़ उस के गले पर पड़ा तो उस के होश ठिकाने आ गए.

उस ने बताया कि वह अपनी पत्नी कोमल की हरकतों से बहुत परेशान था. इसलिए उस ने उसे बोंटा पार्क के जंगल में ले जा कर उस की हत्या कर दी है. बोंटा पार्क दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास है. कंझावला थाने से वह काफी दूर था. तब तक काफी रात हो चुकी थी, इसलिए अगली सुबह निखिल कांस्टेबल महेश और नरेश को साथ ले कर उत्तरी दिल्ली के मोरिसनगर थाने पहुंचे और वहां की थानाप्रभारी इंसपेक्टर आरती शर्मा को उन के इलाके के बोंटा पार्क में एक लड़की की हत्या किए जाने की सूचना दी.

17 जून, 2017 को कंझावला पुलिस द्वारा मिली इस सूचना को थाना मौरिसनगर के डीडी नंबर 14 ए में दर्ज करवा कर इंसपेक्टर आरती शर्मा ने अतिरिक्त थानाप्रभारी इंसपेक्टर  वीरेंद्र सिंह को इंसपेक्टर राकेश कुमार, एएसआई बिजेंद्र, हैडकांस्टेबल राजकुमार, सुखवीर, कांस्टेबल श्याम सैनी तथा महिला कांस्टेबल मधु को आरोपी मनोज और कंझावला पुलिस के साथ बोंटा पार्क भेजा.

पुलिस टीम पार्क के गेट नंबर 6 से अंदर दाखिल हुई. अंदर जा कर पुलिस कोमल की लाश की तलाश में जुट गई. मनोज ठीक से उस जगह के बारे में नहीं बता पा रहा था, जहां उस ने अपनी पत्नी कोमल की हत्या कर के उस की लाश छिपाई थी. पुलिस की तलाशी 12 घंटे तक जारी रही, लेकिन कोमल की लाश नहीं मिली. रात घिर आई थी, फिर भी तलाशी चलती रही.

रात के करीब 12 बजे मनोज पुलिस टीम को एक छोटी चट्टान के पास ले कर गया, जहां 22-23 साल की एक लड़की की लाश पड़ी थी. वह गुलाबी रंग का टौप और नीले रंग की जींस पहने थी. लाश की छानबीन करते समय इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह ने देखा कि उस के दाहिने हाथ पर कोमल गुदा हुआ था.

आरोपी मनोज ने लाश की ओर इशारा कर के बताया कि यह उस की पत्नी कोमल की लाश है, जिसे उस ने कल शाम को धोखे से यहां ला कर उस की हत्या कर दी थी. लाश की फोटोग्राफी कराने के बाद उसे पोस्टमार्टम के लिए सब्जीमंडी मोर्चरी भेज दिया गया, साथ ही कोमल के घर वालों को फोन कर के उस की लाश की शिनाख्त के लिए सब्जी मंडी मोर्चरी बुला लिया गया.

17 जून को कोमल की बड़ी बहन गौरी सब्जी मंडी पहुंची,जहां लाश देखने के बाद उस ने उस की पहचान अपनी छोटी बहन और मनोज गुजराती की पत्नी कोमल के रूप में कर दी. कोमल की लाश की शिनाख्त होने के बाद गौरी की तहरीर पर उसी दिन कोमल की हत्या का मामला उस के पति मनोज गुजराती के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत दर्ज कर लिया गया. इस मामले की विवेचना इंसपेक्टर वीरेंद्र सिंह को सौंपी गई. गौरी के बयान तथा मनोज गुजराती के बयानों के बाद 2 साल की लव मैरिज का जो दर्दनाक वाकया सामने आया, वह इस प्रकार था—

कोमल के पिता चमनलाल का परिवार नांगलोई के चंचल पार्क में रहता था. उन के परिवार में पत्नी कमलेश के अलावा 4 बेटियां तथा 2 बेटे थे. इन में कोमल पांचवे नंबर की थी. घर के लोग उसे प्यार से कमली कह कर पुकारते थे. कोमल के बड़े भाई गंगाराम की शादी 8 साल पहले दिव्या से हुई थी. मनोज गुजराती दिव्या का चचेरा भाई था.

मनोज का परिवार कंझावला इलाके के सावदा गांव में रहता था. उस के परिवार में उस के अलावा इस के पिता राजू गुजराती, मां कमलेश तथा एक बहन परवीन थी. घर के बाहरी कमरे में मनोज की परचून की दुकान थी. दुकान अच्छीखासी चलती थी, जिस की वजह से मनोज की जेब हमेशा भरी होती थी. वह शौकीनमिजाज युवक था और हमेशा बनठन कर रहता था. चूंकि दोनों के परिवार आपस में रिश्तेदार थे, इसलिए समय समय पर उन का एकदूसरे के यहां आनाजाना लगा रहता था.

2 साल पहले एक दिन मनोज अपने दोस्तों के साथ मस्ती करने गुरुग्राम के सहारा मौल पहुंचा. वहां उस की नजर एक लड़की पर पड़ी, जो शक्लसूरत से जानीपहचानी लग रही थी. वह कोमल थी. मौडर्न कपड़ों, गहरे मेकअप और फ्लड लाइट की रंगबिरंगी रोशनी में कोमल बहुत ही सुंदर लग रही थी. दरअसल, कोमल वहां एक पब में नौकरी करती थी.

मनोज ने किसी बहाने से कोमल को अपने पास बुलाया तो दोनों ने एकदूसरे को पहचान लिया. बातोंबातों में मनोज ने उस का मोबाइल नंबर ले लिया और जल्द ही उस के घर चंचल पार्क आने का वादा किया. कोमल ने मनोज की खूब आवभगत की और उसे अपने साथ काम करने वाली कुछ सहेलियों से भी मिलवाया.

कोमल के लटकेझटके देख कर मनोज पहली ही नजर में उसे दिल दे बैठा. इधर कोमल भी मनोज के प्रति आकर्षित हो गई. उस दिन मनोज घर लौटा तो उस के दिलोदिमाग में कोमल की मनमोहिनी सूरत बसी हुई थी. वह जल्दी से जल्दी उसे अपनी बना लेना चाहता था.

उस दिन के बाद दोनों एकदूसरे को फोन कर के अपने दिल की बातें शेयर करने लगे. कोमल मनोज को हमेशा मौल में आने वाले हाईफाई लोगों के बारे में तरहतरह के किस्से सुनाती, जो मनोज को बहुत अच्छे लगते. वह कोमल को प्रभावित करने के लिए उसे महंगे तोहफे देने लगा. धीरेधीरे दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. दोनों के घर वाले इस सब से कब तक अनजान रह सकते थे. उन्हें भी उन के प्यार की जानकारी हो गई.

मनोज और कोमल के घर वाले यों तो रिश्तेदार थे, लेकिन पता नहीं क्यों उन्हें यह रिश्ता मंजूर नहीं था. कोमल के पिता चमनलाल को लगता था कि मनोज उन की बेटी को ज्यादा दिनों तक खुश नहीं रख पाएगा. मनोज सावदा गांव में रहता था, जहां के लोगों का रहनसहन पुराने जमाने जैसा था.

उधर मनोज के घर वालों की सोच भी कुछ ऐसी ही थी. जब मनोज और कोमल ने अपनेअपने घरों में अपनी पसंद जाहिर की तो उन्होंने इसे सिरे से नकार दिया. लेकिन प्यार इन बंदिशों को कहां मानता है. वैसे भी दोनों ही अपने पैरों पर खड़े थे. इसलिए 5 जून, 2015 को कोमल ने अपने मम्मीपापा की मर्जी के खिलाफ जा कर तीसहजारी कोर्ट में मनोज से शादी कर ली. शादी के बाद दोनों रघुबीर नगर में किराए का मकान ले कर रहने लगे.

8-10 महीने तो दोनों ने खूब मौजमस्ती की, लेकिन बाद में मनोज को कोमल का सहारा मौल में काम करना बुरा लगने लगा. उस ने कोमल से यह काम छोड़ देने के लिए कहा, पर वह इस के लिए तैयार नहीं थी. उसे मौल में जा कर परफौरमेंस देना और नएनए लोगों से मिल कर हंसनाबोलना अच्छा लगता था. बात आगे बढ़ी तो दोनों के बीच झगड़े शुरू हो गए. पड़ोसियों ने दोनों को समझाया तो कोमल मनोज के घर जेजे कालोनी, सावदा में रहने को तैयार हो गई.

इस के बाद कोमल अपने पति मनोज के साथ सावदा में जा कर रहने लगी. लेकिन घर छोटा होने के कारण उसे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था. मनोज की एक बहन परवीन थी, जिस से उस की कतई नहीं बनती थी. यह देख कर मनोज ने दूसरी जगह किराए पर एक घर ले लिया और दोनों उसी में रहने लगे. कुछ दिनों तक दोनों सुखचैन से रहे. मनोज की जिंदगी में अचानक भूचाल तब आया, जब एक दिन वह कोमल के सूटकेस में रखी उसकी एलबम देख रहा था. एक फोटो में वह एक लड़के के साथ बहुत खुश दिख रही थी.

मनोज ने कोमल को वह फोटो दिखा कर उस लड़के के बारे में पूछा तो कोमल ने बताया कि यह अमित है और उस के साथ सहारा मौल में नौकरी करता था. अमित महज उस का दोस्त है. लेकिन मनोज को कोमल की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उस ने कोमल के जानकारों से अमित के बारे में पूछा तो पता चला कि शादी से पहले अमित कोमल का बौयफ्रैंड था. मनोज को यह जानकारी मिली तो वह परेशान हो गया. कोमल के बारे में यह जानकारी मिलने के बाद मनोज उस से उखड़ाउखड़ा रहने लगा.

कुछ ही दिनों बाद उन के बीच फिर से झगड़े शुरू हो गए. कोमल ने अपने घर में फोन कर के बताया कि मनोज उस से दहेज लाने के लिए दबाव डालता है और मना करने पर उस के साथ मारपिटाई करता है.

एक महीने बाद कोमल मनोज की मारपिटाई से दुखी हो कर अपनी बड़ी बहन किरण के पास रहने के लिए रघुवीरनगर चली गई. मनोज सावदा स्थित अपने घर में अकेला रह गया. एक दिन उसे पता चला कि कोमल फिर से अपने पुराने बौयफ्रैंड अमित से मिलने लगी है. यह जान कर मनोज को चिंता हुई कि कोमल कहीं उस से किनारा न कर ले. यही सोच कर उस ने कोमल के मोबाइल पर बात करने की कोशिश की. कुछ दिन तो कोमल मनोज के फोन को नजरअंदाज करती रही, लेकिन धीरेधीरे दोनों में बातचीत शुरू हो गई.

एक महीना पहले कोमल ने मनोज को बताया कि वह बहन पर बोझ नहीं बनना चाहती, इसलिए उस ने रघुवीरनगर के ही डी ब्लौक में अपने लिए अलग कमरा ले लिया है, जहां रह कर अब वह फिर से जौब पर जाएगी. घर में बैठेबैठे उस का मन नहीं लगता. दूसरे बिना पैसों के जिंदगी भी नहीं चलती. मनोज को उस की यह बात अच्छी नहीं लगी तो उस ने उस के नौकरी करने का विरोध करते हुए वापस घर लौट आने के लिए कहा. इस पर कोमल ने ऐतराज करते हुए मनोज से कहा कि वह उस के साथ गांव में नहीं रहेगी, क्योंकि वह उस के  साथ गालीगलौच करने के साथ मारपीट करता है. ऐसा जीवन वह नहीं जी सकती.

15 जून, 2017 को मनोज अपनी दुकान छोड़ कर कोमल से मिलने उस के घर पहुंचा. मनोज को आया देख कर उस ने उसे और उस के परिवार वालों को बहुत बुराभला कहा. कोमल की बातों से मनोज को लगा कि वह उस के साथ नहीं रहना चाहती. उसे बहुत गुस्सा आया. घर पहुंच कर वह सोचने लगा कि उस ने कोमल से कोर्टमैरिज की है और वह उस की पत्नी है. अगर वह उस के साथ नहीं रहेगी तो वह भी उसे उस की मनमर्जी से नहीं जीने देगा.

अगले दिन सुबह उस ने एक मोबाइल शौप पर जा कर नया सिम खरीदा और एक मैकेनिक के यहां से क्लच वायर ले आया. उसी सिम से उस ने कोमल से बड़े प्यार से बात की. बातोंबातों में उस ने कोमल को घूमने जाने के लिए राजी कर लिया. उस दिन काफी बारिश हुई थी, जिस से मौसम सुहाना हो गया था.

16 जून को मनोज ने कोमल को फिर फोन कर के मिलने के लिए सीमेंट गोदाम के पास बुलाया. कोमल ने कहा कि वह उस के पास पहुंच जाएगी. 2 बजे मनोज अपनी मोटरसाइकिल से सीमेंट गोदाम के पास पहुंचा तो थोड़ी देर बाद कोमल आ गई. उस ने कोमल को मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर बिठाया और रिंगरोड होते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी के बोंटा पार्क जा पहुंचा.

पार्क के गेट पर मोटरसाइकिल खड़ी कर के वह कोमल के साथ अंदर चला गया. कोमल को विश्वास में लेने के लिए वह उस से रोमांटिक बातें कर रहा था. वहां झाडि़यों के पास कई युवा जोड़े प्रेमालाप में मग्न थे. यह देख कर कोमल भी रोमांटिक हो गई. कोमल से प्यारीप्यारी बातें करते हुए मनोज उसे एकांत में ले गया, जहां दोनों एक साफसुथरी चट्टान पर बैठ गए. मनोज ने उसे बांहों में ले कर अपनी गलतियों के लिए माफी मांगी और फिर से ऐसा न करने की कसम खाई तो कोमल खुश हो गई.

जब मनोज को लगा कि मौका एकदम सही है तो उस ने कोमल से कहा, ‘‘तुम अपना मुंह पीछे की तरफ कर लो, मैं तुम्हारे लिए एक सरप्राइज गिफ्ट लाया हूं.’’

कोमल ने खुश हो कर मुंह पीछे की ओर कर लिया. उचित मौका देख कर मनोज ने जेब में रखा क्लच वायर निकाला और कोमल की गर्दन पर लपेट कर कस दिया. कोमल ने मनोज को वायर ढीला करने के लिए कहा, साथ ही बचने के लिए बहुत हाथपैर मारे, जिस की वजह से मनोज के हाथों में खरोंचे भी आ गईं. लेकिन उस ने वायर को ढीला नहीं किया.

कुछ ही पलों में कोमल ने आखिरी हिचकी ली और उस की गर्दन एक ओर लुढ़क गई. कोमल की लाश को परे धकेल कर वह पार्क से बाहर आ गया और अपनी मोटरसाइकिल पर सवार हो कर घर लौट आया. इस के बाद उस ने अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए अपने दोस्त अनुज के साथ शराब की पार्टी की, जहां कोमल की हत्या का राज उस पर जाहिर कर दिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने 17 जून, 2017 को मनोज को तीसहजारी कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Crime Story

— इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.

— 2017 में प्रकाशित

गुनाह जो छिप न सका

16 फरवरी, 2017 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के गांव सिरकोई भूड़ निवासी अरविंद  गांव की ही रहने वाली शीतल के घर पहुंचा. प्रौपर्टी डीलर अरविंद शीतल को मुंहबोली बहन मानता था. शीतल एक बुटीक में काम करती थी.

अरविंद ने शीतल के घर जा कर उस की मां अनीता देवी से कहा कि गजरौला में उस की मौसेरी बहन की शादी है, इसलिए वह शीतल को उस के साथ भेज दें. अनीता अरविंद को घर के सदस्य की तरह मानती थी और उस पर विश्वास करती थी, इसलिए उस ने शीतल को उस के साथ गजरौला भेज दिया.

अगले दिन यानी 17 फरवरी, 2017 को अरविंद गजरौला से लौट कर घर आ गया, पर उस के साथ शीतल नहीं आई. अनीता ने अरविंद से शीतल के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘आंटी, शीतल मेरे साथ गई जरूर थी, पर रास्ते में मुझ से 1500 रुपए ले कर लौट आई थी.’’

इस के बाद अरविंद ने शीतल के घर वालों को विश्वास में ले कर कहा, ‘‘देखो, मुझे यह बात कहनी तो नहीं चाहिए, जो आप को बुरी लगे. पर मैं बताना चाहता हूं कि आजकल शीतल पर महेंद्र कुछ ज्यादा ही मेहरबान है. उन दोनों के बीच कुछ चल रहा है. मुझे लगता है कि शीतल महेंद्र के साथ ही गई है.’’

शीतल की मां अनीता तुरंत महेंद्र के घर पहुंच गई. उस ने पूछा कि महेंद्र कहां है तो उस के घर वालों ने बताया कि उस का कल से ही कुछ पता नहीं है. जब भी उसे फोन किया जाता है, उस के फोन की घंटी तो बजती है, लेकिन वह फोन उठाता नहीं है. यही बात अनीता ने भी बताई कि शीतल के फोन की घंटी तो बज रही है, पर वह फोन उठा नहीं रही है.

महेंद्र और शीतल के घर वालों ने यही समझा कि दोनों को अभी दुनियादारी की समझ नहीं है, जल्दी ही वापस आ जाएंगे. लेकिन जब 2 दिन बाद भी दोनों घर नहीं आए तो शीतल और महेंद्र के घर वालों ने मझोला थाने में उन की गुमशुदगी दर्ज करा दी. थाना मझोला पुलिस ने भी इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया.

