Murder Mystery. सुबह से ही आसमान में बादल छाए हुए थे. रुकरुक कर बारिश भी हो रही थी, पर जैसेजैसे दिन ढलता जा रहा था, बादल छंटते जा रहे थे.

दुर्गा प्रसाद ने अपनी चारपाई बरगद के पेड़ के नीचे बिछा ली और हुक्का गुड़गुड़ाने लगे.

वे हर रोज इसी पेड़ के नीचे बैठते थे. उन के सामने से गुजरने वाला हर कोई उन्हें ‘नमस्कार’ जरूर करता था.

दुर्गा प्रसाद की पूरे गांव में इज्जत थी. उन के पास कई बुजुर्ग आ कर बैठते थे. यहीं बैठेबैठे देश व समाज की चर्चा होती और सभी हुक्का गुड़गुड़ाते रहते.

दुर्गा प्रसाद खुद को गांव की राजनीति से दूर रखते, लेकिन उन से नाइंसाफी सहन नहीं होती थी. यही खिलाफत गांव के नेता रामप्रकाश को पसंद नहीं थी. इसी वजह से अकसर दोनों में नोकझोंक चलती रहती थी.

शाम ढलने लगी थी. परिंदे अपने घोंसलों में लौटने लगे थे. कल्लन, मुन्ना, चुकनिया और घसीटू अपनी भैंसों के संग लौट आए थे. वे चारों सुबह जाते और शाम को ही लौटते. उन के साथ पारो भी होती थी. वह अपनी दोनों भैंसों और एक बछिया को चराने जाती थी.

हमेशा की तरह उन चारों ने नमस्कार किया, तो दुर्गा प्रसाद ने पूछा, ‘‘क्या बात?है, पारो नजर नहीं आ रही… सुबह तो वह तुम्हारे साथ गई थी?’’

‘‘बाबा, हम ने उसे बहुत आवाजें लगाईं, पर वह कहीं मिली ही नहीं… पता नहीं कहां चली गई? हम उस की भैंसों और बछिया को तो हांक लाए,’’ कल्लन ने कहा और वे चारों आगे बढ़ गए.

दुर्गा प्रसाद को पारो की चिंता सताने लगी. वह सोचने लगे कि न जाने पारो कहां चली गई होगी? रहरह कर उन के दिमाग में उलटेसीधे खयाल आने लगे, ‘गरीब की जवान बेटी पर दुनिया की बुरी नजर रहती?है, कहीं उस पर भी…’ और फिर खुद को समझाते हुए वे सोचते, ‘नहींनहीं, ऐसा नहीं हो सकता.’

चुकनिया जब भैंसों को पारो के घर पहुंचाने गया, तो उस का बाप परेशान हो उठा. पारो की मां भूरो तो यह सुन घबरा ही गई. लेकिन उस के पति जमना प्रसाद ने समझाया, ‘‘घबराओ नहीं, चली गई होगी इधरउधर… थोड़ीबहुत देर में आ जाएगी. क्या पता, अपनी सहेली कल्लो के पास चली गई हो.’’

पारो 16 बरस पूरे कर चुकी थी. परसों ही उस के फूफा रिश्ते की बात पक्की कर गए थे. सुबह मां ने उसे रोका भी था, ‘बेटी, अब तू भैंसें चराने मत जाया कर. 2 महीने बाद ही तेरी शादी है… कहीं ऊंचनीच हो गई, तो हम दुनिया के सामने मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.’

‘अरे मां, अगर मैं भैंसें चराने नहीं जाऊंगी, तो ये ढेर सारा दूध नहीं देंगी. घर का खर्च फिर कैसे चलेगा?’ पारो ने शिकायती लहजे में कहा, तो मां कहने लगी, ‘अच्छाअच्छा, ठीक है मेरी अम्मां, तू अब कुछ ज्यादा ही सयानी हो गई है.’

जमना प्रसाद सोच रहा था कि पारो को कहां तलाश करें. उस की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था, तभी नेताजी का नौकर उसे बुलाने आ पहुंचा, ‘‘जमना, तुझे नेताजी ने बुलाया है.’’

