Religious Journeys. मध्य प्रदेश के इंदौर से राजस्थान के जैसलमेर जिले में रामदेवरा दर्शन करने जा रहे एक परिवार की कार जोधपुर जिले में आगोलाई के निकट सामने से आ रहे टैंकर से भिड़ गई.  हादसे में कार सवार 2 मासूमों सहित 5 जनों की मौके पर ही मौत हो गई. टक्कर इतनी भीषण थी कि पांचों जनों के शव कार में बुरी तरह से फंस गए.

मौके पर पहुंची पुलिस ने क्रेन की मदद से मशक्कत कर शव बाहर निकाले और जोधपुर के एमडीएम अस्पताल की मोर्चरी में रखवाए. बालेसर पुलिस ने बताया कि मध्य प्रदेश के इंदौर एक ही परिवार के 5 सदस्य, जिन में एक मर्द, 2 औरतें और 2 बच्चे लोकदेवता बाबा रामदेव के दर्शन करने जा रहे थे.

सूरसागर इलाके में पुलिस चौकी कालीबेरी के पास पत्थर की खान में भरे बरसाती पानी में डूबने से 3 पैदल जातरुओं की मौत हो गई. सबइंस्पैक्टर मानाराम ने बताया कि पाली जिले में रोहट थाना के तहत वायद गांव के 20-22 लोगों का एक समूह रामदेवरा के लिए पैदल जा रहा था. यात्री दोपहर बाद कालीबेरी क्षेत्र पहुंचे, जहां आसपास पत्थर की खानों में बरसाती पानी भरा है. यात्रियों के संघ में शामिल लोग वहां रुक गए.

इस बीच, 3 यात्री शाम के तकरीबन साढ़े 4 बजे नहाने के लिए पत्थर की एक खान में उतरे, लेकिन खान में बने गड्ढे की गहराई काफी ज्यादा थी. ऐसे में तीनों यात्री गहराई में जा कर डूबने लगे. उन्हें गायब पा कर अन्य जातरुओं ने मदद के लिए आवाज लगाई. नजदीक चौकी से पुलिस भी मौके पर पहुंची. गोताखोरों ने बड़ी मशक्कत के बाद 1-1 कर तीनों जातरुओं को बाहर निकाल लिया, लेकिन तब तक इन की मौत हो चुकी थी.

ब्यावर के लालपुरा घाटे के समीप एक कार चालक ने लसानिया मांडावास से रामदेवरा जा रहे करीब 7 जातरुओं को टक्कर मार दी, जिस में 2 औरतों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक औरत गंभीर रूप से घायल हो गई.

अजमेर से रामदेवरा जा रही एक महिला पैदल यात्री की रास्ते में तबीयत बिगड़ने के बाद मौत हो गई. निकट के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डाक्टरों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया. डाक्टरों के मुताबिक, मौत का कारण हार्ट अटैक माना जा रहा है.

झलावाड़ जिले के मेहर महल्ला मगसीपुर के रहने वाले सांवरलाल, रतनलाल और भैंरूलाल ने 20 दिन पहले रामदेवरा दर्शन की मुराद ले कर पैदल यात्रा शुरू की थी. यात्रा के दौरान वे सादड़ी पहुंचे और परशुराम महादेव के दर्शन कर रात को बारलीसादड़ी के अंबेडकर नगर में एक खुली जगह पर आराम किया.

आराम करने के दौरान तकरीबन रात को एक सांप ने रतनलाल को काट लिया. सूचना मिलने पर ईगल रैस्क्यू टीम के जितेंद्र सिंह राठौड़ ने एंबुलैंस भेजी और रतनलाल को अस्पताल के लिए रवाना किया, लेकिन रास्ते में ही उस की मौत हो गई.

देश में धार्मिक और सामाजिक पदयात्राओं के दौरान लगातार हो रहे सड़क हादसे, वाहन की टक्कर और बहुत ज्यादा गरमी व सेहत बिगड़ने से कई श्रद्धालुओं की जान जाने के कारण पैदल यात्राएं जानलेवा साबित हो रही हैं. रामदेवरा की ओर जाने वाले पैदल यात्रियों को तेज रफ्तार वाहनों व बसों द्वारा कुचलने के मामले ज्यादा सामने आए हैं.

