Pubjab. सुबह के 6 बज रहे थे. लुधियाना के फोकल पौइंट औद्योगिक क्षेत्र की एक संकरी गली में हलचल शुरू हो चुकी थी. 10 बाई 12 फुट के एक कमरे का दरवाजा खुला. भीतर 4 लड़के रहते थे. कोई बिहार के सहरसा का, कोई उत्तर प्रदेश के गोरखपुर का, तो कोई पश्चिम बंगाल के मालदा का. कोई स्टील फैक्टरी में काम करता था, कोई होजरी यूनिट में और कोई प्लास्टिक मोल्डिंग कारखाने में.

कमरे का किराया 5,000 रुपए महीना. पानी का अलग हिसाब नहीं, लेकिन बिजली का हिसाब अलग था. दरवाजे के बाहर लगा एक छोटा सा सबमीटर हर महीने तय करता कि इस बार जेब कितनी हलकी होगी. महीने के आखिर में मकान मालिक आता, मीटर पढ़ता और कहता, ‘‘इतनी यूनिट हुई हैं… 10 रुपए प्रति यूनिट के हिसाब से पैसे दे दो.’’

कमरे में रहने वालों में से किसी ने आज तक बिजली बिल नहीं देखा. किसी ने यह भी नहीं पूछा कि सरकारी दर क्या है. पूछने की हिम्मत भी कम ही लोग जुटा पाते हैं. वजह साफ है कि अगर मकान मालिक नाराज हो गया तो नया कमरा ढूंढ़ना पड़ेगा और उस के साथ नौकरी भी खतरे में पड़ सकती है.

यही केवल लुधियाना का ही मामला नहीं है, बल्कि जालंधर, अमृतसर, मोहाली, पटियाला, मंडी गोबिंदगढ़, बठिंडा और पंजाब के लगभग हर औद्योगिक शहर में लाखों बाहरी किराएदार इसी सिस्टम के बीच जिंदगी बिता रहे हैं.

किराया तय होता है, बिजली नहीं

पंजाब में किराए का कमरा लेते समय मकान मालिक अकसर 2 बातें साफ बता देता है, कमरे का मासिक किराया और एडवांस. तीसरी बात होती है, ‘‘बिजली अलग से लगेगी.’’ यहीं से गड़बड़ शुरू होती है.

कई जगह किराएदार को यह नहीं बताया जाता कि बिजली किस बुनियाद पर वसूली जाएगी. कहीं 9 रुपए, कहीं 10 रुपए, कहीं 12 रुपए प्रति यूनिट. ज्यादातर मामलों में यह दर मौखिक होती है. न कोई लिखित सम झौता, न बिजली बिल की प्रति.

सबमीटर : सुविधा या मुनाफे का जरीया?

सबमीटर का मकसद विवाद रोकना था. एक मेन बिजली कनैक्शन से जुड़े कई कमरों की अलगअलग खपत मापने का यह आसान तरीका है. अगर मेन बिल के अनुपात में हर किराएदार से रकम ली जाए तो इस में कोई विवाद नहीं होना चाहिए.

समस्या तब शुरू होती है जब सबमीटर केवल खपत मापने का साधन नहीं रहता, बल्कि एक्स्ट्रा कमाई का जरीया बन जाता है.

मान लीजिए मेन बिजली बिल की प्रभावी दर साढ़े 7 रुपए प्रति यूनिट पड़ती है, लेकिन किराएदार से 10 रुपए प्रति यूनिट लिए जाते हैं तो प्रति यूनिट ढाई रुपए का फर्क पहली नजर में बहुत छोटा लगता है, लेकिन यही फर्क महीने के आखिर में सैकड़ों रुपए और साल के आखिर में हजारों रुपए बन जाता है. अगर किसी इमारत में 15-20 किराएदार हों तो यह फर्क और बड़ा हो जाता है.

यहीं से सवाल उठता है कि क्या बिजली का बिल केवल लागत की वसूली है या उस से फायदा भी कमाया जा रहा है? यह शिकायत खबर क्यों नहीं बनती?