‘‘तू जा, मैं थोड़ी देर में आ जाऊंगा.’’

‘‘नहीं. उन्होंने कहा है कि साथ ले कर ही आना.’’

‘‘ठीक है,’’ जमना प्रसाद ने ?ां?ालाते हुए कहा.

‘‘पारो की मां, तू बेटी को कल्लो के घर देख आ… शायद वहीं होगी. तब तक मैं नेताजी से मिल कर आता हूं,’’ कहतेकहते वह बाहर निकल गया.

नेताजी उसे देखते ही चहके, ‘‘अरे आओ जमना, आओ. आज तो तुम सुबह से आए ही नहीं… हम तुम्हारी बाट देखते रहे. आज हमारे साले साहब आए हुए हैं.’’

यह सुनते ही जमना प्रसाद सोचने लगा कि फिर तो आज शराब पीने को मिलेगी.

‘‘सोच क्या रहा है… तेरे लिए हम ने पहले से ही रखी हुई है. यह ले भई, तू हमारा खयाल रखे या न रखे, पर हमें तो तेरा खयाल रखना ही पड़ता है,’’ कहते हुए नेताजी ने जमना के सामने गिलास और शराब की बोतल रख दी.

जल्दी ही जमना प्रसाद 2 गिलास शराब गले से नीचे उतार गया.

नेताजी कहने लगे, ‘‘जमना, ऐसा कर, आज साले साहब के साथ चला जा. इन्हें अभी जाना है…कोई जरूरी काम है. रात का मामला है और रास्ता भी खराब है…

‘‘और हां, इन के गांव में सांग हो रहा है. तू तो सांग का बड़ा शौकीन है… खूब सांग देखना, फिर लौट आना. हां, तुझे कोई काम हो तो हमें बता दे, करवा देंगे.’’

‘‘नहीं सरकार, काम तो कोई नहीं… पर पारो अभी तक घर नहीं आई. उस की मां परेशान हो रही है…बस, उसे ही ढूंढ़ने जाना था.’’

‘‘घर पर उस की मां तो है. मैं किसी को भेज दूंगा… तू चिंता मत कर… बेफिक्र हो कर जा तू.’’

लड़खड़ाता हुआ जमना साले साहब की जीप में जा बैठा. धीरेधीरे शराब का नशा उस पर चढ़ने लगा था. वह भूल गया था कि पारो की मां घर पर उस का इंतजार कर रही है.

नेताजी का साला सुबह का ही आया हुआ था. जब से वह आया था, तभी से नेताजी के खेत वाले मकान में शराब का दौर चल रहा था. आशिकमिजाज साला कोई फरमाइश रखे और नेताजी इनकार करें, ऐसा कभी नहीं हुआ था.

दोपहर को जब उस ने फरमाइश रखी, तो नेताजी सोच में पड़ गए.

तभी उन का मुंहलगा नौकर गणेशी बोला, ‘सरकार, गुस्ताखी माफ हो तो मैं कुछ इंतजाम करूं.’ और वह दौड़ कर पास ही भैंसें चरा रही पारो को बहलाफुसला कर ले आया था.

‘लो सरकार, पारो आ गई. यह अपने जमना प्रसाद की बेटी है,’ गणेशी ने कहा.

पारो की जवानी देख कर दोनों की आंखें फटी की फटी रह गईं. पारो बला की खूबसूरत थी.

नशे में धुत्त नेताजी और उस का साला पागल कुत्तों की तरह पारो पर टूट पड़े. वे बारीबारी से अपनी प्यास बुझाते रहे. पारो चीखतीचिल्लाती रही, पर वहां पर उस की सुनने वाला कोई न था. चीखतेचीखते पारो मर चुकी थी. हवस के दरिंदों ने उसे हमेशाहमेशा के लिए सुला दिया था.

जब नेताजी ने देखा कि वह मर गई है, तो गणेशी को कह कर लाश को पास के ईख के खेत में फिंकवा दिया और खुद घर लौट आए.

