Social Issue. झारखंड में रांची की सड़कों पर प्रतियोगी परीक्षाओं में तथाकथित धांधली और अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन कर रहे छात्रों के बीच जोकुछ हुआ वह केवल एक छात्र नेता के ऊपर स्याही फेंके जाने की घटना नहीं है. यह घटना उस सोच पर गंभीर सवाल खड़ा करती है जो सवालों का जवाब सवालों से नहीं तर्क का जवाब तर्क से नहीं और असहमति का जवाब संवाद से नहीं देना चाहती.
जब छात्र अपने भविष्य को ले कर सवाल पूछने सड़क पर उतरते हैं और उन के आंदोलन के बीच आल इंडिया स्टूडैंट्स एसोसिएशन की प्रदेश अध्यक्ष नेहा बोरा पर स्याही फेंकी जाती है तो हमें इस घटना को केवल निजी अपमान के रूप में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक असहमति के प्रति बढ़ती असहिष्णुता के लिहाज से भी देखना चाहिए.
नेहा बोरा पर स्याही फेंकने की घटना इसलिए भी खास है, क्योंकि इस के पीछे केवल एक शख्स का गुस्सा नहीं दिखाई देता, बल्कि यह सवाल सामने आता है कि आखिर छात्रों की आवाज से इतनी बेचैनी क्यों है? अगर नेहा गलत हैं तो उन के सवालों का जवाब दिया जाना चाहिए. अगर छात्र आंदोलन की मांगें गलत हैं तो सरकार और प्रशासन को तथ्यों के साथ उन्हें गलत साबित करना चाहिए. अगर परीक्षा में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं हुई है तो जांच के बाद हालात साफ होने चाहिए, लेकिन किसी के चेहरे और कपड़ों पर स्याही डाल देना किसी सवाल का जवाब नहीं हो सकता.
यह घटना हमें इतिहास के एक बहुत पुराने दृश्य की याद दिलाती है. 10वीं सदी में जब सावित्रीबाई फुले लड़कियों को पढ़ाने के लिए घर से निकलती थीं तब उन के रास्ते में भी विरोध खड़ा किया जाता था.
उन पर गोबर और कीचड़ फेंका जाता था. उन का अपराध क्या था? उन का अपराध सिर्फ इतना था कि वे लड़कियों को पढ़ाना चाहती थीं. वे उस सामाजिक सिस्टम को चुनौती दे रही थीं जो मानता था कि पढ़ाईलिखाई पर कुछ लोगों का अधिकार है और लड़कियों को पढ़ने की जरूरत नहीं है. पर सावित्रीबाई ने फुले उस अपमान के सामने अपने कदम नहीं रोके.
उस समय गोबर और कीचड़ फेंका गया था, आज स्याही फेंकी जा रही है. साधन बदल गया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या विरोध की वह मानसिकता आज भी कहीं हमारे बीच मौजूद नहीं है? जब कोई महिला अपने अधिकारों की बात करती है, जब कोई नौजवान सिस्टम से सवाल करता है, जब कोई छात्र अपनी मेहनत और भविष्य की सुरक्षा की मांग करता है और उस के जवाब में उसे अपमानित करने की कोशिश होती है, तो हमें उस सोच को पहचानना होगा जो सवाल से घबराती है.
सावित्रीबाई फुले पर गोबर और कीचड़ फेंकने वाले लोग उस समय शायद यही सम झते थे कि उन के विरोध से लड़कियों की पढ़ाईलिखाई का रास्ता रुक जाएगा. उन्हें लगता होगा कि अपमान से सावित्रीबाई फुले डर जाएंगी और स्कूल जाना छोड़ देंगी. लेकिन वे इतिहास को नहीं सम झ पाए. गोबर और कीचड़ उन के कपड़ों पर लगा था, उन के विचारों पर नहीं. उन का रास्ता रोका गया, लेकिन शिक्षा का रास्ता नहीं रुका. उन का अपमान किया गया, लेकिन लड़कियों के पढ़ाईलिखाई के अधिकार का सवाल खत्म नहीं हुआ.
आज नेहा बोरा के साथ हुई घटना को भी इसी ऐतिहासिक संदर्भ में देखना जरूरी है. स्याही उन के चेहरे और कपड़ों पर पड़ी है लेकिन सवाल उन के चेहरे पर नहीं, व्यवस्था के सामने है. स्याही धुल जाएगी. कपड़े बदल जाएंगे. चेहरा साफ हो जाएगा. लेकिन जिन सवालों को ले कर छात्र सड़क पर हैं, वे तब तक बने रहेंगे जब तक उन का जवाब नहीं मिलता.
