Bhojpuri Stars. एक दौर वह भी था जब हिंदी फिल्मों की दुनिया बेहद चमकीली और शहरी हुआ करती थी. फिल्मों की कहानियां या तो विदेशों में घूमती थीं या फिर मुंबईदिल्ली के आलीशान बंगलों में. उस दौर में अगर कोई भोजपुरी या अवधी बोलने वाला किरदार आता भी था, तो उसे या तो ‘रामू काका’ बना दिया जाता था या फिर एक ऐसा विलेन जिस के पास दिमाग कम और सनक ज्यादा हो.

उस समय भोजपुरी कलाकारों के लिए हिंदी फिल्मों के दरवाजे मानो ‘लोहे के चने चबाने’ जैसे थे. टैलेंट की कोई कमी नहीं थी, लेकिन टाइप कास्टिंग का ऐसा जाल बुना गया था कि उस से बाहर निकलना नामुमकिन था. अपनी ही मिट्टी के कलाकारों को वह इज्जत नहीं मिल पा रही थी, जिस के वे हकदार थे.

लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भोजपुरी सिनेमा कोई छोटामोटा फिल्म उद्योग नहीं है. इस की अपनी भाषा है. अपना दर्शक वर्ग है. अपने सुपरस्टार हैं. अपनी संगीत परंपरा है. और अपनी एक पूरी फिल्म इंडस्ट्री है. लेकिन लंबे समय तक हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा में भोजपुरी कलाकारों को ले कर एक अलग तरह की सोच देखने को मिलती थी.

यह कहना सही नहीं होगा कि हर हिंदी फिल्म निर्माता भोजपुरी कलाकारों को नापसंद करता था, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि भोजपुरी पहचान के साथ आने वाले कलाकारों को अकसर एक खास तरह के किरदारों तक सीमित कर दिया जाता था.

लेकिन पुरानी कहावत है कि ‘उगते हुए सूरज को कोई रोक नहीं सकता’. और आज भोजपुरी सिनेमा ने हिंदी सिनेमा की छाती पर मूंग दल कर अपना वह मुकाम हासिल कर लिया है, जिस की कल्पना कभी किसी ने नहीं की थी. जी हां, आज हवा का रुख बदल चुका है. जो भोजपुरी सिनेमा कभी हिंदी सिनेमा की परछाई में जीने को मजबूर था, आज उसी के सुपरस्टार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बड़ेबड़े प्रोडक्शन हाउस के चहेतेबने हुए हैं. फिर चाहे हिंदी फिल्म ‘लापता लेडीज’ में रवि किशन का पान चबाता हुआ कड़क पुलिस वाला किरदार हो या फिर 18 सितंबर, 2026 को रिलीज हुई कुणाल खेमू के डायरैक्शन में बनी फिल्म ‘वाइब’ में दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ का किरदार हो.

इतना ही नहीं, इस के ठीक एक हफ्ते बाद यानी 25 सितंबर, 2026 को एकता कपूर और टीवीएफ की फिल्म ‘द वन : फोर्स औफ द फौरैस्ट’ में पहली बार बौलीवुड के इतिहास में पहली बार पूर्वांचल के सब से बड़े महापर्व ‘छठ’ को समर्पित एक गाना ‘छठी मैया…’ नजर आया, जिसे तमन्ना भाटिया पर फिल्माया गया.

लेकिन भोजपुरी कलाकारों को यह कामयाबी रातोंरात नहीं मिली है. इस ‘कायापलट’ के पीछे संघर्ष और हिंदी की अति लोकप्रिय पत्रिका ‘सरस सलिल’ की मुहिम का एक ऐसा समंदर है, जिसे जाने बिना इस ऐतिहासिक बदलाव को सम?ाना आसान नही है.

रवि किशन की दस्तक

इसी दौर में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के मेन स्ट्रीम सिनेमा के बंद दरवाजे पर सब से पहली और जोरदार दस्तक दी एक ऐसे कलाकार ने, जिसे आज हर कोई जानता है… रवि किशन.

