Hindi Story: लिफाफे में रसगुल्ला

Hindi Story:अपने देश में मिठाइयों की परंपरा बहुत पुरानी है. शादीब्याह, जन्मदिन, तबादला, चुनाव या कोई भी सैलिब्रेशन हो, मुंह मीठा करना तो बनता ही है. लेकिन मिठाइयां भी कई तरह की होती हैं. कुछ मिठाइयां कागज के डब्बे में आती हैं और कुछ मिठाइयां लिफाफे में आती हैं और लिफाफे में आया हुआ रसगुल्ला बेहद मीठा होता है. यह आधुनिक और विकसित भारत की सब से उन्नत मिठाई है.
यह ऐसी मिठाई है कि इस में चींटी लगती है, डायबिटीज बढ़ती है और ही ब्लड प्रैशर बढ़ता है.

बस, मन मीठा हो जाता है, सिस्टम मीठा हो जाता है. और जो रसगुल्ले लिफाफे में आते हैं, वे साधारण रसगुल्ले नहीं होते हैं. इतने मुलायम और पसंदीदा होते हैं कि इन के लिए नियमकानून खुद पिघल कर आइसक्रीम बन जाते हैं, जमीन पर बिछ जाते हैं. और ये इतने सफेद होते हैं कि काले से काले काम भी सफेदसफेद लगने लगते हैं. इन रसगुल्लों को खाने के बाद अफसर की फाइलें दौड़ने लगती हैं, जनता की अर्जियां इस टेबल से उस टेबल तक उछलकूद करने लगती हैं. जितना भारी लिफाफा, उतनी तेज दौड़ होती है उस फाइल की. देखने और सुनने में यह लिफाफा बहुत ही मासूम और खूबसूरत दिखता है, लेकिन उस पर रसगुल्ला लिखा होता है और ही मिठाई लिखी होती है, लेकिन मीठा पूरा होता है.

उस में खालिस देशी घी के लड्डू जितनी मिठास और काजू कतली के जैसे स्वाद भरे होते हैं. हलका इतना होता है कि जेब में रखा जा सके और भारी इतना होता है कि किसी भी काम का बो? अपने कंधे पर उठा सके. अगर कोई इस लिफाफे के बारे में नहीं जानता और सम?ाता है, तो या तो वह बहुत बड़ा गधा और बेवकूफ है या फिर बहुत ईमानदार है और उस की नईनई भरती हुई है और पानी में रह कर मगरमच्छ से बैर करने के बारे में सोच रहा है, जिस में उस की खैर नहीं है. जिसे ऐसे लिफाफे के बारे में ज्ञान नहीं है, उसे इस ज्ञान की बहुत जरूरत है. नेताजी किसी अफसर के घर जाते हैं, तो कहते हैं, ‘अरे साहब, बस
शगुन है.’ अफसर भी मुसकरा कर जवाब देते हैं, ‘अरे, इस की क्या जरूरत थी,’ जबकि दोनों जानते हैं कि सब से ज्यादा इसी चीज की जरूरत थी. बाकी बातें तो औपचारिकता होती हैं, मेन सैलिब्रिटी तो यही होता है.

फिर वह अफसर बड़े ही सलीके से शगुन को अलमारी में रख देता है, ताकि उस के बच्चों का भविष्य भी मीठामीठा रहे और उस की पत्नी के गले में नौलखा हार सजता रहे. लिफाफा के रसगुल्ले खाने का सब से बड़ा फायदा यह है कि ही इसे रिश्वत कहा जाता है और ही यह कड़वा और बदनाम और संवैधानिक होता है. एक तरह से देखा जाए, तो रिश्वत बहुत ही खराब शब्द हैयह भी कोई कहने का और बोलने का शब्द है. हां, रसगुल्ला कहना सही है. रसगुल्ला संस्कृति है, परंपरा है, मिठास है और जब लिफाफे में रहता है, तो सम्मान भी कहा जा सकता है. उधर ईमानदारी अपना माथा कूटती रहती है कि गलती मेरी ही थी क्या कि मैं ने लिफाफा को पहना और ही रसगुल्ला खा पाई और हिस्से में मेरी सूखी रोटी आई? सब भाषण में ईमानदारी की तारीफ करते हैं, लेकिन खाते समय कोई बांट कर खाना याद नहीं रखता है.

