Hindi Fiction Story. शाम के 4 बज रहे थे. एहसान साहब को अचानक पान खाने की तलब हुई और वे घर से निकल कर पान की एक दुकान पर पहुंच गए.
पान खा कर वे घर लौट ही रहे थे कि एक खूबसूरत लड़की को उन्होंने नीची नजरें किए अपने पास से गुजरते हुए देखा. तभी एक जानपहचान वाले ने उन के पास आ कर कहा, ‘‘आप जिसे देख रहे हैं, वह तो इम्तियाज साहब की बेटी नाजिया है, जो फिलहाल 7वीं जमात में पढ़ती है.’’
‘‘यह सब तो ठीक है, लेकिन उस के अब्बा क्या करते हैं और उन का रहनसहन कैसा है?’’ एहसान साहब की यह बात सुन कर उस शख्स ने कहा, ‘‘इम्तियाज साहब खानदानी आदमी हैं. परिवार भी पढ़ालिखा है, पर गुजरबसर मामूली है.’’
‘‘खैर, मु झे उन की जमीनजायदाद से क्या लेनादेना. मु झे तो बस उन की लड़की नाजिया से मतलब है.’’
एहसान साहब सुबह इम्तियाज साहब के घर पहुंच गए. वे अपने साथ गांव के 2-4 लोगों को भी ले गए थे.
एहसान साहब को देख कर इम्तियाज साहब ने उन की खातिरदारी की और उन के आने का मकसद पूछा.
‘‘मैं अपने बेटे का निकाह आप की बेटी नाजिया से कराना चाहता हूं.’’
‘‘निकाह की बात तो ठीक है, लेकिन मेरी माली हालत ऐसी नहीं है कि…’’ इम्तियाज साहब बोले.
एहसान साहब ने उन्हें सम झाते हुए कहा, ‘‘मु झे दहेज या रुपएपैसे नहीं चाहिए.’’
इस बात का इम्तियाज साहब पर असर हुआ और वे नाजिया के निकाह के लिए राजी हो गए.
एहसान साहब यह सुन कर काफी खुश हुए और घर लौट गए.
इम्तियाज साहब ने अपने परिवार के सामने इस बारे में बात की, तो सभी काफी खुश हुए, पर नाजिया को इस बात से कोई खुशी नहीं हुई. उसे अपना भविष्य अंधेरे में नजर आने लगा. उसे एक पढ़ेलिखे साथी का इंतजार था, जबकि अफरोज अनपढ़ था और कपड़े सिलने का काम करता था.
पर नाजिया कर भी क्या सकती थी. आखिरकार वह दिन भी आ गया, जब उस के घर बरात आनी थी.
शाम को बैंडबाजे के साथ बरात नाजिया के दरवाजे पर आ लगी थी. सभी काफी खुश थे, सिवा नाजिया के.
उधर अफरोज का इंतजार आज खत्म हो गया था. निकाह के बाद वह अपने कमरे में नाजिया के साथ था, लेकिन नाजिया उस से दूर पलंग के दूसरे कोने पर बैठी सोच रही थी कि वह शौहर से अपने दिल की बात कैसे करे?
उस ने हिम्मत बटोर कर कह ही डाला, ‘‘मु झे आप से कुछ कहना है.’’
कुछ देर सोच कर अफरोज बोला, ‘‘जो कहना है बेखौफ हो कर कहो.’’
नाजिया ने कहा, ‘‘मैं अभी पढ़ना चाहती हूं और पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं.’’
अफरोज ने कहा, ‘‘तुम अगर पढ़ना चाहती हो, तो मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं, बल्कि तुम्हारा साथ दूंगा. आखिर इस से मेरा भी तो नाम होगा.’’
अफरोज ने कहने को तो कह दिया, लेकिन उसे अपने सपनों का महल टूटता हुआ दिखाई दे रहा था.
निकाह हुए पूरा एक महीना बीत गया था, लेकिन दोनों के बीच नाजिया की शर्त एक दीवार सी बनी हुई थी और फिर एक दिन नाजिया अपने घर चली गई.
अब अफरोज का दुख और बढ़ गया था. पर वह अपने दिल का दर्द किसे सुनाता? इसी तरह महीने दर महीने और साल दर साल बीत गए.
नाजिया अब 12वीं जमात में जा चुकी थी. अफरोज ने उस के घर पर ही नाजिया के लिए 2 ट्यूशनें लगवा दी थीं.
अफरोज का काम अब केवल इतना था कि वह किसी तरह हर महीने नाजिया के लिए 5 हजार रुपए भेजता रहे, ताकि उस की पढ़ाई चलती रहे.