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सोचा कि प्रेमप्रसंग का मामला है, इसलिए दोनों के घर वालों से कह दिया कि वे अपनीअपनी रिश्तेदारियों में उन्हें खोजें. जब मिल जाएं तो थाने आ कर खबर कर दें.

जब कहीं से भी शीतल और महेंद्र के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो दोनों के घर वालों ने मुरादाबाद के एसएसपी मनोज तिवारी, जिलाधिकारी सुहैर बिन सगीर, डीआईजी ओमकार सिंह से गुहार लगाई. इस पर भी उन की शिकायत पर कोई कारवाई नहीं हुई.

मजबूरन शीतल के घर वालों ने महिला थाने और एएसपी औफिस के बाहर जाम लगा दिया. महिला थाना और एएसपी औफिस आसपास ही स्थित हैं. एएसपी यशवीर सिंह ने शीतल के घर वालों को समझाबुझा कर भरोसा दिया कि पुलिस जल्द ही शीतल का पता लगाएगी. इस आश्वासन के बाद जाम खुल गया.

28 फरवरी, 2017 को संभल जिले के थाना असमोली के गांव घूंघरपुर का चेतन सिंह सुबह अपने आम के बाग में गया तो उस ने देखा कि कुछ कुत्ते किसी लाश को खा रहे हैं.

चेतन सिंह ने तुरंत इस की सूचना थाना असमोली पुलिस को फोन द्वारा दे दी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी ब्रजेश यादव फोर्स के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. वह शव किसी महिला का था. घुटने के नीचे का हिस्सा छोड़ कर पूरी लाश कुत्ते खा गए थे. कपड़ों से पुलिस ने अनुमान लगाया कि लाश महिला की है. पास ही एक गड्ढा था, जिस से अंदाजा लगाया कि लाश इसी गड्डे में दफनाई गई थी.

एसआई मेघराज सिंह ने मौके की जरूरी काररवाई पूरी कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने उस का डीएनए कराने के लिए सैंपल सुरक्षित कर लिया.

अगले दिन किसी युवती की सड़ीगली लाश मिलने की खबर अखबार में छपी. अनीता के कई रिश्तेदार संभल में रहते थे. उन्हें पता था कि अनीता की बेटी शीतल कई दिनों से लापता है. अखबार में अज्ञात युवती की लाश मिलने की खबर पढ़ कर एक रिश्तेदार ने शीतल के घर वालों को फोन कर दिया.

यह जानकारी मिलने के बाद शीतल के पिता जसपाल सिंह पत्नी अनीता को ले कर थाना असमोली पहुंच गए. पुलिस ने जब बरामद कपड़े आदि उन्हें दिखाए तो दोनों ही फूटफूट कर रोने लगे. वे कपड़े उन की बेटी शीतल के थे. कपड़ों की शिनाख्त से स्पष्ट हो गया कि चेतन सिंह के बाग में जो लाश मिली थी, वह जसपाल की बेटी शीतल की थी.

19 मार्च, 2017 को जिला अमरोहा के थाना सैद नगली के गांव ढक्का निवासी शराफत हुसैन के आम के बाग में भी जमीन में गड़ी एक लाश को कुत्ते नोचनोच कर खा रहे थे. शराफत हुसैन ने थाना सैद नगली पुलिस को यह बात बताई तो थोड़ी देर में पुलिस मौके पर पहुंच गई.

पुलिस ने गड्ढा खोद कर जब लाश बाहर निकाली तो वह किसी पुरुष की थी, पर उस का सिर गायब था. घटनास्थल की तलाशी में वहां से थोड़ी दूरी पर एक मानव सिर मिल गया.

जल्दी ही इस लाश के मिलने की खबर पूरे जिले में फैल गई. थाना मझोला में शीतल और महेंद्र की गुमशुदगी दर्ज थी. शीतल की लाश संभल के थाना असमोली में मिल चुकी थी, जबकि महेंद्र के बारे में अभी तक कुछ नहीं पता चला था.

इसलिए मुरादाबाद के थाना मझोला की पुलिस 20 मार्च, 2017 को महेंद्र के 3 भाइयों कमल, सतपाल और अशोक को साथ ले कर थाना सैद नगली पहुंची. तीनों भाइयों ने उस शव की शिनाख्त अपने भाई महेंद्र के शव के रूप में कर दी. पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम करवा कर शव महेंद्र के भाइयों को सौंप दिया.

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20मार्च, 2017 को महेंद्र का शव मुरादाबाद आया तो लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. सैकड़ों लोग शव को ले कर सम्राटनगर गेट के पास साईं अस्पताल के सामने दिल्ली रोड पर पहुंच गए. राष्ट्रीय राजमार्ग पर महेंद्र की लाश रख कर जाम लगा दिया. गांगन तिराहे से ले कर स्टेशन रोड, हरिद्वार रोड पर कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया. जाम की सूचना मिलते ही थाना मझोला पुलिस के साथ एएसपी डा. यशवीर सिंह भी पहुंच गए.

भीड़ आक्रोशित थी. वह हत्यारों की गिरफ्तारी की मांग कर रही थी. माहौल को देखते हुए मुरादाबाद के अन्य थानों की पुलिस बुला ली गई. पुलिस के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी पहुंच गए. उन्होंने भीड़ को आश्वासन दिया कि अभियुक्तों को 5 दिनों के अंदर गिरफ्तार कर लिया जाएगा. इस आश्वासन के बाद शाम 4 बजे से लगा जाम रात 8 बजे खुला.

जाम स्थल पर ही महेंद्र की अर्थी तैयार की गई और उसे लोको शेड शमशान घाट ले जा कर अंतिम संस्कार कर दिया गया. शीतल की मां अनीता ने बताया था कि 16 फरवरी को अरविंद शीतल को बुला कर ले गया था. उस के बाद वह लौट कर नहीं आई थी और अब तो अरविंद भी अपने घर से गायब था. महेंद्र के घर वालों ने भी प्रौपर्टी डीलर अरविंद पर शक जाहिर किया था.

पुलिस ने अरविंद के घर दबिश दी, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. पुलिस ने उस के घर वालों पर दबाव बनाया. इस का नतीजा यह निकला कि अरविंद ने 23 मार्च, 2017 को मुरादाबाद की सीजेएम कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया, जहां से पुलिस ने उसे 2 दिनों के रिमांड पर ले कर पूछताछ की.

पूछताछ में अरविंद ने स्वीकार कर लिया कि शीतल और महेंद्र की हत्या उसी ने कराई थी. इस के बाद उस ने दोनों हत्याओं की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

अरविंद की बहन दुर्गेश का गांव में ही बुटीक था. शीतल उसी के बुटीक पर काम करती थी. चूंकि वह उस की बहन की सहेली थी, इसलिए अरविंद उसे मुंहबोली बहन मानता था. दुर्गेश का शीतल के यहां आनाजाना था. उसी बीच सिरकोई भूड़ निवासी महेंद्र के अवैध संबंध दुर्गेश से हो गए. महेंद्र प्रौपर्टी डीलर का काम करता था.

घर वालों ने दुर्गेश को बहुत समझाया कि वह महेंद्र से संबंध न रखे, क्योंकि वह उन की बिरादरी का नहीं है. घर वालों के समझाने से दुर्गेश मान गई. इस के बाद घर वालों ने दुर्गेश की आननफानन में शादी कर दी. कुछ दिनों ससुराल में रह कर दुर्गेश मायके आ कर रहने लगी.

जब दुर्गेश के पति को पता चला कि उस की पत्नी के महेंद्र से संबंध थे तो उस ने दुर्गेश को तलाक दे दिया. इसी वजह से अरविंद महेंद्र से रंजिश रखने लगा.

पति से तलाक होने के बाद दुर्गेश का महेंद्र से मिलनाजुलना फिर से शुरू हो गया. घर वालों के समझाने के बाद भी दुर्गेश ने उस से मिलना बंद नहीं किया. इस की वजह से उन की बदनामी हो रही थी. एक दिन अरविंद ने गुस्से में दुर्गेश को गला घोंट कर मार डाला और लाश को सिरकोई भूड़ के पास रेलवे लाइन पर डाल आया.

ट्रेनों के गुजरने से दुर्गेश की लाश कट गई. रेलवे पुलिस और थाना मझोला पुलिस ने इसे आत्महत्या मान कर जांच आगे नहीं बढ़ाई. बहन को ठिकाने लगाने के बाद अरविंद ने ठान लिया कि वह महेंद्र को भी नहीं छोड़ेगा. वह महेंद्र को ठिकाने लगाने की योजना बनाने लगा.

कुछ दिनों पहले की बात है. शीतल का मोहल्ले के ही रवि से प्रेमसंबंध था. उस के घर वालों ने एक दिन उसे रवि के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. घर वालों ने रवि को थाना मझोला पुलिस के हवाले कर दिया. पुलिस ने जब शीतल से पूछताछ की तो घर वालों के दबाव में उस ने रवि के खिलाफ बयान दे दिया. पुलिस ने रवि को जेल भेज दिया. रवि अभी भी मुरादाबाद जेल में बंद है.

बाद में शीतल को अफसोस हुआ कि उसे घर वालों के दबाव में रवि के खिलाफ बयान नहीं देना चाहिए था, क्योंकि वह सचमुच उसे चाहती थी. वह अकसर अपने प्रेमी रवि से मिलने जेल जाती रहती थी. उस ने रवि को भरोसा दिया था कि वह उसे जल्दी ही छुड़ा लेगी.

शीतल किसी भी तरह रवि की जमानत कराना चाहती थी, पर इस के लिए उसे रुपयों की जरूरत थी. चूंकि अरविंद शीतल को बहन मानता था और शीतल भी उस पर भरोसा करती थी, इसलिए एक दिन उस ने अरविंद को कहा कि उस के बयान से रवि जेल चला गया है. पर अब वह उसे हर हालत में जेल से बाहर निकलवाना चाहती हूं.

अरविंद यह सुन कर बहुत खुश हुआ, क्योंकि जिस बात की वह योजना बना रहा था, वह शीतल की मदद से आसानी से पूरा हो सकती थी. उस ने कहा, ‘‘शीतल, तुम मेरी बहन हो. क्या मैं तुम्हारे इतने भी काम नहीं आ सकता. पर शीतल मेरा एक छोटा सा काम है, तुम उसे करा दो.’’

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‘‘बोलो, क्या करना है?’’ शीतल ने कहा.

‘‘देखो, आजकल महेंद्र से तुम्हारी कुछ ज्यादा ही बन रही है. तुम्हें तो पता है कि दुर्गेश की आत्महत्या के बाद से मैं महेंद्र से बात नहीं करता. हम दोनों प्रौपर्टी डीलिंग का काम करते हैं. कांशीरामनगर के पास एक बड़े प्लौट का सौदा मैं ने कर लिया है. महेंद्र उस में टांग अड़ा रहा है. वह पार्टी को मेरे बारे में उलटासीधा बता कर गुमराह कर रहा है. तुम्हें कुछ नहीं करना. बस तुम पार्टी के पास महेंद्र को ले आना. वहां पर आमनेसामने पार्टी से बात हो जाएगी. इस काम के लिए तुम्हें 50 हजार रुपए और एक प्लौट मिल जाएगा.’’ अरविंद ने कहा.

‘‘इतना सा काम है, यह तो मैं चुटकी बजा कर करा दूंगी.’’ शीतल ने कहा.

16 फरवरी, 2017 की शाम घूमने के बहाने वह महेंद्र को ले गई. दिल्ली रोड स्थित गांगन नदी के तिराहे से सैद नगली के लिए औटो बुक कर के वहां पहुंच गई. वहां अरविंद, सुपारीकिलर गुलाम, अरविंद का भाई राजू और मामा कल्लू मिल गए. सब ने मिल कर पहले शीतल की हत्या की, क्योंकि वह पूरे मामले की राजदार थी. इस के बाद उन्होंने महेंद्र को भी मौत के घाट उतार दिया.

इन लोगों ने महेंद्र की लाश सैद नगली के गांव ढक्का की एक बाग में गड्ढा खोद दबा दिया तो वहां से 2 किलोमीटर दूर संभल के थाना असमोली के गांव घूंघरपुर के एक बाग में शीतल को दफना दिया.

पुलिस ने अरविंद की निशानदेही पर मोबाइल फोन और हत्या में प्रयुक्त फरसा सोनकपुर के जंगल से बरामद कर लिया था. विस्तार से पूछताछ के बाद पुलिस ने अरविंद को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक अन्य अभियुक्त पुलिस के हाथ नहीं लगे थे. पुलिस सरगरमी से उन की तलाश कर रही थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Story : सोने के व्यापारी को ले डूबी रंगीनमिजाजी

Hindi Story. मई, 2016 को स्पेन में मलागा की अदालत से आने वाले एक चर्चित मामले के फैसले का लोगों को बड़ी बेसब्री से इंतजार था. आरोपी और पीडि़त के परिजनों से ले कर मीडिया के लोगों तक को फैसला सुनने की उत्सुकता थी. यह हाईप्रोफाइल मामला ब्रिटेन के 48 वर्षीय सोने के व्यापारी एंडी बुश की हत्या का था. उन की हत्या 5 अप्रैल, 2014 को स्पेन के शहर मारबेला के कोस्टा डेल सोल नामक मशहूर बीच पर स्थित होटल हौलिडे विला में उन की पूर्व प्रेमिका द्वारा गोली मार कर की गई थी. हत्या का आरोप 26 वर्षीया स्विमवियर मौडल मायका मैरीका कुकुकोवा पर था. अपराध साबित हो जाने के बाद उसे सजा के लिए दोषी करार दिया जा चुका था.

अदालत में बुश की 22 वर्षीया बेटी एल्ली अपनी 44 वर्षीया बुआ रशेल के साथ मौजूद थी. जबकि ज्यूरी के सामने सिर झुकाए चिंतातुर बैठी आरोपी कुकुकोवा अपने चेहरे को हथेली से बारबार ढंकने का प्रयास कर रही थी. ऐसा लगता था, जैसे वह किसी से खासकर एल्ली और रशेल से नजरें मिलाने से बचना चाह रही हो. हालांकि सुनवाई के दौरान उन तीनों का अदालत में पहले भी कई बार आमनासामना हो चुका था, लेकिन तब वे अपनीअपनी बातों को साबित करने की कोशिश करते हुए इतनी अधिक असहज महसूस नहीं करती थीं, जितना कि उन्हें फैसले की घड़ी के वक्त महसूस हो रहा था.

मायका मैरीका कुकुकोवा अपने बचाव के लिए हर संभव प्रयास कर चुकी थी. लेकिन सबूतों के अभाव में उस की दलीलों को खारिज कर दिया गया था. फिर भी क्यूडेड ला जस्टिका के निर्णायक मंडल द्वारा उसे एक और अंतिम मौका दिया गया था, ताकि वह बचाव संबंधी औपचारिक याचिका दायर कर सके.

कुकुकोवा ने भले ही बचाव के लिए कोई याचिका नहीं दायर की थी, लेकिन इतना जरूर कहा था कि बुश ने उस के ऊपर हमला किया था और उस ने अपनी आत्मरक्षा में उसे गोली मारी थी.

बुश को चोट पहुंचाने का उस का कोई मकसद कभी नहीं था, क्योंकि अपनी उम्र से दोगुनी उम्र का होने के बावजूद वह उस से बेइंतहा मोहब्बत करती थी. उस ने भावुकता के साथ कहा था कि वह उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी, लेकिन उन के प्रेम में किसी तीसरे के शामिल होने से वह काफी दुखी थी.

निर्णायक मंडल ने फैसला सुनाने के दरम्यान कहा कि घटना के 6 महीने पहले ही कुकुकोवा और बुश के बीच संबंध खराब हो चुके थे. वह ईर्ष्या, द्वेष की भावना से भरी हुई थी.

सरकारी वकीलों को उम्मीद थी कि इस मामले में 26 वर्षीया मौडल कुकुकोवा को 25 साल की जेल की सजा तो सुनाई ही जाएगी, लेकिन जजों के निर्णायक मंडल ने उसे 15 साल की सजा सुनाने के साथ बुश की 21 वर्षीया बेटी को 1,22,000 पाउंड और 44 वर्षीया बहन रशेल को 30,500 पाउंड की राशि जुरमाने के तौर पर देने का आदेश दिया.

इसी के साथ न्यायाधीश ने यह भी कहा कि आरोपी का पूर्व का कोई आपराधिक रिकौर्ड नहीं है. उस ने जो भी अपराध किया है, वह भावुकता में किया है. इस लिहाज से उसे अपना पक्ष रखने का एक और मौका दिया जाता है लेकिन बचाव के अंतिम मौके का भी कुकुकोवा को कोई लाभ नहीं मिल पाया.

अदालत ने फैसले से संबंधित 17 पृष्ठों का दस्तावेज बुश के परिजनों को भी दे दिया. इस फैसले पर भले ही एल्ली और उस की बुआ रशेल ने न्याय मिलने का संतोष व्यक्त किया, लेकिन बुश से तलाक ले चुकी एल्ली की मां ने ट्विटर पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा कि कुकुकोवा को कम सजा हुई है. उसे कम से कम 20 साल की सजा होनी चाहिए थी. वह अदालत में अपनी बेटी के साथ नहीं थी, लेकिन उस ने खुद उस की भावनाओं को काफी शिद्दत के साथ महसूस करते हुए कई ट्वीट किए थे.

