Politics. मायावती इन दिनों अपने राजनीतिक उत्तराधिकार की तलाश में हैं. भतीजे आकाश आनंद को हटा कर वे अपनी भतीजी दीपिका आनंद को राजनीति में लाने का मन बना रही हैं. लेकिन सवाल यह है कि इतने साल तक उत्तर प्रदेश में मायावती को सत्ता मिली थी, पहचान की राजनीति भी मिली थी. लेकिन क्या दलित समाज को वह आर्थिक ताकत मिल पाई, जिस की उसे सब से ज्यादा जरूरत थी?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती का दौर सिर्फ एक राजनीतिक अध्याय नहीं था, बल्कि यह उस सामाजिक बदलाव का दौर भी था, जब एक दलित महिला उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की सत्ता के शीर्ष तक पहुंची थी. उन्होंने 4 बार मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश की कमान संभाली थी. पहली बार 3 जून, 1995 से अक्तूबर, 1995 तक, फिर मार्च से सितंबर, 1997, मई, 2002 से अगस्त, 2003 और सब से लंबे कार्यकाल में मई, 2007 से मार्च, 2012 तक.
इतना लंबा राजनीतिक अनुभव और सत्ता का इतना बड़ा अवसर किसी भी नेता को इतिहास बदलने की ताकत देता है, इसलिए आज जब उत्तर प्रदेश फिर विधानसभा चुनाव की तरफ बढ़ रहा है और बहुजन समाज पार्टी के भीतर नेतृत्व को ले कर चर्चा तेज है, तो सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि मायावती के बाद पार्टी कौन संभालेगा?
मायावती को जो सत्ता मिली थी, उस का सब से बड़ा और सब से स्थायी फायदा दलित समाज को क्या मिला?
मायावती की राजनीति ने दलित समाज को एक आवाज दी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया और अंबेडकरकांशीराम की विरासत को सत्ता की राजनीति के केंद्र में रखा.
उन के शासन में लेकिन क्या दलित समाज को आर्थिक रूप से इतना मजबूत बनाया गया कि वह आने वाली पीढि़यों के लिए अपनी दिशा खुद तय कर सके?
मायावती ने अपने कार्यकाल में अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल, कांशीराम स्मारक स्थल, बौद्ध विहार, ईको गार्डन और राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल बनवाए थे. अंबेडकर की प्रतिमाएं बनाई गई थीं, पर अंबेडकर का सपना उस से कहीं बड़ा और ज्यादा जरूरी था.
लखनऊ और नोएडा में बड़ेबड़े स्मारक बने, लेकिन अंबेडकर का सपना सिर्फ इतना तो नहीं था कि उन के नाम पर पार्क बनें. उन का सपना था कि जिस समाज को पढ़ाईलिखाई से दूर रखा गया, वह पढ़ाईलिखाई में सब से आगे जाए.
जिस समाज को आर्थिक संसाधनों से दूर रखा गया, वह आर्थिक रूप से मजबूत बने. जिस समाज को फैसले लेने से दूर रखा गया, वह नीति बनाने की ताकत हासिल करे.
कितने युवाओं को मशीन चलाने के बजाय मशीन बनाने की ट्रेनिंग मिली? कितने युवाओं को सिर्फ सरकारी नौकरी की तैयारी कराने के बजाय उद्योग शुरू करने की ट्रेनिंग मिली? कितने किसानों को आधुनिक खेती, ड्रोन, सौर ऊर्जा, नई सिंचाई तकनीक, प्रसंस्करण और बाजार से जोड़ने का बड़ा अभियान चला? कितने युवाओं को इलैक्ट्रौनिक्स, रोबोटिक्स, कंप्यूटर, आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस या मौडर्न टैक्निक से जोड़ा गया?
दलित राजनीति की सब से बड़ी ताकत उस का वोट है, लेकिन अगर किसी समाज की पूरी राजनीतिक ताकत सिर्फ चुनाव के दिन वोट देने तक सीमित रह जाए तो वह अधूरी ताकत है.
वोट देने का हक ताकत देता है, लेकिन पढ़ाईलिखाई उस ताकत को दिशा देती है, तकनीक उसे रोजगार देती है, उसे आर्थिक स्वतंत्रता देता है और संगठन उसे लंबे समय तक मजबूत बनाए रखता है.
मायावती ने दलित समाज को उस बड़े पैमाने पर आर्थिक और तकनीकी आंदोलन में बदलने की कोशिश उतनी दिखाई नहीं दी जितनी दिखाई देनी चाहिए थी.
एक गरीब दलित परिवार का बच्चा अगर पढ़ कर इंजीनियर बनता है, अपनी कंपनी खोलता है और 50 लोगों को नौकरी देता है तो यह सिर्फ एक इनसान की कामयाबी नहीं है, यह पूरे सामाजिक ढांचे को बदलने वाली घटना है.
