Social Taboos. सब से पहले औरत को चुप कराया गया, फिर उसे ढका गया, और फिर इस पूरी कैद को मर्यादा का नाम दे दिया गया. यह काम किसी एक युग या किसी एक समुदाय ने नहीं किया. हर धर्म ने, हर पंथ ने और हर परंपरा ने अपने अपने ढंग से यही किया.

जरा धर्मग्रंथों और रीतिरिवाजों की सूची उठा कर देखिए. सिर पर क्या हो, चेहरे पर क्या हो, पल्लू कितना लंबा हो, आंखें कितनी झुकी हों, आवाज कितनी धीमी हो, किस के सामने जाना है और किस के सामने नहीं, कब बाहर निकलना है और कब नहीं.

मर्द के लिए ऐसी लंबी फेहरिस्त कहीं नहीं मिलती. उस के कपड़े सुविधा के लिए हैं, औरत के कपड़े निगरानी के लिए. घूंघट हो, बुरका हो, हिजाब हो या ननों का परदा, सब का सार एक ही है कि औरत का शरीर खतरा है और उसे छिपा कर रखना ही उस का धर्म है.

सवाल यह है कि खतरा किस के लिए है? औरत के लिए नहीं, उस मर्द की कमजोरी के लिए, जो अपनी नजर और अपनी नीयत संभाल नहीं सकता. मगर सजा औरत को मिलती है, कैद औरत की होती है, और सफाई भी औरत से ही मांगी जाती है.

इन नियमों को बनाने वाले कौन थे. उन के नाम गिन लीजिए. धर्मगुरु, पुजारी, मौलवी, पादरी, पंडित, महंत. मंच पर मर्द, आसन पर मर्द, फैसले की कुरसी पर मर्द. औरत को सिर्फ यह सुनने का हक मिला कि उसे क्या करना है.

जिन किताबों में उस की जिंदगी की हर सांस का हिसाब लिखा गया, उन्हें लिखने की बैठक में वह कभी बुलाई ही नहीं गई. जो फैसला आप की गैरमौजूदगी में लिखा जाए और आप पर थोप दिया जाए, उसे कानून कहते हैं या कैद, यह खुद सोचिए.

मर्द ने धर्म को इतनी कस कर क्यों पकड़ा, इस का जवाब बहुत सीधा है. दुनिया में मर्द चाहे जितना छोटा हो, चाहे बाजार में उस की कोई हैसियत न हो, दफ्तर में उस की कोई सुनता न हो, घर लौट कर कम से कम एक इनसान तो उसे मिल जाए, जो उस के आगे झुके. पत्नी, बहन या बेटी. धर्म ने यह इंतजाम पक्का कर दिया.

आस्था और परंपरा का नाम ले कर कही गई बात पर सवाल उठाना पाप कहलाता है, इसलिए औरत की गुलामी को पवित्रता का चोला पहना दिया गया. पति के नाम का व्रत, पति की उम्र का उपवास, पति के नाम का सिंदूर, पति के नाम की चूडि़यां. मर्द के लिए उस की पत्नी के नाम का कोई व्रत नहीं, कोई चिह्न नहीं, कोई शर्त नहीं. यह बराबरी का रिश्ता नहीं, मालिकाने की रस्म है.

इसी बैकग्राउंड में देखिए कि जब कोई लड़की अपनी मरजी का पहनती है, तो वह क्या कर रही होती है. वह केवल कपड़ा नहीं बदल रही होती. वह धर्म से कह रही होती है कि मेरी देह पर तुम्हारी मुहर अब नहीं चलेगी. वह मर्द को जता रही होती है कि बुद्धि और बल में वह उस से कम नहीं है, इसलिए उसे किसी संरक्षक की जरूरत नहीं.

और जो लोग इस पर सब से ज्यादा चीखते हैं, उन का डर देखिए. बाहर खुले समाज में जब अपनी मरजी से जीती, पहनती और दिखती औरतें सामने आती हैं, तो मर्द केवल उन्हें नहीं देखता. वह अपने घर की ओर देखता है. उसे घबराहट होती है कि कहीं उस की गुलाम जैसी पत्नी, बहन या बेटी भी यह देख कर सवाल न पूछने लगे, विद्रोह न कर बैठे, बराबरी न मांगने लगे.

बेझिझक लड़की उसे भीतर की खामोश औरत का आईना दिखाती है, और आईना देखना हर किसी को पसंद नहीं आता. इसीलिए संस्कृति की दुहाई, संस्कारों का रोना और नैतिकता के भाषण सब से ज्यादा इसी मोड़ पर सुनाई देते हैं. यह चिंता औरत की इज्जत की नहीं, अपने हुक्म की है.

यहां एक ईमानदार बात भी कहनी जरूरी है. बौडी डिस्प्ले के पीछे हर बार विद्रोह ही नहीं होता. कुछ लड़कियां ऐसी हैं, जिन का चेहरा सुंदर है, कद लंबा है, काया छरहरी है और जो गोरी हों या सांवली, त्वचा या शरीर का कोई हिस्सा न दिखाएं तब भी आकर्षक लगती हैं. उन्हें ध्यान खींचने के लिए कुछ उघाड़ने की जरूरत नहीं पड़ती.

ऐसी लड़कियों के बीच टिकने और उनसे मुकाबला करने के लिए बहुत सी लड़कियां ‘माई बौडी, माई चौइस’ का सहारा लेती हैं. मुकाबले की यह वजह भी उतनी ही जायज है, जितनी बगावत की, क्योंकि इसे गलत ठहराने का हक भी उसी पहरेदार को नहीं है, जिस ने सदियों तक औरत को सिर्फ देह समझा.

इसलिए सवाल यह नहीं है कि लड़की ने कितना पहना और कितना नहीं. सवाल यह है कि तय करने वाला कौन है. जिस दिन औरत यह मान लेती है कि उस का शरीर उस का अपना है, उसी दिन धार्मिक गुलामी की सब से मजबूत कड़ी टूट जाती है.

यही वजह है कि धर्म की दुकानें सब से पहले औरत के कपड़ों पर फतवे जारी करती हैं, क्योंकि जिस दिन औरत अपने शरीर की मालिक हो गई, उस दिन उन की सत्ता की जड़ हिल जाएगी. इसलिए हर लड़की को पूरा हक है कि वह मर्द और धर्म की खींची हर रेखा को तोड़े. यही रास्ता उसे उस गुलामी से छुटकारा दिला सकता है, जो परंपरा के नाम पर उस के गले में डाली गई थी.

हां, एक सावधानी फिर भी जरूरी है. अगर देह का प्रदर्शन लाइक्स, व्यूज और बाजार की मांग का गुलाम हो जाए, तो वह आजादी नहीं रहती, बस पुराने पहरेदार की जगह नया पहरेदार आ जाता है. पहले धर्म कहता था क्या ढको, अब बाजार कहता है क्या दिखाओ.

असली आजादी तब है, जब लड़की को ढकने का भी उतना ही हक हो जितना दिखाने का, और दोनों में से किसी भी चुनाव पर उसे किसी को सफाई न देनी पड़े. वह दिन आएगा, जब औरत के कपड़ों पर बहस नहीं होगी.  Social Taboos

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