एक ऐसा बाजार, जो किसी सरकारी लिस्ट में नहीं

अगर कोई दुकान सरकारी दर से ज्यादा कीमत पर जरूरी सामान बेचती है तो शिकायत दर्ज हो सकती है. अगर कोई पैट्रोल पंप ज्यादा कीमत वसूलता है तो कार्रवाई मुमकिन है. लेकिन किराए के कमरों में बिजली की असली दर क्या है और कितनी वसूली जा रही है, इस का कोई सटीक सार्वजनिक रिकौर्ड नहीं है.

मतलब एक ऐसा लेनदेन, जिस में हर महीने लाखों रुपए का भुगतान होता है, वह तकरीबन पूरी तरह निजी भरोसे पर टिका होता है. यही वजह है कि इस मामले पर विश्वसनीय आंकड़े भी बहुत कम मुहैया हैं.

क्या यह केवल गरीब का सवाल है?

पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि यह केवल प्रवासी मजदूरों का मुद्दा है, लेकिन ऐसा नहीं है. आज पंजाब के शहरों में छात्र, निजी कंपनियों के कर्मचारी, नर्सिंग स्टाफ, सुरक्षा गार्ड, सेल्समैन, ड्राइवर और छोटे व्यापारी भी बड़ी तादाद में किराए के कमरों में रहते हैं. उन में से अनेक इसी तरह की बिजली व्यवस्था के अधीन हैं, इसलिए यह मुद्दा केवल गरीबी का नहीं, बल्कि किराएदारों के हक का भी है.

एक ऐसा सवाल, जिस का जवाब अभी बाकी है

अगर कोई मकान मालिक सरकार से एक दर पर बिजली खरीदता है और किराएदार से दूसरी दर पर वसूलता है, तो क्या यह केवल सुविधा शुल्क है या मुनाफे का कारोबार? अगर यह लीगल है तो उस की स्पष्ट सीमा क्या है? और यदि यह लीगल नहीं है तो सालों से यह सिस्टम बिना किसी दखलअंदाजी के कैसे चल रहा है?

भारत में बिजली केवल एक उपभोक्ता वस्तु नहीं, बल्कि एक विनियमित सार्वजनिक सेवा है. आप सब्जी, कपड़ा या फर्नीचर खरीद कर आगे बेच सकते हैं, लेकिन बिजली के मामले में नियम अलग हैं. इस की वजह यह है कि बिजली का उत्पादन, वितरण, आपूर्ति, टैरिफ और उपभोक्ता अधिकार, सभी इलैक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003 और राज्य विद्युत नियामक आयोगों के नियमों के अधीन आते हैं.

यही वजह है कि पंजाब के किराए के मकानों में सालों से चली आ रही एक व्यवस्था अब कानूनी बहस का मुद्दा बनती है. सवाल सीधा है, क्या कोई मकान मालिक घरेलू बिजली खरीद कर उसे अपनी तय की हुई दर पर किराएदारों को बेच सकता है?

बिजली का व्यापारी कौन?

पंजाब में बिजली मुहैया कराने की जिम्मेदारी पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन  लिमिटेड की है. बिजली की दरें पंजाब स्टेट इलैक्ट्रिसिटी रैगुलेटरी कमीशन तय करती है यानी बिजली ग्राहक और वितरण कंपनी के बीच एक कानूनी करार होता है.

इस करार के मुताबिक घरेलू कनैक्शन लेने वाला इनसान ग्राहक है, बिजली का व्यापारी नहीं. यहीं से पूरी बहस शुरू होती है. अगर कोई ग्राहक अपने घर में परिवार के साथ बिजली इस्तेमाल करता है, तो कोई विवाद नहीं. अगर उसी परिसर में किराएदार रहते हैं और उन के हिस्से की वास्तविक खपत का हिसाब रखने के लिए सबमीटर लगाया गया है, तब भी कोई समस्या नहीं, लेकिन अगर वही ग्राहक बिजली को मुनाफा कमाने का जरीया बना दे, तो सवाल उठना लाजिमी है.

