Short Story in Hindi. सत्यप्रकाश के नाम में ही ‘सत्य’ था. यही उस की सब से बड़ी ताकत भी थी और कमजोरी भी. सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटतेकाटते उस की चप्पलें घिस चुकी थीं. उस ने देखा था कि कैसे एक गरीब किसान अपने हक के मुआवजे के लिए बाबू के सामने गिड़गिड़ा रहा था और वहीं दूसरी ओर एक रसूखदार आदमी नोटों की गड्डी थमा कर चंद मिनटों में अपना गलत काम करवा कर मुसकराते हुए निकल गया था.
सत्यप्रकाश का खून खौल उठता था. जब उस ने एक दिन दफ्तर में हो रहे इस नाइंसाफी के खिलाफ गुस्से में आवाज उठाई तो सिस्टम ने मिल कर उसी पर ‘सरकारी काम में बाधा डालने’ का आरोप मढ़ दिया. ऊंची पहुंच वालों के सामने सिस्टम नतमस्तक था और सत्य अकेला खड़ा था.
इस सिस्टम को बदलने और लोगों का दुखदर्द दूर करने के लिए सत्यप्रकाश ने समाजसेवा के क्षेत्र में कदम रखा.
उस ने तय किया कि वह नाइंसाफी के खिलाफ लड़ेगा, लेकिन यह राह कांटों भरी थी.
सत्यप्रकाश ने जब एक भ्रष्ट अफसर व स्थानीय नेता के गठजोड़ के खिलाफ मोरचा खोला तो मुश्किलें उस के दरवाजे पर दस्तक देने लगीं. धमकियां, झूठे मुकदमे और अपनों का दूर होना… सब एकसाथ शुरू हुआ.
एक शाम जब सत्यप्रकाश थकाहारा चाय की दुकान पर बैठा था, इलाके के एक बुजुर्ग रामदीन चाचा उस के पास आए. रामदीन चाचा ने उस के कंधे पर हाथ रखा और धीमी आवाज में कहा, ‘‘सत्य, क्यों इस सेवा के कीचड़ में कूदे हो बेटा? आज का सिस्टम भ्रष्ट है. यहां जो नेताओं के चाटुकार हैं, घूसखोर हैं, बेईमान हैं, वे ही सुखी हैं. गलत लोगों की तरह बड़ी पहुंच बनाओ, अपना घर भरो… वरना भरत भूषण तिवारी की तरह मार दिए जाओगे.’’
सत्यप्रकाश ने चौंक कर रामदीन चाचा की तरफ देखा. रामदीन चाचा की आंखों में खौफ और तजरबा दोनों था.
उन्होंने आगे कहा, ‘‘दुनिया का यही दस्तूर है सत्य, अपना उल्लू सीधा करो, सुखी रहोगे. इस मुगालते में मत रहना कि कोई तुम्हारे साथ खड़ा होगा. अगर तुम मार दिए गए तो यही मोमबत्तियां उठाने वाले समाजसेवी तुम्हारे नाम पर अपनी रोटियां सेंकेंगे, अपना उल्लू सीधा करेंगे, लेकिन जीतेजी तुम्हारा साथ कोई नहीं देगा. सब तमाशबीन हैं.’’
चाचा की बातें सत्यप्रकाश के सीने में तीर की तरह चुभ गईं. उस रात वह सो नहीं सका. वह खिड़की के पास खड़ा हो कर अंधेरे आसमान को निहारता रहा. उस के मन में विचारों का बवंडर चल रहा था, ‘देश में यह सब क्या हो रहा है? जहां ईमानदारी एक गुनाह बन गई है और बेईमानी एक काबिलीयत? कैसे सुधार होगा इस सिस्टम का? क्या वाकई इस अंधेरे से जीतने का कोई रास्ता नहीं है?’
तभी सत्यप्रकाश को अपने भीतर से एक आवाज सुनाई दी. उसे याद आया कि निराशा के सब से घने दौर में भी इनसान को अपने अंदर की उम्मीद को मरने नहीं देना चाहिए. हालात चाहे जितनी भी उलट हों, हवाएं चाहे जितनी भी खिलाफ हों, हार मान लेना कोई औप्शन नहीं था.
सत्यप्रकाश ने मन ही मन कहा, ‘प्रवाह में ठहराव है, मंजिल नहीं, पड़ाव है… रात भले ही सारी पड़ी हो और बाहर का अलाव बुझा सा हो, लेकिन मैं अपने भीतर के अलाव को बुझने नहीं दूंगा…’
सत्यप्रकाश को समझ आ गया कि सुधार रातोंरात नहीं होगा और न ही यह लड़ाई आसान है. लेकिन अगर हर कोई डर कर अपना उल्लू सीधा करने में लग गया तो यह समाज पूरी तरह अंधकार
में डूब जाएगा. भरत भूषण तिवारी जैसे लोगों की शहादत बेकार न जाए, इस के लिए किसी न किसी को तो मशाल थामे रखनी होगी.
अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण सड़कों पर पड़ी तो सत्यप्रकाश की आंखों में निराशा के आंसू नहीं, बल्कि एक नया संकल्प था. उस ने अपनी डायरी उठाई, चप्पल पहनी और एक बार फिर नाइंसाफी के खिलाफ गवाही देने के लिए घर से निकल पड़ा. वह अकेला था, पर अब उसे भीड़ की परवाह नहीं थी.




