Short Story in Hindi. समुद्र का पानी ठहराठहरा सा लग रहा था. समुद्र में कभीकभी नहाने वाले सैलानियों और समुद्र के किनारे टहलने वालों को समुद्र शांत जान पड़ता था.
अनुभवी मछुआरे ही जानते थे कि इतनी खामोशी किसी तूफान के आने की निशानी थी. मछुआरों की नावें समुद्र तट पर लौटने लगी थीं.
डाक्टर समीर एक सरकारी अस्पताल में डाक्टर थे. यह अस्पताल समुद्र के पास ही के एक कसबे में था. दक्षिण भारत के समुद्री इलाके में बने इस कसबे में वे 6 साल पहले आए थे.
डाक्टर समीर को शुरू से ही तैराकी का शौक था. मगर उन का यह शौक तालाबों, स्विमिंग पूलों और छोटीछोटी नहरों तक ही सिमटा था.
वे नहाने के लिए समुद्र में उतरे ही थे कि उन्हें एक औरत की आवाज सुनाई पड़ी. वह बोल रही थी, ‘‘साहब, समुद्र में तूफान आने वाला है. आप बाहर आ जाइए.’’
उन्होंने मुड़ कर देखा. एक सांवले रंग की लड़की थी. उस ने मछुआरों की औरतों की तरह घुटनों तक साड़ी पहने हुई थी. उस के हाथ में मछली पकड़ने का जाल था.
‘‘आसमान साफ है. पानी में कोई हलचल नहीं है. तूफान कहां से आ सकता है?’’ डाक्टर समीर ने मुसकराते हुए पूछा.
‘‘साहब, आप शहरी हैं. आप को पानी और समुद्र का क्या तजरबा,’’ वह बोली.
मछुआरिन की चेतावनी को नजरअंदाज कर डाक्टर समीर समुद्र में उतर पड़े.
मछुआरिन बेबसी से थोड़ी देर तक उन्हें पानी में तैरते, अठखेलियां करते देखती रही, फिर चुपचाप पानी से बाहर निकल कर समुद्र तट पर उलटी पड़ी एक नाव पर जा कर बैठ गई.
डाक्टर समीर समुद्र में तैरतेतैरते आगे बढ़ चले. आधा घंटा बीतने के बाद साफसुथरे दिखाई पड़ते आसमान पर काली घटाएं छा गईं. थोड़ी ही देर में मूसलाधार पानी बरसने लगा.
शांत दिखती लहरें भयंकर हो कर उछलने लगीं. यह देख डाक्टर समीर घबरा गए. उन्हें मछुआरिन की चेतावनी याद आने लगी.
डाक्टर समीर ने खुद को लहरों के हवाले कर दिया. उन्हें मौत सामने नजर आने लगी, तभी उन की पीठ पर किसी का हाथ पड़ा. उन्होंने मुड़ कर देखा, वही मछुआरिन लड़की नजर आई.
वह बोली, ‘‘साहब, मेरा हाथ पकड़ लीजिए. धीमेधीमे तैरिए. लहरों के खिलाफ नहीं, उन के बहाव में तैरिए. आप समुद्र के किनारे पहुंच जाएंगे.’’
उसी मछुआरिन लड़की की आवाज सुन कर डाक्टर समीर की खोई हुई हिम्मत लौट आई. उन्होंने मछुआरिन का हाथ थाम लिया. लहरों के बहाव में तैरते हुए वे दोनों समुद्र तट पर आ पहुंचे.
‘‘तुम न आती, तो शायद मैं समुद्र में डूब कर मर जाता,’’ उन्होंने कांपती आवाज में कहा.
‘‘कोई बात नहीं साहब, यह तो मेरा फर्ज था,’’ उस लड़की ने कहा. फिर उस की नजर समीर के बदन पर पड़ी, तो वह शरमा गई.
‘‘साहब, क्या आप इस हालत में घर चले जाएंगे? आप मेरे घर चलिए. मैं आप को कपड़े दे दूंगी.’’
डाक्टर समीर उस मछुआरिन लड़की के पीछेपीछे चल दिए.
समुद्र से काफी हट कर मछुआरों की बस्ती थी. किसी जमाने में छोटे तबके वालों के घर कच्चे और कामचलाऊ होते थे. मगर माली तरक्की होने से अब मछुआरों और दूसरे छोटे काम करने वालों की बस्तियां भी पक्के मकानों की बन चुकी थीं.
एक अनजान नौजवान को अपनी बेटी मायप्पा के साथ देख उस के मातापिता चौंक पड़े. पिता ने बेटी से पूछा, ‘‘ये कौन हैं?’’
