Awareness. आजादी के दिन यानी 15 अगस्त को इस साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर पर अपना संबोधन देते हुए देश के लोगों को ‘दिमागी नक्सल’ से सावधान रहने के लिए कहा था. उन्होंने कहा कि देश ‘हथियारी नक्सलों’ को जंगलों में खत्म करने में कामयाब रहा है, लेकिन उस के वैचारिक समर्थक हिंसा और अराजकता को बढ़ावा देने के अवसर तलाश रहे हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जोर दे कर कहा कि देशवासियों को ‘दिमागी नक्सलियों’ से सावधान रहना चाहिए. उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे लोग व्यवस्था में अपनी पैठ बना कर नीतियों को प्रभावित कर के समाज के लिए खतरा बने हुए हैं.
नरेंद्र मोदी की इस टिप्पणी के बाद विपक्षी पार्टियों ने इस बात को ले कर सत्तापक्ष पर निशाना साधना शुरू कर दिया. कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि सरकार पहले विपक्षी नेताओं को ‘अर्बन नक्सल’ कहती थी अब ‘दिमागी नक्सल’ कह रही है. तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने भी सरकार पर निशाना साधा. पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए लिखा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है.
क्या है नक्सलवाद
नक्सलवाद की चिनगारी साल 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी इलाके से भड़की थी. सिलीगुड़ी में सीपीआई (एम) के कट्टरपंथी धड़ों ने जमींदारों के खिलाफ, कर्ज में डूबे आदिवासियों और भूमिहीन किसानों के साथ मिल कर अभियान शुरू किया था.
25 मई को पुलिस के एक सबइंस्पैक्टर की तीरकमान से हत्या कर दी गई थी. इस के बाद हुई पुलिस की गोलीबारी में 8 औरतों, 2 बच्चों और एक मर्द की मौत हुई थी. इस के साथ ही सशस्त्र संघर्ष फैलना शुरू हुआ था और चीन की मीडिया ने इसे ‘स्प्रिंग थंडर ओवर इंडिया’ करार दिया था.
इस से 2 साल पहले एक स्थानीय सीपीआई (एम) नेता चारु मजूमदार ने गुरिल्ला युद्ध के जरीए इंडियन स्टेट को उखाड़ फेंकने के मकसद के साथ ‘8 दस्तावेज’ तैयार किए थे. कानू सान्याल और जंगल संथाल के साथ मिल कर उन्होंने शुरुआत में नक्सलबाड़ी आंदोलन का नेतृत्व किया था. यह आंदोलन बाद में श्रीकाकुलम, तेलंगाना, बिहार समेत दंडकारण्य के जंगलों तक फैल गया था. इन्हें ‘नक्सली’ कहा गया था और जो आज भी इस सोच का हिमायती है उसे ‘दिमागी नक्सल’ कहा गया है.
यह तो हुई राजनीतिक उठापटक की बात, पर जब कौकरोच जनता पार्टी ने इस ‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर अपना एतराज दर्ज किया तो सवाल उठा कि जेनजी पीढ़ी इस मसले पर अपनी क्या राय रखती है खासकर गांवदेहात की वह पीढ़ी जो सवाल करने और जवाब मांगने में किसी से पीछे नहीं है.
केंद्र की भगवा भाजपाई सरकार जेनजी की इसी सवाल पूछने और जवाब की जवाबदेही के हल्ले से डरी हुई लगती है. धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद देशभर में पढ़ाईलिखाई की कमियों पर जब देश ने नौजवान खासकर जेनजी सड़कों पर आंदोलन करते दिखे तो सरकार बैकफुट आ गई गई, तभी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसी पीढ़ी के स्टाइल पर वीडियो बना कर इंटरनैट पर अपलोड करने पड़े.
यहां एक बात और सामने आई कि देशभर में गांवदेहात के जेनजी ने शासन और प्रशासन को डरा दिया है. ऐसे जेनजी जो विपरीत हालात में पढ़ते हैं, सरकारी नौकरी में सब से ज्यादा अप्लाई करते हैं, लड़कियां भी तालीम हासिल करने में पीछे नहीं हैं.
