Beautiful Love Story in Hindi. 12  साल की उम्र में ही प्रदीप ने अपने पिता के सब्जी के ठेले पर बैठना शुरू कर दिया था. छठी क्लास में वह लगातार 2 बार फेल हुआ तो मातापिता ने एक दिन फैसला ही सुना दिया था कि पढ़नालिखना इस के बस का नहीं है. जितनी जल्दी इसे काम में लगा दें, उतना अच्छा.

पिता बरसों से एक ठेले पर सब्जी बेच कर परिवार पाल रहे थे. सुबह अंधेरे में मंडी जाना, सब्जियां खरीदना, उन्हें ठेले पर सजाना और फिर दिनभर ग्राहकों की आवाजाही के बीच खड़े रहना, यही उन की जिंदगी थी. मां भी जरूरत पड़ने पर हाथ बंटातीं, लेकिन प्रदीप के रोज ठेले पर बैठने से उन्हें कुछ राहत मिल गई.

प्रदीप ने काम सीखने में ज्यादा समय नहीं लगाया. कहां से माल लेना है, कौन सी सब्जी किस मौसम में अच्छी बिकती है, कितना माल उठाना है, किस ग्राहक को कितनी रियायत देनी है, किस सब्जी में कितना मुनाफा रखना है, वह सब सम झ गया.

सब से बड़ी बात थी प्रदीप की बात करने की कला की. वह ग्राहक को केवल सब्जी नहीं बेचता था, उस के साथ दो बातें भी बेचता था, ‘‘भाभी, आज टमाटर ले जाइए. इतने लाल हैं कि आप की सब्जी की कड़ाही भी शर्म से लाल हो जाएगी.’’

‘‘चाचा, लौकी ले जाइए. डाक्टर की फीस बचाइए.’’

ग्राहक हंसते और प्रदीप की दुकान पर रुक जाते.

धीरेधीरे पिता को महसूस होने लगा कि लड़का भले किताबों में कमजोर हो, मगर जिंदगी की किताब बड़ी तेजी से पढ़ रहा है. ग्राहक बढ़े तो आमदनी भी बढ़ने लगी.

एक साल बाद प्रदीप ने पिता से कहा, ‘‘बाबूजी, एक और ठेला लगा लेते हैं.’’

पिता ने प्रदीप को घूर कर देखा, ‘‘पैसा कहां से आएगा?’’

‘‘पहले ठेला पुराना ही ले लो. जगह मैं ढूंढ़ता हूं.’’

प्रदीप ने कुछ दूरी पर एक जगह खोज ली. सड़क के किनारे वह जगह बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन आसपास कुछ छोटी दुकानें थीं और आनेजाने वालों की तादाद अच्छी थी.

वहां पहले से एक जवान लड़की सब्जी बेचती थी. वह अपने खेत से सब्जियां लाती, सड़क किनारे बैठती और 3-4 घंटे में पूरा माल बेच कर चली जाती.

अमूमन उस लड़की की सब्जियां चमकदार नहीं होती थीं, मगर ताजा होती थीं. टमाटर थोड़े टेढ़ेमेढ़े, बैगन पर कहींकहीं दाग, लौकी पर मिट्टी की हलकी परत, लेकिन उन में खेत की ताजगी होती थी.

प्रदीप ने उसी लड़की के आसपास ठेला लगाने की कोशिश की. पहले वह उस के चले जाने के बाद ठेला लगाता, क्योंकि उसे लगता था कि कहीं वह नाराज न हो जाए.

एक दिन प्रदीप ने उस लड़की से पूछा, ‘‘आप को बुरा तो नहीं लगता कि मैं आप के पास ठेला लगाता हूं?’’

वह लकड़ी हंस दी, ‘‘बुरा क्यों लगेगा… सड़क किसी के बाप की है क्या…’’

प्रदीप भी हंस पड़ा, ‘‘नहीं, पर आप की दुकान चलती है, मेरी भी चलनी चाहिए.’’

‘‘तो चलाओ. ग्राहक मेरे गुलाम थोड़े हैं.’’

धीरेधीरे उन दोनों के बीच संकोच खत्म हो गया. प्रदीप ने अपनी बातों से ग्राहकों को रोकना शुरू किया. वह उस सब्जी वाली से भी हंसीमजाक करने लगा.

