Hindi Story: नल पुराण

देवकी के घर के आंगन और पिछवाड़े में बड़ीबड़ी घास और झाडि़यां उग आई थीं. मकान का प्लास्टर भी जगहजगह से उखड़ चुका था. देखने से लगता था जैसे कई महीनों से इस की किसी ने सुध नहीं ली है, पर आज अचानक उस के आंगन में रौनक सी लगी थी. कुछ लोग झाडि़यां साफ कर रहे थे, तो कुछ दीवारों के उखड़े प्लास्टर की मरम्मत में लगे थे. शाम तक रंगवार्निश लगा कर घर को चकाचक कर दिया गया. एक गरीब विधवा के घर की ऐसी कायापलटआखिर ऐसा क्या हो गया था?
‘‘जरा, जल्दीजल्दी हाथ चलाओ भाईऔर कितना टाइम लगाओगे स्टेज बनाने में?’’
‘‘अरे, यह शामियाना कैसे बांध रहे होजरा ढंग से बांधो…’’
‘‘कुरसियों का क्या हुआ? अभी तक नहीं आईं? और वह रैड कार्पेट?’’
‘‘कल सवेरे 8 बजे तक सारा काम पूरा हो जाना चाहिए, बेशक रातभर काम करना पड़े तो करो.’’

जल निगम का जूनियर इंजीनियर मजदूरों को डांटते हुए काम बता रहा था. यही मौका था उस के लिए अपनी अफसरी दिखाने का खासकर जब उस के बड़े अफसर भी साथ खड़े हों. दूसरे दिन ठीक सवेरे 8 बजे जल निगम के बड़े अफसर देवकी के घर पहुंच गए.
‘‘सर, रैड कार्पेट बिछवा दूं क्या? चीफ इंजीनियर साहब, कमिश्नर, डीएम और बाकी औफिसर्स की गाडि़यां नीचे रोड पर गई हैं,’’ जूनियर इंजीनियर ने धीरे से असिस्टैंट इंजीनियर से पूछा.
‘‘हां, बिछवा दो. और हां, नल की टोंटी बदली या नहीं? उस में बढि़या पीतल की टोंटी लगवा दो. ध्यान रहे
कि नल के स्टैंड पोस्ट का प्लास्टर उखड़े नहीं, अभी ताजा है.’’
‘‘पर साहब, बाकी जगह तो हम ने लोहे की टोंटी लगाई थी और स्टैंड पोस्ट भी नहीं बनाया था, बस यों ही लकड़ी का डंडा खड़ा कर के नल उस से बांध दिया था,’’ जूनियर इंजीनियर के बजाय काम पर लगे प्लंबर ने झिझकते हुए बताया.

‘‘चुप बे, तुझ से किस ने पूछा है? जितना कहा जाए, उतना कर, फालतू बोलने की जरूरत नहीं है,’’ असिस्टैंट इंजीनियर ने डांटते हुए कहा.
फिर एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने जूनियर इंजीनियर को इशारे से बुलाया और पूछा, ‘‘जेई साहब, जरा चैक तो करो, नल में पानी भी रहा है कि नहीं?’’
जूनियर इंजीनियर ने नल की टोंटी घुमा कर देखा तो उस की जान हलक में गई, हाथपैर फूल गए. डरते हुए, घबराई आवाज में वह बोला, ‘‘सर, गजब हो गयापानी तो नहीं रहा अबक्या होगा?’’
क्या कह रहे हो?… पानी नहीं रहा,’’ एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को एक झटका सा लगा.
‘‘जी एकदम सही सर…’’ जूनियर इंजीनियर बोला.
यह सुनते ही एग्जीक्यूटिव इंजीनियर का पारा चढ़ गया और वह गुस्से में बोला, ‘‘कल से अभी तक चैक क्यों नहीं किया? अब बता रहे हो कि पानी नहीं रहा है. तुम से एक काम भी ढंग से नहीं हो सकता. एक घंटे के बाद मंत्रीजी आने वाले हैं उद्घाटन के लिए. पानी नहीं आया तो क्या जवाब देंगे? खुद तो सस्पैंड होगे ही, मुझे भी करवाओगे.’’

‘‘सर, कल शाम को तो चैक कर के ही गए थे. तब तो पानी रहा था. पता नही रातोंरात…’’
‘‘…तो रात में क्या हो गया? धरती निगल गई या आसमान खा गयाजो भी हो मुझे आधे घंटे में पानी चाहिए,’’ एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने सख्त लहजे में आदेश दिया.
‘‘ठीक है सर, चैक करता हूं,’’ कह कर जूनियर इंजीनियर ने मोटरसाइकिल उठाई और कैजुअल लाइनमैन को पीछे बिठा कर चल दिया.
इसी बीच इलाके के सभी बड़े अफसर, जल निगम के चीफ इंजीनियर, कमिश्नर, डीएम पंडाल पर पधार चुके थे, साथ ही मंत्रीजी की पार्टी से ब्लौक प्रमुख, भूतपूर्व विधायक, जिला और मंडल स्तर के पार्टी नेता आदि भी चुके थे. इन के अलावा, विपक्षी पार्टी के वर्तमान विधायक और उन के चेलेचपाटे भी पंडाल में पधार चुके थे. इंतजार था तो बस मंत्रीजी का.
अव्वल तो इतने छोटे कार्यक्रम में मंत्रीजी आते नहीं, पर पिछले इलैक्शन में पानी की समस्या को ले कर सत्ता पक्ष को मुंह की खानी पड़ी थी. अब  पार्टी किसी भी तरह अपने खोए वोट बैंक को वापस लाना चाहती थी, इसलिए सरकार ने इलाके की सब से बड़ी समस्या यानी पानी के लिएहर घर जल, हर घर नलका शिगूफा छोड़ दिया था.

