Love Story in Hindi. कुलदीप की लाश को फटी आंखों से ताकती तनवीर बुत बनी बैठी थी. जानपहचान वाले घर पर इकट्ठे होते जा रहे थे. अमेरिका का वह इलाका भारत के पंजाबी और सिख तबके का गढ़ था.
तनवीर की हालत देख कर औरतों के आंसू नहीं थम रहे थे. अभी 4 महीने पहले ही तो लाल जोड़े में आई तनवीर की आरती उतार कर उन्होंने प्यार से घर में स्वागत किया था.
बचपन से अनाथ कुलदीप अपने प्यार भरे स्वभाव के चलते किसी का बेटा, किसी का भाई या किसी का देवर बन चुका था. परायों के बीच उसे अपना परिवार मिल गया था.
तनवीर को सतवंत ताई ने गले से लगा कर रोंआसी आवाज में तसल्ली देनी चाही, ‘‘तू चिंता मत कर तन्नी बेटी. हम सब तेरे अपने हैं. खुद को अकेली मत समझ.’’
कुलदीप के साथी टैक्सी ड्राइवर उदास खड़े थे. उन का सब से ज्यादा जिंदादिल साथी उन्हें छोड़ कर जो चला गया था.
हाईवे पर हादसा होना कोई नई बात नहीं थी, पर कुलदीप तो बहुत होशियार ड्राइवर था. पुलिस का कहना है कि हादसा होने के समय वह मोबाइल फोन पर बातें कर रहा था.
दरअसल, सवारी से अच्छे पैसे पा कर कुलदीप की खुशी दोगुनी हो गई थी. उस ने तनवीर को फोन लगाया था. शाम को लोहड़ी में पहनने के लिए उस ने अपनी तन्नी के लिए जामुनी रंग का सलवारसूट खरीदा था, तभी जोर के एक धमाके के साथ सब खत्म हो गया.
5-7 दिन तक बारीबारी से कोई न कोई पड़ोसन तनवीर के पास रही. सतवंत ताई और मनजीत भाभी का मन अपने घर में टिकता ही नहीं था. तन्नी का दुख उन का अपना दुख बन गया था.
सब के सामने एक बड़ा सवाल यह था कि अब तन्नी का क्या होगा? किराए का घर तो छोड़ना ही होगा. सब सोच में पड़ गए कि वह कहां जाएगी?
कुलदीप और तनवीर की कहानी सब जानते थे. कुलदीप ने बताया था कि जब वह भारत में था, तब बचपन में ही उस के मातापिता हैजे के शिकार हो कर चल बसे थे.
लालची चाचाचाची पूरी जायदाद पर कब्जा करना चाहते थे. समझदार हो रहा कुलदीप उन की राह का कांटा बन रहा था.
जवान हो रहे कुलदीप को गांव वालों ने इशारोंइशारों में बताया था, ‘चाचा तुम्हारी जान का दुश्मन बन चुका है. उस के साथ रहने में खतरा है.’
पास के गांव में रहने वाला जगजीत अकसर कुलदीप से मिलता रहता था. वह अमेरिका में टैक्सी चलाता था. कुलदीप की हालत देख कर उस ने सलाह दी थी, ‘यहां रह कर चाचा की चाकरी कर के क्यों बेकार में गालियां खाता है? चल, मेरे साथ. अमेरिका में तेरी जिंदगी बन जाएगी.’
चाचा ने एक चाल चल कर पूरी जायदाद अपने नाम लिखवा ली थी. कुलदीप को अमेरिका की टिकट के पैसे दे कर चाचा ने जैसे उस पर एहसान किया था.
अमेरिका पहुंच कर कुलदीप की दुनिया ही बदल गई. जगजीत को वह अपना भाई मानता था. जगजीत की घरवाली मनजीत भाभी के साथ वह अपना सुखदुख बांटता था.
कुलदीप कहता था, ‘खून के रिश्तों से बड़ा मन का रिश्ता होता है. जगजीत से मेरे मन का रिश्ता है. उस ने मुझे नई जिंदगी दी है.’
जगजीत की बहिन की शादी में कुलदीप भी उस के साथ भारत में उस के गांव गया था. वापसी में तनवीर भी उस के साथ आई थी.
‘क्यों रे कुलदीप, यह परी कहां से उड़ा लाया? तू ने तो हमें अपनी शादी की खबर भी नहीं दी?’ अमेरिका में सतवंत ताई ने उसे मीठा उलाहना दिया था.