वह लड़की प्रदीप से तकरीबन 10 साल बड़ी थी. कोई उसे नाम से नहीं पुकारता था. सब के लिए वह बस ‘सब्जी वाली’ थी.

वह लड़की गायों के लिए रोज कुछ सब्जियां अलग निकाल देती. कभी किसी गरीब को सब्जी कम दाम में दे देती.

प्रदीप को यह बात समझ नहीं आती थी.

एक दिन उस ने पूछा, ‘‘तुम कमाती कम हो और बांटती ज्यादा हो. ऐसा क्यों?’’

वह लड़की मुसकराई और बोली, ‘‘कभी मेरे घर आओगे तो तसल्ली से बताऊंगी.’’

‘‘घर दिखाने के लिए बुला रही हो या राज बताने के लिए?’’

‘‘दोनों सम झ लो,’’ कह कर वह खिलखिला दी.

प्रदीप को उस लड़की की हंसी अच्छी लगती थी. धीरेधीरे उस जगह पर दोनों की अपनी दुनिया बन गई. आसपास के दुकानदार प्रदीप के दोस्त बन गए थे. ग्राहक उसे पहचानने लगे थे.

एक साल में प्रदीप का बिक्री कारोबार दोगुना हो गया. लेकिन वह लड़की अभी भी उसी मात्रा में सब्जियां बेचती थी. उस के चेहरे पर न असंतोष था, न ज्यादा कमाने की बेचैनी.

एक दिन प्रदीप ने कहा, ‘‘तुम ज्यादा सब्जियां क्यों नहीं लातीं? तुम्हारा माल तो बहुत जल्दी बिक जाता है…’’

‘‘मु झे जितने की जरूरत है, उतना ही बेचती हूं.’’

‘‘जरूरत बढ़ जाए तो?’’ ‘‘तो जरूरत घटा दूंगी.’’

प्रदीप ने पहली बार महसूस किया कि वह लड़की जितनी साधारण दिखाई देती है, उतनी साधारण है नहीं.

फिर एक दिन सबकुछ बदल गया.

वह लड़की सड़क किनारे बैठी सब्जियां बेच रही थी कि अचानक 2 सांड़ लड़ते हुए उस की ओर आ गए. लोगों को संभलने का मौका ही नहीं मिला. एक सांड़ ने उसे टक्कर मार दी और वह सड़क पर जा गिरी.

प्रदीप अपना ठेला छोड़ कर दौड़ा, ‘‘अरे, कोई पानी लाओ.’’

उस लड़की का हाथ बुरी तरह मुड़ गया था. प्रदीप ने बिना कुछ सोचे आटोरिकशा रोका और उसे अस्पताल ले गया.

जांच के बाद पता चला कि हाथ में फ्रैक्चर है. प्लास्टर चढ़ाया गया. दवाएं दी गईं और कुछ घंटों बाद उस लड़की को घर जाने की इजाजत मिल गई.

प्रदीप ने उस से कहा, ‘‘मैं तुम्हें घर छोड़ूंगा.’’

‘‘रास्ता मु झे पता है.’’ प्रदीप बोला, ‘‘हाथ तुम्हारा टूटा है, रास्ता नहीं.’’

वह मुसकराई और बोली, ‘‘बहुत बोलने लगे हो.’’ ‘‘तुम्हारे कारण.’’

आटोरिकशा एक कच्चे रास्ते पर मुड़ा. कुछ दूर जा कर एक छोटी सी  झोंपड़ी दिखाई दी.

प्रदीप कुछ क्षण चुप रह गया. घर के आगे छोटी सी क्यारी थी. उस में टमाटर, मिर्च, लौकी, टिंडे, तुरई और बैगन लगे थे.

अंदर बहुत कम सामान था. एक चारपाई, एक छोटी सी मेज, कुछ बरतन, एक चूल्हा और दीवार पर टंगी  2-3 पुरानी तसवीरें.

वह लड़की चारपाई पर लेट गई.

प्रदीप ने कुरसी पास खिसका ली, ‘‘तुम यहां अकेली रहती हो?’’ ‘‘हां,’’ जवाब आया.

‘‘कब से?’’ ‘‘2 साल से ज्यादा हो गए.’’

‘‘लेकिन तुम्हारे घर वाले?’’