लेकिन अगर वही बच्चा पढ़ाई छोड़ कर या स्कूली पढ़ाई करने के बावजूद मजबूरी में मजदूरी करने लगे, छोटेमोटे काम में चला जाए या सिर्फ सरकारी नौकरी की उम्मीद में सालों तैयारी करता रहे तो सवाल सिस्टम पर उठेगा.
मायावती को सिर्फ स्मारक नहीं, संस्थान खड़े करने चाहिए थे. अगर सरकार के पास संसाधन हैं तो उसे ऐसी चीजें बनानी चाहिए जो पीढि़यों तक नतीजे देती रहें.
मान लीजिए उत्तर प्रदेश में एक बड़ा दलित तकनीकी कौशल मिशन शुरू किया जाता. हर मंडल में आधुनिक प्रशिक्षण केंद्र बनते. वहां गांव के बच्चों को सिखाया जाता.
इलैक्ट्रौनिक उपकरण बनाना, सोलर पैनल लगाना और बनाना, ड्रोन चलाना और ड्रोन से खेती करना, आधुनिक कृषि मशीनों की मरम्मत, कंयूटर प्रोग्रामिंग, मोबाइल और इलैक्ट्रौनिक्स रिपेयरिंग, मशीन डिजाइन, वैल्डिंग और आधुनिक निर्माण, खाद्य प्रसंस्करण, औनलाइन कारोबार, डिजिटल मार्केटिंग, छोटे उद्योग का प्रबंधन और ट्रेनिंग के बाद बैंक से आसान कर्ज, बाजार और सरकारी खरीद से जोड़ा जाता, तो 10-15 साल में देश की तसवीर कितनी बदल सकती थी.
यह सिर्फ कल्पना नहीं है, बल्कि दुनिया के कई देशों ने पढ़ाईलिखाई, तकनीक और कौशल को विकास की सीढ़ी बनाया है.
जापान के 5 युवाओं की कहानी यहां बहुतकुछ सिखाती है. साल 1863 में जापान के चोशू क्षेत्र के 5 युवा इतो हिरोबुमी, इनोउए काओरू, इनोउए मासारू, एंडो किनसुके और यामाओ योजो ब्रिटेन गए थे. उस समय जापान में विदेश जाना बेहद मुश्किल था. पर वे वहां घूमने नहीं गए थे.
उन्होंने जा कर देखा कि पश्चिमी देश तकनीक, रेलवे, उद्योग, इंजीनियरिंग और प्रशासन कैसे चला रहे हैं. उन्होंने भाषा सीखी, वैज्ञानिक शिक्षा ली और अलगअलग संस्थानों को सम?ा. फिर वे पांचों जापान वापस लौटे, लेकिन असली कहानी वापसी के बाद शुरू हुई.
किसी ने रेलवे के विकास में भूमिका निभाई, किसी ने इंजीनियरिंग और उद्योग के विकास में, किसी ने टकसाल व्यवस्था में और किसी ने प्रशासन तथा राजनीतिक संस्थाओं के निर्माण में योगदान दिया. जापान के मौडर्नाइजेशन में इन पांचों लोगों की भूमिका को इसी वजह से महत्वपूर्ण माना जाता है. उन्होंने सिर्फ यह नहीं कहा कि दूसरे देश हम से आगे हैं. उन्होंने पूछा, ‘हम उन से सीख कर अपने देश को आगे कैसे ले जाएं?’
यही सोच किसी भी पिछड़े समाज को बदल सकती है
उत्तर प्रदेश में भी ऐसी सोच की जरूरत थी. मायावती के पास सत्ता थी. उन के पास प्रशासन था. उन के पास बजट था. उन के पास लाखों समर्थक थे. उन के पास दलित समाज में असाधारण राजनीतिक असर था.
उस पौलिटिकल पावर को ऐसी संस्थाओं में क्यों नहीं बदला गया जो अगले 50 साल तक दलित युवाओं को मजबूत करतीं? अगर लखनऊ में एक बड़ा पार्क बनता है, वहां करोड़ों रुपए लगा कर पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियां बनवाई हैं, तो लोग वहां जाते हैं, देखते हैं और लौट आते हैं, लेकिन अगर उसी पैसे से हजारों बच्चों के लिए तकनीकी संस्थान बनते हैं, तो वे बच्चे आगे चल कर हजारों परिवारों की जिंदगी बदल सकते हैं.
दलित समाज को किसी नेता का इंतजार क्यों करना चाहिए? यह सवाल सिर्फ मायावती से नहीं, पूरी दलित राजनीति से है. अगर कोई समाज हर चुनाव में यह इंतजार करे कि कोई नेता आएगा, उस की समस्या उठाएगा और उसे आगे ले जाएगा, तो समाज हमेशा किसी दूसरे की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बना रहेगा.