2-3 महीने में फिर से इलैक्शन होने वाले थे. सरकार इस से पहले, इलाके के हर गांव में पानी पहुंचाना चाहती थी. इस का जिम्मा जल मंत्री रघुवीर सिंह उर्फजग्गू भैयाको सौंपा दिया गया था. वे खुद अपने हाथों से इस का शुभारंभ करना चाहते थे. जूनियर इंजीनियर और लाइनमैन पाइप लाइन को चैक करते हुए उस जगह पहुंचे जहां से देवकी के घर के लिए मेन लाइन से कनैक्शन दिया गया था. वहां का नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. तकरीबन 100 मीटर लंबा पाइप गायब था.
‘‘साहब, अब हम क्या करें? इतनी जल्दी 100 मीटर लंबा पाइप ला कर कैसे जोड़ेंगे?’’ लाइनमैन ने घबराई आवाज में पूछा.
‘‘तेरी नौकरी तो गई बेटा. तेरे साथ मैं भी सस्पैंड होऊंगा,’’ जूनियर इंजीनियर ने घबराहट में माथे से पसीना पोंछते हुए लाइनमैन को धमकाया.
‘‘साहब, इस में मेरा क्या कुसूर है? रात में कोई पाइप उखाड़ कर ले जाएगा, ऐसा कौन सोच सकता था?’’ लाइनमैन ने डरतेडरते सफाई दी.
थोड़ी देर के लिए लगा कि उन दोनों को जैसे सांप सूंघ गया, एकदम चुप रहे.
‘‘खैर, जो भी होगा, देखा जाएगा. एग्जीक्यूटिव इंजीनियर साहब को तो तुरंत बताना ही होगा,’’ कहते हुए जूनियर इंजीनियर ने चुप्पी तोड़ी.

दरअसल, हुआ यों कि गांव में पानी की पाइप लाइन बिछाने की टारगेट डेट कब की निकल चुकी थी, पर जल निगम की लापरवाही और टालमटोली की वजह से अब तक पाइप लाइन नहीं बिछ पाई थी.
अचानक जल विभाग के सचिव का आदेश गया,’’ अगले 2-3 महीने में विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित होने की उम्मीद है और फिर आचार संहिता लागू हो जाएगी. माननीय जल मंत्री चाहते हैं कि वेहर घर जल, हर घर नलयोजना का अगले हफ्ते अपने करकमलों से शुभारंभ करेंगे. इस के लिए जल्दी ही जरूरी तैयारी की जाए.’’ यह फरमान मिलते ही डिवीजन में हड़कम मच गया था. अभी तक तो गांव में मेन पाइप लाइन भी नहीं बिछी थी, फिर घरों तक पानी कैसे पहुंचाएंगेडिवीजन के सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर ने आननफानन में मीटिंग बुलाई और तय हुआ कि गांव में ऐसा घर ढूंढ़ा जाए जो दूसरे गांव को जा रही मेन पाइप लाइन और रोड के एकदम नजदीक हो.

इस के लिए देवकी का घर सब से मुफीद था, जो कि दूसरे गांव को पानी की सप्लाई करने वाली मेन पाइप लाइन से महज 500 मीटर की दूरी पर था और  रोड के नजदीक भी. तय कार्यक्रम के मुताबिक चुपके से देवकी के घर के लिए दूसरे गांव को पानी सप्लाई करने वाले मेन पाइप से टैंपरेरी कनैक्शन जोड़ दिया गया. गांव के कुछ और घरों में भी दिखावे के लिए नल लगा दिए गए बिना पानी के कनैक्शन के ताकि गांव वाले भरोसे में रहें कि जल्दी उन के घर भी पानी जाएगा. एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को जैसे ही पता चला कि कोई पाइप लाइन ही उखाड़े कर ले गया तो उस पर आसमान टूट पड़ा. हताशा और तनाव में वह मन ही मन भुनभुनाया, ‘‘आज तो मर गए अब कुछ नहीं हो सकता.’’ वह कुछ क्षण माथा पकड़ कर यों ही बैठा रहा, फिर जूनियर इंजीनियर पर सारी भड़ास निकाली, ‘‘इडियटतुम्हारे बस का कुछ नहीं है. मरवा दिया सब को. अब देखते हैं कि कौन बचाता है नौकरी…’’

फिर दौड़ादौड़ा सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर के पास गया और सारी बात बताई. पहले तो सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर गुस्से में एग्जीक्यूटिव इंजीनियर पर ही चढ़ पड़ा, फिर कुछ देर चुप्पी सी छाई रही. सब सोचने में लगे रहे कि अब क्या किया जाए? मंत्रीजी उद्घाटन के लिए पहुंचने वाले ही थे. तभी असिस्टैंट इंजीनियर को एक तरकीब सूझी. इसे उस ने दूसरे अफसरों के साथ साझा किया. यह सुनते ही सब के चेहरे खिल उठे और वे इस के लिए तुरंत राजी हो गए. पंडाल में जमा भीड़ में अचानक हलचल सी मच गई. कुछ लोग रोड की तरफ भाग रहे थे, तो कुछ अपनी जगह उचक कर देख रहे थे. शांत वातावरण को चीरते हुए सायरन की आवाज अब पंडाल तक रही थी. शायद मंत्रीजी का काफिला रोड के बिलकुल पास पहुंच चुका था.
पंडाल में मौजूद बड़े अफसर और उन के पार्टी के पदाधिकारी और नेता मंत्रीजी की अगवानी के लिए तेजतेज कदमों से रोड की तरफ जा रहे थे.

गाडि़यों के काफिले के बीच से एक सफेद चमचमाती हुई, लाल बत्ती वाली कार प्रकट हुई. उस में से झक सफेद कुरतापाजामा और काली नेहरूकट जैकेट पहने, आंखों पर काला चश्मा और गले में पार्टी का गमछा डाले, मंत्रीजी उतरे. वे किसी फिल्मी नेता से कम नहीं लग रहे थे. आते ही अफसरों और उन के पार्टी के नेताओं ने उन्हें घेर लिया और फूलमालाओं से इस कदर लाद दिया था कि चेहरे के अलावा और कुछ नजर नहीं रहा था. मंत्रीजी धीरेधीरे हाथ जोड़े मंच की ओर बढ़ रहे थे. पीछेपीछे स्थानीय नेता, पार्टी कार्यकर्ता, चेले और चमचे जोरजोर से नारे लगाते चल रहे थे, ‘जग्गू भैया जिंदाबाद. विकास पार्टी जिंदाबाद. अपना नेता कैसा हो, जग्गू भैया जैसा हो…’

मंच पर मंत्रीजी के लिए खास कुरसी मंगवाई गई थी, जिसे मंच के बीचोंबीच लगवाया गया था. मंत्रीजी सब का अभिवादन कर कुरसी पर बैठ गए. उन के दाएं तरफ ब्लौक प्रमुख, भूतपूर्व विधायक और फिर जिला स्तर के नेता बैठे थे. बाएं तरफ कमिश्नर, डीएम, चीफ इंजीनियर और बाकी ऊंचे सरकारी अफसर बैठे थे.
किंतु इस विधानसभा क्षेत्र के वर्तमान विधायक के लिए कुरसी, जो कि विपक्षी पार्टी लोक शक्ति से थे, मंच के एक कोने पर लगाई थी. विधायक अपनी कुरसी मंच एक कोने में देख कर भड़क उठे. इस क्षेत्र के वर्तमान विधायक की हैसियत से उन्हें उम्मीद थी कि उन की कुरसी भी मंच के बीच में मंत्रीजी के साथ लगाई जाएगी. इस को ले कर वे अफसरों से उलझ गए, पर कोई उन की बात सुनने को राजी नहीं था.