रवि किशन ने सब से पहले हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ही कदम रखा था, लेकिन तब उन्हें भी शुरुआती संघर्षों का सामना करना पड़ा. पर उन्होंने कभी हार नहीं मानी. बाद में वे ‘भोजपुरी सिनेमा के अमिताभ बच्चन’ बन गए.

लेकिन हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए वे लगातार मेहनत करते रहे. फिर आया वह मोड़, जब हिंदी फिल्मकारों को सम?ा में आया कि रवि किशन सिर्फ लाउड एक्टिंग नहीं करते, बल्कि जब वे स्क्रीन पर आते हैं, तो जीजान लगा देते हैं.

पिछले साल आई किरण राव व आमिर खान की फिल्म ‘लापता लेडीज’ में इंस्पैक्टर श्याम मनोहर के किरदार में रवि किशन ने जो अभिनय किया, उस ने दर्शकों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया.

वह किरदार यह साबित करने के लिए काफी था कि एक भोजपुरी सुपरस्टार जब अपनी पूरी रेंज दिखाता है, तो बड़ेबड़े एक्टर्स के पसीने छूट जाते हैं.

रवि किशन ‘तेरे नाम’ के अलावा ‘लक’, ‘वैलकम टू सज्जनपुर, ‘रावण’, ‘मुक्काबाज’, ‘बाटला हाउस’ और ‘लापता लेडीज’ जैसी कई हिंदी फिल्मों में नजर आए हैं.

साल 2024 के बाद उन की हिंदी और पैन इंडिया उपस्थिति और भी बढ़ी है. उन की फिल्मोग्राफी में ‘सिंघम अगेन’, ‘सन आफ सरदार 2’, ‘धमाल 4’ और सितंबर 2026 में रिलीज हुई फिल्म ‘मिर्जापुर : द मूवी’ फिल्में दर्ज हैं.

‘मिर्जापुर : द मूवी’ में उन का शामिल होना खासतौर पर उल्लेखनीय है, क्योंकि यह एक लोकप्रिय ओटीटी फ्रैंचाइजी का बड़े परदे पर विस्तार मात्र नही है, बल्कि कहानी भी रवि किशन के किरदार के मुताबिक ही लिखी गई.

रवि किशन को सिर्फ भोजपुरी कलाकार कह कर देखना अब काफी नहीं है. वे हिंदी सिनेमा, ओटीटी और क्षेत्रीय सिनेमा तीनों जगह काम करने वाले कलाकार हैं.

मनोज तिवारी ‘मृदुल’ का कारनामा

90 के दशक के आखिरी और 2000 के शुरुआती सालों में जब भोजपुरी सिनेमा दम तोड़ रहा था, तब एक आवाज गूंजी… मनोज तिवारी ‘मृदुल’ की.

मनोज तिवारी ने पहले अपने गानों और लोकगीतों से पूर्वांचल के घरघर में अपनी जगह बनाई. उन के कैसेट्स और सीडी की बिक्री ने रिकौर्ड तोड़ दिए. लेकिन असली धमाका होना अभी बाकी था. साल 2004 में एक फिल्म आई ‘ससुरा बड़ा पैसा वाला’. इस फिल्म में मनोज तिवारी मुख्य भूमिका में थे.

इस फिल्म के रिलीज होते ही एक नए इतिहास का सूत्रपात हो गया. महज कुछ लाख रुपयों में बनी इस फिल्म ने करोड़ों की कमाई की. सिनेमाघरों के बाहर लाठियां चली थीं. टिकटें ब्लैक मे बिकी थीं.

पहली बार मनोज तिवारी ने भोजपुरी सिनेमा को ऐसी कामयाबी दिलाई थी, जिस की कल्पना तब तक बौलीवुड की मेनस्ट्रीम सिनेमा की बड़ी फिल्मों ने भी नहीं की थी, जिस की उसे सख्त जरूरत थी.

मनोज तिवारी ने साबित कर दिखाया था कि भोजपुरी भाषी दर्शक सिर्फ फिल्में देखता नहीं है, बल्कि अपनी फिल्मों के लिए जान छिड़कता है.

