Judgment. उत्तर प्रदेश के मेरठ में सौरभ राजपूत हत्याकांड ने मार्च, 2025 में देशभर का ध्यान खींचा था. तकरीबन डेढ़ साल बाद अदालत ने इस मामले में सौरभ की पत्नी मुसकान रस्तोगी और उस के प्रेमी साहिल शुक्ला को हत्या के अपराध में मौत की सजा सुनाई.

अदालत ने दोनों पर 20-20 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया और दूसरी धाराओं में 7 साल की सजा सुनाए जाने की जानकारी अभियोजन पक्ष ने दी.

अदालत का फैसला और इंसाफ की कसौटी

मेरठ की अदालत में फैसला सुनाए जाने के दिन मुसकान साहिल और जेल से वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरीए कार्यवाही में शामिल हुए. बीबीसी संवाददाता दिलनवाज पाशा ने अभियोजन पक्ष के हवाले से फैसले की पुष्टि की. जिला जज अरविंद कुमार ने मामले में सजा सुनाई.

अभियोजन पक्ष के एडवोकेट विजय बहादुर के मुताबिक, मुसकान और साहिल को हत्या के मामले में मौत की सजा दी गई और दोनों पर जुर्माना लगाया गया. उन्होंने दूसरी धाराओं के तहत 7 साल की सजा का भी जिक्र किया.

मौत की सजा भारतीय न्याय व्यवस्था की सब से कठोर सजा है. इस का मतलब है कि अदालत ने सुबूतों, अभियोजन के तर्कों और लागू कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद यह सजा तय की.

एक गुमशुदगी से खुला हत्या का राज

इस मामले की शुरुआत सौरभ राजपूत के लापता होने की शिकायत से हुई. मेरठ के ब्रह्मपुरी इलाके से जुड़े सौरभ की गुमशुदगी ने उन के परिजनों को परेशान कर रखा था. परिवार की ओर से पुलिस को सूचना दी गई. शुरुआत में यह एक लापता की तलाश का मामला था, लेकिन जांच आगे बढ़ने के साथ हालात एक गंभीर अपराध की ओर संकेत करने लगे.

मेरठ पुलिस के तब में सहायक पुलिस अधीक्षक आयुष विक्रम सिंह ने मीडिया को बताया था कि सौरभ को 4 मार्च से नहीं देखा गया था. शक के आधार पर उन की पत्नी मुसकान और साहिल शुक्ला को पूछताछ के लिए बुलाया गया. पुलिस के मुताबिक, पूछताछ में हत्या और लाश को छिपाने से संबंधित जानकारियां सामने आईं.

पुलिस के मुताबिक, सौरभ की हत्या 3 मार्च, 2025 की रात की गई थी. इस के बाद लाश को ठिकाने लगाने के लिए ड्रम का इस्तेमाल किया गया.

लाश को ड्रम में रख कर उस में सीमेंट और रेत का मिश्रण भर दिया गया, ताकि शरीर बाहर न आ सके और अपराध छिपा रहे. जब पुलिस ने ड्रम बरामद किया तो उसे थाने लाया गया और काट कर लाश को बाहर निकाला गया.

लंदन से वापसी और टूटते रिश्तों की बैकग्राउंड

सौरभ राजपूत की उम्र 29 साल बताई गई थी. वह लंदन में काम करता था और फरवरी, 2025 में भारत लौटा था. बताया गया कि उस के पासपोर्ट की अवधि खत्म होने वाली थी और उसे रिन्यू कराने के सिलसिले में भी उस की वापसी हुई थी.

सौरभ ने साल 2016 में मुसकान रस्तोगी से प्रेम विवाह किया था. दोनों परिवारों के विरोध के बावजूद विवाह के बंधन में बंधे थे. साल 2019 में उन के घर बेटी का जन्म हुआ.

विवाह के शुरुआती सालों की कहानी से ले कर इस हत्याकांड तक का सफर कई ऐसे सवाल खड़े करता है जिन का जवाब केवल वैवाहिक संबंधों के बाहरी स्वरूप को देख कर नहीं मिल सकता.

पुलिस के मुताबिक, माली हालात को ले कर सौरभ के अपने मातापिता से संबंधों में तनाव पैदा हुआ था. इस के बाद वह मुसकान के साथ अलग रहने लगा. परिवार से दूरी का मतलब यह भी था कि सौरभ की रोजमर्रा की जिंदगी और उन की गैरहाजिरी पर तत्काल शक करने वाले लोगों की संख्या सीमित हो सकती थी. हालांकि, इसे हत्या का कारण मान लेना उचित नहीं होगा. यह केवल उस सामाजिक हालात का हिस्सा था जिस में सौरभ रह रहा था.