‘हां, कुलदीप देवरजी, अब हमें सचसच बताओ कि यह कमाल कैसे हो गया?’ कमलजीत भाभी ने सब के मन की बात कही थी.
‘एक बात जान ले कुलदीप, अगर इन्हें पूरी कहानी नहीं सुनाई, तो ये तुझे तनवीर से मिलने नहीं देंगी,’ मनजीत भाभी ने चेतावनी दे डाली थी.
20 दिन की बच्ची को ले कर मनजीत अपनी ननद की शादी में भारत नहीं जा पाई थी. कुलदीप की प्रेम कहानी सुनने के लिए वह भी बहुत उतावली थी.
‘अरे भाभी, ऐसी कड़ी सजा मत देना. चलो, मैं सब बताता हूं,’ कुलदीप बोला था.
औरतें चौकन्नी हो कर बैठ गई थीं. सब के मन में कोई फिल्मी कहानी उभर रही थी. कुलदीप ने बताना शुरू किया था, ‘तनवीर की सौतेली मां के जुल्मों ने उस की बुरी हालत कर दी थी. सौतेली मां की 3 और बेटियां हैं, पर घर का सारा काम तनवीर पर मढ़ कर सब मौज करतीं. यह देख कर मैं ने तनवीर से शादी करने का फैसला सुना डाला.
‘अमेरिका में कमाने वाला दूल्हा मिलने की बात से सौतेली मां जल गई. शादी न होने देने के लिए उस ने बहुत अड़ंगे लगाए, पर गांव वालों और जगजीत की मदद से हमारी शादी हो गई.’
कुलदीप की तरह तनवीर भी सब की प्यारी ‘तन्नी’ बन गई.
कुलदीप की मौत के बाद अब तनवीर का क्या होगा? जानपहचान के सभी मर्द इसी सोच में पड़ गए. तनवीर तो टूरिस्ट वीजा पर आई थी. कुलदीप का मानना था कि अमेरिका में रहते हुए ही वह तनवीर का वीजा स्टेटस बदलवा लेगा.
कुलदीप खुद ग्रीन कार्ड पर था. तनवीर कानूनन 6 महीने से ज्यादा वहां नहीं रह सकती थी. भारत वापस जाने का मतलब उसे फिर उसी नरक में झोंक देना था.
बूढ़े सरदार कुलवंत सिंह ने समस्या उठाई, ‘‘अब हमें सोचना है कि तनवीर बेटी की कैसे मदद की जाए?’’
‘‘सच तो यह है ताऊजी कि इधर कुआं है, तो उधर खाई. तन्नी को भारत नहीं भेजा जा सकता. हमारा कुलदीप उसे जिस आग से बचा कर लाया था, हम तन्नी को उसी आग में जलने को नहीं भेज सकते, पर यहां रहने में भी कानूनी अड़चनें हैं,’’ जगजीत ने कुछ सोचते हुए कहा.
यह सुन कर सब सोच में पड़ गए. अचानक हरजीत ने एक चौंकाने वाला प्रस्ताव सब के सामने रख दिया, ‘‘अगर माफी मिले तो जो एक तरीका मेरे दिमाग में आ रहा है, सब को बताऊं?’’
‘‘हां… हां, बेखौफ हो कर बता बेटा. तन्नी बेटी की खुशी हमारे लिए सब से ऊपर है.’’
‘‘अरमिंदर को तो आप जानते हैं न ताऊजी?’’
‘‘अरे, उसे कौन नहीं जानता. वह तो पूरी बिरादरी को बदनाम कर रहा है,’’ यह कह कर सरदार कुलवंत सिंह का चेहरा कठोर हो गया था.
‘‘इस मुश्किल घड़ी में वही हमारी मदद कर सकता?है,’’ हरजीत ने कहा.
‘‘क्या बकवास कर रहा है तू? इसी अरमिंदर ने पहले एक 50 साल की औरत के साथ शादी कर के अमेरिका की नागरिकता ली. उसे तलाक दे कर भारत से सुरजीत को ब्याह कर ले आया. उस से भी तलाक हो गया.
‘‘अब तो उस ने यह धंधा बना लिया है. पैसे ले कर जरूरतमंद लड़कियों से शादी करता है, बाद में उन्हें तलाक दे कर खुला घूमता है. ऐसे नीच इनसान से कौन सी मदद मिलेगी?’’ सरदारजी के चेहरे पर नफरत साफ झलक रही थी.