विरोध में वे मंच से नीचे उतर कर पंडाल में अपने कार्यकर्ताओं के साथ पीछे खड़े हो गए. पार्टी कार्यकर्ता उन के समर्थन में सरकार के खिलाफहायहायके नारे लगाने लगे. बड़ी मुश्किल से उन्हें चुप कराया गया.
जल निगम के चीफ इंजीनियर उठे और माइक पर जन समूह की ओर मुखातिब हो कर बोले, ‘‘भइयो और बहनो, जिस घड़ी का आप को बेसब्री इंतजार था वह गई है. माननीय मंत्रीजी के अथक प्रयास से आप के गांव तक पानी का नल गया है. मैं माननीय मंत्रीजी से अनुरोध करूंगा कि वे अपने हाथों से इस योजना का शुभारंभ करें.’’ सरकारी अफसर और पार्टी पदाधिकारी मंत्रीजी की अगवानी करते हुए उन्हें नल के पास ले गए. पूरे नल पोस्ट को फूलमालाओं से दुलहन की तरह सजाया गया था.

नल की पीतल की टोंटी सूरज की किरणों में सुनहरी रोशनी बिखेर रही थी. पास ही मेज पर करीने से मेजपोश बिछा कर उस पर एक तांबे का चमचमाता जग, गिलास और एक बड़े से टोकरे में बेसन के लड्डू रखे थे. मंत्रीजी ने नल की टोंटी घुमा कर जग में पानी भरा और लड्डू के साथ एक गिलास पानी पीने के लिए देवकी को दिया. पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. मंत्रीजी वापस मंच पर बैठ गए.
चीफ इंजीनियर ने फिर से मंत्रीजी से अनुरोध किया कि वे गांव वालों को आशीर्वाद के रूप में दो शब्द कहें. साथ ही उद्घोषणा की गई कि इस शुभारंभ की खुशी में सभी लोग लड्डू और नल का पानी ग्रहण करें. सभी लोगों को बारीबारी से एकएक  लड्डू और पीने के लिए पानी दिया जाने लगा. इस बीच नल की टोंटी खुली रही. लोग पीने के साथ साथ हाथ मुंह भी धोने लगे.

मंत्रीजी उबासी लेते हुए उठे. कुरते की सिलवटें ठीक की और धीरेधीरे माइक की तरफ बढ़े. एक नजर जन समूह पर डाली, फिर हाथ जोड़ कर सब का अभिवादन किया और बोलना शुरू  किया, ‘‘भाइयो और बहनो, 70 सालों में पिछली सरकारें जो नहीं कर पाईं, वह हमारी सरकार ने कर दिखाया. ऐसे दुर्गम क्षेत्र में भी हम ने घरघर नल पहुंचा दिया. ‘‘आज हमारे लिए बड़े सौभाग्य और खुशी का दिन है. ‘हर घर जल, हर घर नलका सपना अब पूरा हुआ. अब गांव वालों को खासकर औरतों, बच्चों और बूढ़ों को, पानी के लिए कोसों दूर नहीं जाना पड़ेगा. ‘‘भाइयो और बहनो, अगर आने वाले चुनाव में इस बार आप लोगों ने इस क्षेत्र से विकास पार्टी को भरी वोटों से जिताया, तो इसी तरह और भी बहुत सारी योजनाएं इस गांव के लिए लाऊंगा. आप का गांव प्रदेश में एक आदर्श और उत्कृष्ट गांव बन जाएगा.’’ लोगों का ध्यान भाषण ज्यादा लड्डू पर था. लोग लड्डू पाने की उम्मीद में धक्कामुक्की करने लगे. 2-3 आदमी भीड़ को कंट्रोल करने में लगे थे. लोग आतेजाते मुंहहाथ धोते, गिलास में पानी लेते और लड्डू खाते हुए निकल जाते.

लेकिन यह क्याअभी तकरीबन आधे लोग ही पानी के साथ लड्डू खा पाए होंगे कि अचानक नल से पानी आना बंद हो गया. मंत्रीजी ने घूर कर चीफ इंजीनियर की तरफ देखा मानो कह रहे हों, यह क्या बदतमीजी है. चीफ इंजीनियर ने इशारे से सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर को बुलाया और कान में कुछ फुसफुसाया. सुपरिटैंडिंग इंजीनियर खड़े हुए और भीड़ को संबोधित करते हुए बोले, ‘‘आप सभी सब्र से काम लें. असल में पंपहाउस में बिजली चली गई है, इसलिए कुछ देर के लिए पानी रुक गया है. बिजली आते ही पानी आना शुरू हो जाएगा.’’ उधर एग्जीक्यूटिव इंजीनियर डर और घबराहट के मारे पसीनेपसीने हुए जा रहा था. वह जल्दी से मंच से नीचे उतरा और जूनियर इंजीनियर को फोन किया, ‘‘अबे, मरवाओगे क्यापानी क्यों बंद हो गया?’’ ‘‘सर, जहां से पानी पंप कर रहे हैं, वहां गाड़ी नहीं जा सकती. बड़ी मुश्किल से  500 लिटर का पानी का टैंक लोगों से भरवाया था. उस से ही हम पाइपलाइन में पानी पंप कर रहे थे.

लोगों ने टोंटी शायद खुली छोड़ दी होगी, इसलिए पानी अब खत्म हो गया है. अगर आप कहें फिर पानी भरवा दें. बहुत जल्दी भी करें तो करीब एक घंटा लग जाएगा.’’ ‘‘बेवकूफतुम्हारे बस का कुछ नहीं है. मैं असिस्टैंट इंजीनियर को भेज रहा हूं. उन का ही यह आइडिया था.’’ ‘‘आप का ही यह सुपर आइडिया था ? जाओ अब मुंह क्या ताक रहे होजा कर कुछ करो.’’ असिस्टैंट इंजीनियर चुपचाप उठा और चल दिया. आधा घंटा बीत गया पर पानी नहीं आया. लोगों के सब्र का बांध अब टूट चुका था. लोग हल्ला मचाने लगे. विपक्षी पार्टी के विधायक, नेता और पार्टी कार्यकर्ता ऐसे ही मौके की तलाश में थे. उन्होंने पीछे सेजग्गू भैया, हायहाय, विकास पार्टी मुरदाबादके नारे लगाने शुरू कर दिए. विपक्षी पार्टी का विधायक जोरजोर से भाषण देने लगा, ‘‘भाइयो, मैं पहले ही कहता था कि यह सरकार जनता के साथ धोखधड़ी कर ही है.

