बंदूक के दम पर तेजी से बढ़ते अपराध

उत्तर प्रदेश के आगरा में एक मेला लगा था. मेले में डांस दिखाने वाला आरकेस्ट्रा चल रहा था. मंच पर तमाम डांसर नाच रही थीं. कम कपड़ों में डांस करती डांसर फिल्म ‘बुलेट राजा’ के गाने ‘तमंचे पे डिस्को…’ पर डांस कर रही थीं. इस बीच वहां डांस देख रहा एक बाहुबली मंच पर चढ़ गया. उस ने अपनी जेब से पिस्तौल निकाली और एक डांसर की कमर पर लगा दी. वह बाहुबली अपने दूसरे हाथ में पैसे भी लिए हुए था. डांसर की नजर उस के पैसों पर थी. डांसर पैसे लेने के चक्कर में पिस्तौल पर ठुमके लगा रही थी. पैसे की छीनाझपटी के बीच कब पिस्तौल से गोली चल गई, पता ही नहीं चला. वह गोली डांस देख रहे एक आदमी को लग गई. वह आदमी वहीं मर गया. यह इस तरह की अकेली वारदात नहीं है.

वाराणसी जिले में नौटंकी में एक लड़की ‘नथनिया पर गोली मारे सैयां हमार…’ गाने पर डांस कर रही थी. उस के डांस को देख कर वहां मौजूद एक दारोगा तैश में आ गया. उस ने अपनी जेब से पिस्तौल निकाल ली और डांसर के साथ डांस करना शुरू कर दिया.

नशे में धुत्त उस दारोगा को एहसास ही नहीं था कि उस से क्या गलती होने जा रही है. पिस्तौल से गोली चला कर वह नचनिया पर निशाना लगाने लगा. उस का निशाना चूक गया, जिस से डांसर घायल हो गई. अगर निशाना सही लग जाता, तो वह मर जाती.

लखनऊ शहर में एक कारोबारी परिवार में शादी की पार्टी चल रही थी. जब जयमाल हो गया, तो नातेरिश्तेदारों में से कुछ लोगों ने खुशी में बंदूक से गोली चलानी शुरू कर दी. गलती से एक गोली दूल्हे के भाई को लग गई, जिस से वह शादी के उसी मंडप में मर गया.

खुशी में होने वाली इस तरह की तमाम फायरिंग पीडि़त परिवार पर गम का पहाड़ तोड़ देती है.

शादी के अलावा जन्मदिन, बच्चा होने, मुंडन और दूसरे तमाम संस्कारों पर खुशी में फायरिंग का रिवाज होता है. ऐसे में तमाम घटनाएं घट जाती हैं, जो दुख की वजह बनती हैं.

लाइसैंसी असलहे का एक सच यह भी सामने आता है कि ये अपनी हिफाजत से कहीं ज्यादा खुदकुशी करने में इस्तेमाल होते हैं. पुलिस महकमे के आंकड़े बताते हैं कि बंदूक से होने वाली खुदकुशी में 95 फीसदी वारदातें लाइसैंसी असलहे से ही होती हैं.

लखनऊ में ही एक दारोगा की बेटी ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई में फेल होने के बाद पिता की लाइसैंसी रिवौल्वर से गोली मार कर खुदकुशी कर ली. एक रिटायर अफसर ने तनाव में आने के बाद अपनी लाइसैंसी राइफल से खुद को खत्म कर लिया.

ऐसी तमाम वारदातें रोज रोशनी में आती हैं, जहां पर बंदूक संस्कृति अपराध को बढ़ाने का काम करती है. असलहे की यह संस्कृति आम लोगों में दहशत फैलाने का काम भी करती है. बंदूक के बल पर केवल लूट और डकैती ही नहीं, बल्कि बलात्कार जैसे अपराध भी होते हैं.

