Story.एक सुबह गांव में हाहाकार मच गया. मंदिर का स्वर्ण कलश किसी ने चुरा लिया. पुजारी ने पड़ोस के मुसलिमों के गांव पर इलजाम लगाया. क्या था असली माजरा?
गांव वाले सन्न रह गए थे. कहां तो सुबहसुबह उन्हें काम पर जाना था और कहां मंदिर के पुजारी की चीख उन्हें यहां आने पर मजबूर कर गई थी. बात भी ठीक ही है. आखिर वे लोग गांव की संपत्ति के बारे में नहीं सोचेंगे, तो फिर कौन सोचेगा.
‘‘अरे, यह क्या हो गया भाई. घोर अनर्थ हो गया है. गांव पर तो अब विपदा आने ही वाली है. हम सब नहीं बचेंगे. कोई भी नहीं बचेगा. पहले से मैं बोलता था कि उन अधर्मियों पर नजर रखा करो. मगर मेरी कौन सुनता है. आज मंदिर का कलशकंगूरा गया, कल देवताठाकुर चले जाएंगे. अपना देश में तो यह कौड़ी का है, मगर विदेश में तो लाखों में बिक जाएगा. अब हम यहां नहीं रहेंगे. चले जाएंगे हरिद्वारहिमालय. क्यों रे भोला, तू तो यहीं रह जाएगा न…’’ मंदिर के पुजारी बाबा ने कहा.
‘‘हम यहां कैसे रह जाएंगे बाबा… जीना आप के साथ है, तो मरना भी तो आप ही के साथ होगा,’’ भोला ने कहा.
‘‘मगर यहां का पूजापाठ कौन देखेगा रे? हे ऊपर वाले, इस गांव की अब तुम ही रक्षा करना. सब गांव वालों की रक्षा करना. मेरे बस का तो कुछ रहा नहीं अब. बहुत कर ली तेरी सेवा. अब तो मुक्ति ही देना…’’
‘‘यह काम कौन कर सकता है बाबा?’’ एक गांव वाला बोला तो बाबा फफक कर रो पड़े, ‘‘मु झे मालूम है कि यह सब काम उस मलेच्छ गांव अहमदपुरवा के लोगों का है. वहीं के लोग इधर आतेजाते उस स्वर्ण कलश को देखते रहते थे. कल मौका मिला, तो हाथ साफ कर गए.’’
‘‘अच्छा तो वह कलशकंगूरा सोने का था?’’ भोला ने जिज्ञासा प्रकट की, ‘‘मु झे तो वह साधारण पीतल का लगता था.’’
‘‘कभी ठीक से सोना देखा हो, तब तो सोने और पीतल के अंतर का पता चले,’’ बाबा नाराज हो कर बोले, ‘‘यहां हमेंतुम्हें पीतल का तो ठिकाना ही नहीं, तो सोने की परख कैसे होगी?’’
पूरे गांव में सनसनी थी. जिसे देखो वही इधर भागता हुआ चला आ रहा था. जितने मुंह उतनी बातें.
‘‘अरे, पुलिस को तो कोई खबर करो. इस की तो रपट दर्ज होनी चाहिए कि नहीं?’’
‘‘एफआईआर कर के क्या होगा. वे सब बड़े चंटचालाक लोग हैं. पहले ही सब को मिला नहीं लिया होगा… हिस्सा पहले ही पहुंचा दिया होगा. यहां की पुलिस को कौन नहीं जानता…’’
गांव में कोई बात तेजी से फैलती है. तिस पर यह तो बड़ी गंभीर बात थी. इसे तो जंगल की आग की तरह फैलना ही था. वैसे भी पौकेट में पड़े मोबाइल का इस खबर के लिए इस्तेमाल नहीं होता, तो किस के लिए होता.
मुखिया सरपंच से ले कर चौकीदार तक तरहतरह की बातें बना रहे थे. आखिर में चौकीदार चैतू ही थाने गया और इस घटना की एफआईआर लिखाई.
थानेदार मोंछू सिंह की तो बांछें खिल गईं. कितने दिनों से शुद्ध घी की पूरियां और दम आलू का स्वाद नहीं मिला था. आते ही पहले तो बाबा की पांवलगी की. सिंदूर का तिलक लगा कर प्रसाद ग्रहण किया. फिर अदालत सजा कर बैठ गए.