अदालती सुनवाई और जांचपड़ताल की काररवाई में पाया गया था कि बुश को .38 की रिवौल्वर से 3 गोलियां मारी गई थीं. 2 गोलियां उस के सिर में लगी थीं, जबकि एक गोली उस के कंधे में लगी थी. न्यायाधीश ने फैसले में कहा कि बुश का हाथ रिवौल्वर के साथ इस तरह से रखा गया था, ताकि पहली नजर में लगे कि उस ने आत्महत्या की है. हत्या के बाद कुकुकोवा बुश की महंगी हमर गाड़ी से करीब 3012 किलोमीटर दूर स्लोवाकिया स्थित अपने घर चली गई थी, जहां उस का प्रेमी इंतजार कर रहा था.

कुकुकोवा ने न केवल 2 देशों की सीमाएं लांघीं, बल्कि इस लंबी यात्रा को 27 घंटे में पूरा भी किया. हालांकि कुछ दिनों बाद ही उसे स्लोवाकिया स्थित उस के पुश्तैनी गांव नोवा बोसाका से हिरासत में ले लिया गया था. उस की गिरफ्तारी स्पैनिश अधिकारियों के अनुरोध पर यूरोपीय वारंट के आधार पर की गई थी.

मायका मैरीका कुकुकोवा एक जमाने में बहुचर्चित स्विमवियर मौडल रही. सन 1990 में उस का जन्म स्लोवाकिया के एक गांव नोवा बोसाका में हुआ था. ग्रामीण परिवेश के साधारण परिवार में पलीबढ़ी कुकुकोवा जब किशोरावस्था में आई तो उसे अहसास होने लगा कि उस के अंदर खूबसूरती के साथसाथ हीरोइन बनने के भी तमाम गुण मौजूद हैं. जब उस के दोस्तों ने उस की सुंदरता की तारीफ के पुल बांधे तो उस की सपनीली आंखों में मौडलिंग की रंगीन दुनिया तैरने लगी.

कुकुकोवा के मातापिता ने उसे अपनी मनमर्जी से कैरियर चुनने की आजादी दे रखी थी. उस ने मौडलिंग के लिए कोशिश की तो थोड़े प्रयास में ही उसे मौका मिल गया. मौडलिंग की दुनिया में शुरुआत की पहली कोशिश में ही उसे सफलता मिल गई.

आगे भी सफलता की सीढि़यां चढ़ने में उसे ज्यादा वक्त नहीं लगा. ऊंची जगह बनाने के लिए भी उसे अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ा. उस की खूबसूरती और पहली ही नजर में किसी को भी आकर्षित कर लेने वाले ग्लैमर की वजह से उस का आगे का रास्ता खुदबखुद बनता चला गया.

जल्दी ही कुकुकोवा एक परफेक्ट मौडल बन गई. चाहे रैंप पर चलना हो या कैमरे के किसी भी एंगल के सामने खुद को प्रदर्शित करना हो, वह बहुत कम समय में सीख गई. फलस्वरूप जल्द ही वह एक पेशेवर मौडल बन गई. उसे कुछ नामीगिरामी मौडलों के साथ रैंप पर चलने का मौका मिला तो वह एक चर्चित मैगजीन के कवर पर भी जगह बनाने में सफल रही.

इस के बाद फोटोग्राफरों ने उसे इंटरनेशनल मौडलिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की सलाह दी. उस ने ऐसा ही किया और स्लोवाकिया के फैशन और मौडलिंग की दुनिया का मक्का माने जाने वाले शहर मिलान की ओर रुख किया. मौडलिंग की बदौलत कुकुकोवा ने अपनी खास पहचान बना ली. ब्रिटिश और अमेरिकन मौडलों से टक्कर लेते हुए उस ने स्विमवियर या बिकिनी के पहनावे के साथ रैंप पर चल कर निर्णायक मंडल का दिल जीत लिया.

फिर क्या था, उस का सितारा बुलंद हो गया. मल्टीनेशनल कंपनियां उसे जहां अपने ब्रांड के लिए ब्रांड एंबेसडर बनाने को लालायित रहने लगीं, वहीं उसे नौकरी के कुछ औफर भी मिले. लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही वह देर रात तक चलने वाली पार्टियों में भी आनेजाने लगी.

मौडलिंग की दुनिया में इस प्रोफेशन को अपनाने वाली मौडल्स अगर अपनी अदाकारी और शारीरिक सुंदरता बिखेरती हैं तो इस में अमीरजादे प्लेबौय की भी भरमार रहती है. उन की सोच के हिसाब से सुंदरियां मौजमस्ती की सैरगाह में मनोरंजन और रोमांस के साधन की तरह होती हैं. ऐसे ही लोगों में से एक थे इंगलैंड के गोल्ड बिजनेसमैन ‘किंग औफ ब्लिंग’ के नाम से चर्चित एंडी बुश. वह अधेड़ावस्था की दहलीज पर आ चुके थे, लेकिन मौजमस्ती के लिए सुंदरियों के साथ डेटिंग पर जाना उन का खास शौक था.

एंडी ब्रिटेन में सोने के आभूषणों के अरबपति कारोबारी थे. उन की गिनती अमीरजादों में होती थी. 1990 में उन्होंने बीबीसी टीवी प्रजेंटर साम मैसन से शादी की थी. उसी से एक बेटी एल्ली पैदा हुई थी. लेकिन बाद में साम मैसन से उन का तलाक हो गया था. वह एल्ली को बहुत प्यार करते थे और उसे हर तरह से खुश और सुखी रखने की कोशिश करते थे.

एल्ली अपनी मां से ज्यादा बुआ रशेल के करीब रही. दूसरी तरफ बुश की पहचान रंगीनियों में डूबे रहने वाले शख्स की बन गई थी. वह आए दिन लेट नाइट पार्टियों या फैशन शो में जाया करते थे. गर्लफ्रैंड के साथ लौंग ड्राइव या डेटिंग पर जाना उन का खास शौक था.

कुकुकोवा को रैंप पर चलते देख बुश पहली बार में ही उस पर फिदा हो गए थे. बुश को न केवल उस का ग्लैमर भरा सौंदर्य पसंद आया था, बल्कि उस की शारीरिक सुंदरता और अदाएं भी बहुत अच्छी लगी थीं. संयोग से बुश उस फैशन शो वीक के प्रायोजक भी थे, जिस में कुकुकोवा को बतौर मौडल जगह मिली थी. तब दोनों की औपचारिक मुलाकात हुई थी.

पहली मुलाकात में ही कुकुकोवा ने बुश के दिल में इतनी तो जगह बना ही ली थी कि वह कारोबारी व्यस्तता के बावजूद उस से मिलनेजुलने के लिए समय निकालने लगे थे.

इस तरह शुरू हुई मुलाकातों के दौरान कुकुकोवा ने उन से अपने लिए कोई काम तलाशने की इच्छा जताई. इस पर बुश ने उसे ब्रिस्टल स्थित अपने ही सोने के आभूषणों के शोरूम में नौकरी दे दी.

अब बुश के लिए उस से मिलनाजुलना आसान हो गया था. नतीजा यह हुआ कि उन की मुलाकातें प्रगाढ़ संबंध में बदलती चली गईं.

बुश अपनी सुगठित और चुस्तदुरुस्त देह के लिए काफी मेहनत करते थे. यही वजह थी कि वे 48 की उम्र में भी 28-30 के युवा की तरह दिखते थे. उन की सब से बड़ी कमजोरी सुंदरियों के पीछे भागना थी. नईनई प्रेमिकाएं बनाना, उन्हें महंगे उपहार देना और उन के साथ डेटिंग या लौंग ड्राइव पर जाना उन की जीवनशैली का अहम हिस्सा था.

उन के पास महंगी कारों की बड़ी शृंखला थी, जिन में लाल रंग की फेरारी और ग्रे रंग की लेंबोरगिनी के अतिरिक्त हमर रेंज की कई कारें थीं. उन की कई गाडि़यां कानसेलाडा के समुद्र तटीय गांव स्थित स्पैनिश विला में रखी जाती थीं.

अपनी आरामदायक जिंदगी गुजारने के लिए उन्होंने सन 2002 में करीब 3,20,000 पाउंड में 5 बैडरूम का एक मकान खरीदा था, जो केप्सटो के भीड़भाड़ वाले इलाके से काफी दूर ग्रामीण क्षेत्र मानमाउथशिरे में स्थित था. यह भव्य मकान 7 फुट ऊंची चारदीवारी से घिरा था.

इस के बावजूद इस मकान में सुरक्षा के तमाम अत्याधुनिक इंतजाम किए गए थे. उन्होंने सुरक्षा के लिए विख्यात राट्टेवाइलर डौग गार्ड भी वहां तैनात किए थे. आधिकारिक तौर पर बुश के 4 तरह के कारोबार थे, जिस में 3 तो फिलहाल निष्क्रिय थे. सिर्फ ट्रेडिंग कंपनी बिगविग से ही उन्हें मुनाफा होता था.

बुश के दिल में कुकुकोवा के लिए कितनी जगह थी या फिर कुकुकोवा बुश से कितनी मोहब्बत करती थी, यह कहना मुश्किल था, लेकिन इतना जरूर था कि वह उन के तमाम निजी कार्यों में दखलंदाजी करती थी. वह बुश के उसी शोरूम में एक कर्मचारी थी, जिस का कामकाज बुश की बहन रशेल और बेटी एल्ली संभालती थीं.

सन 2012 में बुश की कुकुकोवा के साथ डेटिंग चरम पर थी. इस का फायदा उठाते हुए कुकुकोवा बुश के साथ रशेल और एल्ली पर भी अपना रौब दिखाती थी. हालांकि उन के ‘लिव इन रिलेशन’ की मधुरता में जल्द ही नीरसता आ गई और नवंबर 2013 में तो उन के संबंध पूरी तरह से खत्म हो गए. इस की वजह यह थी कि उसी दौरान बुश की जिंदगी में एक 20 वर्षीया रूसी युवती मारिया कोरोतेवा आ गई थी.

मारिया इंगलैंड के पश्चिमी इलाके में स्थित एक यूनिवर्सिटी में ह्यूमन रिसोर्सेस की छात्रा थी. उस से बुश की मुलाकात ब्रिस्टल के कोस्टा कैफे की एक शाखा में हुई थी. मारिया बुश की बेटी एल्ली से मात्र एक साल बड़ी थी.

नई प्रेमिका का साथ मिलने पर वह कुकुकोवा को समय नहीं दे पा रहे थे. इतना ही नहीं, वह मारिया को अपना जीवनसाथी भी बनाना चाहते थे. कुकुकोवा अपनी उपेक्षा को महसूस कर रही थी. यह सब मारिया की वजह से हुआ था, इसलिए इस का दोषी वह मारिया को मान रही थी.

वह मारिया से ईर्ष्या करने लगी थी. इस की वजह से वह हमेशा तनाव में भी रहने लगी थी. और तो और वह फोन, ईमेल और डेटिंग ऐप के जरिए उस का पीछा भी करती थी. इस की शिकायत मारिया ने बुश से भी की थी. बुश को भी कुकुकोवा की यह हरकत पसंद नहीं आई. नतीजतन उन दोनों के बीच जबतब तकरार होने लगी. कुकुकोवा उन पर अपना एकाधिकार बनाए रखने की कोशिश करती थी.

एल्ली का कहना था कि कुकुकोवा बहुत जल्द गुस्से में आ जाती थी. दुकान की महंगी चीजों को फर्श पर फेंक देती थी. कई बार तो वह बुश का मोबाइल तक फेंक देती थी, पासपोर्ट छिपा देती थी और उन की गैरमौजूदगी में उन का पर्सनल कंप्यूटर चेक करती थी.

इसी तरह का एक वाकया एल्ली के जन्मदिन के अवसर पर भी हुआ. एल्ली अपने 18वें जन्मदिन के मौके पर पिता और कुकुकोवा के साथ दुबई में थी. एक मौल में महंगी खरीदारी को ले कर कुकुकोवा ने न केवल हंगामा खड़ा कर दिया था, बल्कि गुस्से में उस ने बुश पर अपना बैग फेंक कर हमला भी किया था.

बुश ने उसे बहुत समझाने की कोशिश की, पर उस ने उसी दिन बुश का लैपटौप भी तोड़ डाला था. उस की वजह से एल्ली के जन्मदिन की खुशियों भरे माहौल में खलल पड़ गया. इंगलैंड वापस लौट कर बुश ने दुबई की घटना को नजरअंदाज करना ही बेहतर समझा.

कुकुकोवा की अजीबोगरीब आदतों को झेलना बहुत ही मुश्किल हो गया था. वह हमेशा तेवर में रहती थी. सितंबर, 2013 में कुकुकोवा बगैर कुछ बताए बुश के यहां से चली गई. वह एक जगह स्थिर नहीं रहती थी. एक शहर से दूसरे शहर घूमती रहती थी. बुश ने उस से संबंध खत्म कर लिए थे, लेकिन कुकुकोवा को लगता था कि बुश उसे फिर से अपना लेगा. इस के लिए वह अपने फेसबुक एकाउंट पर प्रेमसंबंधों का सबूत देने वाले चुंबन और गले लगने के वीडियो अपलोड करती रहती थी.

कुकुकोवा के परिजनों के अनुसार, हत्या की घटना के 2 सप्ताह पहले वह अपना पुश्तैनी घर छोड़ गई थी. उस वक्त उस के पिता बीमार चल रहे थे. बुश की हत्या की खबर जब अखबारों की सुर्खियां बन गईं और उस की पूर्व पत्नी समेत दूसरे परिजनों ने हत्या का आरोप सीधे तौर पर कुकुकोवा पर लगाया.

इस के बाद स्पेन समेत स्लोवाकिया की पुलिस भी सक्रिय हो गई और बुश की हत्या के 2 दिनों बाद ही कुकुकोवा को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया गया. उसे न्यायिक हिरासत में ले कर मलागा के निकट अल्हउरा डेला टोर्रो जेल में डाल दिया गया. उस की गिरफ्तारी से उस की मां लुबोमीर कुकुका (50) और पिता दानक कुकुकोवा (51) को काफी दुख हुआ. उन्हें लगा जैसे उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई है.

कुकुकोवा की वजह से उस के मातापिता की पूरे इलाके में काफी बदनामी हुई. इस के बावजूद वे बेटी को बचाने की कोशिश के लिए स्पेन गए. उन्होंने एक महंगा वकील किया, जिस की फीस जुटाने में उन का पुश्तैनी मकान तक बिक गया.

पुलिस के अनुसार, घटना वाली रात को कुकुकोवा बुश के उसी घर में थी, जिस में बुश ने अपनी नई प्रेमिका मारिया कोरातेवा को बुला रखा था. मारिया किसी वजह से कुछ देर के लिए बाहर चली गई थी. संभवत: वह वापस जाना चाहती थी. थोड़ी देर में ही उस ने गोली चलने की आवाज सुनी. यही गवाही मारिया ने कोर्ट में दी थी.

बुश के स्मार्टफोन पर डेटिंग ऐप के जरिए कुकुकोवा को पता चल चुका था कि बुश और मारिया 5 अप्रैल, 2014 की रात अपनी मुलाकात का पांचवां महीना पूरा होने पर जश्न मनाने वाले हैं. इस के लिए स्पैनिश विला कोस्टा डेल सोल में खास किस्म का रोमांटिक आयोजन किया गया था. इस से पहले ब्रिस्टल हवाई अड्डे पर बुश ने मारिया को 10,000 पाउंड की हीरे की एक अंगूठी भेंट की थी. इस के साथ ही उन्होंने कहा कि वे विला पर उस से एक खास बात पर चर्चा करना चाहते हैं.

घटना के बारे में मारिया ने बताया, ‘‘5 अप्रैल की सुबह जब हम लोग (मैं और बुश) विला पहुंचे, तब सूर्योदय नहीं हुआ था. हम लोगों ने एकदूसरे का हाथ थामे प्रेमी युगल की तरह हंसहंस कर बातें करते हुए विला में प्रवेश किया. विला के कर्मचारियों ने हमारा गर्मजोशी के साथ स्वागत किया. हम सहज भाव से कमरे में चले गए.’’

मारिया ने आगे बताया, ‘‘बुश ने कमरे की बत्ती जलाई. मुझे कमरे में कुछ अच्छा नहीं लगा. मैं ने दरवाजे के पास एक रैक में ‘ब्रा और किंकर्स’ टंगे देखे. यह देख कर मैं समझ गई कि निश्चित तौर पर यहां पहले से कोई औरतें आती होंगी. मैं बुश से थोड़ा आगे बढ़ी तो कुछ दूरी पर फर्श पर एक अधखुला सूटकेस पड़ा था, जिस में 2 कटार रखे दिखे. उसे देख कर मैं घबरा गई. मैं उलटे पैर मुड़ कर ऊपर की सीढि़यों पर चली गई.

‘‘जब मैं सब से ऊपर पहुंची, तब देखा कि वहां कुकुकोवा बिलकुल शांत, स्थिर एकदम चट्टान की तरह खड़ी थी. वह मुझे ही घूर रही थी. उस ने अपने बाल नीचे किए हुए थे और पाजामा पहन रखा था. ऊपर वह शार्ट्स पहने हुए थी. मैं ने पलभर के लिए उसे देखा और चिल्लाती हुई वहां से भाग कर घर से बाहर आ गई.’’