लिफाफे के रसगुल्ले को कमतर मत मानिए, क्योंकि लिफाफे का रसगुल्ला बहुत ही चमत्कारिक होता है. जो कल तक फाइल जांच के अधीन होती है, वह विचाराधीन हो जाती है और परसों मंजूर. अगर कोई भूलेभटके उस फाइल के बारे में पूछ ले, तोप्रोसैस चल रहा हैजैसे जवाब हमेशा तैयार रहते हैं. रसगुल्ला पाचन का तरीका इसे कह सकते हैं. सब से मजेदार बात यह है कि लिफाफे में रसगुल्ले देने वाला और लेने वाला दोनों ही खुद को नैतिकता का पहरेदार मानते हैं. देने वाला सोचता है कि मजबूरी में दे रहा हूं और लेने वाला सोचता है कि अब लक्ष्मी को कौन मना करने जाए. जनता सोचती रह जाती है कि वह क्या करे.
आजकल डिजिटल जमाना है. रसगुल्ले भी स्मार्ट हो गए हैं. पहले हाथ से दिए जाते थे, पर अब सिस्टम के जरीए पहुंचते हैं, पर नाम वही रहता है लिफाफे में रसगुल्ले. तकनीक बदली है, स्वाद नहीं बदला है और ही रसगुल्ले का मिजाज बदला है.

अगर आप को भी ऐसे रसगुल्ले खाने को मिलें, तो बेवकूफों के जैसे छोड़ कर पछताना नहीं. सम?ादार वही है जो लिफाफा खाए और मुंह मीठा होने का दावा भी करे. लेकिन एक बात का ध्यान जरूर रखना कि लिफाफे में रसगुल्ला सुन कर सचमुच लिफाफे में रसगुल्ला मत भेजिएगा, क्योंकि अफसर उसे आप के मुंह पर फेंक देगा. नारियल के चक्कर में नहर में बह गया बच्च उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में दनकौर के दौला रजपुरा गांव में 27 फरवरी को गंग नहर में बहते नारियल को पकड़ने की कोशिश में.

4 साल का अदनान तेज बहाव में डूब गया. दरअसल, दौला रजपुरा के रहने वाले इसरार का छोटा बेटा अदनान उस शाम को अपने 10 साल के बड़े भाई के साथ नहर किनारे खेल रहा था. उसी समय नहर में एक नारियल तैरता दिखाई दिया. दोनों भाई उसे लेने पानी में उतरे. बड़ा भाई किसी तरह बाहर निकल गया, लेकिन अदनान तेज बहाव के चलते पानी में बह गया. उस के परिवार वालों ने प्रशासन पर देरी करने का आरोप लगाया.

रेखा शाह

घूस की मार से देश बीमार

मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के गोहपारु थाने के असिस्टैंट सब इंस्पैक्टर एम एल शुक्ला को 7 मई को लोकायुक्त पुलिस, रीवा ने 3 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगेहाथों पकड़ा. मारपीट के एक मामले को रफादफा करने के लिए आरोपी से यह घूस ली जा रही थी.

शाजापुर जिले के आगर मालवा के ब्लौक मैडिकल औफिसर डा. आर एल मालवीय को 9 मई को 250 रुपए की घूस लेते वक्त लोकायुक्त पुलिस उज्जैन द्वारा गिरफ्तार किया गया. सेमली गांव निवासी सरकारी तौर पर घोषित एक गरीब आदमी अनवर खां की 10 वर्षीय बेटी फरजाना के कान में चांदी का घुंघरू फंस गया था, अस्पताल में इलाज के लिए ले जाने पर उक्त डाक्टर ने 450 रुपए मांगे थे.