शादी के कुछ सालों बाद सौरभ और मुसकान के बीच मतभेद बढ़ने लगे थे. पुलिस के मुताबिक, साहिल और मुसकान की निकटता भी बढ़ रही थी. साहिल शुक्ला की उम्र उस समय 27 साल बताई गई थी.

वह सौरभ के घर से कुछ दूरी पर रहता था और मुसकान का पुराना परिचित था. दोनों कक्षा 8 में सहपाठी रह चुके थे. साहिल ने बीकौम तक पढ़ाई की थी और औनलाइन ट्रेडिंग के काम से जुड़े होने की जानकारी पुलिस ने दी थी.

पुलिस के मुताबिक, जब सौरभ को अपनी पत्नी और साहिल के संबंधों के बारे में पता चला तो साल 2021 में उस ने तलाक के लिए कानूनी रास्ता अपनाया था. बाद में परिवार के लोगों ने छोटी बच्ची का हवाला दे कर उसे शिकायत वापस लेने के लिए सम झाया.

3 मार्च की रात क्या हुआ

पुलिस के मुताबिक, हत्या से पहले मुसकान और साहिल ने योजना बनाई थी. जांच में यह बात सामने आई कि चाकू और बेहोशी की दवाएं खरीदी गई थीं.

पुलिस के मुताबिक, 3 मार्च की रात मुसकान ने सौरभ के खाने में बेहोशी की दवाएं मिला दीं. सौरभ के बेहोश होने के बाद उस पर चाकू से हमला किया गया. पुलिस ने आरोप लगाया कि इस वारदात में साहिल ने भी सक्रिय भूमिका निभाई.

इस के बाद कथित रूप से कमरे को ब्लीचिंग पाउडर से साफ किया गया, ताकि खून और दूसरे सुबूतों के निशान मिटाए जा सकें.

4 मार्च को ड्रम और सीमेंट खरीदने तथा लाश को उस में बंद करने का ब्योरा भी पुलिस ने सार्वजनिक किया था.

लाश को ड्रम में डाल कर सीमेंट और रेत से भर देना इस मामले का सब से भयावह पहलू बन कर सामने आया. आमतौर पर हत्या के बाद अपराधी जल्दबाजी, घबराहट या पुलिस से बचने की कोशिश में गलतियां करते हैं.

इस मामले में पुलिस के मुताबिक, लाश को छिपाने में समय और साधनों का इस्तेमाल किया गया. इस से जांच के सामने एक ऐसे अपराध की तसवीर आई जिस में वारदात के बाद भी अपराध छिपाने की कोशिश की गई थी.

लाश छिपाने के बाद घूमने निकले

पुलिस के मुताबिक, सौरभ की हत्या और लाश को ड्रम में बंद करने के बाद मुसकान और साहिल शिमला, मनाली और कसौली घूमने चले गए. यह बात सामने आने के बाद मामले को ले कर लोगों का गुस्सा और बढ़ गया.

जिस समय एक परिवार अपने सदस्य की गुमशुदगी से परेशान था, उसी समय पुलिस के आरोपों के मुताबिक वे सफर दोनों पर निकले हुए थे.

बेटी का तबाह हुआ बचपन

इस हत्याकांड में सब से संवेदनशील पक्ष सौरभ और मुसकान की छोटी बेटी का है. पुलिस के मुताबिक, लाश छिपाए जाने के बाद मुसकान ने बच्ची को अपनी मां के पास छोड़ दिया था. 17 मार्च के आसपास मुसकान के लौटने के बाद बच्ची ने अपने पिता के बारे में पूछा. इस के बाद कांड में नया मोड़ आया.

पुलिस के मुताबिक, मुसकान अपने मायके पहुंची और ससुराल पक्ष पर हत्या का आरोप लगाने लगी. उस के परिवार को इस दावे पर भरोसा नहीं हुआ और वे उसे खुद थाने ले गए. पूछताछ के बाद पुलिस ने हत्या के संबंध में जानकारी मिलने और ड्रम बरामद होने की बात कही.

अदालत में सजा सुनाए जाने से पहले सौरभ के भाई राहुल ने बताया था कि मुसकान पिछले 3-4 दिनों से अपनी बड़ी बेटी से मिलने की मांग कर रही थी. उन्होंने यह भी कहा था कि बच्ची को उस से मिलने नहीं लाया गया था. इस कथन को राहुल द्वारा दी गई जानकारी के रूप में ही देखा जाना चाहिए.