‘‘कहने को तो वह आटोमोबाइल पार्ट्स की दुकान का मालिक है, पर असल में वह औरतों को परमानैंट वीजा दिला कर पैसे कमाता है. इस के बावजूद वह कहता?है कि वह किसी की मजबूरी का कोई फायदा नहीं उठाता, बल्कि उन की मदद करता है,’’ जगजीत ने नाराजगी से कहा.
‘‘यह सच बात है. दरअसल, अरमिंदर को न जाने क्यों औरत जात से नफरत है. उस के खिलाफ किसी लड़की ने कभी कोई शिकायत नहीं की, बल्कि वे उस की एहसानमंद हैं,’’ हरजीत ने अपनी बात रखी.
‘‘तू कहना क्या चाहता है? साफसाफ बता,’’ सरदारजी ने जानना चाहा.
‘‘तनवीर की शादी अरमिंदर से करानी होगी. उस की बीवी बन कर तनवीर को अमेरिका का परमानैंट वीजा मिल जाएगा. वीजा मिलने के बाद ही तनवीर यहां रह सकती है और काम भी कर सकेगी,’’ हरजीत ने बात साफसाफ कह दी.
‘‘तेरा मतलब है कि हम तन्नी को उस भेडि़ए के हाथ में सौंप दें?’’ जगजीत ने गुस्से से कहा.
‘‘क्या अरमिंदर पर यकीन किया जा सकता है? अगर उस ने तन्नी की मरजी के खिलाफ कोई जबरदस्ती की तो?’’ जगजीत ने सवाल किया.
‘‘अगर उस ने ऐसा करने की गलती की, तो हम सब मिल कर उसे ऐसा सबक सिखाएंगे कि उस की अक्ल ठिकाने आ जाएगी,’’ हरजीत ने मजबूती से अपनी बात कही.
हरजीत की बात में दम था, लेकिन इस का अंजाम खतरनाक भी हो सकता?था.
बहुत सोचनेसमझने के बाद सब का फैसला हरजीत के हक में था. तनवीर को इस नाम की शादी के लिए राजी करने की जिम्मेदारी औरतों को दी गई.
तनवीर को समझ पाना इतना आसान नहीं था. भारत वापस जाने के नाम पर तनवीर कांप उठती. सौतेली मां ने जाते समय कड़ी चेतावनी दी थी, ‘अमेरिका का लड़का फांस कर हमारा बड़ा नाम किया है. खबरदार, जो पलट कर मुंह दिखाया, तो तेरी खैर नहीं.’
तनवीर को अपनी छाती से लगा कर मनजीत ने समझाया, ‘‘देख तन्नी, तू मेरी छोटी बहिन जैसी?है. तेरी भलाई के लिए ही हम ने यह फैसला लिया?है.
‘‘कुलदीप नहीं चाहता था कि तू कभी वापस भारत जाए. यहां रह कर तू एक नई जिंदगी जी सकती है, पर उस के लिए परमानैंट वीजा चाहिए.’’
सब के समझने से तनवीर का विरोध ज्यादा देर नहीं टिक सका. सब ने उस की सलामती की जिम्मेदारी ली थी.
अरमिंदर से जब बात की गई, तो उस ने सपाट लहजे में कह दिया, ‘‘जरूरतमंद लड़कियों और औरतों को परमानैंट वीजा दिलाना मेरा काम है. पैसे मिलेंगे तो तनवीर तो क्या, मैं किसी से भी शादी करने के लिए तैयार हूं.’’
‘‘पर एक बात समझ ले अरमिंदर, हमारी तनवीर पैसे देने की हालत में नहीं है. उस की मदद कर दे बस,’’ सरदारजी ने प्यार से कहा.
‘‘तू तनवीर की मदद कर दे. हम सब मिल कर जो भी बनेगा, पैसा इकट्ठा कर के तुझे दे देंगे,’’ जगजीत ने मिन्नत की.
‘‘वाह, मुझे क्या इतना गयागुजरा समझ लिया? मुझे भीख के पैसे नहीं चाहिए,’’ अरमिंदर ने कुछ नाराजगी से कहा.
‘‘माना कि यह शादी बस नाम के लिए होगी, पर पैसों की भरपाई की जगह जब तक तनवीर को परमानैंट वीजा नहीं मिल जाता, वह तेरा घर संभालेगी. तेरे लिए रोटी बनाएगी, साफसफाई करेगी. बोल, यह सौदा मंजूर है?’ सरदारजी ने पूछा.