9 मई को ही शाजापुर के गांव अकोदिया के पटवारी संतोष सोलंकी को उज्जैन लोकायुक्त ने एक किसान से 3 हजार रुपए की घूस लेते रंगेहाथों पकड़ा. घूस नामांतरण के लिए ली गई थी. सौदा कुल 8 हजार रुपए में तय हुआ था जिस में से 5 हजार रुपए पीडि़त किसान पूर्व में उक्त पटवारी को दे चुका था.उज्जैन जनपद पंचायत के सहायक मंत्री कमल सिंह सिसौदिया को 20 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगेहाथों लोकायुक्त द्वारा पकड़ा गया. नयागांव के सरपंच नरेंद्र सिंह से यह रिश्वत एक सरकारी इमारत बनवाने की इजाजत के लिए ली गई थी. कुल सौदा 1 लाख रुपए में तय हुआ था.

भोपाल में 8 मई को स्कूली शिक्षा विभाग के एक ब्लौक एकेडमिक  कोऔर्डिनेटर विक्रम सिंह प्रजापति को लोकायुक्त ने 4 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगेहाथों गिरफ्तार किया. यह घूस एक स्कूल को मान्यता देने के एवज में मांगी गई थी. भोपाल के टीटी नगर इलाके में बीआरसी यानी विकास खंड स्रोत समन्वय कार्यालय है. यह विभाग स्कूलों का निरीक्षण तयशुदा मानदंडों पर करता है. कुछ दिन पहले वी एस प्रजापति ने निजामुद्दीन कालोनी स्थित स्कौलर स्कूल का निरीक्षण किया था और मान्यता देने के लिए 4 हजार रुपए एस ए अहमद नाम के शिक्षक से मांगे थे.

8 मई को मंदसौर जिले के पीपल्या मंडी शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के प्रभारी प्राचार्य जे के डोसी को लोकायुक्त दल द्वारा 4 हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगेहाथों गिरफ्तार किया गया. यह रिश्वत राकेश काबरा, कमलेश पाटीदार और संजय पंवार नाम के अनुबंधित शिक्षकों से पिछले डेढ़ महीने की पगार निकालने के बाबत ली गई थी.

3 दिन में रिश्वत के ये 7 बड़े मामले केवल मध्य प्रदेश के हैं. राज्य में औसतन हर दिन 2 मुलाजिम घूस लेते रंगेहाथों पकड़े जाते हैं. पकड़े गए 90 फीसदी मुलाजिम छोटे पद वाले होते हैं. 10 फीसदी ही बड़े यानी मगरमच्छ होते हैं जिन से करोड़ोंअरबों की नामीबेनामी संपत्ति और नकदी जब्त होती है. साल 2013 में 15 मई तक 300 से भी ज्यादा सरकारी कर्मचारी घूस लेते पकड़े गए.

ये मामले चिंतनीय इस लिहाज से भी हैं कि घूस लेने के तौरतरीके तेजी से बदल रहे हैं और न पकड़े जाने वाले मामलों की तादाद जाहिराना तौर पर लाख गुना ज्यादा होगी. वजह, सभी लोग शिकायत नहीं करते हैं.

घूस के नए तौरतरीके

तेजी से पनपती घूसखोरी के सियासी नतीजे क्या होंगे यह तो कहना अभी मुश्किल है पर आगर मालवा के ब्लौक मैडिकल औफिसर आर एस मालवीय ने तो शर्मोहया की सारी हदें पार कर दीं. अनवर खां गरीबी रेखा कार्डधारी (बीपीएल) है यानी मुश्किल से कमाखा पाता है. एक दिन बेटी के कान में चांदी का घुंघरू फंस गया. वह बेटी को ले कर सरकारी अस्पताल पहुंचा जहां डाक्टर साहब ने उस की हैसियत देखते हुए केवल 450 रुपए रिश्वत के मांगे. अनवर की जेब में उस वक्त महज

100 रुपए थे जो उस ने तुरंत ईमानदारी से दे दिए और बचे 350 रुपए बाद में देने का वादा कर लिया. बेटी की तकलीफ दूर करने के लिए वह कुछ भी कर सकता था. डाक्टर साहब ने तो उस की गरीबी देखते भारी डिस्काउंट भी दे दिया था, दूसरी सहूलियत यह दी कि रिश्वत में भी उधारी कर दी. अस्पताल न हुआ बनिए की दुकान हो गई कि किराने का सामान ले जाओ, पैसे बाद में जब हों, दे देना.