‘‘हां तो पंडितजी, बताइए कि क्या हुआ?’’
‘‘होना क्या है सरकार…’’ बाबा बोले, ‘‘हम तो मुंह अंधेरे ही उठ जाते हैं. दिशापानी कर नहाएधोए और पूजा के लिए बगीचे से फूल तोड़े. उसी समय देखा कि मंदिर के बुर्ज का सोने का कलश नहीं है. यह जरूर उसी अहमदपुरवा के लोगों की करतूत है. उन्हीं लोगों की नजर इस पर हमेशा लगी रहती थी.’’
‘‘ठीक है, ठीक है…’’ थानेदार मोंछू सिंह बोले, ‘‘और सरपंचजी, आप क्या कहते हैं. सुबहसुबह यह कारनामा करा दिया कि मु झे बिना खाएपिए यहां दौड़ कर आना पड़ा…’’
‘‘आप चाय पीजिए हजूर…’’ सरपंच हरेराम महतो बोले, ‘‘आप मेरे घर चलिए. वहीं कुछ खाने का इंतजाम हो जाएगा.’’
चाय खत्म कर थानेदार साहब सरपंच के साथ उस के घर चले आए. सरपंच महतो के यहां आधा दर्जन गायें थीं. सो दूधघी की कमी न थी. घर में घुसते ही शुद्ध घी में छनती पूरियों की सुगंध ने थानेदार साहब का मन जुड़ा दिया. वे खापी कर डकार लेते हुए थाने चले गए.
वह नाश्ता था कि भारीभरकम भोजन. दम आलू के साथ गरमागरम पूरियां खाने का अलग ही मजा था. तिस पर खालिस दूध में बनी गमकउआ सोनाचूर चावल की खीर थी, जिसे ग्रहण कर वे एकबारगी ही गदगद हो गए थे.
‘‘हां जी, राम बु झावन,’’ थानेदार साहब अपने साथ आए कांस्टेबल से हंसते हुए बोले, ‘‘खाने में मजा आया या नहीं?’’
‘‘बहुत ज्यादा मजा आया साहब…’’ रामबु झावन बोला, ‘‘आप के साथ रह कर तो हम धन्य हो गए.’’
‘‘बता, दोपहर का भोजन कहां करेगा?’’ ‘‘इतना खा कर दोपहर का खाना कैसे खा सकते हैं?’’
‘‘बुड़बक कहीं का…’’ थानेदार साहब ने उसे घुड़का, ‘‘यह भी कोई खाना है. शौच चले जाना, तो हलका हो जाएगा तुम. दोपहर में अहमदपुरवा गांव जाएंगे. बहुत दिन से मुरगाभात नहीं खाया. वहीं दावत उड़ाएंगे.’’
‘‘जैसा सरकार का हुक्म,’’ राम बु झावन उठते हुए बोला. भारी भोजन कर लेने से साफ दिख रहा था कि उसे उठने में परेशानी हो रही है.
‘‘क्यों भाई राम बुझावन, पेट खाली हुआ कि नहीं?’’ दोपहर को थानेदार मोंछू सिंह पूछ रहे थे, ‘‘अहमदपुरवा गांव चलना है न, वहां के भोजभात में?’’
‘‘अभी तो 12 ही बजा है साहब,’’ राम बु झावन बोला, ‘‘इतना पहले जा कर क्या करेंगे?’’ ‘‘अरे, खाना बनने में भी टाइम लगता है न. चलो, तैयार हो जाओ.’’
‘‘जरा ठहर जाइए, वरदी पहन लेते हैं. वरदी का रोब अलग रहता है.’’ अहमदपुरवा गांव में जब पुलिस की जीप रुकी, तो वहां सनसनी फैल गई. हिंदू बहुल गांवों के बीच अहमदपुरवा मुसलिम गांव था, जहां जरदोजी और कशीदाकारी जैसे काम करने वाले कारीगर बसते थे. सरपंच जुम्मन मियां के दरवाजे पर जब जीप रुकी, तो वे सकते में आ गए कि क्या हुआ?