इस के बाद मनोज तिवारी ने ‘दरोगा बाबू आई लव यू’ ‘गंगा’ और ‘बंधन टूटे न’ जैसी बैक टू बैक हिट्स दे कर भोजपुरी सिनेमा को एक कौर्पोरेट पहचान दिलाई. उन्होंने बौलीवुड के ‘बिग बौस’ जैसे बड़े मंचों पर जा कर भोजपुरी अस्मिता का ?ांडा गाड़ा.

यह मनोज तिवारी की ही बिछाई हुई पिच थी, जिस पर आगे चल कर बाकी कलाकारों ने ‘चौकेछक्के’ लगाने शुरू किए और अब बौलीवुड इन का दीवाना हो गया है.

आवाज का धनी पवन सिंह

हिंदी फिल्मों में भोजपुरी कलाकारों के लिए संगीत एक बड़ा प्रवेशद्वार बना है. मनोज तिवारी ‘मृदुल’ के बाद पवन सिंह ने भी अपनी आवाज व संगीत की ताकत के बल पर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कामयाबी हासिल की. साल 2024 हिंदी फिल्म ‘स्त्री 2’ की कामयाबी में पवन सिंह की आवाज में गाया हुआ गीत ‘आई नहीं…’ का योगदान रहा. इसी तरह फिल्म ‘विक्की विद्या का वह वाला वीडियो’ के गीत ‘चुम्मा…’ में भी पवन सिंह की ही आवाज गूंजी.

कहने का मतलब यह है कि भोजपुरी कलाकार अब केवल भोजपुरी फिल्मों तक सीमित नहीं हैं. उन की भाषा और संगीत की लोकप्रियता हिंदी मेन स्ट्रीम सिनेमा के लिए कामयाबी की गारंटी मानी जाने लगी है. पहले भोजपुरी कलाकार हिंदी सिनेमा में जगह तलाशते थे, अब हिंदी सिनेमा भी भोजपुरी कलाकारों की लोकप्रियता और प्रतिभा का इस्तेमाल कर रहा है.

‘निरहुआ’ को न भूलें

भोजपुरी सुपरस्टार दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ के लिए भी यह बदलाव खास है. सब से पहले दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ ‘प्राइम वीडियो’ की वैब सीरीज ‘ग्राम चिकित्सालय सीजन 2’ में ‘बाबू साहब’ के किरदार में नजर आए. फिर हिंदी फिल्म ‘वाइब’ में बंसी के किरदार में नजर आए. और अब वैब सीरीज ‘दुपहिया सीजन 2’ में वे कोचिंग सैंटर चलाने वाले प्रथमेश के किरदार में नजर आ रहे हैं.

मतलब यह कि दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ हिंदी सिनेमा का हिस्सा तो बन रहे हैं, पर वे जल्दबाजी में अपना नुकसान ही कर रहे हैं. ‘वाइब’ हो या ‘दुपहिया सीजन 2’ हो या ‘ग्राम चिकित्सालय सीजन 2’ हो, उन का किरदार जबरन ठूंसा हुआ नजर आता है. कम से कम उन्हें किरदार व फिल्में चुनने में सावधानी बरतनी चाहिए.

सरस सलिल का रोल

लेकिन हमारे लेख का सब से दिलचस्प हिस्सा तो अब शुरू होता है. हिंदी की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली लोकप्रिय पाक्षिक पत्रिका ‘सरस सलिल’ ने सब से पहले हाशिए पर पड़ी भोजपुरी भाषा और भोजुपरी सिनेमा को मुख्यधारा में लाने के मकसद से साल 2020 में ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ की शुरुआतकी. पिछले 7 साल से लगातार हर साल ‘सरस सलिल’ पत्रिका भोजपुरी सिनेमा से जुड़े कलाकारों को अवार्ड दे कर उन्हें राष्ट्रीय मंच देती आ रही है.

‘सरस सलिल’ पत्रिका अब तक दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, अरविंद अकेला ‘कल्लू’, अंजना सिंह, देव सिंह, संजय पांडेय सहित कई कलाकारों को यह सम्मान दे चुकी है.

