Short Story. गरीब सुक्का और पानो के 7 बच्चे थे. वे उन्हें पढ़ालिखा कर काबिल बनाना चाहते थे. पर एक सफाई कर्मचारी और घरों में काम करने वाले इस जोड़े के लिए यह आसान नहीं था. क्या उन्हें मंजिल मिली?

तड़के 4 बजे का अंधेरा अभी पूरी तरह छंटा भी नहीं होता था कि पानो अपने काम पर निकल पड़ती. उस के हिस्से में पूरे 30 घर थे. किसी घर से 20 रुपए महीना मिलते, किसी से नकद मजदूरी के साथ हर घर से 4 रोटियां और थोड़ी सी सब्जी भी मिल जाती, जो उस के बड़े परिवार का सहारा थी.

30 घरों की सफाई करतेकरते पानो अपने घर का चूल्हाचौका कब देख पाती, उसे खुद भी पता नहीं चलता.

पानो का पति सुक्का छावनी में सफाई कर्मचारी था. सैनिकों के बीच रहने से उसे शराब आसानी से मिल जाती. रोज पीता, घर लौट कर झगड़ा भी करता, लेकिन अपने सातों बच्चों पर जान छिड़कता था. 4 बेटियां और 3 बेटे, यही उस की दुनिया थे.

2 कमरों के कच्चे मकान में रहने वाला सुक्का जब छावनी में बड़ेबड़े अफसरों को देखता, तो मन ही मन ठान लेता कि उस के बच्चे भी एक दिन इज्जत की नौकरी करेंगे.

सुक्का की ड्यूटी सैनिकों की बैरकों के शौचालय साफ करने की थी. सुबह 4 बजे सैनिकों की ट्रेनिंग शुरू होने से पहले उसे 10-10 शौचालय साफ करने होते. असहनीय बदबू से लड़ने के लिए वह अंधेरे में ही शराब की पूरी बोतल गले से उतार लेता और फिर तेजी से अपना काम पूरा करता. यह उस की मजबूरी थी, शौक नहीं.

उधर पानो भी सुबहसुबह काम पर निकल जाती. ऐसे में घर की पूरी जिम्मेदारी सब से बड़ी बेटी रचना पर आ जाती. दादी के जिंदा रहते रचना भी 5वीं तक स्कूल जाती थी, लेकिन दादी के मरने के बाद उसे पढ़ाई छोड़नी पड़ी. अब वही छोटे भाईबहनों… अमर, विजय, सुरेश, निधि, सुनीता, सीमा और सब से छोटी शालू की मां बन गई थी.

रचना सब को उठाती, नहलाती, तैयार करती और स्कूल भेजती.

खुद का बचपन कब जिम्मेदारियों के बोझ तले दब गया, उसे पता ही नहीं चला.

सुक्का का काम एक ही बैरक में था, इसलिए वह जल्दी घर लौट आता. लेकिन पानो को 2 महल्लों में सफाई करनी पड़ती. घर लौटतेलौटते 11 बज जाते. नहा कर वह फिर रोटियां और सब्जी लेने निकल पड़ती.

रास्ते में उस की आवाज गूंजती, ‘‘डाक्टरनी के घर भी जाना है… सुनारनी और सरदारनी के यहां भी खाना लेना है… और रिफ्यूजी वाले घर में तो रोज की तरह पहले क्लेश होगा, फिर रोटी मिलेगी… जल्दी कर…’’

समय बदला. बड़ा बेटा अमर 8वीं पास करते ही सेना में भरती हो गया. 2 साल बाद उस की शादी हो गई और उसी के साथ रचना भी अपनी ससुराल विदा हो गई.

विजय ने 10वीं के बाद वन विभाग में क्लर्क की नौकरी पा ली. सुरेश कालेज की पढ़ाई पूरी कर टीचर बनने की राह पर चल पड़ा. सुक्का ने बेटियों निधि और सुनीता को भी कालेज भेजा.

लेकिन सीमा की दिलचस्पी पढ़ाई में नहीं थी. उसे मां के साथ बड़ेबड़े घरों में जाना अच्छा लगता था.

कई बार तो वह मां से पहले ही खाने की टोकरी ले कर रोटियां लेने निकल पड़ती.

सब से छोटी शालू अलग थी. वह मां को लोगों की गंदगी साफ करते देख तिलमिला उठती.

एक दिन उस ने कहा, ‘‘अमर भैया फौज में हैं, विजय भैया क्लर्क हैं. अब तुम क्यों यह काम करती हो? छोड़ दो इसे.’’

पानो ने शालू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटी, इसी मैला ढोने ने तुम सब को इस काबिल बनाया है. अब यह काम तो मेरी चिता के साथ ही छूटेगा.’’

शालू ने यह बात गांठ बांध ली. उस ने पढ़ाई जारी रखी, कालेज पूरा किया और आखिरकार अपने भाई सुरेश की तरह सरकारी स्कूल में टीचर बन गई.

सुक्का का देखा गया सपना सच हो चुका था.

एक दिन बैरक में सैनिकों से गर्व से बोला, ‘‘तुम लोगों को रोज अफसर बनते और वरदी में सम्मान पाते देखा. बस वहीं से सपना लिया था. मैं ने अपने बच्चों को भी इस काबिल बना दिया. अब वे मैला नहीं ढोएंगे, बल्कि सम्मान से नौकरी करेंगे.’’

उस दिन सुक्का के हाथों से भले ही बैरक की सफाई हो रही थी, लेकिन उस के चेहरे पर पहली बार आत्मसम्मान की चमक थी. उस ने अपने बच्चों को वह विरासत नहीं दी जो उसे मिली थी, बल्कि वह भविष्य दिया जिस के लिए उस ने और पानो ने पूरी जिंदगी अपने हिस्से का अंधेरा सहा.

यही उन दोनों की सब से बड़ी जीत थी. Short Story

-शारदा नंद गौतम

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