Story in Hindi. गां व की भुखमरी से परेशान हो कर सुलखान ने बीवी सुगिया को साथ ले कर दिल्ली जाने का इरादा कर लिया.

गांव में भीषण सूखा पड़ा था. 2 साल से लगातार बादल धोखा दे रहे थे. खेतों में हरियाली की जगह धूल उड़ने लगी, तो किसानों की उम्मीदों का धुआं निकल गया.

सरकारी कर्जों के मिलने में लगने वाली देरी और घूसखोरी ने किसानों की छोटीमोटी जोतें गिरवी रख कर उन्हें सूदखोरों के आगे सलाम मारने पर मजबूर किया.

जब 4 बच्चों को सल्फास खिला कर सुखबीर की बेवा जनका ने जान दे दी, तो सुलखान ने भी गांव से हाथ जोड़ लिए. मांबाप थे नहीं, घरवाली सुगिया को किस के भरोसे छोड़ता.

सुगिया का नाम लेते ही उस की आंखों में अबीरगुलाल उड़ने लगता. जब वह इस घर में आई थी, तो मां ने बलाएं लेते हुए उस से कहा था, ‘दूधो नहाओ, पूतों फलो.’

पड़ोस की लड़कियां उसे घेरे रहतीं. जब औरतें बतियातीं, ‘सुलखान के आंगन में चांद उतर आया है.’ तब उसे अपना टूटा छप्पर और घर की मिट्टी की दीवारें महल से कम नहीं लगती थीं.

उस दिन सवेरे जब 2 ?ोलों में कपड़ेलत्ते ले कर वह गांव छोड़ रहा था, तो गांव के किनारे वाले पीपल के पास उल्लू बोल रहा था. उसे लगा जैसे पुरखों का गांव अब अपना वजूद खो कर शहरों में चला जाएगा.

एकएक गरीब आदमी शहर भागेगा, तो क्या शहर वाले नोट की जगह अनाज भी छापने लगेंगे, जो सब का पेट भरेगा. पैसे की खनक भी तभी काम करेगी, जब धरती अनाज उगलेगी.

उसे लगा, सारी दौड़धूप कहीं बेकार न जाए. पर अब वह लौट नहीं सकता था. न गांव में जिंदगी दिखाई दे रही थी, न अनदेखे शहर पर भरोसा जम रहा था.

स्टेशन 2 किलोमीटर दूर रह गया था, जब गांव के प्रधान गनगौर सिंह की मोटरसाइकिल आती दिखाई दी.

प्रधान की नजर सुगिया पर पड़ गई. सुगिया के चर्चे तो खूब सुने थे, मगर उस की खूबसूरती से रूबरू होने का मौका आज मिला, तो वे ठगे से रह गए.

वे सोचने लगे कि सुलखान वाकई खुशनसीब है. सुगिया के बोल सुनने और उसे निहारने को मन हिलकोरे मारने लगा. अपने घर में बैठी गेहूं के बोरे जैसी घरवाली से सुगिया की तुलना करने पर उन्हें लगा कि उन का सबकुछ बेकार है. मोटरसाइकिल रोक कर वे बोले, ‘‘सवेरेसवेरे कहां चले सुलखान?’’

‘‘जहां नसीब ले जाएगा. अब तो गांव में गुजर नहीं. यहां रह कर तो भूखे मरना है. मैं कामचोर नहीं, पर यहां मजदूरी भी तो नहीं,’’ सुलखान ने जमीन पर गठरी रखते हुए कहा.

‘‘खैर, हरेक को तो काम नहीं दिया जा सकता है, पर देखता हूं. तुम जैसा भला आदमी गांव छोड़ देगा, तो मेरी प्रधानी बेकार. कल से गांव के पूरब वाले तालाब की खुदाई होगी. तुम वहां काम करना. कहां दूसरे शहर में ठोकरें खाते घूमोगे,’’ प्रधान ने एहसान जताया.

‘‘मगर, सुगिया को तो मेहनत वाला काम करने की आदत नहीं है. मैं अकले भले ही कर लूं. रुपए कितने मिलेंगे,’’ एक ही सांस में सुलखान ने अपने सारे शक जाहिर कर दिए.

‘‘सुगिया को काम करने की कौन कहता है? इतने मजदूर चलते हैं, यह 4 बालटी पानी भर कर रख ले. जो पीना चाहेगा, पिएगा. इस में तो इसे खास तकलीफ नहीं होगी. तुम मिट्टी खोदने का काम करना. दोनों को मजदूरी सौसौ रुपए मिलेगी. सरकार ने पानी पिलाने के लिए कमजोर तबके की औरतों को ही रखने को कहा है. नीम के पेड़ की छाया में बालटी रख कर बैठी रहे,’’ प्रधान ने अपना पासा फेंका.

सुगिया को कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था. वह बोल गई, ‘‘सच कह रहे हो प्रधानजी?’’

सुगिया की आवाज में जैसे मिठास घुली थी. चांदी की घंटी जैसी खनकती आवाज ने उन्हें घरवाली की फटे बांस जैसी आवाज की याद दिला दी. वे बोले, ‘‘सोलह आने सच. यह लो 2 सौ रुपए, 2-4 दिन का इंतजाम कर लो.’’

रुपए लिए तो सुलखान की आंखें छलछला आईं. वह सुगिया के साथ गांव लौट आया.

सवेरे से ताल पर सैकड़ों फावड़े चलने लगे. चिलचिलाती धूप में मजदूर एड़ीचोटी का पसीना एक कर के जुटे और देखते ही देखते तालाब के किनारों पर खुदी मिट्टी का ढेर लगा कर पटरियों में बदलने लगे.

सुगिया पानी भर कर पेड़ के नीचे बोरा बिछा कर बैठ गई. ज्यादातर लोग दूर लगे हैंडपंप पर ताजा पानी की चाह में चले जाते थे. सुगिया के पास बहुत कम लोग आते थे.

प्रधानजी ने अपनी चारपाई उसी के पास पेड़ के नीचे डलवा रखी थी. काम पर नजर डालने के बाद वे हर बार उसी चारपाई पर आ कर बैठ जाते, पान मसाले की पुडि़या फाड़ते और एक पुडि़या सुगिया की ओर उछाल देते.

सुगिया आदत न होने की बात कहती, तो हंस कर कहते, ‘‘खा कर देखो, दिल बागबाग हो जाएगा.’’

‘‘नशा चढ़ गया तो?’’ सुगिया हंस कर कहती.

‘‘तुझ  से ज्यादा नशा इस में थोड़े ही है,’’ कह कर प्रधान आंख दबा कर मुसकराते.

इन दांवपेंचों से अनजान सुगिया को अपनी खूबसूरती की तारीफ अच्छी लगती और वह लजा कर आंखें झपका का लेती. चार बातें अच्छी लगतीं, तो एकाध अटपटी भी वह सह लेती. कुल मिला कर वह सोचती थी कि सुनसुन कर भी अपना काम चले, तो ठीक ही है.

उसे ज्यादा अटपटा उस दिन जरूर लगा, जब प्रधान ने मजदूरी देने के बहाने अपनी चौपाल पर बुलाया और साथ आए सुलखान को सिगरेट लाने के बहाने भेज कर उस का हाथ पकड़ कर उस की उंगली में एक अंगूठी पहना दी.

सुगिया के हाथ खींचने की कोशिश पर वे बोले, ‘‘क्या मेरा इतना भी हक नहीं कि तुम्हें अंगूठी दे सकूं? मैं इतना पराया हूं क्या?’’

‘‘पर इस के दाम कहां से दूंगी? खाने के लाले पड़े हैं,’’ सुगिया ने अपना संकोच जाहिर किया.

‘‘तुम से दाम मांगता कौन है? अदा करने की जिद ही हो, तो तुम दोनों काम करते ही हो. आगे भी कर देना,’’ प्रधान मुसकराए.

‘‘हां, यह ठीक है,’’ सुगिया की सांस में सांस आई.

‘‘मैं तो तेरे लिए साड़ी और पायल भी लाया था, पर तू इतने में ही बिदकने लगी. जानती है, औरतें मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बन रही हैं, पर तू कुएं की मेढकी बनी रहना चाहती है.

‘‘मैं तो सोचता हूं, अगली बार औरत की सीट हो, तो तुझे  ही प्रधान बना दूं. शान से हुकूमत करना,’’ प्रधानजी ने सावधानी से अपनी बिसात बिछानी शुरू की.

‘‘आप तो मुझे आसमान पर चढ़ा रहे हैं,’’ सुगिया को प्रधान की बातें मन ही मन अच्छी लग रही थीं, पर वह इन बातों का भरोसा नहीं कर पा रही थी.

‘‘तू घबराती क्यों है? आजकल औरतें आदमी के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम करती हैं. एक तुम हो, जो अपने खोल में ही सिमटी रहने की जिद पर हो,’’ प्रधान ने उस की पीठ पर हाथ रखते हुए कहा.

इस बार सुगिया ने कोई एतराज नहीं किया. वह अपने वजूद के गरूर से भर कर गुलाबी नजरों से प्रधान को देखने लगी.

तब तक सुलखान आ गया. उसे देख कर प्रधान ने कहा, ‘‘सुलखान, तुम्हारी घरवाली है बड़ी समझेदार. इसे अगले चुनाव तक कुछ न कुछ बनवा देना है.’’

सुलखान का बस चलता तो सुगिया को आसमान पर बैठा देता, इसलिए यह बात उसे भली लगी. सुगिया के घर साड़ीपायलें आईं और साथ ही, प्रधान की नरेगा के काम की जांच आई.

प्रधान ने सुगिया को सिखापढ़ा कर समझाया कि उसे जांच अधिकारी के सामने उस के काम की तारीफ करनी है. प्रधान ने बताया कि सही जवाब देने पर उसे पंचायत मित्र की नौकरी दिला देंगे.

जांच के एक दिन पहले प्रधान ने चौपाल में पंचायत सैके्रटरी के साथ जम कर शराब पी और समझाने के बहाने शाम को सुगिया को बुलाया.

सुगिया और सुलखान दोनों को यह बात अखरी, मगर मना करने का मतलब भुखमरी झेलना था, इसे दोनों अच्छी तरह समझाते थे.

जब दोनों वहां पहुंचे, तो नशे में बेखबर प्रधान को उन के आने की आहट नहीं मिली. दोनों प्रधान की बड़बड़ाहट सुन कर थोड़ा दूर ही ठहर गए.

प्रधान की बातें उन्हें बिच्छू के डंक से भी तीखी लगीं. वह सैके्रटरी से कह रहे थे, ‘‘अपने पास सुगिया तुरुप का पत्ता है. अच्छेअच्छे अफसरों का ईमान डोल जाएगा. उसे पेश कर दूंगा, सारा झमेला पार हो जाएगा. बस, अफसर शौकीन तबीयत वाला होना चाहिए.’’

‘‘वह झिझकेगी तो नहीं, सारी बात पुख्ता कर ली है?’’ सैक्रेटरी ने शंका जाहिर की.

‘‘उसे नौकरी दिलाने का भरोसा दिया है और यहां झिझक दूर करने के लिए ही तो बुलाया है. सुलखान भी उस के साथ आएगा, पर उसे शराब लाने के बहाने एक किलोमीटर दूर ठेके पर भेज देंगे. फिर हम दोनों सुगिया की झिझक दूर करेंगे. चीखीचिल्लाई तो हजार 5 सौ से उस का मुंह बंद कर देंगे. फिर तो वह मना नहीं करेगी,’’ प्रधान ने सुरूर में कहा.

प्रधान की नीचता पर सुलखान का रोमरोम सुलग उठा. सुगिया वहीं से चीख कर बोली, ‘‘प्रधानजी, वह दिन कभी नहीं आएगा. मैं मजदूरी कर के भी रह लूंगी, मगर इज्जत का सौदा कभी नहीं करूंगी.

‘‘सुगिया न सही, अपनी बहिनबेटी पेश कर के तुम नीलामी बचा ही लोगे. तुम्हारे लिए औरत की इज्जत की यही तो कीमत है. तुम्हारे जैसे लोग बहिनबेटी पर लालच को तरजीह देते हैं.’’

प्रधान और सैक्रेटरी दोनों ने हड़बड़ा कर बाहर जहाँ झाका, तो उन के होश उड़ गए. उन्हें लगा कि सुगिया ने उन के मुंह पर थूक दिया है. इतनी मुश्किल से तैयार सुगिया फुर्र हो गई थी और भयानक कल मुंह फैलाए खड़ा था.

उन्हें गांव के छले हुए लोग यमदूतों की तरह अपने चारों ओर मुंह फैलाते नजर आने लगे. उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ  रहा था. Story in Hindi

-मदन मोहन पांडेय

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