Emotional Hindi Story. ‘‘बहूजी, ओ बहूजी…’’ सुखिया दरवाजे पर आ कर आवाज लगाने लगी.

सुखिया की आवाज में काफी बेचैनी लग रही थी, जैसे वह कुछ बताना चाहती हो. वैसे तो वह हर रोज रात के बरतन मांजने के लिए सुबह के 8 बजे आती थी, लेकिन आज समय से पहले ही वह दरवाजे पर खड़ी थी.

‘‘सुखिया, आज इतनी सुबहसुबह? सब ठीक तो है न?’’ सुभद्रा ने रसोई की खिड़की से  झांकते हुए पूछा.

‘‘अरे बहूजी, आप जल्दी से दरवाजा खोलो.’’

‘‘बोल, क्या बात है? इतनी परेशान क्यों है?’’

‘‘बात ही कुछ ऐसी है. आप सुनेंगी, तो आप भी हैरान रह जाएंगी.’’

‘‘ऐसा क्या हो गया?’’

‘‘आज सुबह हमारा बड़कू दुकान खोलने जा रहा था कि तभी उसे एक बच्चे के रोने की आवाज सुनाई पड़ी. उस ने जा कर देखा, फुटपाथ पर एक लावारिस बच्चा पड़ा था.’’

‘‘लड़का था या लड़की?’’

‘‘यही तो हैरानी की बात है. अभी तक तो लड़कियां ही लावारिस पड़ी मिलती थीं, लेकिन कोई लड़का फेंक गया था.’’

‘‘नाजायज होगा वह,’’ सुभद्रा ने धीमी आवाज में कहा, लेकिन उन की आवाज सुखिया के कानों तक पहुंच गई थी.

‘‘आप सही कह रही हैं, वरना कोई अपना लड़का फुटपाथ पर क्यों फेंक जाता?’’

सुखिया के मुंह से लड़केलड़की में फर्क सुन कर सुभद्रा सोच में पड़ गईं कि 21वीं सदी में भी यह सब खत्म नहीं हो रहा है. अभी 10 दिन पहले की ही तो बात है, जब पार्क में एक नवजात बच्ची मिली थी. अखबार में पढ़ने को मिला था कि उस बच्ची को गोद लेने वालों की कमी न थी.

सुभद्रा के एक जानपहचान वाले बेऔलाद थे, जिन की शादी को काफी समय बीत चुका था.

सुभद्रा ने एक बार पूछ लिया था, ‘आप ने कभी बच्चा गोद लेने की नहीं सोची?’

उन्होंने बताया था, ‘कई बार बच्चा गोद लेने की कोशिश की, लेकिन हर बार लड़की ही मिल रही थी. अगर लड़का गोद मिलता, तो बुढ़ापे का सहारा बनता. लड़की को पालो, शादीब्याह के लिए दहेज जुटाओ. इन सब बातों से तो हम लोग ऐसे ही भले.’

ऐसी बातें सुन कर सुभद्रा उन्हें देखती रह गई थीं.

‘‘अरे बहूजी, आप कहां खो गईं? अभी तो मैं जा रही हूं… बाद में आ कर बरतन धोऊंगी,’’ सुखिया इतना बोलते ही तेजी से दरवाजे से बाहर निकल गई.

‘‘क्या हुआ मां, सुखिया इतनी जल्दी क्यों आई थी?’’ सुभद्रा की बहू पल्लवी अपनी बेटी अनन्या को गोद में लिए उन के पास आई.

‘‘सुखिया की बस्ती में कोई नवजात बच्चा छोड़ गया है, यही बताने आई थी वह,’’ सुभद्रा उस बच्चे के बारे में सुन कर कुछ परेशान हो गई थीं.

‘‘कैसी मां थी वह, जिस ने अपने बच्चे को फेंकने के लिए 9 महीने पेट में पाला. वाकई, बहुत कठोर दिल की होगी वह,’’ पल्लवी ने इतना कहते ही अनन्या को अपनी छाती से चिपका लिया.

‘‘चलो, चाय पी लें,’’ सुभद्रा ने अनन्या को अपनी गोद में ले लिया और उस के साथ खेलने लगीं.

‘‘मां, एक बात कहूं? पता नहीं, आप को ठीक लगेगी या गलत,’’ पल्लवी ने टेबिल पर चाय के 2 कप रखते हुए कहा.

‘‘पहले बात तो बोलो. बिना बोले कैसे पता लगेगा कि सही है या गलत,’’ सुभद्रा चाय का घूंट लेते हुए पल्लवी से बोलीं.

