जालौन के डिवाइन मर्सी स्कूल में कक्षा 11 में पढ़ने वाले कुणाल ने 3.17 सेकंड में अंग्रेजी की पूरी 26 अल्फाबेट्स टाइप करके गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड (Guinness World Record) अपने नाम कर साबित किया है कि स्किल हमेशा जाति, जेंडर और धर्म के बंधन से ऊपर होता है. अगर बराबर का मैदान दे दिया जाए तो दलित बच्चे भी किसी से कम नहीं हैं. कमी टैलेंट में नहीं है, कमी मौके में है और जब मौका मिला तो कुणाल ने 3.17 सेकंड में पूरी दुनिया को बता दिया कि हुनर का कोई सरनेम नहीं होता.
कुणाल जाटव का यह कारनामा सिर्फ एक टाइपिंग का रिकॉर्ड नहीं है बल्कि यह इस देश की हजार साल पुरानी उस सोच पर हथौड़ा है जिसके तहत यह माना जाता है कि दिमाग का काम किसी खास जाति के पास है और हाथ का काम किसी और जाति के पास. धर्म और जाति हमेशा से यही सिखाते आए हैं कि तुम्हारी काबिलियत तुम्हारे जन्म से तय होगी. ब्राह्मण का बेटा ज्ञानी होगा, दलित का बेटा मजदूर होगा लेकिन कुणाल जाटव के की-बोर्ड ने इस पूरी थ्योरी को 3.17 सेकंड में ध्वस्त कर दिया है.
की-बोर्ड के लिए कोई जाटव नहीं होता, कोई पंडित नहीं होता और कोई हिंदू मुसलमान नहीं होता. की-बोर्ड सिर्फ दो चीजें पहचानता है, स्पीड और एक्यूरेसी. और ये दोनों चीजें किसी मंदिर में पूजा करने से नहीं आतीं, किसी मस्जिद में दुआ करने से नहीं आती और न ही यह स्पीड और एक्यूरेसी किसी जाति के खून से तय होती है. यह स्किल है जो प्रैक्टिस से, पसीने से और बार बार फेल होकर दोबारा कोशिश करने से आती है.
जब कुणाल की उंगलियां A से Z तक दौड़ रही थीं तो उस वक्त उसके साथ कोई भगवान नहीं था, कोई जाति नहीं थी, कोई आरक्षण या सिफारिश नहीं थी. उसके साथ सिर्फ उसकी मेहनत थी. धर्म ने हमें सिखाया कि सफलता के लिए भाग्य चाहिए, किस्मत चाहिए, भगवान की कृपा चाहिए. लेकिन सच यह है कि सफलता के लिए मौका और मेहनत चाहिए. जालौन जैसे छोटे शहर में जहां बड़े शहरों जैसे कोचिंग सेंटर नहीं हैं, जहां हर बच्चे के पास महंगा लैपटॉप नहीं है, वहां से निकलकर एक दलित लड़के का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाना हैरत की बात तो है. Guinness World Record