कुछ ही दिनों में नाजिया का रिजल्ट भी आ गया. वह अपने स्कूल में अव्वल आई थी. यह सुन कर वह फूला नहीं समाया और मिठाई का डब्बा लिए ससुराल पहुंच गया.
बातचीत के दौरान नाजिया ने कहा, ‘‘मु झे अब कालेज की पढ़ाई करनी है और इस के लिए मु झे हर महीने कम से कम 7 हजार रुपए चाहिए.’’
अफरोज अपने दिल के हाथों मजबूर था. उस ने रुपए भेजने का वादा किया.
नाजिया का दाखिला कालेज में हो गया था. अफरोज हर महीने उस के घर 7 हजार रुपए भिजवा देता था. इस तरह महीनों बीत गए.
एक दिन नाजिया को देखने की चाह में अफरोज ससुराल पहुंच गया. वहां उसे पता चला कि नाजिया कालेज गई हुई है.
वह उस से मिलने की चाह में उस के कालेज पहुंच गया और उसे तलाश करने लगा, तभी उस की नजर नाजिया पर पड़ी. वह एक लड़के की बांहों में बांहें डाले झाड़ी की ओट में बैठी थी.
जब वे दोनों बाहर निकले, तो वह ऊंची आवाज में बोला, ‘‘तुम्हारे साथ यह लड़का कौन है?’’
इतना सुनते ही नाजिया आगबबूला हो गई और चीखते हुए बोली, ‘‘तुम को यहां किस ने बुलाया है? तुम यह सवाल करने वाले कौन हो?’’
तभी नाजिया के साथ खड़े उस लड़के ने पूछा, ‘‘यह कौन है नाजिया?’’
नाजिया ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘यह मेरे घर का नौकर है.’’
यह सुन कर अफरोज की आंखें भर आईं. काफी देर के बाद जब वह लड़का चला गया, तो अफरोज ने नाजिया के पास जा कर उस से पूछा, ‘‘वह लड़का कौन था, जिस के सामने तुम ने मु झे अपने घर का नौकर बना दिया?’’
‘‘तो तुम क्या सम झते हो कि मैं दर्जी को अपना पति बता देती? ऐसा कभी नहीं हो सकता. मेरे साथ अगर किसी का नाम जुड़ेगा, तो वह राजा का होगा. तुम्हारे जैसे किसी अनपढ़ का नहीं,’’ नाजिया तमक कर बोली.
घर जा कर अफरोज ने सारी बातें अपने पिता को बताईं. दूसरे ही दिन अफरोज के पिता नाजिया की विदाई के लिए उस के घर पहुंच गए.
एहसान साहब ने नाजिया के पिता से विदाई की बात चलाई, तो उन्होंने मना करते हुए कहा, ‘‘अभी तो उस के इम्तिहान हैं. वह उसी की तैयारी में लगी है. हां, इम्तिहान के बाद आइएगा, तो विदाई हो जाएगी.’’
एहसान साहब ने बात को बढ़ाना ठीक नहीं सम झा और चुपचाप घर लौट आए. इस तरह महीनों गुजर गए.
नाजिया ने बीए का इम्तिहान पास कर लिया. अफरोज ने फिर एक बार अपने पिता से नाजिया को घर ले आने की बात कही.
दूसरे ही दिन अफरोज के पिता नाजिया के घर पहुंचे. इम्तियाज साहब उन्हें देख कर कुछ कहते, इस से पहले नाजिया बोली, ‘‘मैं आप के घर नहीं जा सकती. मैं ने एक अनपढ़ को अपना पति बनाया, यह मेरी भूल थी.’’
नाजिया की बातें सुन कर एहसान साहब पर मानो कहर टूट पड़ा. वे मन मसोस कर घर लौट आए.
एहसान साहब गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर फिर एक बार इम्तियाज साहब के घर पहुंचे और विदाई की बात छेड़ते हुए बोले, ‘‘क्या आप अपनी बेटी को ससुराल भेजिएगा या अपने पास ही रखिएगा, सिर्फ हां या न में जवाब दीजिए. अगर आप बेटी को घर पर ही रखने का फैसला लेते हैं, तो फिर वे सारे पैसे लौटा दीजिए, जो आप को अफरोज के जरीए मिलते रहे हैं.’’
इस पर इम्तियाज साहब ने कहा, ‘‘मैं आप लोगों की बात सम झता हूं. लेकिन मजबूरी यह है कि मेरी बेटी आप के घर नहीं जाना चाहती है. वह किसी सरकारी नौकरी करने वाले से शादी करना चाहती है, इसलिए मेरी गुजारिश है कि आप भी अपने बेटे की शादी किसी दूसरी लड़की से कर दें.’’