केवल नेहा का सवाल नहीं है, बल्कि यह हजारों छात्रों का सवाल है. यह उन अभ्यर्थियों का सवाल है जिन्होंने सालों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की है. यह उन परिवारों का सवाल है जिन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए अपनी सीमित आमदनी खर्च की है. यह उन नौजवानों का सवाल है जिन्होंने अपनी उम्र के बहुत अहम साल किताबों के बीच बिताए हैं और इस भरोसे के साथ परीक्षा दी है कि अगर वे मेहनत करेंगे तो उन्हें अपनी योग्यता के आधार पर अवसर मिलेगा.
प्रतियोगी परीक्षा किसी विद्यार्थी के लिए महज कुछ घंटों की परीक्षा नहीं होती. उस के पीछे कई सालों की मेहनत होती है. किसी छोटे शहर या गांव का छात्र अपने घर से निकल कर किराए के कमरे में रहता है. कभी कोचिंग करता है, कभी पुस्तकालय में घंटों बैठता है, कभी पैसे से जुड़ी परेशानियों से जू झता है. उस के परिवार को उम्मीद होती है कि एक दिन उस की नौकरी लगेगी और घर के हालात बदलेंगे.
ऐसे में यदि परीक्षा प्रक्रिया में कथित अनियमितता की खबर आती है या प्रश्नपत्र, नतीजे या भरती प्रोसैस की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं तो उस का असर केवल एक परीक्षा पर नहीं पड़ता. इस से पूरे परिवार का भरोसा टूटता है. यही वजह है कि रांची में छात्र सड़क पर हैं. उन्हें केवल नौकरी नहीं चाहिए, उन्हें निष्पक्ष अवसर चाहिए.
उन्हें केवल परीक्षा नहीं चाहिए उन्हें ऐसी परीक्षा चाहिए जिस पर उन्हें भरोसा हो. उन्हें केवल नतीजा नहीं चाहिए, उन्हें यह विश्वास चाहिए कि नतीजा उन की मेहनत और योग्यता के आधार पर आया है. और जब यह भरोसा टूटता है तो आंदोलन पैदा होता है.
सरकार को इस आंदोलन को केवल राजनीतिक विरोध के रूप में देखने से बचना चाहिए. किसी आंदोलन में राजनीतिक संगठन शामिल हो सकते हैं. अलगअलग विचारधाराओं के लोग भी हो सकते हैं. लेकिन इस से आंदोलन में उठाए गए हर सवाल को झूठा नहीं कहा जा सकता. छात्रों की मांगों की जांच होनी चाहिए. जो सही हो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए और जो गलत हो उसे तथ्यों के साथ साफ किया जाना चाहिए.
लोकतंत्र में सरकार का काम केवल कानून व्यवस्था बनाए रखना नहीं है. सरकार का काम नागरिकों की आवाज सुनना भी है खासकर तब जब सड़क पर खड़े लोग राज्य के वही नौजवान हों जिन के भविष्य की जिम्मेदारी आखिरकार उसी सरकार के पास है.
आज छात्र आंदोलन का विरोध करने वाले लोगों को भी यह सम झने की जरूरत है कि किसी छात्र आंदोलन का विरोध करना अलग बात है और छात्रों के सवालों को ही गलत मान लेना अलग बात. अगर आंदोलन में कोई गलत तरीका अपनाया जा रहा है तो उस की आलोचना कीजिए. अगर कहीं हिंसा होती है तो कानून अपना काम करे. लेकिन शांतिपूर्ण सवालों को ही अपराध की तरह देखना लोकतांत्रिक समाज के लिए खतरनाक संकेत है.
दुख की बात यह है कि आज भी हमारे समाज में ऐसी सोच दिखाई देती है जो सवाल पूछने वाले को दुश्मन सम झने लगती है. जो छात्र परीक्षा की पारदर्शिता मांगता है, उसे राजनीतिक कह दिया जाता है. जो पत्रकार सवाल पूछता है, उसे पक्षपाती कह दिया जाता है.
जो लेखक सत्ता की आलोचना करता है, उसे विरोधी बता दिया जाता है. जो महिला अपने अधिकारों की बात करती है, उसे अपमानित करने की कोशिश की जाती है. यही सोच लोकतंत्र के लिए सब से बड़ा खतरा है.