असल ताकत तब आएगी जब गांव का दलित युवा खुद तय करे, मैं सिर्फ मजदूर नहीं बनूंगा, मैं मशीन चलाना सीखूंगा. मैं सिर्फ नौकरी नहीं करूंगा, मैं कारोबार भी करूंगा. मैं सिर्फ खेती नहीं करूंगा, आधुनिक खेती करूंगा. मैं सिर्फ मोबाइल इस्तेमाल नहीं करूंगा, तकनीक बनाना सीखूंगा. मैं सिर्फ वोट नहीं दूंगा, नीति को भी सम?ांगा. मैं अपने बच्चों को ऐसी तालीम दूंगा कि उन्हें किसी नेता के सहारे की जरूरत न पड़े.
मायावती की राजनीति की सब से बड़ी ताकत दलितों का भरोसा रही है, लेकिन उन के राजनीतिक गठबंधनों ने समयसमय पर इस भरोसे को तोड़ा है, कभी समाजवादी पार्टी के साथ और कभी भाजपा के साथ सत्ता साझा करने के फैसलों ने सत्ता हासिल करने के लिए उन्होंने वैचारिक विरोधियों से भी सम?ाता किया.
1990 के दशक में बसपा ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया, जबकि बाद के सालों में भाजपा के समर्थन से भी मायावती सरकार बनी. 2002 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा को 98 सीटें और 23.06 फीसदी वोट मिले, जबकि भाजपा को 88 सीटें मिलीं.
आलोचना यहीं से उठती है कि जिस राजनीति ने दलितों को सामाजिक सम्मान और स्वतंत्र राजनीतिक आवाज देने का दावा किया, उस में सत्ता के लिए अलगअलग दलों के साथ सम?ाते कितने दूर तक जायज थे? ऐसे फैसलों ने दलित मतदाताओं के उस भरोसे को चोट पहुंचाई कि बसपा उन की राजनीति को किसी भी कीमत पर सत्ता से ऊपर रखेगी. उन्होंने ‘दलित वोट का सौदा’ किया दलितों के साथ ‘विश्वासघात’ किया.
जिस समाज की वजह से मायावती सत्ता के शीर्ष तक पहंचीं, उन से सवाल है कि कि उन्होंने लोगों को अपनी जिंदगी बदलने की क्षमता कितनी दी? आप ने दलित समाज को सत्ता की भाषा तो सिखाई, लेकिन क्या आप ने उसे नई इकोनौमी की भाषा भी उतनी मजबूती से सिखाई?
आप ने अंबेडकर का नाम सत्ता के गलियारों तक पहुंचाया, लेकिन क्या अंबेडकर के विचारों को हर गांव के स्कूल और हर युवा के कौशल तक पहुंचाया? आप ने स्मारक बनाए, लेकिन क्या उसी लैवल पर तकनीकी संस्थान बनाए? आप ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाया, लेकिन क्या उतने ही बड़े पैमाने पर आर्थिक प्रतिनिधित्व तैयार किया?
अब सवाल मायावती के बाद की पीढ़ी का है. आज चर्चा इस बात की भी हो रही है कि बसपा में अगली पीढ़ी कौन होगी?
लेकिन शायद दलित समाज को इस सवाल को थोड़ा अलग तरीके से देखना चाहिए.
सवाल यह नहीं होना चाहिए कि मायावती के बाद कौन? सवाल होना चाहिए कि मायावती के बाद दलित समाज कैसा होगा? क्या वह सिर्फ चुनावी आंकड़ा होगा या हजारों उद्यमियों का समाज होगा? क्या वह सिर्फ सरकारी नौकरी का इंतजार करेगा या अपनी कंपनियां बनाएगा? क्या उस के युवा सिर्फ मजदूरी करेंगे या आधुनिक तकनीक सीख कर दुनिया के बाजार में काम करेंगे? क्या गांव के बच्चे सिर्फ अंबेडकर की प्रतिमा के सामने फोटो खिंचाएंगे या अंबेडकर के विचारों को पढ़ कर अपनी जिंदगी बदलेंगे?
अंबेडकर को याद करने का सब से मजबूत तरीका शायद यही है कि दलित समाज पढ़ाईलिखाई में आगे निकले. जिसे आर्थिक रूप से कमजोर रखा गया था, वह आर्थिक रूप से ताकतवर बने. जिसे फैसला लेने से दूर रखा गया था, वह खुद फैसला लेने के हालात में पहुंचे.
मायावती ने दलित राजनीति को सत्ता के दरवाजे तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई, लेकिन उस राजनीति की अगली परीक्षा कहीं ज्यादा मुश्किल है. स्मारकों से आगे बढ़ कर स्कूल चाहिए. स्कूलों से आगे कौशल चाहिए. कौशल से आगे उद्योग चाहिए. उद्योग से आगे आर्थिक स्वतंत्रता चाहिए.
शायद यही वह काम है जिसे आने वाली दलित राजनीति को प्राथमिकता देनी होगी, क्योंकि किसी समाज को हमेशा यह नहीं चाहिए कि उस का नेता उस के लिए लड़ता रहे. असली जीत तब होगी जब वह समाज इतना शिक्षित, संगठित, कुशल और आर्थिक रूप से मजबूत हो जाए कि उसे अपने अधिकार के लिए किसी एक नेता का इंतजार ही न करना पड़े. Politics