‘‘ये समुद्र के पानी में फंस गए थे. मेरे रोकने पर भी ये पानी में तैरने उतर पड़े थे. इन्हें मैं बचा कर लाई हूं. कपड़े तूफान में तट से उड़ गए. इस हालत में अपने घर कैसे जाते?’’
‘‘ओह…’’ लड़की की मां ने अलमारी से एक लुंगीकुरता निकाल कर डाक्टर समीर को थमा दिया.
थोड़ी देर बाद कौफी पीते हुए सभी बातें करने लगे.
तूफान थम गया था. लड़की का पिता अपनी मोटरसाइकिल पर डाक्टर समीर को उन के घर छोड़ आया. इस के बाद डाक्टर साहब का मायप्पा के परिवार में आनाजाना शुरू हो गया.
मायप्पा भी समुद्र तट पर उन से मिलनेजुलने लगी. यह मिलनाजुलना धीरेधीरे प्यार में बदल गया.
इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. अस्पताल और मछुआरा बस्ती में डाक्टर साहब और मायप्पा के प्यार की चर्चा होने लगी.
हर पिता की तरह मायप्पा के पिता ने सम झाया, ‘‘डाक्टर साहब ऊंची जाति के हैं. हमारा और उन का कोई मुकाबला नहीं.’’
प्यार में डूबी मायप्पा को पिता की नेक सलाह अच्छी नहीं लगी. डाक्टर साहब को मायप्पा के तीखे नैननक्श, सांवला रंग और कसा हुआ बदन भा गया था. मगर उस के बदन से आती मछली की बदबू उन्हें सहन नहीं होती थी. मायप्पा भी डाक्टर साहब को चाहने लगी थी.
डाक्टर समीर के इश्क के चर्चे उन के परिवार में भी जा पहुंचे. उन के मातापिता खुले विचारों के थे. बेटे को अगर मछुआरिन पसंद थी, तो वही सही. उन की मां ने अपनी होने वाली बहू को देखने का इरादा जताया.
लड़की का रंग सांवला था. नैननक्श तीखे थे. बदन कसा हुआ था. बोली भी मीठी थी, मगर उस के बदन से मछली की बदबू आ रही थी.
डाक्टर समीर का परिवार शाकाहारी था. उन की मां को उबकाई आने लगी. किसी तरह कुछ बातें कर के वे मायप्पा के घर से चली आईं.
‘‘समीर, लड़की वैसे तो ठीक है, मगर इस के बदन से उठने वाली मछली की बदबू मैं सहन नहीं कर सकती,’’ मां ने कहा.
‘‘मैं इस बात को सम झता हूं मां. यह मछलियां पकड़ना छोड़ देगी, तो यह बदबू भी जाती रहेगी.’’
‘‘मायप्पा, मेरी मां तुम्हें अपनी बहू बनाने को तैयार हैं,’’ अगले दिन डाक्टर समीर ने मायप्पा को यह बताया, तो वह खिल उठी.
‘‘मगर…’’ डाक्टर समीर कुछ कहतेकहते रुक गए.
‘‘मगर क्या?’’ मायप्पा ने पूछा.
‘‘मेरी मां का कहना है कि तुम्हारे बदन से मछली की बदबू आती है. अगर तुम मछलियां पकड़ना छोड़ दो, तो यह बदबू भी जाती रहेगी.’’
यह सुन कर मायप्पा डाक्टर समीर को गौर से देखने लगी.
‘‘डाक्टर साहब, मैं मछलियों के बीच पैदा हुई हूं और पलीबढ़ी हूं. मैं मछलियां ही खाती हूं. मछलियां पकड़ना मेरा पेशा है, शौक है. मछली की गंध मु झे पसंद है. अगर आप को बदबू आती है, तो आती रहे,’’ मायप्पा की आवाज थोड़ी तीखी थी.
‘‘तुम एक मामूली मछुआरे की लड़की हो. तुम्हें ऊंचे कुल की बहू बनने का मौका मिल रहा है. तुम एक डाक्टर की पत्नी बनने जा रही हो. मछली पकड़ने का घटिया पेशा छोड़ने में ही तुम्हारा भला है,’’ डाक्टर समीर ने उसे सम झाते हुए कहा.
‘‘डाक्टर साहब, मेरा पेशा घटिया है या बढि़या, पर यह मु झे पसंद है. आप मु झे मेरी बदबू के साथ अपना सकते हैं तो अपनाइए, नहीं तो मैं अपने घर ही ठीक हूं,’’ मायप्पा ने डाक्टर समीर के दिए जेवर उतार कर उन के सामने रख दिए और चुपचाप वहां से चली गई. Short Story in Hindi