‘‘ठीक है, परमानैंट वीजा मिलते ही मैं तनवीर को तलाक दे दूंगा. उस वक्त यह शर्त मत रखिएगा कि उसे जिंदगीभर के लिए सहारा दूं.’’
अरमिंदर की ‘हां’ से सभी के चेहरे खिल उठे.
गुरुद्वारे में दोनों की शादी के समय सारी बिरादरी जमा हुई थी. तनवीर के आंसू चुन्नी से पोंछ कर सतवंत ताई ने तसल्ली दी, ‘‘घबरा मत तन्नी, शादी तो नाम के लिए है. कुछ महीने बाद तू यहां रह सकेगी. हम सब तेरे साथ हैं बेटी.’’
‘‘मुझे तो लगता है कि अरमिंदर जैसा बुरा इनसान भी हमारी तन्नी के साथ रह कर अच्छा इनसान बन जाएगा. अगर दोनों के मन मिल गए, तब तो बल्लेबल्ले. क्यों तन्नी?’’ उस गंभीर माहौल को मनजीत ने अपने मजाक से हलका करना चाहा.
आंसू?भरी आंखों के साथ तनवीर उस बदनाम अरमिंदर के घर आ गई. घर पर एक नजर डालते हुए अमरिंदर ने तनवीर से कहा, ‘‘एक बात अच्छी तरह से समझ ले. इस घर को अपना घर समझाने की भूल कभी मत करना. यह कमरा तेरा वेटिंगरूम है. जिस दिन तेरा टिकट मिल गया, अपनी गाड़ी पकड़ कर चलती बनना.’’
‘‘जी…’’ यह सुन कर तनवीर की आंखें भर आईं.
‘‘एक बात और साफ कर दूं. यह मेरा घर है, तू यहां गृहस्थी जमाने की कोशिश मत करना. घर में कुछ बरतन जरूर पडे़ हैं, पर रोटी पकाने का कोई सामान नहीं है. अब कुछ वक्त तु?ो यहां रहना है, तो कुछ इंतजाम करना होगा. आज बाहर से खाना आ जाएगा. मुश्किल में पड़ गया मैं तो,’’ अरमिंदर का गुस्सा फूट पड़ा.
अरमिंदर के जाने के बाद एक लड़का खाने की थाली के साथ आ पहुंचा. वह बोला, ‘‘भाभी, आप के लिए खाना लाया हूं. अरमिंदर भाई ने कहा है कि आप उन का इंतजार मत करना.’’
तनवीर की रुलाई फूट पड़ी. कुलदीप उसे कितने प्यार से खाना खिलाता था, पर अब कुलदीप कहां था? खाना छूने का भी मन नहीं किया. आंखों से नींद भाग चुकी थी. क्या से क्या हो गया था.
देर रात दरवाजा खुलने की आवाज पर तनवीर डर गई. कमरे की खिड़की से बाहर झंकने पर हाथ में बोतल के साथ डगमगाते कदमों से अरमिंदर आता दिखाई दिया.
नशे में धुत्त अरमिंदर अपने कमरे में चला गया. इस आदमी के साथ तनवीर कैसे रहेगी?
सुबह नहाधोकर तनवीर काम से फारिग हो चुकी थी और सोच रही थी, ‘पता नहीं, वह चाय पीता भी है या नहीं?’
ताई ने समझाया था, ‘समझदारी से कुछ वक्त निकालना होगा तन्नी. अपने को उस से बस दूर रखना. इस बीच उस की और उस के घर की ठीक से देखभाल कर लेना.’
तनवीर की सोच को अरमिंदर की आवाज ने तोड़ा था, ‘‘तू ने कल रात खाना नहीं खाया. थाली वैसे ही रखी हुई थी. क्यों?’’ ‘‘जी… भूख नहीं थी.’’
‘‘एक बात समझ ले. यहां कोई मानमनौव्वल करने वाला नहीं है. सरदारजी ने कहा है कि तू सारा घर संभालेगी. भूखी रह कर काम कैसे कर पाएगी. तू चाय पीती है?’’
‘‘जी, आप चाय लेंगे?’’ तनवीर ने सहमते हुए पूछा.
‘‘मैं ने कहा न कि अपने काम से काम रख. मेरी जिंदगी में दखल मत दे. कल कुछ सामान आया था. चाय की पत्ती, चीनी वगैरह होगी. दूध फ्रिज में होगा,’’ अपनी बात कह कर अरमिंदर बाहर चला गया जा तेजाते अरमिंदर कह गया, ‘‘किसी अनजान के लिए दरवाजा मत खोलना. अपने लिए खाना पका लेना.’’