यह पानी का नल बस दिखावा है. देखो, आधे घंटे में ही पानी बंद हो गया . अब ऐसी पार्टी को आने वाले चुनाव में फिर से बाहर का रास्ता दिखाना है…’’ भीड़ में सब लोग इन के स्वर में स्वर मिला करहायहाय…’ करने लगे. देखते ही देखते भीड़ कंट्रोल से बाहर हो गई. मंत्री, चीफ इंजीनियर, कमिश्नर, डीएम ने भीड़ को शांत कराने की कोशिश की, पर नाकाम रहे. अब भीड़ भी विपक्षी पार्टी के भड़कावे में कर गालीगलौज पर उतर आई. इतने में ही कुछ शरारती लोगों ने पीछे से सड़े टमाटर और आलू मंच की ओर फेंकने शुरू कर दिए. पुलिस जितना भीड़ को कंट्रोल करने की कोशिश करती, वह उतना ही भड़काऊ होती जा रही थी. टमाटर और आलू के बाद लोगों ने अब टूटे जूते और चप्पलें उछालनी  शुरू कर दीं.
एक जूता मंत्रीजी के सिर पर कर  टकराया. फिर क्या था, मंत्रीजी की पार्टी के कार्यकर्ताओं का गुस्सा भी फूट पड़ा. पक्ष और विपक्ष पार्टी के लोग एकदूसरे पर टूट पड़े. पहले लातघूंसों से गुत्थमगुत्था हुए और फिर खूब लाठियां और डंडे चले.

भीड़ भी 2 खेमों में बंट गई, पक्ष और विपक्ष. जिस के हाथ जो लग रहा था उसे ले कर एकदूसरे पर बरसाने लगते. करीब एक घंटे तक यह सब चलता रहा. आखिर में हालात को बेकाबू होता देख कर डीएम ने लाठीचार्ज का आदेश दिया. दंगाई भीड़ पुलिस को लाठी भांजते देख कर चुपचाप गायब हो गईरह गए तो बस सीधेसादे गांव वाले, औरतें, बच्चे और बूढ़े. उन्हें पुलिस ने दौड़ादौड़ा कर खूब पीटा. मंत्रीजी को अफसर और पुलिस वाले चुपके से मंच के पीछे से दंगा होने से पहले ही खिसका कर ले गए और वे गाड़ी के काफिले के साथ राजधानी की तरफ रवाना हो चुके थे. दूसरे दिन के सभी लोकल और बड़े अखबारों की हैडलाइन थी किजल मंत्री के उद्घाटन समारोह में दंगा : 2 मारे गए ओर 10 गंभीर रूप से घायल’. सभी टीवी चैनल्स की भी ये ब्रेकिंग न्यूज थी. एंकर चिल्लाचिल्ला कर इस घटना को मिर्चमसाला लगा कर परोस रहे थे. सोशल मीडिया प्लेटफार्म भी इस घटना से भरे पड़े थे.

मंत्रीजी यह खबर देखते ही बौखला गए. तुरंत जल विभाग, बिजली विभाग और पुलिस विभाग के बड़े  अफसरों को अपने औफिस में तलब किया. शाम तक सभी विभागों के अफसर मंत्री के औफिस में हाजिर हो गए थे. आधी रात तक मैराथन मीटिंग चली. पूरे समय सभी विभाग के अफसर एकदूसरे पर बस आरोप लगाते रहे, पर असली वजह का कुछ भी पता नहीं चला. अब चूंकि कुछ तो एक्शन लेना ही था यानी किसी को तो बलि का बकरा बनाना ही था. तय हुआ कि जल विभाग और बिजली विभाग के जूनियर इंजीनियर और उस इलाके के दारोगा को तुरंत सस्पैंड किया जाए. लाइनमैन और पंप आपरेटर को नौकरी से बरखास्त कर दिया जाए, क्योंकि ये दोनों कौन्ट्रैक्ट पर थे. संबंधित एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर और डीएसपी को कारण बताओ नोटिस दिया जाए. उस जिले के डीएम को आदेश दिया गया
कि घटना की निष्पक्ष जांच कर के एक महीने में रिपोर्ट दे.

विपक्षी दलों खासकर लोक शक्ति पार्टी ने इसे चुनावी मुद्दा बना कर  सरकार के खिलाफ मोरचा खोल दिया. जल मंत्री पर इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने के लिए दबाव बनाने लगे. उधर सरकार और  जल मंत्री ने इस घटना की पूरी  जिम्मेदारी लोक शक्ति पार्टी के विधायक पर थोप दी.
सरकार का आरोप था कि लोक शक्ति पार्टी के विधायक और नेताओं ने ही लोगों को उपद्रव करने के लिए उकसाया, पर पक्के सुबूतों की कमी में अभी तक गिरफ्तारी नहीं हुई थी. वैसे भी कहीं इस का चुनाव पर उलटा असर पड़ जाए, यह सोच कर कुछ समय के लिए टाल दिया गया. हर चुनावी सभा में इस मुद्दे पर दोनों पार्टियां ने एकदूसरे पर खूब कीचड़ उछाला. चुनाव में सब से ज्यादा सीटें विकास पार्टी को ही मिली थीं और उस ने जोड़तोड़ कर किसी तरह फिर से सरकार बना ली, पर इस घटना की वजह से उसे इस विधानसभा क्षेत्र से फिर से हार का सामना करना पड़ा.

