Editorial. सत्य निकेतन में एक 5 मंजिला इमारत के ढहने के बाद कम से कम 7 लोगों की मौत ने दिल्ली वालों को दहशत में डाल दिया है क्योंकि दिल्ली की आधी आबादी सत्य निकेतन जैसी कालोनियों में ही रहती है. दिल्ली ही नहीं, देश के सब बड़े शहरों में, अब कसबों और यहां तक कि गांवों में भी इसी तरह के मकान बनने लगे हैं जैसा सत्य निकेतन में ढहा था.
सत्य निकेतन का मकान दिन में 1.30 बजे ढहा. रात को ढहता तो 20-30 लोगों की जानें जातीं. इस की वजह असल में मकान मालिकों का लालच या मुनाफाखोरी नहीं है, सीधेसीधे इकोनौमिक्स है.
ये मकान बनते ही कच्चे हैं क्योंकि मालिक जब शुरू करता है तो सिर्फ एक या 2 मंजिल का सोच कर शुरू करता है. उस के पास पैसे ही इतने ही होते हैं. जितने का मकान में सामान लगता है उस का आधा टैक्सों में लगता है. यह छिपी सरकारी लूट है जिस की जिम्मेदारी आम आदमी पर डाल दी जाती है.
मकान में लगने वाले हर सामान पर टैक्स पर टैक्स लगा होता है जो छिपा रहता है. जिन फावड़ों से नींव खोदी जाती है, उन के लोहे पर टैक्स लगता है. जिस ट्रक से खान से लोेहे का खनिज लोहा बनाने वाली फैक्टरी में आता है उस पर टैक्स लगा होता है. रास्ते का टैक्स होता है. डीजल का टैक्स होता है. फावड़ा बनाने के लिए जो फैक्टरी बनती है वह टैक्सों पर टैक्स दे कर बनती है. यह सब टैक्स लागत में जुड़ता चला जाता है. आखिरी खरीदार जिस दुकान से खरीदता है वह टैक्स देता है. जिस वाहन से मजदूर फावड़ा ले कर मकान की नींव खोदने के लिए आता है उस पर भारी टैक्स लगा होता है.
यही नहीं जहां टैक्स जरूरी है वहीं रिश्वत भी देना जरूरी है. हर पग पर रिश्वत देनी होती है. हमारी बड़ी होशियार सरकार ने बीसियों तरीके बना रखे हैं रिश्वत के मौके देने के लिए. हर काम की अनुमति चाहिए. अगर अनुमति मिल जाए तो भी रिश्वत देनी होगी वरना 2-4 गुना रिश्वत बिना अनुमति वाले मकान के लिए देनी होगी. सत्य निकेतन के सभी मकान बिना अनुमति वाले हैं, मोटी रिश्वतें दे कर बने हैं.
मेहनत मकान मालिक की, मेहनत किराएदार की, मेहनत मजदूरों की सरकारी अमला टैक्स और रिश्वत बिना किसी मेहनत के मोटी रकम खाता है.
सत्य निकेतन जैसी कालोनी में 5 मंजिलों या 6 मंजिलों को अनुमति देने में दिक्कत क्या है? जी, पौलिसी नहीं है. कौन बनाता है? नहीं है तो नहीं है. हम बनाते हैं, तुम पूछने वाले कौन होते हो? तुम्हें बनाना है तो बिना अनुमति के बना लो ताकि हम हर थोड़े दिन बाद बुलडोजर या ड्रिलिंग मशीनें ले कर आ जाएं और लाखों रुपए लगा कर बने मकानों को ढहा दें. मकान गिरेगा तो तुम पकड़े जाओगे हमारा कुछ नहीं होगा.
मकान मालिक एक के बाद दूसरी मंजिल बनाता है, फिर पैसा मिलने पर तीसरी, फिर चौथी, फिर 5वीं, फिर छठी भी. किराएदार बिना लिफ्ट वाले संकरे जीने से चढ़ने को तैयार है. किराएदार ही नहीं, उस की बूढ़ी मां भी, उस के यहां सामान पहुंचाने वाला भी.
सब के सब असल में सरकारी मशीनरियों के शिकार हैं पर एककठघरे में खड़े हैं और सुप्रीम कोर्ट भगवान बन कर आदेश दे देती है कि ढहा दो. और आप को मालूम भी है कि कितने हाड़मांस गला कर मकान बनाया था? आप की भाषा में इललीगल हो पर हमारी मेहनत तो लीगल थी तभी हमारे पास पैसे आए कि हम ने मकान बना लिया.
अगर सत्य निकेतन जैसे मकान न होते तो शहर की आधी आबादी पटरियों पर सो रही होती, ठंड में भी, बरसात में भी, गरमी में भी. कच्चे पर छत वाले मकान पटरियों से कहीं बेहतर हैं, उन की जेब में इतने ही पैसे हैं.
किराएदार या मकान मालिक जानता है कि मकान गिरने का जोखिम है पर वह रहता चला जाता है क्योंकि उस के पास कर्तव्य भवन बनाने लायक पैसे तो नहीं हैं जो सरकार ने टैक्स के पैसे से वसूल कर दिल्ली के राजपथ के दोनों ओर अच्छेभले पक्के मकानों को तोड़ कर बनाए हैं.
सत्य निकेतन देश की गरीबी का आईना है पर अमीर अफसर इस आइने को नहीं देखना चाहते. वे तो दोष देना जानते हैं, अपनी गलती नहीं मानते.
वे अपनेआप न सड़क बना सकते हैं, न पुल, न स्कूल, न सीवर, फिर भी वे महान हैं.