उस लड़की ने कुछ क्षण चुप रह कर कहा, ‘‘4 साल पहले एक लड़के के साथ भाग कर शादी कर ली थी. मेरे घर वालों ने मु झ से संबंध तोड़ लिए. उस के घर वालों ने भी हमें यह जमीन दे कर अलग कर दिया.’’

‘‘अब वह लड़का कहां है?’’

उस लड़की की आंखों में क्षणभर के लिए कोई पुराना दृश्य चमका, ‘‘2 साल पहले खेत में काम करते समय सांप ने काट लिया. अस्पताल पहुंचने से पहले ही चल बसा.’’

कमरे में अचानक एक गहरी चुप्पी उतर आई. प्रदीप के पास कहने को कुछ नहीं था.

वह लड़की उठी और बोली, ‘‘कुछ खाओगे?’’ ‘‘अभी तुम्हारा हाथ टूटा है और तुम्हें खाने की पड़ी है?’’

‘‘खाना नहीं बनाऊंगी. सिर्फ चाय बनाऊंगी.’’ ‘‘मैं बना देता हूं.’’

‘‘तुम्हें गुड़हल की चाय बनानी आती है?’’ ‘‘नहीं,’’ प्रदीप बोला.

‘‘तो बाहर से गुड़हल के 4 फूल तोड़ लाओ.’’

प्रदीप बाहर गया. लाल गुड़हल के 4 फूल तोड़ कर लाया.

उस लड़की ने फूल धोए, गरम पानी में डाला. कुछ देर बाद चाय छान कर उस में नीबू और थोड़ा शहद मिलाया. गिलास उस की ओर बढ़ाते हुए बोली, ‘‘लो, जिदगी में पहली बार कुछ ऐसा पीना जो तुम्हारे पिता ने नहीं सिखाया.’’

प्रदीप हंस पड़ा. पहला घूंट लेते ही उस की आंखें फैल गईं, ‘‘अरे, यह तो बहुत अच्छी है.’’

‘‘जिंदगी भी ऐसी ही है. पहली बार अजीब लगती है, फिर स्वाद आने लगता है.’’

प्रदीप उसे देखता रहा, ‘‘तुम हमेशा इतनी खुश कैसे रहती हो?’’

वह लड़की चुप रही, फिर बोली, ‘‘खुश रहने के लिए बहुतकुछ चाहिए नहीं होता, बस शिकायतों की सूची छोटी रखनी पड़ती है.’’

‘‘तुम्हें अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं?’’ ‘‘किस से करूं?’’

‘‘अपने परिवार से.’’ ‘‘मैं ने अपनी पसंद से शादी की थी. उस के नतीजे के लिए दूसरों को दोष क्यों दूं?’’

‘‘पति को?’’  उस की आवाज धीमी हो गई, ‘‘वह तो चला गया. मौत से किस बात की शिकायत?’’

‘‘अकेलापन?’’ ‘‘अकेलापन है, लेकिन मैं अकेली नहीं हूं. गायें हैं, खेत है, पौधे हैं, ग्राहक हैं, तुम हो’’ वह अचानक रुक गई.

प्रदीप ने पहली बार उस की आंखों में अपने लिए अलग चमक देखी.

अगली सुबह प्रदीप जल्दी उस के घर पहुंच गया, ‘‘चलो, आज सब्जियां मैं तोड़ता हूं.’’

‘‘और तुम्हारा ठेला?’’ ‘‘देर से लगाऊंगा.’’

‘‘तुम्हें काम का नुकसान होगा.’’ ‘‘तुम्हारा हाथ ठीक होना ज्यादा जरूरी है.’’

प्रदीप 15 दिन तक सुबह उस के घर जाता रहा. सब्जियां तोड़ता, साफ करता, टोकरियां उठाता और उसे दुकान पर बैठा कर अपना ठेला संभालने चला जाता.

वह लड़की भी दोपहर बाद उस की दुकान पर आ कर मदद करने लगी.

दोनों के बीच का रिश्ता बदल रहा था. अब वे केवल सब्जी बेचने वाले 2 लोग नहीं थे, वे एकदूसरे के दिन का हिस्सा बन गए थे. कभी साथ चाय, कभी साथ खाना, कभी लंबी बातचीत.

प्रदीप अपने घर की बातें करता. वह अपने बीते जीवन की.