‘‘और कहिए जनाब, कैसे आना हुआ?’’ सरपंच उन्हें अपने बैठकखाने में बैठाते हुए बोला, ‘‘अभी आप के लिए लस्सी मंगाता हूं.’’
‘‘शुद्ध गाढ़ी दही की लस्सी पी कर मोंछू सिंह ताजा दम हुए तो बोले, ‘‘आप को तो पता ही होगा कि माखनपुर गांव के प्राचीन मंदिर का सोने का कलश चोरी चला गया है. उसी की तहकीकात के लिए निकला हूं. इस भरी धूप में घर से बाहर निकलना कितना मुश्किल है.
‘‘ये चोरबदमाश सब जो न करा दें, कम ही है. अभी प्रदेश की सरकार भी है न, वह कुछ जानतीसम झती तो है नहीं. बस मंदिर के नाम पर दौड़ा देती है. बिना कुछ खाएपिए दौड़धूप करना पड़ रहा है.’’
‘‘खानेपीने की चिंता क्यों करते हैं. अभी हम बनवा देते हैं,’’ फिर घर की ओर मुंह कर के जुम्मन मियां चिल्लाए, ‘‘अरे रहीम बेटा. दड़बे में जो सफेद रंग वाला बड़ा मुरगा है न, उसे निकाल कर रसोई में पहुंचा दो.
‘‘बहुत दिन बाद साहब घर आए हैं और हम उन्हें बिना खाएपिए जाने कैसे देंगे. बड़े दिन बाद मेहमाननवाजी का मौका हाथ लगा है.’’
आधेक घंटे में ही खाना लग गया था. अच्छी तरह से भुना हुआ मसालेदार मुरगा और भात. वाकई मजा आ गया. मोंछू सिंह ने अपने बड़े पेट पर हाथ फेरा और कस कर डकार ली ही थी कि उन का मोबाइल बज उठा. वाकई मामला सैंसेटिव था.
तभी तो एसपी साहब ने खास हिदायत कर डीएसपी रवि शर्मा को इस केस की तहकीकात के लिए भेजा था. वही थाने में बैठे उन्हीं का इंतजार कर रहे थे.
राम बु झावन ने जल्दी ही जीप को थाने की ओर मोड़ दिया.
वारदात माखनपुरा गांव में हुई…’’ डीएसपी रवि शर्मा ने छूटते ही सवाल दाग दिया, ‘‘फिर अहमदपुरवा में आप क्या करने गए थे?’’
‘‘वह क्या है न सर कि पंडितजी ने बताया कि अहमदपुरवा गांव के लोगों का इस केस में हाथ हो सकता है, इसलिए तहकीकात करने गए थे.’’
‘‘पहले घटना स्थल पर जांच की जाती है. सुबूत ढूंढ़े जाते हैं और आप एकबारगी ही शक की बिना पर अहमदपुरवा गांव चले गए. चलिए, पहले मंदिर की ओर चलते हैं.’’
एक बार फिर गांव के मंदिर के पास भीड़ थी. जैसे कि भीड़ की आदत होती है, तरहतरह की बातें बनाई जा रही थीं. डीएसपी रवि शर्मा के सामने बाबा फिर हाजिर थे. उन के चेले भोला का डर के मारे बुरा हाल था.
‘‘हां, तो तफसील से सारी घटना बताइए…’’ डीएसपी रवि शर्मा बाबा से मुखातिब थे, ‘‘आप तो इसी मंदिर के पिछवाड़े रहते हैं. और आप के रहते यह वारदात हो गई.’’
‘‘मैं तो कल रात को एक भोज में गया था. मेरे पीछे मेरा चेला भोला घर में था. और वह ठहरा बौड़म आदमी. उसे तो कुछ पता ही नहीं चला. वह तो सुबह उठ कर मैं ने देखा कि मंदिर के बुर्ज पर कलश नहीं है, तो मैं ने शोर मचाया.’’
‘‘चलिए, मंदिर की ओर चलते हैं,’’ डीएसपी रवि शर्मा ने कहा.
मंदिर के पास ही एक चांपाकल था. उसी के पास कुछ कदमों के निशान थे. वे कुछ दूर आगे चल कर बगीचे के आगे की झाडि़यों के अंदर जा रहे थे.