2 दिन बाद दूसरी दफा वह बेटी को दिखाने गया तो घूसखोर डाक्टर साहब बकाया पैसे न मिलने पर ?ाल्ला उठे और 10 वर्षीय फरजाना को अस्पताल में ही यह कहते बैठा लिया कि बेटी छोड़ जाओ, जब पैसों का इंतजाम हो जाए तो अपनी बेटी को ले जाना. बेचारी मासूम फरजाना घंटों बंधक बनी रही या गिरवी रही. इस बात से अनवर परेशान हो गया. उसे कुछ सू?ा नहीं रहा था कि क्या करे तभी किसी ने उसे समझ कर लोकायुक्त कार्यालय का रास्ता बता दिया, तब कहीं जा कर बिटिया को वह डाक्टर के चंगुल से छुड़ा पाया.

पुराने जमाने में ऐसा होता था कि सूदखोर किसानों को भारीभरकम ब्याज पर कर्ज देते थे और उस के एवज में किसान परिवार से उस के ही खेतों में मजदूरी करा कर सारी उपज हड़प जाते थे. किसान और उस का परिवार मजदूरी करने के लिए जिंदा रहें, इतना भर खाने को देते थे. ऐसा आज भी होता है, फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब लोग घूस में औलाद को भी गिरवी रखने लगे हैं. गहने, जायदाद भी घूस में चलते हैं, यह बात भोपाल के एक वरिष्ठ तहसीलदार स्वीकारते हुए बताते हैं कि नामांतरण, खसराखतौनी की नकल, बंटवारे वगैरह जैसे जरूरी कामों में राजस्व विभाग नकदी का मुहताज नहीं, उस के होनहार मुलाजिम सोनेचांदी के गहने ले कर किसान का काम कर देते हैं. मुरगी अगर ज्यादा मोटी हो तो एकाध एकड़ जमीन की रजिस्ट्री किसी सगेसौतेले रिश्तेदार के नाम करवा कर पीडि़त की परेशानी दूर कर देते हैं.

विदिशा की एक अदालत का बाबू तो घूस की तय रकम पर ब्याज भी लेता है. मुवक्किलों के पास पैसे नहीं होते तो रेट तय कर उसी दिन से 24 फीसदी ब्याज की दर से वह घूस लेता है. अंदाजा है कि इस बाबू को मुकदमेबाजों से तकरीबन 12 लाख रुपए लेने हैं. कुछ मामलों में घूस का लेनदेन चैक और बैंक खातों के नंबरों से भी हुआ है. देने वाले को बैंक अकाउंट नंबर दिया गया और पैसे जमा होने के 8-10 दिन बाद काम किया गया. घूसखोर ने चैक किसी और के नाम से लिया.

किस्तों में घूस

घूस एकमुश्त ही लेंगे, यह जिद घूसखोरों ने कभी की छोड़ दी है. अब अधिकांश घूस किस्तों में ली जाती है जिस से देने वाले को सहूलियत रहे. उज्जैन के असिस्टैंट इंजीनियर कमल सिंह सिसोदिया ने भवन निर्माण हेतु सौदा 1 लाख रुपए में सरपंच नरेंद्र सिंह से तय किया था. मजबूरी जताए जाने पर किस्तों में घूस लेने के लिए राजी हो गए और पहली दफा में ही धरे गए. घूसखोरों की मनोवृत्ति जानने वाले भोपाल के समाजशास्त्र के एक प्रोफैसर की मानें तो यह इंजीनियर अपनी गिरफ्तारी या बदनामी पर कम बाकी 80 हजार रुपए डूबने पर ज्यादा दुखी रहा होगा. शुजालपुर का पटवारी संतोष सोलंकी इस मामले में बाजी मार गया. वह किसान से 5 हजार रुपए पहले ही सफलतापूर्वक ले चुका था.