पारो की मां भूरो उसे सब जगह तलाश कर आई थी, पर वह कहीं नहीं मिली. फिर वह हांफती हुई दुर्गा प्रसाद के पास पहुंची, जो पेड़ के नीचे बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे. एक वही थे, जो उन के दुखदर्द में काम आते थे.

दुर्गा प्रसाद खुद भी पारो को ढूंढ़ने गए, पर वह कहीं न मिली. उस के बाद वह जमना के घर पहुंचे. वहां पहुंचने पर मालूम हुआ कि जमना भी घर पर नहीं है.

भूरो ने बताया कि नेताजी के यहां यह कह कर गया था कि अभी आ रहा हूं, पर लौटा ही नहीं. एक बच्चे को बुलाने भेजा, तो उस ने आ कर बताया कि नेताजी के यहां तो ताला लगा है. वहां कोई नहीं है.

पारो के गायब होने की खबर सुन कर बहुत से गांव वाले जमना के घर जमा हो गए थे. सब की राय यह बनी  कि पारो को वहीं खोजा जाए, जहां वह भैंसों को चरा रही थी.

कई लोग लाठियां और लालटेन ले कर वहां पहुंचे. इधरउधर तलाशने के बाद खून से लथपथ पारो की लाश एक खेत में पड़ी मिली.

बेटी की लाश को देख कर भूरो फूटफूट कर रोने लगी. पूरे गांव में यह खबर आग की तरह फैल गई. नेताजी भी वहां आ पहुंचे थे, पर जमना उन के साथ नहीं था.

नेताजी ने बताया कि जमना तो वहां से उसी समय चला आया था, कहीं दूसरी जगह चला गया होगा.

रात को ही थाने में खबर कर दी गई. सुबह पुलिस आई. उस ने रिपोर्ट दर्ज कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. दूसरे दिन लाश गांव वालों को सौंप दी गई, जिस का उन्होंने अंतिम संस्कार कर दिया.

पारो की हत्या हुए पूरा हफ्ता बीत गया था, पर हत्यारा पकड़ में नहीं आया था. दूसरी ओर जमना भी घर से लापता था.

8वें दिन जब जमना शाम को घर पहुंचा, तो बेटी के कत्ल की खबर सुन कर पागल सा हो गया. भूरो तो छाती पीटपीट कर रोए जा रही थी, पर जमना कुछ भी नहीं बोल पा रहा था. गांव वाले उसे ताने दे रहे थे कि वह जाने कहांकहां घूमताफिरता रहता है… अपनी बच्ची की भी सुध नहीं लेता.

थोड़ी देर बाद पुलिस की जीप वहां आ कर रुकी, जिस में से दारोगा और 2 सिपाही नीचे उतरे. दारोगा के इशारे पर पुलिस वालों ने आगे बढ़ कर जमना प्रसाद को हथकड़ी लगा दी.

यह नजारा देख कर सब हैरान रह गए. सब ने इस का विरोध किया. लोगों का कहना था कि जमना ऐसा नीच काम नहीं कर सकता.

दारोगा जोर दे कर कहने लगा, ‘‘तुम्हें मालूम है, यह एक हफ्ते से लापता था. हम ने इसे कहांकहां नहीं तलाश किया, पर यह कहीं न मिला. जब मिला तो तुम लोग कहते हो, इस ने यह काम नहीं किया. इस का फैसला तो अदालत करेगी.’’

वे लोग जमना को घसीटते हुए जीप में ले गए, वह गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन किसी ने उस की एक न सुनी.

जीप जाने के बाद नेताजी मुसकराते हुए वहां पहुंचे.

‘क्या जमाना आ गया है. किसी का पता ही नहीं चलता कि कौन कब क्या कर बैठे. जमना प्रसाद देखने में तो बड़ा भोलाभाला लगता था, पर देखो, उस ने अपनी बेटी को भी नहीं बख्शा,’ गांव की एक बूढ़ी औरत बड़बड़ाए जा रही थी और नेताजी उस के सुर में सुर मिला रहे थे.  Murder Mystery

–अजय कुमार ‘भिंड’

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