डीएसपी रवि शर्मा की पुलिसिया नजरें कुछ और खोज रही थीं. थोड़ी ही दूर पर एक खुरपी पड़ी थी. एक जगह की नम मिट्टी देख कर वे रुक गए.
‘‘मोंछू सिंहजी, जरा एक कुदाल तो मंगवाइए,’’ डीएसपी रवि शर्मा ने उन्हें लगभग आदेश ही दिया, ‘‘जरा हम भी तहकीकात कर ही लेते हैं.’’
मोंछू सिंह ने राम बु झावन को आदेश दिया, ‘‘कुदाल ले आओ.’’
राम बुझावन भोला से बोला, ‘‘अरे, दौड़ कर जाओ और कुदाल ले आओ.’’
‘‘साहब, अभी फूलपत्ती लगाने का समय है क्या, जो कुदाल मंगवा रहे हैं?’’
‘‘तुम को जैसा कहा जाए वही करो…’’ मोंछू सिंह ने उसे घुड़का, ‘‘जल्दी कुदाल लाओ. साहब के पास समय नहीं है.’’
‘‘पूरा बौड़म बकलोल चेला है सरकार.’’ ‘‘वह तो हम भी देख रहे हैं.’’
‘‘हम तो यहां से चले जाएंगे सरकार. लगता है लक्ष्मी यहां से रूठ गई है…’’ बाबा फफकते हुए बोल रहे थे, ‘‘अब हमारा यहां निबाह नहीं हो सकता.’’
भोला कुदाल ले आया, तो उस से कुदाल ले कर एक सिपाही डीएसपी रवि शर्मा के निर्देश पर एक जगह गड्ढा खोदने लगा. नम मिट्टी थी. लगता था हाल ही में खोद कर उसे भरा गया है.
हाथ भर खुदाई के बाद ही उस में से एक बोरा निकला. उस में एक गमछे में लिपटा स्वर्ण कलश था.
‘‘यह यहां कैसे आ गया रे बाप… घोर कलियुग है भाई…’’ बाबा चिल्ला कर बोले, ‘‘चोर ने चुरा कर इसे यहां गाड़ दिया था. बाद में वह फिर कभी चुपके से ले जाता.’’
‘‘चलो, कलश तो मिल गया बाबा,’’ भोला खुशी से चिल्लाया, ‘‘इसे हम फिर मंदिर के कंगूरे पर लगा देंगे.’’
‘‘तुम तो एकदम बौड़म है रे…’’ बाबा ने उसे फिर घुड़का, ‘‘इसे अपनी जगह पर वापस लगाना इतना आसान है क्या. पहले पूजापाठ कराना होगा. मलेच्छ का हाथ लगा है, सो शुद्धिकरण करना होगा इस का. बड़ा भारी यज्ञ कराएंगे हम. तब जा कर यह कलश स्थापित होगा.’’
‘‘बौड़म वह नहीं आप हैं बाबा. अब सारा केस सामने आ चुका है. और आप का खेल खत्म होने को है. आप यहां से 200 मील दूर के एक गांव सुखपुरा के निवासी हैं.
‘‘20 साल पहले वहां पर आप ने एक आदमी की हत्या कर दी थी और यहां भाग आए थे. यहां आ कर इस मंदिर के बीमार पुजारी की सेवा करते हुए आप यहीं रहने लगे थे. उस की भी आप ने हत्या कर दी या वे अपनी बीमारी से मरे, इस की भी तहकीकात होगी.
‘‘मगर आप ने शायद सुना नहीं कि कानून के हाथ लंबे होते हैं. मैं सालभर से आप ही की फाइल ले कर तहकीकात कर रहा था. मु झे क्या पता था कि आप इस स्वर्ण कलश के लालच में यहां रुके पड़े हैं…’’ डीएसपी रवि शर्मा हंस कर बोले, ‘‘यह चोरी आप ही की करामात है.’’
फिर वे एक सिपाही की ओर इशारा कर बोले, ‘‘इसे हथकड़ी लगाओ भाई. इस औड़मबौड़म का तिकड़म तो अब थाने में खुलेगा.’’




