Rajasthan. सिरोही जिले के बरलूट थाना इलाके के मंडावरिया गांव में 5 जून को बलवाजी गुर्जर के एकलौते कमाऊ बेटे सदाराम की मौत हो गई. 17 जून को हुए मृत्युभोज में परिवार की माली हालत ठीक न होने के कारण घी के मालपुए नहीं बनाए जा सके. ऐसे में गांव व समाज के लोगों को बेहद सादा भोजन कराया गया.

इस बात से गांव व समाज के एक दर्जन से ज्यादा पंच इस कदर नाराज हुए कि उन्होंने अगले ही दिन 18 जून को फरमान सुना कर इस परिवार सहित कुल 43 समर्थक परिवारों को समाज व जाति से बाहर कर दिया.

गौरतलब है कि गुर्जर बहुल इस गांव में गुर्जर जाति के तकरीबन 130 परिवार रहते हैं. ज्यादातर परिवार खेतीबारी करते हैं. जिन परिवारों के पास खेती की जमीन कम हैं या खेती लायक जमीन नहीं हैं, वे पास ही अरलूट की खदानों में पत्थर तोड़ने का काम कर अपने परिवार का पेट पालते हैं.

सदाराम भी अरलूट की खदानों में पत्थर तोड़ने का काम करता था. एक रोज मजदूरी कर बाइक से घर लौटते समय सड़क हादसे में उस की मौत हो गई. परिवार में सदाराम ही अकेला कमाने वाला था. 3 छोटी बहनों में वही अकेला भाई था.

सदाराम की मौत से परिवार पर दुख और तकलीफों का पहाड़ टूट गया. बुजुर्ग पिता बलवाजी गुर्जर बुरी तरह लाचार हो गए. रिवाज के मुताबिक, मृत्युभोज भी करना जरूरी था. उन की हैसियत नहीं थी कि वे मौसर पर देशी घी के मालपुए बनाएं. बलवाजी ने अपने करीबी समाज के कुछ लोगों व रिश्तेदारों से रायमशवरा कर देशी घी के बजाय तेल में मालपुए बनवा कर गांव वालों को खिला दिए.

इस से गांव के दबंग लोग नाराज हो गए और उन्होंने दूसरे ही दिन गांव की चौपाल पर पंचायत बुला कर बलवाजी व उस के करीबी परिवारों को जाति बाहर करने का फरमान जारी कर दिया.

दबंग पंचों का कहना था कि देशी घी के मालपुए खिलाने की हैसियत नहीं थी तो यह परिवार पहले गांव में हुए मौसरों (मृत्युभोज) में क्यों जीमता फिरा था. खाया है तो खिलाना ही पड़ेगा.

जब उस लाचार परिवार के लोगों ने हाथ जोड़ कर कहा कि ‘माईबाप, इतनी औकात नहीं है हमारी, सादा खाना खा लो’, तो इन परमेश्वरी पंचों का ‘भूखा पेट’ जाग उठा.

इन की नीचता की हद देखिए, मालपुए नहीं मिले तो गुस्सा सीधे पेट से दिमाग में चढ़ गया. फरमान आ गया कि इस परिवार का हुक्कापानी बंद. और तो और, जब गांव के 42 अन्य सम झदार परिवारों ने इस जाहिलाना हरकत का विरोध किया तो इन मठाधीशों ने थोक के भाव में 43 परिवारों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया.

अब इन 43 परिवारों के लिए जो नियम बनाए गए हैं, उन्हें जान कर किसी भी सम झदार इनसान का सिर चकरा जाए :

दुकान से राशन बंद यानी मालपुए नहीं खिलाए, तो अब तुम्हें हम राशन का सामान भी नहीं खरीदने देंगे. भूखे मरो.

कुएं से पानी बंद, वाह, कुएं का पानी जैसे इन पंचों के घर के फिल्टर से आ रहा हो.

अगर किसी ने इन से बातचीत भी की या मेल मुलाकात की, तो 11,000 रुपए का जुर्माना और पूरे समाज को मुफ्त का ‘जीमण’.

मतलब साफ है कि मुफ्त का माल उड़ाने का बहाना हर हाल में चाहिए. यह तथाकथित पंचपटेलों का न्याय नहीं, कोरी जाहिलियत है. इसे गिद्ध सोच कहना तो गिद्धों का अपमान होगा. यह विशुद्ध रूप से ‘बौद्धिक कंगाली’ और ‘बेवकूफी’ का जीताजागता उदाहरण है.

पीडि़तों की जबानी

पीडि़त गोपाल गुर्जर बताते हैं कि उन की बूआ की लड़की की 20 जून को शादी थी. पंचों के डर से वे शादी में नहीं जा सके. फरमान है कि अगर कोई जाएगा तो उसे 11,000 रुपए और पूरे समाज को सामूहिक भोजन (जीमण) का दंड देना होगा.

दूसरे पीडि़त भोगीलाल ने बताया कि उन के भाई दिनेश की 24 जून को शादी थी. ननिहाल वालों ने दंड और मालपुए की मांग के डर से पीले चावल (निमंत्रण) लेने से ही इनकार कर दिया. इस के चलते उन का परिवार शादी में शामिल नहीं हुआ.

वहीं तेजाराम ने बताया कि पंचों ने कहा है कि गांव वालों को सादा भोजन खिला कर बलवाजी ने समाज की नाक कटा दी. अब गांव में हम से कोई बात नहीं करता. सार्वजनिक कुएं से पानी तक नहीं लेने दे रहे हैं.

वहीं एक और पीडि़ता कमला देवी ने बताया कि उन की बहूबेटियों से गांव में कोई बातचीत तक नहीं करता है. घी के मालपुआ नहीं बनाए तो  क्या हम इनसान नहीं रहे? यह कैसा इंसाफ है?