रात की थाली में से एक रोटी गले से उतार कर तनवीर ने पानी पी लिया. इस जिंदगी की तो उसे आदत डालनी ही होगी.
तनवीर ने कमरा ठीक कर दिया. वह समझ नहीं पा रही थी कि दिन कैसे कटेगा. कुलदीप की यादें उसे कचोट रही थीं. सूना घर उसे काटने को दौड़ रहा था.
रात में तनवीर ने दालसब्जी के साथ रोटियां बना दीं. अगर अरमिंदर आ गया, तो खाना परोस देगी.
रात को बहुत देर तक इंतजार करने के बाद उस ने 2 रोटियां खा लीं. ताई ठीक कहती हैं, ‘कुछ भी हो जाए, यह पापी पेट नहीं मानता. इसे तो भरना ही पड़ता है.’
फिर वही दरवाजा खुलने की आवाज और अरमिंदर का लड़खड़ाते कदमों से घर में आना तनवीर को डरा गया. अगर कभी अरमिंदर ने उस के साथ जबरदस्ती की, तो वह क्या करेगी? कल से अपने बंद दरवाजे के आगे मेज लगा कर सोएगी.
अरमिंदर ने तनवीर को परमानैंट वीजा दिलाने का काम शुरू कर दिया. इतने दिनों में तनवीर काफी सामान्य हो चली थी. अरमिंदर ने कभी कोई गलत हरकत नहीं की, बल्कि उस की जरूरतों के बारे में पूछ कर वह उस का मन हलका कर देता.
एक दिन अरमिंदर काम पर जाने को निकलने ही वाला था कि तनवीर एक डब्बा ले कर आ गई, ‘‘आप के लिए खाना बनाया है…’’
‘‘क्या मैं ने कहा था कि मेरे लिए खाना बना?’’ अरमिंदर ने रूखेपन से कहा.
‘‘आप रोज बाहर का खाना खाते हैं. घर में रोटी बनती है, इसलिए…’’
‘‘देख तनवीर, मैं ने पहले ही कह दिया था कि रोटी का डब्बा थमा कर मेरी घरवाली बनने की कोशिश मत कर… समझ?’’
अरमिंदर की इस सख्त बात पर आंसू भरी आंखों के साथ तनवीर अपने कमरे में चली गई. काफी देर बाद उस ने बाहर आने पर देखा, रोटी का डब्बा नहीं था.
उस शाम अरमिंदर कुछ जल्दी घर आ गया. रोटी वाला डब्बा रसोईघर में रख कर उस ने कहा, ‘‘तेरा डब्बा तो मेरे साथी खाली कर गए. कह रहे थे कि सब्जी अच्छी बनी थी.’’
अरमिंदर की इस बात से तनवीर का चेहरा खुशी से चमक उठा. उस दिन के बाद से तनवीर रोज अरमिंदर को खाने का डब्बा थमाने लगी, पर शाम का वही रूटीन चलता रहा.
सतवंत ताई और मनजीत भाभी अकसर तनवीर के पास आ जाती थीं. साफसुथरा घर देख कर मनजीत के चेहरे पर शरारत छलक आई, ‘‘वाह तन्नी, देखती हूं, तू ने अरमिंदर का घर संवार दिया है. चमक रहा है घर. एक बात बता, क्या तू ने घर के मालिक को भी संभाल लिया है?’’
‘‘चुप कर मनजीत. जो मुंह में आता है, बोल देती है. सहीगलत का तो ध्यान रखा कर. हां तन्नी बेटी, बता अरमिंदर तुझे परेशान तो नहीं करता?’’ सतवंत ताई ने पूछा.
‘‘नहीं ताई, उन्होंने कभी परेशान नहीं किया. वे मेरी जरूरतों का खयाल रखते हैं,’’ तनवीर के चेहरे पर थोड़ी सी खुशी झलक आई.
‘‘क्या कहा तन्नी? वह तेरी हर जरूरत का खयाल रखता है?’’ मनजीत कान में फुसफुसाई.
तनवीर का चेहरा शर्म से लाल हो आया. ताई ने राहत की सांस ली, ‘‘चल, यह सुन कर तसल्ली हुई. हम सब तो डरते थे कि कहीं वह तेरे साथ कोई बदसुलूकी न करे.’’