यही वजह है कि आजकल जेनजी हर जगह छाए हुए हैं. दिल्ली के मशहूर जंतरमंतर से ले कर मध्य प्रदेश के अनजान गांव तक इन की हनक के चर्चे हैं. जंतरमंतर पर अभिजीत दीपके ने सत्ताधारियों के दिमाग पर छाए घमंड के जाले साफ किए, तो मध्य प्रदेश के एक गांव में ‘बिट्टू तबाही’ ने अपने दम पर एक नदी, जो गंदा नाला बन चुकी थी, को साफ कर के उस में दोबारा सांसें भर दीं.
जी हां, ‘बिट्टू तबाही’ मध्य प्रदेश का वह लड़का है, जिस ने अकेले दम पर एक मरी हुई नदी को जिंदा कर दिया. 21 साल के ‘बिट्टू तबाही’ का असली नाम सुरेंद्र सिंह चौधरी है जो बीएससी का छात्र है.
यह ब्यावरा, जिला राजगढ़, मध्य प्रदेश का रहने वाला है और इस ने अजनार नदी, जो आंदलहेड़ा गांव से निकलती है और कभी ब्यावरा की जीवनरेखा थी, बाद में कचरा, प्लास्टिक, जलकुंभी और नाले के पानी से गंदा नाला बन गई थी, को अपने दम पर साफ कर दिया.
ऐसा क्या किया
26 जनवरी, 2026 को ‘बिट्टू तबाही’, यह सुरेंद्र सिंह चौधरी का सोशल मीडियाई नाम है, ने किसी गैरसरकारी संस्था या सरकारी मदद का इंतजार किए बिना खुद नदी में उतर कर सफाई शुरू की. शुरू में कुछ दोस्त आए, पर मुश्किल काम देख कर छोड़ गए. हालांकि, इस मुद्दे पर लोगों की राय अलगअलग है, फिर ‘बिट्टू तबाही’ अकेला ही रोज घंटों गंदे पानी, जहरीली काई और प्लास्टिक के बीच हाथों से कचरा निकालता रहा.
पर यह सब इतना आसान नहीं था, क्योंकि न तो ‘बिट्टू तबाही’ को तैरना आता था, न ही उस के पास ग्लव्स या गमबूट थे और न मशीनें. इतना ही नहीं, गंदे पानी से ‘बिट्टू तबाही’ के हाथों में इन्फैक्शन हुआ, सफाई के दौरान सांप भी मिले, पर यह जेनजी रुका नहीं. अपनी जेब से तकरीबन 30,000 रुपए खर्च कर के फावड़ा, औजार और डस्टबिन खरीदे और 3 महीने से ज्यादा की लगातार मेहनत से नदी का रंगरूप ही बदल दिया.
इन 2 उदाहरणों से हम ने सम झ लिया कि जेनजी की ताकत क्या है. पर अब सवाल यह उठता है कि गांव में रहने वाला जेनजी शहर में रहने वाले किसी जेनजी से कितना पिछड़ा है? साधारण शब्दों में पूछें तो क्या वह भी आज के साल 2026 के माहौल में खुद को ढाल चुका है या फिर गांव की जिंदगी ने उसे भी अपनी पिछली पीढि़यों की तरह सिर्फ जमीन के ज्ञान को बुनियाद बना कर पुराने रीतिरिवाजों में जकड़ा हुआ है?
अगर थोड़ी पुरानी पीढ़ी पर नजर डालें तो उन में से ज्यादातर आज भी 1950 के दौर में जीते दिखाई देते हैं खासकर गांवदेहात में. उन के लिए उम्र में बड़ा हमेशा आदर का पात्र है, जिस के पैर छूना ही आप की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. आप धार्मिक बनें, फिर चाहे आप की कमाई का एक बहुत बड़ा अंश पंडे के प्राइवेट दानपात्र में क्यों ही न चला जाए.
