Editorial. गांवों में आजकल कट्टे, घरेलू कारखानों में बनाई गई पिस्टलों, से ज्यादा विदेशी तस्करी से आई गन इस्तेमाल होने लगी हैं. दिल्ली के गुरुग्राम में एक बिजनैसमैन के घर पर 60 से ज्यादा गोलियां चलाने वाले कांड में 4 अपराधी पुलिस की फायरिंग में मारे गए थे और उन के पास से चीनी बनी पीएक्स 30 नौरिंको पिस्टलें बरामद हुईं जिन में मैगजीन में 17 गोलियां आ जाती हैं.

यह गांवकसबों के लिए बहुत खतरनाक है. बंदूक का इस्तेमाल कर के डराने का धंधा जो पहले चंबल या बिहार में होता था और अब हर बड़े शहर में फैल रहा है और इस में कौन शामिल और कौन नहीं कहना मुश्किल है. आजकल जो भी अनापशनाप पैसा बना रहा है वह गैंगों को निशाने पर आ रहा है. गांवों में खेती और जमीन की बिक्री से आने वाले पैसे का भी जीभर कर गलत इस्तेमाल हो रहा है क्योंकि एक बड़ी गिनती इन जवान होते लड़कों की है जिन्हें ढंग का काम न आता है, न करने की इच्छा है.

राजनीति और ब्यूरोक्रेसी ने इस में पैट्रोल डाला है और एक बड़ी खेप उन लड़कों की तैयार हो रही है जो अब चीन, यूरोप, इजराइल से पाकिस्तान, म्यांमार, नेपाल से आए हथियारों को खरीद कर जबरन उगाही के धंधे में लग गए हैं. मुसीबत यह है कि इन लड़कों के पिता भी कोई सुधरे नहीं हैं कि वे अपने लाड़लों को संभाल सकें. पूरे घरों का बिजनैस बंदूकबाजी का होने लगा है चाहे इस में कोई भी जोखिम क्यों न हो.

पुलिस को तो खरीदना आसान है पर जब गैंग बनने लगते हैं तो एकदूसरे पर हमलों में कुछ न कुछ जानें जाती रहती हैं. जैसा राजनीति में दलबदल होता है वैसा गैंगों में भी हो रहा है. विदेशी हथियारों में सुविधा यह है कि इन्हें रखना, साफ करना, चलाना आसान है. कट्टों के हाथ में ही फटने का डर बना रहता है. गांवकसबों के लड़के घरेलू जमापूंजी इन पर बरबाद करने में लग गए हैं क्योंकि ये महंगे बहुत होते हैं.

दुनियाभर में हर लड़ाई में हर युग में मारने वालों को वीर माना गया है और लड़ाई में मरने वालों को शहीद माना गया है. इन गैंगों के पीछे असल में यही वीरता और शहादत है. इसे पंडों, मौलवियों, पादरियों ने भी जीभर के उकसाया है और राजाओं ने भी. देशप्रेम का मतलब बन गया है कि अपनी जमीन से कुछ परे बसे लोगों को मार डालना. देश के लिए कुरबानी का गुणगान गाया जाता है, ज्ञान देने वाले को महान बताया जाता है चाहे उस से आम लोगों को कुछ न मिले.

इसी वीरता और शहादत की कहानियां अपनी शक्त बदल कर गैंगों की जान बन जाती हैं. अपने गैंग के लिए मर जाना भी शहीद माना जाने लगा है, दूसरे गैंग वाले या जिस से उगाही करनी है उसे मार देना वीरता मानी जाने लगी है. जिन्हें देश के लिए कुछ बनाने, कुछ पैदा करने, कुछ ढंग से जीना सिखाने की जगह देशीविदेशी फायर आर्म्स देश में भर रहे हैं जिन्हें चलाने में निशाना लगाना आना चाहिए, मसल की जरूरत कम है.

ये परिवार जो अपराधों में जीते हैं, शान की, रौब की जिंदगी चाहे जीते हों पर हर समय मौत या जेल का साया इन पर मंडराता है. पुलिस से मिलीभगत के बावजूद अपराधियों पर एक नहीं. 10-10 मुकदमे चलते रहे हैं, जो ये लोग अपराध से देशीविदेशी पिस्टलों से कमाते हैं, वह ऐसे ही जाता है जैसे हरिद्वार से सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर लाया गया गंगाजल मंदिरों में चढ़ा कर नाली में बहा दिया जाता है.  Editorial

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