तन्नी को आशीर्वाद दे कर वे दोनों चली गईं. रास्ते में मनजीत को चुप देख कर सतवंत ताई ने पूछा, ‘‘क्या सोच रही है मनजीत?’’
‘‘एक बात का डर लग रहा है ताई. कहीं तन्नी उस अरमिंदर शैतान के जाल में न फंस जाए. वह तो प्यार का मतलब भी नहीं जानता. कहीं हमारी तन्नी धोखा न खा बैठे.’’
‘‘क्या पता, तन्नी के साथ रह कर अरमिंदर ही सुधर जाए.’’
अमेरिका के उस हिस्से में सिख और पंजाबी जोरशोर से बैसाखी मनाते थे. बैसाखी के 2 दिन पहले अरमिंदर ने तनवीर को एक कीमती सलवारसूट दे कर उसे हैरानी में डाल दिया.
उस ने सपाट लहजे में कहा, ‘‘परसों पास के मैदान में बैसाखी का मेला लगेगा. यह सूट पहन कर चली जाना.’’
‘‘आप नहीं चलेंगे?’’
‘‘नहीं. तेरी ताई और भाभी तुझे ले जाएंगी. ये कुछ पैसे रख ले, जो जी चाहे खरीद लेना.’’
नोटों का एक बड़ा बंडल देख कर तन्नी डर गई, ‘‘नहीं, मुझे पैसे नहीं चाहिए. मैं मेले में नहीं जाऊंगी.’’
‘‘देख, यह औरतों का मनपसंद मेला है. तू वहां जरूर जाएगी. मैं भाभी को बोल चुका हूं,’’ इतना कह कर अरमिंदर वहां से चला गया.
मनजीत के साथ कई औरतें आई थीं. तन्नी को नया सूट पहने देख कर मनजीत की नजर ठहर गई, ‘‘वाह तन्नी, तू ने तो बड़ा प्यारा सूट पहना है.’’
‘‘वे लाए हैं…’’ शरमाती हुई तन्नी बस इतना ही कह सकी.
‘‘ओए… होए, यह ‘वे’ कौन हैं जी?’’
सब की हंसी ने तन्नी का चेहरा लाल कर दिया. मेले में सब ने खूब मजे किए. उतनी देर के लिए तनवीर अपना दुख भुला बैठी. घर लौटने पर उम्मीद के उलट अरमिंदर घर में ही था.
‘‘कैसा था मेला?’’ अरमिंदर ने पूछा.
‘‘बहुत मजा आया. मनजीत भाभी ने जबरदस्ती चूडि़यां दिलवा दीं…’’ तनवीर ने चहकते हुए बताया.
‘‘ठीक है, बहुत रात हो गई. जा, सो जा,’’ अपने कमरे का दरवाजा बंद कर अरमिंदर ने तन्नी के जोश पर ठंडे पानी के छींटे डाल दिए.
अब तन्नी को जिंदगी मुश्किल नहीं लगती थी. उसे अरमिंदर के आने का इंतजार रहता. उस का मनपसंद खाना बना, उस की तारीफ के दो शब्द सुनने को वह उतावली रहती. समझ नहीं पाती, अरमिंदर को लोग खराब क्यों कहते हैं?
कुलदीप की यादें अब धुंधली होने लगी थीं. अपनी नई जिंदगी से तन्नी ने समझौता कर लिया था.
एक दिन अरमिंदर को शराब पीते देख कर वह बोल उठी, ‘‘आप इतनी शराब न लिया करें, नुकसान करती है.’’
‘‘मेरे फायदेनुकसान से तुझे क्या लेनादेना है? इस बारे में तो मैं ने कभी सुरजीत का कहा भी नहीं माना,’’ तन्नी की बात बीच में ही काट कर अरमिंदर ने रूखेपन से कहा.
‘‘जी, सुरजीत कौन थीं?’’
‘‘थी नहीं, है. उस की यादें इस दिल में इतनी गहरी बैठी हैं, जिन्हें कोई नहीं मिटा सकता. मेरी सबकुछ है सुरजीत.’’
‘‘अब वे कहां हैं?’’
‘‘मु?ो छोड़ गई. मेरे ही दोस्त के साथ घर बसा लिया उस ने, पर मैं पूरी जिंदगी उस का इंतजार करूंगा. अगर मेरा प्यार सच्चा है, तो वह मेरे पास जरूर आएगी.’’