एडवोकेट महेंद्र सिंह ने बताया कि पंचों का यह फरमान पूरी तरह गैरकानूनी है. पुलिस को तुरंत मामला दर्ज कर आरोपियों को गिरफ्तार करना चाहिए. राजस्थान सामाजिक बहिष्कार निषेध अधिनियम 2019 के तहत दोषी को 7 साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है.

वैंटिलेटर पर सोच

अकसर जागरूक लोग मृत्युभोज का विरोध करते हैं, तो लोग कहते है कि यह तो अपनी मरजी से करते हैं, कोई जबरदस्ती थोड़े ही करवाता है. उन लोगों के लिए ऐसी घटनाएं मुंह पर तमाचा होती हैं.

सामाजिक ताने, व्यंग्य, तंज ऐसी विधा होती है जिस के द्वारा पेटू गिद्ध जिंदा इनसान को कुरेदकुरेद कर मार देते हैं. अगर किसी ने हिम्मत दिखाई भी तो सामाजिक बहिष्कार कर देते है. इसी घटना को देख लीजिए.

इस 21वीं सदी के डिजिटल इंडिया में जहां दुनिया एआई और रोबोटिक्स की बातें कर रही है, वहीं इस मंडवारिया गांव के कुछ ‘परम ज्ञानी’ और स्वयंभू विधाता अलग ही लैवल की ‘रौकेट साइंस’ सुल झाने में बिजी हैं.

विज्ञान कहता है कि इनसान को जिंदा रहने के लिए औक्सीजन चाहिए, लेकिन इन महाज्ञानियों की ‘अल्ट्रालैवल’ थ्योरी कहती है कि नहीं साहब, समाज में जिंदा रहना है तो ‘मृत्युभोज में घी के मालपुए’ चबाने ही पड़ेंगे.

जिस समाज में किसी के मरने पर हमदर्दी जताने के बजाय इस बात पर पंचायत बैठती हो कि ‘मीठे में क्या बना था’, उस समाज की मानसिक सेहत वैंटिलेटर पर है. यह कैसी कुरीति है जो इनसानियत को ताक पर रख कर सिर्फ जीभ के स्वाद और  झूठी चौधराहट पर टिकी है?

कानून की किताबों में ‘सामाजिक बहिष्कार निषेध अधिनियम’ धूल फांक रहा है और यहां जमीन पर मुट्ठीभर सामाजिक आतंकी समानांतर सरकार चला रहे हैं. जब तक इन अंधविश्वासी और मूढ़ सोच वाले तत्वों को कानून का डंडा मार कर यह नहीं सम झाया जाएगा कि देश संविधान से चलता है, तब तक समाज का यह मानसिक दीवालियापन ठीक नहीं होगा.

थाने में कोई सुनवाई नहीं हुई तो 43 परिवार जिला कलक्टर दफ्तर पहुंचे हैं, जहां पुलिस को पंचों की धोती कुंडी में टांग कर कानून सम झाना था, वहां पीडि़त इंसाफ मांगते भटक रहे हैं. प्रशासन को हाथ में चाबुक ले कर इन मठाधीशों को यह याद दिलाना था कि इनसानी जिंदगी की कीमत, घी के मालपुए से कहीं ज्यादा होती है, एक महीने से ज्यादा गुजर जाने के बाद भी वहां सामाजिक आतंकियों पर कोई एक्शन नहीं हो रहा है.

एक और घिनौना रिवाज

राजस्थान के देहाती इलाकों में ऊंची और दबंग जातियों के यहां होने वाले मृत्युभोज में गांव की निचली जातियों के लोग तेरहवीं खाने आ जाते हैं, लेकिन जब मृत्युभोज निचली या दलित जाति के यहां हो तो ऊंची और दबंग जातियों के लोग कभी नहीं जाते. चूंकि निचली जाति के लोग आए थे तो इस लिहाज से ऊंची और दबंग जाति वालों को बदले का व्यवहार तो रखना ही है, तो इस के लिए एक अलग तरीका निकाला जाता है.

तरीका यह है कि मृत्युभोज का पूरा पैसा वह देगा जिस के यहां मौत हुई है. तेहरवीं का खाना नीची जाति वाले के यहां नहीं बनेगा.

भोजन किसी ऊंची या दबंग जाति वाले के घर में बनेगा. राशन खरीदी से ले कर तंबू, हलवाई तक की सब व्यवस्था ऊंची और दबंग जाति के लोग करेंगे.

जब तेरहवीं का खाना बन कर तैयार हो जाएगा तो पहले पंडितजी लोग भोजन करेंगे. फिर गांव के ऊंची और दबंग जाति वाले लोग भोजन करेंगे. खाना परोसने से ले कर खानेखिलाने तक का काम ऊंची और दबंग जाति वाले लोग अपने हाथ में रखेंगे.

दलितों का उधर फटकना हरगिज मना है. यहां तक की जिस के यहां मौत हुई है और जो मृत्युभोज में पैसा लगा रहा है, उस का व उस के परिवार के किसी भी सदस्य का वहां पैर रखना सख्त मना है. जब तक ऊंचे और दबंग लोग मृत्युभोज खा रहे हैं, तब तक किसी बरतनभांडे, जगचमचे को छूना भी मना है.

जब ऊंची और दबंग जाति वाले लोग, उन के परिवार की औरतें व बच्चे तक अच्छे से छक कर खापी लेंगे तब बाकी बाकी बचा खाना उस परिवार के लोगों के लिए छोड़ दिया जाता है कि अब वे अपने मृत्युभोज की व्यवस्था खुद संभालें. खुद खाएं और अपने नातेरिश्तेदारों को खिलाएं. Rajasthan

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