1. दहशत में शहरी

लखनऊ के विकास नगर महल्ले में माफिया मुन्ना बजरंगी के रिश्तेदार रहते हैं. मुन्ना बजरंगी उत्तर प्रदेश के झांसी जेल में बंद है. जब वह पुलिस की निगरानी में अपने रिश्तेदार से मिलने आया, तो असलहे से लैस उस के समर्थक किसी कमांडो की तरह महल्ले की गलियों में फैल गए. किसी के हाथ में सिंगल बंदूक, तो किसी के हाथ में डबल बैरल रिपीटर बंदूक थी.

ज्यादातर लोगों के पास अंगरेजी राइफल थी. राइफल के साथ ये लोग कारतूस से भरे बैग भी अपने हाथों में लटकाए थे. कई लोगों के पास कमर में लगी पिस्टल भी देखी जा सकती थी.

मुन्ना बजरंगी 3 दिन के पैरोल पर झांसी जेल से बाहर आया था. उस के एक रिश्तेदार की मौत हो गई थी, जिस के परिवार से वह मिलने आया था. मुन्ना बजरंगी को पुलिस एक बुलेटप्रूफ वैन से लाई थी.

लखनऊ के विकास नगर महल्ले में रहने वालों ने पहली बार किसी के साथ बंदूकों का इतना बड़ा जखीरा देखा था. इस के कुछ दिन पहले ही एक और माफिया ब्रजेश सिंह उत्तर प्रदेश विधानपरिषद का चुनाव जीत कर जब शपथ ग्रहण करने लखनऊ विधानसभा पहुंचा था, तो उस के साथ भी बंदूकों का ऐसा ही जलजला देखा गया था.

उत्तर प्रदेश में बाहुबलियों की पसंद रेलवे ठेकेदारी है. आंकडे़ बताते हैं कि साल 1991 से साल 2016 के बीच लखनऊ में रेलवे का ठेका हासिल करने में 12 ठेकेदारों की हत्या हो चुकी है. 1999 के बाद इस में कुछ कमी आई, पर 18 मार्च, 2016 को उत्तर रेलवे में ठेकेदारी विवाद में आशीष पांडेय की हत्या कर दी गई. यह विवाद एक करोड़ रुपए के ठेके को ले कर हुआ था.

लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 6 पर वाशेबल एप्रैल लगाने का काम होना था. आशीष पांडेय अपने साथियों के साथ यह ठेका हासिल करने आया था. ठेका लेने आए दूसरे गुट के लोगों को जब टैंडर डालने से रोका जाने लगा, तो संघर्ष शुरू हुआ और यह वारदात हो गई.

आशीष पांडेय हरदोई जिले का रहने वाला था. वह एक मामले में पहले भी जेलजा चुका था.

उत्तर प्रदेश सब से ज्यादा बंदूक रखने वाले राज्यों में शामिल है. साल 2012 से साल 2015 के बीच देश में 47 फीसदी बंदूकें जब्त की गईं, जिन की तादाद 16,925 रही. बंदूकों के जब्त होने के मामले में उत्तर प्रदेश सब से आगे है. यहां तकरीबन 7 फीसदी बंदूकें जब्त की गईं. इन की कुल तादाद 2,283 रही.

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर को भारत की गन कैपिटल कहा जाता है. यहां बंदूक बेचने की सब से ज्यादा दुकानें हैं. उत्तर प्रदेश के बाद बिहार, पश्चिम बंगाल, जम्मूकश्मीर, असम, महाराष्ट्र, मणिपुर, हरियाणा और झारखंड का नंबर आता है. यही वजह है कि इन राज्यों में बंदूक से होने वाले अपराध सब से ज्यादा होते हैं.

इन प्रदेशों में जब लोकल लैवल पर हिंसा होती है, तो वहां पर सब से ज्यादा इस तरह की बंदूकों का इस्तेमाल होता है. चुनावों के समय यहां होने वाली हिंसा में भी गैरलाइसैंसी बंदूकों का इस्तेमाल सब से ज्यादा होता है. केवल दुश्मनी निकालने में ही नहीं, बल्कि खुशी के समय पर भी होने वाली फायरिंग में तमाम बार जान चले जाने की वारदातें होती हैं.