‘‘मां, मैं सोच रही थी कि क्यों न उस बच्चे को हम सरला बूआ के लिए ले लें,’’ पल्लवी ने धीमी आवाज में अपनी बात रखी.

‘‘तुम्हारा सोचना अपनी जगह ठीक है, लेकिन यह सब इतना आसान नहीं होता, जितना तुम सोच रही हो,’’ सुभद्रा ने कहा.

‘‘मां, अगर कोशिश करेंगे, तो सब ठीक हो जाएगा,’’ पल्लवी सुभद्रा को बच्चा लेने के लिए राजी करना चाह रही थी.

‘‘पल्लवी, हम बच्चे के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं. क्या ऐसा बच्चा सरला अपनाएगी?’’

सरला सुभद्रा की ननद थीं. उन की शादीशुदा जिंदगी के 25 साल बीत चुके थे, पर उन के कोई औलाद नहीं थी.

पल्लवी को इस बात का पूरा एहसास था, क्योंकि जब भी वे आतीं, अनन्या के प्रति अपनी ममता उड़ेलतीं.

दरवाजे पर ‘खटखट’ की आवाज हुई. पल्लवी ने देखा, सुखिया खड़ी थी.

पल्लवी ने दरवाजा खोला. सुखिया रसोई में जा कर बरतन मांजने लगी.

‘‘सुखिया, वह बच्चा कहां है?’’ पल्लवी ने पूछा.

‘‘हमारे घर में. आज बड़कू ने दुकान नहीं खोली.’’

‘‘क्यों? तुम ने उसे अपने घर में क्यों रखा है? तुम ने थाने में रिपोर्ट क्यों नहीं दर्ज की? तुम्हें वहां जा कर बताना चाहिए था कि तुम्हें एक लावारिस बच्चा मिला है.’’

पल्लवी के मुंह से पुलिस का नाम सुनते ही सुखिया के हाथ से गिलास छूट गया और वह मारे डर के उठ खड़ी हुई.

‘‘क्यों दुलहन, रिपोर्ट न करने से पुलिस से हमें खतरा है क्या? इसीलिए तो हम ने बच्चे को अपने घर में रखा है.’’

‘‘तुम उस बच्चे का क्या करोगी?’’

‘‘बहुत प्यारा बच्चा है,’’ कह कर सुखिया फिर बरतन मांजने बैठ गई.

‘‘सुखिया, जल्दी जाओ और बच्चे को यहां ले आओ.’’

‘‘अरे, बाहर कोई देख लेगा तो?’’ सुखिया ने शक जाहिर किया, तो पल्लवी ने अंदर से अनन्या का तौलिया उसे ला कर दे दिया.

थोड़ी देर में सुखिया वापस आ गई. ‘‘यह लो दुलहन. देखो, कितना प्यारा बच्चा है.’’

पल्लवी ने सुखिया की गोद से वह बच्चा ले लिया.

‘‘किसी अच्छे घर का मालूम होता है. औलाद को अपने कलेजे से दूर करना बड़ा मुश्किल काम है, पर समाज से डरी कुंआरी लड़कियां अपने किसी कमजोर पल के नतीजे को रात के अंधेरे में फुटपाथ में लिटा कर अपने लांछन से छुटकारा पा लेती हैं. यह भी उसी का नतीजा है,’’ सुभद्रा ने दुनिया देखी है और बच्चा देखते ही वे उसे जन्म देने वाली मां पर बरस पड़ीं.

‘‘कुछ ही घंटों की पैदाइश लगती है,’’ पल्लवी उस बच्चे का पूरा मुआयना कर रही थी.

‘‘क्या देखासुना जा रहा है?’’ अब तक सुभद्रा के पति अमरेश व उन के दोनों बेटे भी बाहर आ चुके थे, जो कमरे में बैठे चाय व अखबार में उल झे हुए थे.

सुभद्रा व पल्लवी ने उन्हें पूरी घटना बताई. बच्चे को सरला के लिए लेने पर पहले तो वे तीनों भड़क गए, फिर काफी मुश्किल से राजी हुए.

पल्लवी ने सरला बूआ को फोन किया और उन्हें सारी बात बताई. बरसों से बच्चे के लिए तरसती सरला ने बच्चे को अपनाने की हामी भर दी.

दूसरे ही दिन सरला और अमर सुभद्रा के यहां पहुंच गए. इन सब के बीच सुखिया काफी खुश दिख रही थी.

सरला बूआ ने आते ही बच्चे की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली. पल्लवी के चलते अमरेश बच्चे को अपनाने की हामी तो भर चुके थे, पर दिमागी तौर पर वे तैयार नहीं थे.