मंत्रीजी के मीटिंग से वापस आते हीअफसरों ने पहला काम दोनों जूनियर इंजीनियर और इलाके के दारोगा को सस्पैंड करने और लाइनमैन और पंप आपरेटर को बरखास्त करने का किया, क्योंकि यही काम सब से आसान था. जल विभाग के जूनियर इंजीनियर और दारोगा को तो इस की उम्मीद ही थी इसलिए उन्होंने चुपचाप सस्पैंशन लैटर ले लिया. पर बिजली विभाग के जूनियर इंजीनियर के लिए यह आदेश हैरान कर देने वाला था, इसलिए वह मिमियाने लगा, ‘‘सर, यह क्यामुझे सस्पैंशन लैटर क्यों दिया जा रहा है? आखिर मेरा कुसूर क्या है?’’
‘‘जल विभाग का कहना कि जब मंत्रीजी नल का उद्घाटन कर रहे थे तो तुम ने उस इलाके की बिजली काट दी जिस से पानी का पंप चलना बंद हो गया और नल में पानी आना भी बंद हो गया,’’ सस्पैंशन लैटर देने वाले अफसर ने समझाया.
‘‘नहीं सर, यह एकदम झूठ है. आप इलाके में किसी से भी पूछ सकते हैं. उस समय कोई बिजली कटौती नहीं की गई थी,’’ जूनियर इंजीनियर ने बताया.

‘‘देखो भई, यह सच है या झूठ, यह तो इन्कवायरी के बाद ही पता चलेगा. ऊपर से आदेश है तो हमें पालन करना ही पड़ेगा. वैसे भी सस्पैंशन से कोई नौकरी थोड़े ही जा रही है… 2-3 महीने घर पर आराम करो, फिर सस्पैंशन वापस ले लेंगे, वह भी बैक डेट से और सारी सैलरी भी मिल जाएगी एरियर के साथ,’’ अफसर ने जूनियर इंजीनियर को दिलासा देते हुए कहा. बरखास्तगी का आदेश सुन कर लाइनमैन और पंप आपरेटर भी हाथ जोड़ के गिड़गिड़ाने लगे, ‘साहब, नौकरी से मत निकालिए. बड़ी मुश्किल से जुगाड़ लगा कर यह नौकरी मिली थी.’ ‘‘तुम्हारा दर्द हम समझते है भाई, पर क्या करें, मजबूर हैं. ऊपर से ऐसा ही आदेश है. अभी जाओ. तुम लोगों के बारे में भी कुछ सोचेंगे,’’ अफसर ने दोनों को समझाते हुए घर वापस भेज दिया. जब से पता चला कि डीएम को घटना की जांच के आदेश दिए गए हैं, जल, बिजली और पुलिस विभाग के बड़े अफसर डीएम के इर्दगिर्द चक्कर काटने लगे ताकि जांच की आंच उन तक पाए.

यहां तक कि जल निगम के सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर ने तो बर्थडे के बहाने अपने घर पर पार्टी का इंतजाम भी तक कर डाला. इस में डीएम और बाकी बड़े अफसरों को भी बुलाया गया. सब लोग डीएम से मिन्नतें करने लगे कि वे जांच की गोलमोल रिपोर्ट बनाएं, ताकि किसी बड़े अफसर पर गाज गिरे. भला डीएम भी नमक खा कर नमकहलाली कैसे करता. उस ने जानबूझ कर रिपोर्ट सौंपने में देरी की, ताकि तक लोग इस घटना के बारे में भूल जाएं. अब तक टीवी चैनल और सोशल मीडिया भी ठंडे पड़ चुके थे. डीएम ने पूरी घटना की जिम्मेदारी विपक्षी लोक शक्ति पार्टी के विधायक और नेताओं पर डाल दी और बाकी विभागों की भूमिका के बराबर बताई. रिपोर्ट भी तय समय एक महीने के बजाय 3 महीने में इस टिप्पणी के साथ भेजी गई किप्राकृतिक आपदा के काम में व्यस्तता की वजह से समय नहीं मिला’. रिपोर्ट जल विभाग के सचिवालय में कई महीनों तक यों ही ठंडे बस्ते में पड़ी रही. खानापूरी हो गई थी बस, अब किसी को इस से कोई मतलब था. इस तरह  और 6 महीने कट गए.

इस बीच गांव वालों ने इस घटना पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं होने पर आवाज उठानी शुरू कर दी. विपक्षी दलों को भी सरकार को घेरने का अच्छा मुद्दा मिल गया और उन के नेताओं ने तो आग में घी काम किया. मुद्दा एक बार फिर से गरमा गया. आननफानन में सरकार को रिपोर्ट सार्वजनिक करनी पड़ी.
रिपोर्ट पढ़ कर विपक्षी दल खासकरलोक शक्ति पार्टीके नेता और कार्यकर्ता भड़क उठे. वे उस इलाके के गांव वालों को ले कर सड़कों पर उतर आए. उन का कहना था कि रिपोर्ट झूठी है. सरकार घटना की सीबीआई से जांच करवाए. जल निगम के सभी कुसूरवार अफसरों को बरखास्त कर उन पर मुकदमा चलाया जाए और जल मंत्री तुरंत इस्तीफा दे. फिर से यह मुद्दा देशप्रदेश में सुर्खियों में छाने लगा. प्रदेश के दूसरे हिस्सों से भी लोग इस आंदोलन में जुड़ने लगे. पानी सिर के ऊपर से गुजरता देख कर, सरकार ने इस घटना की जांच के लिए हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जस्टिस की अध्यक्षता में एक हाई लैवल कमेटी बना दी, जिस को 6 महीने में अपनी रिपोर्ट देनी थी.

वैसे, विपक्षी दल सीबीआई से जांच की मांग पर अड़े हुए थे. इस घटना को बीते पूरे 2 साल हो चुके थे. कुसूरवार लोगों पर कार्रवाई तो दूर अभी तक हाई लैवल कमेटी की जांच रिपोर्ट भी सार्वजनिक नहीं हुई थी. गांव वाले जब भी जल निगम के अफसरों से पूछते है कि उन के घर पर लगे नल में पानी कब आएगा? तो उन का सपाट से जवाब होता है, ‘‘अभी जांच चल रही है. जब जांच पूरी हो जाएगी तब पानी भी जाएगा.’’ देवकी के आंगन में फिर से बड़ीबड़ी घास और झाडि़यां उग आई हैं. पीतल की टोंटी कोई खोल के ले गया, शायद जल निगम के मुलाजिम ही ले गए होंगे. नल का स्टैंड पोस्ट टूट चुका है. देवकी रोज सवेरे जमीन पर पड़े नल को इस उम्मीद से देखती है कि शायद कभी पानी जाए, फिर निराश हो कर गगरी लिए पानी की तलाश में दूर निकाल जाती है.                           
दिनेश चंद्र कबडाल

 

Hindi Story: लिफाफे में रसगुल्ला

Hindi Story:अपने देश में मिठाइयों की परंपरा बहुत पुरानी है. शादीब्याह, जन्मदिन, तबादला, चुनाव या कोई भी सैलिब्रेशन हो, मुंह मीठा करना तो बनता ही है. लेकिन मिठाइयां भी कई तरह की होती हैं. कुछ मिठाइयां कागज के डब्बे में आती हैं और कुछ मिठाइयां लिफाफे में आती हैं और लिफाफे में आया हुआ रसगुल्ला बेहद मीठा होता है. यह आधुनिक और विकसित भारत की सब से उन्नत मिठाई है.
यह ऐसी मिठाई है कि इस में चींटी लगती है, डायबिटीज बढ़ती है और ही ब्लड प्रैशर बढ़ता है.