इसी बीच कुकुकोवा ने बुश पर 3 गोलियां दाग दीं. मारिया ने समझा कि टीवी या सीढि़यों से कोई भारी सामान गिर गया है. कुछ मिनट बाद ही कुकुकोवा बाहर आई तो उस के हाथ में गाड़ी की चाबी थी. उस ने मुझ से कहा, ‘‘कार से दूर हट जाओ.’’

उस वक्त वह बहुत ही शांत थी. मुझे आश्चर्य हुआ कि बुश ने उसे अपनी हमर कार की चाबी कैसे दे दी. इस से मारिया को शक हुआ. जब तक वह घर में जाने के लिए दरवाजे की तरफ बढ़ी, तब तक कुकुकोवा कार को तेजी से ड्राइव करते हुए फरार हो गई. मारिया विला के अंदर पहुंची तो बुश की रक्तरंजित लाश देख कर घबरा गई.

मारिया ने तुरंत बुश की बहन रशेल और पुलिस को बुलाया. पुलिस के साथ आई डाक्टरों की टीम ने बुश को मृत घोषित कर दिया.

बुश की हत्या के बाद जहां मारिया के सपने साकार होने से पहले ही चूरचूर हो गए, वहीं कुकुकोवा को पूरी जवानी जेल की सलाखों के पीछे गुजारनी होगी. उस के मातापिता पर तो जैसे पहाड़ ही टूट पड़ा है. न तो बुढ़ापे का कोई सहारा है और न ही सिर छिपाने को छत बची है. सब कुछ बेटी को जेल जाने से बचाने में खत्म हो गया है. रही बात एल्ली और बहन रशेल की, तो उन को बुश की यादों के सहारे जीना होगा.

Crime Story in Hindi : पंजाब में बहन भाई का खुराफाती कारनामा

Crime Story in Hindi. 28 नवंबर, 2016 की शाम मोहाली के थाना सोहाना के थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरसिमरन सिंह बल फील्ड के कामों से फारिग हो कर अपने औफिस पहुंचे थे कि उन का एक खास मुखबिर उन के सामने आ खड़ा हुआ. नमस्कार करने के बाद उस ने कहा, ‘‘सर, बढि़या इनाम तैयार रखिए, ऐसी जबरदस्त खबर लाया हूं कि सुन कर आप उछल पड़ेंगे.’’

यह मुखबिर लंबे समय से हरसिमरन सिंह के लिए मुखबिरी करता आ रहा था. यह उन का निहायत भरोसे का आदमी था, जिस की सूचनाएं अकसर सही निकलती थीं. वह पढ़ालिखा था और मामले की गहराई में जाने के बाद जब उसे पूरा विश्वास हो जाता था कि मामला पूरी तरह से सच है, उस के बाद ही वह उन के पास आता था.

उस दिन भी उस के चेहरे पर ऐसा ही आत्मविश्वास झलक रहा था. हरसिमरन सिंह ने उसे अपने रिटायरिंग रूम में ले जा कर कहा, ‘‘इनाम की चिंता मत करो, सूचना बढि़या होनी चाहिए.’’

‘‘मैं ने कहा न सर, ऐसी जबरदस्त सूचना लाया हूं कि सुन कर उछल पड़ेंगे. सरकार द्वारा जो यह दम भरा जा रहा है कि 2 हजार रुपए के नए नोट की कभी नकल नहीं हो सकेगी यानी जाली नोट नहीं छापे जा सकेंगे, मेरी सूचना उसी के बारे में है.’’ मुखबिर ने उत्साह के साथ कहा.

‘‘मतलब, किसी ने इतनी जल्दी उस की नकल तैयार कर ली यानी 2 हजार रुपए के नकली नोट छाप लिए ’’ हरसिमरन सिंह ने हैरानी से पूछा.

‘‘नकल तैयार ही नहीं कर ली सर, करोड़ों के जाली नोट छाप कर मार्केट में चला भी दिए हैं.’’ ‘‘2 हजार के जाली नोट चला भी दिए ’’ ‘‘जी सर.’’ ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है ’’ कहने के साथ उन्होंने पूछा, ‘‘यह अपराध क्या मेरे इलाके में हुआ है ’’

‘‘सर, यह तो पता नहीं, लेकिन मुझे जो जानकारी है, उस के अनुसार लालबत्ती लगी औडी कार पर सवार हो कर 3 लोग, जिन में एक लड़की भी शामिल है, 2 हजार रुपए के जाली नोटों के साथ आप के एरिया में घूम रहे हैं.’’

‘‘उन लोगों के पास इस समय भी 2 हजार रुपए के जाली नोट हैं, अगर हैं तो कितने होंगे ’’

‘‘एकदम सटीक तो नहीं बता सकता सर, लेकिन जो भी है, वे लाखों में हैं. आप तुरंत नाकाबंदी करवाइए. अगर देर हो गई तो वे आप के इलाके से निकल भी सकते हैं. सर, मेरे कहने का मतलब यह है कि अगर इस समय आप ने उन लोगों को पकड़ लिया तो बड़ी मात्रा में 2 हजार रुपए के जाली नोट पकड़ने का यह पहला मामला होगा. अगर ऐसा हो गया तो मैं भी बढि़या इनाम पाने का हकदार हो जाऊंगा.’’ ट्राइसिटी (मोहाली-चंडीगढ़-पंचकूला) के कुछ बैंक वालों ने 2 हजार रुपए के नए नोटों की पुख्ता पहचान के लिए एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया था, जिस में बताया गया था कि 2 हजार रुपए के नोट पर सीधी तरफ सी थ्रू रजिस्टर में 2 हजार रुपए लिखा है. महात्मा गांधी के चित्र की दाईं ओर देवनागरी में 2 हजार रुपए लिखा गया है, जिस में रुपए का नया साइन है. महात्मा गांधी का चित्र नोट के ठीक बीच में है. नोट पर बाईं ओर माइक्रालैटर्स में आरबीआई और 2 हजार लिखा है. नोट को थोड़ा टेढ़ा कर के देखने पर थ्रेड का रंग हरे से नीले में बदलता दिखाई देता है. नोट की दाईं ओर गवर्नर के हस्ताक्षर, गारंटी और प्रौमिस क्लाज दिया गया है.

इस में आरबीआई का साइन भी देखा जा सकता है. नोट को लाइट में देखने पर सफेद जगह में महात्मा गांधी का चित्र दिखाई देता है. वहीं इलैक्ट्रोटाइप वाटरमार्क है तो नीचे की तरफ दाईं ओर अशोक स्तंभ है, जिस के ऊपरी भाग पर रैक्टेंगल में 2 हजार रुपए लिखा गया है. बाईं ओर 7 लाइनें भी चिह्नित की गई हैं. नोट में पिछली तरफ स्वच्छ भारत का लोगो दिया गया है. वहीं पर कई भाषाओं में नोट की वैल्यू लिखने के अलावा मंगलयान का चित्र भी दिया गया है.

सरकार पहले ही दिन से दावा कर रही थी कि इस नए 2 हजार रुपए के नोट का जाली नोट तैयार करना कठिन ही नहीं, एकदम असंभव है. बैंक वालों ने 2 हजार रुपए के नोट के बारे में जो आयोजन किया था, उस में हरसिमरन सिंह ने भी भाग लिया था. उन दिनों उन के पास थाना सोहाना के अलावा मोहाली इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर स्थित थाने का भी चार्ज था. उस समय वह वहीं से आए थे, जब उन का वह मुखबिर उन से मिलने आया था.

मुखबिर द्वारा मिली सूचना के बारे में उच्चाधिकारियों को फोन द्वारा बता कर दिशानिर्देश लेने के बाद हरसिमरन सिंह ने एक तहरीर तैयार कर अपराध संख्या 276 पर भादंवि की धाराओं 420, 489ए, 489बी, 489सी, 489डी, 489ई एवं 120बी के तहत आपराधिक मामला दर्ज कर एक टीम तैयार की, जिस में एसआई चरणजीत सिंह के अलावा हवलदार परमजीत कुमार, इकबाल सिंह, संजय कुमार, बलविंदर सिंह और जगतपाल सिंह, सीनियर सिपाही गुरमुख सिंह, देवेंद्र सिंह, सिपाही बलवीर सिंह व महिला हवलदार गुरविंदर कौर को शामिल किया गया.

अपनी इस पूरी टीम के साथ मुखबिर के बताए अनुसार, जगतपुरा के टी पौइंट पर उन्होंने नाका लगा दिया. यह शाम के करीब साढ़े 7 बजे की बात है. गाडि़यां आतीजाती रहीं और जरूरत के हिसाब से उन्हें रोक कर तलाशी ली जाती रही. जिस गाड़ी का इस पुलिस टीम को इंतजार था, वह अभी तक कहीं दिखाई नहीं दी थी.

आखिर आधी रात को साढ़े 12 बजे के करीब वीआईपी नंबर की लालबत्ती लगी सफेद रंग की औडी कार आती दिखाई दी. शायद इसी गाड़ी के बारे में मुखबिर ने बताया था, इसलिए हरसिमरन सिंह ने अपने एक सिपाही को इशारा कर के उस कार को रोकने को कहा.

सिपाही के इशारे पर गाड़ी चालक ने बड़ी शराफत से गाड़ी एक तरफ ले जा कर रोक दी. उस के बाद खिड़की का शीशा नीचे कर के गरदन बाहर निकाल कर पूछा, ‘‘क्या बात है भई, गाड़ी क्यों रुकवाई  देख नहीं रहे हो कि यह वीआईपी गाड़ी है.’’

तब तक हरसिमरन सिंह गाड़ी के पास पहुंच गए थे. सिपाही के बजाए उन्होंने उस की बात का जवाब दिया, ‘‘गाड़ी इसलिए रुकवाई है, क्योंकि इस की तलाशी लेनी है.’’

‘‘वह किसलिए ’’ ड्राइविंग सीट पर बैठे आदमी ने रुखाई से पूछा.

इस पर हरसिमरन सिंह ने अपनी आवाज में थोड़ी सख्ती लाते हुए कहा, ‘‘गाड़ी में जितने भी लोग हैं, चुपचाप बाहर आ कर खड़े हो जाएं. हमें अपना काम करने दें.’’

‘‘कमाल है सर, वीआईपी नंबर वाली गाड़ी है, जिस पर रैड बीकन भी लगी है, ऐसे में आप को मालूम होना चाहिए…’’

‘‘मुझे यह मालूम करने की जरूरत नहीं है कि तुम लोग किस तरह के वीआईपी हो और अपनी गाड़ी पर लालबत्ती लगाने का अधिकार तुम ने कहां से हासिल किया है. ऊपर से आदेश के अनुसार हमें तुम्हारी गाड़ी की तलाशी लेनी है. बेहतर होगा कि तुम लोग शराफत से बाहर आ कर खड़े हो जाओ वरना हमें सख्ती से काम लेना होगा.’’ हरसिमरन सिंह ने अपनी आवाज को सख्त करते हुए कहा.

इस बीच उन के इशारे पर टीम के अन्य लोगों ने कार को चारों ओर से घेर लिया था. यह सब देख कर ड्राइविंग सीट पर बैठे युवक ने अंदर कोई इशारा किया और दरवाजा खोल कर बाहर आ गया. वह एक स्मार्ट सा युवक था. उस की बगल वाली सीट से एक आकर्षक युवती उतरी तो पिछली सीट से अधेड़ उम्र का एक आदमी बाहर आया. कार से बाहर आ कर ये सभी हरसिमरन सिंह को यह समझाने की कोशिश करने लगे कि वे ऊंचे पदों पर बैठे प्रतिष्ठित परिवार से संबंधित हैं और उन की गाड़ी में ऐसा कुछ नहीं है, जिसे अनुचित कहा जा सके. अधेड़ शख्स ने कुछेक राजनेताओं के नाम ले कर प्रभावित करने की कोशिश की.

हरसिमरन सिंह ने उन की बातों पर ध्यान न दे कर खुद कार की तलाशी लेने लगे. इस तलाशी में उन के हाथ ऐसे 3 बैग लगे, जिन में 2 हजार रुपए के नोटों की गड्डियां ठसाठस भरी थीं. देखने में वे तमाम नोट एकदम असली लग रहे थे, लेकिन मुखबिर ने उन के पास जाली नोटों के होने के बारे में बताया था. फिर भी नोटबंदी के दौर में इतनी बड़ी मात्रा में नई करेंसी का एक जगह मिलना किसी अपराध से कम नहीं था.

हरसिमरन सिंह तीनों को उन की गाड़ी और करेंसी सहित थाने ले आए, जहां शुरुआती पूछताछ में ही उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए उगल दिया कि उन से बरामद सारी करेंसी नकली है और वे कुल 42 लाख के नोट हैं. फिर क्या था, तीनों को विधिवत हिरासत में ले कर फिलहाल हवालात में बंद कर दिया गया. अगले दिन सुबह उन्हें अदालत में पेश कर के कस्टडी रिमांड पर ले कर तीनों से व्यापक पूछताछ की गई. इस पूछताछ में उन्होंने जो कुछ पुलिस को बताया, उस से उच्चशिक्षित एवं अच्छे प्रतिष्ठित परिवारों के लड़केलड़की द्वारा अपना एक गिरोह बना कर आपराधिक राह पर चलने की जो दास्तान सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी—

सरवमित्तर वर्मा हरियाणा सरकार में उच्च अधिकारी थे. उन की पत्नी सैन्य विभाग में लैफ्टिनेंट कर्नल डाक्टर हैं. इस जाली नोटों के साथ पकड़ा गया युवक इन्हीं वर्मा दंपति का 21 साल का बेटा है अभिनव वर्मा. वह पढ़ाईलिखाई में काफी होशियार था. मूलरूप से ये लोग हरियाणा के जिला फरीदाबाद के कस्बा बल्लभगढ़ के रहने वाले थे.

स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए अभिनव चंडीगढ़ चला आया था. यहीं रह कर उस ने चंडीगढ़ से 25 किलोमीटर दूर पंजाब के जिला मोहाली के कस्बा बनूड़ स्थित चितकारा यूनिवर्सिटी से बीटेक किया.

अभिनव ने कई प्रोजैक्टों पर काम करते हुए न केवल अपार सफलताएं अर्जित कीं, बल्कि अपना नाम भी रोशन किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए कार्यक्रम ‘मेक इन इंडिया’ का हिस्सा बन कर उस ने अंधे लोगों के लिए एक ऐसा उपकरण बनाया, जिसे किसी अंधे की छड़ी अथवा अंगूठी में आसानी से फिट किया जा सकता है. नेत्रहीन अगर अकेला चला जा रहा है तो किसी भी तरह की बाधा आने पर यह उपकरण सेंसर की तरह काम करते हुए उन्हें चौकन्ना कर देता है. इस उपकरण की न केवल खूब चर्चा हुई बल्कि अभिनव इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतारने की तैयारी करने लगा. इस के लिए ‘लाइव ब्रेल सौल्यूशन’ नाम से अपनी कंपनी बना कर चंडीगढ़ के इंडस्ट्रियल एरिया फेज-1 में उस ने अपना आलीशान औफिस भी खोल लिया. रहने के लिए उस ने जीरकपुर के ढकौली स्थित पाइनहोम अपार्टमेंट में एक फ्लैट ले लिया. अभिनव घर से काफी संपन्न था. वैसे भी उस की प्रतिभा को निखारने के लिए घर वाले उस का हर तरह से सहयोग कर रहे थे. पिछले साल उस के पिता का अचानक देहांत हो गया तो उस की मां का प्यार उस पर कुछ ज्यादा ही उमड़ने लगा.

अपना व्यापार चलाने के लिए अभिनव अब तक 16 देशों की यात्रा कर चुका है. नेट के जरिए वह विश्व भर की कंपनियों व ग्राहकों से जुड़ता जा रहा था. ऐसे में उसे योग्य स्टाफ की जरूरत थी. कपूरथला की रेलवे कोच फैक्ट्री में इंजीनियर के पद पर काम कर रहे रामरक्खा वर्मा रिश्ते में अभिनव के मामा हैं.

वह फैक्ट्री के सी टाइप वार्ड के अपने सरकारी फ्लैट में पत्नी और बेटी विशाखा के साथ रहते थे. विशाखा ने सिक्किम मणिपाल यूनिवर्सिटी से एमबीए किया था. इन दिनों वह लुधियाना के एक बड़े प्रौपर्टी डीलर सुमन नागपाल के यहां नौकरी करती थी. लुधियाना की गगनदीप कालोनी में रहने वाले नागपाल के अनेक राजनेताओं से घनिष्ठ संबंध थे.

एमबीए करने के बाद विशाखा ने अभिनव से कहीं नौकरी दिलाने को कहा था. लेकिन वह उसे कहीं नौकरी नहीं दिला सका था. इस के बाद विशाखा ने लुधियाना में प्रौपर्टी डीलर सुमन नागपाल के यहां नौकरी कर ली थी, जबकि वह इस से कहीं बढि़या नौकरी करने में सक्षम थी.