सबमीटर लगाने का मकसद हमेशा से उचित बंटवारा रहा है, व्यापार नहीं. मान लीजिए एक मकान में 10 कमरे हैं और एक ही मेन मीटर है. ऐसे में हर कमरे की अलग खपत जानने के लिए सबमीटर उपयोगी है. इस से विवाद कम होते हैं.

लेकिन अगर मेन बिल साढ़े 7 रुपए प्रति यूनिट के औसत से बना हो और किराएदार से 10 रुपए या 12 रुपए प्रति यूनिट वसूले जाएं, तो सबमीटर मापने का उपकरण न रह कर कमाई का जरीया बन जाता है. यहीं कानून का रोल शुरू होता है.

‘रीसेल औफ इलैक्ट्रिसिटी’ क्या है?

ऊर्जा कानून में रीसेल औफ इलैक्ट्रिसिटी का मतलब है, ऐसे हालात, जहां कोई बिजली खरीद कर उसे आगे मुनाफा कमाने के मकसद से मुहैया कराए.

हालांकि हर मामला उस के तथ्यों पर निर्भर करता है, फिर भी नियामक संस्थाओं का मूल सिद्धांत यही है कि घरेलू बिजली कनैक्शन व्यावसायिक पुनर्विक्रय के लिए नहीं होता.

यदि वास्तविक बिल का न्यायसंगत बंटवारा किया जा रहा है, तो स्थिति अलग है. यदि अतिरिक्त लाभ कमाया जा रहा है, तो स्थिति अलग हो सकती है. यही वह महीन रेखा है, जिसे सम झना आवश्यक है.

इलैक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003 में कई ऐसे प्रावधान हैं जो इस विषय से जुड़े हैं. धारा 12 कहती है कि बिजली के वितरण और व्यापार के लिए कानूनी इजाजत जरूरी है. धारा 42 वितरण लाइसैंसधारी की जिम्मेदारियों और उपभोक्ता व्यवस्था से संबंधित है.

धारा 50 राज्यों को सप्लाई कोड बनाने का अधिकार देती है, जिस की बुनियाद पर बिजली सप्लाई के नियम तय किए जाते हैं.

धारा 126 अधिकृत शर्तों के उलट उपयोग के मामलों में आकलन का प्रावधान करती है. अगर किसी मामले में बिजली का इस्तेमाल नियम से जुड़ी शर्तों के उलट पाया जाता है, तो जांच के बाद एक्शन किया जा सकता है.

ध्यान देने वाली बात यह है कि कानून हर मामले में स्वत: अपराध घोषित नहीं करता. कार्रवाई तथ्यों, जांच और उपलब्ध सुबूतों पर निर्भर करती है.

पंजाब के नियम क्या हैं?

पंजाब के बिजली सप्लाई नियमों का मूल मकसद यह पक्का करना है कि बिजली का इस्तेमाल तय शर्तों के मुताबिक हो.

अगर सबमीटर केवल वास्तविक खपत का हिसाब रखने के लिए लगाया गया है और किराएदार से उसी अनुपात में राशि ली जा रही है, तो विवाद की संभावना कम होती है. लेकिन अगर बिजली का इस्तेमाल एक्स्ट्रा इनकम करने के लिए किया जा रहा हो, तो नियम से जुड़े सवाल खड़े हो सकते हैं.

क्या किराएदार बिल देखने की मांग कर सकता है? तो इस का जवाब है हां. अगर कोई आदमी बिजली का अलग भुगतान कर रहा है, तो उस के लिए यह जानना जरूरी है कि :

* मेन बिल कितना आया?

* कुल यूनिट कितनी थीं?

* दर क्या लगी?

* उस के हिस्से की बिजली की गणना कैसे हुई?

अगर मकान मालिक मेन बिल दिखाता है, तो ज्यादातर विवाद अपनेआप खत्म हो सकते हैं, लेकिन जहां बिल दिखाने से बचा जाता है, वहीं शक पैदा होता है.

शिकायत क्यों नहीं होती?