यहीं से जेनजी और उस से पहले की पीढ़ी में द्वंद्व शुरू होता है. पुरानी पीढ़ी के पास जमीन का ज्ञान था और आज भी है, पर जेनजी के पास जमीन और मोबाइल की स्क्रीन दोनों का ज्ञान है. और यहीं से सारा अंतर और विरोध शुरू होता है.
देहाती जेनजी कितना स्मार्ट है
शहर वाले जिसे स्मार्ट सम झते हैं उस से अलग तरह से स्मार्ट है. इन दोनों के बीच पैसे, अच्छी तालीम और बोलचाल के स्टाइल की गहरी खाई हो सकती है, पर दिमाग के लैवल पर गांवदेहात का जेनजी उतना भी कम नहीं है.
जुगाड़ू स्मार्ट नहीं, इन्फौर्म्ड स्मार्ट
पहले गांवदेहात में जानकारी प्रधान, पंडित या बड़े बुजुर्ग से आती थी. मतलब जो बड़ेबूढ़ों ने बोल दिया वही पत्थर की लकीर. चारपाई पर बड़े के सिरहाने नहीं बैठना, उन से बहस नहीं करनी, अगर गाली मिल रही है तो चुपचाप खालो. लड़की के लिए तो हजारों नियमकायदे.
पर अब माहौल पूरी तरह बदल चुका है. अब लड़का खेत में ट्रैक्टर चलाते हुए यूट्यूब पर इजराइल की खेती देख रहा है. उसे पता है एमएसपी क्या है, यूरिया का रेट क्या है, और बिहार का लड़का यूपीएससी का फार्म कैसे भरता है. वह अब मानता नहीं, वैरिफाई करता है.
2 भाषाओं में जीना सीख लिया
घर में शुद्ध देहाती बोली, दोस्तों में हरियाणवी, भोजपुरी या और कोई बोली, गाली वाला मीम कल्चर, और इंस्टाग्राम पर अंगरेजी कैप्शन. यह पीढ़ी कोड स्विचिंग शहर के जेनजी से बेहतर करती है.
पैसा कमाने का नया मतलब
पुरानी पीढ़ी के लिए स्मार्टनैस का एक ही मतलब रहा है कि किसी तरह सरकारी नौकरी लग जाना, फिर चपरासी ही क्यों न हो. पर इस जेनजी के लिए स्मार्टनैस का मतलब है घर बैठे पैसा बनाना. कोई रील से कमा रहा है, कोई एफिलिएट मार्केटिंग, कोई गेमिंग चैनल, कोई लोकल दुकान का पेज चला रहा है. खेती करना शर्म नहीं, पर सिर्फ खेती पर निर्भर रहना इसे बेवकूफी लगता है.
तो फिर जेनजी और पुरानी पीढ़ी के बीच असली विरोध और किसकिस बात पर हो सकता है?
इज्जत बनाम बराबरी पर
पुरानी पीढ़ी कहती है या मानती है कि ‘बड़ा कह रहा है तो सही ही कह रहा होगा, चुप रहो’. उस के लिए यह इज्जत की बात है. पर जेनजी वाली पीढ़ी कहती है कि ‘बात सही होगी तो मान लूंगा, चाहे छोटा कह रहा हो’. जिसे जेनजी बराबरी मानते हैं, बड़ेबुजुर्गों को उन की यही बराबरी बदतमीजी लगती है.
रिस्क लेने पर
पुरानी पीढ़ी का एक ही सूत्र है ‘सुरक्षित रहो’. सरकारी नौकरी करो, समय पर ब्याह कर लो, बापदादा की जमीन मत बेचो. इस सूत्र पर जेनजी सवाली बन जाते हैं कि सुरक्षित रह कर क्या मिलेगा? जमीन का एक टुकड़ा बेच कर दुकान खोल लेते हैं, बाहर बड़े शहर या विदेश जा कर ट्राई करते हैं. बुजुर्गों को यह सब करना जुआ लगता है, इन्हें ये मौका.