न जाने क्यों अरमिंदर की इस बात से तनवीर का दिल बैठ गया. कई कहानियां याद हो आईं. प्रेमिका या प्यारी बीवी के न रहने पर लोग देवदास बन जाते हैं, पर सच्ची जीवनसंगिनी मिल जाने पर पुराने घाव भर जाते हैं. क्या तनवीर के साथ ने अरमिंदर पर कोई असर नहीं डाला?
2 दिन बाद हाथ में लिफाफा लिए अरमिंदर ने खुशीखुशी तनवीर से कहा, ‘‘ले, तेरा परमानैंट वीजा आ गया. आज से तेरी छुट्टी. खुशी मना. जहां जी चाहे, जा सकती है.’’
‘‘कहां जाऊं मैं?’’
‘‘अरे, अब तू जो चाहे काम कर सकती है. तलाक होते ही किसी अच्छे लड़के के साथ शादी कर के घर बसा सकती है.’’
‘‘मैं यहां क्यों नहीं रह सकती?’’
‘‘क्या कह रही है? कहीं तू खुद को मेरी घरवाली तो नहीं मान बैठी? देख तन्नी, मैं ने पहले ही कह दिया था कि जिस दिन तेरा टिकट आएगा, तु?ो यहां से जाना होगा. मेरा घर तो तेरे लिए मुफ्त की सराय था. अब तेरा दानापानी यहां से उठ गया.’’
‘‘मैं इस घर के एक कोने में पड़ी रहूंगी. मु?ो यहां रहने दीजिए,’’ तन्नी की आंखों में आंसू थे.
‘‘आंसू बहाना बेकार है. मैं ने तु?ो कोईर् धोखा नहीं दिया है. पहले ही साफसाफ बता दिया था कि तेरामेरा कोई रिश्ता नहीं है. मैं प्यारव्यार में यकीन नहीं रखता… सम?ा?’’
‘‘अगर यह सच है, तो आप सुरजीत को याद क्यों करते हो?’’ अचानक तन्नी तड़प उठी.
‘‘सुरजीत का नाम मत ले. एक सच जान ले कि इस दुनिया में पैसा ही सबकुछ है. अगर उस वक्त मेरे पास इतने पैसे होते, तो सुरजीत क्यों जाती?’’ अरमिंदर की आवाज तल्ख हो आई.
‘‘मुझे पैसों का जरा भी मोह नहीं है. मैं आप का घर देखूंगी…’’
‘‘फिर वही बात. जब तू मुझे छोड़ेगी, तभी तो किसी और के साथ शादी कर पैसे कमाऊंगा. तेरी वजह से अपना धंधा चौपट नहीं कर सकता. मैं तलाक की अर्जी दे रहा हूं.’’
‘‘ठीक है, तो मुझे भी कोईर् पैसे कमाने वाला काम दिला दो. मैं चली जाऊंगी,’’ तन्नी ने आंसू पोंछ दिए.
‘‘तू किसी के साथ शादी कर के आराम की जिंदगी जी सकती है. तू कहे, तो मैं कोईर् अच्छा लड़का देखूं?’’
‘‘नहींनहीं, मुझे शादी नहीं करनी है. शादी का सुख मेरे नसीब में ही नहीं लिखा है.’’
अरमिंदर सोच में पड़ गया. कुछ देर बाद वह बोला, ‘‘तू पढ़ीलिखी तो नहीं है, अंगरेजी जाने बिना कोई ठीक काम मिल नहीं सकता. 5वीं पास औरत क्या कर सकती है?’’
‘‘मैं कोई भी काम कर सकती हूं. किसी के घर रोटी पकाने का काम तो मुझे मिल ही जाएगा न?’’ तन्नी ने कहा.
‘‘एक काम कर सकती है. बुरा न माने तो कहूं.’’ ‘‘कहिए?’’
‘‘मेरे एक चाचा का बेटा हरमिंदर अमेरिका आना चाहता है, लेकिन आजकल वीजा मिलना मुश्किल है. तू उस के साथ शादी कर के मुंहमांगे पैसे पा सकती है. देख, मैं ने मुफ्त में तेरी मदद की है, तू पैसे ले कर मेरा एहसान उतार सकती है.’’
‘‘आप यह क्या कह रहे हो? यह तो पाप है.’’
‘‘हरमिंदर के साथ भी तेरी शादी नाम के लिए होगी. तेरी मरजी के बिना वह मुझे छुएगा भी नहीं.’’