हाईवे या दूसरे रास्तों पर ट्रकों और वाहनों के पलटने से कई पदयात्री अपनी जान गंवा बैठते हैं. तेज गरमी, उमस, जहरीले सांपबिच्छू और लगातार लंबी दूरी तक पैदल चलने से डिहाइड्रेशन या हार्ट अटैक भी पदयात्रियों के लिए जानलेवा बन रहे हैं.

कैसे शुरू हुआ यह सिलसिला

माना जाता है कि देश में पैदल यात्रा का चलन बाबा रामदेव के मंदिर से ही बना है. बताया जाता है कि बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह जब दूसरे विश्वयुद्ध से लौटे थे, तब उन्होंने बाबा रामदेव की पहली पैदल यात्रा शुरू की थी. तभी से लोगों ने हर साल भादो महीने में पैदल पहुंच कर बाबा की समाधि के दर्शन करने शुरू किए.

यह चलन ऐसा शुरू हुआ कि अब हर मंदिर में पैदल जाने का क्रेज बढ़ रहा है, जबकि असल में यह सिलसिला बाबा रामदेव मंदिर से शुरू हुआ है. यह शायद देश का पहला मंदिर है, जहां एक महीने में 35 से 40 लाख पैदल श्रद्धालु आते हैं और इन में से कई सैकड़ोंहजारों किलोमीटर लंबी यात्रा कर के पहुंचते हैं.

आमतौर पर पहाड़ों पर बने मंदिरों में पैदल श्रद्धालु पहुंचते हैं, यात्रा मुश्किल होती है, लेकिन इतनी लंबी दूरी की नहीं होती और न ही एक महीने में इतने लाख श्रद्धालु यहां आते हैं.

पिछले दिनों जयपुर के निकट 26 यात्रियों का एक समूह हैदराबाद से रामदेवरा जाते हुए मिला. तकरीबन 2,000 किलोमीटर की यात्रा पूरी करने में 62 दिन लगे.

समूह में आए दिनेश सिंह ने बताया कि उन्होंने कई सालों पहले मन्नत मांग रखी थी. वह पूरी हो गई इसलिए यह पैदल यात्रा की. रास्ते में कई मुश्किलें आईं, लेकिन बाबा की श्रद्धा के आगे वे कुछ भी नहीं थीं.

यही नहीं, मेले की एक महीने की अवधि के भीतर हजारों संघ या समूह राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा व महाराष्ट्र से पैदल आते हैं.  एक एक संघ में 1,000 से 3,000 तक श्रद्धालु शामिल होते हैं.

रामदेवरा सरपंच समुंदर सिंह ने बताया कि अब तो पैदल यात्रियों के अलावा बाइक व साइकिल पर आने वाले यात्रियों का भी चलन है.

मेले के दौरान ऐसे यात्रियों की तादाद तकरीबन 5 लाख तक पहुंच जाती है. रामदेवरा आने वाले हर रास्ते पर ध्वजा लगी बाइक व साइकिलों की भीड़ देखी जा सकती है.

धर्मरक्षक बने पिछड़ेदलित

सावनभादो के मौसम में अकसर लोगों को रंगबिरंगे झंडे लिए जयकारे लगाते पैदल सड़कों पर यात्रा करते देखा जाना आम बात है. सब से ज्यादा भीड़ इन दिनों रामदेवरा जाने वाले जातरुओं की देखी जा सकती है.

इस दौरान हर तरफ कीचड़ भरे टूटेफूटे रास्तों पर चलते लोगों की भीड़ न बारिश देखती हैं, न सड़कों की बुरी हालत. आदमी, औरत, बच्चे हो या बूढ़े, कोई दंडवत, कोई पैदल तो कई बाइक पर सवार हो कर पंचरंगे ?ांडे?ांडियों के साथ चले जा रहे होते हैं.

गौरतलब है कि रामदेवरा मंदिर जैसलमेर जिले के पोखरण के पास रुणिचा धाम में बना हुआ है. यह वही पोखरण है, जहां साल 1974 व 1998 में कुल 3 बार परमाणु परीक्षण हुए थे. यहां से रामदेवरा महज 12 किलोमीटर की दूरी पर बना है.