लेकिन भोजपुरी सिनेमा में बदलाव का श्रेय सिर्फ ‘सरस सलिल’ को देना भी सही नहीं होगा… भोजपुरी कलाकारों के हालात बदलने के पीछे कई कारण हैं… पहला, भोजपुरी कलाकारों का अपना विशाल दर्शक वर्ग. और इस बात को सब से पहले दक्षिण के अभिनेता अल्लू अर्जुन ने पहचान कर अपनी फिल्म ‘पुष्पा 2’ का एक प्रमोशनल इवैंट पटना के गांधी मैदान में रखा.

दूसरी वजह, यूट्यूब और सोशल मीडिया ने भोजपुरी संगीत और कलाकारों को देश की सीमाओं से बाहर तक पहुंचाया. तीसरी वजह, ओटीटी प्लेटफार्म ने विविधता पूर्ण कलाकारों को चयनित करना शुरू किया.

चौथी वजह, हिंदी दर्शकों की देहाती व श्रेत्रीय कहानियों के प्रति बढ़ता रु?ान. 5वीं वजह यह कि भोजपुरी कलाकारों ने खुद अपनी पहचान को केवल भोजपुरी उद्योग तक सीमित नहीं रखा.

इस का सब से बड़ा उदाहरण रवि किशन हैं. पवन सिंह संगीत के रास्ते हिंदी फिल्मों तक पहुंचे. दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ अब हिंदी फिल्म और ओटीटी प्लेटफार्म की जरूरत बनते जा रहे हैं.

साल 2026 में भोजपुरी हीरोइन आम्रपाली दुबे ने माना कि भोजपुरी इंडस्ट्री अपनी पुरानी छवि बदलने की कोशिश में है.

आखिर में अहम सवाल… अगर कल हिंदी की किसी बड़ी फिल्म में भोजपुरी का कोई नया कलाकार मुख्य लीड में दिखाई दे, तो क्या हम उसे सिर्फ ‘भोजपुरी कलाकार’ कहेंगे या भारतीय अभिनेता?

जब राष्ट्रपति ने बनवाई पहली भोजपुरी फिल्म

भोजपुरी सिनेमा के नए युग को सम?ाने के लिए अतीत की परतें उधेड़ना भी जरूरी है. बात साल 1962 की है, जब भारत के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद की सदाबहार अभिनेता नाजिर हुसैन (जिन्हें कई लोग ‘नादिर शाह’ के नाम से भी याद करते हैं) से मुलाकात हुई थी.

डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने नाजिर हुसैन से कहा था कि उन्हें अपनी मातृभाषा भोजपुरी में भी फिल्में बनानी चाहिए ताकि मिट्टी की खुशबू परदे पर बिखर सके. राष्ट्रपति की इस बात ने नाजिर हुसैन के दिल में घर कर लिया और फिर साल 1963 में इतिहास रचा गया. भोजपुरी सिनेमा की पहली आधिकारिक फिल्म रिलीज हुई, जिस का नाम था ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’. कुमकुम, असीम कुमार और नाजिर हुसैन जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म ने बौक्स औफिस पर ऐसी कामयाबी हासिल की थी कि बड़ीबड़ी हिंदी फिल्में इस के सामने पानी मांगने लगीं.

इस फिल्म के लिए संगीतकार चित्रगुप्त ने लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी की आवाज अपने गीतों में इस्तेमाल की और इस फिल्म को अमर बना दिया. शुरुआती दौर में भोजपुरी सिनेमा ने ‘लागी नाही छूटे राम’ और ‘बिदेशिया’ जैसी कल्ट फिल्में दीं. लेकिन 70 और 80 के दशक के आतेआते, सिनेमाघरों और डिस्ट्रीब्यूशन की कमी में यह इंडस्ट्री थोड़ी सुस्त पड़ गई. ऐसा लगने लगा मानो भोजपुरी सिनेमा अंधेरे कुएं में खो गया हो.

इस के लिए काफी हद तक भोजपुरी सिनेमा से जुड़े फिल्मकार व कलाकार ही दोषी थे. वे ऐसी फिल्में बना रहे थे, जिन्हें पूरे परिवार के साथ बैठ कर नहीं देखा जा सकता था. Bhojpuri Stars

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