‘‘कैसी हैं आप?’’ सरला बूआ को देखते ही सुखिया खुश हो गई.

‘‘हां, आ क्या गई हूं, तुम्हीं ने तो बुलाया है,’’ सरला बूआ ने कहा.

‘‘हमारा उपहार कैसा लगा?’’ सुखिया का इशारा बच्चे की ओर था.

‘‘तुम्हारा उपहार अनमोल है. हम लोग जिंदगीभर तुम्हारे कर्जदार रहेंगे,’’ यह कहते हुए सरला बूआ की आंखों से आंसू छलक आए.

घर के सभी सदस्य ड्राइंगरूम में बैठे हुए थे. अमरेश इस बच्चे को कानूनी तौर पर गोद लेना चाह रहे थे. जानपहचान के वकील से बात हुई. बच्चा फुटपाथ पर मिला, इस के गवाह भी चाहिए थे. जब यह बात सुखिया को पता चली, उस ने गवाह बनने से साफ मना कर दिया.

सुखिया को अचानक क्या हो गया? दूसरी तरफ बूआ बच्चे के लगाव में जकड़ चुकी थीं.

‘‘हमारा बच्चा हमें दे दे,’’ कहते हुए सुखिया बूआ की गोद से सोए बच्चे को उठाने की कोशिश करने लगी.

‘‘अरे सुखिया, बात को सम झो. हमारा मतलब केवल बच्चे को पक्के तौर पर गोद लेने का है, जिस से कल को कोई दावा न कर सके कि यह बच्चा उस का है,’’ अमरेश ने सुखिया को हर तरह से सम झाने की कोशिश की, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही.

ऐसे में बड़कू को बुलवाया गया, लेकिन वह भी अपनी मां सुखिया की तरह गवाह बनने को राजी नहीं हुआ.

‘‘अब अगर तुम गवाह नहीं बनोगे, तो हम तुम्हारी पुलिस में रिपोर्ट करेंगे,’’ कहते हुए अमरेश उठ खड़े हुए.

‘‘नहीं बाबू, ऐसा न करो. पहले आप हमारी पूरी बात सुनें,’’ सुखिया धमकी के डर से हाथ जोड़ने लगी.

‘‘जल्दी बोलो, इतनी देर से तुम हम लोगों का समय बरबाद कर रही हो,’’ अमरेश तो पहले से ही खफा थे.

‘‘बाबूजी, हम लोगों ने आप से  झूठ बोला था कि यह बच्चा हमें फुटपाथ पर मिला. यह तो हमारी भतीजी के कुकर्म का फल है.’’

‘‘सुखिया, यह तुम क्या कह रही हो?’’ सरला बूआ बच्चे को बिस्तर पर लिटाते हुए चिल्लाईं.

सुखिया ने बताया कि उस की भतीजी की किसी अंधे लड़के की मदद करतेकरते उस से दोस्ती इस हद तक परवान चढ़ गई कि वह बिन ब्याही पेट से हो गई.

‘‘अरे, वह लड़का अंधा था कि तुम सब भी अंधे थे?’’ सुभद्रा को सुखिया के ऊपर गुस्सा आ रहा था.

‘‘चलो उठाओ इस नाजायज को और निकल जाओ यहां से. तुम जैसे  झूठे लोगों के लिए यहां कोई जगह नहीं. आज तुम ने इतनी बड़ी बात छिपाई है और कल को पता नहीं कौन सा  झूठ ले कर खड़ी हो जाओ,’’ अमरेश अब किसी भी तरह बच्चे को रखने के लिए राजी न थे.

पल्लवी चाह कर भी कुछ बोल न सकी. सुखिया बुत बनी खड़ी थी. बूआ बच्चे को गोद में लिए बोतल से दूध पिला रही थीं.

अमरेश ने इस बार सुखिया को डांटते हुए बच्चे को उठाने को कहा. वह बु झे मन से सरला बूआ की गोद से बच्चा लेने लगी.

‘‘इसे लावारिस मत कहो. बहुत सुनना पड़ा है मु झे बच्चे की खातिर. यही बच्चा मेरे ऊपर लगा बां झ का कलंक मिटाएगा. देर से ही सही, यह बच्चा मु झे मिला तो सही. 9 महीने पेट में न रखा तो क्या हुआ, मैं इसे अपने प्यार से सींचूंगी,’’ सरला बूआ ने बच्चे को अपने आंचल से ढक लिया.  Emotional Hindi Story

-पूनम तिवारी

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