Hindi Short Story. भक्तों की भीड़ बढ़ती जा रही थी. आखिर 3 महीने के मौनव्रत के बाद आज बाबा मुक्तानंद महाराज भक्तों को आशीर्वाद जो देंगे.
जैसे ही यह खबर सूबे में पहुंची, सुबह से ही बाबा के आश्रम के बाहर भक्तों की भीड़ लगने लगी. बाबा ने अपने भक्तों को आशीर्वाद देने का समय दोपहर 2 बजे तय किया था.
आश्रम में भरपूर भीड़ हो जाने के बाद बाबा के स्वयंसेवक बड़े से पंडाल में भक्तों को बैठाने में लगे हुए थे और ठीक 2 बजे बाबा के सचिव पंडित चतुरनाथ चौबे पंडाल में बैठे सभी भक्तों से बोले, ‘‘तबीयत ठीक न होने के बावजूद बाबा आप सभी से मिलने को बेकरार हैं, लेकिन आज पहले दिन पंडाल में आए भक्तों में से केवल गंभीर समस्याओं वाले भक्त ही यहां रहें और जो भक्त आज बाबा के दर्शन करने आए हैं, वे कल दोपहर में आने की कृपा करें.’’
सचिव के इस ऐलान के बाद तकरीबन आधा पंडाल खाली होने लगा. भक्त बाबा की गद्दी के पास रखे दानपात्र में कीमती सामान व नकदी डालते हुए आश्रम के बड़े दरवाजे से बाहर निकलते गए.
अब पंडाल में केवल 100-150 भक्त ही रह गए थे. बाबा के सचिव पंडित चतुरनाथ चौबे ने बारीबारी से बाकी बचे भक्तों से उन की समस्या को सुना और उन्हें बाबा की कुटिया के बाहर बने 5 गेटों के बाहर अलगअलग लाइनों में खड़ा करवा दिया. साथ ही, सभी भक्तों को यह हिदायत भी दे दी गई कि बाबा हर 5 औरतों के बाद 2 मर्दों की समस्या सुनेंगे और हल बताएंगे.
सभी भक्तों को 5 लाइनों में तरीके से खड़ा करने के बाद बाबा के सचिव ने बाबा की कुटिया के भीतर जा कर थोड़ी देर बाद बड़ा दरवाजा खोल दिया और वहीं लाउडस्पीकर से अलगअलग लाइनों में खड़ी औरतों को एकएक कर के बाबा के सामने आने को कहा.
पहली औरत के आते ही बाबा ने जोर से कहा, ‘‘ऐ देवी, तुम्हें अभी तक औलाद का सुख नहीं मिला है.’’
बाबा के इतना कहते ही वह औरत उन के पैरों में गिर गई और फल, नकदी व दूसरी चीजें उन के चरणों में रख दीं. साथ ही, अपने हाथ की सोने की अंगूठी भी उतार कर बाबा को दे दी.
बाबा ने उस औरत को भभूत और एक सेब देते हुए कहा, ‘‘अब तुम 6 महीने बाद शाम ढले आना.’’
इस के बाद दूसरी लाइन की एक औरत भीतर आई, तो बाबा ने उस के परिवार में कारोबारी घाटे की बात कही. उस औरत की आंखें खुली की खुली रह गईं और बाबा को सामान दे कर वह भी भभूत और सेब ले कर चलती बनी.
तीसरी औरत को बाबा ने उस के पति के साथ मनमुटाव की जानकारी दी. बाबा की यह बात सुन कर वह औरत भी हैरान रह गई.
अगली औरत के आने पर बाबा ने उस के बेटे की नौकरी न लगने की बात की. इसी तरह आखिरी लाइन की औरत के आने पर बाबा ने उसे बताया कि उस के पूरे परिवार को बीमारियों ने घेर रखा है.
इस तरह बारीबारी से औरत व मर्द आते रहे और बाबा उन से पूछे बिना ही उन की समस्या बता कर उन्हें अपना आशीर्वाद, भभूत, फल वगैरह प्रसाद में देते रहे. इस के एवज में तमाम भक्त नकदी, पूजा का सामान, सोने व चांदी के जेवर, कपड़े, साड़ी और दूसरी कीमती चीजें बाबा को देते रहे.
दोपहर के 2 बजे से यह सिलसिला शाम के 7 बजे तक चलता रहा. जो भी भक्त बाबा की कुटिया से बाहर आता, वह पंडाल में बैठे बाकी भक्तों को बाबा के चमत्कार के किस्से सुनाता हुआ आश्रम से बाहर निकल जाता.
जब सभी भक्त बाबा के आश्रम से चले गए, तो बाबा मुक्तानंद महाराज के सचिव पंडित चतुरनाथ चौबे कुटिया के भीतर गए और भक्तों द्वारा चढ़ाए गए चढ़ावे का हिसाबकिताब करने लगे.
सारा चढ़ावा अलगअलग छांट कर और भारी मात्रा में आए जेवरात व नकदी की गिनती वगैरह कर लेने के बाद बाबा ने कुल दान का 25 फीसदी अलग कर के एक पोटली में बांध कर सचिव को सौंप दिया.
आखिर सचिव 25 फीसदी हिस्से का हकदार तो था ही. उसी ने तो पंडाल में बैठे तमाम भक्तों को उन की परेशानियों के हिसाब से ही बाबा की कुटिया के बाहर बनी पांचों लाइनों में अलगअलग खड़ा कर दिया था.
पहली लाइन में खड़े भक्तों को औलाद सुख नहीं था, तो दूसरी लाइन में भक्त बीमारी से परेशान थे. इसी तरह चौथी लाइन के भक्तों के परिवार में नौकरी न लगने जैसी समस्याएं थीं.
लाइन के हिसाब से ही बाबा भक्तोें की समस्या का अंदाजा लगा लेते थे.
दान का एकचौथाई हिस्सा ले कर सचिव पंडित चतुरनाथ चौबे महीने की 14 तारीख को फिर से आने का वादा कर के लंबेलंबे कदमों से आश्रम से बाहर निकल गया. Hindi Short Story