यही इस पूरे मुद्दे की सब से बड़ी समस्या है. कानून किताबों में मौजूद है, लेकिन उस का लाभ लेने वाला इनसान खुद को असुरक्षित महसूस करता है.

एक बाहरी मजदूर के लिए नौकरी, कमरा और रोजमर्रा की स्टेबिलिटी सब से बड़ी प्राथमिकता होती है. वह अदालत, आयोग या सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने की हालत में नहीं होता. यही वजह है कि वह पैसे से जुड़े छोटेछोटे नुकसान अपनाता चला जाता है.

मकान मालिकों का पक्ष

अनेक मकान मालिक कहते हैं कि कौमन एरिया की लाइट, पानी की मोटर, वायरिंग की मरम्मत, मीटर बदलने का खर्च, इन सब का भी कुछ खर्च होता है. ये सब बातें पूरी तरह से गलत नहीं हैं, लेकिन अगर सच में एक्स्ट्रा खर्च है, तो उस का साफ और लिखित आधार होना चाहिए.

इस पूरी बहस का सार यही है कि विवाद का सब से बड़ा कारण बिजली नहीं, बल्कि बात को छिपा कर रखना है. अगर किराएदार को मेन बिल मिले, अगर प्रति यूनिट दर पहले से लिखित रूप में तय हो, यदि एक्स्ट्रा शुल्क का कारण साफ हो, तो ज्यादातर विवाद जन्म ही नहीं लेंगे.

समाधान केवल अदालतों में नहीं, बल्कि साफगोई में भी छिपा है, लेकिन यदि यह साफगोई नहीं आती, तो एक सवाल बारबार उठता रहेगा कि क्या घरेलू बिजली उपभोग का साधन है या कुछ जगहों पर एक्स्ट्रा इनकम का जरीया बन चुकी है?

यह सवाल बहुत खास है. असल में पंजाब समेत अनेक राज्यों में छोटे किराए के कमरों के मामले में औपचारिक किरायानामा अपवाद है, सामान्य नियम नहीं, इसलिए ‘किरायानामा अनिवार्य हो’ जैसा सु झाव व्यावहारिकता से थोड़ा दूर लगता है.

सरकार क्या कर सकती है?

अगर राज्य सरकार और बिजली नियामक आयोग चाहें, तो बिना नया कानून बनाए भी कई व्यावहारिक सुधार लागू किए जा सकते हैं.

पहला, यदि बिजली का अलग भुगतान लिया जा रहा है, तो मकान मालिक के लिए मेन बिजली बिल की प्रति या उस की डिजिटल कौपी किराएदार को दिखाना अनिवार्य किया जा सकता है.

दूसरा, हकीकत यह है कि पंजाब में छोटे किराए के कमरों में मुश्किल से 10-15 फीसदी मामलों में ही किरायानामा तैयार होता है. ज्यादातर जगह सिस्टम केवल मौखिक सहमति पर चलता है… किराएदार आया, कमरा देखा, किराया तय हुआ और रहने लगा, इसलिए सरकार किरायानामे पर निर्भर रहने के बजाय यह इंतजाम कर सकती है कि मकान मालिक बिजली की प्रति यूनिट दर और गणना का तरीका कमरे में लिखित रूप से प्रदर्शित करे या साधारण रसीद पर दर्ज करे.

तीसरा, बिजली विभाग ऐसी औनलाइन सुविधा विकसित कर सकता है, जिस से किराएदार मेन मीटर का बिल देख सके.

चौथा, अतिरिक्त वसूली से संबंधित शिकायतों के लिए गोपनीय शिकायत तंत्र बनाया जाए, ताकि शिकायत करने वाले को मकान खाली कराने या सताने का डर न रहे.

5वां, जनजागरूकता अभियान चला कर यह बताया जाए कि सबमीटर का लीगल इस्तेमाल क्या है, बिजली बिल कैसे तय होता है और मनमानी वसूली के हालात में ग्राहक कहां शिकायत कर सकता है.

इन सुधारों के लिए बड़े बजट की जरूरत नहीं है. जरूरत केवल साफ नीति, ट्रांसपेरेंट सिस्टम और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की है.Pubjab

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