2. अपराध हैं ज्यादा

बंदूक को अपनी हिफाजत के लिए रखा जाता है. असल बात यह है कि बंदूक अपनी हिफाजत से ज्यादा दहशत फैलाने और समाज में अपराध को बढ़ावा देने में काम आती है. बंदूक रखना अपने दबदबे को बनाए रखने का आसान तरीका हो गया है.

भारत में कितनी बंदूकें हैं, इस बात का कोई आधिकारिक आंकड़ा सरकार के पास नहीं है. अपराध के आंकड़ों को देखने से पता चलता है कि देश में लाइसैंसी बंदूकों से ज्यादा गैरलाइसैंसी बंदूकें हैं.

बंदूकों से होने वाली हत्याओं को देखें, तो पता चलता है कि 90 फीसदी हत्याओं में गैरलाइसैंसी बंदूकों का इस्तेमाल होता है. चुनावी हिंसा में सब से ज्यादा बंदूकों का इस्तेमाल होता है.

चुनाव को करीब से देखने वाले कहते हैं कि चुनावों में बूथ कैप्चरिंग और वोट न डालने देने की वारदातों में बंदूकों का जम कर इस्तेमाल होता है. छोटेबडे़ पंचायत चुनावों से ले कर लोकसभा चुनावों तक में बहुत सारे पुलिस इंतजाम के बाद भी बंदूक का जोर देखने को मिलता है.

इन चुनावों में हिंसक वारदातें होती रहती हैं. इन को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने चुनावों के समय बंदूकों को जमा कराने की मुश्किल भी शुरू की. लाइसैंसी बंदूकों के जमा होने के बाद भी चुनावी हिंसा की वारदातों से पता चलता है कि देश में लाइसैंसी हथियार से ज्यादा गैरलाइसैंसी हथियार हैं.

देश में फैक्टरी मेड और हैंडमेड हर तरह के असलहे मिलते हैं. इन का इस्तेमाल ऐसे ही अपराधों में किया जाता है. देश में बढ़ती बंदूक संस्कृति ने ही नक्सलवाद और आतंकवाद को बढ़ाने का काम किया है.

3. गैरलाइसैंसी हथियार ज्यादा

देश में लाइसैंसी से ज्यादा गैरलाइसैंसी हथियार जमा हो रहे हैं. लाइसैंसी हथियार लेने के लिए सरकारी सिस्टम से गुजरना पड़ता है. पुलिस से ले कर जिला प्रशासन तक की जांच से गुजरने के बाद बंदूक रखने का लाइसैंस मिलता है.

कई तरह के असलहे रखने के लिए शासन लैवल से मंजूरी लेनी पड़ती है. इस सिस्टम में बहुत सारा पैसा रिश्वत और सिफारिश में खर्च हो जाता है.

हर जिलाधिकारी के पास सैकड़ों की तादाद में लाइसैंस लेने के लिए भेजे गए आवेदन फाइलों में धूल खाते हैं. ऐसे में अपराध करने वाले लोग गैरकानूनी असलहे रखने लगते हैं.

आकंड़ों के मुताबिक, देश में साल 2012 से साल 2015 के बीच 4 सालों में 36 हजार से ज्यादा गैरकानूनी असलहे पकडे़ गए. साल 2009 से ले कर 2013 बीच 15 हजार से ज्यादा मौतें गैरकानूनी असलहों से हुईं. पुलिस महकमे से जुडे़ लोगों का मानना है कि कई ऐसे परिवार हैं, जहां पीढ़ी दर पीढ़ी केवल बंदूक बनाने का ही काम होता है.