भाई का दर्द और परिवार के आरोप

सजा सुनाए जाने से पहले सौरभ के भाई राहुल उर्फ बबलू ने कहा था कि परिवार शुरू से ही उन दोनों के लिए फांसी की सजा की मांग कर रहा था.

उन्होंने बताया कि दोनों चिंतित और परेशान दिखाई दे रहे थे और पिछले कुछ दिनों से ठीक से नहीं सो पा रहे थे. राहुल ने मुसकान के परिवार के इस कांड में मिले होने को ले कर भी शक जाहिर किया था.

मातापिता ने की कठोर सजा की मांग

इस मामले का एक और पहलू यह था कि मुसकान के मातापिता ने भी अपनी बेटी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की थी. समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में उन्होंने कहा था कि उन की बेटी ने अपने दोस्त के साथ मिलकर पति की हत्या की और वह समाज के लिए खतरनाक है. मुसकान की मां ने सौरभ को अच्छा लड़का बताते हुए कहा था कि उन की बेटी ने उस के साथ गलत किया.

यह बयान पारिवारिक संबंधों के लिहाज से असाधारण था. आमतौर पर ऐसे मामलों में आरोपी के परिजन उस के बचाव में सामने आते हैं, लेकिन यहां मातापिता ने भी कठोर सजा की मांग की.

क्या मौत की सजा ही जरूरी

सौरभ राजपूत हत्याकांड में फैसला सामने आने के बाद एक सवाल उठता है कि क्या सब से कठोर सजा ऐसे अपराधों को रोकने के लिए काफी है?

हत्या के मामलों में पीडि़त परिवार अकसर ज्यादा से ज्यादा सजा देने की मांग करता है. यह मांग उन के दर्द, गुस्से और इंसाफ की उम्मीद से पैदा होती है, लेकिन सजा के सवाल पर चर्चा केवल भावनाओं के आधार पर खत्म नहीं होनी चाहिए.

कठोर सजा न्याय व्यवस्था का एक अहम हिस्सा है, लेकिन अपराध रोकने के लिए जांच की गुणवत्ता, पुलिस की तत्परता, सुबूतों का वैज्ञानिक संकलन, मुकदमों का समय से निबटारा और पीडि़त परिवारों को मदद भी उतने ही खास हैं.

अगर अपराध के बाद गिरफ्तारी और दोषसिद्धि की उम्मीद कम हो, तो केवल दंड की अधिकतम कठोरता से अपराध नियंत्रण की पूरी समस्या हल नहीं होती.

इस मामले में अदालत का फैसला अपने कानूनी आधार पर खास है, लेकिन इस से आगे की सामाजिक चर्चा का उद्देश्य न तो पीडि़त की पीड़ा को कम कर के देखना होना चाहिए और न ही न्यायिक प्रक्रिया को भीड़ के आक्रोश के हवाले करना.

प्रेम विवाह, विवाहेतर संबंध और अपराध

इस हत्याकांड के बाद प्रेम विवाह, विवाहेतर संबंधों और पारिवारिक संस्कारों को ले कर भी तरहतरह की टिप्पणियां की जा सकती हैं, लेकिन किसी एक अपराध को किसी व्यापक सामाजिक समूह के चरित्र का प्रमाण बना देना गलत होगा.

सौरभ और मुसकान ने परिवारों के विरोध के बावजूद प्रेम विवाह किया था. बाद में उन के संबंधों में तनाव पैदा हुआ और पुलिस के मुताबिक, साहिल के साथ मुसकान की निकटता इस मामले की पृष्ठभूमि का हिस्सा बनी, मगर इस से यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि प्रेम विवाह नाकाम होते हैं या विवाहेतर संबंध रखने वाला हर कोई हिंसक अपराध कर सकता है.

इस मामले का असली सबक किसी खास तरह के विवाह या महिलापुरुष संबंधों को कठघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि यह सम झना है कि असहमति और तलाक को हिंसा से अलग रखना कितना जरूरी है. किसी रिश्ते को जारी रखना मुमकिन न हो तो कानून से अलगाव का रास्ता अपनाया जा सकता है. किसी को धोखे, दबाव या हिंसा से नियंत्रित करने की कोशिश आखिर में सभी संबंधित लोगों की जिंदगी को तबाह कर सकती है.

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