‘‘नहींनहीं, यह नहीं हो सकता…’’
‘‘सोच ले. मैं तो कहता हूं, तेरा परमानैंट वीजा तेरे लिए तुरुप का पत्ता है. मेरी तरह शादी कर के जरूरतमंदों को वीजा दिला कर खूब पैसे बना सकती है. इस बीच अगर किसी से मन मिल जाए, तो घर भी बसा सकती है.’’
‘‘नहीं, मेरे लिए तो यह सुनना भी गलत है,’’ चुन्नी से चेहरा ढक कर तन्नी अपने कमरे में चली गई.
रातभर जागी तन्नी ने सूजी आंखों के साथ सुबह अरमिंदर को फैसला सुना दिया, ‘‘अपने हरमिंदर को बता दो, मैं शादी करने को तैयार हूं.’’
‘‘वाह, यह हुई न बात. मैं अभी भारत फोन लगाता हूं. जब तक हमारा तलाक होता है, तू भारत जा कर चाचा के यहां रह कर सब देखसम?ा लेना.’’ ‘‘जी…’’
‘‘तू जल्दी से अपना सामान पैक कर ले. मैं तेरा टिकट बुक करा देता हूं,’’ कहते हुए अरमिंदर फोन पर टिकट बुक कराने लगा.
तन्नी का भारत जाने का टिकट आ गया. टिकट थामती तन्नी को लगा, जैसे उस की मौत का फरमान आ गया हो.
अरमिंदर ने एक हजार डालर देते हुए समझया, ‘‘इन्हें मुश्किल घड़ी के लिए संभाल कर रखना. चाचा के यहां तुझे एक पैसा भी खर्च नहीं करना होगा. वापसी होने पर हरमिंदर को मैं अपने साथ काम पर लगा लूंगा.’’
‘‘ठीक है, उसे भी परमानैंट वीजा मिलने पर अपनी तरह जरूरतमंदों को वीजा दिलाने के धंधे में लगा लेना,’’ तन्नी की कड़वी आवाज अनचाहे ही निकल गई.
‘‘चुप कर. इस काम से मुझे कोई खुशी नहीं मिलती. सच यही है कि सच्चा प्यार भी पैसा चाहता है.’’
‘‘अब तो तुम पैसे वाले हो, घर क्यों नहीं बसा लेते? कुछ भी कहो, तुम्हें इस काम में मजा आता है.’’
‘‘मैं क्या करता हूं, यह मेरी मरजी है. तू अपने काम से मतलब रख. अपनी जिंदगी में दखलअंदाजी करने का हक मैं ने किसी को भी नहीं दिया है.’’
जगजीत तन्नी को एयरपोर्ट तक छोड़ने के लिए अपनी टैक्सी के साथ आ चुका था.
तन्नी के हाथ से सूटकेस ले कर जगजीत ने पूछा, ‘‘अचानक भारत क्यों जा रही हो? हम तो तेरे परमानैंट वीजा मिलने पर खुशी मना रहे थे. सरदारजी तुझे कोई काम दिलाने की सोच रहे हैं. अच्छा हुआ, तुझे अरमिंदर से छुटकारा मिल गया.’’
‘‘हां भैया, मैं जल्दी आऊंगी.’’ ‘‘किसी से मिले बिना क्यों जा रही हो? अभी भी वक्त है, उधर होता चलूं?’’
‘‘नहीं भैया. सीधे एयरपोर्ट चलना है. मैं वापस आ कर उन्हें समझ दूंगी.’’ ‘‘अरमिंदर कहां है? तुझे छोड़ने नहीं आएगा?’’
‘‘मैं कौन सी उन की रिश्तेदार लगती हूं? बहुत एहसान कर दिया उन्होंने. अब और नहीं,’’ तनवीर की आवाज में कड़वाहट घुल गई.
एयरपोर्ट पर तन्नी को छोड़ कर जगजीत चला गया. सूटकेस खींचती तनवीर काउंटर की ओर जा ही रही थी कि अचानक अरमिंदर की आवाज कानों में गूंजी, ‘‘वापस चल तन्नी. तू कहीं नहीं जाएगी.’’
‘‘क्या… क्यों?’’ हैरान तन्नी और कुछ नहीं पूछ सकी.
‘‘क्योंकि मैं तेरे बिना नहीं रह सकता. सुरजीत की झूठी यादों के सहारे जीने की कोशिश में खुद को बहुत सजा दे चुका हूं. मेरे कहेसुने को माफ कर दे. चल, मेरा घर तेरा इंतजार कर रहा है.’’
यह सुन कर अरमिंदर की फैली बांहों में वह समा गई. Love Story in Hindi