बस, मन मीठा हो जाता है, सिस्टम मीठा हो जाता है. और जो रसगुल्ले लिफाफे में आते हैं, वे साधारण रसगुल्ले नहीं होते हैं. इतने मुलायम और पसंदीदा होते हैं कि इन के लिए नियमकानून खुद पिघल कर आइसक्रीम बन जाते हैं, जमीन पर बिछ जाते हैं. और ये इतने सफेद होते हैं कि काले से काले काम भी सफेदसफेद लगने लगते हैं. इन रसगुल्लों को खाने के बाद अफसर की फाइलें दौड़ने लगती हैं, जनता की अर्जियां इस टेबल से उस टेबल तक उछलकूद करने लगती हैं. जितना भारी लिफाफा, उतनी तेज दौड़ होती है उस फाइल की. देखने और सुनने में यह लिफाफा बहुत ही मासूम और खूबसूरत दिखता है, लेकिन उस पर रसगुल्ला लिखा होता है और ही मिठाई लिखी होती है, लेकिन मीठा पूरा होता है.

उस में खालिस देशी घी के लड्डू जितनी मिठास और काजू कतली के जैसे स्वाद भरे होते हैं. हलका इतना होता है कि जेब में रखा जा सके और भारी इतना होता है कि किसी भी काम का बो? अपने कंधे पर उठा सके. अगर कोई इस लिफाफे के बारे में नहीं जानता और सम?ाता है, तो या तो वह बहुत बड़ा गधा और बेवकूफ है या फिर बहुत ईमानदार है और उस की नईनई भरती हुई है और पानी में रह कर मगरमच्छ से बैर करने के बारे में सोच रहा है, जिस में उस की खैर नहीं है. जिसे ऐसे लिफाफे के बारे में ज्ञान नहीं है, उसे इस ज्ञान की बहुत जरूरत है. नेताजी किसी अफसर के घर जाते हैं, तो कहते हैं, ‘अरे साहब, बस
शगुन है.’ अफसर भी मुसकरा कर जवाब देते हैं, ‘अरे, इस की क्या जरूरत थी,’ जबकि दोनों जानते हैं कि सब से ज्यादा इसी चीज की जरूरत थी. बाकी बातें तो औपचारिकता होती हैं, मेन सैलिब्रिटी तो यही होता है.

फिर वह अफसर बड़े ही सलीके से शगुन को अलमारी में रख देता है, ताकि उस के बच्चों का भविष्य भी मीठामीठा रहे और उस की पत्नी के गले में नौलखा हार सजता रहे. लिफाफा के रसगुल्ले खाने का सब से बड़ा फायदा यह है कि ही इसे रिश्वत कहा जाता है और ही यह कड़वा और बदनाम और संवैधानिक होता है. एक तरह से देखा जाए, तो रिश्वत बहुत ही खराब शब्द हैयह भी कोई कहने का और बोलने का शब्द है. हां, रसगुल्ला कहना सही है. रसगुल्ला संस्कृति है, परंपरा है, मिठास है और जब लिफाफे में रहता है, तो सम्मान भी कहा जा सकता है. उधर ईमानदारी अपना माथा कूटती रहती है कि गलती मेरी ही थी क्या कि मैं ने लिफाफा को पहना और ही रसगुल्ला खा पाई और हिस्से में मेरी सूखी रोटी आई? सब भाषण में ईमानदारी की तारीफ करते हैं, लेकिन खाते समय कोई बांट कर खाना याद नहीं रखता है.

लिफाफे के रसगुल्ले को कमतर मत मानिए, क्योंकि लिफाफे का रसगुल्ला बहुत ही चमत्कारिक होता है. जो कल तक फाइल जांच के अधीन होती है, वह विचाराधीन हो जाती है और परसों मंजूर. अगर कोई भूलेभटके उस फाइल के बारे में पूछ ले, तोप्रोसैस चल रहा हैजैसे जवाब हमेशा तैयार रहते हैं. रसगुल्ला पाचन का तरीका इसे कह सकते हैं. सब से मजेदार बात यह है कि लिफाफे में रसगुल्ले देने वाला और लेने वाला दोनों ही खुद को नैतिकता का पहरेदार मानते हैं. देने वाला सोचता है कि मजबूरी में दे रहा हूं और लेने वाला सोचता है कि अब लक्ष्मी को कौन मना करने जाए. जनता सोचती रह जाती है कि वह क्या करे.
आजकल डिजिटल जमाना है. रसगुल्ले भी स्मार्ट हो गए हैं. पहले हाथ से दिए जाते थे, पर अब सिस्टम के जरीए पहुंचते हैं, पर नाम वही रहता है लिफाफे में रसगुल्ले. तकनीक बदली है, स्वाद नहीं बदला है और ही रसगुल्ले का मिजाज बदला है.

अगर आप को भी ऐसे रसगुल्ले खाने को मिलें, तो बेवकूफों के जैसे छोड़ कर पछताना नहीं. सम?ादार वही है जो लिफाफा खाए और मुंह मीठा होने का दावा भी करे. लेकिन एक बात का ध्यान जरूर रखना कि लिफाफे में रसगुल्ला सुन कर सचमुच लिफाफे में रसगुल्ला मत भेजिएगा, क्योंकि अफसर उसे आप के मुंह पर फेंक देगा. नारियल के चक्कर में नहर में बह गया बच्च उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में दनकौर के दौला रजपुरा गांव में 27 फरवरी को गंग नहर में बहते नारियल को पकड़ने की कोशिश में.

4 साल का अदनान तेज बहाव में डूब गया. दरअसल, दौला रजपुरा के रहने वाले इसरार का छोटा बेटा अदनान उस शाम को अपने 10 साल के बड़े भाई के साथ नहर किनारे खेल रहा था. उसी समय नहर में एक नारियल तैरता दिखाई दिया. दोनों भाई उसे लेने पानी में उतरे. बड़ा भाई किसी तरह बाहर निकल गया, लेकिन अदनान तेज बहाव के चलते पानी में बह गया. उस के परिवार वालों ने प्रशासन पर देरी करने का आरोप लगाया.