शादीब्याह और जातबिरादरी पर
यहां सब से बड़ा टकराव है. पुरानी पीढ़ी के लिए शादी 2 परिवारों का सम झौता है, पर जेनजी के लिए वह 2 लोगों का फैसला है. वह जात देख कर रिश्ता करने को प्रैक्टिकल नहीं, बल्कि अपनी पसंद को दबाना सम झता है, इसलिए भाग कर शादी या लेट शादी के केस गांवदेहात में भी बढ़े हैं. औनर किलिंग का डर होने के बावजूद.
लड़कियों का अलग ही स्वैग
कोई माने या न माने आज की गांव की जेनजी लड़की शायद इस देश की सब से स्मार्ट पीढ़ी है, क्योंकि उसे 2 दुनिया एकसाथ मैनेज करनी आती है. शहर की लड़की को सिर्फ आगे बढ़ना है, गांव की लड़की को आगे बढ़ते हुए पुरानी पीढ़ी वालों को भी मनाना है.
स्मार्टनैस दिखती नहीं, चलती है
गांव की जेनजी लड़की को स्मार्टनैस छिपा कर चलानी पड़ती है. शादी हो गई है तो घर में संस्कारी बहू वाली बात, खेत में मजदूर वाली मेहनत, स्कूल में टौपर वाली पढ़ाई और रात को फोन में बिजनैस वाली प्लानिंग… मतलब 4 रोल एक दिन में. यह मल्टीटास्किंग किसी एमबीए से ज्यादा बड़ी है.
सुनती सब की, करती मन की है
पुरानी पीढ़ी की औरतें सह लेती थीं. पर जेनजी लड़कियां सुन तो लेती हैं कि ‘लड़की ज्यादा पढ़ेगी तो हाथ से निकल जाएगी’, पर फिर चुपचाप स्कौलरशिप फार्म भी भर देती हैं, यूट्यूब से सिलाई, मेकअप, इंगलिश, कंप्यूटर सीख लेती है. बहस नहीं करती, सीधा रिजल्ट दिखाती हैं. वे गांव में टीशर्टजींस पहन कर बिंदास घूमती हैं.
उत्तर प्रदेश और बिहार के राज्य शिक्षा बोर्ड के 10वीं के नतीजों के मुताबिक, इन दोनों राज्यों में लड़कियों का पास फीसदी 80 से 93 के बीच रहता है, जिस में गांवदेहात इलाकों की सरकारी और संबद्ध स्कूलों की छात्राओं का योगदान बेहद अहम है.
उत्तर प्रदेश बोर्ड में लड़कियों का पास फीसदी तकरीबन 93.76 रहा है. उत्तर प्रदेश बोर्ड में एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी और सहायताप्राप्त स्कूलों के छात्रों का होता है, जहां लड़कियों ने लड़कों (87.30 फीसदी) की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है.
बिहार बोर्ड 10वीं की परीक्षा में लड़कियों का पास फीसदी तकरीबन 80.82 से 86.23 के बीच रहा है. ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों जैसे सिमुलतला आवासीय विद्यालय और अन्य जिला स्तरीय सरकारी उच्च विद्यालयों की छात्राओं ने टौप रैंक में स्थान हासिल किया है.
पैसों के मामले में भी तेज
गांवदेहात की जेनजी लड़कियां लड़कों से ज्यादा प्रैक्टिकल होती हैं, जैसे पैसा आएगा तो लड़का बाइक लेगा, पर ये पैसा बचा कर सोना, स्मार्टफोन या अपनी छोटी बहन की फीस पर लगाएंगी. इंस्टाग्राम पर रील नहीं, औनलाइन प्लेटफार्म पर साड़ीसूट दूसरा सामान बेचना, ब्यूटीपार्लर का पेज चलाना, ट्यूशन पढ़ाना, इनकम के किसे सोर्स जिन का घर में पता भी नहीं चलता.