अभिनव को अपना काम जमता नजर आने लगा तो उसे अपने औफिस के लिए विशाखा की जरूरत महसूस हुई. विशाखा उस से भले ही 2 साल बड़ी थी, मगर वह उसे मानती बहुत थी. लिहाजा अभिनव के कहने भर की देर थी कि उस ने प्रौपर्टी डीलर के यहां वाली नौकरी छोड़ दी और अभिनव के औफिस में जौइन कर लिया.

अभिनव को इस क्षेत्र में अपना सुनहरा भविष्य नजर आ रहा था. उस का बनाया उपकरण खरीदने के लिए पूरी दुनिया से और्डर आ रहे थे. उस के लिए उन की मांग पूरी कर पाना मुश्किल हो रहा था. ऐसे में उसे अपने पैर जमाने के लिए काफी बड़ी रकम की जरूरत थी, जिसे वह न खुद पूरी कर सकता था और न ही उस के परिवार वाले पूरी कर सकते थे. अचानक नोटबंदी के तहत 500 और 1000 रुपए के नोटों का प्रचलन बंद कर सरकार द्वारा 2 हजार रुपए के नए नोट मार्केट में उतार दिए गए. ऐसे में मार्केट और आम लोगों की परेशानी को देख कर अभिनव के दिमाग में आइडिया आया कि क्यों न 2 हजार रुपए के जाली नोट छाप कर बाजार में चला दिए जाएं.

प्रयोग के तौर पर उस ने नए नोट को स्कैन कर के उस का प्रिंट निकाला. प्रिंट इतना बढि़या निकला कि देखने में किसी भी तरह से असली नोट से कम नहीं लग रहा था. उस ने इस बारे में विशाखा से बात की तो वह भी उस की मदद के लिए तैयार हो गई. फिर तो उन्होंने 2 हजार रुपए के 10 जाली नोट तैयार कर के अपने कर्मचारियों के माध्यम से मार्केट में भिजवाए जो आसानी से चल गए. इस सफलता से उत्साहित हो कर उन्होंने अपने कर्मचारियों का अपना एक गैंग बना लिया. यही नहीं, लुधियाना के प्रौपर्टी डीलर सुमन नागपाल को भी लालच दे कर अपने गिरोह में शामिल कर लिया. 54 वर्षीय यह अधेड़ बिना आगेपीछे की सोचे अपराध की राह पर चलने को तैयार हो गया. आगे जो योजना बनी, उस के अनुसार, थोड़ीबहुत नहीं, 2 हजार रुपए के करोड़ों के नकली नोट तैयार कर के इन लोगों ने उन लोगों के हवाले कर दिए, जिन के पास 5 सौ व 1 हजार रुपए के नोटों की शक्ल में ब्लैकमनी भरी पड़ी थी. ऐसे में 30 प्रतिशत कमीशन काट कर नकली नोटों को असली कह कर उन के हवाले कर 70 प्रतिशत असली नोटों की कमाई कर ली जाए. इन पैसों से काम के अनुसार, गिरोह के सदस्यों का कमीशन फिक्स कर दिया गया.

फिर क्या था, पूरे उत्साह के साथ ये सभी इस काम में शिद्दत से लग गए. दिनरात मेहनत कर के कुछ ही समय में इन्होंने 3 करोड़ रुपए के नकली नोट तैयार कर के 2 करोड़ के नोट बाजार में चला भी दिए.

पूछताछ में उन लोगों ने जो बताया, उस के अनुसार, अभिनव ने मोहाली में अपनी एक फैक्ट्री खोल रखी थी, जिस में विशाखा को एचआर की अहम पोस्ट दी गई थी. उसी फैक्ट्री में पैसा लगा कर उसे ऊंचाइयों तक ले जाने का उस ने सपना देखा था. पकड़े गए सारे नोट इसी फैक्ट्री में तैयार किए गए थे. पुलिस ने अभिनव और विशाखा की निशानदेही पर डिजिटल प्रिंटर, पेपर और कटर वगैरह बरामद कर लिया था. पूछताछ में इन लोगों ने बताया था कि अपने इस धंधे में अभिनव ने आधा दर्जन से ज्यादा कर्मचारियों को लगा रखा था. लेकिन उन में हर्ष और प्रमोद की भूमिका अहम थी. पुलिस ने उन की गिरफ्तारी के लिए तमाम जगहों पर छापे मारे, पर वे पकडे़ नहीं जा सके. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में अभिनव ने यह भी स्वीकारा कि 2009 मौडल की वीआईपी नंबर एचआर 70यू 0004 वाली औडी कार उस ने 20 लाख रुपए में जीरकपुर के कार बाजार से खरीदी थी. उस कार को अपने नाम पर ट्रांसफर न करवा कर उस पर अवैध रूप से लालबत्ती लगा कर वह पुलिस और अन्य लोगों की आंखों में धूल झोंक कर नकली नोटों के अपने धंधे को अंजाम देता रहा.

अखबारों में खबरें छपने के बाद कई लोगों ने थाने जा कर अभिनव और उस के साथियों द्वारा ठगे जाने की अपनी शिकायतें दर्ज कराई हैं. मजे की बात यह है कि वे भी अभियुक्तों से मिले 2 हजार रुपए के नकली नोट आसानी से असली के रूप में चला चुके थे. नकली नोटों के बदले लोगों से मिले पुराने असली नोटों को अभिनव न केवल अपने पर्सनल और कंपनी के खातों में जमा कराता था, बल्कि कुछ पैसा उस ने अपने कर्मचारियों के बैंक खातों में भी जमा कराए थे. 14 लाख के पुराने नोट उस के घर से भी बरामद किए गए थे. खुद तैयार किए गए 3 करोड़ के 2 हजार के नोटों में से उस के पास 42 लाख रुपए ही बचे थे, जिन्हें वह विशाखा और सुमन नागपाल के साथ अपनी कथित वीआईपी गाड़ी से एक पार्टी को देने जा रहा था, तभी पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

अभिनव से बरामद नोटों के बारे में आरबीआई की रिपोर्ट आ चुकी है कि वे सभी नोट जाली हैं और उन की छपाई हलके कागज पर हुई है.

पुलिस ने रिमांड अवधि समाप्त होने पर अभिनव, विशाखा और सुमन नागपाल को एक बार फिर अदालत में पेश किया, जहां से उन तीनों को न्यायिक हिरासत में जेल भिजवा दिया गया. कथा लिखे जाने तक न तो उन की जमानतें हुई थीं और न ही इस मामले के 7 अन्य अभियुक्तों में से कोई पकड़ा जा सका था. Crime Story in Hindi

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

News Story : सुपरस्टार विजय की राजनीति में सुपर एंट्री

News Story. एक तो चिलचिलाती गरमी, ऊपर से अनामिका का कई दिनों से बिना बताए गायब हो जाना, विजय को बड़ा अखर रहा था. उस के मम्मीपापा को भी नहीं पता था कि अनामिका किस कोप भवन में जा छिपी थी.

15 मई को विजय के सब्र का बांध टूट गया. उस ने अनामिका को फोन किया, पर वहां से कोई जवाब नहीं आया. उस ने अनामिका को मैसेज किया कि वह डियर पार्क जा रहा है. अगर उसे आना है, तो आ जाए.

विजय तैयार हो कर जब अपनी मोटरसाइकिल से निकल ही रहा था कि अनामिका का मैसेज आया, ‘ठीक है.’ विजय ने मैसेज चैक किया और भाव खाते हुए बिना रिप्लाई किए डियर पार्क के लिए निकल गया.

शाम के तकरीबन साढ़े 6 बजे अनामिका डियर पार्क आई. उसे दूर से देखते ही विजय ने नाराज हो कर मुंह फेर लिया. ‘‘क्या हुआ जनाब, आ तो गई तुम से मिलने,’’ अनामिका बोली. ‘‘बड़ा अहसान कर दिया. वैसे, तुम थीं कहां इतने दिनों से?’’ विजय ने सवाल दागा.

‘‘एक सीक्रेट मिशन पर,’’ अनामिका बोली और फिर हंस दी. ‘‘बताओगी भी या नहीं?’’ विजय बोला. ‘‘मैं एक्टिंग क्लास ले रही हूं,’’ अनामिका ने राज खोला. ‘एक्टिंग क्लास’ जैसी बात सुनते ही विजय का मुंह खुला का खुला रह गया. ‘‘अब यह क्या नौटंकी है… तुम और एक्टिंग क्लास… आईएएस बनने का इरादा छोड़ दिया क्या?’’ विजय ने पूछा. ‘‘क्यों… क्या मैं एक्टर नहीं बन सकती? आजकल तो नौटंकी करने वालों की ही बल्लेबल्ले है. देश की सरकार को ही देख लो. उन के नेताओं की भगवा नौटंकी जगजाहिर है. हर कोई जनता को बेवकूफ बनाने के लिए संसद हो या सरकारी समारोह, हर जगह ये लोग एक्टिंग ही कर रहे हैं,’’ अनामिका बोली.

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‘‘अब यह कौन सी नई खुराफात है? मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा है,’’ विजय बोला. ‘‘इस में खुराफात जैसी कौन सी बात है. नेता अभिनेता बन रहे हैं और अभिनेता नेता. दोनों हाथ में लड्डू और मुंह में मलाई. फिर क्या करना आईएएस बन कर,’’ अनामिका बोली. ‘‘फिर वही बात. कहीं कुछ नशावशा तो नहीं कर लिया है,’’ विजय अब चिढ़ रहा था. ‘‘अरे मेरे भोले विजय… क्या तुम ने थलापति विजय के बारे में नहीं सुना, जिन्होंने फिल्मों के बाद अब सियासत में इतनी शानदार एंट्री मारी है कि सीधे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बन गए हैं,’’ अनामिका बोली.

‘‘तो क्या हुआ? वहां तो बड़े से बड़े अभिनेता नेता बने हैं, फिर विजय ने क्या कारनामा कर दिया?’’ विजय ने कहा. ‘‘पर इस बंदे में दम है. फिल्मों में सुपर हिट और राजनीति में सुपर हिट. आए और सब पर छाए,’’ अनामिका ने कहा. ‘‘अच्छा, तो बताओ अपने इस सुपर हीरो के बारे में, जिस के चक्कर में तुम पर एक्टिंग का भूत चढ़ गया है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘तमिल फिल्म इंडस्ट्री के सुपरस्टार और तमिलगा वेत्री क?ागम (टीवीके) सियासी दल के प्रमुख जोसेफ सी. विजय, जिन्हें उन के चाहने वाले ‘थलापति विजय’ के नाम से जानते हैं, अब आधिकारिक तौर पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बन गए हैं. ‘‘हालांकि, सत्ता तक पहुंचने का उन का सफर किसी राजनीतिक ड्रामे से कम नहीं रहा. बहुमत जुटाने की जद्दोजेहद, सहयोगियों की तलाश और लगातार राजनीतिक बैठकों के बीच आखिरकार विजय ने रविवार, 10 मई, 2026 को ‘मदर्स डे’ पर मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली.

‘‘चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में आयोजित इस शपथ ग्रहण समारोह में विजय के साथ टीवीके के 9 विधायकों ने भी मंत्री पद की शपथ ली थी. इस समारोह में कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी मौजूद रहे थे.’’ ‘‘बधाई हो, पर थलापति विजय को तो बहुमत नहीं मिला था, फिर यह सब कैसे मुमकिन हुआ?’’ विजय ने पूछा. ‘‘दरअसल, 4 मई को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित हुए तो विजय की पार्टी टीवीके ने सभी को चौंका दिया था. इस पार्टी ने 234 सदस्यीय विधानसभा में 108 सीटें जीत कर सब से बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर राजनीतिक समीकरण बदल दिए थे.

‘‘हालांकि, यह जीत ऐतिहासिक मानी गई, लेकिन विजय की पार्टी बहुमत के आंकड़े से 10 सीट पीछे रह गई. इस के बाद विजय को सरकार बनाने के लिए चुनाव बाद गठबंधन की राह अपनानी पड़ी.’’ ‘‘फिर तो सरकार बनाने के लिए चला यह ड्रामा कई दिनों तक सस्पैंस भरा बना रहा होगा?’’ विजय ने सवाल उठाया.

‘‘सच में चुनाव नतीजे आने के बाद कई दिनों तक तमिलनाडु की राजनीति में सस्पैंस बना रहा. टीवीके ने कांग्रेस से समर्थन मांगा, जिस ने अपने 5 विधायकों का समर्थन दिया. इस के बाद सीपीआई और सीपीआई (एम) ने भी विजय का साथ दिया.

शनिवार, 9 मई, 2026 को विदुथलाई चिरुथैगल काची (वीसीके) और इंडियन यूनियन मुसलिम लीग (आईयूएमएल) के समर्थन के बाद विजय बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने में कामयाब रहे.’’ ‘‘सुना है तमिलनाडु के राज्यपाल ने भी कोई अड़ंगा लगाया था?’’ विजय ने कुरेदते हुए पूछा. ‘‘सूत्रों के मुताबिक, विजय ने शपथ लेने से पहले राज्यपाल आरवी अरलेकर से कम से कम बार मुलाकात की थी, पर जरूरी 118 विधायकों की लिस्ट पूरी न होने के चलते राज्यपाल उन्हें लौटा रहे थे. इस रवैए पर राज्यपाल की किरकिरी भी हुई. विपक्ष ने उन्हें खूब आड़े हाथ लिया. फिर आखिरकार, राज्यपाल ने सरकार बनाने की मंजूरी दे दी.

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‘‘वैसे, राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा रही कि अगर 10 मई तक कोई सरकार नहीं बनती तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता था. ऐसे में विजय का बहुमत जुटाना समय के खिलाफ दौड़ जैसा माना गया,’’ अनामिका ने बताया. ‘‘चलो, अब विजय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बन चुके हैं. पर मु?ा जैसे आम इनसान को उन के बारे में, उन के परिवार के बारे में, उन की पढ़ाईलिखाई और फिल्मों के बारे में जानने की ज्यादा दिलचस्पी है. इस के बारे में कुछ बताओ…’’ विजय बोला, ‘‘आखिर इतना बड़ा सुपरस्टार मेरा नाम राशि का है. वह भी विजय और हम भी विजय. वह जनता का हीरो और हम आप के हीरो.’’

‘‘वैरी फनी. पर अब तुम ने पूछ ही लिया है तो बता देती हूं. विजय का जन्म 22 जून, 1974 में हुआ था. वे एक फिल्मी परिवार से आते हैं. उन के पिता एसए चंद्रशेखर तमिल फिल्मों के डायरैक्टर हैं और उन की मां शोभा चंद्रशेखर प्लेबैक सिंगर हैं. ‘‘फिल्मों की बात करें तो विजय ने 1992 में फिल्म ‘नालैया थीरपू’ से अपने एक्टिंग कैरियर की शुरुआत की. 1990 के दशक में उन्होंने रोमांटिक फिल्मों के जरीए लोकप्रियता हासिल की. ‘पूवे उनाक्कागा’, ‘लव टुडे’, ‘कधालुक्कु मरियाधै’ और ‘थुल्लाथा मनामुम थुल्लुम’ जैसी फिल्मों ने उन्हें नौजवानों के बीच बड़ी पहचान दिलाई.

‘‘इस के बाद विजय ने एक्शन फिल्मों की ओर रुख किया और ‘घिल्ली’, ‘पोक्किरी’, ‘थिरुमलाई’ जैसी फिल्मों से वे सुपरस्टार बन गए. पिछले एक दशक में ‘थुप्पक्की’, ‘कत्थी’, ‘मेर्सल’, ‘सरकार’, ‘मास्टर’, ‘लियो और ‘ग्रेटेस्ट आल टाइम’ जैसी फिल्मों ने उन्हें तमिल सिनेमा के सब से बड़े सितारों में शामिल कर दिया,’’ अनामिका बोली. ‘‘जब विजय का फिल्म कैरियर इतना शानदार चल रहा था, तो वे राजनीति में क्यों आए?’’ विजय ने पूछा.

‘‘विजय ने साल 2024 में फिल्मों से दूरी बना कर सक्त्रिय राजनीति में कदम रखा और तमिलगा वेत्री क?ागम (टीवीके) नाम की पार्टी बनाई. उन की लोकप्रियता और बड़े फैन बेस ने उन्हें सीधे राज्य की राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया. राजनीतिक माहिरों का मानना है कि विजय ने नौजवानों, मिडिल क्लास और शहरी वोटरों के बीच मजबूत पकड़ बनाई, जिस का फायदा उन्हें चुनाव में मिला,’’ अनामिका ने बताया.

‘‘पर विजय की आखिरी फिल्म ‘जना नायकन’ अब विवादों में घिर गई है. इस का क्या हश्र होगा?’’ विजय ने सवाल किया. ‘‘दरअसल, यह फिल्म जनवरी में पोंगल के मौके पर रिलीज होने वाली थी, लेकिन केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से मंजूरी नहीं मिलने के कारण रिलीज टालनी पड़ी. इस पर फिल्म के प्रोड्यूसरों ने अदालत का दरवाजा भी खटखटाया, लेकिन मामला अभी कोर्ट में पैंडिंग है. ‘‘इतना ही नहीं, अप्रैल में फिल्म औनलाइन लीक हो गई, जिस से तमिल फिल्म इंडस्ट्री में हड़कंप मच गया.

‘‘इस मामले में विजय ने आरोप लगाया था कि फिल्म की रिलीज में देरी राजनीतिक साजिश का हिस्सा है और चुनाव के दौरान उन की निजी जिंदगी से जुड़ी खबरें भी जानबू?ा कर लीक की गईं.’’