सावित्रीबाई फुले के समय में भी यही हुआ था. वे लड़कियों को पढ़ाने निकलीं तो कहा गया कि वह समाज को बिगाड़ रही हैं. आज जब छात्र अपनी परीक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की मांग कर रहे हैं तो उन्हें भी तरहतरह के नाम दिए जा रहे हैं. तब सावित्रीबाई के ऊपर गोबर और कीचड़ फेंका गया था, आज नेहा पर स्याही फेंकी गई है. तब भी सवाल शिक्षा का था, आज भी सवाल शिक्षा और भविष्य का है. तब भी एक महिला को अपने रास्ते से हटाने की कोशिश हुई थी, आज भी एक महिला की आवाज को अपमानित करने का प्रयास हुआ है.
समय बदला है, साधन बदले हैं, लेकिन असहमति को दबाने की सोच यदि कायम है तो हमें उस पर गंभीरता से विचार करना होगा. हालांकि यह भी जरूरी है कि किसी घटना के लिए बिना सुबूत किसी पूरे समूह या विचारधारा को जिम्मेदार न ठहराया जाए.
स्याही फेंकने वाले की निजी जिम्मेदारी और उस के पीछे की वास्तविक मंशा की जांच कानून और तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए. लेकिन इस घटना ने जिस सोच की ओर ध्यान खींचा है, उस पर बहस करना बिलकुल जरूरी है कि क्या हम ऐसा समाज बना रहे हैं जहां सवाल पूछने वाले को जवाब देने के बजाय अपमानित किया जाता है?
यदि हां, तो यह केवल नेहा बोरा की समस्या नहीं है. यह हम सब की समस्या है, क्योंकि आज जिस सवाल को आप पसंद नहीं करते, कल वही सवाल आप के दरवाजे पर खड़ा हो सकता है. आज किसी दूसरे विद्यार्थी की परीक्षा में गड़बड़ी का सवाल है. कल आप के बच्चे की परीक्षा का सवाल हो सकता है. आज किसी दूसरे की नौकरी का सवाल है. कल आप के घर के बेरोजगार युवा का सवाल हो सकता है, इसलिए निष्पक्ष भरती सिस्टम की मांग किसी एक संगठन की मांग नहीं है. यह हर उस परिवार की मांग है जिस का कोई नौजवान प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है.
सरकार को चाहिए कि वह छात्रों के प्रतिनिधियों से खुले मन से बातचीत करे. जिन परीक्षाओं को ले कर गंभीर आरोप हैं, उन की निष्पक्ष और विश्वसनीय जांच हो. यदि अनियमितता साबित होती है तो जिम्मेदार लोगों पर कठोर एक्शन हो. यदि आरोप गलत साबित होते हैं तो सरकार को तथ्यों के साथ छात्रों को सम झाना चाहिए. शिकायतों के निबटारे के लिए समयबद्ध व्यवस्था होनी चाहिए.
भरती परीक्षाओं में प्रश्नपत्र की सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, परिणाम प्रक्रिया और शिकायत निवारण को इतना पारदर्शी बनाया जाना चाहिए कि किसी विद्यार्थी को अपनी मेहनत के साथ धोखा होने का डर न रहे, क्योंकि सरकार और नौजवानों के बीच सब से जरूरी चीज भरोसा है.
सरकार कहती है कि पढ़ो, मेहनत करो, परीक्षा दो और काबिलीयत के आधार पर आगे बढ़ो. नौजवान इस बात पर विश्वास कर के अपनी जिंदगी के कई साल लगा देता है. यदि परीक्षा प्रक्रिया ही संदिग्ध हो जाए तो यह पूरा भरोसा टूट जाता है और टूटे हुए भरोसे को पुलिस की लाठी या स्याही से नहीं जोड़ा जा सकता. उसे संवाद, निष्पक्षता और न्याय से ही वापस पाया जा सकता है.
नेहा बोरा पर स्याही फेंकने वाले के खिलाफ कानून अपना काम करे. लेकिन सरकार और समाज को यह भी पक्का करना होगा कि स्याही की घटना छात्रों के मूल सवालों को ढक न दे. कहीं ऐसा न हो कि हम इस बात पर बहस करते रहें कि स्याही किस ने फेंकी और यह भूल जाएं कि हजारों छात्र सड़क पर क्यों उतरे, क्योंकि असली सवाल स्याही नहीं है. असली सवाल परीक्षा व्यवस्था है. असली सवाल बेरोजगार युवाओं का भविष्य है. असली सवाल मेहनत और योग्यता पर भरोसा है. असली सवाल सरकारी भरती की विश्वसनीयता है और असली सवाल यह है कि क्या राज्य अपने युवाओं को यह भरोसा दिला सकता है कि उन की मेहनत बेकार नहीं जाएगी.
