Married Life Story. सलमा ने एक कप चाय बनाई और कमरे में आ गई. यह उस का रोज का काम बन गया है कि स्कूल से आ कर सब से पहले वह चाय पीती है, फिर शाम के खाने की तैयारी करती है.
रास्ते में शायरा ने सलमा को बताया था कि रूबी अपना घर छोड़ कर आ गई है. उसे हैरानी हुई कि रूबी जैसी समझदार लड़की अपनी ससुराल क्यों छोड़ आई है?
सलमा सोचने लगी कि अगर अब्बू ने उसे पढ़ाया न होता, तो वह भी जाने कहांकहां ठोकरें खाती घूमती.
अब्बू की छोटी सी दुकान थी, जिस से बड़ी मुश्किल से घर का खर्च पूरा होता था. सलमा और सलीम पढ़ रहे थे.
रमजान चाचा हमेशा ईमान की बातें करते थे, पर बूढ़े मांबाप की जिम्मेदारी अब्बू के ही जिम्मे थी.
रमजान चाचा ने साफ कह दिया था, ‘मेरी बीवी इन्हें रखने के लिए राजी ही नहीं है, तो मैं क्या करूं?’
अब्बू की आमदनी कम थी, खर्च ज्यादा थे. यह तो अच्छा था कि उन के 2 ही बच्चे हुए, सलमा और सलीम. अब्बू की पूरी कोशिश थी कि उन के बच्चे पढ़ जाएं.
जब सलमा के दादादादी की दवा वगैरह में काफी पैसा खर्च हो जाता, तो खाने में ही कटौती होती थी. अम्मी एक रोटी दे कर कह देतीं कि अब रोटी न मांगना. सलमा तो समझदार थी, लेकिन सलीम कई बार और रोटी के लिए जिद करने लगता, तो अम्मी उसे पीट देतीं.
रमजान चाचा सलमा के अब्बू के हालात जानते थे, फिर भी कभी उन्होंने बूढ़े मांबाप की दवा ला कर नहीं दी.
‘मैं कुछ भी करूं, नाम तो बड़े का ही होगा,’ कह कर रमजान चाचा अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ा लेते थे.
सलमा को याद है कि जब दादी और दादा की मौत हुई थी, तो कफनदफन भी अब्बू ने ही किया था, जिस में अम्मी के पास जो 1-2 जेवर थे, वे भी बिक गए.
दोनों बार रमजान चाचा ने 40 दिन पर होने वाली फातिहा और दावत बड़ी धूमधाम से की थी.
‘मेरे मांबाप थे, फातिहा तो मुझे करानी ही थी,’ रमजान चाचा बड़ी अकड़ से कहते थे.
किसी ने ताना कस दिया था, ‘जिए न दे कौरा, मरे बनावे चौरा.’
एक दिन रमजान चाचा ने अब्बू को समझाया था कि सलमा कुरान पढ़ ही चुकी है, अब उसे घर बैठा लो.
‘लड़की है, पढ़ लेगी तो बुरे वक्त में यह पढ़ाई उस के काम आएगी,’ अब्बू ने कहा था.
सलमा पढ़ती रही थी. उस की सहेलियां कुरान पढ़ कर घर बैठ गई थीं. जब उस ने हाईस्कूल का इम्तिहान पास किया था, तो अब्बू ने पूरे महल्ले में मिठाई बांटी थी.
‘सलमा की पढ़ाई बंद कर दो, अब उस की शादी के लिए सामान इकट्ठा करो,’ अम्मी ने कहा था.
‘यह पढ़ाई ही सलमा का दहेज है,’ अब्बू ने कहा था.
सलमा ने सिलाईकढ़ाई सीख ली थी. खाली समय में वह कढ़ाई करती थी. कढ़ाई से मिलने वाले पैसे उस की पढ़ाई के काम आ जाते.
इस बीच सलमा ने बीएड कर लिया था. बिरादरी में सवाल उठा था कि इस की शादी के लिए इतना पढ़ालिखा लड़का कहां मिलेगा?
सभी जानते हैं कि हर घर में ढेरों बच्चे होते हैं. जब तक छोटे रहते हैं, उन्हें मदरसे में भेजते रहते हैं, जहां वे अरबीउर्दू पढ़ने के नाम पर समय काटते हैं. उन में अच्छे घरों के बच्चे पढ़ कर बाप का काम संभाल लेते हैं.