उत्तर प्रदेश का पश्चिमी हिस्सा इस तरह की फैक्टरी चलाने वाला सब से बड़ा इलाका है. मध्य उत्तर प्रदेश में हरदोई सब से बड़ा जिला है, जहां हर तरह की ऐसी बंदूकें बनाई जाती हैं, जैसी ओरिजनल बनती हैं. इन को भ्रष्ट पुलिस की मिलीभगत से खरीदाबेचा जाता है.

दरअसल, गैरकानूनी असलहे को खरीदने और बेचने का एक बड़ा कारोबार है. इस के जरीए करोड़ों रुपयों की रकम इधर से उधर होती है. 3 हजार से ले कर 50 हजार रुपए तक के असलहे इन गैरकानूनी फैक्टरियों में बनते और बिकते हैं. उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों में जितने हथियार एक जिले में हैं, उतने किसी बाहरी देश में नहीं हैं.

साल 2011 के एक सर्वे में बताया गया कि भारत के 671 जिलों में से केवल 324 जिलों में 4 करोड़ लोगों के पास हथियार पाए गए. इन में से केवल 15 फीसदी लोगों के पास लाइसैंसी हथियार थे. बंदूक से होने वाली मौतों के मामले में 5 शहरों में से 4 शहर मेरठ, इलाहाबाद, वाराणसी और कानपुर उत्तर प्रदेश के हैं.

उत्तर प्रदेश के बाद बिहार सब से ज्यादा असलहे वाला प्रदेश है. गैरकानूनी असलहे का इस्तेमाल सब से ज्यादा बाहुबली और दबंग अपने दबदबे को बढ़ाने के लिए करते हैं. इस से ही वह अपना असर बढ़ाने का काम करते हैं.

समाज में अपराध को रोकने के लिए बंदूक संस्कृति पर रोक लगाने की जरूरत है. यह काम केवल लाइसैंस सिस्टम से काबू में आने वाला नहीं है. ऐसे में जरूरी है कि कुछ नया सिस्टम लागू किया जाए, जिस से समाज में बढ़ती बंदूक संस्कृति को रोका जा सके.

4. ‘बंदूक कल्चर’ पर फिल्मों का असर

आज तमाम फिल्में ऐसी बनती हैं, जिन में बंदूक संस्कृति को ग्लैमर की तरह पेश किया जाता है. बंदूक के बल पर अपराधियों को ऐश करते दिखाया जाता है. इस को देख कर आम जिंदगी में भी लोग बंदूक संस्कृति को बढ़ाने में लग जाते हैं. इस के अलावा आम लोगों में दिखावे की सोच बढ़ रही है, जिस से वे बंदूक खरीदना चाहते हैं.

शहरों से कहीं ज्यादा गांवों में यह चलन बढ़ रहा है. गांवों में जमीन बेच कर बंदूक खरीदने का चलन है. यहां पर लोग अपने दबदबे को बढ़ाने के लिए बंदूक खरीदते हैं. कई लोग तो ऐसे भी हैं, जिन के पास केवल साइकिल है, पर वे लोग भी बंदूक रखते हैं.

बंदूक की आड़ में समाज में गैरकानूनी असलहे बढ़ रहे हैं. सरकार को गैरकानूनी असलहे को जब्त करने के लिए सरकार को योजना बनानी होगी. जब तक यह योजना नहीं बनती, तब तक समाज को अपराध से मुक्त नहीं किया जा सकता. आम जिंदगी ठीक से गुजरे, इस के लिए जरूरी है कि समाज को बंदूक से दूर रखा जाए.