‘‘मतलब विजय की एक्टर से नेता बनने की कहानी भी बड़ी फिल्मी है?’’ विजय बोला. ‘‘सच मे विजय का मुख्यमंत्री बनने का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहा. चुनावी जीत, बहुमत की कमी, सहयोगियों की तलाश और आखिरकार सत्ता तक पहुंच, पूरे प्रोसैस ने तमिलनाडु की राजनीति को कई दिनों तक रोमांचक बनाए रखा.’’

‘‘विजय के परिवार के बारे में और कुछ बताओ?’’ ‘‘विजय की शादीशुदा जिंदगी की बात करें, तो उन्होंने 25 अगस्त, 1999 को संगीता सोर्नालिंगम से शादी की थी. संगीता एक ब्रिटिश तमिल परिवार से ताल्लुक रखती हैं और उन का जन्म श्रीलंका में हुआ था. दोनों की पहली मुलाकात 1997 में फिल्म ‘कालमेलम काथिरुप्पेन’ के सैट पर हुई थी, जहां संगीता एक फैन के तौर पर उन से मिलने पहुंची थीं.

‘‘हालांकि, पिछले कुछ समय से उन के रिश्ते में खटास की खबरें चर्चा में रही हैं. साल 2025 में संगीता द्वारा तलाक की अर्जी देने की रिपोर्ट्स सामने आई थीं, जिस से उन की निजी जिंदगी में बड़े बदलाव के संकेत मिले.

‘‘विजय और संगीता के 2 बच्चे हैं. बेटा जेसन संजय और बेटी दिव्या साशा. जेसन संजय ने फिल्म ‘सिग्मा’ से बतौर डायरैक्टर अपने कैरियर की शुरुआत की है और वे अपने पिता के साथ बचपन में ‘वेट्टाइकारन’ फिल्म में नजर आ चुके हैं. वहीं बेटी दिव्या ने फिल्म ‘थेरी’ में अपने पिता के साथ स्क्रीन शेयर की थी. दोनों ही बच्चे विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद अब धीरेधीरे अपने कैरियर की दिशा तय कर रहे हैं,’’ अनामिका बोली.

‘‘वैसे, यह बंदा कितना पढ़ालिखा है? सुना है यह कालेज से ड्रौप आउट है और इसे डाक्टरेट की उपाधि भी मिली है. यह क्या माजरा है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘विजय ने अपनी शुरुआती पढ़ाई चेन्नई के कोदंबक्कम में बने फातिमा स्कूल से की. इस के बाद उन्होंने विरुगंबक्कम के बाललोक स्कूल से अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी की. पढ़ाई के मामले में औसत छात्र थे, लेकिन उन का रु?ान पढ़ाई से ज्यादा एक्टिंग की तरफ था. चूंकि उन के पिता एसए चंद्रशेखर एक फिल्म डायरैक्टर थे, इसलिए सिनेमा का माहौल उन्हें बचपन से ही मिला था.

‘‘स्कूल के बाद विजय ने चेन्नई के लोयोला कालेज में ‘विजुअल कम्यूनिकेशन’ की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया. इस के बाद उन्होंने एक्टिंग में अपना कैरियर बनाने का मन बना लिया. ‘‘यही वजह थी कि थलापति विजय ने पढ़ाई के दौरान ही कई शूटिंग और बाकी चीजों में काम करना शुरू कर दिया था. इस के बाद उन्हें एक्टिंग के कई औफर मिलने लगे और पढ़ाई को आगे बढ़ाना मुश्किल हो गया. आखिरकार उन्होने ग्रेजुएशन पूरी होने से पहले ही कालेज ड्रौप कर लिया.’’

‘‘अब मैं तुम्हें एक दिलचस्प बात बताता हूं…’’ विजय ने कहा, ‘‘भले ही विजय ने अपनी कालेज की डिगरी पूरी नहीं की, लेकिन उन के काम को खूब सम्मान मिला. उन का नाम इतना मशहूर हुआ कि साल 2007 में डाक्टर. एमजीआर एजुकेशनल एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट ने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में उन के योगदान के लिए ‘मानद डाक्टरेट’ की उपाधि से सम्मानित किया.’’

‘‘वाह…’’ अनामिका बोली. ‘‘जो भी हो बंदा कमाल का है. अब यह राजनीति में आ ही गया है तो फिर यहां भी अपने अच्छे काम से सुपरस्टार बन जाए. वैसे, मैं तो यह भी चाहूंगा कि मेरी अनामिका भी एक्टिंग सीख कर बड़ी कलाकार बने,’’ विजय बोला.

‘‘हो गया, चलो अब कहीं डिनर करने चलते हैं. मुझे बड़ी तेज भूख लगी है,’’ अनामिका बोली तो विजय ने ‘हां’ में सिर हिला दिया. News Story

Crime Story In Hindi: बुआ के दिल ने जब भतीजे को छुआ

Crime Story In Hindi: वेदराम बेहद सीधासादा और मेहनती युवक था. वह उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के एक चूड़ी कारखाने में काम करता था, जबकि उस के बीवीबच्चे कासगंज जिले के नगला लालजीतगंज में रहते थे. यह वेदराम का पैतृक गांव था. वहीं पर उस का भाई मिट्ठूलाल भी परिवार के साथ रहता था.

जिला कासगंज के ही थाना सहावर का एक गांव है बीनपुर कलां. यहीं के रहने वाले आलम सिंह का बेटा नेकसे अकसर नगला लालजीतगंज में अपनी बुआ के घर आताजाता रहता था. उस की बुआ की शादी वेदराम के भाई मिट्ठूलाल के साथ हुई थी.

वेदराम की पत्नी सुनीता पति की गैरमौजूदगी में भी घर की जिम्मेदारी  ठीकठाक निभा रही थी. वह अपनी बड़ी बेटी की शादी कर चुकी थी. जिंदगी ने कब करवट ले ली, वेदराम को पता ही नहीं चला. पिछले कुछ समय से वेदराम जब भी छुट्टी पर घर जाता था, उसे पत्नी सुनीता के मिजाज में बदलाव देखने को मिलता था. उसे अकसर अपने घर में नेकसे भी बैठा मिलता था.

नेकसे हालांकि उस के भाई मिट्ठूलाल की पत्नी का भतीजा था, फिर भी वह यही सोचता था कि आखिर यह उस के घर में क्यों डेरा डाले रहता है. उस ने एकदो बार नेकसे को टोका भी कि बुआ के घर पड़े रहने से अच्छा है वह कोई कामकाज देखे. सुनीता ने भी नेकसे पर कोई ज्यादा ध्यान नहीं दिया था, लेकिन वह जब भी आता था, वह उस की खूब मेहमाननवाजी करती थी. नेकसे के मन में क्या था, यह सुनीता को पता नहीं था. एक दिन नेकसे दोपहर में उस के घर आया और चारपाई पर बैठ कर इधरउधर की बातें करने लगा. अचानक वह उस के पास आ कर बोला, ‘‘बुआ, तुम जानती हो कि तुम कितनी सुंदर हो?’’

नेकसे की इस बात पर पहले तो सुनीता चौंकी, उस के बाद हंसती हुई बोली, ‘‘मजाक अच्छा कर लेते हो.’’

‘‘नहीं बुआ, ये मजाक नहीं है. तुम मुझे सचमुच बहुत अच्छी लगती हो. तुम्हें देखने को दिल चाहता है, तभी तो मैं तुम्हारे यहां आता हूं.’’ नेकसे ने हंसते हुए कहा.

नेकसे की बातें सुन कर सुनीता के माथे पर बल पड़ गए. उस ने कहा, ‘‘तुम यह क्या कह रहे हो, क्या मतलब है तुम्हारा?’’

‘‘कुछ नहीं बुआ, तुम बैठो और यह बताओ कि फूफाजी कब आएंगे?’’ उस ने पूछा.

‘‘उन्हें छुट्टी कहां मिलती है. तुम सब कुछ जानते तो हो, फिर भी पूछ रहे हो?’’ सुनीता ने थोड़ा रोष में कहा.

‘‘तुम्हारे ऊपर दया आती है बुआ, फूफाजी को तो तुम्हारी फिक्र ही नहीं है. अगर उन्हें फिक्र होती तो इतने दिनों बाद घर न आते. वह चाहते तो गांव में ही कोई काम कर सकते थे.’’ यह कह कर नेकसे ने जैसे सुनीता की दुखती रग पर हाथ रख दिया था.

इस के बाद सुनीता के करीब आ कर वह उस का हाथ पकड़ते हुए बोला, ‘‘बुआ, अब तुम चिंता मत करो, सब कुछ ठीक हो जाएगा.’’

इतना कह कर नेकसे तो चला गया, लेकिन सुनीता के मन में कई सवाल छोड़ गया. वह सोचने लगी कि आखिर नेकसे का उस के यहां आनेजाने का मकसद क्या है? 28 साल का नेकसे देखने में ठीकठाक था. वह अविवाहित था. और अपने गांव के एक ईंट भट्ठे पर काम करता था. तनख्वाह तो ज्यादा नहीं थी, पर वहां उसे अच्छी कमाई हो जाती थी. बुआ के यहां आतेआते उस का दिल बुआ की देवरानी सुनीता पर आ गया था.

सुनीता पति की दूरी से बहुत परेशान थी. इसी का बहाना बना कर उस ने उस के दिल में जगह बनानी शुरू कर दी थी. रिश्ते की नजदीकियां रास्ते में बाधक थीं. नेकसे को इस बात का भी डर लग रहा था कि अगर सुनीता को बुरा लग गया तो परिवार में तूफान आ जाएगा. उस दिन नेकसे के जाने के बाद सुनीता देर तक उसी के बारे में सोचती रही कि आखिर नेकसे चाहता क्या है. उस रात सुनीता को देर तक नींद नहीं आई. नेकसे की बातचीत का अंदाज मन मोहने वाला था, लेकिन सुनीता उम्र और रिश्ते में नेकसे से बड़ी थी. मन में पति के प्रति गुस्सा भी आया, क्योंकि पति से दूरी के कारण ही उस का मन डगमगा रहा था.

उस ने तय कर लिया कि इस बार जब पति घर आएगा तो वह उस से कहेगी कि या तो वह गांव में रह कर कोई काम करे या फिर उसे भी अपने साथ ले चले.

कुछ दिनों बाद वेदराम छुट्टी पर आया तो सुनीता ने कहा, ‘‘देखो, तुम्हारे बिना मेरा यहां बिलकुल भी मन नहीं लगता. या तो तुम यहीं कोई काम कर लो या फिर मैं भी बच्चों को ले कर फिरोजाबाद चल कर तुम्हारे साथ रहूंगी.’’

पत्नी की बात सुन कर वेदराम बोला, ‘‘लगता है, तुम पगला गई हो. तुम अपनी उम्र तो देखो. बच्चे बड़े हो रहे हैं और तुम्हें रोमांस सूझ रहा है.’’

‘‘तो क्या अब मैं बूढ़ी हो गई हूं?’’ सुनीता ने कहा.

‘‘नहीं…नहीं, ऐसा नहीं है. पर सुनीता यह मेरी मजबूरी है. मेरी तनख्वाह इतनी नहीं कि वहां किराए पर कमरा ले कर तुम्हें साथ रख सकूं. और तुम क्या सोच रही हो कि वहां मैं खुश हूं. नहीं, तुम्हारे बिना मैं भी कम परेशान नहीं हूं.’’

पति के जवाब पर सुनीता कुछ नहीं बोली. वेदराम 3 दिनों तक घर पर रहा, तब तक सुनीता काफी खुश रही. पर पति के जाने के बाद उस के जिस्म की भूख फिर सिर उठाने लगी. वह उदास हो गई. तब उस के दिलोदिमाग में नेकसे घूमने लगा. वह उस से मिलने को उतावली हो उठी. इतना ही नहीं, वह अपनी जेठानी के घर जा कर बोली, ‘‘दीदी, नेकसे आया नहीं क्या?’’

जेठानी ने कहा, ‘‘आया तो था, पर जल्दी में था. क्यों, कोई काम है क्या?’’

‘‘नहीं, मैं ने तो यूं ही पूछ लिया.’’ उदास मन से सुनीता वापस आने को हुई, तभी जेठानी ने कहा, ‘‘शायद वह कल आएगा.’’

जेठानी की बात सुन कर सुनीता का दिल बल्लियों उछलने लगा. उसे लग रहा था कि नेकसे उस से नाराज है, तभी तो वह उस के घर नहीं आया. अगले दिन अचानक उस के दरवाजे पर दस्तक हुई. उस ने दरवाजा खोला, सामने नेकसे खड़ा था.

‘‘तुम?’’ उसे देख कर सुनीता हैरानी से बोली.

‘‘हां, मैं ही हूं बुआ, लेकिन तुम मुझे देख कर इतना हैरान क्यों हो? बड़ी बुआ ने बताया कि तुम मुझे याद कर रही थीं, सो मैं आ गया. अब बताओ, क्या कहना है?’’ नेकसे ने घर में दाखिल होते हुए कहा.

सुनीता ने मुख्यद्वार बंद किया और अंदर आ कर नेकसे से बातें करने लगी. कुछ देर में सुनीता 2 गिलासों में चाय ले कर आई तो नेकसे ने पूछा, ‘‘फूफा आए थे क्या?’’

‘‘हां, आए तो थे, लेकिन 3 दिन रह कर चले गए.’’ सुनीता बेमन से बोली.

नेकसे को लगा कि वह फूफा से खुश नहीं है. उस ने मौके का फायदा उठाते हुए कहा, ‘‘बुआ, मैं कुछ कहना चाहता हूं, पर डर लगता है कि कहीं तुम बुरा न मान जाओ.’’

‘‘नहीं, तुम बताओ क्या बात है?’’

‘‘बुआ, सच तो यह है कि तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो और मैं तुम से प्यार करने लगा हूं.’’ नेकसे ने एक ही झटके में मन की बात कह दी.

नेकसे की बात पर सुनीता भड़क उठी, ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा? और हां, प्यार का मतलब जानते हो? अपनी और मेरी उम्र में फर्क देखा है. मैं रिश्ते में तुम्हारी बुआ लगती हूं.’’

‘‘हां, लेकिन इस दिल का क्या करूं, जो तुम पर आ गया है. अब तो दिलोदिमाग पर हमेशा तुम ही छाई रहती हो.’’ नेकसे ने कहा.

‘‘लगता है, तुम पागल हो गए हो. जरा सोचो, अगर घर वालों को यह सब पता चल गया तो मेरा क्या हाल होगा?’’ सुनीता ने कहा.

नेकसे चारपाई से उठा और सुनीता के पास जा कर उस के गले में बांहें डाल दीं. सुनीता ने इस का कोई विरोध नहीं किया. इस से नेकसे की हिम्मत बढ़ गई. इस के बाद सुनीता भी खुद को नहीं रोक सकी तो मर्यादा भंग हो गई. जोश उतरने पर जब होश आया तो दोनों में से किसी के भी मन में पछतावा नहीं था.

सुनीता को अपना मोबाइल नंबर दे कर और फिर आने का वादा कर के नेकसे चला गया. उस दिन के बाद सुनीता की तो जैसे दुनिया ही बदल गई. पर कभीकभी उसे डर भी लगता था कि अगर भेद खुल गया तो क्या होगा. अब नेकसे का आनाजाना लगा रहने लगा. इसी बीच एक दिन वेदराम अचानक घर आ गया. उस की तबीयत खराब थी. पर उस समय घर पर नेकसे नहीं था. सुनीता डर गई कि कहीं पति की मौजूदगी में नेकसे न आ जाए, इसलिए उस ने नेकसे को फोन कर के सतर्क कर दिया. हफ्ते भर बाद वेदराम चला तो गया, पर सुनीता के मन में डर सा समा गया.

पड़ोसियों को सुनीता के घर नेकसे का आनाजाना अखरने लगा था. आखिर एक दिन पड़ोसन ने सुनीता को टोक ही दिया, ‘‘जवान लड़के का इस तरह घर आनाजाना ठीक नहीं है. अपनी जवान बेटी का कुछ तो खयाल करो.’’

सुनीता तमक कर बोली, ‘‘अपने घर का खयाल मैं खुद रख लूंगी. तुम हमारी फिक्र मत करो.’’

नेकसे उस के यहां बेखौफ और बिना रोकटोक आताजाता था. पड़ोसियों के मन में भी शक के बीज पड़ चुके थे. एक दिन जब वेदराम घर आया तो एक पड़ोसी ने कहा, ‘‘नेकसे तुम्हारी गैरमौजूदगी में तुम्हारे घर अकसर आता है. तुम्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए.’’

इस बात से वेदराम को लगा कि जरूर कुछ गड़बड़ है. उस ने सुनीता से पूछा, ‘‘यह नेकसे का क्या चक्कर है?’’

पति की बात सुन कर सुनीता की धड़कनें बढ़ गईं, ‘‘यह क्या कह रहे हो तुम, तुम्हारा रिश्तेदार है. कभीकभी यहां आ जाता है. इस में गलत क्या है?’’

‘‘घर में जवान बच्ची है. तुम उसे यहां आने के लिए मना कर दो.’’ वेदराम ने कहा.

‘‘अपनी बेटी की देखरेख मैं खुद कर सकती हूं, पर कभी सोचा है कि तुम्हारे बिना मैं कैसे रहती हूं.’’