वह उसे जीवन सम झाती. प्रदीप उसे भविष्य के सपने सुनाता और देखतेदेखते 3 महीने बीत गए.

प्रदीप को महसूस हुआ कि वह उस से प्रेम करने लगा है. एक शाम दुकान समेटते हुए उस ने कहा, ‘‘मु झ से शादी करोगी?’’

वह कुछ क्षण उसे देखती रही और फिर खिलखिला कर हंस पड़ी, ‘‘तुम्हें पता है तुम कितने साल के हो?’’

‘‘16,’’ ‘‘और मैं?’’ ‘‘26.’’ ‘‘तो पहले अपनी उम्र तो सम झो.’’

‘‘उम्र से क्या होता है?’’ ‘‘बहुतकुछ,’’ वह गंभीर हो गई.

‘‘मैं ने एक बार शादी की है. मैं ने प्रेम किया, घर छोड़ा और फिर अपने पति को खो दिया. अब मैं किसी बंधन में नहीं बंधना चाहती.’’

‘‘लेकिन मैं तुम्हें चाहता हूं.’’ ‘‘और मैं तुम्हें चाहती हूं.’’

प्रदीप का चेहरा खिल उठा, ‘‘तो फिर शादी क्यों नहीं?’’

‘‘क्योंकि प्रेम और शादी एक ही चीज नहीं हैं.’’

वह कुछ क्षण उसे देखता रहा.

‘‘पति बनने के बाद तुम मु झ पर अपना हक सम झने लगोगे. मेरे आनेजाने, मिलनेजुलने, कमाने, खर्च करने पर सवाल करोगे. अभी तुम मु झे वैसे स्वीकार करते हो जैसी मैं हूं.’’

‘‘मैं ऐसा नहीं करूंगा.’’ ‘‘आज नहीं, पर कल?’’

प्रदीप चुप हो गया.

वह आगे बोली, ‘‘मु झे अपना जीवन अपने तरीके से जीना है. तुम मु झे चाहो, मैं तुम्हें चाहूं. इस में किसी कागज की जरूरत मु झे नहीं लगती.’’

‘‘तो क्या तुम परिवार नहीं चाहती?’’ प्रदीप ने पूछा.

‘‘परिवार चाहती हूं, बंधन नहीं.’’ ‘‘बच्चे?’’

वह कुछ देर सोचती रही, ‘‘अभी नहीं पता.’’

‘‘कभी चाहा तो?’’ वह मुसकराई, ‘‘तब सोचूंगी.’’

प्रदीप ने धीरे से पूछा, ‘‘क्या तुम मु झ से इतना प्रेम करती हो कि मु झे अपने भविष्य में देख सको?’’

‘‘तुम मेरे लिए बहुत प्रिय हो.’’ ‘‘लेकिन?’’

‘‘लेकिन मैं तुम्हें अपना मालिक नहीं बनाना चाहती.’’

ये शब्द प्रदीप के भीतर उतर गए.

वह पहली बार सम झ रहा था कि प्रेम का मतलब किसी को पा लेना ही नहीं होता. किसी को उस की आजादी के साथ स्वीकार करना भी प्रेम हो सकता है.

उस रात प्रदीप देर तक जागता रहा.

अगले दिन उस ने अपने पिता से कहा, ‘‘बाबूजी, मैं अपनी दुकान को और बड़ा करना चाहता हूं.’’

पिता ने पूछा, ‘‘और शादी?’’ प्रदीप मुसकराया, ‘‘वह बाद में.’’

‘‘किसी लड़की के चक्कर में तो नहीं पड़ गया?’’

प्रदीप चुप रहा.

पिता ने उसे गौर से देखा, ‘‘जो भी है, सोचसम झ कर करना.’’

प्रदीप ने पहली बार महसूस किया कि शायद वह अपने पिता से ज्यादा पढ़ालिखा नहीं है, लेकिन जीवन उसे लगातार पढ़ा रहा है.

उधर सब्जी वाली ने भी अपनी छोटी सी क्यारी का विस्तार करना शुरू कर दिया था.

अब प्रदीप उस के खेत में बीज डालने में मदद करता. वह उसे पौधों की भाषा सम झाती, ‘‘जिस पौधे को रोज पानी चाहिए, उसे रोज पानी देना जरूरी नहीं. जरूरत से ज्यादा पानी भी जड़ सड़ा देता है.’’