जब एक बैनर ने पकड़वाया कातिल

पटना गया रेलवे लाइन के पास कई टुकड़ों में मिली लाश की गुत्थी को एक बैनर ने सुलझा दिया. 45 साला गीता की लाश के कुछ टुकड़े सरस्वती पूजा के लिए बने बैनर में लिपटे मिले थे. उस बैनर पर फ्रैंड्स क्लब, कुसुमपुर कालोनी, नत्थू रोड, परसा बाजार लिखा हुआ था. इस गुत्थी को सुलझाने के लिए सदर अनुमंडल पुलिस अधीक्षक प्रमोद कुमार मंडल की अगुआई में जक्कनपुर थाना इंचार्ज अमरेंद्र कुमार झा और परसा बाजार थाना इंचार्ज नंदजी प्रसाद व दारोगा रामशंकर की टीम बनाई गई. पूछताछ के बाद पता चला कि उस बैनर को रंजन और मेकैनिक राजेश अपने साथ ले कर गए थे. पुलिस ने तुरंत राजेश को दबोच लिया. राजेश से पूछताछ करने के बाद कत्ल की गुत्थी चुटकियों में हल हो गई.

गीता का कत्ल उस के अपनों ने ही कर डाला था. कत्ल से ज्यादा दिल दहलाने वाला मामला लाश को ठिकाने लगाने के लिए की गई हैवानियत थी. गीता के पति उमेश चौधरी, बेटी पूनम देवी और दामाद रंजन ने मिल कर गीता का कत्ल किया था. रंजन और उस के दोस्त राजेश ने मिल कर लाश को 15 छोटेछोटे टुकड़ों में काटा. उमेश, पूनम और राजेश को पुलिस ने दबोच लिया है, जबकि रंजन फरार है. हत्या में इस्तेमाल किए गए 3 धारदार हथियार भी पुलिस ने बरामद कर लिए हैं.

रंजन और राजेश ने गीता की लाश को चौकी पर रखा और हैक्सा ब्लेड से सब से पहले सिर को धड़ से अलग किया. सिर को काटने के बाद खून का फव्वारा बहने लगा, तो खून को एक प्लास्टिक के टब में जमा कर लिया और टौयलेट के बेसिन में डाल कर फ्लश चला दिया. उस के बाद लाश के दोनों हाथपैरों को काटा गया.

गीता की बोटीबोटी काट कर उसे कई पौलीथिनों में बांध कर दूरदूर अलगअलग जगहों पर फेंक दिया. धड़ को कुसुमपुर में ही पानी से भरे एक गड्ढे में फेंक दिया गया. सिर को जक्कनपुर थाने के पास गया फेंका गया. वहीं पर हत्या में इस्तेमाल किए गए गड़ांसे और हैक्सा ब्लेड वगैरह को फेंक दिया गया.

हाथपैरों के टुकड़ों को पटनागया पैसेंजर ट्रेन में रख कर रंजन और राजेश पुनपुन रेलवे स्टेशन पर उतर गए. पटना गया पैसेंजर ट्रेन जब गया स्टेशन पहुंची, तो रेलवे पुलिस ने एक डब्बे में लावारिस बैग बरामद किया. उस बैग में हाथपैर के टुकड़े मिलने से गया पुलिस ने 18 अप्रैल को पटना पुलिस को सूचित किया. पटना पुलिस को धड़ और सिर पहले ही मिल चुके थे. शरीर के सभी हिस्सों को जोड़ने के बाद पता चला कि वह एक ही औरत की लाश है.

हत्यारों द्वारा गीता के जिस्म के टुकड़ों को अलगअलग जगहों पर फेंकने की वजह से हत्या के मामले को 3 थानों में दर्ज कराना पड़ा. गया के जीआरपी थाने में हाथपैर मिलने का, परसा बाजार में सिर मिलने का और पटना के जक्कनपुर थाने में धड़ मिलने का मामला दर्ज किया गया.

पटना के एसएसपी मनु महाराज कहते हैं कि अपराधी चाहे कितनी भी चालाकी कर ले, कोई न कोई सुबूत पुलिस के लिए छोड़ ही जाता है. गीता की हत्या करने वालों ने भी कानून की पकड़ से बचने के लिए पूरा उपाय किया था, पर उस के दामाद ने ऐसा सुबूत छोड़ दिया कि पुलिस आसानी से उन तक पहुंच गई.