ज्यादातर लड़के कुछ बड़े होते ही खराद, मोटरसाइकिल, वैल्डिंग वगैरह का काम सीखने लगते हैं. कुछ ही लड़के काम सीख पाते हैं, वरना ज्यादातर हैल्पर ही बन कर रह जाते हैं.
घर में इतने बच्चे होते हैं कि बाप उन्हें ठीक से पढ़ाने के बारे में सोच भी नहीं सकता. बड़े होने पर ज्यादातर के पास आमदनी का कोई नियमित साधन नहीं होता. जिन के पास खेती होती, वह बंट कर इतनी रह जाती कि उस से एक परिवार का गुजारा भी नहीं होता.
एक दिन लियाकत मियां अपने भाई शराफत का रिश्ता ले कर आए थे. अब्बू ने साफ बता दिया था कि उन के पास केवल लड़की है.
लियाकत मियां तैयार हो गए. अब्बू ने रिश्तेदारों से जानकारी की थी, तो पता चला था कि बड़े भाई लियाकत की शादी हो चुकी है और 3 बच्चे हैं. शराफत कुंआरा है और थोड़ाबहुत पढ़ा है. वैसे बचपन से दोनों भाई कारोबार में लगे रहे और आज उन का बहुत नाम है.
लियाकत मियां किसी भी कीमत पर शादी के लिए तैयार थे, तो अब्बू ने रिश्ता पक्का कर दिया था. जब लियाकत मंगनी की रस्म करने आए थे, तो इतने फलमिठाई, कपड़े और जेवर ले कर आए थे कि लोगों को भरोसा हो गया था कि रिश्ता बड़े घर से ही हुआ है.
सलमा के पड़ोसी उस की तकदीर से जलने लगे थे. लोग समझ गए कि वह पढ़ीलिखी है, इसलिए गरीबी के बावजूद इतना अच्छा रिश्ता मिला.
सलमा की शादी भी धूमधाम से हुई थी. अब्बू ने दहेज भी थोड़ाबहुत दे ही दिया था. रिश्तेदारों ने भी काफी सामान दे दिया था. लियाकत मियां कुछ ले जाना नहीं चाहते थे. लोगों के कहने पर सामान रखवा लिया था. उसे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि वह झोपड़ी से महल में पहुंच जाएगी.
जब सलमा ससुराल पहुंची थी, तो उस ने देखा था कि वे लोग काफी अमीर थे. शराफत भी सीधेसादे थे. वह खुश थी. उसे नहीं मालूम था कि ये खुशियां चंद दिनों की हैं. उसे याद है, उस दिन शराफत एक डब्बा मिठाई ले आए थे. उन्होंने बच्चों को मिठाई दी थी.
‘यह क्या है?’ भाभी ने पूछा था.
‘कुछ नहीं, थोड़ी सी मिठाई लाया था,’ शराफत ने कहा था और कमरे में आ गए थे.
‘हमें क्या है, दोनों हाथों से लुटाओ. इन का क्या जाएगा. भीख तो हमारे बच्चे मांगेंगे,’ भाभी चिल्ला कर बोली थीं.
‘मैं ने क्या लुटा दिया?’ शराफत कमरे से बाहर आ कर बोले थे.
सलमा कुछ समझ नहीं पा रही थी कि यह क्या हो रहा है.
‘कुछ नहीं, अब बंटवारा होगा,’ भाभी ने तेज आवाज में कहा था.
शराफत अपने भाई लियाकत के पास गए थे, तो उन्होंने भी कह दिया था कि वे कुछ नहीं कह सकते.
सलमा यह तो समझ गई थी कि लियाकत ही बंटवारा चाहते हैं, लेकिन क्यों, वह यह समझ नहीं सकी थी.
शराफत ने सोचा कि भाभी किसी बात पर गुस्सा हैं. सुबह तक ठीक हो जाएगा. लेकिन सुबह जब शराफत ने दुकान की चाबी उठाई थी, तो भाभी ने कह दिया था, ‘तुम दुकान मत खोलो, अपना हिस्सा लो और यहां से जाओ.’
‘मैं कहां चला जाऊं?’ शराफत धीरे से बोले थे.
‘बेकार की बहस से क्या फायदा, अब बंटवारा तो होना ही है. कहां जाओगे, यह तुम जानो?’ लियाकत बोले थे.