‘‘तुम लोगों के लिए ही तो मैं बाहर रहता हूं. जरा सोचो क्या तुम्हारे बिना मुझे वहां अच्छा लगता है क्या?’’

वेदराम को सुनीता की इस बात से विश्वास होने लगा कि पड़ोसियों ने उसे उस की पत्नी और नेकसे के बारे में जो खबर दी है, वह सही है. वेदराम 2-4 दिन रुक कर अपने काम पर फिरोजाबाद चला गया. पर इस बार उस का काम में मन नहीं लगा. उसे लगता था, जैसे उस की गृहस्थी की नींव हिल रही है.

एक दिन अचानक वह छुट्टी ले कर बिना बताए घर से आ गया. उस ने घर में कदम रखा तो घर में कोई बच्चा दिखाई नहीं दिया. उस ने कमरे का दरवाजा खोला तो सन्न रह गया. उस की पत्नी नेकसे की बांहों में थी. गुस्से में वेदराम ने डंडा उठाया और सुनीता की खूब पिटाई की. जबकि नेकसे भाग गया.

पिटने के बाद भी सुनीता के चेहरे पर डर नहीं था. वह गुर्रा कर बोली, ‘‘इस सब में मेरी नहीं, बल्कि तुम्हारी गलती है. मैं ने कहा था न कि मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती, पर तुम ने मेरी भावनाओं का खयाल कहां रखा.’’

वेदराम का गुस्सा बढ़ गया. वह हैरान था कि सुनीता ने रिश्तों का भी खयाल नहीं रखा. नेकसे तो उस के बेटे की तरह है. उस ने कहा, ‘‘ठीक है, अब मैं आ गया हूं, सब संभाल लूंगा.’’

‘‘मैं आ गया हूं, से क्या मतलब है तुम्हारा?’’ सुनीता ने पूछा.

‘‘अब मैं नौकरी छोड़ कर हमेशा के लिए आ गया हूं. यहीं खेतीबाड़ी करूंगा. फिर देखूंगा तुझे.’’ वेदराम ने कहा.

पति के नौकरी छोड़ने की बात सुन कर सुनीता परेशान हो उठी. क्योंकि अब उसे नेकसे से मिलने का मौका नहीं मिल सकता था. उस ने नेकसे को सारी बात बता कर सतर्क रहने को कहा. अब वह किसी भी कीमत पर नेकसे को छोड़ने को तैयार नहीं थी. उस के मन में पति के प्रति नफरत पैदा हो गई.

वेदराम को अब इस बात का डर लगा रहता था कि सुनीता नेकसे के साथ भाग न जाए. अगर ऐसा हो गया तो समाज में उस की नाक ही कट जाएगी. लिहाजा उसे अपनी दुराचारी पत्नी से नफरत हो गई. बेटी भी जवान थी पर वह मां की ही तरफ से बोलती थी. उसे इस बात का भी डर था कि कहीं बेटी भी गुमराह न हो जाए.

वेदराम की चौकसी के बावजूद सुनीता और नेकसे मौका पा कर घर से बाहर मिलने लगे. यह बात भी वेदराम से ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रह सकी. उस ने सुनीता को एक बार फिर समझाने की कोशिश की, पर वह कुछ भी मानने को तैयार नहीं थी. वेदराम समझ गया कि अब कोई बड़ा कदम उठाना ही पड़ेगा, वरना उस की गृहस्थी डूब जाएगी. घर का वातावरण काफी तनावपूर्ण रहने लगा था. नेकसे वेदराम की खुशियों के रास्ते में बाधा बन गया था. काफी सोचनेविचारने के बाद वेदराम को लगा कि इस समस्या का अब एक ही हल है कि रास्ते के कांटे को जड़ से निकाल दिया जाए.

दूसरी ओर रोजरोज पिटने से सुनीता को लगने लगा था कि अब वह पति के साथ ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकती. वह खुल कर नेकसे के साथ अपनी दुनिया बसाना चाहती थी.

वेदराम धीरेधीरे अपने इरादे को मजबूत कर रहा था. बेशक यह काम उस के लिए कठिन था. पर एक ओर चरित्रहीन पत्नी थी तो दूसरी ओर बेलगाम भतीजा. दोनों उस केगुस्से को हवा दे रहे थे.

योजना के अनुसार, वेदराम उसी ईंट भट्ठे पर काम करने लगा, जहां नेकसे करता था. वेदराम जानता था कि नेकसे रात में भट्ठे पर ही सोता है. उसे लगा कि वह वहीं पर अपना काम आसानी से कर सकता है. वह भी भट्ठे पर ही सोने लगा और मौके की तलाश में लग गया.

नेकसे अपने फूफा वेदराम के इरादे से बेखबर था. जबकि वेदराम ने तय कर लिया था कि अपनी इज्जत पर हाथ डालने वाले को वह जिंदा नहीं छोड़ेगा. अपनी नौकरी के तीसरे दिन 5 दिसंबर, 2016 को वेदराम को मौका मिल गया. उस ने देखा, नेकसे अकेला सो रहा था. वह अपनी जगह से उठा और फावड़े से नेकसे पर प्रहार कर दिया. चोट नेकसे के कंधे पर लगी तो वह चीख कर उठा और भागने की कोशिश की. लेकिन वेदराम ने उस पर ताबड़तोड़ प्रहार कर दिए, जिस से वह वहीं पर मर गया.

नेकसे की हत्या करने के बाद वेदराम ने राहत की सांस ली, पर उस की दिमागी हालत ठीक नहीं थी. वह फावड़ा ले कर सीधे थाना सहावर पहुंचा और पुलिस को सारी बात बता दी. थानाप्रभारी रफत मजीद वेदराम से पूछताछ कर के उसे उस जगह ले गए, जहां उस ने नेकसे की हत्या की थी. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

पुलिस ने वेदराम के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. थानाप्रभारी रफत मजीद केस की तफ्तीश कर रहे थे.

– कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित, Crime Story In Hindi

Hindi Story: प्यार ऐसे तो नहीं हासिल होता

Hindi Story: 18 अक्तूबर, 2016 की सुबह साढ़े 5 बजे के करीब पुणे शहर की केतन हाइट्स सोसायटी की इमारत के नीचे एक्टिवा सवार एक महिला और एक आदमी के बीच कहासुनी होते देख उधर से गुजर रहे लोग ठिठक गए थे. औरत से कहासुनी करने वाले आदमी की आवाज धीरेधीरे तेज होती जा रही थी. लोग माजरा समझ पाते अचानक उस आदमी ने जेब से चाकू निकाला और एक्टिवा सवार औरत पर हमला कर दिया. औरत जमीन पर गिर पड़ी और बचाव के लिए चिल्लाने लगी. हमलावर के पास चाकू था, जबकि वहां खड़े लोग निहत्थे थे. फिर भी वहां खड़े लोग उस की ओर बढ़े, लेकिन वे सब उस तक पहुंच पाते, उस के पहले ही वह आदमी महिला पर ताबड़तोड़ चाकू से वार कर के उसी की स्कूटी से भाग निकला था. महिला जमीन पर पड़ी तड़प रही थी. उस की हालत देख कर किसी ने कंट्रोल रूम को फोन कर के घटना की सूचना दे दी थी. चूंकि घटनास्थल थाना अलंकार के अंतर्गत आता था, इसलिए कंट्रोल रूम ने घटना की जानकारी थाना अलंकार पुलिस को दे दी थी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर बी.जी. मिसाल ने घटना की सूचना अपने अधिकारियों को दी और खुद एआई विजय कुमार शिंदे एवं कुछ सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

लाश और घटनास्थल के निरीक्षण में पुलिस वालों ने देखा कि घायल महिला सलवारसूट पहने थी. उस की उम्र 30-31 साल रही होगी. उस के शरीर पर तमाम गहरे घाव थे, जिन से खून बह रहा था. पुलिस को लगा कि अभी वह जीवित है, इसलिए उसे तत्काल पुलिस वैन में डाल कर इलाज के लिए सेसून अस्पताल ले जाया गया. लेकिन अस्पताल पहुंच कर पता चला कि उस की मौत हो चुकी है. इंसपेक्टर बी.जी. मिसाल अपने सहायकों के साथ घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि डीएसपी सुधीर हिरेमठ और एएसपी भी फोरैंसिक टीम के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे. फोरैंसिक टीम ने जरूरी साक्ष्य जुटा लिए तो अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. उस के बाद बी.जी. मिसाल को जरूरी दिशानिर्देश दे कर चले गए. बी.जी. मिसाल ने सहयोगियों की मदद से घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी कीं और उस के बाद अस्पताल जा पहुंचे. डाक्टरों से पता चला कि महिला के शरीर पर कुल 21 घाव थे. अधिक खून बहने की वजह से ही उस की मौत हुई थी. उन्होंने काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए रखवा दिया और थाने आ कर अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर इस मामले की जांच इंसपेक्टर (क्राइम) विजय कुमार शिंदे को सौंप दी.

विजय कुमार शिंदे ने मामले की जांच के लिए अपनी एक टीम बनाई और हत्या के इस मामले की जांच शुरू कर दी. घटनास्थल पर पुलिस को मृतका का पर्स और मोबाइल फोन मिला था. मोबाइल फोन के दोनों सिम गायब थे, इसलिए मृतका की शिनाख्त में उस से कोई मदद नहीं मिल सकी. लेकिन पर्स से उस का ड्राइविंग लाइसैंस मिल गया, जिस से उस की शिनाख्त हो गई. मृतका का नाम शुभांगी खटावकर था और वह कर्वेनगर के श्रमिक परिसर की गली नंबर-5 में रहती थी. उस के पति का नाम प्रकाश खटावकर था. इस के बाद विजय कुमार शिंदे ने लाइसैंस में लिखे पते पर एक सिपाही को भेजा तो वहां मृतका का पति प्रकाश खटावकर मिल गया. सिपाही ने उसे पूरी बात बताई तो वह सिपाही के साथ थाने आ गया.

विजय कुमार शिंदे ने अस्पताल ले जा कर उसे लाश दिखाई तो लाश देख कर वह खुद को संभाल नहीं सका और जोरजोर से रोने लगा. विजय कुमार शिंदे ने किसी तरह उसे चुप कराया तो उस ने एकदम से कहा, ‘‘शुभांगी की हत्या किसी और ने नहीं, मेरे ही परिसर में रहने वाले विश्वास कलेकर ने की है. वह उसे एकतरफा प्रेम करता था. वह उसे राह चलते परेशान किया करता था.’  प्रकाश खटावकर के इसी बयान के आधार पर विजय कुमार शिंदे ने विश्वास कलेकर को नामजद कर के उस की तलाश शुरू कर दी. उस के घर में ताला बंद था. आसपड़ोस वालों से पूछताछ में पता चला कि घटना के बाद से ही वह दिखाई नहीं दिया था. पुलिस को प्रकाश खटावकर से उस का नागपुर का जो पता मिला था, जांच करने पर वह फरजी पाया गया था. इस के बाद उस की तलाश के लिए पुलिस की 2 टीमें बनाई गईं. एक टीम नागपुर भेजी गई तो दूसरी टीम वहां जहां वह रहता और काम करता था. पुलिस ने वहां के लोगों से उस के बारे में पूछताछ की.

दूसरी टीम द्वारा पूछताछ में पता चला कि विश्वास नागपुर का नहीं, बल्कि कोल्हापुर का रहने वाला था. वहां के थाना राजारामपुरी में उस के खिलाफ हत्या का एक मुकदमा दर्ज हुआ था, जिस में वह साल भर पहले बरी हो चुका था. बरी होने के बाद ही वह पुणे आ गया था. इंसपेक्टर विजय कुमार शिंदे के लिए यह जानकारी काफी महत्त्वपूर्ण थी. कोल्हापुर जा कर वह थाना राजारामपुरी पुलिस की मदद से विश्वास को गिरफ्तार कर पुणे ले आए और उसे अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया. थाने में अधिकारियों की उपस्थिति में विश्वास कलेकर से शुभांगी की हत्या के बारे में पूछताछ शुरू ही हुई थी कि वह फर्श पर गिर कर छटपटाने लगा. उस के मुंह से झाग भी निकल रहा था. अचानक उस का शरीर अकड़ सा गया. पूछताछ कर रहे सारे पुलिस वाले घबरा गए. उन्हें लगा कि पूछताछ से बचने के लिए विश्वास ने जहर खा लिया है. उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया.

डाक्टरों ने उसे चैक कर के बताया कि इस ने जहर नहीं खाया है, बल्कि इसे मिर्गी का दौरा पड़ा है. यह जान कर पुलिस अधिकारियों की जान में जान आई. इलाज के बाद विश्वास को थाने ला कर पूछताछ की जाने लगी तो उस से सख्ती के बजाय मनोवैज्ञानिक ढंग से पूछताछ की गई. इस पूछताछ में एकतरफा प्रेम में शुभांगी की हत्या करने की उस ने जो कहानी बताई, वह कुछ इस प्रकार से थी—

शुभांगी महाराष्ट्र के नागपुर के रहने वाले प्रकाश मधुकर खटावकर की पत्नी थी. जिस समय शुभांगी की शादी प्रकाश से हुई थी, उस समय वह बीकौम कर रहा था. शुभांगी जैसी सुंदर, संस्कारी और समझदार पत्नी पा कर वह बहुत खुश था. पढ़ाई पूरी करने के बाद कुछ दिनों तक वह गांव में पिता मधुकर खटावकर के साथ खेती के कामों में उन की मदद करता रहा. खेती की कमाई से किसी तरह परिवार का खर्च तो चल जाता था, पर भविष्य के लिए कुछ नहीं बच पाता था. ऐसे में जब प्रकाश और शुभांगी को एक बच्चा हो गया तो उस के भविष्य को ले कर उन्हें चिंता हुई. दोनों ने इस बारे में गहराई से विचार किया तो उन्हें लगा कि बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए उन्हें गांव छोड़ कर शहर जाना चाहिए.

इस के बाद प्रकाश और शुभांगी घर वालों से इजाजत ले कर पहले मुंबई, उस के बाद पुणे जा कर स्थाई रूप से बस गए थे. पुणे के जेल रोड पर किराए का मकान ले कर उन्होंने रोजीरोटी की शुरुआत की. प्रकाश को एक प्राइवेट कोऔपरेटिव बैंक में नौकरी मिल गई थी तो पति की मदद के लिए शुभांगी कुछ घरों में खाना बनाने का काम करने लगी थी. इस काम से शुभांगी को अच्छे पैसे मिल जाते थे. इस के अलावा वह घर से भी टिफिन तैयार कर के सप्लाई करती थी. इस तरह कुछ ही दिनों में उन की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत हो गई. शुभांगी के पास पैसा आया तो इस का असर उस के रहनसहन पर तो पड़ा ही, उस के शरीर और बातव्यवहार पर भी पड़ा. अब वह पहले से ज्यादा खूबसूरत लगने लगी थी.

जल्दी ही शुभांगी और प्रकाश ने कर्वेनगर के श्रमिक परिसर की गली नंबर-5 में अपना खुद का मकान खरीद लिया था. बच्चे का भी उन्होंने एक बढि़या अंगरेजी स्कूल में दाखिला करा दिया था. शुभांगी को मेहनत ज्यादा करनी पड़ती थी और उस के पास समय कम होता था. उस की भागदौड़ को देखते हुए प्रकाश ने इस के लिए स्कूटी खरीद दी थी. शुभांगी घर और बाहर के सारे काम कुशलता से निपटा रही थी. इस के अलावा वह अपने शरीर का भी पूरा खयाल रखती थी. बनसंवर कर वह स्कूटी से निकलती तो देखने वाले देखते ही रह जाते थे. उस का शरीर सांचे में ढला ऐसा लगता था कि वह कहीं से भी 13 साल के बच्चे की मां नहीं लगती थी. उस की यही खूबसूरती उस के लिए खतरा बन गई.

शुभांगी जिस परिसर में रहती थी, उसी परिसर में 40 साल का विश्वास कलेकर भी एक साल पहले कोल्हापुर से आ कर रहने लगा था. रोजीरोटी के लिए वह वड़ापाव का ठेला लगाता था. एक ही परिसर में रहने की वजह से अकसर उस की नजर शुभांगी पर पड़ जाती थी. खूबसूरत शुभांगी उसे ऐसी भायी कि वह उस का दीवाना बन गया. इस की एक वजह यह थी कि उस की शादी नहीं हुई थी. शायद मिर्गी की बीमारी की वजह से वह कुंवारा ही रह गया था. और जब उसे घर बसाने का मौका मिला तो उस में भी कामयाब नहीं हुआ. जिस लड़की से वह प्यार करता था, उस की हत्या हो गई थी. उस की हत्या का आरोप भी उसी पर लगा था, लेकिन अदालत से वह बरी हो गया था. बरी होने के बाद वह पुणे आ गया था और उसे शुभांगी से प्यार हुआ तो वह हाथ धो कर उस के पीछे पड़ गया. शुभांगी तक पहुंचने के लिए पहले उस ने उस के पति प्रकाश से यह बता कर दोस्ती कर ली कि वह भी उस के गांव के पास का रहने वाला है. इस के बाद जल्दी ही वह शुभांगी के परिवार में घुलमिल गया. शुभांगी के घर आनेजाने में ही उस ने शुभांगी से यह कह कर अपना टिफिन भी लगवा लिया कि दिन भर काम कर के वह इस तरह थक जाता है कि रात को उसे अपना खाना बनाने में काफी तकलीफ होती थी. शुभांगी को भला इस में क्या ऐतराज होता, उस का तो यह धंधा ही था. वह उस का भी टिफिन बना कर पहुंचाने लगी.