कत्ल के 40 घंटे के भीतर पटना सदर पुलिस की टीम ने पूरे मामले का खुलासा कर दिया. 3 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया. गीता का कत्ल कर उमेश अपनी बेटी पूनम के साथ मसौढ़ी चला गया था. उस के बाद रंजन ने अपने साथ काम करने वाले दोस्त राजेश को घर पर बुलाया और उस की मदद से लाश को टुकड़ों में काट डाला. इस के बदले में रंजन ने उसे 20 हजार रुपए देने का लालच दिया था.

17 अप्रैल की रात को पूनम ने अपनी मां गीता को चिकन खाने के लिए घर पर बुलाया था. वहां उमेश और रंजन पहले से मौजूद थे. पूनम ने चिकन में नींद की गोलियां मिला दी थीं. खाना खाने के बाद गीता बेहोश हो गई. तकरीबन 5 घंटे के बाद गीता को होश आया, तो उसे काफी कमजोरी महसूस हो रही थी.

गीता ने कमरे में इधरउधर देखा, तो कोई नजर नहीं आया. किसी तरह से उस ने अपने मोबाइल फोन से तुरंत अपने प्रेमी अरमान को फोन किया और बताया कि उस की तबीयत काफी खराब लग रही है. इसी बीच गीता का दामाद रंजन कमरे में पहुंच गया और उस ने गीता को मोबाइल फोन पर किसी से बात करते हुए सुन लिया. रंजन ने गुस्से में आ कर गीता का गला दबा कर उसे मार डाला.

पुलिस की छानबीन में पता चला है कि गीता का अरमान नाम के शख्स से नाजायज रिश्ता था. इस वजह से पति और बेटी ने मिल कर उस की हत्या कर डाली. गीता हर महीने अपने पति उमेश से रुपए लेने पहुंच जाती थी और उस से उस की तनख्वाह का बड़ा हिस्सा ले कर अपने प्रेमी अरमान को दे देती थी. पिछले 20 सालों से गीता और अरमान के बीच नाजायज रिश्ता था. गीता का पति उमेश सचिवालय के भवन निर्माण विभाग में ड्राफ्टमैन था.

55 साल के उमेश की शादी 30 साल पहले मसौढ़ी के तरेगाना डीह की रहने वाली गीता से हुई थी. शादी के बाद गीता ससुराल में रहने लगी और उन के 3 बच्चे भी हुए. कुछ सालों के बाद उमेश लकवे का शिकार हो गया. पति की बीमारी का फायदा उठाते हुए गीता ने अपने पड़ोसी अरमान से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी और उस के बाद जिस्मानी रिश्ते भी बने. वह ज्यादा से ज्यादा समय अरमान के साथ ही गुजारती थी.

गीता की इस हरकत से उमेश और उस की बेटियां गुस्से में रहती थीं. उन्होंने कई दफा गीता को समझाने और परिवार को संभालने की बात की, पर गीता पर उन की बातों का कोई असर नहीं होता था. यही वजह थी कि गीता का इतनी बेरहमी से कत्ल किया गया.

गांव वालों के ताने सुन कर उमेश परेशान रहने लगा था और उस ने अपना पुश्तैनी घर भी छोड़ दिया था. उस के बाद उमेश ने कुसुमपुर वाला घर भी छोड़ दिया. कभीकभी वह मसौढ़ी में अपनी ससुराल वाले घर में रहता था, तो कभी पटना में रहता था.

एसएसपी मनु महाराज ने बताया कि हत्यारों ने हत्या में इस्तेमाल किए गए गंड़ासे और हैक्सा ब्लेड को फ्लैक्स में लपेट कर फेंका था. बैनर पर कुसुमपुर फ्रैंड्स क्लब का पता लिखा हुआ था. उसी पते के सहारे पुलिस कुसुमपुर पहुंची और फ्रैंड्स क्लब का पता कर के हत्यारों तक आसानी से पहुंच गई.