रेखा शाह

घूस की मार से देश बीमार

मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के गोहपारु थाने के असिस्टैंट सब इंस्पैक्टर एम एल शुक्ला को 7 मई को लोकायुक्त पुलिस, रीवा ने 3 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगेहाथों पकड़ा. मारपीट के एक मामले को रफादफा करने के लिए आरोपी से यह घूस ली जा रही थी.

शाजापुर जिले के आगर मालवा के ब्लौक मैडिकल औफिसर डा. आर एल मालवीय को 9 मई को 250 रुपए की घूस लेते वक्त लोकायुक्त पुलिस उज्जैन द्वारा गिरफ्तार किया गया. सेमली गांव निवासी सरकारी तौर पर घोषित एक गरीब आदमी अनवर खां की 10 वर्षीय बेटी फरजाना के कान में चांदी का घुंघरू फंस गया था, अस्पताल में इलाज के लिए ले जाने पर उक्त डाक्टर ने 450 रुपए मांगे थे.

9 मई को ही शाजापुर के गांव अकोदिया के पटवारी संतोष सोलंकी को उज्जैन लोकायुक्त ने एक किसान से 3 हजार रुपए की घूस लेते रंगेहाथों पकड़ा. घूस नामांतरण के लिए ली गई थी. सौदा कुल 8 हजार रुपए में तय हुआ था जिस में से 5 हजार रुपए पीडि़त किसान पूर्व में उक्त पटवारी को दे चुका था.उज्जैन जनपद पंचायत के सहायक मंत्री कमल सिंह सिसौदिया को 20 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगेहाथों लोकायुक्त द्वारा पकड़ा गया. नयागांव के सरपंच नरेंद्र सिंह से यह रिश्वत एक सरकारी इमारत बनवाने की इजाजत के लिए ली गई थी. कुल सौदा 1 लाख रुपए में तय हुआ था.

भोपाल में 8 मई को स्कूली शिक्षा विभाग के एक ब्लौक एकेडमिक  कोऔर्डिनेटर विक्रम सिंह प्रजापति को लोकायुक्त ने 4 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगेहाथों गिरफ्तार किया. यह घूस एक स्कूल को मान्यता देने के एवज में मांगी गई थी. भोपाल के टीटी नगर इलाके में बीआरसी यानी विकास खंड स्रोत समन्वय कार्यालय है. यह विभाग स्कूलों का निरीक्षण तयशुदा मानदंडों पर करता है. कुछ दिन पहले वी एस प्रजापति ने निजामुद्दीन कालोनी स्थित स्कौलर स्कूल का निरीक्षण किया था और मान्यता देने के लिए 4 हजार रुपए एस ए अहमद नाम के शिक्षक से मांगे थे.

8 मई को मंदसौर जिले के पीपल्या मंडी शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के प्रभारी प्राचार्य जे के डोसी को लोकायुक्त दल द्वारा 4 हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगेहाथों गिरफ्तार किया गया. यह रिश्वत राकेश काबरा, कमलेश पाटीदार और संजय पंवार नाम के अनुबंधित शिक्षकों से पिछले डेढ़ महीने की पगार निकालने के बाबत ली गई थी.

3 दिन में रिश्वत के ये 7 बड़े मामले केवल मध्य प्रदेश के हैं. राज्य में औसतन हर दिन 2 मुलाजिम घूस लेते रंगेहाथों पकड़े जाते हैं. पकड़े गए 90 फीसदी मुलाजिम छोटे पद वाले होते हैं. 10 फीसदी ही बड़े यानी मगरमच्छ होते हैं जिन से करोड़ोंअरबों की नामीबेनामी संपत्ति और नकदी जब्त होती है. साल 2013 में 15 मई तक 300 से भी ज्यादा सरकारी कर्मचारी घूस लेते पकड़े गए.

ये मामले चिंतनीय इस लिहाज से भी हैं कि घूस लेने के तौरतरीके तेजी से बदल रहे हैं और न पकड़े जाने वाले मामलों की तादाद जाहिराना तौर पर लाख गुना ज्यादा होगी. वजह, सभी लोग शिकायत नहीं करते हैं.

घूस के नए तौरतरीके

तेजी से पनपती घूसखोरी के सियासी नतीजे क्या होंगे यह तो कहना अभी मुश्किल है पर आगर मालवा के ब्लौक मैडिकल औफिसर आर एस मालवीय ने तो शर्मोहया की सारी हदें पार कर दीं. अनवर खां गरीबी रेखा कार्डधारी (बीपीएल) है यानी मुश्किल से कमाखा पाता है. एक दिन बेटी के कान में चांदी का घुंघरू फंस गया. वह बेटी को ले कर सरकारी अस्पताल पहुंचा जहां डाक्टर साहब ने उस की हैसियत देखते हुए केवल 450 रुपए रिश्वत के मांगे. अनवर की जेब में उस वक्त महज

100 रुपए थे जो उस ने तुरंत ईमानदारी से दे दिए और बचे 350 रुपए बाद में देने का वादा कर लिया. बेटी की तकलीफ दूर करने के लिए वह कुछ भी कर सकता था. डाक्टर साहब ने तो उस की गरीबी देखते भारी डिस्काउंट भी दे दिया था, दूसरी सहूलियत यह दी कि रिश्वत में भी उधारी कर दी. अस्पताल न हुआ बनिए की दुकान हो गई कि किराने का सामान ले जाओ, पैसे बाद में जब हों, दे देना.

2 दिन बाद दूसरी दफा वह बेटी को दिखाने गया तो घूसखोर डाक्टर साहब बकाया पैसे न मिलने पर ?ाल्ला उठे और 10 वर्षीय फरजाना को अस्पताल में ही यह कहते बैठा लिया कि बेटी छोड़ जाओ, जब पैसों का इंतजाम हो जाए तो अपनी बेटी को ले जाना. बेचारी मासूम फरजाना घंटों बंधक बनी रही या गिरवी रही. इस बात से अनवर परेशान हो गया. उसे कुछ सू?ा नहीं रहा था कि क्या करे तभी किसी ने उसे समझ कर लोकायुक्त कार्यालय का रास्ता बता दिया, तब कहीं जा कर बिटिया को वह डाक्टर के चंगुल से छुड़ा पाया.