प्रदीप हंसता, ‘‘तुम पौधों की बात कर रही हो या इनसानों की?’’

वह मुसकरा देती, ‘‘जिसे सम झना हो, सम झ ले.’’

स मय बीतता गया. प्रदीप का ठेला अब एक छोटी दुकान में बदलने लगा.

उस ने पढ़ाई भले ही छोड़ दी थी, लेकिन उस ने हिसाबकिताब सीख लिया. मंडी के भाव सम झने लगा. ग्राहकों की पसंद पहचानने लगा. धीरेधीरे उस ने 2 और लड़कों को काम पर रख लिया, लेकिन उस की सब से बड़ी कमाई पैसे नहीं थी.

उस ने उस लड़की से सीखा था कि जरूरत और लालच में फर्क होता है.

उस ने सीखा था कि कम कमा कर भी इनसान अमीर हो सकता है.

उस ने यह भी सीखा था कि प्रेम किसी पर हक जमाने का नाम नहीं.

2 कम पढ़ेलिखे लोग थे. एक छठी क्लास में 2 बार नाकाम हुआ था.

दूसरी जिंदगी की पहली परीक्षा में ही बहुतकुछ खो चुकी थी, लेकिन दोनों ने मिल कर जिंदगी का एक नया पाठ पढ़ना शुरू कर दिया था.

समाज के पास उन के रिश्ते के लिए शायद कोई तय नाम नहीं था.

कभी लोग उन्हें दोस्त कहते, कभी प्रेमीप्रेमिका, कभी अजीब जोड़ी.

दोनों मुसकरा कर सब सुन लेते.

एक शाम दुकान बंद करते हुए प्रदीप ने पूछा, ‘‘तुम्हें लगता है हम गलत कर रहे हैं?’’

वह कुछ देर चुप रही, फिर बोली, ‘‘गलत और सही का फैसला हमेशा समाज नहीं करता. कभीकभी इनसान को अपनी जिम्मेदारी खुद तय करनी पड़ती है. बस एक बात याद रखना. हमारी आजादी किसी दूसरे के हक को चोट न पहुंचाए.’’

प्रदीप ने सिर हिलाया और पूछा, ‘‘और तुम्हें?’’

‘‘मु झे?’’ ‘‘तुम्हें किस बात का डर लगता है?’’ प्रदीप बोला.

वह आसमान की ओर देखने लगी, ‘‘फिर किसी को खो देने का.’’

प्रदीप ने पहली बार उस का हाथ थामने के बजाय उस के पास बैठना चुना, क्योंकि अब वह सम झ चुका था कि किसी का हाथ पकड़ लेना आसान है, उस का हाथ इस तरह थामना कि उसे अपनी आजादी भी महसूस होती रहे, यह मुश्किल है.

सड़क पर अंधेरा उतर रहा था. दूर किसी दुकान से सब्जी बेचने की आवाज आ रही थी.

गुड़हल के फूलों पर शाम की लालिमा उतर चुकी थी.

प्रदीप ने अपना ठेला समेटा. वह अपनी टोकरी उठा कर चल पड़ी. दोनों साथसाथ सड़क पर आगे बढ़ रहे थे. उन के पास न बड़ी डिगरियां थीं, न बड़ी संपत्ति, न समाज को दिखाने लायक कोई चमकदार जीवन, लेकिन उन के पास एक चीज थी… अपने हिस्से का आसमान चुनने का साहस.

और शायद जीवन की सब से बड़ी शिक्षा यही है कि पढ़ाई केवल किताबों से नहीं होती.

कुछ लोग विद्यालय में बहुतकुछ पढ़ते हैं, फिर भी जीवन को सम झ नहीं पाते और कुछ लोग छठी क्लास से आगे नहीं पढ़ पाते, मगर जिंदगी की ऐसी किताब खोल लेते हैं जिस के पन्ने समाज की किसी पाठ्यपुस्तक में नहीं मिलते.

प्रदीप और वह सब्जी वाली उसी किताब के 2 छात्र थे. उन का पाठ अभी पूरा नहीं हुआ था, बस पहला चैप्टर खत्म हुआ था. अपने फैसले खुद लेने का. इतना तय था कि आगे का जीवन सम झदारी भरा होने वाला था.    Beautiful Love Story in Hindi

-संदीप पांडे ‘शिष्य’

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...