इस लड़के ने रेलवे को लगाया करोड़ों का चूना

12वीं जमात में पढ़ने वाले हामिद अशरफ नाम के एक 19 साला लड़के ने 2 सालों में भारतीय रेल को करोड़ों रुपए का चूना लगाया और रेलवे अफसरों को इस की भनक तक नहीं लगी. मामले का खुलासा तब हुआ, जब रेलवे विजिलैंस टीम ने इस की शिकायत बेंगलुरु व लखनऊ की सीबीआई टीम से की. पता चला कि रेल का टिकट बुक करने वाली आईआरसीटीसी वैबसाइट का क्लोन तैयार कर देशभर की कई जगहों से फर्जी तरीके से तत्काल टिकट की बुकिंग की जा रही थी.

इस मामले के खुलासे के लिए रेलवे विजिलैंस व सीबीआई टीम द्वारा पिछले 2 सालों से कोशिश की जा रही थी कि अचानक सीबीआई के हाथ एक क्लू लगा कि देशभर में तकरीबन 5 हजार एजेंटों के जरीए आईआरसीटीसी की वैबसाइट को हैक कर तत्काल टिकटों के कोटे में सेंध लगा दी गई थी और इस का संचालन उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से किया जा रहा था.

इस के बाद बेंगलुरु की सीबीआई टीम के इंस्पैक्टर टी. राजशेखर और लखनऊ सीबीआई टीम के इंस्पैक्टर रमेश पांडेय की टीम रेलवे विजिलैंस के साथ बस्ती पहुंची और पुरानी बस्ती के थाना प्रभारी रणधीर मिश्र के साथ मिल कर 3 दिनों तक इस मामले के खुलासे की कोशिश करती रही.

आखिरकार पुलिस की मेहनत रंग लाई. 27-28 अप्रैल, 2016 की रात सीबीआई टीम ने पुरानी बस्ती थाने के थाना प्रभारी रणधीर मिश्र व एसआई अरविंद कुमार व रामवृक्ष यादव, एचसीपी रामकरन और महिला सिपाही प्रीति पांडेय के साथ मिल कर दरवाजा नाम की जगह पर बनी एक मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान पर छापा मारा, तो गुफानुमा संकरे गलियारों से होते हुए जब पुलिस के लोग एक कमरे में पहुंचे, तो वहां तकरीबन 19 साला एक किशोर को 10 लैपटौप के बीच काम करता हुआ पाया गया.

उस लड़के ने पुलिस को देखते ही भागने की कोशिश की, लेकिन पुलिस की मुस्तैदी से वह धर दबोचा गया.

हामिद अशरफ ने बताया कि वह पिछले 2 साल से आईआरसीटीसी का क्लोन तैयार कर वैबसाइट को हैक कर चुका था, जिस के जरीए उस ने नकली सौफ्टवेयर बना कर पूरे देश में तकरीबन 5 हजार एजेंट तैयार किए थे. इन एजेंटों से उसे अच्छीखासी रकम मिलती थी.

जहां रेल महकमा एक टिकट को बुक करने में एक मिनट का समय लगाता था, वहीं हामिद अशरफ द्वारा तैयार किए गए सौफ्टवेयर से 30 सैकंड में ही टिकट की बुकिंग हो जाती थी.

  1. हामिद की चाहत

 हामिद अशरफ ने पुलिस को बताया कि वह बस्ती जिले के कप्तानगंज थाने के वायरलैस चौराहे का रहने वाला है. उस के पिता जमीरुलहसन उर्फ लल्ला बिल्डिंग मैटीरियल का कारोबार करते हैं. लेकिन घर का खर्च मुश्किल से ही चल पाता था. ऐसे में उसे इंजीनियर बनने का सपना पूरा होता नहीं दिखा.

माली तंगी से परेशान हो कर वह अपने मामा के घर आ कर रहने लगा. बस्ती रेलवे स्टेशन के पास ही एक दुकान पर वह रेलवे टिकट निकालने का हुनर सीखने लगा.