भारत के गांव देहात के इलाकों की 14 से 18-20 साल की लड़कियों का अपना खुद का मोबाइल (स्मार्टफोन) रखने का आंकड़ा तकरीबन 19.8 फीसदी से 20 फीसदी है.
इतना ही नहीं, 15 से 20 साल की ज्यादातर लड़कियों के घर में स्मार्टफोन (मातापिता या भाई का) मौजूद होता है और वे इस का इस्तेमाल करना जानती हैं, लेकिन अपना निजी मोबाइल सिर्फ 5 में से एक (20 फीसदी) लड़की के पास ही होता है. लेकिन जिन लड़कियों के पास मोबाइल का एक्सैस है, वे मुख्य रूप से पढ़ाई संबंधी जानकारी, औनलाइन क्लासेस और सोशल मीडिया के लिए इस का इस्तेमाल करती हैं.
इमोशनल इंटैलिजैंस ज्यादा
जेनजी लड़की को पता है कि किस से कैसे बात निकालनी है. पापा से कैसे पढ़ाई की परमिशन लेनी है, मां को कैसे अपने पक्ष में करना है, भाई को कैसे मना कर अपना काम करवाना है. उन की यह डिप्लोमैसी शहर की लड़कियों से तेज है.
तो फिर टकराव कहां होता है? वहीं जहां उन की स्मार्टनैस घर की परंपरा से बड़ी हो जाती है. जैसे, वे शादी को जिंदगी का फाइनल गोल नहीं मानतीं, एक पड़ाव मानती हैं, पर यह बात मां और दादी को नहीं पचती.
चूंकि गांवदेहात की जेनजी लड़की ‘न’ बोलना सीख गई है, यह वालों को सब से ज्यादा खटकता है. ऐसी लड़कियों को अब परदा बो झ लगता है, सुरक्षा नहीं. उन्हें पता है कि क्या करना और क्या नहीं चाहिए. वे मार, रोकटोक, सिर्फ चूल्हे तक की जिंदगी नहीं चाहती हैं, बल्कि उन्हें चाहिए इज्जत, थोड़ी आजादी और अपना खुद का पैसा.
जेनजी और जेनबी का फर्क
जेनजी का मतलब तो सब जानते हैं, पर जेनबी का मतलब उस नौजवान पीढ़ी से है जो आंख मूंद कर भगवाई सोच का अनुकरण कर रही है. यहां कहने का मतलब है वे जेनजी, जो मंदिरमसजिद के फेर में पड़ कर अपने भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं.
इन पर सत्ता के कहे का इतना ज्यादा असर है कि ये कांवड़ यात्रा में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं. इन में ज्यादातर वे जेनजी हैं जो वंचित और गरीब परिवारों से हैं और सत्ता पक्ष वाले कभी नहीं चाहेंगे कि ये लोग पढ़लिख कर अपना हक मांगें. उन से तार्किक सवाल करें कि मंदिर जाने से उन का क्या ही भला हुआ है.
ये भले ही सोशल मीडिया पर भगवाई विचारों से प्रभावित दिखते हैं, पर साथ ही इन में अपनी पढ़ाईलिखाई को ले कर बेचैनी दिखती है.
इन्हें सरकारी स्कूल सही हालत में चाहिए, साफ पानी और शौचालय की सुविधाएं इन की पहली प्राथमिकता है. अगर ऐसा नहीं होता है तो ये अपने बदहाल स्कूलों के स्मार्टफोन से वीडियो अपलोड करने में भी नहीं हिचकते हैं.
कुलमिला कर गांवदेहात के जेनजी भले ही शहरी जेनजी से अपने हालात के चलते 5-10 साल पीछे नजर आते हों, पर टैक सेवी होने में किसी से कम नहीं हैं. जब वे कुछ ठान लेते हैं, तो फिर जमाने को भी हिला देते हैं. Awareness