समय अपनी गति से सरकता रहा. शुभांगी विश्वास का टिफिन देने आती तो इसी बहाने वह उसे एक नजर देख लेता, साथ ही उसे प्रभावित करने के लिए उस के बनाए खाने की खूब तारीफ भी करता. अपनी तारीफ सुन कर शुभांगी कुछ कहने के बजाय सिर्फ हंस कर रह जाती. इस से विश्वास को लगने लगा कि वह उस के मन की बात जान गई है. शायद इसी का परिणाम था कि एक दिन उस ने अपने मन की बात शुभांगी से कह दी. उस की बातें सुन कर शुभांगी सन्न रह गई. वह संस्कारी और समझदार महिला थी, इसलिए नाराज होने के बजाय उस ने उसे समझाया, ‘‘मैं शादीशुदा ही नहीं, एक बच्चे की मां भी हूं. मेरा अच्छा सा पति है, जिस के साथ मैं खुश हूं. तुम हमारे गांव के पास के हो, इसलिए हम सब तुम्हारी इज्जत करते हैं. तुम अपने मन में कोई ऐसा भ्रम मत पालो, जो आगे चल कर तुम्हें तकलीफ दे.’’ लेकिन शुभांगी के लिए पागल हुए विश्वास पर शुभांगी के समझाने का कोई असर नहीं हुआ. उस ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘शुभांगी, तुम्हारी वजह से मेरी रातों की नींद और दिन का चैन लुट गया है. हर घड़ी तुम मेरी आंखों के सामने रहती हो. मुझे तुम से सचमुच प्यार हो गया है. तुम पति और बच्चे को छोड़ कर मेरे पास आ जाओ. मैं तुम्हें रानी बना कर रखूंगा. तुम्हें कोई काम नहीं करने दूंगा.’’

विश्वास कलेकर की इन बातों से शुभांगी का धैर्य जवाब दे गया. उस ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें इतना समझाया, फिर भी तुम्हारी समझ में नहीं आया. अगर फिर कभी इस तरह की बातें कीं तो ठीक नहीं होगा. मैं तुम्हारी शिकायत प्रकाश से कर दूंगी. जरूरत पड़ी तो पुलिस से भी कर दूंगी.’’ शुभांगी की इस धमकी से कुछ दिनों तक तो विश्वास शांत रहा. लेकिन एक दिन मौका मिलने पर वह शुभांगी के सामने आ कर खड़ा हो गया और पहले की ही तरह गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘शुभांगी, तुम मेरे साथ चलो. मैं तुम्हें जान से भी ज्यादा प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना मैं जिंदा नहीं रह सकता.’’

शुभांगी ने नाराज हो कर उसे खरीखोटी तो सुनाई ही, उस की इस हरकत की शिकायत प्रकाश से भी कर दी. प्रकाश ने जब उसे समझाने की कोशिश की तो उस की बात को समझने के बजाय वह उलटा उसे ही समझाने लगा. इस के बाद दोनों में कहासुनी हो गई.

परेशानी की बात यह थी कि इस के बाद भी विश्वास अपनी हरकतों से बाज नहीं आया. अब वह शुभांगी को परेशान करने लगा. जब इस की जानकारी शुभांगी के भाई को हुई तो उस ने विश्वास की पिटाई कर के चेतावनी दी कि अगर उस ने फिर कभी शुभांगी को परेशान किया तो ठीक नहीं होगा.

शुभांगी के भाई द्वारा पिटाई करने से विश्वास इतना आहत हुआ कि उस ने अपनी इस पिटाई और अपमान का बदला लेने के लिए शुभांगी के प्रति एक खतरनाक फैसला ले लिया. उसे शुभांगी के सारे कामों और आनेजाने की पूरी जानकारी थी ही, इसलिए 18 अक्तूबर, 2016 की सुबह 5 बजे जा कर वह केतन हाइट्स सोसायटी के पास खड़े हो कर उस का इंतजार करने लगा. शुभांगी अपने समय पर वहां पहुंची तो उस की स्कूटी के सामने आ कर उस ने उसे रोक लिया. उस की इस हरकत से नाराज हो कर शुभांगी ने कहा, ‘‘यह क्या बदतमीजी है. अभी तुम्हें या हमें चोट लग जाती तो?’’

‘‘कोई बात नहीं, तुम तो जानती ही हो, आशिक मरने से नहीं डरते. अपनी मंजिल पाने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं.’’ विश्वास ने बेशर्मी से मुसकराते हुए कहा, ‘‘आखिर तुम मेरी बात मान क्यों नहीं लेती?’’

‘‘तुम्हारी बकवास सुनने का मेरे पास समय नहीं है, तुम मेरे सामने से हटो और मुझे काम पर जाने दो.’’

‘‘तुम ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया?’’ विश्वास ने कहा.

‘‘मुझे तुम्हारी किसी बात का जवाब नहीं देना.’’ शुभांगी ने गुस्से में कहा.

‘‘तो क्या तुम्हारा यह आखिरी फैसला है?’’ विश्वास ने पूछा.

‘‘हां…हां,’’ शुभांगी ने लगभग चीखते हुए कहा, ‘‘हां, यह मेरा आखिरी फैसला है. तुम मुझे इस जन्म में तो क्या, अगले 7 जन्मों तक नहीं पा सकोगे.’’

शुभांगी के चेहरे पर अपने लिए नफरत और दृढ़ता देख कर विश्वास को गुस्सा आ गया. लंबी सांस लेते हुए उस ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें कितना समझाया कि तुम मेरी हो जाओ, लेकिन तुम ने मेरी बात नहीं मानी. अब मैं तुम्हारा 7 जन्मों तक इंतजार करूंगा.’’

कह कर विश्वास ने जेब से चाकू निकाला और ताबड़तोड़ वार कर के शुभांगी की हत्या कर दी. इस के बाद जल्दी से उस के मोबाइल फोन के दोनों सिम निकाल कर उसी की स्कूटी से भाग निकला. स्कूटी उस ने पुणे के रेलवे स्टेशन पर पार्किंग में खड़ी कर दी और ट्रेन से कोल्हापुर चला गया.

विस्तृत पूछताछ के बाद विजय कुमार शिंदे ने उस के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस तरह एकतरफा प्यार करने वाला विश्वास अपनी सही जगह पर पहुंच गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Honour Killing : पुलिस को गुमराह करने के लिए लाश पर लगाया गोबर

आ  प ने ‘मुल्लमा’ शब्द तो सुना ही होगा. किसी धातु पर सोने या चांदी की पतली परत चढ़ाना, जिस से वह चमकने लगे और कीमती दिखे, जैसे ‘कलई’ या ‘गिलट’. पर क्या आप ने यह सुना है कि एक मांबाप ने अपनी ही बेटी को मार कर उस की लाश को वहां रखा, जहां वे अपने पालतू पशु बांधते थे और पकड़े जाने की सूरत में पुलिस को गुमराह करने के लिए उस लाश पर जानवरों का गोबर लगा दिया गया था?

इज्जत की खातिर अपनी औलाद को मारने का यह सनसनीखेज मामला उत्तर प्रदेश के मैनपुरी इलाके का है. औनर किलिंग की भेंट चढ़ी उस लड़की का नाम ज्योति था, जिस की लाश 20 जनवरी, 2023 को गांव के चौकीदार मनोज कठेरिया ने बरामद की थी. उस का परिवार भोगांव के मौजेपुर गांव में अपने घर से गायब था.

दरअसल, अशोक यादव नाम के एक शख्स की 24 साल की बेटी ज्योति के पास ही के एक गांव के रहने वाले नौजवान से प्रेम संबंध थे और वह उसी से शादी करना चाहती थी, पर परिवार वाले इस बात पर राजी नहीं थे. इसी तनातनी के चलते अशोक यादव ने अपनी पत्नी और बेटों की मदद से 19 जनवरी, 2023 की रात के 12 बजे ज्योति की गला दबा कर हत्या कर दी और पास ही बने अहाते में गड्ढा खोद कर लाश को दबा दिया था.

इस घटना के दूसरे दिन अशोक यादव के घर में ताला लगा देख कर गांव वालों ने इस की सूचना पुलिस को दी. घटना की एफआईआर गांव के ही चौकीदार मनोज कठेरिया ने अशोक यादव, उन की पत्नी रामा देवी, बेटे अमित, अनुज और अवनीश के खिलाफ दर्ज कराई थी.

लेकिन ट्रायल के दौरान ज्योति के मांबाप ने दावा किया था कि उस ने खुदकुशी की थी. उन्होंने आरोप लगाया कि मनोज कठेरिया ने सिंचाई को ले कर हुए एक झगड़े के चलते एफआईआर दर्ज कराई थी, क्योंकि उस की खेती की जमीन उन की जमीन से सटी हुई थी.

पर सुबूतों और गवाहियों के बाद अब उत्तर प्रदेश की मैनपुरी कोर्ट के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज जहेंद्र पाल सिंह ने ज्योति के मांबाप को उस की गला घोंट कर हत्या करने और लाश को खेत में दफनाने के जुर्म में उम्रकैद की सजा सुना दी. इतना ही नहीं, कोर्ट ने सुबूतों की कमी के चलते ज्योति के तीनों भाइयों को बरी कर दिया और हर कुसूरवार पर 60,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया. Honour Killing

Bollywood Controversy: सलमान के साथ काम करने पर लौरेंस गैंग से पवन सिंह को मिली धमकी!

Bollywood Controversy: बौलीवुड सुपरस्टार सलमान खान को लंबे समय से लौरेंस बिश्नोई गैंग की ओर से धमकियां मिल रही हैं, जिसके बाद उनकी सिक्योरिटी को पहले से ज्यादा बढ़ा दिया गया था. अब इसी कुख्यात गैंग का नाम भोजपुरी इंडस्ट्री के सुपरस्टार पवन सिंह से जुड़े एक चौंकाने वाले मामले में सामने आया है.

रिपोर्ट्स के अनुसार, हाल ही में पवन सिंह को एक अज्ञात नंबर से कौल आया. फोन करने वाले ने खुद को लौरेंस गैंग से जुड़ा बताया और धमकी दी कि अगर पवन सिंह बिग बौस 19 के ग्रैंड फिनाले में सलमान खान के साथ स्टेज पर दिखाई दिए, तो उन्हें गंभीर नतीजे भुगतने होंगे. हैरानी की बात यह है कि कौल करने वाले ने धमकी देने के साथ पैसों की मांग भी रखी, जिससे इस मामले की गंभीरता और बढ़ गई.

धमकियों और दबाव के बावजूद पवन सिंह पीछे नहीं हटे. उन्होंने न सिर्फ ग्रैंड फिनाले में हिस्सा लिया, बल्कि सलमान खान के साथ स्टेज भी शेयर किया. शो के दौरान उन्होंने कंटेस्टेंट नीलम गिरी के साथ जबरदस्त डांस परफौर्मेंस भी दी, जिसने दर्शकों का दिल जीत लिया. उनकी स्टेज प्रेजेंस और कौन्फिडेंस ने साफ कर दिया कि वे किसी भी तरह के डर के आगे झुकने वाले नहीं हैं.

खबरों की माने तो पवन सिंह की सिक्योरिटी पिछले अक्टूबर से ही बढ़ा दी गई थी. मामले की गंभीरता को देखते हुए गृह मंत्रालय ने उन्हें वाई कैटेगरी की सिक्योरिटी दी है. पवन सिंह से जुड़ी इस घटना ने भोजपुरी इंडस्ट्री में हलचल मचा दी है. हालांकि, धमकियों के बावजूद उनका ग्रैंड फिनाले में पहुंचना और दमदार परफौर्मेंस देना उनके प्रोफेशनलिज्म और हिम्मत को दर्शाता है. Bollywood Controversy

Crime News In Hindi: बिहार में सुपारी किलिंग का कहर

Crime News In Hindi: बिहार की धरती पर अपराध का एक नया और खतरनाक चेहरा उभर रहा है. हत्या अब गुस्से का नतीजा नहीं, बल्कि ठेके पर मिलने वाली ‘सेवा’ बन चुकी है. हालिया पुलिस आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ 7 महीनों में 1,436 हत्याएं हुईं और इन में से हर तीसरी हत्या सुपारी दे कर कराई गई.

यह आंकड़ा सिर्फ अपराध का नहीं, बल्कि समाज में गहरे तक फैल चुके अपराधीकरण का सुबूत भी है. हत्या कराने वाला सोचता है कि इस में तो मेरा सिर्फ पैसा लग रहा है. हम आसानी से अपने दुश्मन की हत्या भी करवा देंगे और खुद सेफ रहेंगे.

सनसनीखेज हत्याएं

पटना में एडवोकेट जितेंद्र मेहता की हत्या उन की बेटी के प्रेमी मोहम्मद शोएब ने कराई. डेढ़ लाख रुपए में सौदा तय हुआ. पुलिस ने 8 आरोपियों को गिरफ्तार किया.

गोपाल खेमका नामक कारोबारी की हत्या कारोबारी दुश्मनी के चलते सुपारी शूटरों के जरीए कराई गई.

गैंगस्टर चंदन मिश्रा को मारने के लिए हर शूटर को 4 लाख रुपए देने की डील हुई.

औरंगाबाद में एक औरत ने अपने फूफा के साथ मिल कर सुहागरात के दिन ही पति को मरवा दिया.

इन घटनाओं से साफ है कि हत्या अब पैसों का सौदा बन चुकी है, चाहे वजह प्यार हो, पैसा हो या सत्ता की लड़ाई.

सुपारी किलिंग की दरें

यह जान कर ताज्जुब होता है कि महज 2,000 रुपए एडवांस ले कर अपराधी किसी की हत्या कर देता है. ज्यादातर हत्या का रेट 2 लाख से 10 लाख रुपए के बीच तय किया जाता है.

हत्या करने वाले अपराधी, जिन्हें बिहार में ‘शूटर’ के नाम से जानते हैं, की उम्र 18 से 30 साल के बीच होती है. ज्यादातर बिना आपराधिक रिकौर्ड के होते हैं.

हत्या की अहम वजहों में जमीन विवाद, प्रेम संबंध, राजनीतिक दुश्मनी, कारोबारी रंजिश माना जाता है.

अपराध का उद्योग सुपारी किलिंग

यह अपराध अब यूनिट आधारित संगठित नैटवर्क में बदल चुका है. कौन्ट्रैक्ट फिक्सिंग में एडवांस पैसे ले कर डील पक्की की जाती है. प्रोफैशनल किलर्स या अपराधमुक्त नौजवानों को चुना जाता है. लोकेशन, समय और बचाव की रणनीति तैयार होती है. अपराध के बाद शूटरों को महफूज ठिकाने दिए जाते हैं.

पुलिस की नई पहल ‘किलर सैल’

लगातार बढ़ती घटनाओं को देखते हुए बिहार पुलिस ने ‘किलर सैल नामक एक खास यूनिट बनाई है. इस का मकसद है सुपारी गिरोहों की पहचान करना, वित्तीय स्रोतों का पता लगाना और शूटर नैटवर्क को खत्म करना.

पुलिस अफसरों का कहना है कि यह सैल ‘क्राइम नैटवर्क की रीढ़ तोड़ने’ की दिशा में काम करेगा.

जब कानून व्यवस्था भी हांफने लगे

हर तीसरी हत्या सुपारी दे कर होना केवल अपराध नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था की नाकामी और समाज के लिए बीमारी है. पुलिस के लिए शूटरों की पहचान करना मुश्किल होता है, क्योंकि ज्यादातर का कोई पुराना रिकौर्ड नहीं होता है. अपराध के बाद फरारी और सुबूत मिटाने करने की रणनीति. राजनीतिक संरक्षण और स्थानीय नैटवर्क का समर्थन भी पुलिस की राह में रोड़ा बनता है.

इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए कड़े कानून बनाने की जरूरत है. फास्ट ट्रायल और कड़ी सजा. खुफिया तंत्र को मजबूत करना होगा. गिरोहों की शुरुआती गतिविधियां

पकड़ने के लिए हाईटैक मौनिटरिंग करने पड़ेगी. विवाद सुल झाने में कानूनी रास्तों को प्राथमिकता देनी होगी. अपराध और राजनीति के गठजोड़ को खत्म करना होगा.

राजनीतिक दल के रसूखदार नेता अपराधियों की पैरवी करने लगते हैं, जिस से अपराधियों को मदद मिल जाती है और उन का मनोबल बढ़ जाता है. बहुत से नेताओं का गठजोड़ भी इन शूटर अपराधियों से होता है.

सुपारी किलिंग सिर्फ अपराध नहीं है, बल्कि सरकार की नैतिक और सामाजिक नाकामी है. जब हत्या एक ‘सेवा’ बन जाए और जान की कीमत तय होने लगे, तो यह पूरे समाज की हार है. अब समय है कि पुलिस, कानून और समाज मिल कर इस अपराध उद्योग को जड़ से खत्म करें, वरना वह दिन दूर नहीं जब ‘जान लेना’ बिहार में ‘आम धंधा’ बन जाएगा. Crime News In Hindi

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