चूंकि हामिद अशरफ का झुकाव इंजीनियरिंग की ओर था. ऐसे में रेलवे टिकट की बुकिंग के दौरान उस के दिमाग में एक ऐसी योजना आई, जिस से न केवल उस ने आईआरसीटीसी का सौफ्टवेयर तैयार किया, बल्कि रुपयों की बौछार भी होने लगी.

2. बेचता था सौफ्टवेयर

 हामिद अशरफ ने आईआरसीटीसी की डुप्लीकेट वैबसाइट को बेचने के लिए तमाम सोशल साइटों का सहारा लिया. देखते ही देखते पूरे देश में तकरीबन 5 हजार एजेंटों की फौज तैयार कर ली. इस सौफ्टवेयर को वह 60 हजार से 80  हजार रुपए में एजेंटों को बेचता था.

2 साल में हामिद अशरफ ने नकली सौफ्टवेयर के जरीए इतना पैसा कमा लिया था कि उस के एक ही खाते में तकरीबन 50 लाख रुपए जमा होने की जानकारी पुलिस को हुई.

हामिद अशरफ लोगों की नजर में तब आया, जब उस ने औडी जैसी महंगी गाड़ी की बुकिंग कराई. साथ ही, उस ने अपने पिता के लिए नकद रुपए दे कर एक बोलैरो गाड़ी खरीदी थी.

इंटरनैट पर सर्च कर के हामिद अशरफ ने जानकारी इकट्ठा की थी कि किस तरह से किसी भी साइट को हैक कर इस की सिक्योरिटी में सेंध लगाई जा सकती है.

हामिद अशरफ ने यह कबूला कि उस ने 2 सालों में रेलवे को तकरीबन 16 करोड़ रुपए का चूना लगाया है, लेकिन सीबीआई व पुलिस का मानना है कि यह रकम कई करोड़ रुपए हो सकती है.

3. टूटेगा गिरोह का नैटवर्क

 पुरानी बस्ती थाना क्षेत्र से पकड़े गए हामिद अशरफ की कारगुजारी को ले कर हर कोई हैरान है. यहां के लोगों को इस बात पर यकीन नहीं हो रहा कि हामिद इतना बड़ा शातिर निकलेगा.

गिरफ्तारी के बाद उसे सीबीआई की लखनऊ कोर्ट में पेश किया गया, जहां से बेंगलुरु की सीबीआई टीम उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले कर बेंगलुरु चली गई.

सूत्रों की मानें, तो सीबीआई बस्ती के अलावा गोरखपुर, संत कबीरनगर, फैजाबाद, गोंडा समेत देश के अलगअलग इलाकों से जुड़े लोगों के बारे में जानकरी इकट्ठा करने की कोशिश कर रही है.

4. रेलवे पर उठे सवाल

भारतीय रेल सेवा के नैटवर्क में 19 साला एक लड़के ने इस तरह से सेंध लगाई कि देखते ही देखते 2 साल में उस ने रेलवे को 16 करोड़ रुपए का चूना लगा दिया. इस के अलावा देशभर में तैयार किए गए तकरीबन 5 हजार एजेंटों ने पता नहीं कितने रुपए का चूना लगाया होगा.

इस मामले की जांच सीबीआई के हवाले है. बस्ती पुलिस ने बताया कि उस की भूमिका सीबीआई और रेलवे विजिलैंस टीम के साथ हामिद अशरफ की गिरफ्तारी तक थी. इस के बाद क्या हुआ, पुलिस को नहीं पता.

इस मामले के मास्टरमाइंड की गिरफ्तारी हो चुकी है. अब देखना यह है कि सीबीआई और रेलवे विजिलैंस टीम हामिद अशरफ द्वारा तैयार किए गए देशभर के नैटवर्क को किस तरह से खत्म करती है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें