Humour. हमारे महल्ले में हफ्तों पानी आए या न आए, हमारे महल्ले में दिनों बिजली गुल रहे तो रहे, हमारे महल्ले में बिजली गुल होने की बीसियों बेकार की शिकायतें करने के बावजूद कोई बिजली महकमे की ओर से बिजली ठीक करने आए या न आए, हमारे महल्ले में सड़क साफ करने वाले हफ्तों नहीं, महीनों आएं या न आएं, पर प्रजा प्रिय सरकार की ओर से कोई न कोई, किसी न किसी की गणना, कोई न कोई सर्वे करने वाले सरकारी देवदूत आएदिन आते रहते हैं.

हालांकि, महल्ले के कुछ दिमागी नक्सली पानी न आने, बिजली गुल रहने, सड़कों की सफाई न होने पर आएदिन होहल्ला करते रहते हैं. होहल्ला करना इन दिमागी नक्सलियों का धर्म है तो उन के होहल्ले से व्यवस्था के कान पर जूं तक न रेंगना व्यवस्था का पेशा. ऐसे में मैं बस, अपनी एनर्जी बचाए रखता हूं.

गणना करने वालों के क्रम में कल एक और गणना करने वाले सरकारी गणक हमारे महल्ले में कोई गणना करते मेरे घर आ पहुंचे.

अजीब है मेरे घर के दरवाजे पर लगी घंटी भी. जब कोई सरकारी मुलाजिम किसी काम से आता है तो एकदम ठीक हो जाती है.

मतलब, अब सरकारी मुलाजिमों से दरवाजे पर लगी खराब घंटी तक डरने लगी है.

दरवाजे की घंटी के खराब बटन की ओर ज्यों ही उन्होंने व्यवस्थागत उंगली बढ़ाई ही कि खराब बटन पर व्यवस्थागत उंगली पड़ने से पहले ही दरवाजे की घंटी बज उठी तो मैं तुरंत सम झ गया कि शर्तिया सरकारी मुलाजिम पधारा है. कोई पड़ोसीवड़ोसी होता तो लाख बजाने के बाद भी घंटी न बजती.

घंटी बजते ही मैं ने भीतर से अनादर करते ससादर पूछा, ‘‘जनाब कौन? कहां से तशरीफ लाए हैं?’’

‘‘सरकार की ओर से तशरीफ लाया हूं.’’

‘‘सेवा करवाने आए हो या…?’’ ‘‘नहीं गणना द्वारा सेवा करने आया हूं.’’

‘‘जनाब, किस की? गधों की?’’ ‘‘नहीं, वह मैं पिछले महीने कर गया था.’’

‘‘तो जनाब, उल्लुओं की?’’ ‘‘नहीं, वह उस से पिछले महीने कर गया था.’’

‘‘तो जनाब,  झोटों की?’’ ‘‘नहीं. उसे करने के अभी सरकारी आदेश नहीं हुए हैं?’’

‘‘तो सरकारी नसबंदी हो जाने के बाद भी अपनी संख्या बढ़ा रहे कुत्तों की?’’

‘‘नहीं, दिमागी नक्सलियों की,’’ कह जनाब ने दरवाजा खोलने का अनायास प्रयास किया कि उस से पहले मैं ने ही डरते हुए दरवाजा खोल दिया ताकि उस वक्त तो कम से कम  मैं दिमागी होते हुए भी दिमागी नक्सली न लगूं.

वे सीना चौड़ा रख भीतर आए. आते ही इधरउधर  झांका. कोई दिमागी नक्सली होने की निशानी ढूंढ़ रहे थे शायद. ताक झांक करने के बाद बोले, ‘‘घर में कितने रहते हैं?’’

‘‘कौन जनाब?’’ ‘‘दिमागी नक्सली.’’

‘‘दिमागी नक्सली तो कोई नहीं. दिमागी पैदल 4 रहते हैं.’’

‘‘श्योर?’’ ‘‘श्योर नहीं जनाब, डैड श्योर.’’

‘‘सरकारी रिकौर्ड में दर्ज कर लिया जाए?’’ ‘‘जी, जनाब.’’

‘‘जेनजी कितने हैं?’’ ‘‘2 हैं.’’

‘‘और जेनडी?’’

‘‘जेनडी बोले तो?’ मैं ने अघोषित नई जेनरेशन जेनडी के बारे में पूछा तो वे बोले, ’’जेनडी बोले तो डिस्टर्ब्ड जेनरेशन.’’

‘‘वह तो केवल मैं हूं,’’  मैं ने ‘जो मैं हूं’, उसे खुले मन से हंसते हुए स्वीकारा कि अचानक उन्हें सामने टेबल पर कुछ किताबें, पत्रिकाएं दिखीं तो वे मेरे दिमागी पैदल होने पर सवाल खड़ा करते बोले, ‘‘तुम  झूठ बोलते हो कि तुम दिमागी नक्सली नहीं?’’

‘‘नहीं जनाब, सच बोल रहा हूं. आप की कसम.’’

‘‘देखो, मेरी कसम मत खाओ. अभी मेरी बहुत लंबी सर्विस पड़ी है. मु झे सरकार और जनता को अभी बहुत खाना है. तो ये टेबल पर किताबें, पत्रिकाएं क्यों?’’

‘‘ये कहानियों की किताबें, पत्रिकाएं हैं जनाब. दिमागी पैदल मनोहर कहानियां, कविताएं पढ़ते हैं, समाज के सच नहीं,’’ मैं ने कहा तो वे मु झ से कुछ कुछ संतुष्ट हुए और कुछकुछ असंतुष्ट रहे.

आखिर अपनी बची हुई असंतुष्टि को खत्म करने के लिए उन्होंने अपने सरकारी बैग से प्रश्नावली निकाली और मु झ से बोले, ‘‘सरकार ने एक प्रश्नावली तैयार की है.’’ ‘‘किसलिए जनाब?’’

‘‘ताकि इस प्रश्नावली से सवाल पूछ कर दिमागी नक्सलियों और दिमागी पैदलों को अलगअलग किया जा सके.’’

‘‘तो पूछिए जनाब, हाथ कंगन को आरसी क्या, दिमागी पैदल को फारसी क्या?’’

‘‘मतलब तुम फारसी जानते हो? पढ़ेलिखे हो?’’

‘‘पढ़ालिखा था, जब था. शादी के बाद से दिमागी पैदल चल रहा हूं. बस, दादी के समय का पता नहीं क्यों मुहावरा याद आ गया,’’ मैं ने माफी सहित विनम्र निवेदन किया तो वे कुछ विनम्र हुए, ‘‘तो मेरा पहला सवाल यह कि तुम सरकार को रक्षक मानते हो या भक्षक?’’

‘‘यह भी कोई सवाल हुआ जनाब. मैं तो सरकार को प्रजा का रक्षक मानता हूं.’’

‘‘चाहे वह भक्षक हो?’’ ‘‘जो सरकार को सपने में भी भक्षक होते हुए भक्षक माने उस के दिमाग में कीड़े पड़ें, वह भी गजगज भर लंबे,’’ उन के सवाल का जवाब दे कर मैं ने अपने को दूसरे सवाल के लिए तैयार किया.

‘‘तुम्हारे लिए सरकार किस का रूप है?’’  ‘‘जनाब, देवता का.’’

‘‘और सरकार के मुलाजिम?’’  ‘‘जनाब, देवता के देवदूत.’’

‘‘मतलब?’’ ‘‘मतलब जनाब यह कि जहांजहां देवता खुद नहीं जा सकते, वहांवहां वे अपने मुलाजिमों उर्फ अपने देवदूतों को प्रजा का हित करने को भेज देते हैं,’’ सुन उन का सीना 5 इंच बढ़ा.

‘‘तुम्हें कभी नहीं लगा कि देवता के किसी फैसले का तुम्हें विरोध करना चाहिए? उस से सवाल पूछना चाहिए?’’

‘‘जनाब नहीं. कभी नहीं लगा. सरकार से सवाल पूछना सब से नीचता का काम है. जिन्होंने उस से सवाल पूछे, उनउन को उन का श्राप ऐसा लगा कि… ऐसा लगा कि…’’

‘‘अगर सरकार अपने एजेंडे को ले कर प्रजा विरोधी काम करे तो तुम उसे क्या मानते हो?’’

‘‘जनाब, प्रजा के पिछले जन्म के पाप.’’

‘‘क्या सरकार जन कल्याण के नाम पर अपना और अपनों का कल्याण करती है?’’

‘‘जनाब, अब सरकार कुछ काम तो करती नहीं. पर पेट तो उस के और उस के अपनों के भी तो लगे हैं. ऐसे में जो वह प्रजा के असंख्य पेटों में से केवल एकएक दाना लेले तो प्रजा का इस से बड़ा सरकार हित में और त्याग क्या…’’

‘‘क्या सरकार का कोई गुप्त एजेंडा होता है?’’

‘‘नहीं जनाब, सरकार आसमान से भी ज्यादा खुली होती है.’’

‘‘सरकार किस के कल्याण के लिए बनी होती है, प्रजा के या पूंजीपतियों के?’’

‘‘पूंजीपति भी तो पूंजीपति से पहले प्रजा ही होते हैं जनाब.’’

‘‘तुम्हारा कोई अपना विचार या विचारधारा?’’

‘‘नहीं जनाब, मेरे तो विचार भी सरकार के और विचारधारा भी सरकार की.’’

‘‘मतलब?’’ पूछ कर वे मु झे भीतर से घूरे तो मैं ने कहा, ‘‘जनाब, अपना तो न कोई विचार, न कोई विचारधारा. केवल सरकार का जयकारा.’’

‘‘मजाक तो नहीं कर रहे हो?’’

‘‘जनाब, दिमाग से पैदल न मजाक करता है और न ही मजाक सम झता है.’’

‘‘गुड…’’ प्रश्नावली में दिए गए सवालों के मेरे द्वारा दिए जवाबों को सुन ज्योंज्यों वे धीरेधीरे आगे बढ़ते गए,  त्योंत्यों वे खुश से ज्यादा खुश होते गए कि हमारे महल्ले में अभी भी कोई तो दिमागी पैदल है.

‘‘प्रजा का असली धर्म क्या है?’’  ‘‘सरकार की दिमाग मूंद कर जयजयकार करना.’’

‘‘जो कोई जयजयकार न करे तो?’’

‘‘तो उसे तत्काल घुसपैठिया करार दे देश निकला दे दिया जाए.’’

‘‘क्या तुम अपने को दिमागी पैदल मानते हो?’’

‘‘मानता ही नहीं जनाब, शर्तिया दिमागी पैदल हूं. आप के पास समय हो तो मैं अपना दिमाग खोल कर आप को उस का पैदलपन दिखा सकता हूं.’’

‘‘और तुम्हारी बीवी?’’

‘‘वह तो जनाब मु झ से भी ज्यादा दिमागी पैदल है. शादी के समय छत्तीस नहीं, सैंतीस गुण मिले थे हमारे. कुछ भी नहीं सोचती. बस, हरदम बौराई सरकार… सरकार… सरकार… सरकार कहिए… जाहि विधि राखे सरकार, ताहि विधि रहिए, सरकारी मीरा हो बेसुध गाती रहती है. वह तो अपने प्रभु की भक्त नहीं, उन्मुक्त भक्त है.’’

‘‘और जो तुम्हारे घर में जेनजी हैं, वे क्या हैं?’’

‘‘जनाब, नयानया खून हैं. जवानी के जोश में थोड़ेथोड़े दिमागी नक्सली से हैं. बाप से भी सवाल पूछ लेते हैं. लाख सम झाने के बाद भी भगवान स्वरूप बाप तक का भी विरोध कर लेते हैं. वैसे मैं उन्हें अपनी तरह का बनाने की कोशिश तो पूरी कर रहा हूं, ताकि उन्हें जब विकास के  झूठ की हकीकत का पता चलेगा तो तय है कि धीरेधीरे वे भी…’’

‘‘गुड. अब अगली कोई गणना सरकार ने कराई तो दोबारा कष्ट देने आऊंगा,’’ जनाब ने मु झे और मेरी धर्मपत्नी को कम्पलिटली दिमागी पैदल और मेरी जेनजी को संभावित दिमागी पैदल के कौलम में डाल कर अपने कागज लपेटे और अगले घर की ओर लपके.  Humour

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