इतना सुन कर अफरोज के पिता ने ऊंचे लहजे में कहा, ‘‘मेरा बेटा पहले से ही अनपढ़ है. अगर आप की बेटी को अपनी पढ़ाई पर इतना ही गुमान है, तो वह शादी के लिए तैयार क्यों हुई थी?
‘‘वैसे, मैं मानता हूं कि मेरा बेटा ज्यादा पढ़ालिखा नहीं है, लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि अगर नाजिया बेटी को पढ़ालिखा नौजवान ही चाहिए, तो मेरा छोटा बेटा बीए पास है. उसी के साथ उस की शादी कर दीजिए.’’
जब इस बात की जानकारी नाजिया को दी गई, तो उस ने बाहर आ कर सब के सामने कहा, ‘‘मैं उस घर में कदम तक नहीं रख सकती, शादी करना तो दूर की बात है.’’
इस पर एहसान साहब ने कहा, ‘‘तो ठीक है, अफरोज ने आप को जो रुपए दिए थे, वे हमें लौटा दीजिए.’’
नाजिया के पिता ने कहा, ‘‘हमें अफरोज की तरफ से कोई पैसा नहीं मिला है. ऐसे में उसे लौटाने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता. आप लोगों को शायद कोई गलतफहमी हो गई है.’’
‘‘कैसी बातें कर रहे हैं इम्तियाज साहब. अब तक आप के घर अफरोज 60 हजार रुपए भिजवा चुका है. उस ने हर महीने रुपए आप के घर पहुंचाए हैं.’’
‘‘आप उस शख्स को ही यहां बुला लाइए और पूछ लीजिए कि वह क्या कहता है,’’ इम्तियाज साहब ने कहा.
अफरोज तुरंत वहां से उठा और कुछ देर बाद ही उस शख्स को अपने साथ ले कर आ गया, फिर सब के सामने अफरोज ने उस से पूछा, ‘‘तुम्हें हर महीने मैं जो रुपए देता रहा, उन्हें यहां आ कर तुम किस के हाथों में देते थे?’’
इस पर वह शख्स बोला, ‘‘मु झे तो आप ने कभी रुपए दिए ही नहीं, तो फिर मेरा उन्हें कहीं पहुंचाने का सवाल ही कहां उठता है.’’
यह सुन कर अफरोज और उस के पिता के होश उड़ गए.
हार कर एहसान साहब और अफरोज अपने साथ आए लोगों के साथ उठ कर खड़े हुए और वहां से बेआबरू हो कर घर लौट आए.
नाजिया और उस के पिता इम्तियाज अफरोज के घर वालों को बेवकूफ बना कर काफी खुश थे.
दरअसल, उन लोगों ने उस शख्स को, जो अफरोज से रुपए ला कर उन्हें देता था, 10 हजार रुपए दे कर खरीद लिया था.
नाजिया को पूरी तरह यकीन हो चुका था कि अब वह अफरोज के चंगुल से बाहर आ चुकी है. उस ने इस बात की सूचना अपने आशिक अब्दुल उर्फ राजा को भी दी और फिर दोनों ने मिल कर एक होटल में रात बिताई.
नाजिया की राजा से शादी हो गई और नाजिया राजा के घर आ गई.
नाजिया के मन में खुशियों के लड्डू फूट रहे थे, तभी उस के कानों में राजा की मां की आवाज आई. वह राजा से कह रही थी, ‘‘तुम किस से पूछ कर इस नौकर की बेटी को उठा कर मेरे घर ले आए. क्या यही दिन देखने के लिए तुम्हें पढ़ायालिखाया था?
‘‘तुम फौरन इसे इस के घर पहुंचा दो. मैं किसी भी हालत में इस घटिया लड़की को अपनी बहू नहीं बना सकती… सम झे?’’
यह सुन कर नाजिया के होश उड़ गए, तभी उसे राजा की बातें सुनाई पड़ीं, ‘‘मैं इसे घर की बहू बनाने के लिए नहीं लाया मां, मैं तो केवल इस की जवानी से खेलने के लिए यहां लाया हूं.
‘‘जब मेरा जी इस से भर जाएगा, तो इसे इस के पिता के घर यह कह कर पहुंचा दूंगा कि जब तक डेढ़ लाख रुपए मेरे हाथ में नहीं आ जाएंगे, तब तक मैं इसे लेने नहीं आऊंगा.’’
नाजिया मांबेटे की बात सुन कर सम झ गई कि जैसे उस ने अफरोज को धोखा दिया, ठीक उसी तरह राजा ने भी उसे धोखा दे कर उस से शादी की. Hindi Fiction Story.
-तनवीर राही