जयपुर इलाके में डिग्गी कल्याण की पदयात्राएं, तो अजमेर की तरफ जाने वाले रास्तों पर ख्वाजा के जायरीन, कहीं सवाईभोज के दीवाने तो कहीं जोगमाया के चाहने वाले… ?ांडे?ांडियां उठाए इन भक्तगणों के चेहरे पढ़ने, इन की माली और सामाजिक हालत व इन की सोशल प्रोफाइल पर चिंतनमनन करते है, तो साफ जाहिर होता ये ज्यादातर दलित, पिछडे व आदिवासी जमात के गरीबगुरबे, किसान, मजदूर लोग हैं.

भले ही इन यात्राओं को अब तथाकथित ऊंची जाति के तबके ने त्याग दिया हो, लेकिन रामदेवरा, खाटूश्याम, सवाईभोज, देवनारायण, तेजाजी, गोगाजी जैसी तमाम पदयात्राओं में अब सिर्फ पिछड़े, दलित और आदिवासी समाज के लोग ही नजर आते हैं.

इन पैदल चल रहे लोगों में विरला ही कोई दुकानदार, फैक्टरी का मालिक, मिल वाला होगा या सरकारी कर्मचारी ने छुट्टी ले कर इस तरह पैदल चलना गवारा किया होगा.

पदयात्रा में खर्च कीमती वक्त

भले ही सावनभादो का यह कीमती वक्त अभी इन के खेतों मे होने का है. क्योंकि इस समय खेतों में फसलें आकार ले रही होती है, खेतों को निराईगुड़ाई की सख्त जरूरत रहती है. नदीनाले, तालाब, एनीकट व खेतों के भरनेटूटने के दिन है, जलसंचय का मौसम है, अपनी आजीविका के साधन संसाधनों को सहेजनेसंवारने का समय है, लेकिन ये अपना घरबार छोड़ कर निकल पड़े हैं पदयात्राओं पर.

घरबार, गायभैंस, बैलबकरी, बालबच्चे सब पीछे छोड़ आए इन भक्तों को कल्याण धणी, रामसा पीर, खाटूश्याम और ख्वाजा साहब की रहमत की दरकार है. ये मेहनत करने वाले हाथ भिक्षा की मुद्रा में हैं.  इन का खुद से भरोसा उठ चुका है. ये सड़कों पर, मंदिरों और मजारों पर धोक लगाते फिर रहे है. इन पर आसमानी कृपा बरसेगी, ऐसा इन को यकीन है.

कौन सम?ादार इस मच्छरों और सांपों के सीजन में, बारिश और कीचड़ में अपनी परेशानी भोगने इस तरह सड़क पर निकलेगा, लेकिन आस्था के नाम पर जो निकल पड़े है, उन में से कई लोग दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं, वापस घर नहीं पहुंचते हैं, कई सांप काटे के शिकार हो जाते हैं, कइयों को गाड़ी से कुचल कर मरना पड़ता है, कुछेक बारिश के पानी में बह जाते हैं.

जिम्मेदारी से भागना

पैदल यात्रियों के जत्थे डीजे पर भजनों की अश्लील धुनों पर नशे में धुत हो कर नाचते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे पागलपन का दौरा पड़ा हो. अगर यह यात्रा में नहीं नाच कर कहीं और जगह ऐसी हरकत कर रहे होते तो घर वाले कब के किसी अच्छे मनोचिकित्सक से चैकअप कराने ले जाते.

आस्था के नाम पर जो लोग यात्राओं पर निकलते हैं, असल में वे जिम्मेदारियों से भागने वाले लोग हैं. अपनी जिम्मेदारियों को नहीं निभा पाने वाले लोग धर्म का सहारा लेते हैं. अपने मांबाप को उन के हाल पर छोड़ कर उन की इच्छा के खिलाफ अपनी मौजमस्ती के लिए जहां मरजी वहीं निकल पड़ते हैं, जबकि जो इनसान अपनी जिम्मेदारी व फर्ज निभा लेता है उसे कहीं पर भी जाने की जरूरत नहीं है.

बड़ेबूढ़े बताते हैं कि आज से 40 साल पहले कोई पदयात्रा नहीं थी तो क्या हमारे पुरखे धार्मिक नहीं थे? क्या पैदल यात्रा जैसे आयोजनों को धर्म से जोड़ने वालों का मकसद इस देश के कमेरे वर्ग को लूट कर खुद के लिए रोजगार पैदा करना है?  Religious Journeys

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