शराफत चुप बैठे रहे. लियाकत ने दहेज में मिला सामान ला कर रख दिया.
‘क्या मेरा इतना ही हिस्सा है?’ शराफत ने पूछा था.
‘मांबाप से तो कुछ मिला नहीं, मैं ने बिजनैस किया, रातदिन मेहनत की…’ ‘मेहनत तो मैं ने भी की,’ शराफत बोले थे.
‘तुम्हें मैं पाल रहा था. खा रहे थे, तो काम भी कर रहे थे. इस में हिस्सा कैसा? तुम्हारी शादी कर दी, अब अपना सामान उठाओ, बीवी को लो और यहां से जाओ,’ लियाकत बोले.
‘हम लोग कहां जाएं?’ सलमा रोते हुए बोली थी.
‘कहीं भी जाओ, अपना सामान उठाओ, वरना सड़क पर फेंक दूंगा,’ लियाकत तेज आवाज में बोले थे.
शराफत के एक दोस्त ने अपने घर में एक कमरा दे दिया था. वहीं सामान उठा कर ले गए थे. रात में शराफत फूटफूट कर रोए थे.
‘मैं ने कारोबार के अलावा कुछ किया नहीं, मजदूरी कर नहीं पाऊंगा. बनिए की नौकरी में खर्च भी नहीं चलेगा,’ शराफत ने कहा था.
उस दिन दोनों भूखे ही सोए थे, क्योंकि शराफत की जेब में पैसे नहीं थे. बाजार में इस बंटवारे की चर्चा हुई, लेकिन किसी ने लियाकत से कुछ नहीं कहा था.
सलमा ने अपनी सोने की झुमकियां शराफत को दे कर कहा था, ‘इन्हें बेच कर खाना वगैरह खरीद लो, फिर सोचेंगे कि क्या करें.’
बहुत परेशानियों के बाद भी सलमा मायके नहीं गई थी. कुछ पड़ोसिनों ने उसे समझाया था कि वह शराफत को छोड़ दे. उस के साथ रहेगी, तो भूखी ही मरेगी. वह चुपचाप सुनती रही थी.
सलमा को पता चला था कि बालिका इंटर कालेज में टीचर की जगह खाली है. उस ने अर्जी दे दी. बीएड होने के चलते उसे नौकरी मिल गई थी. उस के बाद शराफत ने भी छोटामोटा कारोबार शुरू कर दिया था.
किसी के दरवाजा खटखटाने से सलमा की यादों का सिलसिला टूट गया. उस ने उठ कर दरवाजा खोला. सामने रूबी खड़ी थी.
‘‘तुम कब आईं?’’ सलमा ने पूछा.
‘‘कल रात ही आई थी,’’ रूबी ने अंदर आते हुए बताया.
‘‘सब ठीक तो है न?’’ वह बोली.
‘‘कुछ भी ठीक नहीं है. फिरोज का तो काम ही नहीं चलता. कोई कहां तक परेशानियां सहन करे. मैं ने तो अब्बू से कह दिया है कि मैं वहां मरने नहीं जाऊंगी,’’ रूबी बोली.
‘‘यह भी कोई बात हुई कि परेशानी आई तो घर छोड़ दिया. हर समस्या का हल होता है. तुम भी कुछ काम…’’
‘‘मैं वहां मजदूरी करने नहीं गई हूं,’’ रूबी तपाक से बोली.
‘‘यह भी कोई सोच है. फिरोज को छोड़ कर दूसरे से निकाह करोगी… वहां भी परेशानी आई तो…’’ सलमा बोली.
‘‘तुम्हारी तरह पढ़ीलिखी होती, तो मैं भी नौकरी कर लेती,’’ रूबी धीरे से बोली.
‘‘रास्ते तो और भी हैं. तुम सिलाई करो. तुम्हारी ही मेहनत सही, कम से कम चूल्हा तो जलेगा,’’ सलमा ने समझाया.
‘‘हां, आप ठीक कहती हैं. आप ने मुझे रास्ता दिखा दिया, वरना मैं भटकती रहती,’’ रूबी धीरे से बोली.
‘‘तुम बैठो, मैं चाय बनाती हूं,’’ रसोई में जाते हुए सलमा बोली.
सलमा समझ गई कि रूबी जल्दी ही पति के पास चली जाएगी और धीरेधीरे उस की जिंदगी संवर जाएगी. Married Life Story
-साबिर हुसैन