पुराने जमाने में ऐसा होता था कि सूदखोर किसानों को भारीभरकम ब्याज पर कर्ज देते थे और उस के एवज में किसान परिवार से उस के ही खेतों में मजदूरी करा कर सारी उपज हड़प जाते थे. किसान और उस का परिवार मजदूरी करने के लिए जिंदा रहें, इतना भर खाने को देते थे. ऐसा आज भी होता है, फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब लोग घूस में औलाद को भी गिरवी रखने लगे हैं. गहने, जायदाद भी घूस में चलते हैं, यह बात भोपाल के एक वरिष्ठ तहसीलदार स्वीकारते हुए बताते हैं कि नामांतरण, खसराखतौनी की नकल, बंटवारे वगैरह जैसे जरूरी कामों में राजस्व विभाग नकदी का मुहताज नहीं, उस के होनहार मुलाजिम सोनेचांदी के गहने ले कर किसान का काम कर देते हैं. मुरगी अगर ज्यादा मोटी हो तो एकाध एकड़ जमीन की रजिस्ट्री किसी सगेसौतेले रिश्तेदार के नाम करवा कर पीडि़त की परेशानी दूर कर देते हैं.

विदिशा की एक अदालत का बाबू तो घूस की तय रकम पर ब्याज भी लेता है. मुवक्किलों के पास पैसे नहीं होते तो रेट तय कर उसी दिन से 24 फीसदी ब्याज की दर से वह घूस लेता है. अंदाजा है कि इस बाबू को मुकदमेबाजों से तकरीबन 12 लाख रुपए लेने हैं. कुछ मामलों में घूस का लेनदेन चैक और बैंक खातों के नंबरों से भी हुआ है. देने वाले को बैंक अकाउंट नंबर दिया गया और पैसे जमा होने के 8-10 दिन बाद काम किया गया. घूसखोर ने चैक किसी और के नाम से लिया.

किस्तों में घूस

घूस एकमुश्त ही लेंगे, यह जिद घूसखोरों ने कभी की छोड़ दी है. अब अधिकांश घूस किस्तों में ली जाती है जिस से देने वाले को सहूलियत रहे. उज्जैन के असिस्टैंट इंजीनियर कमल सिंह सिसोदिया ने भवन निर्माण हेतु सौदा 1 लाख रुपए में सरपंच नरेंद्र सिंह से तय किया था. मजबूरी जताए जाने पर किस्तों में घूस लेने के लिए राजी हो गए और पहली दफा में ही धरे गए. घूसखोरों की मनोवृत्ति जानने वाले भोपाल के समाजशास्त्र के एक प्रोफैसर की मानें तो यह इंजीनियर अपनी गिरफ्तारी या बदनामी पर कम बाकी 80 हजार रुपए डूबने पर ज्यादा दुखी रहा होगा. शुजालपुर का पटवारी संतोष सोलंकी इस मामले में बाजी मार गया. वह किसान से 5 हजार रुपए पहले ही सफलतापूर्वक ले चुका था.

शहडोल के एएसआई एम एल शुक्ला को भी किस्तों में घूस लेने की दयानतदारी भारी पड़ी. यह एएसआई आरोपी से 5 हजार रुपए पहले ही ले चुका था. बचे 3 हजार रुपए का लालच न छूटा तो आरोपी ने लोकायुक्त में शिकायत कर दी.

रतलाम की बिजली कंपनी का बाबू बालाराम काकड़ तो हवन करते ही हाथ जला बैठा. बिल पास करने के लिए घूस दरअसल में मांगी कार्यपालन यंत्री ए के सिंह ने थी जो इत्तेफाक से उस दिन दफ्तर में नहीं थे. लेकिन बालाराम ने अपने कमीशन के लालच में खुद 11 हजार रुपए ले लिए और पकड़ा गया. हालांकि मामला ए के सिंह के खिलाफ भी दर्ज हुआ.

कौनकौन लेता है घूस

बालाराम तो मातहत था और जानता था कि ऐसे बिल बगैर नजराने के पास नहीं होते. गाड़ी किराए पर लेते वक्त भी बिजली कंपनियों और दूसरे सरकारी दफ्तर वाले घूस लेते हैं और हर दफा बिल पास करने पर भी पैसों का वजन रखना पड़ता है. इस में बाबू का हिस्सा 20-30 फीसदी रहता है. भोपाल के एक ठेकेदार की मानें तो जरूरी नहीं है कि घूस काम करने वाला ही ले. अब तो अधिकारी लोग एहतियात बरतते हैं और बारबार जगह और नाम बदलते रहते हैं. यह ठेकेदार बताता है, ‘‘मुझे एक बार लगभग 2 लाख रुपए का बिल पास कराने के लिए एक इंजीनियर साहब को 30 हजार रुपए देने थे तो वे बोले, ‘मेरा साला आप के घर से आ कर रुपए ले जाएगा.’ मैं इंतजार करता रहा, साहब का साला नहीं आया तो मैं घबराया कि कहीं उन्होंने घूस लेने का इरादा न बदल लिया हो. वजह, मुझे पैसों की सख्त जरूरत थी क्योंकि पैसा सीमेंट वाले को देना था. जब दोबारा फोन किया तो होशंगाबाद रोड के एक बंगले का पता बताते हुए बोले, ‘यहां के लैटरबौक्स में डाल आओ.’ मैं समझ गया कि साहब घबराए हुए हैं. लिहाजा, जैसा उन्होंने कहा, वैसा ही मैं ने किया.’’

कई लोग बीवीबच्चों, नजदीकी रिश्तेदारों या भरोसेमंद दोस्तों के जरिए घूस लेते हैं. आजकल नया चलन कार में पैसे रखवाने का जोर पकड़ रहा है. रिश्वत देने वाले को बता दिया जाता है कि फलां कार में पैसे रख आओ और मुड़ कर मत देखना. जाहिर है घूसखोर आसपास ही कहीं होता है, और गाड़ी पर उस की नजर रहती है. नजारा पुरानी हिंदी फिल्मों के उन दृश्यों सरीखा होता है जिन में डाकू और स्मगलर पैसे वाला ब्रीफकेस ले कर शंकरजी के पुराने मंदिर या किसी खंडहर में देने वाले को बुलाते हैं. वैसे भी घूसखोरों, चोरलुटेरों और  स्मगलर्स में कोई खास फर्क नहीं है सिवा इस के कि घूसखोर समाज का सम्मानजनक नागरिक माना जाता है.

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