Editorial. दिल्ली की रामलीलाओं ने अब कौकरोचों के पुतलों को भी रावणों के साथ जलाया है. यह सारे देश में हुआ हो तो बड़ी बात नहीं है. और दूसरे शहरों में भी ऐसा हुआ हो तो बड़ी बात नहीं है. यह पुरानी पौराणिक पद्धति है जिसे आज का सवर्ण समाज दलितों पर थोप रहा है और सब से बड़े गुस्से की बात यह है कि इस पुतले को बनाने वाले ब्राह्मण, बनिए, क्षत्रिय नहीं होंगे, दलित और पिछड़े ही होंगे जिन्हें सदियों से समाज ने दुत्कारा है, कौकरोच समझा है.
गीता के 8वें अध्याय में कृष्ण से कहलवाया गया है कि वासनाओं और कर्मों के कारण मानव कीड़ोंमकोड़ों की तरह पैदा और मरता रहता है. भृतहरि के नीति शतक में इन लोगों को बदबूदार मांस चबाने वाले कुत्तों के समान माना गया है. भगवत पुराण के 10वें स्कंध में ऊंची जातियोें के दान न देने वालों को मल के कीड़े की तरह माना गया है.
आज का ऊंची जातियों का समाज कौकरोच आंदोलन से बेचैन है क्योंकि यहां कौकरोच जनता पार्टी के मंच पर हिंदूमुसलिम, लड़केलड़कियां, ब्राह्मण, दलित, अमीरगरीब साथसाथ खड़े हो कर एग्जामों, बदहाल स्कूलों, वोट चोरी से वर्ण व्यवस्था को बनाए रखने की कोशिश में लगे हैं.
हिंदू धर्म में पूजापाठ, दानदक्षिणा इतना जरूरी नहीं है जितना जातिवाद है. लोग पूजापाठ और दान को कुछ पाने के लिए क्या जातिवाद को कायम रखने के लिए करते हैं.
कौकरोचों की युवाओं में बढ़ती ललक को देख कर ऊंची जातियां बेचैन हैं कि अगर वर्ण व्यवस्था टूट गई तो उन्हें घर बैठे आराम कैसे मिलेगा. देश की नई ईकौमर्स हो या फौरन करैंसी, यह कौकरोचों की देन है जो गंद में रह कर, गंदे रास्तों से चल कर तेज रफ्तार से ऊंची जातियों की सेवा के लिए हाजिर रहते हैं.
कौकरोच हैं तो ही 10 मिनट डिलीवरी हो रही है. कौकरोच हैं तो ही शहरों के अमीरों के इलाकों में सफाई हो रही हैं, कौकरोच हैं तो ही घर में सफाई करने वाली ऊंची जातियों ने कंपनियां बना ली हैं, कौकरोचों को ले कर देशभर में ऊंची जातियों के कौंट्रैक्टरों की बाढ़ आ गई है जो कौकरोचों को रख कर ऊंचों के घरों को साफ करते हैं. ये कौकरोच जबान खोलने लगें तो हिंदू धर्म का फायदा ही क्या है? दानदक्षिणा देने का फायदा ही क्या है?
कौकरोचों को रावणों की तरह जला डालना बड़े पुण्य का काम है. चिंता न करें कौकरोचों को जलाने के लिए बेवकूफ कौकरोच ढेरों में मिल जाएंगे. Editorial