नेहा बोरा के ऊपर पड़ी स्याही धुल जाएगी. जिस तरह सावित्रीबाई फुले के कपड़ों पर पड़ा गोबर और कीचड़ समय के साथ मिट गया. उसी तरह यह स्याही भी मिट जाएगी. लेकिन सावित्रीबाई फुले के संघर्ष की कहानी आज भी जिंदा है, क्योंकि उन्होंने अपमान के बाद अपने कदम नहीं रोके थे. उन्होंने लड़कियों को पढ़ाना नहीं छोड़ा था. आज भी यही संदेश जरूरी है. अपमान से आवाज नहीं रुकनी चाहिए.
छात्र आंदोलन को भी अपनी लड़ाई लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ानी चाहिए, क्योंकि आंदोलन की सब से बड़ी ताकत उस की नैतिकता होती है. छात्रों के हाथ में किताब और संविधान होना चाहिए, हिंसा नहीं. उन के पास तथ्य और तर्क होना चाहिए, नफरत नहीं. उन की आवाज में गुस्सा हो सकता है, लेकिन उस गुस्से को लोकतांत्रिक मर्यादा के भीतर रहना चाहिए.
सरकार को भी यह सम झना होगा कि सड़क पर खड़ा छात्र उस का दुश्मन नहीं है. वह उसी राज्य का नागरिक है. वह उसी राज्य के भविष्य का हिस्सा है. वह आज सवाल पूछ रहा है क्योंकि वह अपने भविष्य को ले कर चिंतित है. उस की चिंता को सुनना सरकार की कमजोरी नहीं, लोकतंत्र की ताकत है.
सावित्रीबाई फुले पर गोबर और कीचड़ फेंकने वाले यह नहीं सम झ पाए थे कि शिक्षा की राह पर फेंका गया कीचड़ इतिहास के पन्नों को गंदा नहीं कर सकता. आज नेहा पर फेंकी गई स्याही भी उन के सवालों को मिटा नहीं सकती. स्याही धुल जाएगी, सवाल नहीं. कपड़े बदल जाएंगे, विचार नहीं. चेहरा साफ हो जाएगा, लेकिन युवाओं के भविष्य का सवाल अपनी जगह खड़ा रहेगा.
और यदि आज भी वही सोच किसी महिला की आवाज, किसी छात्र के आंदोलन या किसी असहमति को अपमानित कर के दबाने की कोशिश करेगी तो उसे इतिहास से एक बात जरूर सीखनी चाहिए. सवालों को दबाने से सवाल खत्म नहीं होते वे और ज्यादा लोगों की आवाज बन जाते हैं.
एक नेहा बोरा को रोकने की कोशिश करोगे तो दूसरी नेहा सामने आएगी. एक छात्र की आवाज दबाओगे तो हजारों छात्र बोलेंगे. एक आंदोलन को रोकने की कोशिश करोगे तो नए सवाल पैदा होंगे, क्योंकि लोकतंत्र में आवाज दबाने से शांति नहीं आती, केवल बेचैनी बढ़ती है, इसलिए रास्ता एक ही है कि स्याही नहीं, संवाद. अपमान नहीं, तर्क. दमन नहीं, न्याय. और चुप्पी नहीं, जवाबदेही.
सावित्रीबाई फुले ने गोबर और कीचड़ के बीच भी लड़कियों के लिए शिक्षा का रास्ता नहीं छोड़ा था. आज नेहा बोरा पर स्याही फेंकी गई है, लेकिन छात्रों के सवालों का रास्ता भी नहीं रुकना चाहिए, क्योंकि स्याही शरीर पर पड़ सकती है, विचारों पर नहीं. एक आवाज को दबाया जा सकता है, लेकिन हजारों आवाजों को नहीं और जब ये हजारों आवाजें एकसाथ पूछेंगी, ‘हमारी मेहनत का भरोसा कौन देगा?’ तब सत्ता को स्याही नहीं, जवाब देना पड़ेगा. Social Issue