शहडोल के एएसआई एम एल शुक्ला को भी किस्तों में घूस लेने की दयानतदारी भारी पड़ी. यह एएसआई आरोपी से 5 हजार रुपए पहले ही ले चुका था. बचे 3 हजार रुपए का लालच न छूटा तो आरोपी ने लोकायुक्त में शिकायत कर दी.

रतलाम की बिजली कंपनी का बाबू बालाराम काकड़ तो हवन करते ही हाथ जला बैठा. बिल पास करने के लिए घूस दरअसल में मांगी कार्यपालन यंत्री ए के सिंह ने थी जो इत्तेफाक से उस दिन दफ्तर में नहीं थे. लेकिन बालाराम ने अपने कमीशन के लालच में खुद 11 हजार रुपए ले लिए और पकड़ा गया. हालांकि मामला ए के सिंह के खिलाफ भी दर्ज हुआ.

कौनकौन लेता है घूस

बालाराम तो मातहत था और जानता था कि ऐसे बिल बगैर नजराने के पास नहीं होते. गाड़ी किराए पर लेते वक्त भी बिजली कंपनियों और दूसरे सरकारी दफ्तर वाले घूस लेते हैं और हर दफा बिल पास करने पर भी पैसों का वजन रखना पड़ता है. इस में बाबू का हिस्सा 20-30 फीसदी रहता है. भोपाल के एक ठेकेदार की मानें तो जरूरी नहीं है कि घूस काम करने वाला ही ले. अब तो अधिकारी लोग एहतियात बरतते हैं और बारबार जगह और नाम बदलते रहते हैं. यह ठेकेदार बताता है, ‘‘मुझे एक बार लगभग 2 लाख रुपए का बिल पास कराने के लिए एक इंजीनियर साहब को 30 हजार रुपए देने थे तो वे बोले, ‘मेरा साला आप के घर से आ कर रुपए ले जाएगा.’ मैं इंतजार करता रहा, साहब का साला नहीं आया तो मैं घबराया कि कहीं उन्होंने घूस लेने का इरादा न बदल लिया हो. वजह, मुझे पैसों की सख्त जरूरत थी क्योंकि पैसा सीमेंट वाले को देना था. जब दोबारा फोन किया तो होशंगाबाद रोड के एक बंगले का पता बताते हुए बोले, ‘यहां के लैटरबौक्स में डाल आओ.’ मैं समझ गया कि साहब घबराए हुए हैं. लिहाजा, जैसा उन्होंने कहा, वैसा ही मैं ने किया.’’

कई लोग बीवीबच्चों, नजदीकी रिश्तेदारों या भरोसेमंद दोस्तों के जरिए घूस लेते हैं. आजकल नया चलन कार में पैसे रखवाने का जोर पकड़ रहा है. रिश्वत देने वाले को बता दिया जाता है कि फलां कार में पैसे रख आओ और मुड़ कर मत देखना. जाहिर है घूसखोर आसपास ही कहीं होता है, और गाड़ी पर उस की नजर रहती है. नजारा पुरानी हिंदी फिल्मों के उन दृश्यों सरीखा होता है जिन में डाकू और स्मगलर पैसे वाला ब्रीफकेस ले कर शंकरजी के पुराने मंदिर या किसी खंडहर में देने वाले को बुलाते हैं. वैसे भी घूसखोरों, चोरलुटेरों और  स्मगलर्स में कोई खास फर्क नहीं है सिवा इस के कि घूसखोर समाज का सम्मानजनक नागरिक माना जाता है.

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